सुर्ख़ियों से ग़ायब होते ही ग़ज़ा पर ख़ामोश हुई दुनिया: इकतीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)

ग़ज़ा के नरसंहार की ख़बरों न आना, इस हिंसा का अंत नहीं, बल्कि इसकी यह निरंतरता ही दुनिया को इसकी तरह से उदासीन बना रही है।

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आज़ादी और स्वाधीनता से क़ीमती कुछ नहीं

पूरे एशिया से महिला बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं ने मिलकर एक सच्चाई उजागर की: इस महाद्वीप में फैले यूएस सैन्य अड्डे अपने मेज़बान देशों की रक्षा नहीं करते — वे युद्ध लाते हैं, ज़मीन में ज़हर…
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सड़कों पर उतरा युवा आक्रोश: जेन ज़ी दरअसल एक वर्ग-संघर्ष है

बेरोज़गारी और परीक्षा घोटालों से जूझ रहे भारतीय युवा अब दमन की परवाह किए बिना अपने हक़ और गरिमा की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतर आए हैं।
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ज़मीन और सपनों के लिए तेलुगूभाषी जनता का संघर्ष

यह डोसियर तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष की विशाल सांस्कृतिक विरासत का ब्यौरा पेश करता है और इस बात पर रोशनी डालता है कि कैसे गीतों और नाटकों ने जनता को उपनिवेशवाद, राजशाही और जमींदारी के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दी। यह स्पष्ट है कि कला और संस्कृति वर्ग संघर्ष में जन्म लेती है और फिर वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाने में मदद करती है। एक ऐसे समाज में जिसे साक्षर होने से रोका गया था, वहाँ गीतों और नाटकों ने जनता में आत्मविश्वास बढ़ाने और उन्हें संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

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Tricontinental: Institute for Social Research seeks to build a bridge between academic production and political and social movements to promote critical thinking and stimulate debates and research with an emancipatory perspective.

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