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पहले जंग ख़त्म करेंगे, फिर दोबारा फ़ैक्टरियाँ शुरू करेंगे: इक्यावनवाँ न्यूज़लेटर (2025)

वैश्विक दक्षिण के लिए औद्योगीकरण प्राथमिकता है लेकिन ऋण, कॉर्पोरेट वर्चस्व, युद्धों और प्रतिबंधों ने इन देशों को निर्भरता और अल्पविकास के चंगुल में फँसाए रखा है।

माटोके किसान, सैम्सन ज़ेनसनसेनकाबा (यूगांडा), 2016

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

नवंबर 2025 में सऊदी अरब में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (यूएनआईडीओ) के सम्मेलन में सूडान के उद्योग और व्यापार मंत्रालय के एक परामर्शदाता बशर अब्दुल्ला ने कहा ‘पहले हमें जंग ख़त्म करनी होगी। उसके बाद हम कारख़ाने फिर शुरू कर सकते हैं। उनका यह बयान सूडान में जारी भयानक गृहयुद्ध के बारे में था, लेकिन यही बात वैश्विक दक्षिण के कई अन्य देशों पर भी लागू होती है जो या तो हथियारों की या व्यापार की जंग से जूझ रहे हैं। इन ग़रीब देशों के लिए कई ऐसे फ़ौरी ख़तरे सामने खड़े हैं जिनकी वजह से विकास इनकी प्राथमिकता की सूची में नीचे जा चुका है। इसके बावजूद हथियारों और लूट के पार भी संभावित भविष्य की कल्पना की ज़रूरत दिखाई पड़ती है।

यूएनआईडीओ सम्मेलन में यह माना गया कि [संयुक्त राष्ट्र या यूएन] के सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिएऔद्योगीकरण अनिवार्य हैऔर ऐसा करने के लिए एक नए औद्योगिक समझौतेकी ज़रूरत है। अप्रैल 2025 में आए यूएनआईडीओ के पॉलिसी ब्रीफ ( संक्षिप्त नीति विवरणिका ) में वैश्विक दक्षिण में औद्योगीकरण की अड़चनों की पहचान की गई, इनमें शामिल थे इंफ़्रास्ट्रक्चर में कमी, सीमित प्रौद्योगिक विकास और वैज्ञानिक क्षमता, प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी, और डिजिटल इंफ़्रास्ट्रक्चर सहित एक कमज़ोर सामग्री प्रवाह प्रणाली। इस विवरणिका में यह भी बताया गया कि वैश्विक दक्षिण को कुछ मेगाट्रेंडस्’ [व्यापक रुझानों] का अनुसरण करना होगा और उनके मुताबिक़ ख़ुद को ढालना होगा, जैसे कि डिजिटलीकरण और आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स [कृत्रिम बुद्धिमत्ता], वैश्विक मूल्य शृंखला की पुनर्संरचना, नए ऊर्जा स्रोतों के प्रयोग और जनसांख्यिकीय परिवर्तन (डेमोग्राफ़िक परिवर्तन)। विवरणिका में कहा गया है कि ये रुझान जोख़िमों और अवसरों दोनों का प्रतीक हैं। लेकिन ग़रीब देश इंफ़्रास्ट्रक्चर, नए कौशल और क्लीन उद्योगों (जलवायु के लिए अपेक्षाकृत बेहतर उद्योग) के लिए निवेश कहाँ से लाएँगे? वे पुराने और प्रदूषण करने वाले औद्योगिक ढाँचे से पीछा छुड़ाकर नई उत्पादन शृंखला में कैसे शामिल होंगे?

सौन्ग ऑफ़ द पिक, जेरार्ड सेकोटो (दक्षिण अफ़्रीका), 1946-1947

सऊदी अरब में हुए इन जैसे सम्मेलनों में ग़रीब देशों के सामने खड़ी रुकावटें और उनके द्वारा अनुभव किए जाने वाले संरचनात्मक विऔद्योगीकरण पर बहुत कम ही चर्चा होती है। वैश्विक दक्षिण में विऔद्योगीकरण न तो कोई आकस्मिक घटना है और न ही अंदरूनी कमियोंकी वजह से है जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के अर्थशास्त्रियों का मानना है। यह 1980 के दशक की शुरुआत में ज्वालामुखी की तरह फटे तीसरी दुनिया के ऋण संकट का सीधा नतीजा है और साथ ही आईएमएफ़ और विश्व बैंक द्वारा 1980 तथा 1990 के दशकों में थोपे गए संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रमों (एसएपी) का भी। उदाहरण के लिए 1980 के दशक में आईएमएफ़ की थोपी गई नीतियों ने आयात शुल्क कम करने पर मजबूर कर घाना के कपड़ा कारख़ानों को सस्ते आयात के लिए खोल दिया जिससे एक दौर में अक्रा की सफल औद्योगिक बेल्ट बर्बाद हो गई। 1990 के दशक में ज़ाम्बिया में एसएपी की वजह से ताँबे की खदानों को आपूर्ति करने वाले उद्योगों का निजीकरण हो गया, जिसकी वजह से कॉपरबेल्ट में औद्योगिक आधार तैयार करने वाले स्थानीय फेब्रिकेशन फाउंड्रियाँ (धातुओं को पिघलाकर साँचों में ढालने वाले कारख़ाने), मशीन की दुकानें और केमिकल प्लांट बर्बाद हो गए। ब्राज़ील के साओ पाउलो के दक्षिण में स्थित एबीसी औद्योगिक क्षेत्र और ग्रेटर ब्वेनॉस एरीज़ के उत्पादन कॉरिडरों में ऋण-समाज कल्याण के लिए सरकारी ख़र्च में 1980 और 1990 के दशकों में कटौती, मुद्रा अवमूल्यन और व्यापार में तेज़ी से आए उदारीकरण ने ऑटोमोबाइल, धातु और कपड़ा कारख़ानों को मज़दूरों की छंटनी, कारख़ाने बंद करने या दूसरी जगह ले जाने के लिए मजबूर किया क्योंकि अब बाज़ार में आयातित माल सस्ते दामों पर मिलने लगा था। पूरे वैश्विक दक्षिण में जो हाशिए की अर्थव्यवस्थाएँ औद्योगीकरण की ओर बढ़ने लगी थीं उन्हें फिर से कच्चा माल निर्यात करने और तैयार सामान आयात करने के पुराने ढर्रे की ओर धकेल दिया यह था नवउदारवादी अर्थव्यवस्था ढाँचा।

ग़रीब देशों की औद्योगिक आकांक्षाओं को रास्ते से भटकाने और इन संप्रभु राष्ट्रों को अस्थिर करने वाले युद्धों और प्रतिबंधों की ओर कम ही ध्यान दिया जाता है। लड़ाइयाँ औद्योगिक इंफ़्रास्ट्रक्चर नष्ट कर देती हैं और मज़दूर वर्ग को हतोत्साहित करती हैं, और यह दोनों ही चीज़ें विकास के लिए बहुत अहम हैं। वैश्विक दक्षिण के बहुत कम ही देश अपनी संप्रभुता पर इन हमलों के ख़िलाफ़ अपनी रक्षा कर पाए हैं और अपनी औद्योगिक क्षमता को बढ़ा पाए हैं। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है क्यूबा जो बायोटेक्नॉलजी, मेडिकल उपकरणों और दवाओं के क्षेत्रों में अपनी औद्योगिक क्षमता का विकास कर पाया है और वह भी छह साल लंबी आर्थिक घेरेबंदी के बीच यह घेरेबंदी के बीच एक समाजवादी औद्योगीकरण की मिसाल है। एक दूसरा उदाहरण है वियतनाम: साम्राज्यवादी युद्धों से तबाह होने के बावजूद यह विकास कर पाया, और इसका श्रेय जाता है राज्य निर्देशित औद्योगिक नीति को जिसने कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स और जहाज़ निर्माण के क्षेत्रों में इसे सक्षम बनाया। सबसे कामयाब मिसाल बेशक चीन की है। चीन ने राज्य की योजनाबद्ध नीतियों, विकेंद्रित शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों (जैसे वित्त और प्रौद्योगिकी) पर सार्वजनिक स्वामित्व के ज़रिये एक औद्योगिक महाशक्ति खड़ी की और पिछले चालीस सालों में 80 करोड़ लोगों को अत्यधिक ग़रीबी से उबारा। समग्रता से देखें तो ये अनुभव वैश्विक दक्षिण के ग़रीब देशों को सुझाए गए हर नवउदारवादी विकास के सिद्धांत के उलट हैं।

नाइजीरियन सिम्फ़नी, बेन एनवोनवू (नाइजीरिया), 1963-1964

औद्योगिक नीति सिर्फ़ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया है। इसमें निहित है कि कैसे संप्रभुता और विकास के अधिकार को स्थापित करते हुए औद्योगिक प्रगति के लिए ज़मीन तैयार की जाए। साथ ही वर्ग संघर्ष के ज़रिए मज़दूर वर्ग की शक्ति का भी निर्माण किया जाए। 

एक नया औद्योगिक समझौतातब तक लागू नहीं हो सकता, जब तक किसी देश की विकास प्रक्रिया इन तीन चीजों से व्यवस्थित रूप से भटकाई जा रही हो: आईएमएफ द्वारा थोपी गई सख़्त कटौती नीतियाँ, वे बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जो कच्चे माल के दोहन और निर्यात पर क़ब्ज़ा जमाए हुए हैं, और युद्धों व प्रतिबंधों की हिंसा। ये सब शक्तियाँ मिलकर उत्पादक ढांचे को तबाह करती हैं, सरकारी क्षमता घटाती हैं, और एक अस्थिर व राजनीतिक रूप से कमज़ोर किसान और मज़दूर वर्ग का निर्माण करती हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ क्षीण होती हैं और कोई योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। जब तक संप्रभुता नहीं होगी, तब तक कोई नया औद्योगिक सौदा संभव नहीं है।

पिछले कुछ सालों सेट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत पर विस्तार से काम कर रहा है। इसी सिद्धांत के दायरे में, हमने औद्योगीकरण के लिए ज़रूरी निम्नलिखित तत्त्वों को चिह्नित किया है:

  1. श्रमिकों को मुख्य नीति-निर्माता बनाना होगायोजना बनाने की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाया जाना चाहिए, जैसा कि केरल राज्य ने किया वहाँ 1996 में विकेंद्रित नियोजन के लिए जन योजना अभियानचलाया गया। औद्योगीकरण तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक नीति-निर्माण में मज़दूरों व किसानों के संगठनों और स्थानीय स्तर पर सक्रिय अन्य जन-संस्थाओं की भागीदारी न हो।
  2. संप्रभुता को पुनर्स्थापित किया जाएयुद्ध ख़त्म किए जाने चाहिए, आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाने चाहिए और सरकारों को दीर्घकालिक योजना बनाने की राज्य क्षमता विकसित करने का मौक़ा मिलना चाहिए। इसमें ऐसे बुनियादी ढांचे, परिवहन और आपूर्ति शृंखला में निवेश शामिल है, जो अलग-अलग इलाक़ों के उत्पादकों और ख़रीदारों को जोड़ सके और विकास का ख़र्च कम कर सके।
  3. आत्मनिर्भरता हासिल करनाविदेशी निर्भरता ख़त्म करने के लिए सरकारी नीतियों में ये क्षमताएँ होनी चाहिए: शुल्क लगाकर और सहायता देकर देश के उद्योगों को सुरक्षा देना, पूँजी पर नियंत्रण रखकर वित्तीय क्षेत्र को नियंत्रित करना, और तकनीक व ज्ञान के आदान-प्रदान को सुनिश्चित करना। इससे देश कच्चा माल बेचने वाली अर्थव्यवस्था से बढ़कर, घर में ही विविध प्रकार के उत्पाद बनाने वाली अर्थव्यवस्था बन सकेंगे।
  4. सार्वजनिक क्षेत्र का दायरा बढ़ानाअर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे ज़मीन, बैंकिंग व वित्त, बिजली-ऊर्जा, खान-खनिज, परिवहन और भारी मशीनरी का स्वामित्व या नियंत्रण सार्वजनिक हाथों में होना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि ये क्षेत्र निजी मुनाफ़े के लिए नहीं, बल्कि देश के विकास के लिए काम करें। मेंग जिए और झांग ज़िबिन ने चीन के हाई-टेक उद्योग का उदाहरण देकर दिखाया कि सरकारी कंपनियाँ और संस्थान प्रतिस्पर्धा में शामिल हो सकती हैं और एक ऐसा सार्वजनिक बाज़ार खड़ा कर सकती हैं जो कार्यकुशलता बढ़ाता है।
  5. दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मज़बूत करनापश्चिम की एकाधिकारवादी कंपनियों और वित्तीय-तकनीकी ढाँचे की पकड़ तोड़ने के लिए अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों को आपसी सहयोग बढ़ाना होगा यानी बांडुंग सम्मेलन की भावना को फिर से जगाना होगा।

Commerçant à la criée (नीलामीकर्ता व्यापारी), चेरी बेंगा (कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य), 2010

दस साल पहले, 2015 में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में हुए चीन-अफ्रीका सहयोग मंच (एफ़ओसीएसी) में चीन की सरकार और अफ्रीका के 50 देशों ने आर्थिक विकास और औद्योगीकरण के सवाल पर बात की। 1945 से ही अफ्रीका के औद्योगीकरण के मुद्दे पर चर्चा हो रही है, मगर नव-उपनिवेशवादी ढाँचे की वजह से कोई बड़ा बदलाव नहीं आ पाया। अफ्रीका में औद्योगिक रूप से सबसे ज़्यादा विकसित देश हैं  दक्षिण अफ्रीका, मोरक्को और मिस्र, लेकिन पूरा महाद्वीप दुनिया के कुल विनिर्माण मूल्य में 2% से भी कम की भागीदारी रखता है और निर्मित सामान के वैश्विक व्यापार में इसका हिस्सा सिर्फ़ 1% के करीब है। इसीलिए एफ़ओसीएसी द्वारा औद्योगिक नीति को एजेंडे के केंद्र में रखना बहुत अहम था। 2015 के जोहान्सबर्ग घोषणापत्र में कहा गया: ‘औद्योगीकरण अफ्रीका के आत्मनिर्भर और सतत विकास के लिए जरूरी है।’ संयुक्त उद्यम, औद्योगिक पार्क, एक सहयोग कोष और तकनीक-ज्ञान के हस्तांतरण के जरिये चीन की औद्योगिक ताक़त अब अफ्रीका के औद्योगीकरण के काम में लगेगी। अफ्रीका-चीन व्यापार 2000 के 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2023 में 282 अरब डॉलर पहुँच गया। 2024 में चीन ने अफ्रीकी देशों के साथ रिश्तों को रणनीतिक साझेदारीमें बदल दिया, ताकि ज़्यादा गहरा सहयोग हो सके। अब यह देखना है कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग क्या वाकई एक ऐसा संप्रभु औद्योगीकरण ला सकता है, जो लूट और ग़ुलामी के पुराने चलन को तोड़े। आख़िरकार, अफ्रीकी सरकारों, मज़दूरों और आंदोलनों को इन संबंधों को विकास का हथियार बनाना होगा, न कि उन्हें असमान आदान-प्रदान का एक और जाल बनने देना होगा।

उम्मीद VII, एलियाने ऐसो (बेनिन), 2020

औद्योगीकरण से जुड़ी इन सब बहसों में केवल एक सीधा सा सवाल दांव पर लगा है: क्या वैश्विक दक्षिण के संसाधन चंद लोगों को अमीर बनाने में नष्ट होंगे या व्यापक जनता की ज़िंदगी बेहतर बनाने में इस्तेमाल होंगे? एफ़ओसीएसी के बारे में पढ़ते हुए मुझे नाइजीरिया के कवि नियी ओसुंदारे (जन्म 1947) की याद आई। इनकी क़िताब द आई ऑफ द अर्थ  (1986) में मानवता के प्रकृति से रिश्ते के बारे में बहुत ज़बरदस्त कवितायें हैं। इनमें से एक कविता ऑवर्स टू प्लो नॉट टू प्लंडर (जोतना हमारा काम है, लूटना नहीं) इतनी प्रसिद्ध हुई कि नाइजीरिया के स्कूलों में इसे पढ़ाया गया, इस बात की परवाह न करते हुए कि 1983 में यहाँ एक निरंकुश सैन्य शासन आ गया था। इस कविता के अंतिम दो छंद हैं:

हमारी धरती अन्न का बंद भंडार-गृह है,
किसी सुदूर जंगल में भरा-पूरा खलिहान है,
खुरदरी उदास मिट्टी में छिपा है कोई नगीना।

हमारी यह धरती
काम के लिए है, बेकार के लिए नहीं
हमें इसकी हिफ़ाज़त करनी है, बर्बादी नहीं।
हमारी यह धरती जोतने के लिए है, लूटने के लिए नहीं।

स्नेह सहित

विजय