लेरॉय क्लार्क (त्रिनिदाद और टोबैगो), अब, 1970.

 

प्यारे दोस्तों,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

पिछले हफ़्ते, अमेरिकी गोलार्ध पर हावी होने की अपनी नीति के तहत, संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार ने लॉस एंजिल्स में अमेरिकाज़ (उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और कैरीबिया) के 9वें शिखर सम्मेलन का आयोजन किया। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पहले से ही यह स्पष्ट कर दिया था कि गोलार्ध के तीन देशों (क्यूबा, ​​निकारागुआ और वेनेज़ुएला) को इस आयोजन में आमंत्रित नहीं किया जाएगा; यह दावा करते हुए कि इन देशों में लोकतंत्र नहीं है। उसी समय, बाइडेन कथित तौर पर सऊदी अरब (जो ख़ुद को धर्मतंत्र कहता है) की आगामी यात्रा की योजना बना रहे थे। मेक्सिको के राष्ट्रपति एंड्रेस मैनुअल लोपेज़ ओब्रेडोर ने बाइडेन की इन तीन देशों को बाहर रखने की मंशा पर सवाल उठाया, और फिर मेक्सिको, बोलीविया और होंडुरास ने इस आयोजन में भाग लेने से इनकार कर दिया। तो कुल मिलाकर, यह शिखर सम्मेलन असफल रहा।

सड़क के दूसरी ओर, सौ से अधिक संगठनों ने मिलकर एक ‘पीपुल्ज़ समिट फ़ॉर डिमॉक्रेसी’ आयोजित की, जिसमें अमेरिकी गोलार्ध के हज़ारों लोग किसानों और श्रमिकों, छात्रों और नारीवादियों, तथा ताक़तवर वर्ग की निगाह से बाहर रहने वाले सभी लोगों के संघर्षों से उभरने वाली सच्ची लोकतांत्रिक भावना का जश्न मनाने के लिए एकत्र हुए। इस सम्मेलन में, क्यूबा और वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति लोकतंत्र के इस त्योहार को मनाने और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा उसके सहयोगियों द्वारा लोकतांत्रिक आदर्शों को हथियारों से लैस करने की निंदा करने के लिए ऑनलाइन शामिल हुए।

अगले साल, 2023 में मुनरो सिद्धांत के दो सौ साल पूरे हो जाएँगे। यह वो सिद्धांत है जिसके तहत अमेरिका पूरे अमेरिकी गोलार्ध पर अपना आधिपत्य जमाता है। आज मुनरो सिद्धांत न केवल बरक़रार है, बल्कि अमेरिका की सरकार इसका वैश्विक मुनरो सिद्धांत के रूप में विस्तार कर रही है। पूरी दुनिया पर इस बेतुके सिद्धांत को थोपने के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका अपने तथाकथित ‘निकट समकक्ष प्रतिद्वंद्वियों’, यानी चीन और रूस, को ‘कमज़ोर’ करने की नीति अपना रहा है।

 

फिलिप गस्टन (कनाडा), ब्लैकबोर्ड, 1969.

 

जुलाई में, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान –मन्थ्ली रिव्यू और नो कोल्ड वॉर के साथ मिलकर- अमेरिकी सरकार की अपने विरोधियों, मुख्य रूप से चीन और रूस, के ख़िलाफ़ लापरवाह सैन्य वृद्धि पर एक बुकलेट निकाल रहा है। इस बुकलेट में  मन्थ्ली रिव्यू के संपादक जॉन बेलामी फ़ोस्टर, इटली में स्थित पत्रकार डेबोरा वेनेज़ियाल और नो कोल्ड वॉर अभियान के सदस्य जॉन रॉस के निबंध शामिल होंगे। उस बुकलेट की कड़ी में, जिसकी घोषणा हम इस न्यूज़लेटर में कर रहे हैं, नो कोल्ड वॉर अभियान ने परमाणु श्रेष्ठता की ओर वाशिंगटन की ख़तरनाक तैयारी पर अपना ब्रीफ़िंग नंबर 3 ‘क्या संयुक्त राज्य अमेरिका रूस और चीन के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा है?’ भी तैयार किया है।

 

 

यूक्रेन युद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका की सैन्य बल इस्तेमाल करने की इच्छा में गुणात्मक वृद्धि को प्रदर्शित कर रहा है। हाल के दशकों में, अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, लीबिया और सर्बिया जैसे विकासशील देशों के ख़िलाफ़ युद्ध किए हैं। इन सभी युद्धों में अमेरिका यह जानता था कि उसे भारी सैन्य श्रेष्ठता प्राप्त है और परमाणु प्रतिशोध का कोई जोखिम नहीं है। लेकिन, यूक्रेन को उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) में लाने की धमकी देने में अमेरिका, एक परमाणु सशस्त्र देश, रूस, की ‘रेड लाइंज़’ को पार करने का जोखिम उठाने के लिए तैयार था। इससे दो सवाल उठते हैं: अमेरिका ने यह सैन्य हस्तक्षेप क्यों किया है, और अमेरिका अब न केवल दक्षिणी गोलार्ध के देशों के ख़िलाफ़ बल्कि चीन या रूस जैसी प्रमुख शक्तियों के ख़िलाफ़ सैन्य बल का इस्तेमाल के लिए किस हद तक तैयार है?

 

आर्थिक पतन की भरपाई करने के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल

इस ‘क्यों’ का जवाब स्पष्ट है: अमेरिका विकासशील देशों और विशेष रूप से चीन के साथ शांतिपूर्ण आर्थिक प्रतिस्पर्धा में हार चुका है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, 2016 में चीन ने अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में पछाड़ दिया था। 2021 में, चीन की वैश्विक अर्थव्यवस्था में 19% हिस्सेदारी थी, जबकि अमेरिका की हिस्सेदारी 16% थी। यह अंतर बढ़ता जा रहा है, और, आईएमएफ़ का अनुमान है कि 2027 तक चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका से लगभग 30% ज़्यादा हो जाएगी। लेकिन, अमेरिका ने बेजोड़ वैश्विक सैन्य वर्चस्व बनाया हुआ है; इसका सैन्य ख़र्च, इसके बाद के नौ सबसे अधिक ख़र्च करने वाले देशों के कुल ख़र्च से भी ज़्यादा है। एकध्रुवीय वैश्विक प्रभुत्व बनाए रखने की इच्छा में, अमेरिका शांतिपूर्ण आर्थिक प्रतिस्पर्धा को तेज़ी से सैन्य बल की प्रतिस्पर्धा में बदल रहा है।

 

इकेदा मनाबू (जापान), पिघलना, 2013.

 

अमेरिकी नीति में इस रणनीतिक बदलाव को समझने के लिए एक उचित प्रारंभिक बिंदु है 26 मई 2022 को, अमेरिकी विदेश मंत्री, एंटनी ब्लिंकन, द्वारा दिया गया भाषण। इसमें ब्लिंकन ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि अमेरिका अन्य देशों के साथ सैन्य समानता नहीं, बल्कि अपना सैन्य वर्चस्व चाहता है, विशेष रूप से चीन के संबंध में। ब्लिंकन ने कहा कि ‘राष्ट्रपति बाइडेन ने रक्षा विभाग को चीन को अपने ख़िलाफ़ बढ़ती चुनौती के रूप में देखने का निर्देश दिया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारी सेना आगे रहे’। हालाँकि, चीन या रूस जैसे परमाणु हथियारों से लैस देशों के साथ सैन्य वर्चस्व बनाए रखने का मतलब है परमाणु सर्वोच्चता प्राप्त करना – यानी यूक्रेन में मौजूदा युद्ध से भी कहीं ज़्यादा घिनौना युद्ध।

 

परमाणु श्रेष्ठता की चाह

21वीं सदी की शुरुआत से ही, अमेरिका परमाणु हथियारों के उपयोग के ख़तरे को सीमित करने वाली प्रमुख संधियों से व्यवस्थित रूप से पीछे हट रहा है: 2002 में, अमेरिका एकतरफ़ा तरीक़े से एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल संधि से बाहर हो गया; 2019 में, अमेरिका ने मध्यवर्ती परमाणु बल संधि को त्याग दिया; और, 2020 में, अमेरिका ओपन स्काईज़ संधि से पीछे हट गया। इन संधियों को त्यागने के साथ, अमेरिका की परमाणु वर्चस्व हासिल करने की ताक़त बढ़ गई है।

 

नतालिया गोंचारोवा (रूस), शहर पर पत्थर फेंकती परियाँ, 1911.

 

इस अमेरिकी नीति का अंतिम उद्देश्य है रूस और चीन के ख़िलाफ़ ‘पहली स्ट्राइक’ की क्षमता हासिल करना, यानी रूस या चीन को परमाणु हथियारों के पहले उपयोग से नुक़सान पहुँचाने की क्षमता; इस हद तक कि उससे प्रतिशोध की संभावना प्रभावी रूप से कम हो जाए। जॉन बेलामी फ़ोस्टर ने इस अमेरिकी परमाणु निर्माण पर अपने अध्ययन में उल्लेख किया है ​​​​कि रूस के मामले में भी, जिसके पास दुनिया का सबसे उन्नत ग़ैर-अमेरिकी परमाणु शस्त्रागार है, यह पहला हमला मास्को को दूसरी-स्ट्राइक के व्यावहारिक विकल्प से वंचित कर देगा; क्योंकि “डिकैपिटेशन” के माध्यम से यह हमला रूस के परमाणु निवारक को प्रभावी रूप से ख़त्म कर देगा। लेकिन सच्चाई यह है कि इस तरह के हमले के नतीजे पूरी दुनिया के लिए ख़तरनाक होंगे।

परमाणु प्रधानता की इस नीति का वाशिंगटन के कुछ हलक़ों द्वारा लंबे समय से पालन किया जा रहा है। 2006 में, अमेरिकी विदेश नीति की प्रमुख पत्रिका ‘फ़ॉरेन अफ़ेयर्स’ में यह तर्क दिया गया था कि ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए जल्द ही रूस या चीन के लॉन्ग रेंज परमाणु शस्त्रागार को पहली स्ट्राइक से नष्ट करना संभव होगा’। उनकी इन आशाओं के विपरीत, अमेरिका आज तक पहली स्ट्राइक क्षमता हासिल नहीं कर पाया है, लेकिन ऐसा अमेरिकी नीति में किसी तरह के बदलाव के कारण नहीं बल्कि इसलिए हुआ है क्योंकि रूस और चीन ने हाइपरसोनिक मिसाइलें और अन्य हथियार तैयार कर लिए हैं।

दक्षिणी गोलार्ध के देशों पर हमलों से लेकर रूस जैसी बड़ी शक्ति के साथ युद्ध में जाने की बढ़ती इच्छा और पहली स्ट्राइक की परमाणु क्षमता हासिल करने की कोशिश जैसे क़दमों से अमेरिकी सैन्यवाद के बढ़ने के पीछे का तर्क साफ़ है: संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी आर्थिक गिरावट की भरपाई करने के लिए सेना का इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहा है। इस अत्यंत ख़तरनाक दौर में मानवता के लिए यह ज़रूरी है कि सभी प्रगतिशील ताक़तें इस बड़े ख़तरे का मुक़ाबला करने के लिए एकजुट हों।

 

शेफ़ा सलेम (लीबिया), KASKA, युद्ध का नृत्य, 2020.

 

1991 में, जब सोवियत संघ का विघटन हुआ और दक्षिणी गोलार्ध कभी न ख़त्म होने वाले ऋण संकट की चपेट में था, तब संयुक्त राज्य अमेरिका ने इराक़ी सरकार की ओर से समझौते पर बातचीत की अपील के बावजूद इराक़ पर बमबारी की। उस बमबारी के दौरान, लीबिया के लेखक अहमद इब्राहिम अल-फ़कीह ने एक गीतात्मक कविता, ‘नफ़ाक तुदिउहु इमरा वहीदा’ (‘एक महिला द्वारा प्रकाशित एक सुरंग’) लिखी थी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि, ‘एक समय बीत चुका है, और अगला समय न आया है और न कभी आएगा’। वो वक़्त निराशा से भरा था।

आज हम एक बहुत ख़तरनाक समय में जी रहे हैं। लेकिन फिर भी, अल-फ़कीह की निराशा हमारी संवेदनशीलता को परिभाषित नहीं करती। मूड बदल चुका है। साम्राज्यवाद से परे एक दुनिया संभव है; यह एक ऐसा मूड है जो न केवल क्यूबा और चीन जैसे देशों में, बल्कि भारत और जापान में भी समान रूप से दिख रहा है, और मेहनतकश जनता के बीच भी दिख रहा है जो चाहती है कि हमारा सामूहिक ध्यान युद्ध और वर्चस्व की कुरूपता पर नहीं बल्कि मानवता की वास्तविक दुविधाओं पर केंद्रित हो।

स्नेह-सहित,

विजय।