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एकतरफ़ा और अवैधानिक प्रतिबंध से सालाना पाँच लाख नागरिकों की हत्या: इकतीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)

द लांसेट में प्रकाशित एक अध्ययन का अनुमान है कि एकपक्षीय प्रतिबंधों के कारण जितनी मौतें हुई हैं, वे युद्धों में होने वाली मौतों के बराबर हैं।

हम ज़िंदा हैं, कैरन पौलिना बिस्वेल (कोलंबिया), 2015

प्यारे दोस्तो

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

जो लोग युद्ध क्षेत्रों या दमघोंटू हो चुके देशों में नहीं रहते, उन्हें ऐसे जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता है जैसे हमारे चारों ओर जो कुछ भी हो रहा है, उसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। जब हम युद्ध के बारे में पढ़ते हैं, तो वह हमारी ज़िंदगी से कटा हुआ लगता है, और हममें से कई लोग हथियारों या प्रतिबंधों से पैदा होने वाली मानवीय पीड़ा के बारे में कुछ भी सुनना नहीं चाहते। बमों और बैंकों ने इस दुनिया में जो युद्ध छेड़ रखा है, उसके आगे विद्वानों की शास्त्रीय चर्चा और राजनयिकों की दबी आवाज़ अनसुनी रह जाती है। 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा (जापान) पर परमाणु बम गिराने का फ़रमान देने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमन ने रेडियो पर एलान किया: ‘अगर [जापान] अब भी हमारी शर्तें नहीं मानता तो उन्हें आसमान से तबाही की बारिश के लिए तैयार रहना होगा, ऐसी तबाही जो अब तक दुनिया में देखी नहीं गई’। 

इन ख़ौफ़नाक हथियारों के इस्तेमाल को जायज़ ठहराने के लिए ट्रूमन ने झूठ बोला कि हिरोशिमा एक सैन्य अड्डा है। लेकिन उन्होंने यह छिपा लिया कि ‘लिटल बॉय’ [छोटा बच्चा] कहे जाने वाले उस बम ने कितनी बड़ी संख्या में नागरिकों की हत्या की थी। सिटी ऑफ़ हिरोशिमा  के मुताबिक़ ‘परमाणु हमले में हुई मौतों की सही संख्या अब भी मालूम नहीं है। दिसंबर 1945 के अंत तक रेडीएशन के गम्भीर प्रभाव कमोबेश ख़त्म हो चुके थे और एक अनुमान के मुताबिक़ तब तक लगभग 140,000 लोग मारे जा चुके थे’। उस समय हिरोशिमा की कुल आबादी थी 350,000। यानी बम गिरने के पाँच महीनों के अंदर-अंदर शहर की 40% जनता मारी जा चुकी थी। ‘तबाही की बारिश’ उन पर पहले ही हो चुकी थी।

बेघर बच्चे, लूइस मेक्वे (ज़िम्बाब्वे), 1997

स्वास्थ्य और दवाओं पर निकलने वाली सबसे प्रसिद्ध पत्रिकाओं में से एक The Lancet ने फ़्रांसिस्को राड्रीगेज़, सिल्वीयो रेंडॉन और मार्क वाइस्ब्रोट का लिखा एक लेख छापा। इस लेख का शीर्षक बड़ा दिलचस्प था: ‘Effects of international sanctions on age-specific mortality: a cross-national panel data analysis’ [अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों का आयु-विशिष्ट मृत्यु दर पर प्रभाव: एक अंतर-राष्ट्रीय पैनल डेटा विश्लेषण]। इन शोधकर्ताओं ने प्रतिबंधों के प्रभावों का अध्ययन किया, इनमें से ज़्यादातर प्रतिबंध यूएस, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र (यूएन) द्वारा लगाए हुए थे। इन्हें अमूमन अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधकहा जाता है लेकिन असल में इनका स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय क़तई नहीं होता। अधिकांश प्रतिबंध यूएन चार्टर का उल्लंघन करते हैं, जिसके अध्याय पाँच में कहा गया है कि ऐसे कदम सिर्फ़ यूएन सुरक्षा परिषद के ज़रिए ही उठाए जा सकते हैं। अधिकतर ऐसा नहीं किया जाता और ताकतवर देश – ख़ासतौर से यूएस और यूरोपीय संघ – दूसरे देशों पर ऐसे ग़ैर-क़ानूनी और एकतरफ़ा प्रतिबंध लगाते हैं जो मानवीयता के विरुद्ध जाते हैं।    

ग्लोबल सैंक्शनस डाटाबेस के अनुसार यूएस, यूरोपीय संघ और यूएन ने दुनिया के 25% देशों पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इनमें से 40% देशों पर अकेले यूएस ने प्रतिबंध लगाए हैं, ये कार्रवाई एकतरफ़ा इसलिए है क्योंकि यूएन सुरक्षा परिषद ने इन्हें स्वीकृति नहीं दी है। साठ के दशक में दुनिया के सिर्फ़ 8% देशों पर प्रतिबंध थे। प्रतिबंधों में आई यह बाढ़ इस ओर संकेत करती है कि उत्तरी अटलांटिक के ताक़तवर देशों के लिए बिना बंदूकों का प्रयोग किए दूसरे देशों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ देना एक सामान्य बात हो चुकी है। यही 1919 में यूएस के राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने लीग ऑफ़ नेशंस की स्थापना के समय कहा था कि प्रतिबंध युद्ध से भी ज़्यादा प्रभावशालीहैं।

जुड़वाँगाएल मास्की (कांगो जनतांत्रिक गणराज्य), 2023

विल्सन के कथन का सबसे क्रूरतापूर्ण रूप मैडेलीन ऑलब्राइट द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जो उस समय संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत थीं, और यह 1990 के दशक में इराक के विरुद्ध अमेरिकी प्रतिबंधों के संबंध में था। सेंटर फ़ॉर इकनॉमिक एंड सोशल राइट्स की ओर से विशेषज्ञों का एक समूह इराक़ गया। इस समूह ने पाया कि 1990 से 1996 के बीच प्रतिबंधों के कारण ‘पाँच साल की उम्र से छोटे 5,00,000 से ज़्यादा बच्चों की मौत हुई। आसान शब्दों में, जापान पर गिराए गए परमाणु बमों और भूतपूर्व यूगोस्लाविया के हालिया जातीय संहार में कुल मिलाकर हुई मौतों से ज़्यादा बच्चे इराक़ में मारे जा चुके हैं। CBS चैनल के 60 Minutes कार्यक्रम में पत्रकार लेज़्ली स्टाल ने ऑल्ब्रायट से इस शोध के बारे में पूछा कि हमने सुना कि पाँच लाख बच्चे मर गए हैं। यानी यह आंकड़ा हिरोशिमा से भी ज़्यादा है। क्या आपके हिसाब से यह सही हुआ?’ यह सवाल पूरी ईमानदारी से पूछा गया था। ऑल्ब्रायट बहुत कुछ कह सकती थीं: वे कह सकती थीं कि उन्हें यह शोध पढ़ने का समय नहीं मिला है, या कि वे सारी ज़िम्मेदारी सद्दाम हुसैन की नीतियों पर डाल सकती थीं। लेकिन उन्होंने जवाब दिया मेरी समझ से यह एक बहुत मुश्किल फ़ैसला था लेकिन इसकी जो क़ीमत चुकानी पड़ी, हमारी नज़र में, उचित है

दूसरे शब्दों में, इराक़ में सद्दाम हुसैन के शासन को अस्थिर करने के लिए पाँच लाख बच्चों की हत्या कोई बड़ी क़ीमत नहीं थी। ज़ाहिर है कि उन प्रतिबंधों से वह सरकार गिरी नहीं। बल्कि अगले सात सालों के लिए लोगों को और भी परेशनियाँ झेलनी पड़ीं। इराक़ की सरकार गिराने के लिए आख़िर यूएस को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से इराक़ पर आक्रमण करना पड़ा (ग़ैर-क़ानूनी इसलिए क्योंकि यूएन सुरक्षा परिषद में कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया था)। ऑल्ब्रायट ने हालाँकि बाद में कहा ‘मैंने 5,000 बार कहा है कि अपने कहे पर मुझे पछतावा है। वह एक बेवक़ूफ़ाना बयान था। मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा कहा था। और इसका जो प्रभाव पड़ना था वह पड़ा चुका था।

द फ़र्स्ट सपर, सारा इस्साखारियन (ईरान), 2016

प्रतिबंध लगाने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। ऑल्ब्रायट ने कहा कि उनका बयान बेवक़ूफ़ानाथा लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि उनकी नीति ग़लत थी। 2019 में असोसीएटिड प्रेस के मैट ली ने यूएस के विदेश मंत्री माइक पाम्पेओ से वेनेजुएला पर लगाए गए प्रतिबंधों के बारे में सवाल पूछा, जिसके जवाब में उन्होंने कहा ‘हम हमेशा चाहते हैं कि चीज़ें तेज़ी से होंघेरा कसता जा रहा है। हर घंटे मानवीय संकट गहरा रहा है।आप देख सकते हैं कि वेनेजुएला की जनता की पीड़ा और कष्ट बढ़ती जा रही हैं। पाम्पेओ का बयान प्रतीकात्मक और सही है: ग़ैर-क़ानूनी प्रतिबंध पीड़ा और अभाव  को जन्म देते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों पर The Lancet का नया शोध आख़िर क्या उजागर करता है?

  1. 1971 से 2021 के बीच एकतरफ़ा प्रतिबंधों की वजह से प्रति वर्ष 5,64,258 लोगों की मौत हुई।
  2. प्रतिबंधों की वजह से मरने वालों की संख्या युद्ध में मरने वालों (प्रति वर्ष 1,06,000 मौतें) से ज़्यादा है, ‘और युद्ध की वजह से मरने वाले नागरिकों के आँकड़े के बराबर है (सालाना लगभग पाँच लाख मौतें)
  3. ज़ाहिर है, पाँच साल से छोटे बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे कमज़ोर आयु-वर्ग माने जाते हैं। ‘1970-2021 के दौरान प्रतिबंधों की वजह से हुई मौतों में 51%’ पाँच साल से छोटे बच्चे थे।
  4. यूएस और यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा थोपे गए एकतरफ़ा प्रतिबंध यूएन के प्रतिबंधों से ज़्यादा ख़तरनाक हैं क्योंकि यूएस के प्रतिबंध प्रतिकूल मृत्यु दर को बढ़ावा देते दिखाई पड़ रहे हैं। ऐसा इसलिए है कि यूएसए और ईयू द्वारा थोपे गए प्रतिबंध तैयार ही इस लिहाज़ से किए गए हैं कि उनका लक्षित आबादियों पर अधिक से अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़े
  5. यूएस द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों (और उनके साथ यूरोपीय संघ द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों) के इतने नकारात्मक प्रभाव होने का कारण है – ‘अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग लेनदेन में अमेरिकी डॉलर और यूरो का व्यापक उपयोग, इन्हें वैश्विक आरक्षित मुद्राओं के रूप में इस्तेमाल किया जाना, और विशेष रूप से अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों का सीमा-पार लागू किया जाना।’
  6. इस विश्लेषण से पता चलता है कि अमूमन प्रतिबंधों का मृत्यु दर पर प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, जितने लंबे समय तक प्रतिबंध रहेंगे लोगों के जीवन पर उतना ही अधिक उनका प्रभाव पड़ेगा

इन तथ्यों के आधार पर यह शोध इस नतीजे पर पहुँचता है कि ‘अधिकार-आधारित दृष्टिकोण से, यदि प्रतिबंधों के कारण जानमाल की हानि होने के प्रमाण मिलते हैं, तो यह उनके प्रयोग को निलंबित करने की वकालत करने के लिए पर्याप्त कारण होना चाहिए।’

अरब लीग होटल, दिया अल-अज़्ज़ावी (इराक़), 1971

मार्च 2025 में हमने Imperialist War and Feminist Resistance in the Global South [वैश्विक दक्षिण में साम्राज्यवादी जंग और नारीवादी प्रतिरोध] नाम से एक डोसियर प्रकाशित किया, जो मुख्य रूप से वेनेजुएला की स्थिति के बारे में है। इस डोसियर में बताया गया कि प्रतिबंधों के क्या असर पड़ते हैं और हमले झेल रहे एक समाज में कैसे महिलाओं ने एकजुटता बनाए रखी। वे जानती हैं कि तबाही की बारिशकैसी होती है और वे अपने समाजों को इनके ख़िलाफ़ मज़बूत करने की लड़ाई लड़ रही हैं। जैसा कि हमने अपने FACTS विश्लेषण में दिखाया है, जनवरी 2017 से दिसंबर 2024 के बीच प्रतिबंधों की वजह से वेनेजुएला को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 213% का नुक़सान झेलना पड़ा है। यह 226 अरब अमेरिकी डॉलर का कुल नुक़सान है यानी हर दिन 7.7 करोड़ डॉलर।

इराक़ पर यूएस द्वारा प्रतिबंध लगाने और 2003 में यूएस द्वारा इस पर ग़ैर-क़ानूनी हमले से पहले, साल 1995 में सादी यूसुफ़ (1934-2021) ने अमेरिका, अमेरिकानाम से एक बेहतरीन कविता लिखी। उसका आख़िरी छंद है:

हम बंधक नहीं, अमेरिका,

और न तुम ख़ुदा के सिपाही

हम ग़रीब हैं, हमारी ज़मीन बिसरे हुए देवताओं की ज़मीन है,

बैलों के देवता,

अग्नि के देवता,

दुःख के देवता जो मिट्टी और ख़ून से गीत गढ़ते हैं

हम ग़रीब हैं, हमारे देवता ग़रीबों के देवता हैं,

जो जन्मे हैं किसानों की पसलियों से,

भूखे और 

चकाचौंध कर देने वाले,

जिनका सिर हमेशा ऊँचा रहता है

अमेरिका, हम मर चुके हैं।

भेजो अपने सिपाही।

किसी भी इंसान को मारने वाला, दरअसल उसमें फिर से जान फूँक देगा।

हम डूबे हुए हैं, मैडम जी।

हम डूबे हुए हैं।

आने दो पानी को।

स्नेह सहित,

विजय