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अंतहीन जंग के विरुद्ध: चौदहवाँ न्यूज़लेटर (2026)

‘नो कोल्ड वॉर’ अभियान ने अपने हालिया बयान में यूएस के आक्रामक इतिहास की पड़ताल करते हुए कहा है कि अंतहीन युद्धों को रोकना ज़रूरी है।

एक ईरानी जनाज़ा, रोक़्नी हायरीज़ादेह (ईरान), 2008.

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

कैरिबियन से लेकर पश्चिम एशिया तक फैली हिंसा के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और इज़राइल द्वारा ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामकता ने विश्व अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया है। इस आक्रामकता के नतीजे वही रहे जिसका अनुमान था: यह जगज़ाहिर था कि अगर यूएस और इज़राइल ईरान पर हमला करते हैं तो होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आवाजाही बाधित हो सकती है। यह एक ऐसा रास्ता है, जिससे समुद्री मार्ग से जाने वाला दुनिया का एक-चौथाई तेल गुज़रता है। तेल के बढ़ते दामों के साथ भू-राजनीति में भी तनाव बढ़ रहा है। वॉशिंगटन और तेल अवीव ने दुनिया को जिस दोज़ख़ की ओर धकेला है उससे बचने के उपाय नाकाफ़ी लग रहे हैं। फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार को न रोक पाने से पहले से ही मायूस दुनिया की मेहनतकश जनता अब एक और ऐसी जंग देखने को मजबूर है जिसमें उसका कोई हाथ नहीं। इस सच्चाई का सामना करते हुए बहुत आसान है ग़ुस्सा होना या निराशा में डूब जाना।

शीर्षकहीन, शादी ग़दीरियन (ईरान), 1998.

हमारी दुनिया के ख़िलाफ़ एक जंग चल रही है – एक अंतहीन जंग।

यह बात अतिशयोक्ति नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की दैनिक प्रेस ब्रीफ़िंग में खाद्य और कृषि संगठन के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेतावनी दी ‘यह सिर्फ़ ऊर्जा के क्षेत्र में झटका नहीं है। यह वैश्विक कृषि खाद्य व्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक व्यापक झटका है’। दुनिया में सल्फ़र के व्यापार का लगभग आधा फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र से होता है जिसका इस्तेमाल सल्फ्यूरिक ऐसिड बनाने के लिए होता है जो फ़ॉस्फ़ेट चट्टानों को उर्वरक में बदलने के लिए ज़रूरी होता है। इस बाज़ार में खलबली ने पहले ही उर्वरक के दाम काफ़ी बढ़ा दिए हैं। इससे किसानों के लिए मुसीबत खड़ी हो चुकी है क्योंकि वे या तो नई फसल लगा चुके हैं या अगले मौसम में लगाने वाले हैं। टोरेरो ने यह भी कहा कि ‘किसान दोहरे लागत के झटके का सामना कर रहे हैं: उन्हें महंगे उर्वरक मिल रहे हैं और साथ ही ईंधन लागत भी बढ़ रही है जो सिंचाई और परिवहन सहित संपूर्ण कृषि मूल्य शृंखला को प्रभावित कर रही है।’ भले ही युद्ध अब समाप्त हो जाए, फिर भी खाद्य क़ीमतों के अगले साल तक बढ़े रहने की आशंका है। वैश्विक दक्षिण के देश पहले से ही थोपे गए ऋण के बोझ और सरकारी ख़र्च में कटौती को झेल रहे हैं। ऐसे में करोड़ों और लोग ग़रीबी और भूख की गहरी खाई में धकेल दिए जाएँगे।

सोमायेह (एक ईरानी फोटो एल्बम के खाली पन्नों से), न्यूशा तवाकोलियन (ईरान), 2014–2015.

साल 2020 में जब कोविड महामारी चरम पर थी और वैश्विक उत्तर में चीन विरोधी विचार भी, तब नो कोल्ड वॉर अभियान ने ‘चीन के विरुद्ध नया शीतयुद्ध मानवता के हितों के ख़िलाफ़ है’ नाम से एक बयान जारी किया था। इस 176 शब्दों के बयान का बीस भाषाओं में तर्जुमा हुआ था, जिसमें कहा गया था कि दुनिया के देशों को एक-दूसरे के बरक्स खड़े होने की बजाय आपसी सहयोग करना चाहिए। इस बयान का समर्थन दो हज़ार से ज़्यादा लोगों और बीस से अधिक शांति संगठनों ने किया था। पिछले पाँच सालों में नो कोल्ड वॉर अभियान चलाने वाला समूह, जिसका मैं भी सदस्य हूँ, और बढ़ा है और अब इसके बीस सदस्य हैं जो अलग-अलग संगठनों से आते हैं। हमारे बयान के साथ ही हम पर्स्पेक्टिव सीरिज़ के तहत निरंतर लेख छापते हैं और जंग तथा अमन से जुड़ी वार्ताएँ भी आयोजित करते हैं। हम आपको अपनी वेबसाइट पर आने का न्यौता देते हैं, जहाँ आप हमारे समूह के सदस्यों की सूची देख सकते हैं और जान सकते हैं कि आप हमारे साथ कैसे मिलकर काम कर सकते हैं।

दुनिया में बढ़ते तनाव और टकराव के ख़तरों को देखते हुए नो कोल्ड वॉर ने इस अंतहीन जंग पर एक बयान जारी किया है:

पूँजीवादी संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1776 से अपने अस्तित्व के शुरुआती कुछ वर्षों को छोड़कर 90% से अधिक समय तक दुनिया पर एक के बाद एक युद्ध थोपे हैं। लगभग ये सभी युद्ध स्वेच्छा से लड़े गए थे, जो अक्सर अमेरिकी मुख्य भूमि से बहुत दूर हुए (फिलीपींस और वियतनाम के युद्ध 13,000 किलोमीटर दूर हुए थे)। इन युद्धों में करोड़ों नागरिकों की जान गई और इनमें भयानक हथियारों का इस्तेमाल किया गया (जिनमें जापान में परमाणु बम और वियतनाम और इराक में रासायनिक हथियार शामिल हैं)। संयुक्त राज्य अमेरिका के 45 पुरुष राष्ट्रपति रह चुके हैं। इन सभी ने अपने देश को किसी न किसी विदेशी युद्ध या उस भूमि पर बसे लोगों, विशेष रूप से मूल अमेरिकी, गुलाम अफ्रीकी और आप्रवासियों के ख़िलाफ़ युद्ध में उलझाया है। इस आक्रामक प्रवृत्ति ने अमेरिकी कानून (विशेष रूप से 1973 के युद्ध शक्ति संकल्प) का उल्लंघन किया है और स्वतः ही अमेरिकी राष्ट्रपतियों को अपनी विशाल सैन्य शक्ति का इस्तेमाल पूरी दुनिया के विरुद्ध करने की अनुमति दी है।

मौजूदा दौर में भी यही रुझान साफ़ दिखाई देता है। 2026 में यूएस राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने पूरी दुनिया में पाँच बड़े टकरावों को या तो और गंभीर स्थिति में पहुँचाया है या इनकी शुरुआत की है। इनमें से तीन यूएस सरकार की बहुत क़रीबी इज़राइल सरकार के साथ, यूरोपीय देशों के राजनयिक समर्थन और हथियारों के साथ मिलकर चलाए गए। इनमें से हरेक जंग संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का उल्लंघन करता है; ये सभी आक्रामक युद्ध हैं जिसका मतलब है कि जिस व्यक्ति ने इन्हें शुरू करने की स्वीकृति दी वह एक युद्ध अपराधी है।

लिखित मार्गदर्शन, मेहरदाद अफ़सरी (ईरान), n.d.

  1. वेनेज़ुएला – 3 जनवरी 2026 को यूएस ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 का उल्लंघन करते हुए यूएन के सदस्य राष्ट्र पर हमला कर उसके मौजूदा राष्ट्रपति को अगवा कर लिया, और जबरन उस देश को ऐसी माँगों के आगे झुकने पर मजबूर किया जो यूएस सरकार ने तय की थीं।
  2. क्यूबा – 1960 से यूएस ने क्यूबा की ग़ैर-क़ानूनी आर्थिक घेरेबंदी की हुई है जो अनुच्छेद-41 का उल्लंघन है। अनुच्छेद 41 के अनुसार, किसी तीसरे देश पर प्रतिबंध केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव से ही लगाए जा सकते हैं (हालाँकि ऐसा कोई प्रस्ताव अभी तक पारित नहीं हुआ है)। 29 जनवरी 2026 को ट्रम्प द्वारा किसी भी तीसरे देश को क्यूबा को तेल आपूर्ति करने से प्रतिबंधित करने के बाद यह घेराबंदी और भी गहरी हो गई, जिससे क्यूबा को अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लगभग एक तिहाई हिस्से पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है।
  3. ईरान – 28 फ़रवरी 2026 को यूएस और इज़राइल ने मिलकर यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2 का उल्लंघन किया और ईरान पर भारी हमला शुरू कर दिया। इसमें कई नागरिकों की मौत हुई और देशभर में आधारभूत ढाँचे की तबाही हुई, इसके साथ ही ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की भी हत्या कर दी गई। अभी एक साल से भी कम हुआ जब जून 2025 में यूएस और इज़राइल द्वारा ईरान के परमाणु ऊर्जा ठिकानों पर बारह दिन से ज़्यादा बमबारी की गई। हालिया बमबारी ने ईरान को भी यूएस के सैन्य अड्डों पर जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाया, ये अड्डे ईरान के पड़ोसी देशों के लिए रक्षाकवच कम और टार्गेट ज़्यादा हैं। इस जंग से होर्मुज़ जलडमरूमध्य भी आंशिक तौर पर बंद हो गया है जिससे दुनियाभर में ईंधन और खाद्य आपूर्ति का संकट पैदा हो गया है।
  4. लेबनान – ईरान पर थोपी जंग का फ़ायदा उठाकर इज़राइल ने दक्षिण लेबनान और इसकी राजधानी बेरुत पर बर्बरतापूर्ण बमबारी कर दी, यह भी यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2 का उल्लंघन है। इस देश की आबादी का पाँचवाँ हिस्सा बेघर हो चुका है और हज़ारों नागरिक मारे जा चुके हैं या घायल हैं।
  5. फ़िलिस्तीन – युद्धविराम के बावजूद इज़राइल फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार का अपना बर्बरतापूर्ण मंसूबा जारी रखे हुए है। वह ग़ज़ा में शहरों पर बार-बार हमले कर रहा है। क़ब्ज़ाए हुए वेस्ट बैंक में ज़मीन हथिया रहा है, साथ ही यहाँ से फ़िलिस्तीनियों को जबरन भगा रहा है, जो साफ़ तौर पर इज़राइल के फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े से जुड़े कई यूएन प्रस्तावों का उल्लंघन है।

शीर्षकहीन, मेघदाद लोरपुर (ईरान), 2019.

ये पाँच युद्ध एक दूसरे से जुड़े हुए हैं क्योंकि इनके पीछे यूएस द्वारा चलाया जा रहा साम्राज्यवाद है जो दुनिया को एक नई शक्ल देना चाहता है (हम फ़िलहाल चल रही अन्य जंगों से भी वाक़िफ़ हैं जैसे म्यांमार, सूडान और यूक्रेन, लेकिन उनके बारे में एक और बयान जारी किया जाएगा)। यूएस अपनी गिरती हुई आर्थिक शक्ति को वापस पाने और वैश्विक दक्षिण के उदय (ख़ासतौर से चीन) को रोकने के लिए कोई अजेंडा नहीं चला पा रहा इसलिए उसने अपना ध्यान सैन्य बल की ओर मोड़ लिया है। लेकिन इसमें भी यूएस को समझ आ रहा है कि यह आधारभूत ढाँचे बर्बाद कर सकता है और नागरिकों की हत्या कर सकता है, लेकिन फिर भी यह राजनीतिक रूप से किसी देश को घुटनों के बल नहीं ला सकता। इनमें से हर एक देश अब भी सीना ताने खड़ा है। कोई भी आत्मसमर्पण नहीं कर रहा।

दुनिया के लोग हताश नहीं हैं और न ही उनके हौसले पस्त हैं। क्यूबा से फ़िलिस्तीन तक, जिन पर भी हमले हो रहे हैं, वे सब लड़ रहे हैं, अपनी पूरी ताक़त से लड़ रहे हैं। उन्हें ज़रूरत है कि दुनिया उनके साथ खड़ी हो और निराशा में न डूबे। उन्हें ज़रूरत है कि यूएस के साम्राज्यवाद की घोर निंदा की जाए, वे चाहते हैं कि इस तरह की हिंसा को सामान्य घटना नहीं मान लिया जाए। ऐसा लगता है कि इन जंगों का कोई अंत नहीं है। लेकिन ये ख़त्म होंगी। मानवता की भावना बहुत मज़बूत है और इन हमलावरों के आगे हार नहीं मानेगी। यह हर उस रास्ते का इस्तेमाल करती है जो ऐसी दुनिया को नकारता है जहाँ युद्ध का अंतहीन इतिहास हमारा भविष्य तय करता है।

हम आज ऐसे दौर में हैं जो हमसे हौसला बनाए रखने की उम्मीद करता है। यह हौसला हमें हमारी मानवता से तो मिलता ही है लेकिन उनसे भी मिलता है जो हमारे सामने संघर्षरत हैं। मोरक्को के मार्क्सवादी संगठन इला अल-अमन (आगे की ओर) की सदस्य और एक स्कूल शिक्षक सैयदा मेनेभी (1952-1977) ऐसे ही लोगों में से एक हैं। 16 जनवरी 1976 को, मोरक्को के ‘लीड ईयर्स’ (लेज़ अँने दे प्लों – सीसे के वर्ष, जिसका असल आशय है-हिंसा और अशांति के वर्ष ) के दौरान – जब राजशाही गणतंत्र के समर्थन में किसी भी शब्द या कार्य को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करती थी, समाजवाद की तो बात ही छोड़िए – कॉमरेड सईदा को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन्हें राजा हसन द्वितीय के यातना केंद्र ‘दरब मौले शरीफ’ में हिरासत में रखा गया, जहाँ उन्होंने यह कविता लिखी जो आज भी मेरे रोंगटे खड़े कर देती है:

तुम जानती हो, मेरी बच्ची,

मैंने तुम्हारे लिए एक कविता लिखी है,

लेकिन मुझे मत डाँटना,

क्योंकि यह उस भाषा में लिखी है

जिसे तुम अभी नहीं समझती।

यह कोई बड़ी बात नहीं है, मेरी बच्ची,

जब तुम बड़ी हो जाओगी,

तुम इस सपने को अपना लोगी,

जो मैंने दोपहर के बीच देखा था।

जब तुम्हारी बारी आएगी,

तुम इस औरत की कहानी सुनाओगी—

एक अरब कैदी,

अपने ही देश में,

अपने सफेद बालों तक अरब,

अपनी हरी-सी आँखों के साथ।

मेरी बच्ची, सपना

तब शुरू होता है

जब मैं एक कबूतर देखती हूँ—

वे पक्षी जो अपने घोंसले बनाते हैं

जेलों की छतों पर।

मैं सपना देखती हूँ कि एक संदेश भेजूँ

फ़िलिस्तीन के क्रांतिकारियों को,

ताकि उन्हें जीत के लिए समर्थन का भरोसा दे सकूँ।

मैं सपना देखती हूँ कि मेरे पंख हों,

गौरैयों की तरह,

ताकि मैं आसमान पार कर सकूँ—

इरित्रिया तक,

धोफ़ार तक।

हाथों में भारी बंदूकें,

और सिर में कविताएँ।

मैं एक यात्री बनना चाहती हूँ,

बादलों पर सवार,

अपने युद्ध के वस्त्रों में,

पिनशे से लड़ते हुए

चिली के दूरस्थ इलाकों में,

ताकि मेरा खून बहे

चिली की उस मिट्टी पर

जिसे पाब्लो नेरुदा ने सजदा किया।

ओ मेरे सपने,

लाल अफ्रीका—

जहाँ कोई बच्चा भूखा न हो।

मैं सपना देखती हूँ

कि ऊपर का चाँद

गिर पड़ेगा

दुश्मन को मिटाने के लिए,

और चाँद मुझे छोड़ देगा

फ़िलिस्तीन में या सहारा में—

कहीं भी।

मैं जीत के लिए संघर्ष करती हूँ,

उन सभी लोगों के लिए

जो लड़ रहे हैं।

1977 के अंत में कॉमरेड सैयदा, राजा द्वारा अब्देलातिफ़ लाबी, अब्राहम सेरफाती, फातिमा औकाचा, पिएरा दी माजियो, रबिया फतूह और ख़ुद जैसे राजनीतिक क़ैदियों को एकांत जेलों में रखने की नीति के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल में शामिल हो गईं। उस साल 11 दिसंबर को सैयदा को कासाब्लांका के इब्न रुशद अस्पताल ले ज़ाया गया जहाँ महज़ पच्चीस साल की उम्र में उनकी मौत हो गई। उनकी बहादुरी और उसकी लिखी कविता हमें अंतहीन जंग के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में ताक़त देती है।

स्नेह सहित,

विजय