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सबसे मज़बूत लोगों का लोकतंत्र हमेशा अच्छा होता है: अठारहवाँ न्यूज़लेटर (2026)

अगर 1987 में संकारा की हत्या न हुई होती तो बुर्किना फ़ासो और साहेल क्षेत्र आज बहुत अलग होते।

Le soleil est dans vos pieds (सूरज तुम्हारे कदमों में), ऑल्गा यामेओगो (बुर्किना फ़ासो), 2023.

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

15 अक्टूबर 1987 को बुर्किना फ़ासो के नेता थॉमस संकारा और उनके बारह वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या कर दी गई। मुझे अच्छे से याद है कि ये जघन्य हत्याएँ किसने करवाईं, इसे लेकर उस वक़्त काफ़ी असमंजस की स्थिति थी। हत्यारे भी संकारा का सामना करने से घबराए हुए थे शायद इसलिए उन्होंने पीछे से गोलियाँ चलाईं, उन पर कई गोलियाँ चलाई गईं और उसके बाद मीटिंग में मौजूद बाक़ियों को निशाना बनाया गया। घटना के कुछ ही वक़्त में संकारा के एक साथी ब्लेज़ कॉम्पाओरे ने इस तख़्तापलट का बचाव करते हुए दावा किया कि संकारा की वजह से फ़्रांस और फ़्रांस के क़रीबी कोट द’ आईवोआर (आइवरी कोस्ट) से देश के रिश्ते बिगड़ रहे थे। पैंतीस साल बाद, एक जनविद्रोह के बाद कॉम्पाओरे को सत्ता से बाहर किया गया, और यह साबित हुआ कि इन हत्याओं में वे शामिल थे, हालाँकि विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियो (जैसे फ़्रांस की) की भूमिका को लेकर कोई गंभीर जाँच नहीं की गई। इसलिए एक सवाल इस मामले में अब भी बना हुआ है: संकारा की हत्या आख़िर क्यों की गई?

नवंबर 1982 में, तब अपर वोल्टा गणराज्य कहलाए जाने वाले देश में साये ज़ेर्बो का तख़्तापलट कर जीन-बैप्टिस्ट ओउएड्रागो राष्ट्रपति बने। उन्हीं के शासनकाल में जनवरी 1983 में थॉमस संकारा (1949-1987) को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया। ज़ेर्बो ने जब मज़दूर संगठनों को बलपूर्वक कुचलने की कोशिश की तब कम्युनिस्ट ऑफ़िसर ग्रुप (Regroupement des officiers communistes, या आरओसी) से जुड़े युवा सैनिकों, जिसमें संकारा भी शामिल थे, ने ओउएड्रागो को सत्ता में आने में मदद की। ओउएड्रागो ने फिर संकारा को अपना प्रधानमंत्री चुना। दोनों ने अपनी सार्वजनिक छवि एक साधारण व्यक्ति जैसी बनाई, संकारा तो साइकिल से दफ़्तर भी जाते थे। फ़्रांस आरओसी को हटाना चाहता था और इसकी निर्णायक भूमिका से ओउएड्रागो भी कुछ असहज थे इसलिए उन्होंने संकारा को हाउस अरेस्ट कर दिया और आरओसी के अन्य सदस्यों को हटाने की कोशिश की। इसके जवाब में 4 अगस्त 1983 को नौजवान कॉम्पाओरे ने एक तख़्तापलट प्रक्रिया का नेतृत्व किया और संकारा को रिहा करवाते हुए उन्हें सत्ता में लाए। संकारा और कॉम्पाओरे ने अपर वोल्टा गणराज्य की कमान सँभाली, संकारा ने जल्दी ही देश का नाम बदलकर बुर्किना फ़ासो (नैतिक जन की भूमि) कर दिया।

बूबा, फ़िदेल काबरे (बुर्किना फ़ासो), 2018.

संकारा के शासनकाल के एजेंडे पर नज़र भर डाली जाए तो पता चल जाएगा कि 1987 में अगर उनकी हत्या नहीं की गई होती तो बुर्किना के लोगों को क्या कुछ हासिल हो सकता था। बुर्किना की क्रांति का सबसे अहम पहलू था जनता को लामबंद करके उन्हें पूरी तरह सक्रिय करना ताकि वे क्रांति की रक्षा के लिए बनी कमेटियों (Comités de Défense de la Révolution, या सीडीआर) के ज़रिए राष्ट्र निर्माण का काम कर सकें। इन कमेटियों का विचार क्यूबाई क्रांति के अनुभवों से लिया गया था। सीडीआर के ज़रिए ही संकारा सरकार जान पाई कि जनता की ज़रूरतें क्या थीं और उन ज़रूरतों के लिए कार्यक्रम बनाए गए और लागू किए गए। वहाँ भी वही मुद्दे प्रमुख थे जो बाक़ी वैश्विक दक्षिण के लोगों के थे: शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य संप्रभुता, बिजली, घर, साफ़ पानी और स्वच्छता संबंधी ढाँचा, ठीक-ठाक रोज़गार, सांस्कृतिक अवसर और यातायात (ये सभी संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास के लक्ष्यों में दिए गए हैं)।

एक युवा के रूप में जब संकारा का आकर्षण मार्क्सवाद की ओर हुआ, तब उन्होंने सवाल किया कि लोगों को अभावों से कैसे मुक्ति दिलाई जा सकती है। इसका जवाब उन्हें सेना और सरकार में अपने काम के दौरान मिला: बुर्किना फ़ासो को अपने कच्चे माल (सबसे ज़्यादा सोने पर) पर राष्ट्रीय संप्रभुता लागू करनी ही होगी; इस राष्ट्रीय संपदा का इस्तेमाल बुर्किना की जनता के आधुनिक जीवन के लिए ज़रूरी आधारभूत ढाँचे के निर्माण के लिए करना होगा (जैसे यातायात, बिजली सुविधाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल एवं स्वच्छता प्रणाली); और ऐसे क्षेत्रीय, महाद्वीपीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का निर्माण करना होगा जो लोगों के आत्म के भाव को पोषित करें न कि उसे बर्बाद करें। यही संकारा द्वारा शुरू की गई लोकतांत्रिक और लोकप्रिय क्रांति का आधार था, इसे उनकी हत्या के बाद संकारावादी दृष्टिकोण के नाम से जाना गया।

L’enfer du Cuivre (ताँबे का नरक), न्याबा लियोन ओउएड्रागो (बुर्किना फ़ासो), 2008.

हमारे हालिया डोसियर Class Struggle and Climate Catastrophe in the Sahel (अप्रैल 2016) (साहेल में वर्ग संघर्ष और जलवायु संकट) में हमने दिखाया है कि बुर्किना फ़ासो सहित सहारा मरुस्थल और साहेल क्षेत्र किस तरह जलवायु संकट की चपेट में है। यहाँ मौसम में आए बदलाव से पशुपालन, कृषि और व्यापार के रास्तों पर बुरा प्रभाव पड़ा है, यह क्षेत्र पहले से ही अलगाववादी हिंसक तनाव और कट्टर धर्मांधता की वजह से काफ़ी बर्बाद हो चुका है। 2011 में यूएस-फ़्रांस-नाटो ने मिलकर लीबिया में जो तबाही की वह अपने पीछे अल्जीरिया से लेकर नाइजीरिया तक सहारा-साहेल क्षेत्र में राजनीतिक टकराव छेड़ गई। संसाधनों को लेकर पुराने विवाद जलवायु संकट की वजह से और भी बढ़ गए हैं, साथ ही विस्तृत सहारा क्षेत्र में जमात नुसरत उल-इस्लाम वा अल-मुस्लिमिन (इस्लाम और मुसलमानों का समर्थन करने वाला संगठन) और इस्लामिक स्टेट के आने से स्थिति और बिगड़ गई है। माली से लेकर चाड तक साहेल क्षेत्र के कई देश इन संगठनों की चपेट में आ चुके हैं, जो अमूमन अपने से सहमति न रखने वाले लोगों के प्रति काफ़ी बर्बर होते हैं।

बुर्किना फ़ासो (2022), माली (2020 और 2021) और नाइजर (2023) में हुए हालिया तख़्तापलट की घटनाओं के पीछे एक प्रमुख कारण यह था कि यहाँ की सरकारें बहुत ज़्यादा फ़्रांस के साथ खड़ी नज़र आ रही थीं और जनता को बुनियादी व्यवस्था तथा विकास तक न दे सकी थीं। ये तख़्तापलट जिन सैन्य गुटों द्वारा किए गए थे उनके नाम काफ़ी मिलते-जुलते थे: बुर्किना फ़ासो में Mouvement patriotique pour la sauvegarde et la restauration (संरक्षण और पुनर्स्थापना के लिए देशप्रेमी आंदोलन), माली में Comité national pour le salut du peuple (जनमुक्ति के लिए राष्ट्रीय कमेटी) और नाइजर में Conseil national pour la sauvegarde de la patrie (मातृभूमि की रक्षा के लिए राष्ट्रीय परिषद)। सितंबर 2023 में इन तीन देशों की सरकारों ने मिलकर अलाइयन्स ऑफ़ साहेल स्टेट्स (साहेल देशों का गठबंधन) बनाया। ये मिलकर कई आपस में जुड़े हुए मुद्दों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं: साम्राज्यवाद और उसके क्षेत्रीय सहयोगी, जलवायु संकट और इनके अपने समाजों में वर्ग संघर्ष।

रीसाइक्लिंग प्रिंसेस, सैदौ डिको (बुर्किना फ़ासो), 2022.

हमारे डोसियर में साहेल क्षेत्र के देशों में जलवायु संकट के प्रभावों का अध्ययन किया गया, ख़ासतौर से क्षेत्र में व्याप्त वर्गीय विरोधाभासों के विश्लेषण के ज़रिए माली और सूडान का। यह डोसियर जब आकार ले रहा था तो मुझे याद आई संकारा के पर्यावरणवाद की, बुर्किना फ़ासो, क्षेत्र और पूरे अफ़्रीका के लिए उससे क्या कुछ किया जा सकता था। अगर संकारा और बुर्किना के लोगों को मौक़ा मिलता तो वे बहुत कुछ हासिल कर पाते। संकारा के एजेंडे के कुछ बिंदु इस प्रकार हैं:

  1. संकारा ने पहचाना कि पर्यावरण की बर्बादी उपनिवेशवादी तबाही का एक नतीजा थी और इसलिए इसका उपाय था कि पर्यावरण की रक्षा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर हो। प्रकृति को ऐसे कच्चे माल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जिसके अस्तित्व की चिंता किए बिना उसका मनचाहा दोहन किया जाए। इसलिए 1985 में संकारा ने झाड़ियों में लगने वाली आग़, पेड़ों की बेलगाम कटाई और आवारा मवेशियों की समस्याओं के ख़िलाफ़ ‘तीन आंदोलन’ (Les trois luttes) शुरू किए। इन तीनों ने किसी ख़ास पर्यावरणीय ह्रास को निशाना बनाया। झाड़ियों में लगने वाली आग़ और पेड़ों की कटाई से जंगल ख़त्म होते हैं, जबकि आवारा मवेशियों द्वारा बड़े स्तर पर घास चरने से मिट्टी में कटाव होता है और मरुस्थलीकरण भी। आवारा मवेशियों की संख्या बढ़ना अपने आप में औपनिवेशिक शासन और उत्तर-औपनिवेशिक दौर में सामूहिक भूमि की देखरेख की व्यवस्था के बिगड़ जाने का नतीजा था। इन प्रयासों का मक़सद पर्यावरण में आए उन बदलावों को उलटना था जो उपनिवेशी शासन से पैदा और गहरे हुए। इस शासन ने ज़मीन को सामूहिक जीवन के आधार के रूप में नहीं बल्कि संसाधनों की खान के रूप में देखा जिसका अंतहीन दोहन किया जा सकता है। इसके विपरीत थे ‘Un village, un bosquet’ (एक गाँव, एक उपवन) और ‘Une école, un bosquet’ (एक स्कूल, एक उपवन) जैसे अभियान जो हरियाली वाले क्षेत्र की बहाली, मरुस्थलीकरण को रोकने और गाँव तथा स्कूली स्तर पर पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना पैदा करने के लिए बनाए गए थे। ‘एक गाँव, एक उपवन’ कार्यक्रम ने ब्राज़ील के भूमिहीन मज़दूर आंदोलन (एमएसटी) को 2019 में उनकी राष्ट्रीय वृक्षारोपण योजना तैयार करने की प्रेरणा दी। इस योजना का लक्ष्य है एक दशक में 10 करोड़ पेड़ लगाना।
  2. भूख नतीजा होती है खाद्यान्न के लिए बाज़ार पर निर्भरता और उसे पैदा करने वाले संसाधनों (जैसे ज़मीन) की कमी का। संकारा ने खाद्य सहायता की बजाय कृषि सुधार और ग्रामीण विकास पर बल दिया। संकारा के कृषि सुधार का उद्देश्य बेहतर संगठन और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से श्रम उत्पादकता बढ़ाना, क्षेत्रीय विशेषज्ञता के साथ कृषि में विविधता को विकसित करना, किसानों पर अत्याचार करने वाली सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को समाप्त करना, और कृषि को औद्योगिक विकास का आधार बनाना था। उनकी क्रांतिकारी सरकार ने भूमि और खनिज संपदा का राष्ट्रीयकरण करने, भूमि आवंटन पर क़बीलाई प्रमुखों के नियंत्रण को कमज़ोर करने, बेगार को समाप्त करने, और सिंचाई का विस्तार करने के लिए भी क़दम उठाए।
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे की कमी ने किसानों को अस्तित्व संकट के ऐसे स्तर पर धकेल दिया जिसने ग्रामीण इलाक़़ों की जिजीविषा को ख़त्म कर दिया। संकारा ग्रामीण इलाक़ों में विद्युतीकरण बढ़ाना चाहते थे, न केवल रहने की स्थिति में सुधार करने के लिए बल्कि जलाऊ लकड़ी पर निर्भरता कम करने के लिए भी, इसके लिए ईंधन के लिए पेड़ों के बेरहम दोहन को रोकने के लिए बेहतर खाना पकाने के चूल्हे उपलब्ध कराया जाना। यह एक ऐसे देश में एक अनसुलझा प्रश्न बना हुआ है जहाँ 2023–2024 में ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली तक पहुँच केवल 5.49% थी। संकारा क्षेत्रीय सिंचाई प्रणालियों के विकास भी करना चाहते थे, ताकि वर्षा जल को जलाशयों और फिर नहरों के माध्यम से बेहतर ढंग से इस्तेमाल में जाया जा सके।
  4. अंत में, सीडीआर की पूरी प्रक्रिया और संकारा के काम के तरीक़े का मक़सद था निर्णय प्रक्रिया को स्थानीय समुदायों को दे देना और संसाधनों का नियंत्रण जनता के हाथ में देना न कि अंतर्राष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संस्थाओं या कि केंद्रीय सरकारों के हाथ में।

शीर्षकहीन, सेदू केइता (माली), 1948-1954.

अगर संकारा के एजेंडे के ये बुनियादी पहलू अमल में लाए गए होते तो हो सकता है कि साहेल क्षेत्र के किसान और पशुपालक उन गहरी समस्याओं का सामना न कर रहे होते जो आज उनके सामने खड़ी हैं। उन विरोधाभासों में से कुछ का हल संभव हो सकता था जिन्हें आज तनाव में बदल दिया गया है – विशेष रूप से बुर्किना फ़ासो के उत्तरी हिस्सों में। बुर्किना फ़ासो से मिले सबक़ माली और नाइजर, और बाद में उत्तरी नाइजीरिया और घाना द्वारा भी अमल में लाए जा सकते थे।

Le Grenier (अन्न भंडार), क्रिस्टोफ सवाडोगो (बुर्किना फासो), 2023.

1999 में, आइवोरियन रेगे स्टार अल्फा ब्लोंडी ने ‘जर्नलिस्ट एन दंगे’ (पत्रकार ख़तरे में) नामक एक गाना तैयार किया। यह बुर्किना के पत्रकार नॉर्बर्ट ज़ोंगो (1949–1998) के बारे में था, जिन्हें बुर्किना फ़ासो के ज़ीरो प्रांत में तीन अन्य लोगों के साथ कुछ समय पहले ही में मार दिया गया था। वह ब्लेज़ कॉम्पाओरे के भाई फ्रांकोइस के ड्राइवर डेविड वेडरावगो की मौत की जाँच कर रहे थे। ज़ोंगो के अंतिम संस्कार में बीस हज़ार लोग शामिल हुए। वे पत्रकारिता और लोकतंत्र के पक्के समर्थक थे और 1989 में मानव एवं जनता के अधिकारों के लिए बुर्किनाबे आंदोलन (Mouvement Burkinabè des Droits de l’Homme et des Peuples) के संस्थापकों में से एक थे, जो संकारा के विचारों से प्रेरित था। मैं बुर्किना फ़ासो की राजधानी वागाडुगू की अपनी पिछली यात्रा के दौरान इस संगठन के लोगों से मिला और ज़ोंगो की विरासत की मौजूदगी को महसूस किया। आज जिस बुर्किना फ़ासो का निर्माण हो रहा है उसमें यह विरासत आज भी गूँजती है और संकारा की विरासत भी। नीचे दी जा रही इन लाइनों में अल्फा ब्लोंडी हमें उन लोगों के बारे में बता रहे हैं जो शालीनता को ख़त्म करना चाहते हैं और कुछ बेहतर बनाने की आवश्यकता के बारे में:

La démocratie du plus fort est toujours la meilleure
C’est comme ça
Au clair de la lune mon ami Zongo.

सबसे मज़बूत लोगों का लोकतंत्र हमेशा अच्छा होता है
और यही होता है
चाँदनी रात में, मेरे दोस्त ज़ोंगो।

स्नेह सहित,

विजय