एशिया बन रहा है विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र: चवालीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
यूएस आर्थिक और सैन्य दबाव से एशिया पर दबदबा बनाए रखना चाहता है, लेकिन चीन का विकास और इस क्षेत्र का अपना अजेंडा उसे चुनौती दे रहे हैं।
बाज़ार का दृश्य, न्गुयेन फान चान्ह (वियतनाम), 1937
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
21 देशों के नेता एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) के 33वें शिखर सम्मेलन के मौक़े पर दो दिनों (31 अक्टूबर और 1 नवंबर) के लिए कोरिया गणराज्य (दक्षिण कोरिया) के ग्योंगजू शहर में इकट्ठा हुए हैं। 1989 में ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा में अपनी स्थापना के समय से ही एपेक ने ‘मुक्त और खुले व्यापार’ के लिए एक ज़ोन के निर्माण पर ज़ोर दिया है – इस विचार की रूपरेखा 1994 में इंडोनेशिया में हुए शिखर सम्मेलन के बोगोर लक्ष्यों में प्रस्तुत की गई थी।
एपेक का स्वरूप अपने दौर के साथ बदलता रहा। पहलेपहल यह जापान के पैसिफ़िक इकनॉमिक कोऑपरेशन काउन्सिल के एक घटक के रूप में सामने आया जिसका उद्देश्य था प्लाज़ा समझौते (1985) के बाद क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाओं को तैयार करना। इस समझौते के बाद अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले येन मज़बूत हुआ था। इसके बाद, उरुग्वे राउंड (1986-1994) के व्यापार और टैरिफ़ पर आम समझौते के दौरान इसका स्वरूप तैयार किया गया जिसकी परिणति विश्व व्यापार संगठन की स्थापना में हुई। यह व्यापार में उदारीकरण का दौर था जब संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और इसके जी7 के सहयोगियों को लगता था कि इतिहास का अंत हो चुका और अब अनंतकाल तक सभी देश यूएस के इर्द-गिर्द चक्कर लगाएँगे, और इसी वजह से इन्होंने तमाम राष्ट्रों को उत्तरी अटलांटिक और जापानी कॉर्परेशनों के लिए अपनी अर्थव्यवस्थाएँ खोलने के लिए मजबूर किया। यूएस को उम्मीद थी कि मास्ट्रिच संधि (1993), जिसके तहत यूरोपीय संघ की स्थापना हुई थी, से अटलांटिक पार मुक्त व्यापार समझौता हो जाएगा (लेकिन ऐसा हुआ नहीं) और उत्तरी अटलांटिक मुक्त व्यापार समझौता (1994) कनाडा और मेक्सिको को हमेशा के लिए यूएस के अधीन कर देगा।
द न्यू फ्नॉम पेन्ह, लेआंग सेकॉन (कंबोडिया), 2010
सालों तक यूएस एपेक शिखर सम्मेलनों में आता रहा और मुक्त व्यापार पर ज़ोर देता रहा जिससे इस क्षेत्र में उसकी कॉर्परेशनों का दबदबा बने। 1994 के बोगोर लक्ष्यों का उद्देश्य भी यही था, लेकिन ये कई कारणों से विफल रहे – जिसमें यह डर भी शामिल है कि कहीं एशिया अपने औद्योगिक कौशल की वजह से यूएस से आगे न निकल जाए। 2005 में चार देशों (ब्रूनेई, चिली, न्यूज़ीलैंड और सिंगापुर) ने ट्रांस-पैसिफ़िक स्ट्रैटेजिक इकनॉमिक पार्ट्नरशिप समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसमें 2013 में आठ और देश शामिल हुए (ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, मलेशिया, मेक्सिको, पेरू, यूएस और वियतनाम)। लेकिन तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। 2008 के वित्तीय संकट ने पूरे वैश्विक दक्षिण में खलबली मचा दी। वैश्विक दक्षिण को समझ आ गया कि उत्तरी अटलांटिक देशों की अर्थव्यवस्थाएँ कितनी कमज़ोर हैं और दक्षिण में आपसी व्यापार और विकास का विकल्प तैयार करने की ज़रूरत है।
इस वित्तीय संकट से पहले 2007 में ही चीन दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका था। 2019 में यह जापान को पीछे छोड़कर सबसे बड़ी दूसरी अर्थव्यवस्था बन गया। आज एशिया-पैसिफ़िक के अधिकांश देशों का सबसे गहरा व्यापारिक संबंध चीन से है, इनमें एपेक के 21 में 13 देश भी शामिल हैं। 2008 के आर्थिक संकट के बाद पैसिफ़िक रिम देशों ने यूएस के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को प्राथमिकता देना बंद कर दिया। और जब यूएस राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने 2017 में यूएस को ट्रांस-पैसिफ़िक पार्ट्नरशिप से अलग कर लिया, इसके बावजूद बाक़ी बचे देशों ने यूएस के बिना ही आपसी बातचीत जारी रखी। इस बातचीत में शामिल ट्रांस-पैसिफ़िक पार्ट्नरशिप के समग्र और प्रगतिशील समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले ग्यारह में से दस देश एपेक के सदस्य थे।
बस स्टॉप पर बारिश, किम इन सोक (कोरिया जनवादी लोकतांत्रिक गणराज्य), 2016
आसियान (दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन) के 2011 के शिखर सम्मेलन में कुछ सदस्य राष्ट्रों ने एक एशिया केंद्रित मुक्त व्यापार समझौते की संभावना पर बात की। इस पर विमर्श आगे बढ़ा जिसका आधार यह विश्वास था कि आसियान के दस सदस्य – साथ ही चीन और भारत – एक महत्वपूर्ण व्यापार नेट्वर्क खड़ा कर पाएँगे। भारत अंतत: इससे पीछे हट गया, लेकिन सभी दस आसियान राष्ट्र और साथ ही चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड इस प्रक्रिया में बने रहे। 2020 में इन देशों ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) पर हस्ताक्षर किए – यह दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक समूह है जिसमें दुनिया की एक तिहाई जनसंख्या (230 करोड़) और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 28% शामिल है। इसके मुक़ाबले में यूरोपीय संघ दुनिया की जीडीपी का 18% है, जबकि एनएएफ़टीए में दुनिया की जीडीपी का लगभग 30% शामिल है। आरसीईपी ‘मुक्त और खुले व्यापार’ के एक विशेष स्वरूप का निर्माण कर पाने में सफल हुआ है – जैसा कि एपेक, बोगोर लक्ष्यों द्वारा प्राप्त करना चाहता था। जबकि यूएस अलग-थलग ही बना रहा है।
इसके बावजूद दो चीज़ों के आधार पर यूएस एशिया-पैसिफ़िक में अपनी शक्ति बनाए रखने में कामयाब रहा है: एपेक, जो एक आर्थिक फ़ोरम कम और यूएस द्वारा अपने एशियाई सहयोगियों को नियंत्रित रखने का ज़रिया अधिक है, और रिम ऑफ़ द पैसिफ़िक (रिमपैक), जो इसका सैन्य अंग है। रिमपैक की स्थापना 1971 में शीतयुद्ध की रणनीति के तहत सोवियत संघ के ख़िलाफ़ हुई थी, लेकिन अब यह चीन और अन्य संप्रभुता की आकाँक्षा रखने वाले देशों के ख़िलाफ़ एक जलसेना में रूपांतरित हो चुका है। रिमपैक का संगठनात्मक नियंत्रण यूएस जलसेना की इंडो-पैसिफ़िक कमांड के पास है और इसका मुख्यालय हवाई में है। इसमें अब इज़राइल की सैन्य परिसंपत्तियाँ भी शामिल हैं। कोलंबिया, चिली और मलेशिया जैसे सदस्य राष्ट्रों को इस बात पर असहमति होनी चाहिए क्योंकि ये इज़राइल द्वारा किए जा रहे फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार के ख़िलाफ़ काफ़ी सख़्ती से खड़े हुए थे। चीन, रूस और वियतनाम के अलावा सभी एपेक देश रिमपैक में शिरकत करते हैं (चीन भी इनमें 2018 तक शामिल था फिर इसे हटा दिया गया)।
एपेक और रिमपैक की सदस्यता में समानता होने से यह साबित होता है कि यूएस आर्थिक सहमति (एपेक, जो पूँजीवाद के आर्थिक तंत्र का संचालन करता है) और सैन्य दबाव (रिमपैक, जो इस आर्थिक व्यवस्था के लिए ज़रूरी सैन्य परिस्थितियाँ बनाता है) के ज़रिए वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करता है। हालाँकि एपेक महज़ निवेश, आपूर्ति शृंखलाओं और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ा संगठन दिखाई देता है। लेकिन असल में यह एक ऐसा तंत्र है जो यह सुनिश्चित करता है कि यूएस इस क्षेत्र में एक वर्चस्ववादी शक्ति बना रहे। ऑस्ट्रेलिया के आरएएएफ़ बेस डारविन से लेकर जापान के कदेना एयर बेस तथा रिमपैक के युद्धाभ्यासों सहित यूएस के 260 सैन्य अड्डे और अस्थाई अड्डे हैं। चीन को घेरे रखने की यूएस की रणनीति अब एपेक-रिमपैक द्वारा संचालित है। चीन और उसके पड़ोसी देशों के आर्थिक विकास का मुक़ाबला न कर पाने की वजह से यूएस इन पर सैन्य ताक़त और विदेश नीति द्वारा दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
लाम आंग का क़िस्सा, रोडेल तपाया (फ़िलिपींस), 2012
दक्षिण कोरिया में होने वाले शिखर सम्मेलन को औद्योगिक और कृषि क्षेत्र के मज़दूर संगठनों, मानवाधिकार संगठनों और छात्र संगठनों के बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ेगा। इसके साथ ही मार्शल लॉ लगाने वाली दक्षिणपंथी पीपल पावर पार्टी के नेता और पूर्व राष्ट्रपति यून सुक योल के कुछ अति-राष्ट्रवादी समर्थक भी प्रदर्शन करेंगे। लेकिन ये समूह अधिकांश प्रदर्शनों का स्वरूप निर्धारित नहीं करेंगे, जो दक्षिण कोरिया में एक जन-केंद्रित अर्थव्यवस्था के निर्माण और यून के पतन से अभी भी हिले हुए देश के राजनीतिक अभिजन को मजबूत करने के लिए एपेक शिखर सम्मेलन के इस्तेमाल के प्रयास के विरोध में हैं।
ड्राफ्ट ऑफ लॉन्ग लॉन्ग समर, हुन क्यू किम (दक्षिण कोरिया), 2017
जैसे-जैसे दुनिया की अर्थव्यवस्था का केंद्र खिसककर एशिया की ओर आ रहा है, वैसे-वैसे यूएस अपना वर्चस्व स्थापित करने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। लेकिन अब इसके पास दबदबा बनाए रखने का कोई ख़ास ज़रिया बाक़ी नहीं रहा है। एपेक का एक सकारात्मक उपयोग यह हो सकता है कि इसने यूएस और चीन के नेताओं को बात करने का मौक़ा बना, वह भी ऐसे दौर में जबकि द्विपक्षीय बातचीत की जगह संकुचित होती जा रही है। इसीलिए मीडिया का सारा ध्यान ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात पर है।
2013 में राष्ट्रपति शी ने ‘मानवता के लिए एक साझे भविष्य का सपना देखने वाले समुदाय’ (人类命运共同体) शब्दों का प्रयोग किया था। 2017 में ये शब्द चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में भी शामिल किए गए। बीजिंग में 2014 में हुए एपेक शिखर सम्मेलन में शी ने कहा था कि एशिया-पैसिफ़िक को ‘एक प्रतियोगिता का अखाड़ा’ नहीं बनना चाहिए बल्कि इसे ‘एक साझी नियति वाले समुदाय’ का क्षेत्र बनना चाहिए। चीनी अधिकारियों ने 2013 की सोच से मिलते-जुलते एक ‘साझे भविष्य वाले एक एशिया-पैसिफ़िक समुदाय’ (亚太命运共同体) की चर्चा करनी शुरू की। इस शब्दों के पीछे का विचार यह है कि एशियाई देशों को राजनीतिक गुटों या सैन्य गठबंधनों के पीछे नहीं भागना चाहिए बल्कि सबसे बातचीत के रास्ते खोलने चाहिए और ऐसे पटलों का निर्माण करना चाहिए जहाँ सब लोगों की गरिमा को महत्व दिया जाए। ये शब्द बहुत दिलचस्प हैं, इतिहास की प्रक्रिया में इनके पीछे के सुविचार को अमल में तभी लाया जा सकता है – जब इस क्षेत्र के सभी लोगों का जीवन शांति और विकास द्वारा बेहतर बनाया जा सके।
स्नेह सहित,
विजय