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दुनिया में एक अरब से ज़्यादा लोग मानसिक रोगों से जूझ रहे हैं: उनचालीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)

एक अरब से अधिक लोग मानसिक रोगों से पीड़ित हैं, अधिकतर गरीब देशों में, फिर भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की ओर ध्यान नहीं दिया जाता।

अंतहीन शीशों का कमरा – सुदूर बसने वाली आत्माएँ, यायोई कुसामा (जापान), 2013

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

मैंने सोलह साल की उम्र में पहली बार डिप्रेशन’ (मानसिक अवसाद) शब्द सुना था। मेरी माँ मुझे बेंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निमहंस) लेकर गयी थीं क्योंकि मुझे बुरे सपने आते थे और दोपहर में घबराहट हुआ करती थी। मैं ख़ुशक़िस्मत था। आज भी दुनिया के सिर्फ़ 9% लोग मानसिक अवसाद का इलाज करवा पाते हैं। निमहंस में डॉक्टर ने देर तक मुझसे बात की और मैं कई दिनों तक वहाँ इलाज के लिए भर्ती रहा। मुझे समझ आ रहा था कि मेरी परेशानियों की वजह कुछ साल पहले हुई एक दर्दनाक घटना है, जब स्कूल में मेरा बलात्कार किया गया था।

इलाज के दौरान मेरे माता-पिता ने मेरा पूरा साथ दिया, मुझे उस भयानक दौर से निकल पाने का हौसला दिया और इस हिंसक घटना की वजह से होने वाली शर्मिंदगी से बचाए रखने की पूरी कोशिश की। मैं आज तक उनका शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने इतने प्यार से मुझे सँभाला और इस बारे में खुलकर बात करने के लिए तैयार होने का पूरा समय दिया। यह एक ऐसी घटना थी जिसे समझ पाना नामुमकिन था, जिसे समझ पाना किसी भी बच्चे के लिए नामुमकिन ही होना चाहिए। मानसिक अवसाद और उसके प्रभाव का साया किसी के भी आत्मविश्वास पर ज़िंदगी भर मँडराता रहता है। दवाओं से मदद होती है, दोस्तों के साथ और प्यार से भी लेकिन यह दुःख इतना जटिल होता है कि इससे पूरी तरह उबर पाने के लिए कोई इलाजनहीं।

इतने सालों में मैं अकेले ही इस घटना की शर्मिंदगी और घटनाक्रम के बारे में अस्पष्टता (क्या मैंने ही कुछ ऐसा किया जो यह मेरे साथ हुआ?) से जूझता रहा। ऐसी भयावह और दर्दनाक घटनाओं से गुज़रने वालों में यह शर्मिंदगी होना आम बात है और आजीवन इसकी टीस बनी रहती है, जिसके बाद सब बदल जाता। इसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि जिन लोगों ने कम उम्र के दौरान हिंसा झेली होती है उनमें आत्महत्या की दर काफ़ी ऊँची है। दवाओं और थेरपी की ज़रूरत पर जितना ज़ोर दिया जाए वह कम है। लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ क़र्ज़ चुकाने और हथियार ख़रीदने पर ज़्यादा खर्च किया जाता है और मानसिक स्वास्थ्य सहित स्वास्थ्य सेवाओं के बजट लगातार घटते जा रहे हैं।

चौराहेअलेक्जेंडर स्कंदरबोगोसियन (इथियोपिया), 1997

संयुक्त राष्ट्र की तमाम एजेंसियों, ख़ासतौर से विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के प्रति मेरे समर्थन की एक वजह यह भी है कि ये संस्थान मानसिक रोगों से जुड़ी समस्याओं और इनसे जूझ रहे लोगों के लिए मौजूद अपर्याप्त सुविधाओं पर नज़दीकी से नज़र बनाए रखते हैं। मेंटल हेल्थ ऐट्लस 2024 और वर्ल्ड मेंटल हेल्थ टुडे (दोनों 2025 में जारी) में बताया गया है कि एक अरब से ज़्यादा लोग मानसिक बीमारियों का शिकार हैं। आम धारणा के विपरीत इनमें से ज़्यादातर लोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। सबसे ज़्यादा होने वाले मानसिक रोग हैं ऐंज़ाइयटी (चिंता) और मानसिक अवसाद, पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएँ इनसे ज़्यादा जूझती हैं।

महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना भी ज़्यादा करना पड़ता है जिसकी वजह से उनमें मानसिक तनाव ज़्यादा देखा जाता है। साथ ही मानसिक रोगों से ग्रस्त महिलाओं को यौन तथा अन्य प्रकार की हिंसा का सामना भी अधिक करना पड़ता है। इन सबके बावजूद डबल्यूएचओ के अध्ययनों में पाया गया है कि थेरपी जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं तक महिलाओं की पहुँच बहुत कम है, इसके विभिन्न कारण हैं। डब्ल्यूएचओ ने भारत में हुए एक अध्ययन का हवाला दिया, जिससे पता चलता है अवसाद से पीड़ित महिलाओं में अन्य महिलाओं की तुलना में इस बात की संभावना तीन गुना अधिक थी कि वे अपनी मासिक घरेलू आय का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करें। मानसिक रोगों से जूझ रहे लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं और क़ानूनी मदद हासिल करने से तीन चीज़ें रोकती हैं ख़र्च, शर्मिंदगी और डर।

गुलाबी रेशमी टिड्डा, तिंग लीरन (चीन), 2019

इस सबसे जुड़े आँकड़े बहुत डरा देने वाले हैं। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर औसतन सरकारी खर्च कुल स्वास्थ्य बजट का 2% ही होता है, यह आंकड़ा 2017 से बदला नहीं है। 2022 में वैश्विक जीडीपी का महज़ 9.89% ही स्वास्थ्य पर खर्च किया गया। हालाँकि पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च को इस तरह आंकना काफ़ी भ्रामक है क्योंकि ज़्यादातर खर्चा वैश्विक उत्तर में बीमा कंपनियों और महँगी चिकित्सा प्रक्रियाओं पर होता है, जिसकी वजह से सही आँकड़ा नहीं जुटाया जाता। 2022 तक वैश्विक दक्षिण में स्वास्थ्य सेवाओं पर औसतन जीडीपी का 1.2% खर्च किया जाता रहा। यानी 141 सरकारों का स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च डब्ल्यूएचओ के जीडीपी के 5% के मापदंड से बहुत कम रहा (2010 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर जीडीपी का 6% स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जाए तो लोगों को अपनी जेब से जो भारी ख़र्च करना पड़ता है वह नहीं करना पड़ेगा)। उच्च आय वाले देशों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति 65 अमेरिकी डॉलर के हिसाब से ख़र्च किया जाता है जबकि निम्न आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति केवल 0.4 डॉलर।

आज एक तरफ़ ग़रीब देश निर्यात से होने वाली आय का 6.5% विदेशी क़र्ज़ चुकाने पर खर्च कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ सेना तथा पुलिस पर वैश्विक खर्च आसमान छू रहा है। ऐसे में लगता नहीं कि ज़्यादातर देश सामाजिक विनाश से हटकर सामाजिक कल्याण पर ख़र्च करना चाहेंगे।

शीर्षकहीन, ऑगस्टिन लेसेज (फ़्रांस), 1923

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं सहित एक सशक्त स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँचा खड़ा न कर पाने के क्या प्रभाव हैं?

  1. बड़ी संख्या में लोग आत्महत्या करने पर मजबूर होते हैं। बताया जाता है कि हर साल 7,20,000 से ज़्यादा लोग आत्महत्या करते हैं, यानी प्रति 1,00,000 व्यक्तियों पर लगभग 8 आत्महत्याएँ। हर देश में युवाओं में आत्महत्या की दर या तो स्थिर है या बढ़ रही है (इसका आख़िरी प्रामाणिक आँकड़ा साल 2021 का है)। दुनिया में होने वाली आत्महत्याओं में से लगभग तीन-चौथाई निम्न आय या मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। उदाहरण के लिए, अफ्रीकी देशों में यह आँकड़ा बहुत ऊँचा है, मौजूदा समय में प्रति 1,00,000 व्यक्तियों पर 11.5 आत्महत्याएँ।
  1. डब्ल्यूएचओ की एक नयी रिपोर्ट बताती है कि हर घंटे सौ लोग अकेलेपन की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं, यानी साल में कुल 8,71,000 मौतें। रिपोर्ट में समझाया गया है कि अकेलेपन या सामाजिक एकाकीपन के कारण हैं शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ (ख़ासतौर से मानसिक अवसाद), न्यूरोटिसिज्म जैसे व्यवहार संबंधी लक्षण, अविवाहित या बिना जीवनसाथी के रहना, अकेले रहना और अपने आस-पास के संरचनात्मक ढाँचे से जुड़ी समस्याएँ जैसे सार्वजनिक यातायात की कमी। इनमें से अधिकांश कारणों को सामाजिक मेलजोल बढ़ाकर सुलझाया जा सकता है, इसके लिए बहुत आसान क़दम उठाने होंगे जैसे बेहतर सार्वजनिक यातायात सुविधाएँ, सांस्कृतिक केंद्रों का निर्माण और सामूहिक सेवा केंद्रों का निर्माण।
  1. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में काम करने वाले कर्मियों को भी अत्यधिक काम और अपर्याप्त सुविधाओं के कारण मानसिक और शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। फ़िलहाल प्रति 1,00,000 व्यक्तियों पर केवल 13 मानसिक स्वास्थ्य कर्मी मौजूद हैं, निम्न आय वाले देशों में तो यह आँकड़ा प्रति 1,00,000 पर केवल 1 कर्मी का है। दुनिया के दो-तिहाई देशों, जिनमें से अधिकांश ग़रीब देश हैं, में 2,00,000 व्यक्तियों पर केवल एक मनोचिकित्सक है। सेवा भाव से इस पेशे में आने वाले लोगों पर इसका कितना दबाव पड़ता होगा। निम्न आय वाला ऐसा एक ही देश है जहाँ पर मैं ऐसे मानसिक स्वास्थ्य सेवाकर्मियों से मिला जो ख़ुश हैं, और वह देश है क्यूबा जहाँ सरकारी व्यवस्था आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से अवसाद ग्रस्त आबादी के बीच प्रतिकूल हालात में ज़मीनी स्तर पर काम करने कर्मियों को हर संभव मदद पहुँचाने का प्रयास करती है।
  1. स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े शोधों से साफ़ पता चलता है कि मानसिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों का इलाज अगर सामुदायिक स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों में होता है तो ज़्यादा अच्छे परिणाम मिलते हैं। क्योंकि यहाँ वे अपने परिवारों के पास होते हैं न कि सुदूर किसी मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में। इसके बावजूद दस में से एक से भी कम देशों ने मनोचिकित्सा अस्पतालों से हटकर सामुदायिक केंद्रों पर आधारित स्वास्थ्य सेवा ढाँचे को अपनाया है (वैसे तो मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ यूँ ही बहुत कम देशों में मिलती हैं)। फिर भी जिन देशों ने सामुदायिक केंद्रों पर आधारित व्यवस्था को अपनाया है उनमें से ज़्यादातर समाजवादी हैं। स्थानीय स्तर पर सामुदायिक केंद्र आधारित मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के ज़रिए इन समस्याओं से जूझ रहे लोगों को समाज का हिस्सा बनाए रखने में मदद मिलती है और साथ ही स्वास्थ्य कर्मियों को रोगियों की मनोसामाजिक परिस्थितियाँ तथा उनके समाज की सच्चाई को बेहतर समझने में मदद मिलती है। ऐसी परिस्थितियों में जो इलाज हो पता है वह सामाजिक और मेडिकल दोनों होता है।

हमें निश्चित तौर पर देखभाल व स्वास्थ्य पर सामाजिक संपदा ज़्यादा ख़र्च करनी चाहिए बनिस्बत विनाश और क़र्ज़ पर।

सीमित पुनर्जागरण, इमरान क़ुरैशी (पाकिस्तान), 2007

किशोरावस्था के दौरान जब मैंने पिंक फ़्लॉयड का गीत द डार्क साइड ऑफ़ द मून (1973) [चाँद की स्याह जानिब] सुना था तो मेरे लिए यह किसी रहस्योद्घाटन जैसा था। मैं कोलकाता के अपने घर में बैठा होता था, बाहर एक बड़े से पेड़ से छनकर दोपहर की रौशनी और ट्राम की आवाज़ कमरे में फैल जाया करती थी, और मैं बार-बार इस अल्बम को सुनता था। मेरे लिए बयान कर पाना मुश्किल है कि तब आँखें बंद करके मैं किस दुनिया में खो जाया करता था। इस अल्बम के गीत ब्रीद (इन द एयर) की दुनिया में:

साँस लो, हवा को अंदर जाने दो।
महसूस करने से घबराओ मत।
जाओ, पर मुझे छोड़कर नहीं।
देखो इर्द-गिर्द और चुनो अपनी ज़मीन।

तुम जियो और ऊँचा उड़ो
और तुम्हारी सारी हँसी, सारे आँसू 
और सारे स्पर्श, सारे दृश्य
बस यही तो है ज़िंदगी।

दौड़ो, नन्हे ख़रगोश, दौड़ो।
खोदो गड्ढा, सूरज को भूल जाओ,
और जब आख़िर ये काम ख़त्म होगा
थककर बैठ न जाना

अभी खोदना है एक और गड्ढा।

तुम जियो और ऊँचा उड़ो
लेकिन सिर्फ़ ऊँची लहर पर
संभलकर सवारी करके ही
तुम वक़्त से पहले पहुँचोगे मौत की शांति तक।

मुझे अक्सर लगता है कि इस गीत ने मुझे ज़िंदा रखा, ज़ाहिर है मेरे माता-पिता, रोज़ी सैम्यूअल, मेरे परिवार और कॉमरेडों के अलावा।

रुक जाओ, नन्हे ख़रगोश, देखो एक बार सूरज की ओर।

स्नेह सहित,

विजय