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केरल ने अत्यधिक ग़रीबी ख़त्म की: पचासवाँ न्यूज़लेटर (2025)

केरल ने स्पष्ट सरकारी नीति, विकेंद्रीकृत योजना और सहकारी आंदोलन के बूते अत्यधिक निर्धनता मिटाने में सफलता पाई।

कुडुम्बश्री, जुनैना मोहम्मद (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), 2025

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

1 नवंबर 2025 को, 3.4 करोड़ आबादी वाले भारत के दक्षिण-पश्चिमी राज्य केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने राज्य को अत्यंत ग़रीबी से मुक्त घोषित कर दिया। केरल दुनिया के उन चुनिंदा स्थानों में से एक हो चुका है जहाँ अत्यंत गरीबी को ख़त्म कर दिया गया है। इससे पहले चीन ने 2022 में घोषणा की थी कि उसने देशव्यापी अत्यंत ग़रीबी को समाप्त कर दिया है।

केरल की यह उपलब्धि दो कारणों से महत्त्वपूर्ण है। पहला, एक ऐसे देश में जहाँ लाखों लोग अभी भी ग़रीबी में रहते हैं, केरल भारत के अट्ठाईस राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में एकमात्र ऐसा राज्य बन गया है जिसने अत्यंत ग़रीबी पर काबू पाया है। दूसरा, केरल में कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) की सरकार है और इसलिए दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार नियमित रूप से इसे आर्थिक सहायता से वंचित रख रही है।

केरल की अतिदारिद्र्य निर्मार्जन परिपाड़ी (अत्यंत ग़रीबी उन्मूलन परियोजना या ईपीईपी) श्रमिक और किसान के दशकों से चले आ रहे संघर्षों पर आधारित थी, जिसने मज़बूत सार्वजनिक संस्थानों और जन संगठनों का निर्माण किया और साथ ही साथ यह कई वाम शासन कालों में किए गए कामों पर आधारित थी। ईपीईपी की शुरुआत मुख्यमंत्री और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के एक नेता पिनराई विजयन ने मई 2021 में उनके नेतृत्व वाली दूसरी एलडीएफ सरकार की पहली कैबिनेट बैठक के दौरान की थी। रोज़गार, भोजन, स्वास्थ्य और आवास तक लोगों की पहुँच पर केंद्रित एक ठोस मानदंड-आधारित प्रक्रिया के बाद, सरकार ने 64,006 परिवारों (या 103,099 व्यक्तियों) को अत्यंत ग़रीब के तौर पर चिह्नित किया। इस सर्वेक्षण में सरकार ने सरकारी कर्मचारियों, सहकारी समितियों के सदस्यों और वाम दलों के जन संगठनों के सदस्यों सहित लगभग 400,000 गणनाकारों (सर्वे में डाटा एकत्रित करने वाले) को लगाया ताकि ग़रीब परिवार जिन ख़ास समस्याओं का सामना करते हैं उनकी पहचान की जा सके। इन गणनाकारों ने प्रत्येक परिवार के लिए समिचत योजनाएँ बनाईं – उनके अधिकार सुरक्षित करने और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच से लेकर आवास, स्वास्थ्य सुविधाएँ और आजीविका में सहायता प्राप्त करने तक – ताकि उन्हें ग़रीबी से लड़ने के लिए सक्षम बनाया जा सके। इस अभियान में सहकारी आंदोलन की भूमिका मौलिक थी। ग़रीबी उन्मूलन के लिए नियोजन प्रक्रिया स्थानीय स्वशासन प्रणाली की भूमिका के बिना संभव नहीं होती, जो केरल में सत्ता के विकेंद्रीकरण की सफल नीति का परिणाम है। यह न्यूज़लेटर जब आप तक पहुँचेगा केरल में स्थानीय निकाय चुनाव हो चुके होंगे।

उदयपुरम सहकारी कार्यकर्ता, वंशिका बब्बर (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), 2025

पिछले कुछ वर्षों में ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने ऊरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी (यूएल) रिसर्च सेंटर के साथ मिलकर केरल के सहकारिता आंदोलन के अध्ययन का काम किया है। हमें ख़ुशी है कि केरल में अत्यंत ग़रीबी के ख़त्म किए जाने के एक महीने के भीतर ही हमने केरल का सहकारिता आंदोलन नाम से अपना अध्ययन प्रकाशित कर दिया है। हमारा अध्ययन छह अलग-अलग सहकारी समितियों का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत करता है, जिसमें उन विशेषज्ञों द्वारा शोध आधारित लेख शामिल हैं जिन्होंने उन सहकारी समितियों/संस्थाओं के साथ काम किया है। एक लेख कुडुम्बश्री के बारे में है जो लगभग 50 लाख सदस्यों वाली एक महिला सहकारी समिति है, जिसने ईपीईपी को लागू करने में प्रमुख भूमिका निभाई।

1957 में केरल की पहली लोकतांत्रिक सरकार कम्युनिस्टों के नेतृत्व में बनी थी। इसने तुरंत भूमि पुनर्वितरण सहित कृषि सुधार कार्यक्रम को लागू करना शुरू किया और सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास और पुस्तकालयों जैसे सार्वभौमिक सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों का विस्तार किया। ग्रामीण इलाक़ों के इस लोकतंत्रीकरण के साथ-साथ सामाजिक एकजुटता के सतत प्रयासों ने केरल के लाखों लोगों की बेहतर सामाजिक संकेतकों तक पहुँचने की ओर यात्रा को तेज़ कर दिया, जो दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय हैं: लगभग पूर्ण साक्षरता, बहुत कम शिशु और मातृ मृत्यु दर, उच्च जीवन प्रत्याशा और भारत में सबसे ज़्यादा मानव-विकास स्कोर इन संकेतकों में से कुछ हैं। समाज के लिए दशकों तक किए गए इन निवेशों ने लक्षित कार्यक्रमों के उभरने से बहुत पहले ही ग़रीबी उन्मूलन के लिए ज़मीन तैयार कर दी थी। कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले गठबंधनों ने 1957-1959, 1967-1969, 1980-1981, 1987-1991, 1996-2001, 2006-2011 और 2016 से वर्तमान तक केरल पर शासन किया है। यहाँ तक कि जब वामपंथी सत्ता नहीं थी, तब भी वाम दलों द्वारा अमल में लाई गई सामाजिक एकजुटता के कारण दक्षिणपंथी सरकारें इन लाभों को पूरी तरह से उलट नहीं सकीं।

दिनेश बीड़ी का रचना पाठ कार्यक्रम, कादंबरी (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), 2025

1990 के दशक में नवउदारवादी ऋण के साथ समाज कल्याण पर सरकारी ख़र्च में कटौती के मॉडल के उभरने के साथ इन परियोजनाओं को उलटने और निजीकरण अपनाने के लिए एलडीएफ सरकार पर दबाव बढ़ गया। हालाँकि, एलडीएफ ने एक अलग रास्ता चुना। 1996 में शुरू हुई विकेंद्रीकृत योजना के लिए जन योजना अभियान के माध्यम से सरकार ने 40% राज्य व्यय स्थानीय प्रशासन को हस्तांतरित कर दिया और स्थानीय प्रशासन से विकास परियोजनाओं के लिए लोगों की ज़रूरतों की पहचान करने, कार्यक्रमों को डिजाइन करने और बजट आवंटित करने के लिए कहा। सबके लिए एक-सा विकास मॉडल और ग़रीबी उन्मूलन एजेंडा विकसित करने के बजाय केरल के लोगों ने स्थानीय रूप से योजनाबद्ध और विशिष्ट परियोजनाएं बनाईं जो शोषित और हाशिए पर रहने वाले समुदायों, जिनमें आदिवासी, दलित और तटीय समुदाय शामिल हैं, के उत्थान पर केंद्रित थीं। इस अभियान ने लोकतांत्रिक सामाजिक नीति की परंपरा स्थापित की और सार्वजनिक संस्थानों और सहकारी समितियों के एक सघन नेटवर्क को पोषित किया – जो सभी ईपीईपी के लिए महत्त्वपूर्ण थे।

जब केरल के मुख्यमंत्री विजयन ने अत्यंत ग़रीबी के अंत की घोषणा की तो उन्होंने ईपीईपी की इस लंबी यात्रा को एक निरंतरता के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कई योजनाओं पर प्रकाश डाला जिनसे इस कार्यक्रम की राह मज़बूत हुई, जिनमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सार्वभौमीकरण शामिल है, जो लोगों को भोजन और ईंधन पर सब्सिडी मुहैया करवाती है और भूमिहीनता और बेघर होने की स्थिति को मिटाने के लिए दीर्घकालिक प्रयास करती है, जिसमें लाइफ़ मिशन भी शामिल है, जिसके तहत राज्य भर में 400,000 से अधिक परिवारों को घर दिए गए। इनमें हम केरल मॉडल के अन्य स्तंभों को भी जोड़ सकते हैं – ऐसी राज्य योजनाएँ जिन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य वितरण, शैक्षिक सहायता और रोज़गार के अवसरों का विस्तार किया है और बेशक सहकारी समितियों को भी। इन सब क़दमों ने मिलकर केरल के सामाजिक जीवन को बदल दिया और इसके वाम आंदोलन के चरित्र को मज़बूत किया है।

केरल की सहकारी समितियों के कर्मचारी, अभिनव वी.के. सतीश (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), 2025

यूएल रिसर्च सेंटर के साथ हमारा अध्ययन उन विभिन्न सहकारी समितियों की एक झलक देता देता है जिन्होंने केरल की अर्थव्यवस्था के लोकतंत्रीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1998 में राज्य के ग़रीबी उन्मूलन मिशन के हिस्से के रूप में कुडुम्बश्री का गठन हुआ, जिसका मलयालम में अर्थ है परिवार की समृद्धि। अब यह दुनिया का सबसे बड़ा महिलाओं का पारस्परिक सहायता नेटवर्क है। यह एक परिवर्तनकारी विचार के इर्द-गिर्द बनी है: यदि परिवार और समुदाय स्तर पर महिलाएँ आर्थिक जीवन को समझने का अपना आत्मविश्वास और क्षमता विकसित करें, तो विकास का केंद्र पितृसत्तात्मक संस्थानों से कामकाजी महिलाओं की ज़रूरतों की ओर ले जाया जा सकता है। सामूहिक खेत, सामुदायिक रसोई, सहकारी कौशल विकास की पहल और अन्य प्रकार के सामूहिक उद्यमों ने कुडुम्बश्री की महिलाओं को अपनी आय बढ़ाने और सार्वजनिक व निजी जीवन दोनों में अपनी शक्ति बनाने में सक्षम बनाया है। प्रतिस्पर्धा के बजाय एकजुटता पर और व्यक्तिगत उद्यमिता के बजाय सामूहिक उद्यमिता पर कुडुम्बश्री का ज़ोर इसे बाज़ार-केंद्रित ग़रीबी उन्मूलन रणनीतियों से अलग खड़ा करता है। हाल ही में, केरल सरकार ने अवैतनिक घरेलू कार्य के मूल्य को मान्यता देने की ज़रूरत के आधार पर एक महिला सुरक्षा योजना की घोषणा की है। 35 से 60 वर्ष की आयु की महिलाओं को प्रति माह ₹1,000 दिए जाएँगे। ऐसी पहल केरल में पितृसत्तात्मक संपत्ति संबंधों को बदलने के समग्र प्रयास का हिस्सा है।

कुडुम्बश्री सहकारी समितियों के एक व्यापक तंत्र का हिस्सा है जो केरल की ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई को बनाए रखती हैं। समग्रता से देखें तो यह पहल इस बात का शक्तिशाली उदाहरण हैं कि कैसे, मार्क्स के शब्दों में, ‘मज़दूरी पर आधारित श्रम भी केवल एक अस्थायी और निम्न अवस्था है, जो अंततः मिलकर किए जाने वाले श्रम के सामने समाप्त हो जाने के लिए अभिशप्त हैएक ऐसा श्रम जो स्वेच्छा से, तत्पर बुद्धि से और प्रसन्न हृदय से

अपना काम करता है। वे तमाम क़दम दर्शाते हैं कि सहकारी समितियां न केवल ग़रीबों के लिए एक प्रकार की सुरक्षा हैं, बल्कि लोकतांत्रिक योजना, तकनीकी प्रगति और सामाजिक गरिमा के वाहक भी हैं।

इनमें शामिल हैं:

  • ऊरांलुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी (यूएल)1925 में उत्तरी केरल में जाति-आधारित बहिष्कार का सामना कर रहे निर्माण श्रमिकों के लिए एक पारस्परिक सहायता सोसाइटी के रूप में स्थापित, यूएल एशिया की सबसे बड़ी श्रमिक सहकारी समितियों में से एक बन गई है, जो प्रमुख इंफ़्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में हज़ारों लोगों को रोज़गार देती है। यह दर्शाता है कि कैसे श्रमिक-नियंत्रित उद्यम जटिल सार्वजनिक कार्यों को पूरा कर सकते हैं, साथ ही अपने श्रमिकों और आसपास के समुदाय के लिए सामाजिक सुरक्षा और सामूहिक कल्याण का विस्तार कर सकते हैं।

  • केरल का सहकारी ऋण समितियों का नेटवर्क – चार हज़ार से अधिक सहकारी ऋण समितियाँ, जिनके लाखों सदस्य हैं जो ज़्यादातर कामकाजी वर्ग और हाशिए के समुदायों से हैं। ये समितियाँ लोगों के बैंकके रूप में काम करती हैं जो उन क्षेत्रों तक पहुँचती हैं जहाँ निजी वित्त नहीं पहुँचता। उधार लेने वालों को साहूकारों से बचाकर, भूमि सुधार को मज़बूती देकर और स्थानीय लोगों की बचत को जुटाकर ये गरीबी उन्मूलन के लिए वित्तीय आधार प्रदान करते हैं यहाँ तक कि इन्होंने यह काम 2018 में केरल में आयी बाढ़ और कोविड महामारी के दौरान भी जारी रखा।

  • केरल दिनेश बीड़ी वर्कर्स सेंट्रल कोऑपरेटिव सोसाइटी1969 में निजी बीड़ी फैक्ट्री मालिकों द्वारा नए श्रम संरक्षण लागू करने के बजाय अपने कार्यस्थल बंद कर देने के बाद गठित, दिनेश बीड़ी जल्द ही दक्षिण भारत में अग्रणी बीड़ी निर्माता बन गई। इसने अपने सदस्यों के लिए उच्च मज़दूरी, सामाजिक सुरक्षा और एक समृद्ध सांस्कृतिक जीवन सुनिश्चित किया और बाद में तंबाकू से दूर सामाजिक रूप से उपयोगी उत्पादन में रोज़गार बनाए रखने के लिए विविधीकरण किया।

  • सह्या टी कोऑपरेटिव फैक्टरी – इडुक्की की पहाड़ियों में, छोटे चाय बागान मालिकों और कृषि श्रमिकों ने 15,000 सदस्यीय थंकमणी सर्विस कोऑपरेटिव बैंक की मदद से 2017 में अपनी खुद की फैक्ट्री स्थापित की और बिग टीके एकाधिकार से अलग हुए। प्रतिदिन 15,000 किलोग्राम पत्तियों को प्रॉसेस करके और 150 से अधिक श्रमिकों को रोज़गार देकर, सह्या लगभग 3,500 बागान मालिकों के लिए बेहतर कीमत सुनिश्चित करती है और दिखाती है कि कैसे छोटे उत्पादक मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठ सकते हैं और गरिमापूर्ण आजीविका की रक्षा कर सकते हैं।

  • उदयपुरम लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी – कासरगोड की एक पंचायत, कोडम बेलूर में, सामंती ज़मींदारी, भ्रष्ट अधिकारियों और शोषक ठेकेदारों का सामना कर रहे ग्रामीणों ने 1997 में एक श्रम सहकारी समिति का गठन किया। लगभग दो सौ सदस्यों से यह अब लगभग तीन हजार श्रमिक-सदस्यों की समिति हो गई है, जिनमें कई आदिवासी शामिल हैं, जो अब पारदर्शी, निष्पक्ष शर्तों पर सार्वजनिक विनिर्माण कार्य करते हैं और स्थानीय विकास प्राथमिकताओं को ख़ुद आकार देते हैं।

समग्रता से देखें तो ये सहकारी समितियाँ कुडुम्बश्री सहित दर्शाती हैं कि जब राज्य नीति, सामाजिक सुधार और संगठित श्रमिक एक साथ आते हैं तो क्या कुछ संभव है। वे केवल बाज़ार के हमलों को कुछ कमज़ोर करने का ही काम नहीं करतीं। वे उत्पादन को मानवीय ज़रूरतों के इर्द-गिर्द पुनर्गठित करती हैं, काम की जगहों और गाँवों में लोकतंत्र को गहराई तक ले जाती हैं और व्यवहार में सहयोगी श्रम संभावित साम्यवाद की एक जीवंत झलक प्रस्तुत करती हैं। यहाँ तक कि समकालीन पूंजीवाद की कठोर परिस्थितियों में भी जो ईपीईपी जैसे कार्यक्रमों को आवश्यक बनाती हैं।

केरल की गरीबी खत्म करने की कहानी में अभी भी कई मुश्किलें हैं। राज्य भारतीय संघ का हिस्सा है, इसलिए नई दिल्ली की दक्षिणपंथी सरकार की नीतियों का उस पर असर पड़ता है। केरल में युवाओं को नौकरियाँ कम मिलती हैं, इसलिए वे अक्सर काम के लिए खाड़ी देशों और दुनिया के दूसरे हिस्सों में चले जाते हैं। राज्य पुराने उद्योगों से आगे बढ़कर  गुणवत्तापूर्ण उत्पादक शक्तियों के निर्माण का प्रयास करना चाहता है, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा राज्य से एकत्रित कर राजस्व तक उसकी सीमित पहुँच इसमें बाधा है। फिर भी, इन सीमाओं को दूर करने और केरल के लिए एक अधिक मजबूत विकास प्रतिमान बनाने के सतत प्रयास जारी हैं।

दिनेश अपैरल्स के दर्ज़ी, नवीन एस. (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), 2025

फ़रवरी 2021 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की थी कि देश के अंतिम ग़रीब लगभग 9.9 करोड़ चीनी जनता ने ख़ुद को अत्यंत ग़रीबी से बाहर निकाल लिया है। 140 करोड़ आबादी के देश ने संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के 2030 की निर्धारित समयसीमा से एक दशक पहले ही यह उपलब्धि प्राप्त कर ली। केरल ने अपना यह लक्ष्य अनुमान से एक साल पहले हासिल कर लिया। वियतनाम भी अत्यंत ग़रीबी को ख़त्म करने के इस लक्ष्य के क़रीब है और 2030 के अंत तक इसे हासिल कर लेगा। इसमें कोई हैरानी नहीं कि इन तीनों राष्ट्र/राज्य का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टियों के हाथ में है। मानव समाज की मुक्ति के प्रति यह कम्युनिस्ट पार्टियाँ प्रतिबद्ध हैं इसलिए ये यह सुनिश्चित करती हैं कि हर व्यक्ति एक गरिमापूर्ण जीवन जिए। ग़रीबी उन्मूलन अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है बल्कि मानव मुक्ति की लंबी यात्रा का एक अंग है यह एक जीवंत सामाजिक कार्यक्रम है, सिर्फ़ एक पड़ाव नहीं जिसे पार किया जाना हो। जैसा कि क्वामे न्क्रुमा ने कहा था हमेशा आगे, पीछे कभी नहीं

स्नेह सहित,

विजय