सूडान की जनता को शांति की ओर बढ़ने दो: छियालीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
विदेशी ताक़तों के समर्थन से चल रहा एसएएफ़ और आरएसएफ़ का ख़ूनी युद्ध सूडानी लोगों के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है।
रिबन लाइन, रीम अलजील्ली (सूडान), 2025
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
नवंबर के शुरू में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चर्चा की ‘सूडान के भयानक संकट के बारे में जो हद पार कर चुका है’। उन्होंने लड़ रहे पक्षों से विनती की कि वे ‘हिंसा के इस तांडव को ख़त्म करें – तुरंत’। इस लड़ाई को ख़त्म करने का रास्ता है, लेकिन इस पर चलने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नदारद है। मई 2025 में हमने इस टकराव के इतिहास के बारे में लिखा था। 2019 में हमने उस साल हुए आंदोलन और उसके प्रभावों का भी विश्लेषण किया था। अब सूडान में शांति स्थापना की ज़रूरत पर ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, इंटरनेशनल पीपल्स असेंबली और पैन ऐफ़्रिकैनिज़्म टुडे ने मिलकर रेड अलर्ट नं. 21 जारी किया है।
सूडान की ज़मीनी हक़ीक़त
15 अप्रैल 2023 को सूडानीज़ आर्म्ड फ़ोर्सेज़ (एसएएफ़) और रैपिड सपोर्ट फ़ोर्सेज़ (आरएसएफ़) के बीच जंग शुरू हो गई। एसएएफ़ का नेतृत्व कर रहे हैं ट्रांज़ीशनल मिलिट्री काउन्सिल के जनरल अब्दुल फ़तह अल-बुरहान और आरएसएफ़ का लेफ़्टिनेंट जनरल मोहम्मद ‘हेमेदती’ हमदान दगालो। तभी से इन दोनों पक्षों के बीच टकराव और लड़ाई जारी है, इन्हें कई बाहरी सरकारों की भी मदद मिल रही है। लेकिन इस टकराव में नुक़सान केवल आम नागरिकों का हो रहा है। यह कहना नामुमकिन है कि कितने लोग इस युद्ध में मारे जा चुके हैं लेकिन एक बात स्पष्ट है कि संख्या काफ़ी अधिक है। एक अनुमान के मुताबिक़ अप्रैल 2023 से जून 2024 के बीच ही मारे जाने वालों की संख्या 1,50,000 तक थी और दोनों ही पक्षों द्वारा किए गए मानवता के विरुद्ध अपराधों के कई मामले मानव अधिकार संगठन दर्ज कर चुके थे। सूडान की कुल 5.1 करोड़ आबादी में से कम-से-कम 1.45 करोड़ लोग विस्थापित हो चुके हैं। अल-फाशिर, उत्तर दारफुर और कादुगली, दक्षिण कोरदोफान के बीच रहने वाले लोग भयानक भुखमरी और अकाल झेल रहे हैं। यूएन के एकीकृत खाद्य सुरक्षा चरण वर्गीकरण के एक हालिया विश्लेषण में पाया गया कि 2.12 करोड़ यानी सूडान की 45% आबादी अत्यंत खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही है। साथ ही देश भर में 3,75,000 लोग भूख के ‘विनाशकारी’ स्तर पर पहुँच चुके हैं (अर्थात् भुखमरी की कगार पर)।
जब से यह युद्ध छिड़ा है देश में विस्थापित हुए लोग अल-फाशिर में शरण लेने के लिए पहुँचे, यहाँ तब मुख्यतः एसएएफ़ का क़ब्ज़ा था। लगभग 2,60,000 नागरिक अक्टूबर 2025 में वहीं थे जब आरएसएफ़ विद्रोही ख़ेमे में सेंध लगाते हुए शहर में घुस आया और बड़े पैमाने पर जनसंहार किया। मरने वालों में साउदी मटर्निटी अस्पताल में भर्ती 460 मरीज़ और उनके तीमारदार भी शामिल थे। इस शहर पर क़ब्ज़ा हो जाने का अर्थ है कि अब दारफ़ुर का विशाल प्रांत मोटे तौर पर आरएसएफ़ के नियंत्रण में है। जबकि सूडान के अधिकांश पूर्वी भाग पर एसएएफ़ का अधिकार है – इसमें देश को समुद्र से और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जोड़ने वाले पोर्ट सूडान भी शामिल है – साथ ही राजधानी खार्तूम भी।
फ़िलहाल हालात सुधरने के कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे।
फ़ेयरवेल वॉल, सलाह एल्मूर (सूडान), 2024
लड़ाई की वजह
इतने व्यापक युद्ध का कभी भी एक सरल कारण नहीं होता। इसका राजनीतिक कारण काफ़ी स्पष्ट है: यह 2019 के लोकप्रिय विद्रोह के विरुद्ध प्रतिक्रांति है। 2019 के विद्रोह में राष्ट्रपति उमर अल-बशीर का शासन ख़त्म किया गया था जो 1993 से सत्ता में बने हुए थे और उनके शासनकल के अंतिम कुछ सालों में महँगाई काफ़ी बढ़ी तथा सामाजिक संकट की स्थिति पैदा हुई।
2019 के विद्रोह के पीछे वामपंथी और लोकप्रिय शक्तियाँ थीं – इनमें शामिल थे सूडानीज़ कम्युनिस्ट पार्टी, नेशनल कंसेंसिस फ़ोर्सिज़, सूडानीज़ प्रोफ़ेशनल असोसिएशन, सूडान रेवोल्यूशनरी फ़्रंट, विमन ऑफ़ सूडानीज़ सिविक एंड पॉलिटिकल ग्रुप्स और अन्य कई स्थानीय समूह। इन्होंने मिलकर सेना को मजबूर किया कि वह एक नागरिक/असैनिक सरकार बनने की प्रक्रिया की निगरानी करें। अफ़्रीकन यूनियन की मदद से ट्रांज़िशनल सॉव्रेंटी काउन्सिल की स्थापना हुई, इसमें पाँच सेना के और छह आम नागरिक सदस्य थे। अब्दल्ला हम्दोक को प्रधानमंत्री और नेमत अब्दल्ला ख़ैर को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इनके साथ ही अल-बुरहान और हेमेदती भी काउन्सिल में थे। इस सैन्य-नागरिक सरकार ने अर्थव्यवस्था को और भी बर्बाद कर दिया। इन्होंने एक नई मुद्रा निकाली और राज्य के घटकों का निजीकरण किया जिससे सोने की तस्करी में मुनाफ़ा बढ़ गया और आरएसएफ़ मज़बूत हुआ (इस सरकार ने अब्राहम समझौते पर भी हस्ताक्षर किए जिससे इज़राइल से इसके संबंध सामान्य हुए)। इस सैन्य-नागरिक सरकार की नीतियों ने उन समस्याओं को हवा दी जिससे सत्ता (राज्य की सुरक्षा पर नियंत्रण) और संपदा (सोने के व्यापार पर नियंत्रण) को हथियाने का यह संघर्ष शुरू हुआ।
काउन्सिल में स्थान के बावजूद अल-बुरहान और हेमेदती ने सैन्य तख़्तापलट की कोशिशें जारी रखीं, जिसमें वे अंतत: 2021 में सफल हुए। सत्ता से गैर-सैन्य लोगों को अलग कर देने के बाद ये दोनों सैन्य अधिकारी एक-दूसरे से लड़ने लगे। एसएएफ़ अधिकारियों ने राज्य के घटकों पर अपना आधिपत्य बचाए रखने का काम शुरू कर दिया। इसमें शामिल था – 2019 में राज्य के बजट के स्रोतों का 82% (इसकी पुष्टि प्रधानमंत्री अब्दल्ला हमदोक ने 2020 में की) और इसके उद्यम जो डिफ़ेन्स इंडस्ट्रीज़ सिस्टम जैसी संस्थाओं के माध्यम से 200 से ज़्यादा कंपनियों पर नियंत्रण करते हैं (इनकी वार्षिक आय अंदाज़न 2 अरब अमेरिकी डॉलर है)। ऐसा करके एसएएफ़ ने सूडान की संगठित अर्थव्यवस्था के काफ़ी बड़े भाग को हथिया लिया, इसमें खनिज, दूरसंचार और आयात-निर्यात जैसे आर्थिक क्षेत्र शामिल हैं। आरएसएफ़ की ताक़त है Janja’wid (घुड़सवार शैतान) मिलिशिया। इसने कोशिश की कि यह अल जुनैद मल्टी-एक्टिविटीज़ कॉर्परेशन के इर्द-गिर्द केंद्रित स्वायत्त युद्ध आधारित अर्थव्यवस्था का फ़ायदा उठा सके, जो दारफ़ुर क्षेत्र की प्रमुख सोने की खदानों और जेबेल अमर सहित लगभग आधा दर्जन खनिज खदानों पर नियंत्रण रखती है। सूडान का सारा सोना निर्यात अधिकारिक रूप से देश से बाहर नहीं जाता बल्कि इसके 50-80% की तस्करी की जाती है (2022 तक) अधिकतर यूएई को। और चूँकि आरएसएफ़ पश्चिमी सूडान की पारंपरिक या छोटे खनिज खदानों के क्षेत्र (कुल उत्पादन का 80-85% यहीं किया जाता है) पर नियंत्रण रखता है इसलिए सोने की सालाना आय का बड़ा हिस्सा आरएसएफ़ के पास जाता है (2024 में सिर्फ़ दारफ़ुर की खदानों से ही अंदाज़न 86 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कमाई हुई थी)।
इस राजनीतिक और संपदा से जुड़ी लड़ाई के नीचे पर्यावरण से जुड़े पहलू भी हैं जिनसे संकट और गहरा जाता है। दारफ़ुर में लंबे समय से चले आ रहे तनाव के पीछे एक कारण साहेल क्षेत्र में पानी की कमी होना भी है। दशकों से जारी भयानक पर्यावरण संकट की वजह से होने वाली असंतुलित बारिश और ग्रीष्म लहर (हीटवेव) के चलते सहारा रेगिस्तान का दक्षिण की ओर विस्तार हो गया है। इसकी वजह से पानी के स्रोत तनाव का कारण बन गए हैं और घुमक्कड़ प्रजातियों तथा एक जगह रहकर किसानी करने वाले समूहों के बीच टकराव हुए हैं। सूडान की आधी आबादी आज भयानक खाद्य असुरक्षा में जीने को मजबूर है। जलवायु में तेज़ परिवर्तनों तथा छोटे से अभिजात वर्ग द्वारा देश की संपदा की चोरी की वजह से सूडान की जनता बर्बाद हो चुकी है। ऐसे में किसी विशेष आर्थिक योजना की ग़ैरमौजूदगी में सूडान लंबे तनावपूर्ण दौर को झेलने के लिए मजबूर है। मौजूदा लड़ाई दो ताकतवर लोगों के बीच का टकराव नहीं है, बल्कि यह संघर्ष है राष्ट्रीय संपदा के स्वरूप में परिवर्तन की प्रक्रिया और बाहरी ताक़तों द्वारा इन्हें हड़पने की कोशिश के बीच। फ़िलहाल युद्धविराम के एक प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है। लेकिन इसका लागू होना तब तक संभव नहीं जब तक तमाम हथियारबंद गुट प्राकृतिक संपदा को हड़पने की कोशिश करते रहेंगे।
बाज़ार का दृश्य, उमर ख़ैरी (सूडान), 1975
सूडान में शांति की संभावनाएँ
सूडान में शांति स्थापित करने का रास्ता इन छह बातों पर टिका है:
- बिना विलंब युद्धविराम हो जिसकी निगरानी भी की जाए। इसके तहत खाद्य सामग्री और दवाओं के लिए रास्ते खोले जाएँ। इन रास्तों पर प्रतिरोध समितियों के नेतृत्व का नियंत्रण रहे। इन समितियों के पास लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और नेट्वर्क हो जिससे वे ज़रूरतमंदों तक राहत सामग्री पहुँचा सके।
- युद्ध आधारित अर्थव्यवस्था का अंत। ख़ासतौर से सोने और हथियारों के व्यापार के जाल को ख़त्म किया जाए। इसमें यह शर्त भी शामिल है कि जब तक यूएई आरएसएफ़ से अपने संबंध तोड़ नहीं देता तब तक उसे हथियार बेचने और उससे सोना ख़रीदने पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएँ।
- राजनीतिक कारणों से देश से बाहर रह रहे लोगों को सुरक्षित वापस लाया जाए और राजनीतिक संस्थानों के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए। यह प्रक्रिया एक ऐसी ग़ैर-सैनिक सरकार के तहत चले जिसे या तो चुना गया हो या उसे लोकप्रिय शक्तियों का समर्थन प्राप्त हो, ख़ासतौर से प्रतिरोध समितियों का। एसएएफ़ को अपनी राजनीतिक शक्ति और आर्थिक संपदा को छोड़ना होगा और सरकार के अधीन आना होगा। आरएसएफ़ को निरस्त्र और उसके संगठन को ख़त्म करना होगा।
- सूडान की उच्च न्यायपालिका का तुरंत पुनर्गठन करना होगा जिससे इन अत्याचारों की जाँच हो सके और गुनहगारों को सज़ा दिलाई जा सके।
- तुरंत एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हो जिससे जवाबदेही तय हो, इसमें शामिल है सूडान में सही ढंग से स्थापित न्यायालयों में तानाशाह सैन्य अधिकारियों पर मुक़दमे चलाना।
- सूडान के योजना आयोग और वित्त मंत्रालय का बिना विलंब पुनर्गठन हो जिससे निर्यात के अधिशेष का इस्तेमाल सामाजिक कल्याण और सामाजिक सुरक्षा किया जा सके।
ये छह बिंदु अफ्रीकी संघ और इंटरगवर्नमेंटल अथॉरिटी ऑन डेवलपमेंट के सूडान संघर्ष के समाधान हेतु एयू-आईजीएडी के संयुक्त रोडमैप (2023) के तीन स्तंभों पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। ऐसे ही अन्य प्रस्तावों की तरह इस रोडमैप के साथ समस्या यह है कि यह दान करने वालों पर निर्भर है, जिनमें हिंसा करने वाले भी शामिल हैं। इन छह बिंदुओं को सच करने के लिए ज़रूरी है कि बाहरी शक्तियों को मजबूर किया जाए कि वे एसएएफ़ और आरएसएफ़ को समर्थन देना बंद करें। इन बाहरी शक्तियों में मिस्र, यूरोपीय संघ, क़तर, रूस, सऊदी अरब, यूएई और यूनाइटेड स्टेट्स शामिल हैं। इस रोडमैप और 2023 में फ़ौरी युद्धविराम और मानवीय सहायता के लिए रास्ता बनाने के उद्देश्य से सऊदी-यूएस द्वारा मध्यस्थता के जेद्दाह संवाद प्रक्रिया, दोनों में ही सूडान के नागरिक समूहों को जगह नहीं दी गई, प्रतिरोध समितियों को बुलाना तो दूर की बात है।
अकेलापन, कमला इब्राहिम इशक़ (सूडान), 1987
हालाँकि सूडान में भी काफ़ी ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने दर्द और पीड़ा के बारे में लिखा है लेकिन हम एक दूसरे अहसास के साथ अपनी बात का अंत करते हैं। 1961 में कम्युनिस्ट कवि ताज अल-सिर अल-हसन (1935-2013) ने ‘An Afro-Asian Song’ [एक अफ्रीकी-एशियाई गीत] लिखा। इसकी शुरुआत 1956 में जौदेह के कोस्ती जनसंहार को याद करने से होती है, जिसमें 194 हड़ताली किसानों की पुलिस हिरासत में दम घुटने से मौत हुई थी। लेकिन हम इस गीत के अंत को याद करेंगे, जिसमें गोलियों की आवाज़ के बीच कवि की आवाज़ सुनाई देती है:
अफ़्रीका के दिल में मैं खड़ा हूँ सुरक्षा के अग्रदल में,
और मेरे सिर का आकाश फैला है बांडुंग तक।
ज़ैतून का नन्हा पौधा मेरी छाँव भी है और आँगन भी,
ओ मेरे कॉमरेड:
ओ मेरे सिपाही कॉमरेड, मेरे लोगों को यश की ओर ले जाने वाले,
तुम्हारी मोमबत्तियाँ मेरे मन में हरी रौशनी जगा रही हैं।
मैं अंतिम छंद गाता हूँ,
अपनी प्रिय धरती के लिए;
अपने साथी एशियाई लोगों के लिए;
मलय के लिए,
और गौरवमय बांडुंग के लिए।
अल-फाशिर के लोगों, खरतौम के लोगों, पोर्ट सूडान के मेरे कॉमरेडों के लिए मैं कहना चाहूँगा: शांति की ओर बढ़ो।
स्नेह सहित,
विजय