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विकास का अधिकार निश्चित रूप से एक मानवाधिकार है: बावनवाँ न्यूज़लेटर (2025)

ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन के 60 साल बाद भी समाजवादी क्रांति और राष्ट्रीय मुक्ति का लक्ष्य विकास का अधिकार – गरिमा की आधारशिला – ही है।

एशिया की जनता के साथ एकजुटता का सप्ताह, बेनाम कलाकार (OSPAAAL), 1968, द रैडिकल मीडिया आर्काइव से साभार

प्यारे दोस्तो,

 

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

हम जिनके नक़्शेक़दम पर चलते हैं उन्हीं महदी बेन बरका (1920-1965) की याद में।

लगभग साठ बरस पहले जनवरी, 1965 में क्यूबा के हवाना में सैकड़ों क्रांतिकारी ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन के लिए इकट्ठा हुए। यह अफ़्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका की जनता की एकजुटता के लिए आयोजित किया गया पहला सम्मेलन था। इस सम्मेलन में इन्होंने चर्चा की कि कैसे औपनिवेशिक शासन का ख़ात्मा होना तय है और साम्राज्यवाद से अलग दुनिया कैसी होगी। यह सम्मेलन फ़िदेल कास्त्रो और अन्य संगठनकर्ताओं ने वैश्विक क्रांति की दो धाराओं को एक साथ लाने के लिए बुलाया था: समाजवादी क्रांति की धारा और राष्ट्र मुक्ति की धारा। दस साल पहले बांडुंग सम्मेलन में संप्रभुता के जिन विचारों को उठाया गया था उन्हें और धार देने की ज़रूरत को इस सम्मेलन में मौजूद प्रतिनिधियों ने पहचाना। वे इस बात से परेशान थे कि दुनिया अब भी नवउदारवादी ढाँचे की क़ैद में है जो नए आज़ाद हुए देशों को अल्पविकास के कुचक्र में फाँसे हुए है। क्योंकि राष्ट्र मुक्ति की क्रांतिकारी पार्टियाँ आज़ादी मिलने के बाद तुरंत ही बिखर गईं।

हमारे संस्थान को उसका नाम देने वाले ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन की विरासत को याद करने के लिए दिसंबर के महीने में हमने डोसियर संख्या 95 निकाला है, जिसका शीर्षक है Imperialism Will Inevitably Be Defeated: The Re-Emergence of the Tricontinental Spirit (साम्राज्यवाद को निश्चय ही हराया जाएगा: ट्राईकॉन्टिनेंटल भावना का पुनरुत्थान)। साल 2026 में हम कई ऑनलाइन और ऑफ़लाइन चर्चाएँ तथा सेमिनार आयोजित करेंगे (इनमें से सबसे पहला, लैटिन अमेरिकन काउन्सिल ऑफ़ सोशल साइंसेज या CLACSO के साथ मिलकर आयोजित किया जा रहा है और इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक कीजिए)। इस डोसियर में हमने यह मत पेश किया है कि बांडुंग भावना का आधार था संप्रभुता और बहुपक्षीयता जिसे  ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन ने आगे बढ़ाते हुए बताया कि सच्ची मुक्ति की जड़ें गरिमा और वर्ग संघर्ष में हैं।

बांडुंग और ट्राईकॉन्टिनेंटल दौर के मुख्य विचारों में से एक था कि बिना विकास के गरिमा हासिल नहीं की जा सकती और विकास दुनिया की सारी जनता का अधिकार है। नवंबर 1957 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने प्रस्ताव 1161 (XII) पारित किया, यह संतुलित और समायोजित आर्थिक तथा सामाजिक विकास के बारे में था। इसके चार साल बाद 1961 में यूएनजीए ने घोषणा की कि 60 का दशक संयुक्त राष्ट्र विकास दशकहोगा। मई 1968 में यानी क़रीब-क़रीब दशक के अंत में मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ईरान के तेहरान शहर में हुआ जिसमें मौजूद प्रतिनिधियों ने तेहरान घोषणा पारित की, जिसमें चेताया गया: 

आर्थिक रूप से विकसित और विकासशील देशों के बीच बढ़ती असमानता अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के मानव अधिकारों को लागू करने में रुकावट है। विकास दशक अपने साधारण लक्ष्यों को भी हासिल करने में असफल रहा इसलिए हर देश के लिए और भी ज़रूरी हो जाता है कि वह अपनी क्षमताओं के मुताबिक़ इस असमानता की खाई को कम करने की हर संभव कोशिश करे।

ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन इसी तथाकथित विकास दशक में हुआ था। तीसरी दुनिया के प्रमुख देश उसी समय समझ गए थे कि संयुक्त राष्ट्र का विकास मॉडल तब तक इस खाई को कम नहीं कर सकता जब तक विश्व अर्थव्यवस्था निर्भरता के ढाँचे पर आधारित है। तेहरान के भी दो दशक बाद संयुक्त राष्ट्र ने विकास के अधिकार को मान्यता दी। 80 के दशक में तीसरी दुनिया के कई देश उस ऋण संकट के बोझ से कुचले जा रहे थे जो 90 के दशक तक भी जारी रहा, इस बीच 4 दिसंबर 1986 को यूएनजीए ने आख़िरकार विकास के अधिकार की घोषणा को पारित किया। यह दस्तावेज़ कुछ बेहतरीन आदर्शों को संजोए था:

विकास का अधिकार एक अविभाज्य मानवाधिकार है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति तथा सभी जनसमुदाय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास में भाग लेने, उसमें योगदान करने और उसके लाभों का उपभोग करने के अधिकारी हैंऐसे विकास में जिसमें सभी मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं की पूर्ण रूप से प्राप्ति हो सके (अनुच्छेद 1.1)।

राष्ट्रों को राष्ट्रीय स्तर पर विकास का अधिकार हासिल करने के लिए सभी आवश्यक उपाय करने चाहिए और विशेष रूप से, सभी के लिए बुनियादी संसाधनों, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, भोजन, आवास, रोज़गार और आय के न्यायपूर्ण वितरण तक पहुँच में अवसर की समानता सुनिश्चित करनी चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी उपाय किए जाने चाहिए कि महिलाओं की विकास प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका हो। सभी सामाजिक अन्यायों को ख़त्म करने के उद्देश्य से उचित आर्थिक और सामाजिक सुधार किए जाने चाहिए (अनुच्छेद 8.1)

राष्ट्रों को सभी क्षेत्रों में जन-सहभागिता को विकास और मानवाधिकारों को सम्पूर्णता में साकार करने के लिए एक ज़रूरी तत्व के तौर पर प्रोत्साहित करना होगा (अनुच्छेद 8.2)

ये आदर्श यूएन के प्रस्तावों और घोषणाओं में अपनी जगह सुरक्षित कर पाए क्योंकि उपनिवेशवाद-विरोधी और समाजवादी आंदोलनों के लाखों लोगों ने इनके लिए संघर्ष किया, न कि वैश्विक उत्तर की उदारता की वजह से।

सैन्यवाद और भुखमरी का विरोध, राफ़ेल मरांते बोयेरिज़ो (OSPAAAL),1981, द रैडिकल मीडिया आर्काइव से साभार

इस घोषणा के दो साल बाद विश्व बैंक ने वर्ल्ड डेवेल्प्मेंट रिपोर्ट (1988) (विश्व विकास रिपोर्ट) जारी की। जिसमें पाया गया कि तीसरी दुनिया का कुल विदेशी क़र्ज़ 1986 में बढ़कर 1.035 खरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा हो चुका था, यह 1982 में 560 अरब डॉलर और 1974 में 130 अरब डॉलर के मुक़ाबले काफ़ी लंबी छलांग थी। रिपोर्ट में कहा गया: उनका [तीसरी दुनिया के देशों] क़र्ज़ बढ़ रहा है, लेकिन वे अभी भी संसाधन हस्तांतरण में नकारात्मक स्थिति का सामना कर रहे हैं क्योंकि उनकी देनदारियाँ नए सीमित निवेश से ज़्यादा हो गई हैं। कुछ विकासशील देशों में यह लंबे समय से चला आ रहा आर्थिक संकट औद्योगिक देशों की महामंदी के दौर से भी अधिक गंभीर हो चुका है, और कई देशों में ग़रीबी बढ़ रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का विश्लेषण भी इसी नतीजे पर पहुँचा, इसने तीसरी दुनिया का कुल क़र्ज़ 916 अरब अमेरिकी डॉलर बताया, यह आँकड़ा भले ही कुछ कम था लेकिन यह भी उसी संकट की ओर इशारा कर रहा था।

अगले साल विकास के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के चालीस साल पूरे होंगे लेकिन बहुत कम ही लोग इसे याद करेंगे। 1986 से यूएन की मानवाधिकार व्यवस्था के भीतर ही कोशिशें हुई हैं कि इसे एक ग़ैर-बाध्यकारी कमोबेश प्रतीकात्मक घोषणा की बजाय क़ानूनन बाध्य तंत्र बनाया जाए। लेकिन अमीर देशों ने इन कोशिशों के सामने रुकावटें खड़ी की हैं क्योंकि वे ऐसे किसी भी तंत्र को संपदा और संसाधनों पर अपने एकाधिकार के लिए ख़तरा मानते हैं।

मसलन, अक्टूबर 2021 में मानव अधिकार काउन्सिल ने अपने सालाना प्रस्ताव में विकास के अधिकार को 29 के मुक़ाबले 13 वोट से पारित किया, 5 प्रतिनिधि मतदान में शामिल नहीं हुए। प्रस्ताव के विरोध में जो 13 वोट पड़े वे सभी वैश्विक उत्तर देशों के थे। दो साल बाद अक्टूबर 2023 में जब काउन्सिल ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में विकास के अधिकार के लिए संधि का मसौदा भेजने के लिए मतदान किया तो एक बार फिर पक्ष में 29 मत पड़े, विरोध में 13 और 5 ने मतदान नहीं किया। एक बार फिर ये 13 वोट वैश्विक उत्तर के देशों के थे। इससे यह बिलकुल साफ़ होता है कि उत्तर भले ही विकास के समर्थन का ढोंग करता है लेकिन यह विकास पर यूएन के प्रस्तावों को कमज़ोर करने में अपनी पूरी ताक़त झोंक देता है, साथ ही वैश्विक दक्षिण में विकास के लिए एक ज़रूरी कदम ऋण में भारी छूट हो सकता है लेकिन उस पर भी वैश्विक उत्तर कोई बहस नहीं छेड़ने देता।

यही विकास के अधिकार के केंद्र में निहित विरोधाभास है: जिसे अविच्छेद्य घोषित किया जाता है, लेकिन व्यवहार में उससे वंचित किया जाता है। डोसियर संख्या 95 ट्राईकॉन्टिनेंटल की उसी भावना की ओर लौटता है जो इस बात पर ज़ोर देती है कि आज़ादी झंडों और भाषणों से नहीं मापी जा सकती बल्कि यह इस बात में दिखती है कि लोगों की ज़िंदगी कितनी बेहतर हुई है। विकास कोई नारा नहीं है और न ही ये कोई ऐसे लक्ष्य हैं जिन्हें सत्ता में बैठे लोग निर्देशित करते हैं। सही अर्थों में विकास लोगों को एक गरिमामय जीवन जीने की क्षमता को विस्तार देने का अधिकार है। लेकिन यह अधिकार तब तक ज़्यादातर जनता की पहुँच से बाहर रहेगा जब तक ऋण चुकाना, बलपूर्ण आर्थिक उपाय और युद्ध ग़रीब देशों की सामाजिक संपदा को चूसते रहेंगे। वैश्विक दक्षिण की विकास संबंधी इच्छाएँ यूएन के गलियारों में हासिल नहीं की जाएँगी; ये तभी पूरी होंगी जब संगठित संघर्ष संस्थानों और राज्यों को ठोस कदम उठाने को मजबूर करेंगे।

नामीबिया: जनता की शक्ति, ऐल्बेर्टो ब्लांको गोंज़ालेस (OSPAAAL), 1981, द रैडिकल मीडिया आर्काइव से साभार

इस साल का अंत हो रहा है और इसके साथ ही हमारे संस्थान का एक दशक भी पूरा हो रहा है। हमने अपना सफ़र एक अभिलाषा के साथ शुरू किया था कि हम वैश्विक दक्षिण के आंदोलनों से जुड़ा विचार मंच (थिंक-टैंक) बनें। हमारा आधार मज़दूरों और किसानों के दो सौ से ज़्यादा संगठनों और राजनीतिक आंदोलनों में हैं, जिन सबसे मिलकर इंटरनेशनल पीपल्स असेंबली नेटवर्क बना है। पिछले एक दशक में हमें समझ आया कि हमारे दो अहम काम हैं: पहला, आंदोलनों की आवाज़ को बुलंदी देना जिससे उनके भीतर और व्यापक समाज में बहस और बातचीत का सिलसिला मज़बूत हो; दूसराविकास का एक नया सिद्धांत तैयार करना उस वक़्त के लिए, जब हमारे ये आंदोलन सत्ता में आएँ और इन पर समाज को एक नया आकार देने की ज़िम्मेदारी हो और पूँजीवाद के साये से अलग ये हमें एक बेहतर भविष्य की ओर ले चलें।

हम उम्मीद करते हैं कि इन सब वजहों के लिए और इसलिए कि आप हमारे इस मिशन में विश्वास करते हैं, आप आने वाले नए साल में भी हमारा साथ देते रहेंगे। हम अपना काम जारी रखने के लिए आपके साथ पर निर्भर हैं। हमारा साथ देने के कई तरीक़े हैं:

  1. अगर आप ट्राईकॉन्टिनेंटल इंटर्न ब्रिगेड में शामिल होना चाहते हैं, तो कृपया हमें इस पते पर संदेश भेजें [email protected]
  2. अगर आप संपादन और अनुवाद में हमारी मदद करना चाहते हैं, तो कृपया हमें इस पते पर संदेश भेजें [email protected]
  3. अगर आप आर्थिक रूप से सहयोग करना चाहते हैं, तो कृपया इस पते पर हमें संदेश भेजें [email protected] । हम अपना काम जारी रखने के लिए आपके सहयोग पर पूरी तरह से निर्भर हैं।

हमें आशा है कि आप हमारे ट्राईकॉन्टिनेंटल समुदाय में शामिल होंगे।

स्नेह सहित,

विजय