अति-साम्राज्यवाद अपने चरम पर: तीसरा न्यूज़लेटर (2026)
यूएस का वेनेज़ुएला पर हमला और राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण करना विश्व व्यवस्था के मौजूदा अति-साम्राज्यवादी दौर को दर्शाता है।
Premio de ganadores (विजेता का इनाम), दागोबेरतो नलास्को (एल साल्वाडोर), 1990.
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
2024 में हमारे संस्थान ने दो अहम दस्तावेज़ प्रकाशित किए – अति-साम्राज्यवाद: पतन का एक ख़तरनाक नया दौर शीर्षक से एक अध्ययन और विश्व व्यवस्था में हलचल शीर्षक से डोसियर नं 72। इन दोनों से ये पाँच प्रमुख निष्कर्ष उभरकर आते हैं:
- संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के नेतृत्व वाला साम्राज्यवाद एक नए और अधिक आक्रामक दौर में दाख़िल हो चुका है जिसे हमने अति-साम्राज्यवाद कहा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से विश्व व्यवस्था पर यूएस वर्चस्व हावी रहा है। यह इसके 900 से ज़्यादा विदेशी सैन्य अड्डों; ‘वैश्विक नाटो’ के विचार और उत्तरी अटलांटिक के बाहर राजनीतिक टकरावों को सुलझाने के लिए यूएस-नाटो सेना के हमलों में साफ़ दिखाई देता है। और साथ ही शक्ति दिखाने के दोहरे तरीक़ों में भी जिनमें शामिल हैं एकतरफ़ा दबाव डालने वाले उपाय, सूचनाओं की जंग, निगरानी के नए तरीक़े और असहमति को अवैधानिक साबित करने के लिए क़ानूनी दाँवपेच। हमारा मानना है कि इस तरह के अति-साम्राज्यवाद के पीछे की वजह है वैश्विक उत्तर की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति अपेक्षाकृत कमज़ोर होना।
- संयुक्त राज्य अमेरिका अब भी उस एकीकृत साम्राज्यवादी गुट की केंद्रीय वर्चस्ववादी शक्ति बना हुआ है जिसे हम वैश्विक उत्तर कहते हैं। हमारा मत है कि पश्चिमी देशों में कोई आपसी बहुध्रुवीय साम्राज्यवादी होड़ नहीं है बल्कि एक सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक रूप से संयोजित नाटो+ गुट पर यूएस का दबदबा है जिसमें उसके अलावा बाक़ी सभी पश्चिमी ताक़तें गौण हैं। यूएस नेतृत्व वाले इस गुट को लगता है कि वैश्विक दक्षिण पर नियंत्रण करने में चीन की प्रगति एक चुनौती है, और वे इस चुनौती को ख़त्म करना चाहते हैं।
- अति-साम्राज्यवादी गुट वैश्विक दक्षिण पर अपना नवउदारवादी नियंत्रण बरक़रार रखना चाहता है और यूरेशिया की विकसित होती शक्तियों (चीन और रूस) पर अपना रणनीतिक वर्चस्व भी। नाटो+ गुट और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) जैसे प्रमुख वित्तीय संस्थानों पर अपने नियंत्रण के ज़रिए यूएस अपने हितों के आड़े आने वाली राष्ट्रीय संप्रभुता और प्रतिरोध को कुचलना चाहता है – जैसा कि यूक्रेन युद्ध और ग़ज़ा में जारी जनसंहार में देखा जा सकता है। ऐसा ही हमने देखा जब यूएस कई ऐसे समझौतों से पीछे हट गया जो उसकी शक्ति को सीमित करते हैं, इनमें शामिल हैं प्रमुख हथियार नियंत्रण संधियाँ जैसे एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल संधि (2002) और इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज़ संधि (2019), साथ ही संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (2026)।
- यूएस नेतृत्व वाले नाटो+ गुट के लिए ज़रूरी है कि चीन का उत्थान और विश्व की अर्थव्यवस्था का केंद्र उत्तरी अटलांटिक के बाहर जाने से रोका जाए। हमारा शोध बताता है कि कैसे चीन और अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के नेतृत्व में वैश्विक दक्षिण ने क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के आधार पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वैश्विक उत्तर को पछाड़ दिया है और इसलिए यह पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व के लिए ख़तरा बन गया है। हमने दिखाया है कि कच्चे माल, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और वित्त पर नियंत्रण को ये उभरती हुई ताक़तें चुनौती दे रही हैं। इसलिए नाटो+ गुट की ओर से एक रणनीतिक जवाब दिया जा रहा है। वैश्विक दक्षिण जहाँ शांति और विकास को अहमियत देना चाहता है वहीं वैश्विक उत्तर दुनिया पर युद्ध थोपना चाहता है।
- साम्राज्यवाद का यह मौजूदा दौर तनाव की आशंकाओं को बढ़ा रहा है और विश्व में स्थिरता के लिए ख़तरा बन चुका है। यूएस की आर्थिक और राजनीतिक ताक़त में आई कमी के कारण वॉशिंगटन के लिए सैन्य बल और दोहरे उपाय अपने वैश्विक प्रभाव को बनाए रखने के लिए प्रमुख हथियार बन गए हैं। इसने हिंसा और तनाव के प्रसार का ख़तरा बढ़ाकर विश्व शांति की संभावना पर सवालिया निशान लगा दिया है, जलवायु संकट को और गहरा कर दिया है और वैश्विक दक्षिण की जनता की संप्रभुता को ख़तरे में डाल दिया है।
हमारे काम के केंद्र में अति-साम्राज्यवाद का सिद्धांत है। आज हम जो देख रहे हैं वह है अति-साम्राज्यवाद का चरम रूप।
बाल योद्धाओं की हस्तकृतियाँ, सिमोन बेनेडिक्ट सेसे (सिएरा लिओन), 2000.
3 जनवरी 2026 को यूएस का वेनेज़ुएला पर हमला हुआ और इसी दिन फ़्रांस और यूके के लड़ाकू विमानों ने पाल्मीरा (सीरिया) के पास पहाड़ों में एक ज़मीन के नीचे स्थित एक ठिकाने पर बमबारी की। इसके कुछ ही हफ़्ते पहले यूएस ने नाइजीरिया के सोकोटो राज्य के गाँवों पर बमबारी की थी। ये सभी हमले ‘आतंकवाद’ से लड़ने का बहाना देकर किए गए और इनमें से किसी को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्वीकृति नहीं थी, इसलिए ये अंतर्राष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन थे। ये सब इस ज़हरीले अति-साम्राज्यवाद के ख़तरों और पतन के उदाहरण हैं। ये सब और कुछ नहीं बस नाटो+ गुट के जानलेवा सैन्य हमलों द्वारा वैश्विक दक्षिण पर उसकी सत्ता का प्रदर्शन है और इसे किसी भी तरह से सही साबित नहीं किया जा सकता।
2024 में दुनिया का सालाना सैन्य ख़र्च 2.7 खरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया और अनुमान है कि 2035 तक 4.7 खरब और 6.6 खरब डॉलर के बीच हो सकता है। अगर यह 6.6 खरब होगा तो यह शीत युद्ध के दौरान के आँकड़े से पाँच गुना और 2024 के ख़र्च से ढाई गुना होगा। इसी रिपोर्ट में अंदाज़ा लगाया गया कि अगर दस सालों तक 2.3 खरब और 2.8 खरब डॉलर खर्च किए जाएँ तो दुनिया से अत्यधिक ग़रीबी को ख़त्म किया जा सकता है। दुनिया के इस सैन्य ख़र्च का 80% से अधिक नाटो+ देशों ने किया, इनमें भी यूएस ने सबसे कहीं ज़्यादा। दुनिया को बर्बाद करने की क्षमता के बिना सामूहिक बर्बादी के हथियारों पर इतना ज़्यादा ख़र्च नहीं किया जा सकता। सैन्य बल का इस्तेमाल कर दूसरों को धमकाने में नाटो+ गुट के देशों का मुक़ाबला दुनिया और कोई मुल्क नहीं कर सकता।
द बुकशेल्फ 2, किरुबेल मेल्के (इथियोपिया), 2019.
पिछले कुछ सालों में हमारे संस्थान ने जिस दूसरे सिद्धांत को विकसित किया है वह है वैश्विक दक्षिण में उभरा नया भाव। हमारा मत है कि पिछले दौर में जो आर्थिक उथल-पुथल हुई है उसने अफ़्रीका और एशिया के देशों के लिए कुछ जगह बनाई है – ख़ासतौर से इन देशों को अब दशकों की घुटन के बाद अपनी संप्रभुता दर्शाने का मौक़ा मिला है। इसके उदाहरण हैं: साहेल क्षेत्र में बुर्किना फ़ासो, माली और नाइजर द्वारा अलाइयन्स ऑफ़ साहेल स्टेट्स (एईएस) का गठन; इज़राइल द्वारा जारी जनसंहार के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में दक्षिण अफ़्रीका ने जो मामला दायर किया उसे कई देशों का समर्थन मिला; और इंडोनेशिया से लेकर कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य तक कई देश अपना कच्चा माल ज्यों-का-त्यों निर्यात करने की बजाय उसमें कुछ मूल्य वृद्धि कर रहे हैं। ये घटनाएँ दिखाती हैं कि चीन के नेतृत्व में वैश्विक दक्षिण के देश कई संस्थानों में नाटो+ गुट की सत्ता के बरक़्स अपनी स्थिति को मज़बूत करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन हमारे लिए यहाँ मुख्य शब्द ‘मिज़ाज’ है: एक नई सोच, जिसकी परीक्षा हो रही है, पर जो अभी तक सामूहिक पश्चिम के लिए पूरी तरह विकसित चुनौती नहीं बनी है।
वर्तमान युद्ध, ओबी प्लेटन (रोमानिया), 2015.
वेनेज़ुएला पर हमले के कुछ घंटे पहले राष्ट्रपति मादुरो लैटिन अमेरिका में चीन के विशेष राजदूत चीयू शियाओछी से कराकस में मिले थे। उन्होंने चीन के लैटिन अमेरिका के लिए तीसरे नीति दस्तावेज़ (10 दिसंबर 2025 को जारी) पर चर्चा की जिसमें चीनी सरकार ने ज़ोर देकर कहा: ‘एक विकासशील देश और वैश्विक दक्षिण का हिस्सा होने के नाते चीन हमेशा लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र सहित वैश्विक दक्षिण की संप्रभुता के साथ हर स्थिति में खड़ा रहेगा’। उन्होंने चीन और वेनेज़ुएला के 600 संयुक्त विकास कार्यक्रमों और वेनेज़ुएला में लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर के चीनी निवेश का जायज़ा लिया। मादुरो और चीयू ने बातचीत की और साथ तस्वीरें खिंचवाईं जो सोशल मीडिया तथा वेनेज़ुएला टीवी पर प्रसारित हुईं। चीयू इसके बाद वेनेज़ुएला में चीन के राजदूत लान हू तथा लैटिन अमेरिका और कैरिबियन विभाग के विदेश मामलों के विदेश मंत्रालय के निर्देशकों लीयू बू और वांग हाओ के साथ चले गए। कुछ ही घंटों में कराकस पर बमबारी कर दी गई।
हमले के कुछ ही देर बाद चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा ‘यूएस का यह वर्चस्ववादी हमला अंतर्राष्ट्रीय क़ानून और वेनेज़ुएला की संप्रभुता का उल्लंघन है और लैटिन अमेरिका तथा कैरिबियाई क्षेत्र की सुरक्षा का भी। चीन इसका पुरज़ोर विरोध करता है।’ इसके अलावा ज़्यादा कुछ नहीं किया जा सकता था। चीन सैन्य ताक़त से यूएस के अति-साम्राज्यवाद की बर्बरता को रोक सकने की क्षमता नहीं रखता। चीन और रूस दोनों की सैन्य क्षमता मिलकर काफ़ी प्रभावी है इसमें परमाणु हथियार भी शामिल हैं लेकिन इनके पास यूएस की तरह दुनियाभर में सैन्य मौजूदगी नहीं है। यूएस का सैन्य ख़र्च इन दोनों देशों के ख़र्च जोड़ने पर भी उससे दोगुना है और इसलिए ये मुख्यत: अपना बचाव करने वाली शक्तियाँ है (यानी ये सिर्फ़ अपनी सीमाओं की रक्षा कर सकते हैं)।
इन हालिया घटनाओं ने वैश्विक दक्षिण के नए मिज़ाज की कमज़ोरी को उजागर किया है लेकिन इसके होने पर सवालिया निशान नहीं लगाया। पूरे वैश्विक दक्षिण में तुरंत यूएस द्वारा यूएन चार्टर के उल्लंघन की कड़ी निंदा की गई। यह नया मिज़ाज तो बरक़रार है लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएँ हैं।
शीर्षकहीन, अबौदिया (कोत द’वुआर/आइवरी कोस्ट), 2018.
हमारे संस्थान ने ख़ास क़िस्म के चरम दक्षिणपंथ का एक तीसरा सिद्धांत भी विकसित किया है। यह दक्षिणपंथ ज़्यादातर महाद्वीपों में सत्ता के गलियारों में काफ़ी तेज़ी से दाख़िल हुआ है लेकिन लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में तो इसकी रफ़्तार बहुत ही तेज़ रही है। हमारे हिसाब से इसके उत्थान के कई कारण हैं, जिनमें शामिल हैं:
- सोशल डेमोक्रैट्स (सामाजिक लोकतंत्रवादी) आईएमएफ़ द्वारा थोपी गई राजकोषीय विवेकशीलता और समाज कल्याण के कार्यक्रमों पर सरकारी ख़र्च में भारी कटौती की नीतियों से बंधे रहे इसलिए वे बेरोज़गारी, सामाजिक वैमनस्य और अपराध जैसे संकटों का उपाय करने में असफल रहे।
- चीज़ों की क़ीमतों में आई गिरावट से बढ़ी हुई राष्ट्रीय आय का पुनर्वितरण और भूख-ग़रीबी जैसी जनता की फ़ौरी समस्याओं से निपटने वाली मामूली कल्याणकारी नीतियों के आधार पर एक ‘गुलाबी लहर’ (2000 के दशक में लैटिन अमेरिका के कई देशों में वामपंथी/प्रगतिशील ताक़तों की सरकारें बनीं) चली। चरम दक्षिणपंथ इस पुनर्वितरण के काफ़ी ख़िलाफ़ है क्योंकि उसके हिसाब से यह मध्य वर्ग के साथ नाइंसाफ़ी है।
- सामाजिक लोकतंत्रवादी और स्थानीय शासन में जगह बनाने वाले वामपंथी भी बढ़ते अपराधों को रोक नहीं पाए। ये अपराध कुछ हद तक ड्रग्स के कारोबार से जुड़े हैं जिन्होंने पूरे पश्चिमी गोलार्ध के मज़दूर वर्ग के इलाक़ों को अपनी जकड़ में ले रखा है।
- ख़ास क़िस्म के चरम दक्षिणपंथ ने वाम की ओर झुके हुए मध्यमार्गी और सामाजिक लोकतंत्रवादी राजनेताओं को योजनाबद्ध रूप से अवैध घोषित करने के लिए भ्रष्टाचार की बहस को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। इस तरह की कानूनी लड़ाई ने राजनीति-विरोधी माहौल बना दिया है, जिसमें बिना किसी बुनियादी सुधार के सख़्त व्यवस्था और दंडात्मक न्याय की सोच को बढ़ावा मिलता है।
- एक गढ़े गए सभ्यतागत संकट की प्रतिक्रिया में भय की राजनीति का उभार देखने को मिलता है। इसका उदाहरण ‘जेंडर विचारधारा’ का डर, शहरी क्षेत्रों में अश्वेत युवाओं को ख़तरे के रूप में नस्ली ढंग से पेश करना (जिससे उनके ख़िलाफ़ पुलिस हिंसा को सामान्य और स्वभाविक माना जाने लगा), आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकार के दावे और पर्यावरणवादियों की माँगें हैं। विशेष प्रकार के चरम दक्षिणपंथ ने परंपराओं की रक्षा और जीवन-शैली को बहाल करने की आवश्यकता के नाम पर आबादी के एक बड़े हिस्से की कल्पना को अपने क़ब्ज़े में कर लिया, मानो समाज को कमजोर करने वाले नारीवादी और कम्युनिस्ट हों, न कि नवउदारवादी विनाश की आग।
- वैश्विक उत्तर से वैश्विक दक्षिण में पारराष्ट्रीय दक्षिणपंथी मंचों (जैसे स्पेन का फोरो मैड्रिड) के माध्यम से भारी मात्रा में धन भेजा जाता है, ताकि ईवैंजेलिकल नेटवर्कों और नए गलत सूचना वाले डिजिटल तंत्र को पोषित किया जा सके।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं पर अपने प्रभुत्व के माध्यम से, SWIFT जैसी वैश्विक वित्तीय प्रणालियों के माध्यम से, और प्रत्यक्ष सैन्य बल एवं धमकाने के माध्यम से वैश्विक दक्षिण में संयुक्त राज्य अमेरिका की सीधी दख़लंदाजी।
लैटिन अमेरिका और कैरीबियन में एक ख़ास क़िस्म के चरम दक्षिणपंथ, सिमोन बोलिवर द्वारा प्रतिपादित और ह्यूगो चावेज़ द्वारा अपनाए गए संप्रभुता के विचारों की वापसी के प्रति साम्राज्यवादी प्रतिकार था, जिसकी अभिव्यक्ति ‘गुलाबी लहर‘ में हुई। जैसे-जैसे गुलाबी लहर कम हुई, एक क्रोध की लहर उभरी: हम शावेज़ (वेनेजुएला), इवो मोरालेस (बोलिविया) और नेस्टर किर्चनर (अर्जेंटीना) जैसे नेताओं से जेयर बोल्सोनारो (ब्राज़ील), जेवियर मिलेई (अर्जेंटीना), डैनियल नोबोआ (इक्वाडोर), होज़े एंटोनियो कास्ट (चिली) और नायिब बुकेले (अल सल्वाडोर) की ओर बढ़ गए।
7 Makara Maha Jog Jay (7 जनवरी विजय दिवस), पेच सोंग (कंबोडिया), 1980–1985.
हमारी सोच को आकार देने में मदद करने वाला हमारे संस्थान द्वारा विकसित चौथा महत्वपूर्ण सिद्धांत भविष्य है – न केवल समाजवाद के रूप में (जो एक उद्देश्य है), बल्कि आशा के रूप में, ऐसे भविष्य के प्रति संवेदनशीलता के रूप में: यह विचार कि हमें अपनी सोच को एक शाश्वत, भद्दे वर्तमान से बंधने नहीं देना चाहिए, बल्कि इसे उन संभावनाओं की ओर उन्मुख करना चाहिए जो हमारे इतिहास और एक बेहतर दुनिया के लिए हमारे संघर्षों में निहित हैं। ख़ास क़िस्म का चरम दक्षिणपंथ, समृद्धि के शास्त्र के माध्यम से भविष्य का प्रतिनिधित्व करने का ढोंग करता है, जबकि वास्तव में वह सामाजिक कल्याण पर सरकारी ख़र्च में भारी कटौती और युद्ध के एक स्थायी वर्तमान की पेशकश करता है और वामपंथ को गुज़रे दौर की चीज़ के रूप में चित्रित करता है। यह सच्चाई से कोसों दूर है। हमारा 100वाँ डोसियर (मई 2026) इस सिद्धांत पर केंद्रित होगा। हम इसे आपके साथ साझा करने का इंतज़ार कर रहे हैं।
जैसा कि क्वामे नुक्रमा ने कहा था ‘हमेशा आगे की ओर, पीछे की तरफ़ कभी नहीं’।
स्नेह सहित,
विजय