बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष में शहीद हुए युवा क्रांतिकारियों के नाम: बत्तीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
फ़्रांत्ज़ फ़ैनन और पैट्रिस लुमुम्बा जैसे क्रांतिकारियों ने अल्पायु में ही जान गंवा देने के बावजूद उपनिवेशवाद-विरोधी और राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों में अमूल्य योगदान दिया।
फ़ाइंडिंग फ़ैनन, लैरी आचियाम्पोंग और डेविड ब्लैंडी के स्क्रीनशॉट (यूके), 2018
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
फ़्रांत्ज़ फ़ैनन की जन्मशताब्दी के कुछ दिन बाद जुलाई में मैं उनकी बेटी मिरेय फ़ैनन मेंडेस-फ्रांस से खाने पर मिला। जब मैंने ज़िक़्र किया कि फ़ैनन की उनतालीस साल की कम उम्र में ही मौत हो गयी तो मिरेय ने मुझे रोकते हुए कहा ‘नहीं, छत्तीस’। ये तीन और साल भी उनके लिए एक तोहफ़े की तरह होते, वे इस दौरान शायद कोई नई क़िताब लिख लेते और अपने परिवार के साथ और वक़्त बिता पाते। हमारे लिए भी यह अच्छा होता कि द रेच्ड ऑफ द अर्थ [धरती के अभागे] के बाद आने वाले उनके और भी बेहतरीन लेखन को पढ़ पाते। शायद वे अपनी अगली क़िताब में बताते कि कैसे एक ऐसा राष्ट्रीय कार्यक्रम खड़ा किया जाए जो संकीर्ण राष्ट्रवाद के शिकंजे में न फँसे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
मिरेय के साथ हुई मेरी बातचीत और उनके पिता की विरासत के बारे में सोचते हुए मैंने ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की टीम को ऐसे युवा क्रांतिकारी नेताओं और बुद्धिजीवियों की फ़ेहरिस्त तैयार करने में मेरी मदद करने को कहा जो चालीस साल की उम्र से पहले ही शहीद हो गए। देखते ही देखते मेरे सामने ऐसे लोगों के नाम की झड़ी लग गई। मेरे पास अब उन नौजवानों के नाम की लंबी सूची थी जिन्हें उनके विचारों की वजह से मार दिया गया। इसमें मोज़ाम्बिक के जोसिना मशेल (25) से लेकर क्यूबा के चे ग्वेरा (39) हैं। मेरा मन था कि इस न्यूज़लेटर में उस सूची का संशोधित रूप भी शामिल करूँ लेकिन मैंने ख़ुद को रोका। उस फ़ेहरिस्त में तो पहले ही कितने नाम नहीं होंगे क्योंकि साम्राज्यवादी व्यवस्था ने दुनिया के कितने ही हिस्सों में ऐसे अनगिनत नेताओं और बुद्धिजीवियों की हत्या की है जिनके नाम हम जानते भी नहीं। तो पहले से ही नामुकम्मल सूची को कैसे और छोटा कर दिया जाए?
लुमुम्बा का जीवन, मोके फ़िल्स (कांगो), 2017
एक नाकाफ़ी लिस्ट जारी करने से बेहतर है कि हम फ़ैनन के बारे में ही कुछ और चर्चा करें जिन्होंने अपने छोटे जीवन में भी दो किताबें लिखीं: 1952 में ब्लैक स्किन, वाइट मास्क [काली चमड़ी, गोरे मुखौटे] और 1961 में उनकी मौत से कुछ ही महीने पहले छपी द रेच्ड ऑफ द अर्थ । 1964 में मरणोपरांत, 1952 और 1961 के बीच लिखे उनके निबंधों के दो संकलन भी छपे।
इस रचना-संग्रह को देखकर यह दावा करना मुश्किल है कि बस यही फ़ैनन थे, यही सब कुछ वे अपने पूरे जीवन में करते, और उनका मनोचिकित्सा का काम, अल्जीरियाई आज़ादी संग्राम में उनकी भूमिका – यही उनका पूरा योगदान था। फ़ैनन के काम को विद्वान एक मुकम्मल काम के तौर पर देखते हैं लेकिन सच तो यह है कि वे अपने बौद्धिक जीवन के शिखर तक पहुँचे ही नहीं। उनकी अंतिम क़िताब में जो मत दिए गए हैं वे दरअसल खोज के नए आयाम खोलते हैं जिन पर वे आगे काम करते, अगर 1961 में ही उनकी मौत न हुई होती – ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि इसके कुछ समय बाद ही उपनिवेशवाद के चंगुल से आज़ाद हुए राष्ट्रों पर थोपी गईं आंतरिक और बाहरी कमियों के सबूत सामने आने लगे थे।
पाँच साल पहले ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने फ़ैनन पर एक डोसियर निकाला था The Brightness of Metal [धातु की चमक] (मार्च 2020) – जिसमें राष्ट्रीय मुक्ति के सवाल पर फ़ैनन के शुरुआती विचारों के बारे में बताया गया था। लेकिन यह सिर्फ़ उनकी प्रारंभिक सोच थी। उनकी अकाल मृत्यु के कारण हमारे सामने उनके अधूरे विचार ही मौजूद हैं।
द रेच्ड ऑफ द अर्थ के बाद उनकी अगली संभावित क़िताब की झलक हमें उनके एक निबंध में दिखती है जो उन्होंने 17 जून 1961 को पैंतीस वर्षीय पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या के बाद लिखा था। एफ़्रिक ऐक्शन के फ़रवरी 1961 के संस्करण में छपे अपने लेख ‘Lumumba’s Death: Could We Do Otherwise?’ [लुमुम्बा की हत्या: क्या हम कुछ और कर सकते थे?] में वे जो कहना चाहते थे वह इस एक दमदार अनुच्छेद से समझा जा सकता है:
हमारी ग़लती, हम अफ़्रीकियों ने जो ग़लती की, वह यह भूल जाना है कि दुश्मन कभी भी पूरी ईमानदारी से पीछे नहीं हटता। वह [आपका पक्ष] कभी नहीं समझता। वह झुक ज़रूर जाता है, लेकिन ख़ुद को बदलता नहीं।
यह मान लेना कि दुश्मन ने अपनी आक्रामकता गंवा दी है और अब वह नुक़सान नहीं पहुँचा सकता, यह हमारी ग़लती है। अगर उसके रास्ते में लुमुम्बा रुकावट हैं, तो लुमुम्बा ख़त्म कर दिए जाएँगे। हत्या करने में झिझकना कभी भी साम्राज्यवाद का लक्षण नहीं रहा है।
सही है कि साम्राज्यवाद कभी भी उदार और मानवीय नहीं होता।
बाढ़, बार्थेलेमी टोगुओ (कैमरून), 2016
लुमुम्बा पर लिखे अपने लेख में फ़ैनन ने और दो लोगों का ज़िक़्र किया था लेकिन उनके बारे में ज़्यादा लिखा नहीं: ‘बेन एम’हिदी को देखो, मूमिए को देखो, लुमुम्बा को देखो’।
मोहम्मद लार्बी बेन एम‘हिदी (1923-1957) अल्जीरियन नेशनल लिबरेशन फ़्रंट (एफ़एलएन) के छह संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्हें ‘Larbi the Wise’ के नाम से जाना जाता था, वे ओरान क्षेत्र के विलाया वी सैन्य ज़ोन के कमांडर थे और आगे चलकर उन्होंने अल्जीरियाई स्वतंत्रता संग्राम में एफ़एलएन का नेतृत्व किया। फ़रवरी 1957 में उन्हें पकड़कर बहुत यातना दी गई और एक महीने बाद उनकी हत्या कर दी गई, उस समय वे तैंतीस साल के थे। फ़्रांस इस सीधे-सच्चे अल्जीरियाई को बर्दाश्त नहीं कर सकता था।
फ़ीलिक्स-रोलां मूमिए (1925-1960) ने 1955 में शुरू हुए राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में यूनियन ऑफ़ द पीपल्स ऑफ़ कैमरून का नेतृत्व किया। अल्जीरिया की ही तरह कैमरून में भी फ़्रांस के दमन ने क्रूरता की हद पार कर दी थी। इसने रिहाइशी इलाक़ों पर भयानक हमले किए जिसमें हज़ारों की संख्या में लोगों की मौत हुई। इतिहास के इस पन्ने को लगभग भुलाया जा चुका है। फ़्रांस की सुरक्षा सेनाओं के एक व्यक्ति ने जिनेवा में मूमिए की हत्या कर दी, उसने उन्हें थैलीयम (ज़हर) दिया। वे उस समय पैंतीस साल के थे।
एम’हिदी, मूमिए और लुमुम्बा को फ़ैनॉन व्यक्तिगत तौर पर जानते थे, और इनकी हत्याओं में साम्राज्यवाद की बर्बरता साफ़ दिखाई देती है। जनता को संप्रभुता की ओर ले जाने के लिए अगर कोई भी क्रांतिकारी खड़ा होगा तो उसे ख़त्म करना अनिवार्य है। लुमुम्बा एक क्रांतिकारी थे, फ़ैनन लिखते हैं कि वे ‘अफ़्रीका को समर्पित’ थे, यानी एक ऐसा व्यक्ति जिसका दिल अफ़्रीका के लोगों के साथ था और जिसे साम्राज्यवाद ख़रीद नहीं सका था। इसीलिए उसकी हत्या कर दी गई।
संगीत, बाया महीदीन (अल्जीरिया), 1974
बेल्जियम, ब्रिटेन, फ़्रांस और पुर्तगाल ने अपने अफ्रीकी उपनिवेशों को शांति से छोड़ देने से इंकार कर दिया। उन्होंने हर संभव हथकंडे अपनाए, यहाँ तक कि उन तरीक़ों को भी जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध में नाज़ियों और जापानियों द्वारा इस्तेमाल किया गया था – बाद में इन्हें नूर्नबर्ग व टोक्यो मुकदमों में युद्ध अपराध माना गया। अगर इन मुक़दमों में इस्तेमाल परिभाषाओं को अल्जीरिया से कैमरून तक के उपनिवेशों के लिए प्रयोग किया जाए तो यूरोपीय देशों के सैन्य अधिकारी और राजनेताओं को फाँसी लगा दी जाती।
उदाहरण के लिए, इंपीरियल जापानी सेना के जनरल तोमोयुकी यामाशिता को 1946 में फांसी दी गई थी, क्योंकि टोक्यो ट्रिब्यूनल ने उन्हें कमांड की ज़िम्मेदारी के सिद्धांत (जिसे बाद में यामाशिता स्टैंडर्ड के रूप में जाना गया) के तहत दोषी ठहराया। फिलीपींस में उनकी सेना ने नागरिकों पर अत्याचार किए थे। यदि इस मानक को हर जगह लागू किया जाता तो ब्रिटिश फील्ड मार्शल जेराल्ड वाल्टर रॉबर्ट टेम्पलर को भी मलय आपातकाल (1948–1960) में उनकी भूमिका के लिए फाँसी दी जाती। इसमें ब्रिटिश सेना द्वारा नज़रबंदी शिविरों का उपयोग और आम जनता के ख़िलाफ़ वनस्पति-विनाशक युद्ध (हर्बिसाइडल वारफेयर) शामिल था, बाद में वियतनाम में अमेरिका ने भी एजेंट ऑरेंज के तौर पर इसका इस्तेमाल किया।
इस लिहाज़ से फ़्रांस के दो जेनरल ज़्याँ-मरी लैम्बर्टन और मैक्स ब्रीयांड को भी कैमरून युद्ध (1955-1964) में उनकी भूमिका के लिए फाँसी दे दी जाती जहाँ फ़्रांस की सेनाओं ने विद्रोहियों और नागरिकों दोनों के साथ क्रूरता की। इस दौरान जनसंहार और मनोवैज्ञानिक युद्ध के तौर पर सर कलम करने जैसे कृत्यों के दस्तावेज़ मिलते हैं।
लेकिन इस सबके बावजूद उन्हें मिले शानदार चमचमाते हुए तमग़े।
यहाँ यह याद रखा जाना चाहिए कि युद्ध के अंतिम दौर में, 13 फ़रवरी 1960 को फ़्रांस ने अल्जीरिया के रेग्गाने में सहारा रेगिस्तान में अपने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था। इसके बाद फ़्रांस दुनिया का चौथा परमाणु हथियार सम्पन्न देश बन गया। फ़्रांस ने 1963 की आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। 1962 में अल्जीरिया ने आज़ादी हासिल की लेकिन फ़्रांस ने रेग्गाने में और पाँच साल तक परमाणु परीक्षण जारी रखने की लीज़ बरकरार रखी, और उसने 1966 तक यह परीक्षण जारी रखे। इसके बाद फ़्रांस ने अपने ये परीक्षण प्रशांत महासागर के मुरुरोआ और फांगाटौफा एटोल में किए जहाँ इसने अगले तीस सालों में 193 परमाणु परीक्षण किए।
जब रेग्गाने में फ़्रांस परमाणु परीक्षण कर रहा था तब फ़ैनन ने द रेच्ड ऑफ द अर्थ में लिखा: ‘सैन्य रिसर्च में जो अथाह पैसा लगाया जाता है, जो इंजीनियर परमाणु युद्ध के टेक्निशियन बना दिए जाते हैं, ये सब पचास सालों में अल्पविकसित देशों के जीवन स्तर को 60 प्रतिशत बेहतर कर सकते थे’। उन्होंने इन परीक्षणों पर आर्थिक नज़रिए से लिखा लेकिन वे इन्हें आसानी से एक राजनीतिक ख़तरे के तौर पर भी देख सकते थे: अगर हत्याएँ करने से काम नहीं बनता तो फ़्रांस के पास उपनिवेशों में विद्रोह को दबाने के लिए परमाणु बम भी मौजूद थे।
फ़ैनन ने 1958 में अल्जीरियाई अंतरिम सरकार की ओर से घाना के प्रधानमंत्री क्वामे न्क्रुमाह द्वारा अकरा में आयोजित अखिल अफ्रीकी जन सम्मेलन में लुमुम्बा और मूमिए से मुलाकात की। उन्होंने राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों की ज़रूरत, साम्राज्यवादी ताक़तों की क्रूरता से ख़ुद को बचाने के तरीक़ों और नव-उपनिवेशवादी संरचना के बढ़ते प्रभाव के बारे में चर्चा की। फ़ैनन एक अफ्रीकी सेना का निर्माण करना चाहते थे – महाद्वीप की आज़ादी की लड़ाई के लिए एक सैन्य बल जिसे अल्जीरियाइयों और उनके सहयोगियों द्वारा प्रशिक्षित किया जाना था। इन बैठकों के अपने नोट्स में फ़ैनन ने मूमिए की मृत्यु के बारे में लिखा:
एक बहुत सशक्त, बेहद ज़िंदादिल, बेहद उत्साही व्यक्ति की एक अमूर्त मौत। फ़ीलिक्स की आवाज़ लगातार बुलंद रहती थी। आक्रामक, ग़ुस्सैल, अपने देश के लिए प्यार से भरा व्यक्ति जो कायरों और षडयंत्रकारियों से नफ़रत करता था। अनुशासित, अडिग, भ्रष्टाचार से मुक्त। सिर्फ़ साठ किलो के शरीर में सम्पूर्ण क्रांतिकारी चेतना का संचार।
मूमिए के बारे में ये वाक्य आसानी से फ़ैनन को भी परिभाषित कर सकते हैं।
फ़ैनन की मौत का रिकॉर्ड तो ब्रोंकाइल निमोनिया दिखाता है, मगर यह सिर्फ़ कागजी दावा है। उनकी मौत के समय वहाँ सीआईए एजेंट सी. ओलिवर इसलिन मौजूद था। तो यह सब इसी तरह चलता है।
स्नेह सहित,
विजय