भविष्य समाजवाद का है – यह संभव है और ज़रूरी भी: बीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी तरह विलुप्त हो जाने का ख़तरा झेल रहा द्वीप राष्ट्र तुवालू अब दुनिया का पहला डिजिटल राष्ट्र बनने जा रहा है।
अल्फोंसो सोतेनो फर्नांडीज (मेटेपेक, मेक्सिको राज्य, मेक्सिको), आर्बोल दे ला विदा (जीवन का वृक्ष), 1975। खुली आग में पकाई गई मिट्टी, जिसे वार्निश विनाइल पेंट से रंगा गया है, 6 मीटर।
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
2022 में प्रशांत महासागर स्थित द्वीप राष्ट्र तुवालू के तक़रीबन 10,500 नागरिकों ने प्रवास शुरू कर दिया, वे एक देश छोड़कर दूसरे देश नहीं जा रहे, बल्कि अपनी ज़मीन छोड़कर डिजिटल दुनिया में जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र-तल से कम ऊँचाई वाले इलाक़े कुछ ही दशकों में रहने लायक़ नहीं रहेंगे, इसलिए तुवालू ‘पहला डिजिटल राष्ट्र’ बनने जा रहा है। यह अपनी धरती का एक त्रि-आयामी रिकॉर्ड तैयार कर रहा है, अपनी संस्कृति का संग्रहण कर रहा है और पहचान तथा सरकार चलाने के लिए डिजिटल प्रणालियाँ बना रहा है ताकि इसके नागरिक दुनिया के दूसरे हिस्सों में जा बसें तब भी इस देश का स्वरूप बना रहे और यह चलता रहे। जलवायु संकट ने अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के सामने एक भयानक प्रश्न खड़ा कर दिया है: बढ़ता हुआ समुद्र स्तर अगर किसी देश की धरती को निगल ले तब उस देश का क्या होगा? 2025 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के संबंध में राष्ट्रों के दायित्वों से जुड़े मामले में एक निर्णय दिया, जिसमें कहा गया कि ‘एक बार किसी देश के स्थापित हो जाने के बाद, उसके किसी एक घटक के ग़ायब हो जाने पर ज़रूरी नहीं कि उसके राष्ट्र होने का दर्जा ख़त्म हो जाए’।
अगर बढ़ते समुद्र स्तर की वजह से तुवालू की 26 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पानी में समा जाए तब भी वह अपने लोगों की कल्पना से ग़ायब नहीं होगा और न ही एक राष्ट्र होने का दर्जा खोएगा। लेकिन जीते-जागते लोग किसी डिजिटल संग्रह में तो नहीं रह सकते। साल 2014 में तुवालू और ऑस्ट्रेलिया के बीच फालेपिली मोबिलिटी पाथवे करार हुआ, इसमें अन्य मुद्दों के साथ ही यह भी तय हुआ कि हर साल तुवालू के 280 नागरिकों को इजाज़त दी जाएगी कि वे स्थाई रूप से ऑस्ट्रेलिया में रहने की अर्ज़ी दे सकें। संयुक्त राष्ट्र 1951 के शरणार्थी सम्मेलन के तहत ‘जलवायु संकट प्रभावित शरणार्थी’ को स्वीकार नहीं किया जाता, लेकिन इस संकट को झेल रहे इन नागरिकों ने अपने लिए ख़ुद एक रास्ता निकाल लिया है। उनके टापू शायद इस धरती से ग़ायब हो जाएँ लेकिन ये लोग दूसरी जगहें खोजेंगे और डिजिटल दुनिया में अपने देश का अस्तित्व बरक़रार रखेंगे।
भविष्य का अधिकार किसके पास है? अरबपतियों के पास बेशक है। दुनिया में अब तीन हज़ार से ज़्यादा अरबपति हैं, इनमें भी सबसे अमीर बारह लोगों के पास सबसे ग़रीब आधी इंसानी आबादी, यानी चार अरब लोगों से ज़्यादा संपत्ति है। उदाहरण के लिए इलॉन मस्क की कुल संपत्ति लगभग 840 अरब अमेरिकी डॉलर है। यानी मस्क दुनिया के 83% देशों की जीडीपी (अलग-अलग) से ज़्यादा संपत्ति के मालिक हैं, इन देशों की लिस्ट में अर्जेंटीना भी शामिल है। अर्जेंटीना में लोगों की औसत मासिक आय तक़रीबन 420 अमेरिकी डॉलर है जबकि मस्क की मासिक आय है 3 अरब डॉलर – अर्जेंटीना के एक औसत व्यक्ति से सत्तर लाख गुना ज़्यादा। अगर धन को संभावना का मानक स्वीकार किया जाए तो मस्क का भविष्य असीम दिखाई देता है। इसके विपरीत अर्जेंटीना के एक आम नागरिक का भविष्य हाथों से फिसलता नज़र आता है।
एंटोनियो सेगुई (अर्जेंटीना)। शीर्षकहीन, 1965। कैनवास पर ऑयल पेंट, 200 x 249 सेमी।
1969 में, रोबर्टो गोयेनेचे ने एस्तोर पियात्सोला और ओरासियो फेरेर के टैंगो ‘चिकिलिन दे बाचिन’ (बाचिन का छोटा लड़का) गाया, जो उस समय और अब भी कई अर्जेंटीना के बच्चों की वास्तविकता को दर्शाता है:
| Por las noches, cara sucia de angelito con bluyín vende rosas en las mesas del boliche de Bachín. Si la luna brilla sobre la parrilla come luna y pan de hollín. |
रात को मिट्टी सने चेहरे वाला, नीली जींस पहना नन्हा फ़रिश्ता बाचिन में टेबल टेबल जाकर बेचता है गुलाब। जब भट्टी पर पड़ती है चाँदनी, वो खाता है चाँद और धुएँ की रोटियाँ। |
एंटोनियो बर्नी (अर्जेंटीना)। हुआनितो लागुना (त्रिपतिचक / तीन-भाग वाली कृति), बिना तिथि। रंगीन लकड़ी और धातु का कोलाज। 220 × 300 सेमी।
इस गीत में जो नन्हा बच्चा है वो काम करने को मजबूर है। यह गीत हमें अतीत में ले जाता है लेकिन यह आज भी उतना ही सटीक है। आज अर्जेंटीना के आधे बच्चे ग़रीबी में जी रहे हैं। वहाँ के राष्ट्रपति हाविएर मिलेई की सरकार के हमलों की वजह से उनका भविष्य अधर में है। वे अपने आज में क़ैद हैं, ज़िंदा बचे रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं जैसे उन्हें सैकड़ों सालों तक तड़पते रहने का कोई श्राप मिला हो जिसे वो उतार नहीं पा रहे:
| Cada aurora, en la basura con un pan y un tallarín se fabrica un barrilete para irse, ¡y sigue aquí! Es un hombre extraño niño de mil años que por dentro le enreda el piolín. |
हर सुबह, कूड़े के ढेर से, ब्रेड और पास्ता के टुकड़ों से, वो अपने लिए एक आज़ादी की राह बनाता है – पर वो अब भी यहीं है! वो अजीब हज़ार सालों का आदमीनुमा बच्चा, उसकी आज़ादी की राह उसके अंदर किसी गाँठ में फँसी है। |
हमारा 100वाँ डोसियर भविष्य (मई 2026) इस बात पर ज़ोर देता है कि यह थोपा हुआ वर्तमान अस्थाई है। हमारा यह दस्तावेज़ कई कारणों से अलग है, लेकिन सबसे बड़ी वजह है इसकी गहरी दर्शनिकता। यह भविष्य को तारीख़ बदलने से कहीं अधिक मानकर उसका ऐतिहासिक-भौतिकतावादी नज़रिया पेश करता है। डोसियर बताता है कि भविष्य वर्तमान का तटस्थ विस्तार नहीं बल्कि वर्तमान से टूटकर एक समाजवादी दौर की तरफ़ बढ़ता हुआ क़दम है। कैलेंडर में क़ैद समय की अवधारणा आने वाले कल को ऐसे देखती है जैसे वह केवल आज की प्रतिलिपि हो सकता है जिससे विनाश एक न टाली जा सकने वाली घटना लगने लगती है। समय की यह समझ नाकाफ़ी है। हमें समय से जुड़ा एक ऐसा विचार चाहिए जो भविष्य में बदलाव और मानव विकास की संभावनाओं को खोले। उस नन्हे बच्चे को भरपेट खाना मिलना चाहिए, उसे पढ़ना चाहिए, खेलना चाहिए, आगे बढ़ना चाहिए। और तुवालू की जनता को उनके पैरों के नीचे ऐसी ज़मीन चाहिए जिसके डूबने का ख़तरा न हो ताकि वे अपनी जीवनयात्रा को जारी रख सकें। ये सिर्फ़ अधिकार नहीं बल्कि मानवीय आवश्यकताएँ हैं। लाखों करोड़ों लोगों को भूख और अशिक्षा में रहते देखना – यह मान लेना कि उनका कोई भविष्य नहीं – हममें से किसी को स्वीकार नहीं।
जूलियो ले पार्क (अर्जेंटीना), मोडुलासियोन 455 (मॉड्यूलेशन 455), 1981। कैनवस पर एक्रेलिक, 200 x 200 सेमी।
युद्ध, ऋण, जलवायु संकट और सामाजिक निराशा से त्रस्त दुनिया में, पूँजीवाद से परे एक भविष्य की कल्पना करने की क्षमता को भी व्यवस्थित रूप से बर्बाद कर दिया गया है। पूँजीवादी यथार्थवाद हमें सिखाता है कि वर्तमान व्यवस्था शाश्वत है, कि शोषण और ऊँच-नीच मानव जीवन के स्थायी तत्त्व हैं न कि वर्ग शक्ति द्वारा निर्मित ऐतिहासिक संरचनाएँ। लेकिन इतिहास हमें कुछ अलग ही सिखाता है। हर सामाजिक व्यवस्था तब तक शाश्वत लगती है जब तक उसमें दरार न दिखाई देने लगे। सामंतवाद ख़ुद को शाश्वत समझता था; औपनिवेशिक साम्राज्यों का मानना था कि उनका शासन हमेशा रहेगा। पूँजीवाद भी आख़िर ख़त्म हो जाएगा। इसलिए, भविष्य कैलेंडर का दिया हुआ कोई तोहफ़ा नहीं है। यह संघर्ष की ज़मीन है। हमारा डोसियर सवाल उठाता है: क्या कोई भविष्य है? और जवाब देता है: ज़रूर है। हम इसके निर्माण के लिए लड़ रहे हैं और हम इसे इस वक़्त भी इसका निर्माण ही कर रहे हैं।
भविष्य इस बात पर ज़ोर देता है कि पूँजीवाद से टूटकर अलग होना ज़रूरी है क्योंकि यह उस स्तर पर आ चुका है जहाँ इसकी उत्पादक क्षमता तो बहुत बढ़ गई है लेकिन इसके सामाजिक परिणाम भयानक हैं। आज दुनिया में भूख, अशिक्षा ख़त्म करने और कई बीमारियों की रोकथाम के लिए तमाम संसाधन, प्रौद्योगिकी विकास, श्रम बल और वैज्ञानिक ज्ञान मौजूद हैं। फिर करोड़ों लोग ग़रीबी में जीने को मजबूर हैं जबकि वित्तीय पूँजी अभूतपूर्व संपत्ति का संचय कर रही है। यह अंतर्विरोध तकनीकी नहीं राजनीतिक है। पूँजीवाद उत्पादक शक्तियों का विकास तो करता है लेकिन साथ ही साथ उनकी मुक्तिदायिनी क्षमता को बर्बाद करता चलता है।
होज़े वेंचुरेली (चिली), सेरिग्राफिया (सेरिग्राफ / रेशमी पट्टी मुद्रण), 1970, संस्करण 15/90। 260 x 430 मिमी।
हमारा डोसियर इस बर्बादी को लाने वाले ‘भविष्य के दुश्मनों’ की पहचान करता है: वित्तीय पूँजी, जो समाज को ऋण और उसके संरचनात्मक संयोजन के ज़रिए अनुशासित करती है; प्लैटफ़ॉर्म पूँजी, जो सामाजिक जीवन को अलग-थलग कर देती है और श्रम को अस्तित्वगत असुरक्षा में पुनर्गठित करती है; निष्कर्षणवाद, जो लाभ के लिए जीवन की पारिस्थितिक नींव को नष्ट कर देता है; और सैन्यवाद, जो हर संकट को युद्ध, निगरानी और दमन के औचित्य में बदल देता है। ये ताक़तें भविष्य के आने से पहले ही उसे हड़प लेने का प्रयास करती हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि आने वाला कल मानवीय गरिमा की बजाय संचय की आवश्यकताओं के अधीन रहे।
फिर भी भविष्य बचा हुआ है क्योंकि इंसान प्रतिरोध कर रहा है। पूरे वैश्विक दक्षिण में किसान, मज़दूर, औरतें और प्रचलित जेंडर मानदंडों को चुनौती देने वाले, प्रवासी और बेरोज़गार हर दिन ऐसी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्षरत हैं जो उनसे उनकी गरिमा छीनती है। ये संघर्ष अमूमन बिखरे हुए, असमान और अन्य ताक़तों द्वारा क़ब्ज़ा लिए जाने की संभावना रखते हैं लेकिन फिर भी इनमें एक स्थाई सत्य दिखता है: शोषित कभी भी पीड़ा को अपनी नियति के रूप में स्वीकार नहीं करता।
अल्फ्रेडो प्लैंक, इग्नासियो कोलंब्रेस, कार्लोस सेसानो, हुआन मैनुअल सांचेज़, और नानी कापुरो (अर्जेंटीना), चे (सामूहिक शृंखला), 1968। कैनवस पर ऑयल पैंट, प्रत्येक 195 x 150 सेमी।
हमारी परंपरा में आशा अमूर्त आशावाद से नहीं, बल्कि संगठित संघर्ष से जन्म लेती है। एक ऐतिहासिक शक्ति बनने के लिए, हालाँकि, इसके लिए संगठन, अनुशासन और अंतर्राष्ट्रीयता की आवश्यकता होती है। सहज विद्रोह सरकारों को गिरा सकते हैं, लेकिन केवल संगठित ताक़तें ही स्थायी विकल्पों का निर्माण कर सकती हैं। बीसवीं सदी की महान क्रांतियाँ इतिहास की घटनाएँ नहीं थीं; वे दशकों तक किए गए धैर्यपूर्ण राजनीतिक कार्य का परिणाम थीं। इसलिए आज भविष्य की बात करना यूटोपियन कल्पना नहीं है। यह इस बात की पुष्टि है कि वर्तमान व्यवस्था असहनीय है और बदली जा सकती है। भविष्य अपने आप नहीं आएगा। इसका निर्माण सामूहिक रूप से, सचेत रूप से, और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करना होगा। उस संघर्ष में ही आशा का सच्चा अर्थ निहित है।
स्नेह सहित,
विजय
पुनश्च: इस न्यूज़लेटर में प्रस्तुत कलाकृतियाँ, ‘द फ्यूचर’ डोसियर के लिए, क्यूबा के हवाना में स्थित कासा दे लास अमेरिकास के विशाल ‘आर्टे दे नुएस्ट्रा अमेरिका हायदी सांतामारिया’ संग्रह से साभार ली गई हैं। यह संग्रह मुख्यतः लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई कला का एक असाधारण अभिलेखागार है, जिसे कासा के दशकों लंबे साम्राज्यवाद-विरोधी सांस्कृतिक अंतर्राष्ट्रीयता के माध्यम से तैयार किया गया है।