नए साल को हम उम्मीद से गले लगाएँगे: पहला न्यूज़लेटर (2026)
युद्ध, जलवायु और आर्थिक संकट के बीच इस नए साल में दाखिल होते हुए हमें अपनी निराशा को संभावनाओं की राजनीति में बदलना होगा।
Les Abalochas dansent pour Dhambala, dieu de l’unité (एकता के देवता दमबाला की स्तुति में अबालोचास नृत्य), विल्फ़्रेदो लाम (क्यूबा), 1970.
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
इस नए साल में उम्मीद के साथ दाख़िल हो रहे हैं या बेचैनी के साथ? मैं पुरउम्मीद इसलिए हूँ कि दुनियाभर में घूमते हुए मैंने लोगों को मौजूदा स्थिति से त्रस्त पाया है – वे एक ऐसे समाज में जीना चाहते हैं जो भूख और बदहाली से आज़ाद हो। लेकिन मैं इतना भी मुतमइन नहीं कि इस असंतुष्टि भर से ही जलवायु संकट और जनसंहारक युद्ध से परेशान यह दुनिया एक गरिमामय और शांतिपूर्ण जगत में तब्दील हो जाएगी। ऐसी दुनिया की इच्छा भले ही मौजूद है लेकिन अभी तक बेहतरी की ओर जाने वाला रास्ता हम नहीं बना पाए हैं
1964 में गठित संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) जैसे संगठन दशकों से दुनिया के लोगों की समस्याओं का साक्ष्य आधारित विश्लेषण पेश करते आ रहे हैं। पिछले साल दिसंबर में यूएनसीटीएडी ने अपनी 2025 की व्यापार और विकास रिपोर्ट जारी की जिसमें कई नए और ज़रूरी नतीजे शामिल थे। यहाँ छह ऐसे बिंदु पेश किए जा रहे हैं जो हमारी नज़र में ज़रूरी हैं:
शोषण, मंगू पुत्र (इंडोनेशिया), 2000
- वैश्विक विकास दर गतिहीन और असमान है – यूएनसीटीएडी ने अनुमान लगाया है कि विश्व की जीडीपी विकास दर 2024 के 2.9% से गिरकर 2025 में 2.6% हो जाएगी – यह एक सर्वव्यापी गतिहीनता है। एशिया के तेज़ी से विकास कर रहे देशों के नेतृत्व में विकासशील देश 4.3% की दर से विकास करेंगे और वैश्विक विकास दर के 70% का दारोमदार इन्हीं पर होगा। जबकि 2024 के मुक़ाबले लैटिन अमेरिकी और कैरिबियाई देशों की विकास दर धीमी होने का अनुमान था , वहीं कुल मिलाकर अफ़्रीका की विकास दर के लिए अनुमान था कि यह असमान रूप से ऊपर जाएगी। वैश्विक दक्षिण के कुछ भाग विकास की गाड़ी के इंजन हैं, लेकिन फिर भी ये वैश्विक उत्तर में स्थित वित्तीय केंद्र के अधीन ही बने हुए हैं: मूल्य उत्पादन परिधि के देशों में होता है लेकिन केंद्रीय देशों की वित्तीय और व्यापार प्रणाली मध्यस्थता, मूल्य निर्धारण आदि के माध्यम से इसे पूर्ण रूप से ही हड़प लेती है।
- वित्तीय प्रणाली के ज़रिए वैश्विक उत्तर व्यापार पर वर्चस्व बनाए रहता है – यूएनसीटीएडी का अनुमान है कि विश्व का 90% व्यापार, व्यापारिक वित्त और बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर है। वैश्विक व्यापार ब्याज दरों, वित्तीय बाज़ार में नक़दी की उपलब्धता और निवेशकों के रुझानों से काफ़ी प्रभावित रहता है, ये सब भी व्यापार को उतना ही प्रभावित करते हैं जितना कि वास्तविक उत्पादन। यूएनसीटीएडी के आँकड़ों से पता चलता है कि ऋण की उपलब्धता, पूँजी प्रवाह और जोख़िम उठाने की प्रवृत्ति में होने वाले बदलाव वैश्विक व्यापार के स्तर से क़रीबी से जुड़े होते हैं। स्विफ़्ट प्रणाली के ज़रिए होने वाले अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर की भागीदारी एक बार फिर लगभग 50% पहुँच गयी है और वैश्विक शेयर बाज़ार मूल्य में आधी तथा बॉन्ड जारी करने में 40% की हिस्सेदारी अमेरिका के पास है, इसलिए वैश्विक दक्षिण पर डॉलर का प्रभुत्व अब भी जारी है। दूसरे शब्दों में, विश्व व्यापार उत्तर के गलियारों में चलता है और उत्तर के ऋण पर भी निर्भर है।
शीर्षकहीन, बहजात सदर (ईरान), 1974
- अति-साम्राज्यवाद का संकट असमानता को जन्म देता है – रिपोर्ट बार-बार वैश्विक ‘उच्च स्तरीय नीतिगत अनिश्चितता‘ का ज़िक़्र करती है। यह साम्राज्यवादी केंद्र में वर्चस्व के संकट के लिए एक तकनीकी शब्दजाल है, जिसके केंद्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का व्यापार युद्ध है। टैरिफ/आयात कर में बढ़ोतरी और भू-आर्थिक टकराव विश्व व्यवस्था के अस्थायी झटके मात्र नहीं हैं, बल्कि ये इसकी स्थायी विशेषताएँ बन गए हैं। ये स्थितियाँ निवेश और व्यापार को लगातार दबाव में रखेंगी, जिससे उत्तरी अटलांटिक देशों और वैश्विक दक्षिण के उन हिस्सों में ठहराव आएगा जो उत्तर-दक्षिण व्यापार पैटर्न के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
- वैश्विक दक्षिण का ऋण संकट गहरा रहा है – दुनिया के आधे कम आय वाले देशों (68 में से 35) के सामने ऋण संकट का ख़तरा बना हुआ है। यूएनसीटीएडी बताता है कि, ‘ऐतिहासिक रूप से, ऋण न चुका पाने के परिणामस्वरूप उत्पादन में असामान्य रूप से भारी और दीर्घकालिक कमी आई है; अंतर्राष्ट्रीय पूँजी बाज़ारों तक पहुँच ख़त्म हो गई है; और उधार लेने की लागत में तेज़ वृद्धि हुई है, जो बाद में होने वाली किसी भी आर्थिक सुधार में बाधा डालती है।‘ औसतन, अविकसित अर्थव्यवस्थाएँ 7%–11% की ब्याज दरों पर उधार लेती हैं, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ 1%–4% पर उधार लेती हैं। यह अंतर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की एक संरचनात्मक विशेषता है, न कि केवल किसी अर्थव्यवस्था के आधारभूत तत्वों का प्रतिबिंब। ऋण का इस्तेमाल वैश्विक दक्षिण के देशों को अनुशासन में रखने के लिए किया जाता है, ख़ासतौर से अफ़्रीका में।
कपास की कटाई, सम जोसेफ़ नतिरो (तंज़ानिया), 1957
- जलवायु संकट ऋण संकट को बढ़ा रहा है – जलवायु संकट का सबसे ज़्यादा ख़तरा झेल रहे देश ऊँची ब्याज दरों के रूप में अपनी इस स्थिति की क़ीमत चुका रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ ये देश ‘प्रति वर्ष 20 अरब डॉलर विदेशी ऋणदाताओं को सिर्फ़ जलवायु संकट के जोख़िम की वजह से लगाई गई ऊँची ब्याज दरें चुकाने के लिए देते हैं। यह क़ीमत 2006 के 5 अरब डॉलर से काफ़ी बढ़कर 2023 तक कुल मिलाकर 212 अरब डॉलर हो गई’। इस प्रक्रिया को ‘जलवायु-ऋण गुलामी‘ के रूप में चित्रित किया जा सकता है, जिसमें कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार लोगों को उच्च जोखिम प्रीमियम के माध्यम से उत्तरी (विकसित) बॉन्डधारकों को सब्सिडी देने के लिए मजबूर किया जाता है।
- खाद्य सामग्री पर अब सट्टा लगाया जा रहा है – ‘वैश्विक खाद्य व्यापार की वित्तीय संरचना‘ नामक तीसरे अध्याय में यूएनसीटीएडी बताता है कि कैसे प्रमुख खाद्य व्यापारी अपनी आय का तीन-चौथाई से अधिक भौतिक खाद्य व्यापार से नहीं बल्कि वित्तीय मध्यस्थता से कमा रहे हैं – जैसे वित्तीय सौदों को वित्त देकर, व्युत्पन्न उत्पादों (डेरिवेटिव्स) का कारोबार करना और जोखिम एवं ऋण प्रबंधन से शुल्क कमाना। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि वित्तीकृत कमोडिटी बाज़ार कीमतों में अस्थिरता बढ़ाकर वैश्विक दक्षिण में खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालती है, – जैसा कि यूएनसीटीएडी ने अपनी 2023 की व्यापार और विकास रिपोर्ट में दिखाया था – खाद्य सामग्री तेज़ी से एक सट्टा बाज़ार की परिसंपत्ति बन गई है।
Tajadas de sandía (तरबूज़ की फाँकें), रूफ़िनो तमायो (मेक्सिको), 1950.
2019 में यूएनसीटीएडी ने हाल के सालों में आई अपनी सबसे परिवर्तनकारी रिपोर्टों में से एक जारी की। जिसमें कहा गया कि यह व्यवस्था ख़ुद अपने को दुरुस्त कर लेगी यह मान लेना ख़याली पुलाव पकाने के बराबर है। रिपोर्ट कहती है कि नवउदारवाद की पूरी व्यवस्था में ही सुधारों की ज़रूरत है। इसके साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व में एक नए वैश्विक ग्रीन समझौते की भी। इसके बाद से यूएनसीटीएडी ने लगातार साक्ष्य आधारित विश्लेषण पेश किए हैं लेकिन इसके प्रस्तावित सुझावों को लगातार कमज़ोर किया गया है। 2023 आते-आते यूएनसीटीएडी ने कह दिया कि ‘वैश्विक वित्तीय संरचना के दिशा-परिवर्तन’ की ज़रूरत है। और 2024 में इसने ज़ोर देते हुए कहा कि ‘असंतोष के दौर में विकास के नए सिरे से आकलन’ की आवश्यकता है। नवीनतम रिपोर्ट में व्यवस्था की सबसे मज़बूत तथ्य आधारित आलोचना की गई है, लेकिन इसका अंत ‘मैक्रोप्रूडेंचल उपकरण’, ‘डाटा के अंतर को ख़त्म करने’ और ‘लक्षित सुधार’ जैसे बेमानी शब्दों से होता है। क्या इन हवाई और तकनीकी बातों से हमारी दुनिया की सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का हल निकल सकता है?
हमें कोरी बातें नहीं बल्कि एक ठोस कार्यक्रम की ज़रूरत है। हम चाहते हैं कि हम अपने संस्थान में जिस विकास के नए सिद्धांत को तैयार कर रहे हैं उसके प्रति प्रतिबद्धता दिखाई जाए। शोध के दौरान हमारे लिए यह साफ़ हो चुका है कि नवउदारवाद और निर्भरता से उबर पाने के लिए वैश्विक दक्षिण के देशों को दस मूलभूत नीतियाँ अपनानी होंगी:
- लोकतांत्रिक योजना – एक लोकतांत्रिक, राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया जाना चाहिए जिसके पास निवेश, व्यापार और औद्योगिक प्राथमिकताओं पर सच्चा अधिकार हो।
- राज्य-नीत औद्योगिक नीति – एक ऐसी औद्योगिक नीति की शुरुआत की जाए जो रणनीतिक क्षेत्रों को चिह्नित करे (डिजिटल इंफ़्रास्ट्रक्चर, फ़ूड प्रॉसेसिंग, मशीन निर्माण, दवा उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा)। और इन्हें सरकारी ख़रीद, सब्सिडी, ऋण देकर, स्थानीय सामग्री और तकनीक के आदान-प्रदान की ज़रूरतों को पूरा करने और विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाकर समर्थन देना चाहिए।
- पूँजी नियंत्रण और कर – रणनीतिक पूँजी नियंत्रण लागू करें जो पूँजी पलायन, सट्टा प्रवाह और मुद्रा पर हमलों को रोकें; अवैध वित्तीय प्रवाह पर अंकुश लगाने के लिए निगरानी मज़बूत करें; लाभों के पुनर्निवेश को घरेलू उत्पादक क्षेत्रों में अनिवार्य करें; और रेंट-सीकिंग को दंडित करने के लिए प्रगतिशील कर प्रणाली अपनाएँ।
- सार्वजनिक विकास वित्त – सार्वजनिक विकास बैंकों की स्थापना और उन्हें मजबूत करें, जो ऋण को दीर्घकालिक औद्योगिक, कृषि, आवास और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की ओर मोड़ सकें।
- सार्वजनिक स्वामित्व – ऊर्जा, खनिज, परिवहन, दूरसंचार और वित्त जैसे रणनीतिक क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण करें।
- खाद्य संप्रभुता – कृषि सुधार के माध्यम से खाद्य संप्रभुता का पुनर्निर्माण करें, जिसका अर्थ होगा ज़मींदारी और कृषि-व्यवसायों के वर्चस्व को कम करना। कुछ मामलों में, इसका मतलब भूमि पुनर्वितरण होगा, तो अन्य में, सहकारी समितियों के माध्यम से लोकतांत्रिक ढंग से बेहतर स्तर हासिल करना होगा। सिंचाई, भंडारण और कृषि परिवहन में निवेश करें, खाद्य आयात और अस्थिर वैश्विक बाज़ारों पर निर्भरता समाप्त करें और खाद्य बाज़ारों में सार्वजनिक हस्तक्षेप के माध्यम से क़ीमतों को स्थिर करें।
- प्रौद्योगिकी संप्रभुता – बौद्धिक संपदा पर निर्भरता तोड़ें: अनिवार्य लाइसेंसिंग, सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों, दक्षिण-दक्षिण प्रौद्योगिकी पूल और ओपन-सोर्स प्लैटफार्मों का उपयोग करके स्वास्थ्य, ऊर्जा और संचार में घरेलू तकनीकी क्षमताओं का विकास करें।
- क्षेत्रीय एकीकरण – क्षेत्रीय क्लीयरिंग तंत्र, स्थानीय मुद्रा व्यापार और समन्वित औद्योगिक शृंखलाओं जैसे क्षेत्रीय दक्षिण-दक्षिण व्यापार और भुगतान प्रणालियों का विकास करें।
- ऋण संप्रभुता – अवैध ऋण की पहचान के लिए सार्वजनिक ऑडिट करें। आवश्यकता पड़ने पर ऋण भुगतान निलंबित करें और लेनदारों की शक्ति को कमज़ोर करने के लिए अन्य वैश्विक दक्षिण देशों के साथ सामूहिक पुनर्वितरण की कोशिश करें।
- सार्वभौमिक सार्वजनिक वस्तुएँ – स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा (व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण सहित, जो औद्योगिक प्राथमिकताओं के अनुरूप हो), आवास, परिवहन और ऊर्जा की गारंटी सार्वजनिक प्रावधान के माध्यम से दें, साथ ही इन सेवाओं को घरेलू उत्पादन प्रणालियों से जोड़ें (सार्वजनिक निर्माण फर्मों, राज्य फार्मास्यूटिकल कंपनियों और सार्वजनिक ऊर्जा उपयोगिताओं के माध्यम से)।
हम विकास के नए सिद्धांत के माध्यम से जिस व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं ये दस बिंदु उसकी केवल शुरुआत भर है। हमारे संस्थान का आर्थिक और ऐतिहासिक समाजशास्त्र विभाग वैश्विक निर्भरता के तंत्रों की पहचान करने और उन्हें तोड़ने की रणनीति तैयार करने के लिए काफ़ी मेहनत से काम कर रहा है। हम विश्लेषण के नए साधन, जैसे निर्भरता सूचकांक और डिजिटल संप्रभुता सूचकांक तैयार कर रहे हैं। इसने मौजूदा निर्भरता और वैश्विक दक्षिण की उत्पादन शक्तियों का गहन विश्लेषण किया जा सके। हमारा काम अब दुनिया में फैले असंतोष को एक बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए इस्तेमाल करने की ओर मुड़ रहा है।
ऊँचा बाँध, इफ़्फ़त नग़ी (मिस्र), 1966
उपनिवेशवाद से मुक्ति के सालों में नवस्वतंत्र तीसरी दुनिया के देशों ने आज़ादी और विकास के राष्ट्रगीत लिखे। मिस्र की आज़ादी की लड़ाई के महान गायक अब्दुल हलीम हाफ़िज़ ने 1960 में हेकायत शाब (लोगों की कहानी) नामक एक गीत गाया था। यह गीत 1952 में मिस्र द्वारा अपनी भ्रष्ट राजशाही के खिलाफ किए गए विद्रोह, असवान बाँध के निर्माण, उसके निर्माण को रोकने के लिए ब्रिटेन, फ्रांस और इज़राइल द्वारा किए गए प्रयासों, तथा गमाल अब्देल नासिर द्वारा स्वेज़ नहर के राष्ट्रीयकरण की कहानी बयान करता है। गीत की शुरुआत इन जोशीले वाक्यों से होती है:
हमने कहा था हम बनाएँगे।
और हमने बाँध बना लिया।
अपने पैसे से और अपने मज़दूरों की मेहनत से।
हमने कहा था हम बना देंगे और हमने बना डाला।
हम फिर यह दोहराएँगे।
स्नेह सहित,
विजय