अगर आप शोषण के ख़िलाफ़ नहीं खड़े हो सकते तो आपका बुद्धिजीवी होना व्यर्थ है: अड़तीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
2016 में होंडुरास की पर्यावरण और मानवाधिकार कार्यकर्ता बर्टा कैसरेस की हत्या कर दी गई – सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वालों का अक्सर यही हश्र होता है।
बर्टा कैसरेस की क़ब्र पर पियर पाओलो पासोलिनी (1925-1975) को पढ़ते हुए, अगस्त 2025
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
होंडुरास के ला एस्पेरांजा में बर्टा इसाबेल कैसरेस फ्लोरेस (1971-2016) की क़ब्र है, वे यहीं पैदा हुई थीं और यहीं मारी गयीं। यहाँ बैठकर मैंने बोगनविलिया के फूलों पर मँडराती एक पीली तितली को देखा। उस ख़ामोश क़ब्रिस्तान में वह बेफ़िक्र उड़ रही थी, एक क़ब्र से दूसरी क़ब्र तक। बर्टा की क़ब्र की बग़ल में उनके भई कार्लोस ऐल्बेर्टो लोपेज़ फ्लोरेस (1958-2004) की क़ब्र है, वे एक कम्युनिस्ट थे जिन्होंने मॉस्को के पैट्रिस लुमुम्बा विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और इनकी छोटी बहन इनसे बहुत प्रभावित थीं। बर्टा की क़ब्र की दूसरी तरफ़ की जगह खाली है। इस खाली जगह को इंतज़ार है कार्लोस और बर्टा की माँ मारिया ऑस्ट्रा बर्था फ्लोरेस लोपेज़ का। लोग इन्हें मामा बर्टा भी कहते हैं, इन्होंने अपने दो बच्चों की मौत झेली है। वह पीली तितली बर्टा की क़ब्र पर मँडरा रही थी जहाँ हम जैसे लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए ताज़े फूल रखते हैं। एक ऐसी जुझारू कार्यकर्ता को याद करते हैं जिनकी इसलिए हत्या कर दी गई कि वे होंडुरास के लेंका समुदाय के लोगों के अधिकारों और दुनिया में सामाजिक न्याय बहाल करने की लड़ाई लड़ रही थीं।
मैं दुनियाभर में ऐसे कई कार्यकर्ताओं की कब्रों और स्मारकों पर गया हूँ: लिंडोकुहले मंगुनी (1994–2022) के स्मारक पर, जो ईखेनाना कम्यून के युवा अध्यक्ष और झुग्गीवासियों के आंदोलन अबहलाली बेसेमजोंडोलो के नेता थे, और जिनकी दक्षिण अफ्रीका के डरबन स्थित उनके घर पर हत्या कर दी गई थी, वे नियमित रूप से इन न्यूज़लेटर्स पर अपनी प्रतिक्रिया दिया करते थे; गौरी लंकेश (1962–2017) के स्मारक पर, जिन्हें बेंगलुरु में उनके घर के बाहर दक्षिणपंथी हिंदुत्व ब्रिगेड के गुंडों ने मार डाला था क्योंकि वे ज़मीर रखने वाली एक पत्रकार के रूप में साहसी काम कर रही थीं; और ट्यूनिस के जेलाज कब्रिस्तान में चोकरी बेलाइद (1964–2013) की कब्र पर, एक मज़दूर संगठन नेता जिनकी उनके घर के बाहर हत्या कर दी गई क्योंकि वे ट्यूनिशिया में एक धर्मनिरपेक्ष सरकार के लिए आवाज उठा रहे थे। इससे पहले भी कई क़ब्रों और स्मारकों पर मैं गया: चिली के संतीयगो शहर में रेकोलेटा में मेरे घर के पास सेमेंटेरीयो जेनरल में विक्टर जारा (1932-1973) की क़ब्र पर जिन्हें तख़्तापलट के बाद पिनोचेट के गुंडों ने यातना दी और फिर मार दिया; महदी अमल (1936-1987) की स्टडी में, जिसे उनकी पत्नी एवलिन बरन हमदान (1937-2020) ने ठीक वैसे ही रखा हुआ था जैसी वह तब थी जब वे ड्राईक्लीनर से अपनी पतलून लेने गए थे और तभी उनकी हत्या कर दी गई क्योंकि वे धार्मिक सांप्रदायिकता की मार्क्सवादी आलोचना किया करते थे; और क्रिस हानी (1942-1993) की याद में बना स्मारक, वे दक्षिण अफ़्रीका के महान कम्युनिस्ट थे जिनकी हत्या उस दौर में कर दी गई थी जब दक्षिण अफ़्रीका नस्लभेद से बाहर आ रहा था, वे देश के श्रमिक वर्ग की आवाज़ थे जो आने वाली नई सरकार में सर्वहारा के विचारों को जगह दिला सकते थे।
इन सब क्रांतिकारियों को क्यों मारा गया? उनका गुनाह क्या था? इनमें से हर एक अपने-अपने ढंग से यह मानता था कि दुनिया में मानव गरिमा की संभावनाओं का विस्तार किए जाने की ज़रूरत है। विक्टर की मौत के बाद उनकी पत्नी जोन जारा (1927-2023) ने उनका अंतिम गीत – मैनिफ़ेस्टो – जारी किया। इसमें विक्टर ने उस उदासी के बारे में लिखा जो यह बात समझ लेने के बाद आती है कि पूँजीवादी ढाँचे के बीच से समाजवाद का निर्माण करना कितना कठिन काम है और अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए अभिजात वर्ग भरसक हिंसा का प्रयोग करता है:
एक मज़दूर का गिटार,
बसंत की ख़ुशबू से महकता।
ये किसी अमीर का गिटार नहीं,
उस जैसा क़तई नहीं।
मेरा गीत निकलता है चबूतरों से,
सितारों को छूने के लिए।
इनमें से कोई भी व्यक्ति इस दुनिया का बुरा नहीं चाहता था। बर्टा ताउम्र साधारण लोगों के हक़ के लिए लड़ती रहीं ताकि उनकी प्राकृतिक संपदा का प्रयोग उनकी प्रगति के लिए कैसे किया जाए, यह निर्णय करने का अधिकार उन्हें मिले; लिंडोकुहले दक्षिण अफ़्रीका के श्रमिक वर्ग के लिए बेहतर आवास और अपने भविष्य का फ़ैसला ख़ुद कर सकने के अधिकार के लिए लड़ रहे थे; और गौरी लंकेश भारतीय जनता के विवेक और सत्य के अधिकार के लिए।
जिस बंदूकधारी व्यक्ति ने इनकी हत्या की उसे इसके लिए पैसे मिले। क्रांतिकारियों की हत्या करने वालों में से अधिकांश पेशेवर हत्यारे होते हैं, वे मुनाफ़े और मृत्यु की षड्यंत्रकारी शतरंज के छोटे-से प्यादे होते हैं। अमूमन इन प्यादों को पकड़ लिया जाता है और आरोप साबित करके इन्हें जेल में डाल दिया जाता है। लेकिन जिन लोगों ने इनके कंधों पर रखकर बंदूक़ चलाई, वे न दिखाई देते हैं और न दोषी ठहराए जाते हैं, वे ताकतवर लोग हैं। वे ख़ुद को निर्दोष कहते हैं। उनकी आस्तीनों पर न किसी का ख़ून है, न उँगलियों पर बारूद के छींटे। बर्टा की हत्या किसने की? जिन्हें ख़ून के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया और दोषी साबित किया गया वे या उनसे भी ख़तरनाक कोई और – जैसे कि वे भूस्वामी जो लेंका समुदाय की ज़मीन से मुनाफ़ा कमाने के सपने देख रहे थे और बर्टा तथा सिवल काउन्सिल ऑफ़ पॉप्यूलर एंड इंडिजनस ऑर्गनाइज़ेशनस् ऑफ़ होंडुरास (COPINH) ने मिलकर उनके सपनों पानी फेर दिया था? बेलाइद को मारने वाले भले ही ट्यूनिस के एट्टाधामेन जैसे ग़रीब इलाक़ों से थे लेकिन असली हत्यारों ने हत्या का षड्यंत्र लेस बर्ज दु लाक की आलीशान कोठियों में रचा था, जैसा कि हमने COPINH के साथ मिलकर छापे अपने डोसियर में बताया।
Sin título (शीर्षकहीन), गेलासीयो गेमेनेज बरेरा (क्यूबाई-होंडुरास), 1986
चोकरी बेलाइद की हत्या के एक साल पहले मैं उनसे ट्यूनिस में मिला था। उन्होंने मुझे ज़ीन अल-अबिदीन बेन अली की सरकार के तख़्तापलट के क़िस्से सुनाए थे। संघर्ष और भविष्य के बारे में कवितात्मक ढंग से बात करने में वे माहिर थे, यह काव्यात्मकता उनमें उनकी जवानी और बग़दाद में पढ़ने के दौर से थी। ताउम्र वे आज़ादी की कविताएँ लिखते रहे, जिन्हें उनकी मौत के बाद उनके परिवार ने Ash‘ār naqashathā al-rīḥ ʿalā abwāb Tūnis al-sabʿa (ट्यूनिस के सात दरवाज़ों पर हवा की लिखी कविताएँ) के नाम से प्रकाशित किया। इनमें से एक कविता है, जो शायद 1980 के दशक में राजनीतिक दमन के चरम के दौरान लिखी गई होगी। कविता का नाम है lā taṭrudūnī (मुझे बेदख़ल न करो):
मुझे बेदख़ल न करो।
मैं वक़्त हूँ, तुम्हारे वक़्त की एक वेदी।
मैं दर्द हूँ, या कोई पुरानी ईशवंदना।
मैं एक आगामी लानत हूँ।
बेलाइद सौंदर्य के तलबग़ार थे। बर्टा की बेटी बर्था (जिन्हें बर्टीटा भी कहते हैं) ने मुझे बताया कि उनकी माँ को खुश रहना पसंद था (और थोड़ा टकीला पीना भी, एक मादक पदार्थ)। गौरी को खाना पकाना और रॉक एंड रोल संगीत पसंद था। लिंडोकुहले को पढ़ना बहुत पसंद था, उन्होंने फ़्रांट्ज़ फ़ैनोन और स्टीव बिको से लेकर कम्युनिस्ट घोषणापत्र सब बहुत गहराई से पढ़ा हुआ था। उनके हत्यारे हमारे आंदोलनों के इन नेताओं की इंसानियत को नहीं मार सकते। उन्होंने इन्हें इसलिए मार दिया कि आंदोलन और उनके नेता ‘एक आगामी लानत’ हैं, जो मुनाफ़े और हिंसा पर टिकी दुनिया को गिराकर गरिमा और साझी इंसानियत पर टिकी दुनिया बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
ग़ज़ा में इज़राइल द्वारा बढ़ते जनसंहार और वहाँ अकाल घोषित हो जाने के इस दौर में बर्टा की क़ब्र पर बैठे मैं बासेल अल-अराज (1984-2017) के बारे में सोचता हूँ। वेस्ट बैंक में इज़राइल द्वारा उनकी हत्या किए जाने के कुछ साल पहले मैं उनसे रमल्लाह में मिला था। बासेल ने अपना वक़्त बेहतरीन किताबों और विचारों को दिया जिससे वे इज़राइली क़ब्ज़े और फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध के बारे में अपने ठोस विचार गढ़ पाए। इसी वजह से मेरे लिए वे अपनी पीढ़ी के ग़सान कानाफ़ानी (1936-1972) हैं। कानाफ़ानी महान फ़िलिस्तीनी कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी थे जिन्हें लेबनान के बेरुत में उनकी सत्रह साल की भतीजी लामिस निज़ेम के साथ एक इज़राइली कार धमाके में मार दिया गया। बासेल की मौत के बाद ग़ज़ा स्थित एक बैंड, मैमस, ने एक म्यूज़िक वीडियो निकाला, इसके अंत में बासेल आते हैं और अपने दौर की ज़मीनी सच्चाई से जुड़े बुद्धिजीवी होने की अनिवार्यता की बात करते हैं [इस बैंड के मुख्य गायक हैदर ईद ने Banging on the Walls of the Tank: Dispatches from Gaza (टैंक की दीवारों पर दस्तक: ग़ज़ा से आई ख़बरें) क़िताब लिखी, जो हाल ही में जोहान्सबर्ग स्थित Inkani Books द्वारा प्रकाशित की गई हैं]। बासेल कहते हैं ‘अगर आप अपने दौर से नहीं जुड़ेंगे, अगर आप शोषण से सीधी लड़ाई नहीं लड़ेंगे – तो एक बुद्धिजीवी के रूप में आपकी भूमिका निरर्थक है’। जब उनकी हत्या की गई तो उनके क़रीब दो किताबें थीं – एक इतालवी मार्क्सवादी ऐंटोनीओ ग्राम्शी की और दूसरी लेबनान के कम्युनिस्ट महदी अमल की (उन्हें अरब दुनिया में ‘आग़ के बने जूते पहनने वाले शख़्स’ के रूप में जाना जाता था, ‘एक शख़्स जो आग़ को चलकर पार कर सकता था’ – al-rajul dhu al-ni‘āl al-nārīyah)।
बर्टा की क़ब्र पर मैंने पियर पाओलो पासोलिनी की क़िताब द ऐशिज़ ऑफ़ ग्राम्शी (1954) के कुछ हिस्से पढ़े, जिसमें वे ग्राम्शी की क़ब्र पर जाते हैं और फिर क़ब्रिस्तान से परे की दुनिया में चले जाते हैं:
मैं उससे विदा लेता हूँ। मैं तुम्हें इस शाम में छोड़ता हूँ
जो बेशक उदास है, लेकिन थोड़ी ख़ुशनुमा भी है, हम जैसे
ज़िंदा प्राणियों को भीनी रौशनी में लपेटे
यह साँझ के झुरमुट में ठहर गई है।
और इसमें हलचल पैदा करती है। इसे विस्तार देती है, इसमें खालीपन भर देती है
अपने नज़दीक और दूर, बहुत दूर तक, इसके लिए
फिर रचती है एक उन्मत्त जीवन, जिसमें आवाज़ें हैं
पटरी पर दौड़ती ट्राम की, इंसानी कोलाहल की,
विभिन्न बोलियों की, जो सुदूर एक हल्का
और सकारात्मक राग बुन रही हैं। और तुम महसूस कर रहे हो उन
प्राणियों की तरह जो चिल्लाते हैं, हँसते हैं
अपनी गाड़ियों में, अपने उन बर्बाद
अपार्टमेंट ब्लॉक में, जहाँ अस्तित्व का
झूठा और विस्तृत उपहार चुक चुका है –
कि जीवन एक कंपन के सिवा कुछ नहीं;
लौकिक, साझा अस्तित्व;
तुम हर सत्य की अनुपस्थिति महसूस करते हो
धर्म; जीवन नहीं, केवल बचे रहना
– शायद यह जीने से ज़्यादा आनंद देता है – जैसे
जानवरों का राष्ट्र, इसके अंदरूनी रहस्यमयी
परमानंद में – दैनिक कार्यों के सिवा और कोई
दूसरी इच्छा नहीं होगी; कर्म:
एक विनम्र ललक जो एक विनम्र भ्रष्टाचार को
किसी उत्सव का जामा उढ़ा देती है।
…
यह जीवन एक कोलाहल है, और इसमें खोए
हुए सब, इसे निष्कलुष खो देते हैं, अगर उनका मन
भरा हो इससे: आनंदित,
बर्बादी को सीने से लगाए हुए, शाम: उनके भीतर
शक्तिशाली, उनके समक्ष शक्तिहीन, मिथक
फिर पैदा होता है… लेकिन मैं, अपने सजक हृदय के साथ,
जो ज़िंदा है केवल इतिहास में,
अगर मैं जान लूँ कि हमारा इतिहास ख़त्म हो चुका है, तो
क्या मैं फिर कोई कार्य विशुद्ध प्रेम से कर पाऊँगा?
लेकिन हमारा इतिहास इतनी आसानी से ख़त्म नहीं हो सकता जैसा कि बर्टा को पता था। हमारे संघर्ष जीवंत और अनिवार्य हैं और जैसा कि बासेल जानते थे कि संक्रामक भी।
स्नेह सहित,
विजय