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युद्ध और बजट कटौती से बेहतर हैं शांति और विकास: उनतीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)

यूएस और सहयोगियों के बढ़ते सैन्य ख़र्च और बयानबाजी के बीच, विश्व को शांति और विकास का वैकल्पिक रास्ता अपनाना होगा।

दालोआ 29’, अबौडिया अब्दुलाये डियारासूबा (कोत दिव्वार), 2011.

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

बम धमाकों के बीच लगता है जैसे विवेक कहीं दब गया है। जैसे-जैसे हथियार बेहतर होते जा रहे हैं वैसे-वैसे वैश्विक उत्तर के देशों के कूटनीतिक साधन कमज़ोर होते जा रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और यूरोपीय राजदूत अपने पुराने औपनिवेशिक ढर्रे पर लौट आए हैं, वे दूसरों को बेअदबी से चिल्लाकर बताते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए क्या नहीं, लेकिन ख़ुद जो मन में आए वही करते हैं। अगर दूसरे इनसे सहमत न हों तो ये भूतपूर्व औपनिवेशिक शासक उन्हें हथियारों से डराते-धमकाते हैं।

जब अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) ने अफ़ग़ानिस्तान में यूएस की बर्बरता की जाँच करने की कोशिश की तो वॉशिंगटन ने इसके अभियोजकों (वकीलों) का वीज़ा रद्द कर दिया और उनके परिवारों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी। हाल ही में यूएस सरकार ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की विशेष दूत फ्रांसेस्का अल्बानीज पर प्रतिबंध लगाए, वजह थी इज़राइल द्वारा जारी फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार में कॉर्पोरेट मिलीभगत पर उनकी रिपोर्ट। यह गुंडई इन औपनिवेशिक  शासकों की मानसिकता को दर्शाती है, इससे पता चलता है कि वे उसी दौर में लौटना चाहते हैं जब पश्चिम अपने हथियारों से लैस बेड़े हमारे देशों में भेजता था और हमें अपनी शर्तों पर व्यापार करने के लिए मजबूर करता था। औपनिवेशिक दौर में इन तौर-तरीक़ों को गनबोट डिप्लोमसी (जंगी बेड़ों आधारित कूटनीति) कहा जाता था। अब हमारे सामने इसका एक और विकसित रूप आ गया है: परमाणु मिसाइल आधारित कूटनीति।

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का हेग में हुआ 2025 का शिखर सम्मेलन इसी परमाणु मिसाइल आधारित कूटनीति का एक उदाहरण है। इसकी अंतिम प्रेसविज्ञप्ति अब तक नाटो की किसी भी मीटिंग में जारी सबसे छोटी विज्ञप्ति है। इसमें सिर्फ़ पाँच बिंदु थे जिनमें से दो धन से जुड़े हैं। हेग घोषणा केवल 425 शब्दों की थी जबकि 2024 में हुए शिखर सम्मेलन की वॉशिंगटन घोषणा 5,419 शब्दों (44 पैराग्राफ़) की थी। इस बार इसमें किसी भी ख़तरे से जुड़ी महीन जानकरियाँ नहीं थी और न ही यूक्रेन युद्ध का कोई विश्लेषण था या यह चर्चा थी कि नाटो इस युद्ध को असीम समर्थन दे रहा है। जबकि 2024 की घोषणा में यह कहा गया था कि यूक्रेन का भविष्य नाटो में है’, 2025 के वक्तव्य में यह बात कहीं भी नहीं है। साफ़ है कि यूएस नाटो के किसी भी तरह के फ़ितूर को बढ़ावा नहीं दे रहा। बल्कि वह अपने फ़ितूर को सर्वोपरि बना रहा है: कि यूरोप अपना सैन्य ख़र्च बढ़ाए जिससे इस महाद्वीप में यूएस का सुरक्षा कवच तैयार हो।

यूएस के दबाव में नाटो राष्ट्रों ने आधिकारिक रूप से मंज़ूर कर लिया है कि वे 2035 तक अपना सैन्य ख़र्च बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5% कर देंगे। चूँकि बहुत से नाटो राष्ट्रों ने अभी तक 2% का पहले से निर्धारित लक्ष्य भी प्राप्त नहीं किया है इसलिए यह नया क़दम अब इन देशों में गंभीर बहस का कारण बनेगा। जैसा कि ऊपर FACTS ग्राफ़िक में दिख रहा है कि हमारे हिसाब के मुताबिक़ नाटो राष्ट्र फ़िलहाल 2.7 ट्रिलियन डॉलर युद्धों पर ख़र्च कर रहे हैं। अब जबकि वे यह ख़र्च बढ़ाकर जीडीपी का 5% करने की ओर बढ़ेंगे तो यह संख्या बढ़कर 3.8 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी – पिछले सालों के मुक़ाबले 1 ट्रिलियन डॉलर ज़्यादा।

शीर्षकहीन, हुसैन मिर्ग़नी (सूडान), 2019

एक ट्रिलियन डॉलर में और क्या किया जा सकता है? इससे अगले बीस से पचीस सालों में दुनिया से भुखमरी ख़त्म की जा सकती है, बच्चों में भुखमरी तो तुरंत ही ख़त्म की जा सकती है या सभी विकासशील देशों का 11.4 ट्रिलियन डॉलर का विदेशी ऋण लगभग एक दशक में चुकाया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) अपने निर्धारित लक्ष्य वर्ष 2030 तक पूरे नहीं हो पाएँगे बल्कि हो सकता है कि इन्हें प्राप्त करने में एक सदी नहीं तो शायद एक और दशक ही लग जाए। इन एसडीजी में से भुखमरी का ख़त्म करने का लक्ष्य सबसे ज़्यादा पिछड़ गया है। यूएन के खाद्य और कृषि संगठन (एफ़एओ) का अनुमान है कि अगर मुद्रास्फीति की दर नाटकीय रूप से न बढ़े या विश्व में राजनीतिक या भौगोलिक उथल-पुथल नहीं हो तब भी दुनिया में भुखमरी ख़त्म करने के लिए सालाना 40 से 50 बिलियन डॉलर अतिरिक्त लगेंगे। इसके बावजूद अतिरिक्त धन खाद्य व्यवस्थाओं को बमों से उड़ाने के लिए ख़र्चे जा रहे हैं न कि उनके निर्माण के लिए। 

2024 में दुनिया का सैन्य ख़र्च 3.7 ट्रिलियन डॉलर पहुँच गया। इसी साल संयुक्त राष्ट्र ने 3.72 बिलियन डॉलर का सालाना बजट पारित किया (इसमें शांति स्थापना के काम का बजट भी शामिल है)। इस लिहाज़ से यूएन का पूरा बजट दुनिया के हथियारों के बजट का महज़ 0.1% है। इन आँकड़ों को देखकर लगता है कि लोगों के बीच शांति के प्रसार और राष्ट्रों के बीच कूटनीति के विकास का काम शायद बेकार है। इतनी समस्याएँ हैं जिन्हें सुलझाने की ज़रूरत है और इन्हें सुलझाने के लिए जो सीमित काम भी किया जा रहा है उसके लिए संसाधन कितने कम हैं।

लाउडस्पीकर, हतेन लिन (म्यांमार), 2021

नाटो राष्ट्रों ने सैन्य ख़र्च बढ़ाकर जीडीपी का 5% कर देने का यूएस राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का आदेश निर्विरोध मान लिया। क्योंकि ये देश नवउदारवादी नीतियों के चलते एक सीमा तक ही ऋण ले सकते हैं इसलिए हथियारों का निर्माण और ख़रीद बढ़ाने के लिए इन्हें समाज कल्याण के क्षेत्र में सरकारी ख़र्च में कटौती करनी होगी। यूरोप में सबसे ज़्यादा जीडीपी जर्मनी की है और यहाँ भी बहुत से संकट दिखाई दे रहे हैं: उदाहरण के लिए, जर्मनी की 21.1% आबादी के सामने ग़रीबी या सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेल दिए जाने का ख़तरा मंडरा रहा है। चांसलर फ़्रेड्रिक मर्ज़ के नेतृत्व वाली जर्मनी की सरकार ने अगले पाँच सालों में 650 बिलियन यूरो सैन्य ख़र्च करने का वादा किया है ताकि 2035 तक जीडीपी के 5% का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके – यह आँकड़ा फाइनेंशियल टाइम्स को भी चौंका देने वाला’ लगा। जर्मनी को यह लक्ष्य हासिल करने के लिए हर साल 144 बिलियन यूरो की ज़रूरत होगी, जिसे मुख्यतः बजट में कटौती (कड़ी बचत) और ज़्यादा क़र्ज़ लेकर जुटाया जाएगा। (टैक्स बढ़ाना तो लगभग नामुमकिन है, भले ही उपभोग पर वैल्यू ऐडेड टैक्स जैसे प्रतिगामी कर ही क्यों न हों)।

दूसरे शब्दों में, यूरोप और यूएस ने सामाजिक कल्याण के लिए सरकारी ख़र्च में कटौती और युद्ध की राह चुनी है। वो दुनिया को ऐसा ही भविष्य देना चाहते हैं। इस बीच रियो डि जेनेरो में ब्रिक्स के 17वें शिखर सम्मेलन में मौजूद ब्रिक्स+ [पाँच संस्थापक सदस्यों के अलावा शामिल अन्य देश] राष्ट्रों, जिनमें अब इंडोनेशिया भी शामिल है, ने इससे एकदम उलट दृष्टिकोण अपनाया। ब्रिक्स+ ने अपने बयान में ऐसे कार्यक्रम तैयार करने की अपील की जो शांति, न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था, बेहतर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, सतत विकास और सबके लिए विकास के ज़रिए लोगों का भला करें। इसमें मुख्य बातें हैं – शांति और प्रगति।

हमारे सामने दो विकल्प हैं: एक तरफ़ सामाजिक कल्याण में सरकारी ख़र्च में कटौती और युद्ध, तथा दूसरी ओर विकास और शांति।

समुद्र तट पर तफ़रीह, बयान अबू नहला (फिलिस्तीन), 2023

इन विकल्पों के बीच हम शांति के अलावा कुछ और चुनने के लिए हरगिज़ राज़ी नहीं हैं। इराक़ी कवि बद्र शाकिर अल-सय्याब (1926-1964) ने 1952 में हुए इराक़ी इंतिफादा (राजशाही विरोधी असफल विद्रोह) में भाग लिया था। उसी साल उन्होंने देखा कि तेहरान में सीआईए-समर्थित तख़्तापलट हुआ जिसमें प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसाद्देक़ को हटाकर ईरान के शाह को फिर से सत्ता में बैठाया गया। जिसके बाद 1953 में उन्हें इराक़ से निष्कासित कर दिया गया। 1954 में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध लंबी कविता ‘हथियार और बच्चे‘ (الأسلحة والأطفال) लिखी। नीचे इसका एक अंश प्रस्तुत है: 

लोहा

ये सारा लोहा किसके लिए?

कलाई पर पड़ी हथकड़ी के लिए

सीने या नस पर रखी छुरी के लिए

जो बंदी नहीं हैं उनके पास रखी जेलों की चाबियों के लिए

ख़ून उठाने के रहट* के लिए।

गोलियाँ

ये सारी गोलियाँ किनके लिए?

मज़लूम कोरियाई बच्चों के लिए

मार्सेय** के भूखे मज़दूरों के लिए

बग़दाद या कहीं और के लोगों के लिए

जो बस ज़िंदा रहना चाहते हैं

लोहा
       गोलियाँ
               गोलियाँ
                     गोलियाँ
लोहा

मैं सुन सकता हूँ व्यापारियों को

और हँसते हुए बच्चों को,

और जैसे मरने वाले के गले पर रखे चाकू की नोक देख लेती है,

जैसे मेरे ज़हन में चमकती बिजली

जैसे एक पर्दा, जैसे घाव से बहता ख़ून – 

मैं देख सकता हूँ दरारों में हो रही हलचल – 

क्षितिज पर छाती हुई लपटें, और ख़ून

बारिश की तरह गिरती हुईं, हर तरफ़ बिखरती हुईं

गोलियाँ और आग़। आकाश का चेहरा

पर दिखता है ग़ुस्सा जब भी लोहा उसे हिलाता है

लोहा और आग़, आग़ और लोहा… 

फिर धमाका, और बम!

हर जानिब गर्जन,

बेजान शरीरों के चिथड़े, और घरों के मलबे।

पुराना लोहा एक नए युद्ध के लिए

लोहाइस जलहीन मरु को समतल करने के लिए,

जहाँ बच्चे रेत में तस्वीरें बनाते थे

और जिसे बुज़ुर्ग मानते थे महफ़ूज़।

शांति

मानो इन शब्दों की गर्मी

दफ़्न हों कहीं गुफाओं के अंधेरों में,

पहले इंसान की उम्मीदों के साथ।

उन शिलाओं पर उसने क्या बनाया था,

मौत की दहलीज़ पर खड़े: क्या ये थी विजय,

एक बेहतरीन दुनिया की आस?

 

[*एक पारम्परिक सिंचाई उपकरण।

**फ़्रांस का एक शहर।]

यही हमें चुनना है: लोहा या शांति, गोलियाँ या विकास। बंदूक़ों से शांति नहीं आएगी, और न ही गोलियों से विकास। यही तो चुनना है हमें। और इस चुनाव में आपको ज़रूर भागीदार बनना होगा। आपकी चुप्पी बंदूक़ और गोलियों और युद्ध को बुलाएगी; आपकी आवाज़, दूसरों की आवाज़ के साथ मिलकर बुलंद होते हुए शायद हमें शांति और विकास तक ले जाएगी, शायद ऐसे भविष्य तक ले जाएगी जहाँ बच्चे बिना किसी डर के हँस सकेंगे, खेल सकेंगे।

स्नेह सहित,

विजय