दुनिया में एक अरब से भी ज़्यादा लोग विकलांग हैं: उन्नीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
विकलांग लोग समाज में शरणार्थी नहीं, बल्कि इसका हिस्सा हैं। इनके साथ होने वाले अन्याय दिखाते हैं कि समाज इंसानी गरिमा से ज़्यादा मुनाफ़े को तरजीह देता है।
पुनर्जन्म के बाद पहली डुबकी, मार्वल हैरिस (नीदरलैंड), 2018.
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
कुछ हफ़्ते पहले जब मैं इंडोनेशिया के बांडुंग में था तब व्हीलचेयर पर निर्भर एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने विकलांग लोगों की संख्या 1.3 अरब बताई है। विकलांग लोग न तो अल्पसंख्यक हैं और न ही अपवाद। ये मानवीय अनुभवों का एक विस्तृत क्षेत्र है – मानव समाज का छठवाँ हिस्सा। फिर भी इनके बारे में यूँ चर्चा होती है जैसे वे इतिहास के हाशिए पर कहीं रहते हों। जबकि असल में वे इसके केंद्र में हैं।
विकलांगता सिर्फ़ एक जैविक अवस्था नहीं; यह अक्षमता और उसके आसपास की दुनिया के बीच के संबंध से आकार लेती है। और यह दुनिया कुछ ऐसी है: एक टूटी हुई सड़क जिस पर व्हीलचेयर का आगे बढ़ना मुश्किल है, एक क्लिनिक या अस्पताल जो इलाज से पहले फ़ीस माँगता है, अलग तरीक़ों से सीखने-समझने वाले बच्चों के लिए जगह न बनाने वाली कक्षाएँ, इंसानों की धज्जियाँ उड़ाने वाले युद्ध और ‘अनुत्पादक’ क़रार देकर लोगों को छोड़ देने वाली अर्थव्यवस्थाएँ। विकलांगता सिर्फ़ किसी अक्षमता से पैदा हुई रुकावट भर नहीं है, बल्कि यह अक्षमता, सामाजिक रुकावटों और अन्याय का गठजोड़ है।
बिस्तर पर चित्र बनातीं फ्रीडा काहलो, अज्ञात फ़ोटोग्राफ़र, 1940.
2022 में आई डब्ल्यूएचओ की महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट, ग्लोबल रिपोर्ट ऑन हेल्थ इक्वॉलिटी फ़ॉर पर्सन्स विद डिसबिलिटीज़, में काफ़ी सोच-समझकर भाषा का प्रयोग किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अक्षम व्यक्ति सिर्फ़ ‘असमानता’ का सामना नहीं करते बल्कि ‘स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं’ को भी झेलते हैं जो अन्याय पर आधारित हैं लेकिन दूर की जा सकती हैं। यह मान लेना कि ये असमानताएँ दूर हो सकती हैं अपने आप में यह मान लेना है कि ये राजनीतिक हैं और ज़ाहिर है कि पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर लिए गए फ़ैसलों का नतीजा हैं। यह 2022 की रिपोर्ट 2011 में डब्ल्यूएचओ और विश्व बैंक की एक रिपोर्ट पर आधारित है जिसमें बेहतर आँकड़े जुटाने तथा अधिक समावेशी प्रणाली तैयार करने पर ज़ोर दिया गया ताकि विकलांग लोग समाज में पूरी भागीदारी कर सकें।
प्रज्वलित आशा, रोलांडो सिगुएन्ज़ा, 2021.
2022 की डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले तथ्यों में से एक यह है कि 80% विकलांग लोग वैश्विक दक्षिण में रहते हैं। काम की जगहों पर बेहद बुरी परिस्थितियाँ, पर्यावरण का संकट, प्रदूषित भोजन और जल प्रणालियाँ, भयावह स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियाँ, और युद्ध विकलांगताएँ पैदा करते हैं और उन्हें और बढ़ा देते हैं। 2019 तक, अशांत इलाक़ों में कम से कम हर पाँच में से एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के साथ जी रहा था; युद्ध के खंडहरों में, विकलांगता केवल चोट के माध्यम से ही नहीं, बल्कि आघात, भूख और विस्थापन के माध्यम से भी बढ़ती है। ग़ज़ा अब अपाहिज बच्चों (किसी कारण से शरीर का कोई अंग काट दिया जाना) का सबसे अधिक संकेंद्रण वाला क्षेत्र है। वैश्विक दक्षिण केवल विकलांगता को समाहित नहीं करता है; विकलांगता वहाँ उन प्रणालियों द्वारा उत्पन्न की जाती है जो उसने ख़ुद नहीं बनाईं हैं।
2022 की डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट में विकलांगता और ग़रीबी के बीच के दुष्चक्र पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें कहा गया है कि ‘विकलांग लोगों की शिक्षा और रोज़गार तक पहुँचने की संभावना कम होती है’ और इसलिए ‘ अन्य लोगों की तुलना में उनके ग़रीबी में जीने की अधिक आशंका होती है’। उनके देखभाल से वंचित किए जाने, बीमारी और बहिष्कार का ज़्यादा सामना करने और जल्दी मरने की आशंका अधिक होती है। यह कोई संयोग नहीं बल्कि यही व्यवस्था चाहती है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि ये असमानताएँ तीन स्वास्थ्य परिणामों में दिखाई देती हैं: समय से पहले मृत्यु दर, बढ़ी हुई रुग्णता (मोर्बिडिटी), और दैनिक कामकाज एवं समाज में भागीदारी के लिए अधिक बाधाएँ। उदाहरण के लिए कोविड-19 के दौरान ये लंबे समय से चली आ रही असमानताएँ और भी अधिक दिखाई दीं; विशिष्ट संदर्भों में अध्ययनों में बौद्धिक या सीखने की विकलांगता वाले लोगों के बीच काफ़ी अधिक मृत्यु दर पाई गई। ये केवल चिकित्सा से जुड़े तथ्य नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी प्रणाली के ख़िलाफ़ सबूत हैं जो प्रतीकात्मक रूप से विकलांग लोगों के लिए प्रतिबद्ध है – 2006 में संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर सम्मेलन (UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से – फिर भी उन प्रतिबद्धताओं पर काम करने में असमर्थ या अनिच्छुक है।
शुभकामनाएँ, लिम अनुआर (मलेशिया), 2023.
2022 की डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि ‘विकलांग व्यक्तियों और अन्य व्यक्तियों के बीच स्वास्थ्य परिणामों के स्तर पर व्यापक अंतर मौजूद हैं। इनमें से कुछ तो असमानताएँ हैं जिन्हें अंतर्निहित स्वास्थ्य समस्याएँ या विकार माना जा सकता है; लेकिन, अन्य उन कारकों से जुड़े हैं जो अन्यायपूर्ण या अनुचित हैं।’ दूसरे शब्दों में, डब्ल्यूएचओ स्वीकार करता है कि कई ख़राब स्वास्थ्य परिणाम अपरिहार्य नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी प्रणाली द्वारा निर्मित होते हैं जो अन्यायपूर्ण और अनुचित तरीक़े से बनाई गई है।
इस प्रणाली में शामिल है:
- स्वास्थ्य प्रणाली जिसमें देखभाल के स्तर पर भुगतान करना होता है।
- जो लोग देख नहीं सकते, कम देख सकते हैं, सुन नहीं सकते या ऊँचा सुनते हैं, सार्वजनिक सूचना तंत्र को उनकी सुविधा अनुरूप नहीं बनाया गया।
- यातायात व्यवस्था ऐसी है जिसकी वजह से लोग अस्पताल तक नहीं पहुँच पाते।
- यौन हिंसा जिसका शिकार विकलांग स्त्रियाँ अधिक होती हैं।
- रोज़गार प्रणालियाँ जो लोगों को ‘अनुत्पादक’ करार देकर काम नहीं देती।
आज हम जिस पूँजीवादी दुनिया में रह रहे हैं वहाँ ऊपर दिए ये तत्व समाज और राज्य में साधारण बात बना दिए गए हैं। यह आम धारणा बन गई है कि विकलांग लोगों की सुविधा के अनुसार आधारभूत ढाँचा खड़ा करना बहुत महँगा है, लेकिन यह भविष्य को समझने का ग़लत तरीक़ा है। 2025 में एशियन डेवलपमेंट बैंक के अध्यक्ष मसाटो कांडा ने कहा कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश करना न सिर्फ़ सामाजिक रूप से ज़रूरी है बल्कि आर्थिक रूप से लाभकारी भी है। उन्होंने कहा कि इसमें निवेश किया हर डॉलर आर्थिक विकास के लिए 10 डॉलर लौटा सकता है। जब प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का निर्माण इस तरह किया जाए कि ये शुरू से ही विकलांग लोगों को शामिल करें तब सबके लिए ही स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर होंगी और सामाजिक स्थिति भी मज़बूत होगी।
शीर्षकहीन, अब्राहम मोयाहा (दक्षिण अफ़्रीका), 2018.
2006 का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन नीति और विचारधारा में एक बदलाव का प्रतीक था, जिसमें विकलांग लोगों को देखभाल की वस्तु के रूप में देखने की बजाय उन्हें अधिकार रखने वाले लोग और दुनिया के नागरिक के रूप में मान्यता दी गई। इस सैद्धांतिक ढाँचे में विकलांगता की बात करना अपने आप में समाज की बात करना था। एक ऐसा समाज जिसमें विकलांग लोग शामिल हैं, वह केवल तकनीकी समायोजन नहीं कर सकता; उसमें बदलाव लाए जाने की ज़रूरत है। इसके लिए सार्वभौमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों की आवश्यकता होती है जो सभी लोगों तक पहुँचें, सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा जो शुरू से ही पहुँच को ध्यान में रखकर बनाया गया हो, शिक्षा प्रणालियाँ जो भिन्नता को अपनाएँ, और राजनीतिक प्रणालियाँ जो भागीदारी पर जोर दें। 2022 में, डब्ल्यूएचओ ने सही कहा कि विकलांगता से जुड़ी असमानताओं को हल करने से सभी को फ़ायदा होता है क्योंकि यह उन बाधाओं को ध्वस्त करता है जो पूरे मानव जीवन को सीमित करती हैं।
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में की गई माँगों और विभिन्न देशों के विकलांग अधिकार आंदोलनों की माँगों के आधार पर हम आठ बिंदुओं की योजना पेश करते हैं जो इस वर्ग को गरिमा और न्याय दे सकती है:
- भागीदारी और नेतृत्व – निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में विकलांग जनता को रखा जाना चाहिए; नीतियों को इस आदर्श पर चलना चाहिए कि ‘हमारे बिना हमारी कोई बात नहीं’।
- सार्वजनिक सूचना तक पहुँच – सभी सार्वजनिक सूचनाओं को सभी स्वरूपों में मुहैया करवाया जाना चाहिए, इसमें ब्रेल, साइन भाषा और आसानी से इस्तेमाल किए जाने वाले डिजिटल फ़ॉर्मैट शामिल हैं।
- आँकड़े, जवाबदेही और कार्यान्वयन – सरकारों को विकलांगता-विभाजित आँकड़े इकट्ठे करने चाहिए और भेदभाव-विरोधी कानूनों को अर्थपूर्ण रूप से लागू करना चाहिए।
- सार्वभौमिक पहुँच का ढाँचा – सभी आधारभूत ढाँचे – यातायात, रिहाइश और डिजिटल प्रणालियों – को आरंभ से ही सबके लिए पहुँच के आदर्श पर बनाया जाना चाहिए।
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाएँ – स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि रोकथाम, इलाज, पुनर्वास और सहायक तकनीकों तक सबकी पहुँच हो और इसमें धन एक बाधा न बने।
- समावेशी शिक्षा व्यवस्था – विकलांग बच्चों सहित सभी बच्चों को सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली के भीतर अच्छी शिक्षा मिले।
- समुदाय आधारित देखभाल की प्रणाली – स्थानीय देखभाल और सहायता नेट्वर्क बनाए जाने चाहिए, समुदायों के बीच से ही लोगों को नौकरी देकर उन्हें प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
- आर्थिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा – राज्य को सुनिश्चित करना होगा कि विकलांगता की वजह से जो अतिरिक्त क़ीमत चुकानी पड़ती है आय, रोज़गार के अधिकार और श्रम सुरक्षा उसी के अनुसार हों।
सैनिक, ले ट्रोन्ग लैन (वियतनाम), 1981.
कुछ साल पहले, ग्रामीण वियतनाम में उन बुज़ुर्गों के साथ चलते हुए जिन्होंने प्रतिरोध में हिस्सा लिया था, मैंने उन दूतों (कूरियर) के बारे में सुना जो संघर्ष के दौरान गाँवों के बीच संदेश ले जाया करते थे। उन्होंने मुझे बताया कि आंदोलन में इस काम के लिए विभिन्न प्रकार के लोगों को भर्ती किया जाता था, लेकिन संदेश ले जाने के लिए ‘आंह डिएक’ (बहरे भाई) और ‘ची मू’ (अंधी बहन) पर निर्भर रहना असामान्य नहीं था। मुझे लगा कि हमारे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों में, हमने अपने संघर्षों में विकलांग साथियों की भूमिका का दस्तावेज़ीकरण करने के मामले में बहुत ख़राब काम किया है। वियतनाम में ऐसा नहीं है, जहाँ ‘थोंग बिन्ह’ — एक शब्द जिसका अक्सर अनुवाद ‘युद्ध विकलांग’ के रूप में किया जाता है, लेकिन जिसका अधिक शाब्दिक अर्थ घायल सैनिकों से है — को चिन्ह साच देओन आप देओन न्घीआ’ (अर्थात ‘कृतज्ञता और प्रतिदान की नीति’) के माध्यम से सम्मानित किया जाता है, और हर वर्ष 27 जुलाई को युद्ध विकलांगों और शहीदों का दिवस भी मनाया जाता है।
1981 में, वियतनाम द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका को पराजित करने के छह साल बाद, चर्चित कवि चान तिएन रेड रिवर डेल्टा के पास तियेन हाई समुद्र तट पर टहल रहे थे, तब उन्होंने रेत में एक बैसाखी द्वारा छोड़े गए गोल निशान देखे। बाद में उन्हें पता चला कि वे एक पैर से घायल सैनिक के थे, जो बच्चों को पढ़ाने के लिए स्थानीय स्कूल जाते समय समुद्र तट को पार करते थे। इस घटना से प्रभावित होकर चान तिएन ने ‘रेत पर गोल पैरों के निशान’ (वेट चान ट्रॉन ट्रेन कैट) लिखी, जो बेहद लोकप्रिय गीत भी बन गई। उस कविता की कुछ पंक्तियाँ यहाँ दी जा रही हैं:
मेरे शहर के सफ़ेद रेट वाले रास्तों पर गोल पदचिह्न अब भी दिखते हैं।
घायल सैनिक अब भी जाता है गाँव की पाठशाला।
अब भी रहता है उसके हाथ में गिटार, वो बच्चों को उनके वतन के गीत सिखाता है।
इन गीतों में उसके देश के सुदूर पहाड़ खड़े हैं।
इन गीतों में लहराती हैं धान की फसल और गुनगुनाती हैं लोकगाथाएँ।
ये गीत हैं उन सैनिकों के जो ख़ामोश हो गए।
लेकिन आज, वो गुलाबी पैर, खेल रहे हैं गोल पदचिह्नों के इर्द-गिर्द…
स्नेह सहित,
विजय