ग्रीनलैंड कोई इनाम में जीती जाने वाली वस्तु नहीं: चौथा न्यूज़लेटर (2026)
यूएस को बस ग्रीनलैंड के खनिजों और उसकी रणनीतिक स्थिति से मतलब है, वह वहाँ के मूलनिवासी ‘कलाल्लित’ समुदाय के बारे में नहीं सोचता।
नुआगार्सुक उर्फ… 2, पिया आर्के (कलाल्लित नुनात), 1990.
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
साम्राज्यवादी वैश्विक उत्तर का केंद्र यानी संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) कुछ-कुछ सालों में अपनी हदें पार करने लगता है।
ईरान या वेनेज़ुएला की बेइज़्ज़ती करना एक बात है, लेकिन डेनमार्क के साथ ऐसा व्यवहार करना अशिष्टता का एक अलग ही स्तर है। उत्तरी अटलांटिक देशों में आपसी कलह शायद पिछली दफ़ा तब हुआ था, जब अडॉल्फ़ हिटलर ने 1939 में पोलैंड पर हमला किया था। यूएस ने हालाँकि डेनमार्क को ही हड़पने की कोशिश नहीं की है। वॉशिंगटन ने बस ग्रीनलैंड को अपने लालच का निशाना बनाया है।
बैग मास्केर्ने (मुखौटों के पीछे), अका होए (कलाल्लित नुनात), 2008.
डेनमार्क ने 305 साल पहले, 1721 में ग्रीनलैंड को अपना उपनिवेश बनाना शुरू किया। संविधानों पर शोध करने वाले कहेंगे कि 1953 में औपचारिक रूप से उपनिवेश नहीं रहा जब ग्रीनलैंड डेनमार्क साम्राज्य में शामिल हो गया और वे यह भी कहेंगे कि 2009 में स्वायत्त शासन का क़ानून पारित होने के बाद ग्रीनलैंड को और भी स्वायत्तता मिल गई – लेकिन सच तो यही है कि यह अब भी एक उपनिवेश ही है।
सनद रहे कि ग्रीनलैंड (20 लाख वर्ग किलोमीटर से बड़ा) डेनमार्क से आकार में पचास गुना बड़ा है। अगर यह एक स्वतंत्र देश होता तो क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का बारहवाँ सबसे बड़ा देश होता। ज़ाहिर है कि इस आर्कटिक देश की आबादी काफ़ी कम है यानी लगभग 57,700।
लेकिन वॉशिंगटन के लिए ग्रीनलैंड किसी का घर नहीं बल्कि नक़्शे पर बनी कोई जगह है। इसके बारे में जो शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं वे क़ब्ज़े की भाषा से आते हैं: ख़रीद, नियंत्रण, क़ब्ज़ा। यह वर्चस्व की भाषा है – एक साम्राज्यवादी ताक़त (यूएस) एक उपनिवेशी ताक़त (डेनमार्क) की ज़मीन क़ब्ज़ाना चाहती है।
लेकिन ग्रीनलैंड कोई प्रतियोगिता में जीता जा सकने वाला इनाम नहीं।
ग्रीनलैंड की इनुइट (आर्कटिक क्षेत्र के मूलनिवासी) जनता अपने देश को कलाल्लित नुनात कहती है: ‘कलाल्लित का देश’ (ग्रीनलैंड के मूलनिवासी)। जब ट्रम्प और उनके सहयोगी ग्रीनलैंड की बात करते हैं तो वे कभी भी वहाँ के लोगों – कलाल्लित – का ज़िक़्र नहीं करते। ट्रम्प इस टापू के रणनीतिक महत्त्व और यूएस सरकार कैसे इसके चीनी या रूसी क़ब्ज़े की ख़तरे से चिंतित है, के बारे में बात करते हैं (हालाँकि चीन और रूस ने कभी भी इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाने की बात तक नहीं की)। ग्रीनलैंड हमेशा ही एक ऐसी जगह बना रहा जहाँ कलाल्लित के अलावा दूसरों का ही अधिकार रहा। ट्रम्प या डेनमार्क के तमाम प्रधानमंत्रियों के लिए कलाल्लित जनता की कोई राजनीतिक भूमिका ही नहीं (हालाँकि डेनमार्क के प्रधानमंत्रियों ने इसके लिए स्व-निर्णय के मार्ग को लेकर नरम वक्तव्य दिए हैं)।
क्विंडे पा एन क्लिप (चट्टान के मुहाने पर महिला), काराले आंद्रेआसेन (कलाल्लित नुनात), n.d.
ग्रीनलैंड में 1794 में क्रायोलाइट नाम के एक खनिज की खोज हुई जो एल्यूमिनीयम के उत्पादन में काम आता है, तभी से यह डेनमार्क के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से अहम हो गया। यह दोहन-केंद्रित रवैया 1956 में दक्षिण ग्रीनलैंड के कुआनेर्सुइट (क्वानेफील्ड) इलाक़े में यूरेनियम और दुर्लभ पदार्थों की खोज के बाद भी जारी रहा। 1941 में यूएस में ग्रीनलैंड के राजदूत हेनरिक कॉफ़मैन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसने यूएस को ग्रीनलैंड में अड्डे और स्टेशन बनाने की अनुमति दी। 1943 में यूएस ने थुले (डंडास) में ब्लूई वेस्ट 6 नाम से मौसम केंद्र स्थापित किया और 1946 में एक छोटी हवाई पट्टी भी। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद डेनमार्क उन देशों में अग्रणी था जो सोवियत संघ के ख़िलाफ़ यूएस के सैन्य गुट बनाने के प्रयासों में शामिल हुए। बल्कि यह उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के संस्थापक सदस्यों में रहा और इसने डिफ़ेन्स ऑफ़ ग्रीनलैंड अग्रीमेंट (1951) [ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए समझौता] पर भी हस्ताक्षर किए जिससे यूएस को ऑपरेशन ब्लू जे कोडनेम से थुले में हवाई सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति मिल गई (अब इसे पिटुफ़िक अंतरिक्ष बेस के नाम से जाना जाता है)। यह अड्डा सिर्फ़ यूएसएसआर पर निगरानी करने में ही मददगार नहीं था बल्कि मिसाइल चेतावनी, मिसाइल सुरक्षा और अंतरिक्ष से निगरानी के लिए भी ज़रूरी है – आज जब आवश्यक खनिजों के लिए दुनिया में होड़ लगी है ऐसे में ग्रीनलैंड का यूरेनियम और अन्य दुर्लभ पदार्थ केंद्र में आ गए हैं जो इसे रणनीतिक रूप से और भी महत्त्वपूर्ण बना देते हैं।
जलवायु संकट के चलते ग्रीनलैंड की हिम चादरें पिघल गई हैं इसलिए यहाँ ज़मीन के नीचे सर्वे करना और खनन आसान हो गया है। 2010 के दशक की शुरुआत से बीच के वर्षों (विशेषकर 2011-2015) में किए गए व्यावहारिकता अध्ययन और ड्रिलिंग से पता चला कि यह भूमि ग्रेफाइट, लिथियम, दुर्लभ मृदा तत्त्वों और यूरेनियम से भरी हुई थी। जैसे-जैसे यूएस ने चीन के विरुद्ध नया शीत युद्ध शुरू किया, उसे दुर्लभ खनिजों के नए स्रोत खोजने पड़े, क्योंकि चीन दुर्लभ पदार्थों को रिफ़ाइन करने और डाउनस्ट्रीम मैग्नेट उत्पादन (कच्चे माल से चुम्बक उत्पादों के निर्माण की उत्पादन प्रक्रिया के बाद के चरण) में काफ़ी दबदबा रखता है। यह टापू न सिर्फ़ खनिजों का स्रोत या शक्ति दिखाने का एक भौगौलिक केंद्र भर नहीं बना बल्कि यूएस द्वारा चलाई जा रही सुरक्षा संरचना की आपूर्ति-शृंखला के लिए भी बेहद ज़रूरी है।
इनुप्पासुइट V (कई लोग), ऐनी-बिर्थे होव (कलाल्लित नुनात), 1995.
जनवरी 2026 के मध्य में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की चीन यात्रा से बहुत पहले अगस्त 2010 में कनाडा सरकार ने एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट का शीर्षक बहुत दिलचस्प था: कनाडा की आर्कटिक विदेश नीति पर बयान: संप्रभुता का प्रयोग और कनाडा की उत्तरी रणनीति को विदेश में बढ़ावा देना। सतही तौर पर यह रिपोर्ट काफ़ी आम सी लगती है, इसमें कई दावे किए गए हैं कि कैसे कनाडा आर्कटिक के मूलनिवासियों का सम्मान करता है और कैसे इसकी मंशा पूरी तरह उदार और नेक है। लेकिन इन पर विश्वास करना मुश्किल है क्योंकि कनाडाई आर्कटिक क्षेत्र में तमाम बड़े खनन कार्यक्रमों की सच्चाई यह है कि इनुइट लोगों ने बार-बार इनसे वन्यजीवों और इनुइट जनता की खेती को हो रहे नुक़सान को उजागर किया है। साथ ही कई बार इन कार्यक्रमों को नियंत्रित करने वालों से इनका विस्तार न करने की सिफ़ारिशें की हैं, जैसा कि बाफ़िनलैंड मेरी रिवर लोहे की खदान के मामले में किया गया।
असल में, कनाडा में दुनिया के खनन वित्त का सबसे बड़ा केंद्र है (TSX और TSX वेंचर एक्स्चेंज में दुनिया की आधी से ज़्यादा सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली खनन कंपनियाँ सूचीबद्ध हैं), यह दशकों से ईंधन और खनिजों की खोज में आर्कटिक के इलाक़ों में सक्रिय है। 2010 की यह रिपोर्ट कनाडा के उत्तर में ईंधन और प्राकृतिक संसाधनों की संभावना’ का ज़िक़्र ज़रूर करती है और बताती है कि सरकार ‘उत्तर में मौजूद संभावित ईंधन और खनिजों के नक़्शे तैयार करने में काफ़ी निवेश कर रही है’। लेकिन इसमें कनाडा की बड़ी निजी खनन कंपनियों का कोई उल्लेख नहीं है, जिन्हें न केवल ग्रीनलैंड में खनिज मिलने लाभ होगा (उदाहरण के लिए, अमारोक मिनरल्स, जो पहले से ही दक्षिणी ग्रीनलैंड में नालुनाक सोने की खान की मालिक है) बल्कि कनाडा के आर्कटिक क्षेत्र (उदाहरण के लिए, एग्निको ईगल माइंस, बैरिक माइनिंग कंपनी, कनाडा रेअर अर्थ कॉर्पोरेशन, और ट्रिलॉजी मेटल्स) से भी फ़ायदा होगा। इस रिपोर्ट की दिलचस्प बात यह है कि अगर इसे लागू किया गया तो यह आर्कटिक में जल यातायात को लेकर कनाडा और यूएस के लंबे समय से चले आ रहे विवाद को बढ़ा देगी, इसे कनाडा अपना आंतरिक जल क्षेत्र मानता है और यूएस इसे अंतर्राष्ट्रीय खाड़ी की तरह देखता है।
रिपोर्ट कहती है कि कनाडा एक ‘आर्कटिक शक्ति’ है। आर्कटिक क्षेत्र वाले सात और देश हैं: डेनमार्क, फ़िनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन और यूएस (अलास्का के ज़रिए)। ये देश आर्कटिक काउन्सिल के सदस्य हैं, जिसका गठन कनाडा ने 1996 में किया था ताकि आर्कटिक क्षेत्र में पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम और इस क्षेत्र के मूलनिवासियों के संगठनों को अपने विचार सामने रखने का मौक़ा मिले। लेकिन 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से आर्कटिक काउन्सिल का कामकाज शिथिल पड़ा है, क्योंकि इसके सदस्य राष्ट्रों ने रूस से सामान्य सहयोग रोक दिया और बाद में सिर्फ़ उन्हीं कार्यक्रमों पर सीमित काम करना शुरू किया जिसमें रूस की भागीदारी नहीं थी, जबकि रूस के पास लगभग आधा आर्कटिक समुद्रतट है। काउन्सिल की भूमिका सीमित हो गई है क्योंकि इसके लिए आपसी सहमति की ज़रूरत है – यह एक ऐसा मंच हो सकता था जहाँ पैन-आर्कटिक (अखिल आर्कटिक) समन्वय किया जा सकता था और यहाँ तक कि बाध्यकारी समझौतों पर बातचीत भी कर सकता था, लेकिन अब इसकी भूमिका घटकर तकनीकी कार्यसमूह परियोजनाओं और मूल्यांकनों तक ही सिमट गई है। कनाडा का ‘आर्कटिक शक्ति’ होने का दावा लगता तो दमदार है लेकिन इसमें दम है नहीं। क्या यह सच में यूएस को अपने समुद्रीमार्गों का इस्तेमाल करने से रोक पाएगा और क्या यह आर्कटिक क्षेत्र में अपनी खनन कंपनियों के लिए पूँजीवादी संप्रभुता का एक रूप लागू कर सकता है?
कम्मंगुआरा (मेरा नन्हा दोस्त), बूटी पेडरसन (कलाल्लित नुनात), 2015.
साल 2020 में, काउन्सिल के रूस के साथ सहयोग रोकने से पहले ही, नाटो ने अपने सदस्यों से ‘अपनी निगाहें सुदूर उत्तर (हाई नॉर्थ) पर केंद्रित करने‘ को कह दिया था (जैसा कि नाटो के थिंक टैंक, अटलांटिक काउंसिल ने एक रिपोर्ट में ज़िक़्र किया)। 2022 के बाद, नाटो ने एक ‘हाई नॉर्थ‘ रणनीति विकसित की, जिसकी सबसे स्पष्ट झलक इसकी 2025 की संसदीय रिपोर्ट ‘रीनेविगेटिंग द अनफ्रोजन आर्कटिक‘ [पिघलते आर्कटिक का पुनर्निर्धारण] में देखी जा सकती है। यह रिपोर्ट नाटो देशों के लिए प्राथमिक ख़तरे के रूप में चीन और रूस को चिह्नित करती है। इनमें से एक (रूस) एक प्रमुख आर्कटिक शक्ति है, और दूसरे (चीन) के पास उत्तर में दो वैज्ञानिक स्टेशन हैं (स्वालबार्ड, नॉर्वे में येलो रिवर स्टेशन, जो 2003 से वायुमंडलीय और पर्यावरण विज्ञान का अध्ययन कर रहा है, और आइसलैंड के कारहोल में चीन-आइसलैंड आर्कटिक साइंस ऑब्जर्वेटरी, जो 2018 से पृथ्वी-प्रणाली और पर्यावरण विज्ञान का अध्ययन कर रहा है)। चीन ने यह भी संकेत किया है कि आर्कटिक जल एक ध्रुवीय सिल्क रोड के लिए आदर्श होंगे, जो चीन को यूरोप से जोड़ने वाला एक व्यापार गलियारा हो सकता है। लेकिन फिलहाल इस क्षेत्र में चीन की कोई सैन्य मौजूदगी नहीं है।
9 जनवरी 2026 को, ट्रंप ने कहा कि वे नहीं चाहते चीन या रूस को ग्रीनलैंड में पैर जमाने का मौका मिले। यह सच है कि चीनी कंपनियों के प्रतिनिधि ग्रीनलैंड गए हैं और गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इनमें से किसी पर भी काम आगे नहीं बढ़ा है। ट्रंप को आशंका है कि इनमें से कुछ एमओयू अंततः परियोजनाओं में बदल सकते हैं, जिससे ग्रीनलैंड की धरती पर चीनी कंपनियों की मौजूदगी हो सकती है। हालाँकि, चूँकि ग्रीनलैंड में यूरोपीय संघ का निवेश बहुत कम है (लगभग 3.4 करोड़ डॉलर प्रति वर्ष), और चूँकि यूएस (लगभग 13.01 करोड़ मिलियन डॉलर प्रति वर्ष) और कनाडाई निवेश (54.93 करोड़ डॉलर प्रति वर्ष) अधिक है लेकिन फिर भी अनुमानित चीनी निवेश (कम से कम 116.2 करोड़ डॉलर) से कम है, इसलिए चीनी व्यवसायों को आशंका से देखना स्वाभाविक है। साथ ही, यह ध्यान देने योग्य है कि डेनिश और अन्य नॉर्डिक राजनयिकों ने ट्रंप के इस दावे को झुठलाया है कि रूसी और चीनी युद्धपोत ‘ग्रीनलैंड के आसपास‘ घूम रहे हैं, जिसके लिए ट्रंप ने कोई सार्वजनिक सबूत नहीं दिया है।
चीन का ग्रीनलैंड में निवेश की संभावना कोई सैन्य ख़तरा नहीं है और इसकी चिंता भी यूएस, कनाडा या डेनमार्क को नहीं होनी चाहिए। इसके बारे में बातचीत या बहस ग्रीनलैंड के अंदर होनी चाहिए।
उगुत (हम), बोलाटा सिलिस-होए (कलाल्लित नुनात), 2021.
ग्रीनलैंड बिकाऊ वस्तु नहीं है। यह कोई सैन्य स्थल या खनिजों का भंडार भर नहीं है जो खनन के इंतज़ार में बैठा है। यह एक समाज है, जो अपनी याद और भविष्य की आकांक्षाओं के साथ ज़िंदा है। वैश्विक दक्षिण यह कहानी अच्छे से जानता है – विकास के नाम पर विनाश, सुरक्षा के नाम पर सैन्य अड्डों की कहानी, अपनी ही ज़मीन पर लोगों को पीड़ा और भुखमरी की आग़ में झोंक देने की कहानी।
कोई ज़मीन अपने पर क़ब्ज़ा होने का ख़्वाब नहीं देखती। लोग आज़ादी के सपने देखते हैं।
अक्कालुक लिंगे से पूछिए, जो एक कलाल्लित कवि, राजनीतिज्ञ और इनुइट अधिकारों के रक्षक हैं और जिन्होंने अपनी कविता ‘ए लाइफ़ ऑफ़ रिस्पेक्ट‘ में लिखा है:
किसी देश के नक़्शे पर
हमें बिंदु और लकीरें खींचनी होती हैं
ताकि हम बता सकें कि हम यहाँ थे –
और आज भी यहीं हैं,
जहाँ लोमड़ियाँ दौड़ती हैं
और पंछी घोंसले बनाते हैं
और मछलियाँ तैरती हैं।तुम सबकुछ दायरों में बाँधना चाहते हो
और हमसे सबूत माँगते हो
हमारे होने का,
कि हम जिस ज़मीन पर हैं वो हमेशा से हमारी ही है,
कि हमारे पुरखों की ज़मीन पर हमारा हक़ है।और आज हम तुमसे पूछते हैं:
तुम्हें यहाँ होने का क्या हक़ है?
स्नेह सहित,
विजय