संयुक्त राष्ट्र के अस्सी साल: छत्तीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
अस्सी साल बाद यूएन, संरचनात्मक सीमाओं और राजनीतिक विभाजनों से ऐसा जकड़ा है कि यह कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं कर पाता – ग़ज़ा जनसंहार इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
शीर्षकहीन (शांति के लिए भित्तिचित्र), पेर क्रॉग (नॉर्वे), 1952
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
दुनिया में एक ही ऐसी संधि हुई है जो अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद राष्ट्रों को बाँधे हुए है: संयुक्त राष्ट्र का चार्टर। 1945 में पचास राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का चार्टर लिखा और स्वीकार किया, आने वाले सालों में अन्य कई देश भी इसका हिस्सा बनते चले गए। चार्टर में सिर्फ़ इसके सदस्य राष्ट्रों के व्यवहार को नियंत्रित करने की शर्तें हैं। यह न एक नई दुनिया का निर्माण करता है और न कर सकता है। यह प्रत्येक राष्ट्र पर निर्भर है कि वह इस चार्टर के अनुरूप चलना चाहता है या नहीं।
यह चार्टर अपने आप में मुकम्मल भी नहीं है। 1948 में मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को इसमें शामिल किया गया और इसे भी चुनौती दी गई क्योंकि राजनीतिक तथा नागरिक अधिकारों को सामाजिक तथा आर्थिक अधिकारों से अलग किए जाने की ज़रूरत पड़ी। राजनीतिक असहमतियों की वजह से संयुक्त राष्ट्र प्रणाली दुनिया की समस्याओं को सुलझा पाने में अक्षम रही है।
यूएन के गठन के अब अस्सी साल पूरे हो चुके हैं। इसका इतने साल टिके रह पाना ही अपने आप में एक अचंभा है। 1920 में लीग ऑफ़ नेशन्स की स्थापना हुई थी और यह महज़ सापेक्षिक शांति वाले अठारह साल ही चल पाया था (1937 में चीन में द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत होने तक)।
La Fraternidad (भाईचारा), रूफ़िनो टमायो (मेक्सिको), 1968
यूएन उतना ही मज़बूत कहा जा सकता है जितनी मज़बूत इसके सदस्य राष्ट्रों की आपसी सहयोग भावना है। अगर यह सहयोग भावना कमज़ोर होगी तो यूएन भी कमज़ोर होगा। एक स्वतंत्र संस्था के रूप में इससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि यह किसी फ़रिश्ते की तरह आए और युद्धरत देशों के कान में शांति का मंत्र फूंके और वे रुक जाएँ। यूएन सिर्फ़ दुनिया को आगाह कर सकता है, यह तो एक ऐसे खेल का अंपायर भर है जिसके नियम ताक़तवर देश अमूमन तोड़ते रहते हैं। यूएन सभी राजनीतिक पक्षों के लिए एक बलि का बकरा बन चुका है: अगर किसी संकट का हल नहीं निकल पाता या राहत कार्य विफल हो जाते हैं तो इस पर इल्ज़ाम लग जाता है। क्या यूएन ग़ज़ा में इज़राइल द्वारा जारी जनसंहार को रोक सकता है? जनसंहार के बीच यूएन अधिकारियों ने काफ़ी दमदार वक्तव्य दिए हैं। इसके महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि ‘ग़ज़ा मौत की खाई बन गया है – यहाँ के लोग मौत के अंतहीन कुचक्र में फँसे हैं’ (8 अप्रैल 2025), और यह भी कहा कि ग़ज़ा में भुखमरी ‘कोई रहस्य नहीं – यह एक मानव-निर्मित आपदा है, नैतिकता पर एक कलंक, और मानवता की पराजय’ (22 अगस्त 2025)। ये शब्द हैं तो बहुत सशक्त लेकिन इनका कोई मोल नहीं, ये यूएन की क्षमता पर ही सवाल खड़ा कर देते हैं।
Guerra e Paz (Guerra) (युद्ध और शांतिः युद्ध), कैंडीडो पोर्टिनरी (ब्राज़ील), 1952
दरसल, यूएन के दो भाग हैं। यूएन का सबसे सार्वजनिक चेहरा है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी), जो इसकी कार्यकारी ही बन चुकी है। यूएनएससी में पंद्रह राष्ट्र होते हैं: पाँच स्थाई सदस्य (चीन, फ़्रांस, रूस, यूनाइटेड किंडम और यूनाइटेड स्टेट्स), और बाक़ी दस सदस्यों को दो सालों के लिए चुना जाता है। पाँच स्थाई सदस्यों (पी5) के पास परिषद के निर्णयों में वीटो की शक्ति है। अगर किसी एक भी स्थाई सदस्य को कोई निर्णय पसंद नहीं आए तो उसे अपनी वीटो शक्ति से उसे निरस्त कर सकता है। जब भी यूएनएससी में किसी युद्धविराम का प्रस्ताव आता है तो यूनाइटेड स्टेट्स (अमेरिका) अपने वीटो के अधिकार से इस मामूली से प्रयास को भी ध्वस्त कर देता है (1972 से अब तक अमेरिका ने इज़राइल द्वारा फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े से जुड़े प्रस्तावों को यूएनएससी में बयालीस बार वीटो किया है)। यूएनएससी संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसके एक सौ तिरानवे सदस्य राष्ट्र दुनिया की दिशा निर्धारण के लिए चाहे कितने भी प्रस्ताव पारित करें, लेकिन उन्हें आसानी से नज़रंदाज़ कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, जनसंहार की शुरुआत से अब तक संयुक्त राष्ट्र महासभा ने युद्धविराम के लिए पाँच महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए हैं (पहला प्रस्ताव अक्टूबर 2023 में पारित किया गया था और पाँचवाँ जून 2025 में)। लेकिन संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में महासभा के पास कोई असल शक्ति नहीं है।
Guerra e Paz (Paz) (युद्ध और शांति: शांति), कैंडीडो पोर्टिनरी (ब्राज़ील), 1957
यूएन का दूसरा हिस्सा बना है इसके असंख्य घटकों से मिलकर, इनमें से प्रत्येक का गठन आधुनिक दौर के किसी न किसी संकट से निपटने के लिए हुआ है। इनमें से कुछ तो यूएन से भी पुराने हैं, जैसे अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ), जिसकी स्थापना 1919 में हुई थी और इसे 1946 में यूएन की पहली विशेषीकृत एजेंसी के तौर पर शामिल किया गया था। इसके बाद और एजेंसियाँ शामिल होती चली गयीं, जैसे संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), जो बच्चों के अधिकारों की पैरवी करता है, तथा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को), जिसका काम है दुनिया की तमाम संस्कृतियों के लिए सहिष्णुता और आदर का प्रसार करना। इन दशकों में इसकी कई संस्थाएँ बनीं हैं जो शरणार्थियों के लिए काम करती है, या यह सुनिश्चित करती है कि परमाणु शक्ति का प्रयोग शांति के लिए हो ना कि युद्ध के लिए, या विश्व में संचार सुविधाओं को बेहतर करने के लिए, तथा विकास कार्यों में सहायता देने के लिए। इनके कार्य-क्षेत्र बहुत प्रभावी हैं हालाँकि इनके कामों के परिणाम कम प्रभावित करते हैं। इनके सामने जो एक रुकावट है वह है राष्ट्रों से मिलने वाला अपर्याप्त फंड (2022 में यूएन का कुल व्यय 67.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, इसके मुक़ाबले सैन्य व्यापार पर 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए गए)। यूएन को लगातार कम फंड देने का यह सिलसिला इसलिए चल रहा है क्योंकि दुनिया के ताक़तवर राष्ट्र इसके और इसकी एजेंसियों के दिशानिर्देशों से सहमत नहीं। फिर भी यूएन और इसकी एजेंसियों के बिना इस दुनिया में लोग जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं उनका न तो निवारण हो सकता है न ही उन्हें दर्ज किया जा सकेगा। संयुक्त राष्ट्र प्रणाली विश्व का मानवतावादी संगठन बन गई है, क्योंकि समाज कल्याण पर सरकारी ख़र्च पर सख़्ती की नवउदारवादी नीति और युद्ध ने अधिकांश देशों को यह काम ख़ुद करने लायक़ ही नहीं छोड़ा है और साथ ही ग़ैर-सरकारी संगठन इतने व्यापक काम करने की क्षमता नहीं रखते।
उम्मीद, एडीटे पॉल्स-विनिएरे (लातविया), 1994
सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व व्यवस्था का संतुलन बदल गया और यूएन में अंदरूनी सुधारों का दौर शुरू हो गया: बुतरोस बुतरोस-घाली के ‘शांति का एजेंडा‘ (1992) और ‘विकास का एजेंडा‘ (1994) से लेकर कोफी अन्नान के ‘संयुक्त राष्ट्र का नवीनीकरण‘ (1997) और एंटोनियो गुटेरेस के ‘हमारा साझा एजेंडा‘ (2021), ‘भविष्य का शिखर सम्मेलन‘ (2024), और ‘यूएन80 टास्क फोर्स‘ (2025) तक। यूएन80 टास्क फोर्स सबसे गंभीरता से सोचा गया सुधार अभियान है, लेकिन इसके तीन क्षेत्रों (आंतरिक दक्षता, जनादेश की समीक्षा और कार्यक्रम संरेखण) में पहले भी प्रयास किए जा चुके हैं (‘हमने यह अभ्यास पहले भी किया है’, यह कहना है नीति के लिए अवर-महासचिव और यूएन80 टास्क फोर्स के अध्यक्ष गाइ राइडर का)। संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित एजेंडा अपनी ख़ुद की संगठनात्मक कमज़ोरियों पर केंद्रित है और यह उन व्यापक राजनीतिक प्रश्नों पर ध्यान नहीं देता जिनकी वजह से संयुक्त राष्ट्र के काम असफल हो जाते हैं। एक व्यापक एजेंडे में निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल करने की आवश्यकता होगी:
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संयुक्त राष्ट्र सचिवालय वैश्विक दक्षिण में स्थापित किया जाए। यूएन की लगभग सभी एजेंसियों के मुख्यालय या तो यूरोप में हैं या यूनाइटेड स्टेट्स में, यहीं यूएन का सचिवालय भी है। सुझाव दिए गए हैं कि यूनिसेफ, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और यूएन विमन को केन्या के नायरोबी में भेज दिया जाए, जहाँ पहले से ही संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और यूएन-हैबिटैट के दफ़्तर मौजूद हैं। अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र सचिवालय को न्यूयॉर्क से निकालकर वैश्विक दक्षिण में कहीं ले जाना चाहिए, कम-से-कम इसलिए ताकि जो यूएन अधिकारी अमेरिका या इज़राइल की आलोचना करते हैं उन्हें वीज़ा न देकर अमेरिका प्रताड़ित न कर सके। अमेरिका संयुक्त राष्ट्र महासभा में फ़िलिस्तीन के अधिकारियों को आने नहीं दे रहा, इसलिए महासभा की मीटिंग को जिनेवा में कराए जाने की माँग उठ रही हैं। तो आख़िर इसे स्थाई रूप से अमेरिका से निकाल ही क्यों न लिया जाए?
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वैश्विक दक्षिण को यूएन को ज़्यादा फंड देना होगा। फ़िलहाल, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को सबसे ज़्यादा फंड अमेरिका (22%) और चीन से (20%) मिलता है, इसके साथ ही अमेरिका के सात क़रीबी देश (जापान, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, फ़्रांस, कनाडा और दक्षिण कोरिया) मिलकर इसे 28% फंड देते हैं। चीन के अलावा वैश्विक दक्षिण से इसे 26% फंड मिलता है, चीन को मिलकर यह आंकड़ा 46% पहुँचता है, इसके कुल बजट का लगभग आधा। समय है कि चीन इसे सबसे ज़्यादा फंड मुहैया कराए और अमेरिका को पछाड़ दे जो अपने भारी-भरकम फंड के बल पर संगठन पर धौंस जमाता है।
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राष्ट्रों को मानवतावादी कार्यक्रमों पर अंदरूनी ख़र्च बढ़ाना होगा। राष्ट्रों को मानवता के संकट के निवारण पर अधिक ख़र्च करना चाहिए, न कि अमीर बॉन्डधारकों के क़र्ज़ चुकाने पर। संकटग्रस्त लोगों की मदद के लिए यूएन मुख्य संगठन नहीं होना चाहिए। जैसा कि हमने दिखाया है, कई अफ्रीकी देश अपना क़र्ज़ चुकाने पर ज़्यादा ख़र्च करने को मजबूर हैं बनिस्बत शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाओं पर; इन अनिवार्य कार्यों पर ख़र्च न कर पाने की वजह से वे यूनिसेफ, यूनेस्को और विश्व स्वास्थ्य संगठन के ज़रिए यूएन पर निर्भर रहते हैं। राष्ट्रों को इस तरह की सहायता पर निर्भर होने की बजाय अपनी क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए।
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वैश्विक सैन्य व्यापार में कटौती। युद्ध सिर्फ़ वर्चस्व के लिए नहीं लड़े जाते बल्कि हथियारों के कारोबारियों के मुनाफ़ों के लिए भी लड़े जाते हैं। दुनिया में हथियारों का सालाना निर्यात लगभग 150 बिलियन डॉलर है, इनमें से साल 2020 से 2024 के बीच 73% अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों ने बेचे। सिर्फ़ 2023 में ही हथियार बनाने वाली सबसे बड़ी सौ कंपनियों ने 632 बिलियन डॉलर कमाए (ज़्यादातर अमेरिकी कम्पनियों द्वारा अमेरिकी सेना को हथियारों की बिक्री द्वारा)। इस बीच शांति स्थापना के लिए यूएन का कुल बजट ही महज़ 5.6 बिलियन डॉलर था और शांति स्थापना का काम करने वाले 92% वैश्विक दक्षिण से आते हैं। वैश्विक उत्तर युद्धों से मुनाफ़ा कमाता है जबकि वैश्विक दक्षिण अपने सैनिकों तथा पुलिसवालों के ज़रिए टकराव व तनावों को कम करने की कोशिश करता है।
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क्षेत्रीय शांति और विकास के ढाँचों को मज़बूत करना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की शक्तियों को कुछ कम करने के लिए अफ़्रीकन यूनियन जैसे क्षेत्रीय शांति और विकास के प्रयासों को मज़बूत करना होगा और उनके दृष्टिकोण को महत्त्व देना होगा। अगर सुरक्षा परिषद में अफ़्रीका, अरब देशों या लैटिन अमेरिका से कोई स्थाई सदस्य नहीं हैं, तो ये क्षेत्र पी5 की वीटो शक्तियों के बंधक क्यों बने रहें? अगर विवादों को सुलझाने की शक्ति स्थानीय या क्षेत्रीय संगठनों को दे दी जाए तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के निरंकुश अधिकार को कुछ हद तक कम किया जा सकेगा।
Pax (शांति), मिम्मो रोटेला (इटली), 2004
बेरोकटोक जारी नरसंहार के बीच मानवता के साथ एकजुटता रखने वाले कार्यकर्ताओं से भरी नावों का एक और बेड़ा – फ्रीडम फ्लोटिला – ग़ज़ा पहुँचने का प्रयास कर रहा है। इनमें से एक नाव पर हैं मोरक्को की वर्कर्स डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य अयूब हबरावी और वे अंतर्राष्ट्रीय पीपल्स असेंबली का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने मुझे यह संदेश भेजा:
ग़ज़ा में जो घट रहा है वह एक पारंपरिक युद्ध नहीं – यह धीमी गति से होने वाला जनसंहार है जो दुनिया के सामने है। मैं इसलिए जा रहा हूँ क्योंकि जबरन भूखा रखना असह्य लोगों को घुटनों पर लाने के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है – माँओं की गोद में उनके बच्चे दम तोड़ रहे हैं और उन्हें दवाएँ, खाना और पानी नहीं दिया जा रहा। मैं इसलिए जा रहा हूँ क्योंकि मानवता को बाँटा नहीं जा सकता। जो शख़्स आज इस घेरेबंदी को स्वीकार कर सकता है वह कल को दुनिया के किसी और कोने में किसी और अन्याय को भी स्वीकार कर सकता है। चुप रहना अपराध में शामिल होने जैसा है और उदासीनता उन मूल्यों के साथ विश्वासघात है जिन्हें हम आदर्श मानते हैं। यह फ्लोटिला नावों का एक बेड़ा भर नहीं है – यह दुनिया के ज़मीर का उद्घोष: एक पूरी आबादी की घेरेबंदी नहीं की जा सकती, मासूमों को भूखा नहीं मारा जा सकता, जनसंहार नहीं किया जा सकता। हो सकता है हमें रोक दिया जाए, लेकिन इन नावों का समंदर में उतरना ही अपने आप में एक घोषणा है: ग़ज़ा अकेला नहीं। हम सब सत्य के साक्षी हैं – और मौत के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ भी।
स्नेह सहित,
विजय