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पूर्वी एशिया में एक नया संकट जड़ पकड़ रहा है: पच्चीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)

पूर्वी एशिया एक गहरे विरोधाभास से गुज़र रहा है: यह क्षेत्र वैश्विक विकास का इंजन है, लेकिन यूएस साम्राज्यवाद इसे नए शीत युद्ध की रणभूमि बनाना चाहता है।

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

 

ओकिनावा के कलाकार किंजो मिनोरू  को आज भी 1945 की ओकिनावा जंग की त्रासदी और इसके बाद से जारी इस टापू का सैन्य क़ब्ज़ा परेशान करता है। उनकी कला में इसकी छाप मौजूद है। ऐसा लगता है मानो उनकी कलाकृतियाँ धरती से ही निकली हों। इनमें इंसानी आकृतियाँ पत्थर और सीमेंट से बाहर आने का संघर्ष करती दिखती हैं, उनके शरीर युद्ध, क़ब्ज़े और स्मृतियों से घायल दिखाई पड़ते हैं। किंजो उन्हीं चीज़ों से अपनी कलाकृतियाँ बनाते हैं जिनसे ओकिनावा के तट पर संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) एक और सैन्य अड्डा बना रहा है। उनकी मूर्तियाँ सिर्फ़ अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं। वे वर्तमान के लिए एक चेतावनी हैं।

इसी वजह से हमारे नए डोसियर East Asia’s Double Bind: Contradictions and Possibilities in the New Cold War (पूर्वी एशिया की दोहरी विवशता: नए शीत युद्ध के विरोधाभास और संभावनाएँ) में किंजो की मूर्तियों की ओर रुख़ किया गया ताकि आज पूरे क्षेत्र में आकार ले रहे एक नए संकट पर चर्चा की जाए। ये मूर्तियाँ हमें आगाह कर रही हैं कि पूरे पूर्वी एशिया में कुछ स्थितियाँ जड़ें बनाती जा रही हैं: नए मिसाइल सिस्टम, सैन्य अभ्यास, सैन्य अड्डे, विवादित समुद्री इलाक़ों में नौसेना के बेड़ों की ग़श्त और सामाजिक कल्याण के बजटों में स्थिरता दूसरी ओर तेज़ी से बढ़ते हुए सैन्य बजट। पूर्वी एशिया दुनिया के आर्थिक और प्रौद्योगिक विकास का विशाल इंजन है जिसे नए शीत युद्ध की रणभूमि में तब्दील किया जा रहा है। इस क्षेत्र में एक विरोधाभास ने घर कर लिया है: वे देश जो खुलकर चीनी आर्थिक गतिशीलता से जुड़ रहे हैं वही उस सैन्य संरचना में भी घसीटे जा रहे हैं जो चीन के विरोध के लिए तैयार की जा रही है।

कई दशकों से, पूर्वी एशिया में प्रमुख आर्थिक रुझान एकीकरण का रहा है: कारखानों, रेलवे और बंदरगाहों ने इस क्षेत्र के देशों को उत्पादन, व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं और बाज़ारों के सघन नेटवर्क में जोड़ दिया है। सन् 1993 की शुरुआत में ही, विश्व बैंक ने द ईस्ट एशियन मिरेकल (पूर्वी एशियाई चमत्कार) नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें स्वीकार किया गया कि इस क्षेत्र में उच्च विकास केवल मुक्त बाज़ारों का परिणाम नहीं था, बल्कि राज्य के हस्तक्षेप का भी परिणाम था, जिसने ‘उच्च और अधिक समान विकास’ को जन्म दिया। बीस साल बाद, विश्व बैंक ने चीन 2030 (2013) प्रकाशित की, जिसमें माना गया कि चीन की व्यवस्था – जो राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों, मज़बूत राज्य हस्तक्षेप और ब्याज़ दरों पर नियंत्रण द्वारा चिह्नित है – ‘चीन की आर्थिक उड़ान के दौरान बचत जुटाने और रणनीतिक क्षेत्रों में पूँजी आवंटित करने में उल्लेखनीय रूप से सफल रही थी’। दूसरे शब्दों में कहें तो विश्व बैंक को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि पूर्वी एशिया का उदय योजना, सार्वजनिक निवेश और क्षेत्रीय एकीकरण पर निर्भर था, न कि उन मुक्त-बाज़ार वाले नुस्खों पर जो आमतौर पर वैश्विक दक्षिण पर थोपे जाते हैं। आज, चीन इस क्षेत्र में विकास का इंजन है, और पूर्वी एशियाई देशों के चीन के साथ संबंधों पर पूरे-पूरे उद्योग तथा लाखों नौकरियाँ निर्भर हैं। इसके बावजूद जहाँ आर्थिक कारण इस क्षेत्र को एकीकरण की ओर खींचते हैं, वहीं सैन्य शक्ति इसे विपरीत दिशा में धकेलती है।

यूएस ने पिछला दशक उस चीज़ के निर्माण में लगाया है जिसे इसके रणनीतिकार खुलकर ‘अस्वीकृति की रणनीति’ कहते हैं। सैन्य समझौतों और अभ्यासों, नए अड्डों के लिए समझौतों, मिसाइलों की तैनाती और ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने के नेटवर्कों के ज़रिए वॉशिंगटन चीन पर दबाव बनाना चाहता है जिससे चीन अपने आर्थिक भविष्य को त्याग दे। यह योजना हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक फैली है – यही है यूएस युद्ध रणनीतिकारों का तथाकथित ‘इंडो-पैसिफिक’ विचार – दिएगो गार्सिया से गुआम तक और ओकिनावा से उत्तरी फिलीपींस तक। यह सैन्य फैलाव एक गहरी ऐतिहासिक वास्तविकता के प्रति एक हताशापूर्ण प्रतिक्रिया है: विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया की ओर खिसक चुका है। अपने उत्पादक तंत्र के भरोसे इस बदलाव को आर्थिक रूप से उलटने में असमर्थ यूएस अपनी वैश्विक प्रधानता की अवधारणा को बनाए रखने के लिए तेज़ी से सैन्य शक्ति पर निर्भर होता जा रहा है। इसका परिणाम वही है जिसे हमारे डोसियर में पूर्वी एशियाई राज्यों के लिए एक दोहरी विवशता कहा गया है।

कई पूर्वी एशियाई राष्ट्र इस दोहरी विवशता में फँसे हुए हैं। जापान इस स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। चीन जापान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और उसके औद्योगिक निर्यात के लिए एक महत्त्वपूर्ण बाज़ार भी। फिर भी जापान में लगभग एक सौ यूएस सैन्य केंद्र हैं और वह अपने सैन्य ख़र्च को तेज़ी से बढ़ा रहा है। जापानी सरकारों ने लगातार हथियार निर्यात पर प्रतिबंधों को ढीला किया है और सैन्य गतिविधियों पर संवैधानिक सीमाओं की पुनर्व्याख्या की है – एक ऐसी दिशा जिसे प्रधानमंत्री ताकाइची सनाए ने तेज़ करने का प्रयास किया है। जबकि ओकिनावा के लोग लगातार यूएस सैन्य उपस्थिति के विस्तार के ख़िलाफ़ मतदान कर रहे हैं, लेकिन यह निर्णय उन पर टोक्यो से थोपा जा रहा है। ऐसा करके टोक्यो एक ऐसी भू-राजनीतिक रणनीति के लिए काम कर रहा है जो ओकिनावा के लोगों ने नहीं बनाई है। ओकिनावा के लोग देख रहे हैं कि खाड़ी अरब देशों में यूएस अड्डे कैसे ढाल के बजाय निशाना बन गए हैं, और वे जानते हैं कि यदि यूएस चीन या क्षेत्र की किसी अन्य शक्ति, जैसे रूस या लोकतांत्रिक जनवादी कोरिया गणराज्य [उत्तर कोरिया] के साथ सैन्य संघर्ष शुरू करता है तो वही हश्र उनका भी हो सकता है।

यही दोहरी विवशता फिलीपींस और दक्षिण कोरिया के सामने भी है। इनके यूएस के साथ सैन्य समझौते और हथियारों की बिक्री बढ़ी है, जबकि दूसरी ओर चीन के साथ व्यापार भी बढ़ा है। इन तमाम देशों में जन आंदोलन अधिक संप्रभुता और सामाजिक न्याय की माँग कर रहे हैं तथा यूएस अड्डों और सैन्य समझौतों का विरोध किया है, लेकिन इन्हें बहुत कम सफलता मिली है। विभिन्न राजनीतिक रुझानों वाली सरकारें पीढ़ियों से बनी सैन्य निर्भरता की संरचनाओं के सामने विवश रही हैं। इन घटनाक्रमों को अपरिहार्य बताया जाता है, लेकिन यह सच नहीं है। वे एक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा हैं। क्षेत्र में बहस को आकार देने वाली लोकतंत्र और सत्तावाद की भाषा भ्रामक है और स्थितियों का ख़ुलासा करने से ज़्यादा उन्हें अस्पष्ट करती है। पूर्वी एशिया के लोगों के सामने वैचारिक नहीं बल्कि भौतिक प्रश्न है: क्या क्षेत्रीय एकीकरण के माध्यम से विकास को आगे बढ़ाने वाले गुट अपने मुख्य व्यापारिक सहयोग के साथ सैन्य टकराव के लिए अग्रिम अड्डों के रूप में भी काम कर सकते हैं? इसमें क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) भी शामिल है, जो चीन को जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अधिकांश दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ती है। इसका उत्तर है – नहीं।

युद्ध रणनीतिकार ‘निवारण’ की बात करते हैं और वित्तीय बाज़ार विश्लेषक ‘जोख़िम’ की बात करते हैं, लेकिन आम जनता तात्कालिक मुद्दे समझती है: नए शीत युद्ध के माध्यम से सैन्य विस्तार ने जीवन को ही ख़तरे में डाल दिया है। हर सैन्य अड्डा ऐसी भूमि पर क़ब्ज़ा करता है जिसका उपयोग दूसरे उद्देश्यों के लिए किया जा सकता था, और रक्षा बजट हर वृद्धि की क़ीमत स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आवास और जलवायु संकट के उपायों में निवेश में कमी के रूप में चुकाई जाती है। 2024 में जापान का रक्षा व्यय 21% बढ़कर 55.3 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.4% है। इसके बाद सरकार ने रक्षा ख़र्च को जीडीपी के 2% तक ले जाने के लिए निर्धारित वित्तीय वर्ष 2027 के लक्ष्य को और पहले हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी। इसके लिए ऐसे संसाधनों को रक्षा क्षेत्र की ओर मोड़ा जा रहा है, जिनका उपयोग दुनिया के सबसे तेज़ी से वृद्ध होती आबादी वाले समाजों में से एक जापानी समाज की सामाजिक और कल्याणकारी आवश्यकताओं को पूरा करने में किया जा सकता था।

पूरे पूर्वी एशिया में मज़दूर संगठन, छात्र संगठन, किसान आंदोलन, महिला संगठन, शांति समर्थक और सैन्य अड्डों का विरोध करने वाले कार्यकर्ता जन कार्रवाई और विधायिकाओं में अपने पक्ष में राय तैयार करने के प्रयासों के ज़रिए सैन्यीकरण और विदेशी सैन्य विस्तार को चुनौती दे रहे हैं। उनके संघर्ष इस मौलिक सत्य को रेखांकित करते हैं कि वास्तविक सुरक्षा हथियारों की होड़ से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी, मानव विकास और सामाजिक न्याय के माध्यम से निर्मित होती है। पूर्वी एशिया का भविष्य केवल जनरलों और रणनीतिकारों द्वारा निर्धारित नहीं किया जाएगा, बल्कि उन सामान्य लोगों द्वारा निर्धारित किया जाएगा जो संगठित हैं और अपने विश्वासों पर दृढ़ हैं। उनके हित शायद ही कभी सैन्यवाद के साथ मेल खाते हैं।

नया शीत युद्ध सिर्फ़ देशों के बीच एक प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि वैश्विक विकास की भविष्य की दिशा से जुड़ा एक संघर्ष भी है। पूर्वी एशिया के राज्यों को सहयोग, संवाद और ऐसी संस्थाओं की ज़रूरत है जो मतभेदों का इस तरह प्रबंधन कर सकें कि वे संघर्षों में न बदल जाएँ। सबसे बढ़कर, क्षेत्र में तनावों के लिए ऐसे राजनीतिक आंदोलनों की आवश्यकता है जो टकराव के तर्क से परे भविष्य की कल्पना कर सकें। पूरे क्षेत्र में, विचारकों और राजनीतिक नेताओं ने लंबे समय से बहस की है कि क्या सुरक्षा का निर्माण निवारण और सैन्य गठबंधनों के माध्यम से किया जाना चाहिए या संवाद, सुलह और मानव सुरक्षा के माध्यम से। हमारा डोसियर इस बहस में इस बात पर ज़ोर देता है कि स्थायी शांति का निर्माण सैन्यीकरण के माध्यम से नहीं किया जा सकता।

किंजो मिनोरू की बनाई मूर्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि युद्ध कोई अमूर्त विचार नहीं बल्कि यह धरती और उस पर रह रहे इंसानों पर घाव छोड़कर जाते हैं। ये संभावनाओं को खंडहरों में तब्दील कर देते हैं। किंजो की मूर्तियों में इस्तेमाल सीमेंट स्मृतियों को पक्का करता है लेकिन सैन्य अड्डों में इस्तेमाल हो रहा सीमेंट ख़तरे की जड़ों को जमाने का काम कर रहा है। इतिहास अब भी अधूरा है।

हर साल 23 जून को ओकिनावा इरेई नो ही (स्मृति दिवस) मनाता है, ताकि 1945 की ओकिनावा की लड़ाई में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी जा सके। इस वार्षिक समारोह में कोई छात्र एक चुनी हुई कविता का पाठ करता है, जो मृतकों की स्मृति को एक नई पीढ़ी की आवाज़ में जीवित रखती है। 2018 में, उरासोए के मिनातोगावा जूनियर हाई स्कूल की तत्कालीन तृतीय वर्ष की छात्रा रिंको सगारा ने अपनी कविता ‘इकिरू’ (जीना) का पाठ किया। यहाँ एक अंश प्रस्तुत है:

मेरी आँखों के सामने माबुनी हिल के नीचे फैला समंदर।

मैं उदास हूँ और इस टापू पर गुज़रे हालात को भुला नहीं सकती।

मैं अपने हाथ जोड़कर क़सम खाती हूँ,

जो मारे गए उन्हें याद करते हुए, दिल से क़सम खाती हूँ:

मैं जब तक ज़िंदा हूँ तब तक,

इतनी जानें लेने वाली इस जंग को स्वीकार नहीं करूँगी।

भविष्य में इस अतीत को नहीं दोहराने दूँगी।

ऐसी दुनिया बनाने की कोशिश करूँगी जहाँ सब इंसान शांति से जिएँ, देशों की सरहदें धूमिल हों,

नस्ली, धार्मिक भेद न हो और निजी हितों से ऊपर हो।

एक ऐसी दुनिया जहाँ जीने की क़ाबलियत और ज़िंदगी की क़ीमत को कोई बर्बाद न कर सके।

मैं कोशिश करूँगी कि शांति स्थापित हो।

स्नेह सहित,

विजय