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मुआवज़ा, न्याय आना ही चाहिए: नौवाँ न्यूज़लेटर (2026)

वैश्विक दक्षिण में जहाँ नया माहौल बन रहा है, वहीं यूएस विदेश मंत्री रुबियो यूरोप से अपना औपनिवेशिक अतीत फिर से अपनाने का आग्रह कर रहे हैं।

मेरा साथ दो, क्वाकु यारो (घाना), 2022

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

यह दुनिया उल्टी दिशा में जा रही है। पुरानी औपनिवेशिक ताक़तें यानी आज के अमीर देश फिर से साम्राज्यवादी भाषा बोलना और फैलाना चाहते हैं: अपने इतिहास पर गर्व और आज के दौर में भी उसी तरह ‘मसीहा’ बनने की चाहत। लेकिन ग़रीब देशों की जनता शांति और विकास के लिए संघर्षरत है, साथ ही वे उपनिवेशवाद के गुनाहों और उस दौर में की गई लूट के हर्जाने की माँग भी कर रही है। इस जनता का नारा एकदम सीधा-स्पष्ट है: ‘न्याय होना ज़रूरी है’। फ़िलहाल यह काफ़ी धीमा है लेकिन जल्दी ही यह बुलंद होगा।

उष्णकटिबंधीय रात, क्रिस्टोफ़र कोज़ीयर (त्रिनिदाद और टोबैगो), 2006-2014

जब संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के अधिकारी भू-राजनीति पर चर्चा करने यूरोप जाते हैं तो वहाँ के वरिष्ठ अधिकारी बड़े गौर से उनकी बात सुनते हैं। पिछले साल म्यूनिख में हुए सुरक्षा सम्मेलन में यूएस के उप-राष्ट्रपति जेडी वैन्स ने यूरोपीयों को ‘अपने अस्तित्व’ से जुड़े संकट के लिए खरी-खरी सुनाई। बदले में उन्हें भी यूरोपीय लोकतंत्र के प्रति अक्खड़ रवैए के लिए आलोचना सहनी पड़ी। उन्होंने यूरोपीय लोकतंत्र की इस बात के लिए आलोचना की थी कि वह शरणार्थियों की ‘समस्या’ पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रहा और एक ख़ास क़िस्म के चरम दक्षिणपंथ के उभार को लेकर बेकार में परेशान हो रहा है।       

द गार्डीयन से लेकर ले मोंडे तक, यूरोपीय अख़बारों ने वैन्स की उनके इस रवैए के लिए आलोचना की। लेकिन यूरोपीय संघ की विदेशी मामलों की प्रमुख काजा कल्लास से लेकर नाटो महासचिव मार्क रुटे तक – ज़्यादातर उदारवादी यूरोपीय अफ़सरान ने उनके सामने सिर झुका लिया और कहा सैन्य खर्च को लेकर यूएस ने जो लक्ष्य रखा है उसे मान लेने में यूरोप की बेहतरी होगी। सैन्यवाद को दिया जा रहा बढ़ावा और चरम दक्षिणपंथ के सामने घुटने टेक देना दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ चल रही हैं।

इस साल म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में यूएस का प्रतिनिधित्व उनके विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने किया। उन्होंने वहाँ अपने भाषण में एक बड़ा सटीक इतिहास का सबक़ पढ़ाया:

दूसरे विश्वयुद्ध के अंत से पहले पाँच सदियों तक पश्चिम लगातार विस्तार करता रहा – यहाँ के मिशनरी, तीर्थयात्री, सैनिक, सुदूर समुद्री यात्रा करने वाले यहाँ के खोजकर्ता, जिन्होंने नए महाद्वीप बसाए, पूरी दुनिया में साम्राज्य स्थापित किया। लेकिन 1945 में, कोलंबस के काल के बाद से पहली बार, यह सिकुड़ने लगा। यूरोप बर्बाद होने लगा। इसका आधा हिस्सा पर्दे के पीछे छिप गया और लगा कि बाक़ी भी जल्दी छिप जाएगा। पश्चिम के महान साम्राज्य बर्बादी की ग़र्त में जा रहे थे, उनका पतन ईश्वरहीन कम्युनिस्टों और उपनिवेश-विरोधी विद्रोहों ने और तेज़ कर दिया, ये सब मिलकर जल्दी ही दुनिया का नक़्शा बदलने वाले थे और आने वाले सालों तक इसे लाल हथौड़े और हंसिए [के झंडे] में लपेटने वाले थे।

इतिहास को लेकर रुबियो की आम समझ तो ठीक है। 1492 के लगभग जब अमेरिका के महाद्वीपों को आधिपत्य और दासता के लिए खोल दिया गया, तब से लेकर बीसवीं सदी के मध्य तक यूरोपीय उपनिवेशवाद का उत्थान होता रहा। फिर, सोवियत संघ के नेतृत्व में और चीन के बड़े बलिदान से लड़े गए फासीवाद-विरोधी वैश्विक युद्ध में फासीवाद की हार के बाद, कम्युनिस्टों और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के तेज़ी से उदय ने यूरोपीय उपनिवेशवाद को किनारे कर दिया गया; वियतनाम (1945), चीन (1949) और क्यूबा (1959) में कम्युनिस्टों ने सभी बाधाएँ पार करते हुए जीत हासिल करके गरीब देशों में कम्युनिस्ट प्रयोगों की शुरुआत की।

De las dos aguas (दो जलों के बीच), मारिया मैग्डेलेना कैम्पोस-पोंस (क्यूबा), 2007

रूबियो का जन्म यूएस के फ़्लोरिडा राज्य के मियामी शहर में हुआ था। क्यूबा की क्रांति के लगभग तीन साल बाद 1956 में उनके माता-पिता ने क्यूबा छोड़ दिया था। अपने भाषण में रुबियो ख़ुद को साफ़-साफ़ ईसाई यूरोप का वंशज मानते हैं, उनमें उनके माता-पिता के क्यूबा की समृद्ध संस्कृति का कुछ भी नहीं है – एक ऐसी संस्कृति जो अफ़्रीका, एशिया और अमेरिका के मूल निवासियों की विरासत पर टिकी है और साथ ही इबेरियन प्रायद्वीप से आए एस्टुरियन, गैलिशियन और कैटलन प्रवासियों की विरासत पर भी। क्यूबा की क्रांति ने धीरे-धीरे पुराने नस्लवादी भेदभाव वाले बाग़ानों पर आधारित समाज की असमानताओं को दूर करने के प्रयास शुरू किए और ऐसा समाज बनाने की कोशिश की जिसमें क्यूबा के सभी नागरिक समान हों। उपनिवेशवादी व्यवस्था का यही टूटता हुआ ढाँचा रुबियो को रास नहीं आ रहा। 

रुबियो का कहना है कि उत्तर-उपनिवेशवादी और समाजवादी दौर में ‘कई लोग मानने लगे हैं कि पश्चिम के वर्चस्व का समय ख़त्म हो चुका है और यह भी कि हमारी नियति है कि हम अपने अतीत की धीमी और कमज़ोर सी आवाज़ बनकर रह जाएँ’। लेकिन अटलांटिक देशों के लीडरान ने यह नहीं माना। ‘हमारे पूर्वजों ने माना था कि पतन एक विकल्प है और यह विकल्प चुनना उन्हें मंज़ूर नहीं था।’

दंगे और आक्रोश, इहोस्वानी सिस्नेरोस (अंगोला), 2011

इसलिए रुबियो का मत है कि पश्चिम के आज के नेताओं को मज़बूती से खड़ा होना चाहिए और जिसे वे न टाला जा सकने वाला पतन कहते हैं उसे अस्वीकार करना चाहिए, कम्युनिस्ट विचारधारा से पश्चिम की रक्षा करनी चाहिए और उपनिवेशवाद के नए रूपों (ग़ज़ा या पश्चिमी गोलार्द्ध में) के लिए ख़ुद को प्रतिबद्ध करना चाहिए। यूएस आख़िर किस तरह के यूरोप को अपने सहयोगी के तौर पर देखता है? रुबियो के शब्दों में: ‘एक ऐसा यूरोप जिसमें आज़ादी का प्रसार करने की वही इच्छाशक्ति हो जिसने अनजाने समंदर में खोजी जहाज़ भेजे थे और हमारी सभ्यता को जन्म दिया था’ – दूसरे शब्दों में, एक साम्राज्यवादी यूएस के लिए एक उपनिवेशवादी यूरोप। रुबियो की इन बातों पर सभागार में मौजूद यूरोपीय नेताओं ने खड़े होकर तालियाँ बजायीं। अगर यूएस उनके साथ है और उन्हें सैन्य सहायता और सुरक्षा देता है तो उन्हें चंद उपनिवेशवादी जंगों से कोई गुरेज़ नहीं। रुबियो के इस भाषण पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई, किसी को पश्चिमी अंधराष्ट्रवाद और उपनिवेशवाद के इस नग्न प्रदर्शन से कोई परेशानी नहीं हुई। ऐसा लगता है कि यूरोपीय लोकतंत्र की आलोचना यूरोपीय लीडरों को स्वीकार नहीं लेकिन पश्चिमी उपनिवेशवाद की वापसी का विचार उनके लिए पूरी तरह मान्य है।

जहाँ एक ओर, वैश्विक दक्षिण में संप्रभुता और अफ़्रीका, एशिया तथा दक्षिण अमेरिका के लोगों के लिए गरिमापूर्ण जीवन के विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक उत्तर के नेता कोलंबस के युग को न सिर्फ़ ख़ुशी से याद कर रहे हैं बल्कि उसके लौटा लाने के विचार को भी आगे बढ़ा रहे हैं। वे चाहते हैं कि अपने अजायबघरों में से मोरियन (एक तरह का सैन्य हेलमेट) पहन लें और अपने लॉकहीड मार्टिन वाले एफ़-35 लाइट्निंग I फिर लड़ाकू विमानों में बैठ वैश्विक दक्षिण की जनता पर ताबड़तोड़ बमबारी करें। यही यूएस ने 3 जनवरी 2026 को वेनेज़ुएला में किया था, यही वे फ़िलिस्तीन में कर रहे हैं और यही वे क्यूबा और साहेल में करने का इरादा रखते हैं। अपने कम होते ख़ज़ानों से वे सैन्य ताक़त बन गए हैं और इसी की बदौलत वे इंसानी समाज के बड़े हिस्से में दहशत भी फैला पा रहे हैं लेकिन इसके दम पर उन्हें न किसी से इज़्ज़त मिलेगी और न ही उनके सामने कोई घुटने टेकेगा। यह स्पष्ट होता है इस बात से कि वेनेज़ुएला की संप्रभुता को तार-तार करने की घटना पर दुनिया भर से प्रतिक्रियाएँ आईं, क्यूबा की क्रांति को बर्बाद करने के विरोध में दुनिया के लोग खड़े हुए हैं और शायद ही दुनिया में कोई ऐसा इंसान होगा जो फ़िलिस्तीन में चल रहे जनसंहार के ख़िलाफ़ नहीं है।

अवापसी की डायरी, केली सिन्नापा मैरी (ग्वाडेलूप), 2017

दिसंबर 2025 में, अल्जीरिया की संसद के निचले सदन ने एकमत से यह घोषणा की कि 1830 से 1962 तक उनकी ज़मीन को फ़्रांस द्वारा उपनिवेश बनाया जाना मानवता के ख़िलाफ़ अपराध था। अल्जीरिया की सरकार ने पहले इस मुद्दे को अफ्रीकी यूनियन (एयू) में उठाया था, जिसने फ़रवरी 2026 को एक प्रस्ताव पारित किया कि 30 नवम्बर को अफ्रीकी शहीदों और ट्रांसअटलांटिक दास व्यापार, उपनिवेशवाद और नस्लभेद के पीड़ितों को अफ्रीकी श्रद्धांजलि दिवस माना गया; उपनिवेशवाद (जिसे प्रस्ताव में ‘अफ़्रीका की जनता का जनसंहार’ कहा गया) के गुनाहों के ख़िलाफ़ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जाएगा; और ‘इन ऐतिहासिक अपराधों को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और प्रायश्चित’ के लिए कोशिश की जाएगी। एयू की मीटिंग में घाना के राष्ट्रपति द्रामानी महामा ने कहा कि उनका देश मार्च 2026 में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह प्रस्ताव रखेगा कि ट्रांसअटलांटिक दास व्यापार को ‘मानवता के विरुद्ध सबसे जघन्य अपराध’ के रूप में स्वीकार किया जाए। महामा ने कहा ‘अफ्रीकी मूल के सभी लोग इस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं। सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता। इसका क़ानूनी आधार मज़बूत है; और नैतिक अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता’। 

भूमध्य सागर के एक तरफ़ वैश्विक उत्तर है जो उपनिवेशवाद को सकारात्मक नज़रिए से देखता है और चाहता है कि इसकी वापसी हो, जबकि इसके दूसरी ओर है वैश्विक दक्षिण जो उपनिवेशवाद की घोर निंदा करता है और इसका हर्जाना चाहता है। महामा के वक्तव्य को क्वेसी प्रैट जूनियर की क़िताब ‘क्षतिपूर्ति: इतिहास, संघर्ष, राजनीति और क़ानून’ की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है। महामा ने इस क़िताब की बहुत स्पष्ट भूमिका लिखी है। इस क़िताब का विमोचन घाना की राजधानी अक्रा में हुआ और जुलाई 2025 में मालाबो (इक्वेटोरियल गिनी) में एयू के सम्मेलन में इसे प्रस्तुत किया गया। प्रैट का मत है कि वैश्विक उत्तर को 2 से 3 खरब अमेरिकी डॉलर न चुकाई गई मज़दूरी और 4 से 6 खरब डॉलर उपनिवेशवादी लूट के हर्जाने के तौर पर चुकाने चाहिए। कुल मिलकर यह रक़म 6 से 9 खरब डॉलर के बीच होगी। अगर 9 खरब डॉलर का हिसाब बनाया जाए तो यह वैश्विक उत्तर की सालाना जीडीपी का दसवाँ हिस्सा होगा और अफ़्रीका महाद्वीप पर जो 1.5 खरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी क़र्ज़ है उससे भी कहीं ज़्यादा (कम-से-कम पश्चाताप के रूप में यह क़र्ज़ तो ख़त्म कर दिया जाना चाहिए)।

Parque de diversões (थीम पार्क), मारिया ऑक्सिलियाडोरा दा सिल्वा (ब्राज़ील), 1973

इस बीच कैरिबिया में एंटीगुआ एंड बारबुडा के प्रधानमंत्री गैस्टॉन ब्राउन ने अपना सूट-बूट उतार, सिर पर बंडाना (एक तरह का रूमाल) पहन लिया और ‘गैसी ड्रेड’ के नाम से रेगे संगीत के लिए प्रसिद्ध ग्रैम्पस् मोर्गन के साथ मिलकर ‘रेपरेशनस्’ नाम का एक गीत फ़रवरी 2026 में पेश किया। उसके बोल इस प्रकार हैं:

मुआवज़ा, न्याय अवश्य आए
अफ्रीका और कैरेबियन एक समान।
दान नहीं, बल्कि उनका साहसपूर्वक पर्दाफाश
श्रम और सोने के लिए वापसी (मुआवज़ा)।
समुद्र के पार, धरती से उखाड़े गए,
पैरों में बेड़ियाँ, हाथ में कोड़ा।
पर जाह की रोशनी* तूफान से हमें ले गई
अब न्याय के एक नए दिन का जन्म हुआ।

उन्होंने शरीर, हीरे और गन्ना लूटा।
पीढ़ियों ने यह बोझ और पीड़ा ढोई।
पर लोग मज़बूत हैं, हम अब भी जीवित हैं।
अब समय आ गया न्याय के आने का:
क्षतिपूर्ति, न्याय अवश्य आए।

(जाह, यानी ईश्वर, की अलौकिक मार्गदर्शक रौशनी)

यक़ीनन, प्रधानमंत्री ब्राउन को अपने गीत का लिंक मार्को रुबियो और बाक़ी सभी यूरोपीय सरकारों के सदरों को भेजना चाहिए। रुबियो उपनिवेशवादी ‘इच्छाशक्ति’ के तलबग़ार है जिसने ‘अनजाने समंदरों’ में जहाज़ भेजे थे। लेकिन वैश्विक दक्षिण की जनता को याद है उन जहाज़ों में क्या आया था – और वे कैसे दिखते थे। अगर अटलांटिक देश ‘सभ्यता’ की बात करना चाहते हैं तो उन्हें हर्जाने से शुरुआत करनी होगी: अवैधानिक क़र्ज़ों को माफ़ करना होगा, लूटी गई सम्पदा वापस करनी होगी और सदियों तक की गई उपनिवेशवादी लूट तथा साथ ही नवउपदरवादी लूट का मुआवज़ा देना होगा। उपनिवेशवाद को दी गई खुली छूट का दौर ख़त्म हुआ। अब न्याय होना चाहिए।

स्नेह सहित,

विजय