यह न्यूज़लेटर आपको ग़ुस्सा दिलाएगा: सातवाँ न्यूज़लेटर (2026)
नशे का व्यापार और उस पर नकेल कसती ‘ड्रग वॉर’ गरीब किसानों को दुख की ज़ंजीर में कसती है। ऐसी बर्बरता बिना गुस्से के नहीं समझाई जा सकती।
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
निकोलस मादुरो और सिलिया फ़्लोरेस के लिए।
कुछ महीने पहले मैं अपने संस्थान के कुछ लोगों के साथ कोलंबिया के काउका गया। वहाँ हम पॉप्युलर यूनिटी प्रॉसेस ऑफ़ साउथवेस्ट कोलंबिया (पीयूपीएसओसी) से जुड़े कई संगठनों से मिले, यह भूमि और ग्रामीण समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाले अलग-अलग संगठनों का एक संयुक्त मोर्चा है। काउका में कोका (एक प्रकार का पौधा जिससे कोकेन बनाई जाती है) उगाने वाले कैम्पेसीनो (किसानों) के समुदाय रहते हैं। यहाँ के लोग कोका की खेती अपनी ‘मर्ज़ी’ से नहीं करते बल्कि ग़रीबी और राज्य की उपेक्षा ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया है क्योंकि उनके पास गरिमापूर्ण तरीक़े से रोज़ी-रोटी कमाने का कोई उपाय है ही नहीं। इस काम से भी ये मुश्किल से ज़िंदगी बसर कर पाते हैं, लेकिन इनकी उगाई फसल बर्बादी की एक बेहद फ़ायदेमंद वैश्विक मूल्य शृंखला का हिस्सा बन जाती है। कोकेन, अफ़ीम और गाँजा उगाने वाले किसानों के राष्ट्रीय समन्वय समूह (Coordinadora Nacional de Cultivadores y Cultivadoras de Coca, Amapola y Marihuana, सीओसीसीएएम) के साथ मिलकर हमारे संस्थान ने जो शोध किया वही हमारे डोसियर संख्या 97 द वॉर ऑन द पुअर: नार्कॉटिक्स, कैम्पेसीनोज़, एंड कैपिटलिज़म (फ़रवरी 2026) [ग़रीबों के ख़िलाफ़ जंग: नशीले पदार्थ, किसान और पूँजीवाद] का आधार बना। इस न्यूज़लेटर में इस्तेमाल किए गए चित्र डोसियर 97 से लिए गए हैं; इनमें पीयूपीएसओसी द्वारा खींची गयी तस्वीरें हैं जिनमें ट्राईकॉन्टिनेंटल के कला विभाग ने कुछ रचनात्मक बदलाव किए हैं।
यह न्यूज़लेटर मैंने एक सीधे-साधे लेख की ही तरह शुरू किया था लेकिन सही शब्द ही नहीं मिले। इसलिए इसे मैंने अब एक लंबी टेढ़ी-मेढ़ी कविता का रूप दे दिया। मुझे ऐसा करना पड़ा क्योंकि जो व्यवस्था इस बर्बादी की शृंखला को जन्म देती है उसके बारे में बिना ग़ुस्से के बात करना नामुमकिन है।
काहिबियो, काउका: बलपूर्वक कोका फसल नष्ट करने के दौरान संघर्ष।सौजन्यः पीयूपीएसओसी
वे आए,
हाँ, वे आए –
एक सुबह समंदर किसी नीले घाव
की तरह खुल गया,
और जहाज़ उसमें से रेंगते हुए निकले
भूखे जहाज़।वे अपनी जेबों में
सभ्यता लाए थे,
जैसे रेशमी रूमाल में
लाया जाए ख़ंजर।सभ्यता, उन्होंने कहा,
जैसे किसी फूल का नाम लिया हो।लेकिन वो भूख थी।
बारूद था।
काग़ज़ी करारनामे थे
जो जिस्म में गड़ते हैं
दाँतों से ज़्यादा।उनके जहाज़ गटक गए सोना
महाद्वीप की पसलियों से,
और बना डाली ज़ंजीरें
ज़िंदा क़ौमों को क़ैद करने के लिए।धरती,
इतिहास से पुरानी,
माँ-सी साबिर,
अजनबियों के लिए
अपनी छाती चीरने को हुई मजबूर।उन्होंने ज़मीन छीन ली।
मेहनत लूट ली।
जंगल निगल लिए, जिनमें
तब भी गूँज रहे थे गीत पंछियों के।उन्होंने पहाड़ निचोड़ डाले
इतने कि वे लगने लगे
ख़ुद ही को अदने।और उन्होंने पीछे क्या छोड़ा?
ग़रीबी,
जैसे भूखे बच्चों के चाटने के लिए
गंदगी में फेंक दी गई हो
एक चटखी हुई तश्तरी।
पोपायन, काउका (2020): 2019 के विद्रोह में पुलिस दमन के पीड़ितों को श्रद्धांजलि। सौजन्यः पीयूपीएसओसी
फिर,
इन लुटेरों ने बदल लिया हुलिया।उन्होंने फेंक दिए
अपने बख्तरबंद,
अपनी तलवारें,
अपनी विजय गाथायें।अब वे पहनते हैं
राख़ के रंग के सूट।उन्होंने सीख ली है
नई भाषा:विकास,
लोकतंत्र,
क़ानून और व्यवस्था –पुरानी लाश पर सजा दिए हैं
नए फूल।और हमेशा
करते हैं जंग की घोषणा।नशे के ख़िलाफ़।
आतंक के ख़िलाफ़।
ग़रीबों के ख़िलाफ़।जंग, जंग, जंग –
उनके पास बची हो जैसे बस यही
एक दुआ।
मोंटेरेडोंडो, काउका: 2016 के शांति समझौते के बाद किसान पूर्व एफएआरसी लड़ाकों का स्वागत करते हुए। सौजन्यः पीयूपीएसओसी
वे हमसे कहते हैं:
नशा व्यापार है एक बीमारी,
व्यवस्था के दायरों के बाहर का अंधेरा,
अपराध की अलग दुनिया
इन साफ़-सुथरे शहरों के नीचे।लेकिन पूँजीवाद,
ये पूँजीवाद,
इसने ही तो बिछाया है, चमकते शहरों
के नीचे, जाल नालियों का।इसके मंदिरनुमा बैंक
खड़े हैं गंदे पानी पर।माफिया इसके दायरों से बाहर नहीं।
न ही नशा व्यापारी।
हथियारों के कारोबारी क्या
इसकी हद से बाहर हैं!ये तो इसकी रगों
में दौड़ते हैं।हराम की कमाई
चिमनी से निकले काले धुँए जैसी,
धोकर,
लौटा दी जाती है,
शालीन
वैध पूँजी की तरह
सत्ता के गलियारों में।यह कोई दुर्घटना नहीं।
यही है इस राक्षस का
छिपा चेहरा।मार्क्स ने इसे कहा
प्रारंभिक संचय –लेकिन ये कभी रुका नहीं।
उपनिवेशवादी विजय,
घेराबंदी,
ज़मीन की लूट,
इंसानों की ख़रीद-फ़रोख़्त –पूँजी का जन्म बेदाग़ नहीं।
जन्मजात इसके मुँह को
लगा है ख़ून।और जब ये होती है भूखी,
प्यासी,
ये लौटती है
लूटने को,किसी पिशाच की तरह
दुनिया का ख़ून
पीने।
अक्टूबर 2020: जीवन, क्षेत्र, लोकतंत्र और शांति की रक्षा के लिए सामाजिक और सामुदायिक मिंगा का एक प्रतिभागी। सौजन्यः पीयूपीएसओसी
देखो –
कोलंबिया के
कैम्पेसीनो।अख़बार उन्हें गुनहगार कहते हैं।
राज्य उन्हें दुश्मन।
पर वे तो बस
इंसान हैं
जिनके नाखूनों में धँसी है मिट्टी,
वे माँ-बाप हैं, जो
देखते हैं अपने बच्चों के
चेहरों पर भूख का मातम।हेलिकॉप्टर आते हैं
मशीनी टिड्डों की तरह।ग्लाईफोसेट की
ज़हरीली बारिश की जाती है।क़तारबद्ध सेनाएँ निकलती है
खेतों से
जैसे चीर रही हों मांस।और कैम्पेसीनो उगाते हैं कोका
लालच में नहीं,बल्कि इसलिए कि पूँजीवाद
ने कर दिए हैं बंद बाक़ी सब रास्ते।ज़मीन जा चुकी
चंद हाथों में।वैध फसलें
हो गईं धराशायी।न सड़क।
न बाज़ार।
न स्कूल।
न अस्पताल।सिर्फ़ परित्याग।
सिर्फ़ कोका
बचने की
की आख़िरी उम्मीद।खेतों में
उनके हाथ आती हैं कुछ कौड़ियाँ –ज़िंदा भर रहने के लिए।
लेकिन पत्तियाँ करती हैं लंबा सफ़र।
ग़ैर-क़ानूनी लैबों से लेकर,
तस्करी की गलियों तक,
वैश्विक मंडी की
शिराओं में से होते हुए –और बढ़ती रहती है
इनकी क़ीमत
करिश्माई ढंग से:एक डॉलर से बढ़कर
हज़ारों डॉलर।यही है पूँजीवाद:
ऊपर बैठे लोग निचोड़ते मूल्य
जैसे हड्डियों से चूस लेंगे जान।नीचे वालों पर डालते रहना
ग़रीबी का जानलेवा बोझ।कैम्पेसीनो ग़रीबी से अभिशप्त।
नशा व्यापारी हिंसा में जीते।
और बैंक –
बेदाग़ बैंक –
हड़पते मुनाफ़ा
जैसे ईश्वर को दिया चढ़ावा।
सांता मार्टा, कोलंबिया: अटलांटिक तट पर मछली पकड़ते हुए किसान। सौजन्यः पीयूपीएसओसी
कभी-कभार हो जाता है
हंगामा।एचएसबीसी ने किया
खरबों का ग़बन।भर दिया जाता है
मामूली हर्जाना
जैसे रेगिस्तान में रेत का एक कण।अफ़सरान को जेल नहीं।
बड़े लोगों को जेल कहाँ!
उनसे भी बड़ा होता है उनका डर।
ग़बन कोई
दुर्घटना नहीं।व्यवस्था का हिस्सा है।
जंग नहीं पहुँच पाती
तिजोरियों तक।पर पहुँच जाती है
खेतों में।नशे के ख़िलाफ़ जंग,
नहीं है नशे के ख़िलाफ़।साम्राज्यवादी हथियार है।
आक्रामकता को ढकता
नैतिकता का आवरण।प्लान कोलंबिया ने
खेतों में हथियार बोए।यही हो रहा आज
वेनेज़ुएला के साथ –नशे के आतंक का आरोप
दाग़ा जा रहा है गोलियों की तरह।सबूत की बात बेमानी है।
नैरटिव ही है सब कुछ।
साम्राज्यवादियों को हिंसा के लिए
चाहिए हमेशा
एक पवित्र बहाना।और वर्षावन जलते हैं।
कोका की फसल तबाह करने
सारे अमेज़न में
छिड़का जाता है ज़हर,जबकि तेल, पैसे, खनन की
उत्तरी हवस पर
नहीं उठती एक भी उँगली।वो रोते हैं:
‘हमें मारने वाली फसल को उजाड़ दो!’लेकिन असल में तो जानलेवा है
उनकी जंग।जंग जो छेड़ी गई
कुदरत के ख़िलाफ़ भी उतनी ही
जितनी इंसानों के ख़िलाफ़।
कोका नदी बेसिन: स्थानीय पर्यावरण समितियों द्वारा पुनर्वनीकरण परियोजना। सौजन्यः पीयूपीएसओसी
अमन की शुरुआत हो कहाँ से?
दोहन से नहीं।
हथियारों से नहीं।
जेलों से नहीं।
अमन आएगा
गरिमा से:भूमि सुधारों,
फसल गारंटी,
सड़कों,
स्कूलों,
अस्पतालों,
अधिकारों से।ग्रामीण इलाक़ों
को फिर बसाने से।क्योंकि समस्या
कोका की पत्तियाँ नहीं।असल समस्या है
यह व्यवस्था।नशे के ख़िलाफ़ जंग,
नशे के ख़िलाफ़ नहीं।यह जंग है
ग़रीबों के ख़िलाफ़ है।और इसर ख़त्म करने के लिए
सुधार नहीं,बदलाव चाहिए –
एक दूसरी दुनिया
ख़ून से लाल समंदर से
उगते नए सूरज जैसी दुनिया।
स्नेह सहित,
विजय