अल्पविकास के कारण होता है पलायन: छठा न्यूज़लेटर (2026)
पिछले 35 वर्षों में दुनिया में प्रवासियों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है, जो बढ़ती असमानता और वैश्विक दक्षिण पर थोपे गए अल्पविकास को दर्शाती है।
सार्डीन मछली पकड़ने वाले की शोकसभा, फिक्रे घेब्रेयसस (इरिट्रिया), 2002
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
साल 2014 में संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) ने मिसिंग माइग्रेंट्स प्रोजेक्ट (गुमशुदा प्रवासी कार्यक्रम) की शुरुआत की। यह अकेला ऐसा कार्यक्रम है जो ‘वैश्विक स्तर पर पलायन के दौरान हुई मौतों का सार्वजनिक आँकड़ा रखता है’। इसका अनुमान है कि 2014 से अब तक भूमध्य सागर पार करते हुए कम-से-कम 33,220 लोग या तो मारे गए या ग़ायब हो गए। यह अनुमान भी काफ़ी कम है क्योंकि आईओएम ने ख़ुद माना है कि वह उत्तरी अफ़्रीका के तट से निकली हर नाव की गिनती नहीं कर सकता, यूरोप तक पहुँचने वाली हर नाव की गिनती करना तो दूर की बात है। भूमध्य सागर की दक्षिणी तरफ़ है सहारा रेगिस्तान जहाँ ख़तरा और भी बढ़ जाता है। आईओएम का अनुमान है कि हर साल भूमध्य सागर पार करने से ज़्यादा लोगों की मौत सहारा रेगिस्तान पार करते वक़्त होती है, लेकिन क्योंकि ये मौतें यूरोप के तटों से बहुत दूर होती हैं इसलिए इन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।
अगर मौसम साथ दे और रेगिस्तान का तूफ़ान बहुत ख़राब न हो तो नाइजर के अगाडेज़ से लीबिया के सबहा तक सहारा को पार करने में लगभग तीन दिन लगते हैं। एक दशक पहले इस इलाक़े की यात्रा करते हुए मैंने इसे पार करने वाले लोगों से सुना था कि यहाँ रेत में आधे दबे शव दिखना और पीछे रह गए लोगों की चीखें सुनाई देना एक आम बात है। पलायन करने वालों के एक दस्ते में से एक या दो लोगों की मौत होना आम बात है; कुछ ट्रक से गिरकर पीछे छूट जाते हैं तो कुछ तस्करों की गोलियों का शिकार हो जाते हैं। पूरे महाद्वीप के लोग इस कॉरिडर का इस्तेमाल करते हैं, इनमें इरिट्रियाई भी शामिल हैं। एक इरिट्रियाई शरणार्थी, तेल्केब्रिहान तेफामरियम तेक्ले, ने स्वीडन में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त को टेलिंग द रियल स्टोरी प्रोजेक्ट के तहत बताया, ‘दुर्घटनाएँ तो सहारा में हो रही हैं। पूरा सहारा इरिट्रिया के लोगों के शवों से भरा है’। जब तेल्केब्रिहान लीबिया पहुँचे तो उन्हें बंदी बना लिया गया। जब उन्होंने दूसरों के साथ समंदर पार करने की कोशिश की तो उनकी नाव को लीबिया के तट रक्षकों ने रोक लिया और उन्हें ज़ुवाराह नाम के तटीय शहर स्थित एक बंदी घर में भेज दिया गया। आठ महीने बाद तेल्केब्रिहान को लगा कि उसे विमान द्वारा वहाँ से निकाल कर ले जाया जा रहा है लेकिन उसे तो वापस इरिट्रिया भेज दिया गया। बाद में वह फिर भागने में कामयाब हुआ और आख़िर स्वीडन तक पहुँचा।
राज्यविहीन लोग, एक सभा, उज़ो एगोनु (नाइजीरिया), 1982
मैं तेल्केब्रिहान और मुझे सहारा में मिले उस जैसे ही दूसरे लोगों के बारे में सोचता हूँ जिन्होंने काम की तलाश के लिए इतना ख़तरनाक सफ़र तय किया। इनमें से कुछ ही यूरोप तक पहुँचे, लेकिन उनकी असली तलाश तो आजीविका की थी, उसके लिए वे कहीं भी जा सकते थे। उनके अपने देश युद्धों, प्रतिबंधों और लूट के शिकार हो चुके थे और वहाँ उन्हें तब तक रोज़गार नहीं मिल सकता था जब तक कि वे देश नवउदारवादी शिकंजे में फँसे रहेंगे।
पलायन के आँकड़ों में एक बेहद अहम कहानी छिपी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पलायन करने वालों की संख्या 1990 में 15.4 करोड़ थी जो 2024 में दोगुनी होकर 30.4 करोड़ हो चुकी है। अगर इन लोगों को मिलाकर एक देश बना दिया जाए तो यह जनसंख्या के हिसाब से भारत, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के बाद दुनिया का चौथा बड़ा देश होगा। विश्व बैंक का अनुमान है कि रेमिटेंस (विदेशों में काम करके कमाया धन जो अपने देश में भेजना, ख़ासतौर से परिजनों को) साल 2023 में 865 अरब अमेरिकी डॉलर से 4.6% बढ़कर 2024 में 905 अरब डॉलर हो गया। अगर ये प्रवासी एक देश होते तो उनके द्वारा भेजी गई रेमिटेंस की राशि 2024 में यूएस, जापान और चीन से बाहर जाने वाले प्रत्यक्ष विदेश निवेश के कुल मूल्य से भी ज़्यादा होती। दुनिया में हर आठ में से एक व्यक्ति अपनी आय और न्यूनतम उपभोग के लिए इस रेमिटेंस पर निर्भर है। पलायन के मुद्दे को विश्व अर्थव्यवस्था की एक छोटी-मोटी कमी के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह इसकी बुनियादी विशेषता हो गया है।
No Pasara (प्रवेश निषेध), लेला अलाउई (मोरक्को), 2008
ग़रीब देशों के लिए पलायन विकास में एक अहम लेकिन द्वंद्वात्मक भूमिका निभाता है। एक तरफ़, 2025 में मोरक्को और नेपाल में युवाओं के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों ने यह दिखाया कि अनिश्चित रोज़गार की तलाश में विदेश जाने की आर्थिक मजबूरी को लेकर युवाओं में मोटे तौर पर नाराज़गी थी। वे अपने देश में रहकर काम करना चाहते हैं जिससे वे अपने परिवार और दोस्तों के बीच एक सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भरापूरा जीवन जी सकें। इससे वैश्विक दक्षिण की सरकारों पर दबाव बनता है कि वे कृषि सुधारों, औद्योगिक नीतियों और सार्वजनिक निवेश के ज़रिए राष्ट्रीय विकास की ऐसी रणनीति तैयार करे जो बेहतर रोज़गार पैदा कर सके। दूसरी तरफ़, कई देशों में रेमिटेंस के ज़रिए प्रत्यक्ष विदेश निवेश (एफ़डीआई) के मुक़ाबले ज़्यादा विदेशी मुद्रा आ रही थी। यह तथ्य इसलिए और ज़्यादा ख़ास हो जाता है क्योंकि साल 2023 में विकासशील देशों, ख़ासतौर से अफ़्रीका और एशिया में, कुल एफ़डीआई 7% गिरकर 867 अरब डोल्लोर हो गया था। इसका मतलब है कि ये देश ख़ुद को बचाए रखने के लिए ढाँचागत रूप से श्रमबल के निर्यात पर निर्भर हो गए हैं।
वैश्विक दक्षिण में किसी भी आर्थिक एजेंडे को पलायन के कारण श्रम की हानि और स्थिरता तथा परिवारों की आजीविका के लिए रेमिटेंस पर निर्भरता के बीच के इस विरोधाभास से जूझना होगा। फ़ौरी उपाय के तौर पर, ग़रीब देशों को रेमिटेंस राशि को विकास के लिए उपयोग किए जाने वाले वित्त से जोड़ने की ज़रूरत है ताकि इसका एक हिस्सा पूरी तरह से इन पर निर्भर मज़दूर वर्ग और ग़रीब परिवारों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने में ही न खप जाए। ऐसा घरेलू हस्तांतरण को नियंत्रित करने की बजाय स्वैच्छिक सार्वजनिक बजत और ऋण साधनों के ज़रिए किया जा सकता है। दूरगामी रणनीति के रूप में, लोगों को उनके ही देशों में रोज़गार देने के लिए उत्पादक निवेश की ज़रूरत है और पलायन की आर्थिक मजबूरी को ख़त्म करने की भी।
El camión (बस), फ्रीडा काहलो (मेक्सिको), 1929
साल 2023 में मेक्सिको में राष्ट्रपति एंड्रेस मैनुअल लोपेज ओब्रेडोर (एएमएलओ) के नेतृत्व में एक प्रयोग शुरू किया जिससे रेमिटेंस की लागत को कम किया जा सके और सार्वजनिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच बढ़ाई जा सके। एएमएलओ सरकार ने कम लागत वाली रेमिटेंस और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए एक मौजूदा सरकारी वित्तीय संस्था — फिनांसिएरा पारा एल बिएनेस्तार (फिनाबिएन) — का उपयोग किया। फ़िनाबिएन कार्ड और ऐप के ज़रिए यूएस में काम कर रहे मेक्सिको के लोग अपने परिवारों को फ़िनाबिएन प्लैटफ़ॉर्म के माध्यम से कम लागत धन भेज पाए, जिससे रेमिटेंस भेजने वाले अन्य बिचौलियों की ऊँची फ़ीस से बच पाए। यह राशि कार्ड से जुड़े डिजिटल खातों में जमा कर दिए गए। इस नीति ने रेमिटेंस भेजने की लागत को कम किया और साथ ही धन पाने वाले परिवारों को वित्तीय प्रणाली का आधिकारिक हिस्सा भी बनाया। इसके बावजूद रेमिटेंस हमेशा ही देश को एक नाज़ुक स्थिति में रखता है क्योंकि इस तरह के ट्रांसफ़रों के आधारभूत संरचनात्मक ढाँचे मुख्यतः वैश्विक उत्तर में हैं। 1 जनवरी 2026 से यूएस के राष्ट्रपति ट्रम्प ने कुछ ख़ास रेमिटेंस ट्रांसफ़रों पर 1% उत्पाद शुल्क लागू किया है, इसमें पहली दी गई इस धमकी की गूँज सुनाई दी कि एक राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति के तहत इस क्षेत्र में रेमिटेंस को बंद कर दिया जाएगा।
यदि फिनाबिएन जैसे कार्यक्रम का विस्तार किया जाए और दुनिया के अन्य हिस्सों में एक व्यापक विकास रणनीति से जोड़ा जाए, तो इन राज्य-समर्थित खातों में आने वाली रेमिटेंस राशि, जमा राशि के एक स्थिर पूल के रूप में काम कर सकती है। इससे प्राप्तकर्ताओं को बचत और ऋण तक पहुँच मिल सकेगी, साथ ही बैंकिंग प्रणाली की जमा आधार और ऋण क्षमता मजबूत होगी। सही सार्वजनिक संस्थानों – जैसे विकास बैंक और निर्देशित-ऋण कार्यक्रमों – के माध्यम से बढ़ाई गई इस जमा राशि आधार का एक हिस्सा बुनियादी ढाँचे और उत्पादक उद्योग के लिए दीर्घकालिक ऋण में डाला जा सकता है। इस तरह, रेमिटेंस राशि को दैनिक उपभोग की ज़रूरतों में पूरी तरह खपाने की बजाय, उत्पादक निवेश के लिए स्वैच्छिक रास्ते दिए जा सकते हैं।
घर लौटते हुए प्रवासी मज़दूर, पुष्पा कुमारी (भारत), 2020
दशकों तक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (एसएपी, आईएमएफ़ द्वारा विकासशील देशों को दिए जाने वाले ऋण के बदले उनके द्वारा अपनायी जाने वाली नीतियाँ) ने ग़रीब देशों को मजबूर किया कि वे ‘समष्टि अर्थव्यवस्था की स्थिरता’ के नाम पर उत्पादक निवेश और रोज़गार की बजाय ऋणदाताओं और निष्क्रिय आय पर निर्भर वर्ग को प्राथमिकता दें। एसएपी की शर्तों में हमेशा सार्वजनिक ख़र्च में कटौती, सरकारी क्षेत्र में रोज़गार को सीमित करना, आय को सीमित रखना और राज्य निर्देशित निवेश में कटौती शामिल रहे। इन शर्तों ने सरकारों को औद्योगिक नीति लागू करने, सार्वजनिक कार्यों का विस्तार करने या सक्रिय तौर से रोज़गार पैदा करने से रोका। व्यावहारिक रूप से आईएमएफ़ की शर्तों ने वैश्विक दक्षिण में एक ‘अधिशेष आबादी’ तैयार की जो बचे रहने तक के लिए पलायन पर मजबूर हो गए। यह विस्थापन साम्राज्यवादी युद्धों और एकतरफ़ा दबाव बनाने वाले आर्थिक उपायों की वजह से और बढ़ जाता है, जो सार्वजनिक आय, विशेष इंफ़्रास्ट्रक्चर को बर्बाद करते हैं और व्यापार तथा वित्त तक पहुँच में रुकावट पैदा करते हैं तथा परिवारों को बर्बाद करते हैं। यूएनएचसीआर के मुताबिक़ साल 2024 के अंत तक दुनियाभर में 12 करोड़ 20 लाख लोग अत्याचार, टकराव, हिंसा और इनसे जुड़े उल्लंघनों के कारण विस्थापित होने पर मजबूर हुए।
विकास की जो रणनीतियाँ उत्पादक रोज़गार उत्पन्न करने में विफल रहती हैं वे केवल श्रम का निर्यात करती हैं और रेमिटेंस पर निर्भरता बढ़ाती हैं। कृषि सुधार से लेकर औद्योगिक नीति और सार्वजनिक सुविधाओं में सार्वजनिक निवेश करना आदि ऐसे उपाय हैं जो उत्पादकता और सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता को बढ़ाते हैं, इनके ज़रिए घरेलू रोज़गार पैदा करने से लोगों को अपने समुदायों में बने रहने का मौक़ा मिलता है, देश की अर्थव्यवस्था मज़बूत होती है और जबरन पलायन रुकता है। जो विकास फ़ायदेमंद रोज़गार न पैदा कर सके अंतत: वह ग़रीबों को उनकी समस्याओं से मुक्ति देने की बजाय उन्हें अपनी जगह, लोग छोड़ने पर ही मजबूर करता है।
इसलिए पलायन को वैश्विक दक्षिण के अल्पविकास और असमान विनिमय के परिणाम के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि सिर्फ़ वैश्विक उत्तर की सुरक्षा को ख़तरे के तौर पर। जबरन पलायन का केवल एक ही हल है कि वैश्विक दक्षिण में गरिमामय रोज़गार पैदा किया जाए। लेकिन इसके लिए आईएमएफ़ की सरकारी ख़र्च में कटौती की नीतियों की जगह विकास का एजेंडा लागू करना होगा जो राजकोषीय संभावना को बढ़ाए, सार्वजनिक निवेश का समर्थन करे और औद्योगिक नीति को सहयोग दे।
नरक की ओर पलायन, बसीम अल शक़र (इराक़), 2021
ज़ाहिर है कि इससे जुड़े कुछ अन्य मुद्दे भी हैं। वैश्विक दक्षिण में सामाजिक पुनरुत्पादन के संकट से तेज़ी से बूढ़ी होती आबादी और नीची जन्मदर की समस्याएँ खड़ी हो गयीं हैं, इनकी वजह से यह देखभाल से जुड़े कार्यों, कृषि से लेकर निर्माण और परिवहन सेवा आदि तमाम क्षेत्रों में वैश्विक दक्षिण से गए प्रवासी मज़दूरों पर निर्भर हो चुका है। वैश्विक उत्तर के प्रमुख उपनिवेशवादी राष्ट्रों में यह निर्भरता स्वास्थ्य सेवाओं, इंजिनीयरिंग और विश्वविद्यालयों जैसे उच्च कौशल वाले क्षेत्रों तक फैल चुकी है, क्योंकि सार्वजनिक प्रशिक्षण और शिक्षा में पैदा हुए फ़ासले को पलायन के ज़रिए ही भरा जा रहा है। इसके बावजूद प्रवासियों के ख़िलाफ़ लगातार माहौल बनाया जा रहा है और उन्हें अपराधी घोषित किया जा रहा है, जबकि उनका श्रम उनके लिए अनिवार्य है।
ये तनाव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित प्रवासन के लिए वैश्विक समझौते (जीसीएम) के दौरान दिखाई दिया, जिसे महासभा ने दिसंबर 2018 में समर्थन दिया था। इसके तहत 23 उद्देश्य रखे गए हैं। जीसीएम के उद्देश्यों को गौर से पढ़ने से तीन महत्वपूर्ण नीतिगत बिंदु उभरते हैं:
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उत्पादक निवेश के ज़रिए पलायन की मुख्य वजहों का उपाय खोजा जाए। यह मुद्दा दूसरे उद्देश्य में उठाया गया है: ‘उन प्रतिकूल प्रेरकों और संरचनात्मक कारकों को न्यूनतम स्तर पर लाएँ जो लोगों को अपने मूल देश छोड़ने के लिए मजबूर करते हैं’। सैद्धांतिक तौर पर, जबरन पलायन को कम करने के लिए देश के भीतर आजीविका के साधनों का विस्तार करना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए राजकोषीय संभावनाओं और नीतिगत स्वायत्तता की आवश्यकता होती है, जिसे सार्वजनिक ख़र्च में कटौती की सख़्त नीतियाँ आमतौर पर नकार देती हैं।
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श्रम गतिशीलता को जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के साथ जोड़ें। यह उद्देश्य 5: ‘नियमित प्रवासन के रास्तों की उपलब्धता और लचीलेपन को बढ़ाना’ और उद्देश्य 18: ‘कौशल विकास में निवेश करना और कौशल, योग्यताओं और क्षमताओं की पारस्परिक मान्यता को सुविधाजनक बनाना’। वास्तव में, जीसीएम नियमित श्रम ऐसे गतिशील मार्गों को बढ़ावा देता है जो गंतव्य देशों में श्रम बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करते हैं, साथ ही प्रवासियों की योग्यताओं को मान्यता देने के तंत्र भी देता है। यह अवैध पलायन और शोषण को कम कर सकता है, लेकिन यह श्रम निर्यात को एक विकास ‘समाधान’ के रूप में भी सामान्य बना सकता है।
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रेमिटेंस की लागत को कम और वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहित किया जाए। यह उद्देश्य 20 में दिया गया है: रेमिटेंस को तेज़, सुरक्षित और सस्ता बनाना और प्रवासियों को वित्तीय सेवाओं से जोड़ना। जीसीएम यह भी कहता है कि रेमिटेंस निजी पैसा है, न कि विकास के लिए सार्वजनिक धन। इससे यह विरोधाभास साफ़ होता है कि जिन ज़रूरतों को सरकारों को पूरा करना चाहिए, उनका बोझ परिवारों पर डाल दिया जाता है।
फराओनिक रोल नंबर 5, लगभग 1300–1200 ईसा पूर्व, मिस्र संग्रहालय, काहिरा
दो साल पहले लीबिया की यात्रा के दौरान, मैं एक छोड़ दिए गए सैन्य ट्रक में एक बार्न स्वैलो (अबाबील) का घोंसला देखकर अचंभित रह गया। बार्न स्वैलो प्रवासी पक्षी हैं जो हर साल भूमध्य सागर और सहारा को पार करते हैं। वे सरहदों की परवाह नहीं करते, और अक्सर हमारे बीच, यहाँ तक कि हमारे मलबे में भी घोंसला बना लेते हैं। स्वैलो लंबी यात्रा और वापसी की आशा का एक प्रतीक रहा है। पुराने ज़माने में समुद्री यात्रा करने वाले नाविक सुरक्षित रास्ता और घर वापसी के प्रतीक के रूप में स्वैलो का टैटू (गोदना) बनवाते थे। यूरोप के कुछ हिस्सों में, स्वैलो के घोंसले को नष्ट करना अशुभ माना जाता है। शायद यह पुराना अंधविश्वास एक साधारण सीख लिए हुए है: यात्री का सम्मान करो, और ऐसी दुनिया बनाओ जहाँ किसी को जीविका की तलाश में मौत का जोख़िम उठाने के लिए मजबूर न होना पड़े। जैसा कि फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश ने लिखा है, ‘और जब तुम घर लौटते हो – अपने घर – दूसरों के बारे में सोचो’ (وأنتَ تعودُ إلى البيتِ، بيتِكَ، فكِّرْ بغيرِكَ)।
स्नेह सहित,
विजय