पूर्वी एशिया एक गहरे विरोधाभास से गुज़र रहा है: यह क्षेत्र वैश्विक विकास का इंजन है, लेकिन यूएस साम्राज्यवाद इसे नए शीत युद्ध की रणभूमि बनाना चाहता है।
दोहन के आधुनिक ढाँचे के पीछे पुरानी उपनिवेशवादी लूट की व्यवस्था ही छिपी है। अफ़्रीका में संप्रभुता और असली आज़ादी के संघर्ष की नींव उपनिवेशवाद-विरोधी विरासत है।
पूँजीवादी व्यवस्था जल्दी-जल्दी होने वाले चुनावों को तरजीह देती है, लेकिन गरिमामय भविष्य के निर्माण में सामाजिक शक्तियों को लंबे समय, संघर्ष और संगठन की ज़रूरत पड़ती है।
विकलांग लोग समाज में शरणार्थी नहीं, बल्कि इसका हिस्सा हैं। इनके साथ होने वाले अन्याय दिखाते हैं कि समाज इंसानी गरिमा से ज़्यादा मुनाफ़े को तरजीह देता है।