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जैमे डी गुज़मैन (फिलीपींस), रूपांतरण II, 1970.

 

प्यारे दोस्तों,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

5 अक्टूबर को, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद ने एक ऐतिहासिक, क़ानूनी रूप से ग़ैर-बाध्यकारी प्रस्ताव पारित किया जो ‘एक सुरक्षित, स्वच्छ, स्वस्थ और सतत पर्यावरण के अधिकार को मानवाधिकार के रूप में मान्यता देता है जो कि मानवाधिकारों को प्रयोग में लाने के लिए महत्वपूर्ण है’। इस तरह का अधिकार, इस महीने के अंत में ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन सीओपी-26 में निर्णय लेने वाली सरकारों पर, हमारे जीवन को आकार देने वाली प्रदूषित प्रणाली से होने वाले गंभीर नुक़सान के बारे में सोचने के लिए मजबूर करेगा। 2016 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बताया था कि दुनिया की 92% आबादी ज़हरीली हवा में साँस लेती है; विकासशील देशों में, पाँच साल से कम उम्र के 98% बच्चे ऐसी ख़राब हवा से पीड़ित हैं। प्रदूषित हवा, ज़्यादातर कार्बन उत्सर्जन से फैले प्रदूषण, के कारण विश्व स्तर पर प्रति मिनट 13 मौतें होती हैं। 

संयुक्त राष्ट्र के ऐसे प्रस्तावों का असर पड़ता है। 2010 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘पानी और स्वच्छता के मानव अधिकार’ के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था। जिसके नतीजे में, कई देशों -जैसे कि मेक्सिको, मोरक्को, नाइजर और स्लोवेनिया आदि- ने पानी के इस अधिकार को अपने संविधानों में जोड़ दिया। भले ही ये कुछ हद तक सीमित नियम हों -जिनमें अपशिष्ट जल प्रबंधन और जल वितरण के सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त साधनों को पूर्णत: शामिल नहीं किया गया है- फिर भी हज़ारों घरों तक पीने के पानी और सीवेज  की लाइनें पहुँचाने के रूप में उनका तत्काल और सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

 

किम इन सोक (डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया), बस स्टॉप पर बारिश की बौछार, 2018.

 

हमारे ग्रह पर हर तीन में से एक व्यक्ति भूख से पीड़ित है, हमारे समय में जीवन के व्यर्थ चले जाने की यही सबसे बड़ी जगह है।  विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर, सात मीडिया आउटलेट्स – एआरजी मेडिओस, ब्रासिल डे फाटो, ब्रेकथ्रू न्यूज़, मदार, न्यू फ़्रेम, न्यूज़क्लिक और पीपुल्स डिस्पैच- ने संयुक्त रूप से  ‘हंगर इन द वर्ल्ड’ नामक एक पुस्तिका निकाली है, जिसमें दुनिया भर के देशों में भूख की स्थिति, कोविड-19 महामारी के चलते कैसे यह स्थिति प्रभावित हुई, और इस त्रासदी से निपटने के लिए जन-आंदोलनों द्वारा उठाए गए क़दमों का विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तिका में शहरी ग़रीबों के दृष्टिकोण से खाद्य संप्रभुता पर अबहलाली बासे मजोंडोलो के अध्यक्ष स’बू ज़िकोडे का एक ख़ास भाषण भी शामिल है। ज़िकोडे ने कहा, ‘मानव इतिहास में सबसे अधिक उत्पादक अर्थव्यवस्था में लोगों का भूखा रहना नैतिक रूप से ग़लत और अन्यायपूर्ण है। हर इंसान के भोजन, आवास और शिक्षा के लिए पर्याप्त से अधिक संसाधन हैं। ग़रीबी दूर करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। लेकिन इन संसाधनों का उपयोग लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नहीं किया जाता है; इसके बजाय, उनका उपयोग ग़रीब देशों, समुदायों और परिवारों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है’।

‘हंगर इन द वर्ल्ड’ का परिचय पीपुल्स डिस्पैच की ज़ोई एलेक्जेंड्रा और प्रशांत आर और मैंने मिलकर लिखा है। हमारे द्वारा लिखे गए इस परिचय से एक संक्षिप्त उद्धरण का हिंदी अनुवाद पढ़ें। 

 

 

मई 1998 में, क्यूबा के राष्ट्रपति फ़िदेल कास्त्रो ने स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य सभा में भाग लिया। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा आयोजित एक वार्षिक बैठक है। कास्त्रो ने अपनी बात भूख और ग़रीबी पर केंद्रित रखी, जो कि उनके अनुसार अधिकतर समस्याओं का कारण हैं। उन्होंने कहा, ‘दुनिया में कहीं भी नरसंहार के किसी भी कृत्य में, किसी युद्ध में, प्रति मिनट, प्रति घंटे और प्रति दिन इतने लोग नहीं मारे जाते हैं जितने लोग हमारे ग्रह पर भूख और ग़रीबी से मारे जाते हैं’।

कास्त्रो द्वारा दिए गए इस भाषण के दो साल बाद, डब्ल्यूएचओ की विश्व स्वास्थ्य रिपोर्ट ने भूख से संबंधित मौतों पर आँकड़ा जमा किया। आँकड़े में निकलकर आया कि प्रति वर्ष भूख से नब्बे लाख से ज़्यादा मौतें होती हैं, जिनमें से साठ लाख पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चे थे। इसका मतलब था कि हर दिन 25,000 लोग भूख और ग़रीबी से मर रहे थे। ये संख्या 1994 के रवांडा नरसंहार में मारे गए लोगों की संख्या से कहीं अधिक है, जिनकी गिनती लगभग पाँच लाख की है। नरसंहार पर ध्यान दिया जाता है – और दिया भी जाना चाहिए – लेकिन भूख से संबंधित मौतों के माध्यम से ग़रीब लोगों के नरसंहार पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। इसी वजह से, कास्त्रो ने उस सभा में भुखमरी और ग़रीबी से होने वाली हत्याओं पर अपनी बात रखी थी।

 

एलिज़ाबेथ वोइट (जर्मनी), किसान युद्ध, 1930 के आसपास.

 

2015 में, संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक कुछ सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को पूरा करने के लिए एक योजना अपनाई थी। इन लक्ष्यों में से दूसरा लक्ष्य ‘भूख को समाप्त करना, खाद्य सुरक्षा और पोषण में सुधार करना और स्थायी कृषि को बढ़ावा देना’ है। उसी वर्ष, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ़एओ) ने दुनिया भर में भुखमरी से पीड़ित लोगों की पूर्ण संख्या में वृद्धि पर नज़र रखना शुरू किया। उसके छह साल बाद, कोविड-19 महामारी ने पहले से ही अस्थिर ग्रह को चकनाचूर कर दिया, और अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवादी व्यवस्था के मौजूदा उत्पीड़नों को और तेज़ कर दिया है। दुनिया के अरबपतियों ने अपनी संपत्ति दस गुना बढ़ा ली है, जबकि दुनिया के अधिकांश लोगों को एक-एक दिन और एक-एक वक़्त के खाने के सहारे अपनी ज़िंदगियाँ जीने के लिए मजबूर कर दिया गया है।

जुलाई 2020 में, ऑक्सफ़ैम ने ‘द हंगर वायरस’ नामक एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें – विश्व खाद्य कार्यक्रम के आँकड़े का उपयोग करते हुए – यह पाया गया था कि ‘साल ख़त्म होने से पहले महामारी के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों से जुड़ी भुखमरी से एक दिन में 12,000 लोग मर सकते हैं, शायद उस समय तक बीमारी से होने वाली प्रतिदिन मौतों से भी ज़्यादा’। जुलाई 2021 में, संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि साल 2020 में ‘230 करोड़ (यानी वैश्विक आबादी के 30%) से अधिक लोगों के पास पर्याप्त भोजन तक साल भर की पहुँच नहीं थी’, और यह घोषणा की कि दुनिया 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ‘बेहद ख़राब दिशा’ में चल रही है। यह आँकड़ा दर्शाता है कि हम गंभीर खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं।.

एफ़एओ की रिपोर्ट, ‘द स्टेट ऑफ़ फ़ूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड 2021’ ने नोट किया है कि ‘दुनिया में लगभग तीन में से एक (यानी 237 करोड़) लोगों के पास 2020 में पर्याप्त भोजन तक पहुँच नहीं थी- [इस आँकड़े में] केवल एक वर्ष के भीतर लगभग 32 करोड़ लोग और बढ़े हैं’। भुखमरी असहनीय है। खाद्य दंगे अब सब जगह बढ़ रहे हैं, और सबसे नाटकीय रूप से दक्षिण अफ़्रीका में। जुलाई के प्रदर्शनों में शामिल होने वाले एक गौतेंग निवासी ने कहा, ‘वे हमें यहाँ भूख से मार रहे हैं’। इन विरोध-प्रदर्शनों, और संयुक्त राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा जारी किए गए नये आँकड़ों ने भुखमरी के मुद्दे को वैश्विक एजेंडे पर वापस ला दिया है।

कई अन्य अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने इसी तरह के निष्कर्षों के साथ अपनी-अपनी रिपोर्ट जारी की है, जिनमें दिखाया गया है कि कोविड -19 महामारी के आर्थिक प्रभाव ने भुखमरी और खाद्य असुरक्षा को बढ़ावा दिया है। इनमें से अधिकतर रिपोर्टें, हालाँकि, वहीं रुक जाती हैं, हमें इस भावना के साथ छोड़ देती हैं कि भुखमरी अपरिहार्य है, और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान ही क्रेडिट, ऋण और सहायता कार्यक्रमों के द्वारा मानवता की इस दुविधा को हल करेंगे।

 

Teodor Rotrekl (Czechoslovakia), Untitled, 1960s.

 

लेकिन भूख अपरिहार्य नहीं है: जैसा कि स’बू ज़िकोडे ने हमें याद दिलाया, यह पूँजीवाद का एक निर्णय है कि लोगों के सामने लाभ रखा जाए, वैश्विक आबादी के बड़े इलाक़े को भूखा रहने दिया जाए, जबकि उत्पादित सभी खाद्य पदार्थों का एक तिहाई बर्बाद हो जाता है, जबकि सभी उदार व्यापार और भोजन के उत्पादन और वितरण में वायदा कारोबार गंभीर विकृतियाँ पैदा करती हैं।

 

जेरज़ी नोवोसिल्स्की (पोलैंड), बड़ा हवाई अड्डा, 1966.

 

बुनियादी सामाजिक सुरक्षा से जनता को मरहूम करने वाली मुनाफ़ों पर आधारित इस व्यवस्था में करोड़ों लोग जीवन के बुनियादी ढाँचे को बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं। भुखमरी और निरक्षरता हमारे ग्रह की भयावह उदासी का प्रमाण हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि इतने सारे लोग सड़कों पर हैं, किसी-न-किसी तरह के शरणार्थी, भुखमरी के कारण बने शरणार्थी और बढ़ते जल स्तरों के कारण बने शरणार्थी।

हमारे समय की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक है विस्थापितों की बढ़ती संख्या। अकेले संयुक्त राष्ट्र की गणना के हिसाब से, इस समय लगभग 8.3 करोड़ लोग विस्थापित हैं, और यदि ये सभी विस्थापित एक ही स्थान पर रहें तो वे आपस में मिलकर दुनिया का 17वाँ सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएँगे। इस संख्या में जलवायु शरणार्थी शामिल नहीं हैं -जिनकी दुर्दशा के बारे में सीओपी26 जलवायु चर्चा में भी बात नहीं की जाएगी- और न ही इसमें आंतरिक रूप से विस्थापित लोग शामिल हैं जो कि स्थानीय विवाद और आर्थिक मंदी के कारण अपनी जगहें छोड़कर जा रहे हैं।

 

 

नाइजीरियाई लेखक चिनुआ अचेबे ने बियाफ्रा के युद्ध से परेशान होकर, अपनी 1971 में प्रकाशित पुस्तक, ‘बिवेर, सोल ब्रदर’ में ‘रिफ़्यूजी मदर एंड चाइल्ड’ नामक एक कविता लिखी थी। इस कविता की सुंदरता हमारी दुनिया के अभागों में बसती है :

कोई ‘मडोना एंड चाइल्ड’ जैसा चित्र

अपने बेटे के प्रति उस माँ के प्यार की तस्वीर को नहीं छू सकता 

जिसे अपने बेटे को जल्द ही भूलना पड़ेगा।

हवा गंध से भरी थी

 

साफ़ नहीं किए गए बच्चों के दस्त से

जिनकी पसलियाँ दिख रही थीं और

ख़ाली पड़े जिस्मों के पीछे सूखे चूतड़ों के साथ

वो चल रहे थे मुश्किल से। अधिकांश

 

माँएँ वहाँ लंबे समय से

देखभाल करना छोड़ चुकीं थीं, बस इसे छोड़कर; उसने

अपने बच्चे के सर पर बचे हुए लाल बालों पर कंघी फेरते हुए 

अपने दाँतों के बीच एक भूतिया मुस्कान बनाई हुई थी

और उसकी आँखों में एक माँ का भूतिया-सा

गर्व मौजूद था और फिर –

 

अपनी आँखों से गाती हुई – वो प्यार से 

उसे विदा करने लगी … दूसरी दुनिया में यह

उसके सुबह के नाश्ते और उसे स्कूल भेजने से पहले 

रोज़मर्रा का मामूली-सा काम होता; लेकिन अभी वो

इसे ऐसे कर रही थी जैसे एक छोटी-सी क़ब्र पर

फूल सजा रही हो।

शक्तिशाली लोग, बेघर और भूखे लोगों को, जो कि हमारे ग्रह के ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में बहुतायत में पाए जाते हैं, घृणा की नज़र से देखते हैं। वे ऊँची दीवारें खड़ी करके और सशस्त्र गार्ड रखकर उन्हें देखने से भी बचना चाहते हैं। पूरा ज़ोर लगाकर बुनियादी मानवीय भावना -अचेबे की कविता जिससे ओत-प्रोत है- को कुचल दिया जाता है। लेकिन बेघर और भूखे लोग हमारे ही जैसे हैं, जो एक समय पर अपने माता-पिता की बाहों में कोमलता के साथ बड़े हो रहे थे, और जिन्हें प्यार मिल रहा था; वो प्यार जिसे हमें एक-दूसरे से करना सीखने की ज़रूरत है।

स्नेह-सहित,

विजय।