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मुश्किल को नामुमकिन क्यों माना जाए?: अट्ठाईसवाँ न्यूज़लेटर (2025)

समाजवाद के निर्माण में चुनौतियों और अंतर्विरोधों के बीच से गुज़रते हुए चीन ने दुनिया के सामने कई सफलताएँ पेश की हैं।

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

1957 में माओ त्सेतुंग ने Socialist Upsurge in China’s Countryside [चीन के ग्रामीण इलाक़ों में समाजवादी उत्थान] के प्रकाशन का काम संभाल रहे थे। यह एक तीन-खंड का दस्तावेज़ था जिसमें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने किसानों और ग्रामीण इलाक़ों की जनता की राजनीतिक शिक्षा के लिए लेख संकलित किए थे। इसके अगले साल इन तीन खंडों के संशोधित और क्षेत्रीय संस्करण भी छपे। इनमें से एक संस्करण में सहकारी आंदोलन के विषय में आन्यांग रीजनल कम्युनिस्ट पार्टी कमेटी की रिपोर्ट भी शामिल थी इसकी भूमिका माओ ने लिखी थी। इस रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि मुश्किल को नामुमकिन क्यों माना जाए?

यह मुश्किल काम था समाजवाद लाना, जिसे कई लोग असंभव मान बैठे थे। माओ लिखते हैं कि आन्यांग की खेती से जुड़ी जनता को पूँजीवाद और समाजवाद के बीच चुनना था – हालाँकि किसी भी समाजवादी संरचना में पूँजीवादी व्यवस्था के हल्के-फुल्के लक्षण रह ही जाएंगे क्योंकि वह सामाजिक उत्पादन के मौजूदा स्वरूपों के भीतर से ही उभरेगी। माओ ने लिखा ग़रीब जनता अपने जीवन का पुनर्निर्माण करना चाहती हैपुरानी व्यवस्था मर रही है। एक नयी व्यवस्था जन्म ले रही है। नामुमकिन काम अब मुमकिन होता नज़र आ रहा है। लेकिन इसके बावजूद माओ सतर्क थे। एक दूसरे लेख ‘They Insist on Taking the Road to Co-Operation’ [उनका आग्रह है सहयोग के मार्ग पर चला जाए] (20 सितंबर 1955) के प्राक्कथन में उन्होंने लिखा:

समाजवाद एक नयी चीज़ है। समाजवाद को लाने से पहले पुराने तरीक़ों के ख़िलाफ़ एक मज़बूत संघर्ष छेड़ना पड़ेगा। एक दौर में समाज का जो वर्ग अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है और पुराने तरीक़ों को छोड़ना नहीं चाहता। वही वर्ग दूसरे दौर में अपना रुख़ बदल लेता है और नयी व्यवस्था का समर्थन करता है।

जब से समाजवादी ताक़तों ने एक ऐसा समाज बनाने की कोशिश शुरू की है जो पूँजीवादी बर्बादी से मुक्त हो, तब से ही उनके सामने पहले से मौजूद सामाजिक संबंधों से उबर पाने की चुनौती खड़ी रही है। पूँजीवादी व्यवस्था के तहत संसाधनों के आबंटन के तरीक़े जैसे लाभ प्रोत्साहनइत्यादि की वजह से सामाजिक प्रक्रियाओं पर काफ़ी हद तक निजी नियंत्रण हो जाता है जिससे अपार नुक़सान होता है और असमानता पैदा होती है। जब समाजवादियों ने ऐसा समाज स्थापित करने की कोशिशें कीं जहाँ श्रम को एक उत्पाद ना समझा जाए (जो कि पूँजीवाद के सबसे केंद्रीय विचारों में से एक है) तो उन्होंने काम के घंटों के मुताबिक़ श्रमिकों को वाउचर देने जैसे नए प्रयोगों द्वारा वेतन व्यवस्थाएँ बदलने की कोशिश की। श्रम को उत्पाद समझने वाले पूँजीवाद के केंद्रीय विचार से अलग हो पाना आसान नहीं बल्कि यह एक संघर्ष भरी लंबी प्रक्रिया है जिसमें सामाजिक जीवन के कई हिस्सों (जैसे स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और यातायात) को उत्पाद समझने के विचार को भी ख़त्म करना होता है। और साथ ही ऐसे तंत्र भी खड़े करने होते हैं जिनके तहत लोग निजी ज़रूरतों का सामान प्राप्त कर पाने के लिए वेतन पर निर्भर नहीं रहें। 1917 में यूएसएसआर और 1949 में चीन की तरह जब भी समाजवादी ताक़तों ने राज्यसत्ता हासिल की उन्हें निम्नलिखित उलझनों से जूझते हुए समाजवाद के बुनियादी स्वरूप के निर्माण के लिए संघर्ष करना पड़ा है: 

  • सूचना प्रबंधन के सीमित तंत्र: समाजवादी अर्थव्यवस्थाएं विशाल और जटिल थीं लेकिन उनके पास एक ताक़तवर अर्थव्यवस्था के लिए उचित योजना तैयार करने के लिए सारा डाटा इकट्ठा करने और उसे प्रॉसेस करने के उपयुक्त तंत्र नहीं थे – आज बेहतरीन कम्प्यूटिंग तकनीकी विकास के बावजूद यह चुनौती बरक़रार है।

  • निर्णय-प्रक्रिया में बुनियादी अनिश्चितता: योजना बनाने वालों को अनिश्चित परिस्थितियों में बजट और निवेश के लिए आबंटन करने होते थे, ख़ासतौर से इसलिए ताकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हो रहे तेज़ बदलावों और विकास की वजह से बड़े-बड़े निवेश बेकार न हो जाएँ।

  • दीर्घकालिक योजना और तात्कालिक माँग के बीच का टकराव: केंद्रीय योजनाएँ अक्सर उपभोक्ताओं की बदलती पसंद के बीच टकराव की स्थिति रहती है जिससे उनकी तात्कालिक पसंद के हिसाब से दीर्घकालिक योजनाओं को ढाल पाना मुश्किल हो जाता है।

  • परस्पर विरोधी राजनीतिक उद्देश्य: आर्थिक लक्ष्य हमेशा राजनीतिक रूप से एकीकृत नहीं होते थे। और विभिन्न योजनाओं में निहित एक-दूसरे से संघर्ष करते दृष्टिकोण अक्सर चालाक नौकरशाही को बढ़ावा देते हैं।

समाजवादी ताक़तें जब राज्यसत्ता हासिल करती हैं तो उनके पास उपरोक्त और अन्य समस्याओं से उबरने का कोई एक फ़ार्मूला नहीं होता। इन्हें प्रयोगों से ही सुलझाना पड़ता है, जैसे कि एक चीनी कहावत है 摸着石头过 (पत्थरों को टटोलते हुए ही नदी पार की जा सकती है), लेकिन उसके लिए भी नदी में उतरना और आगे बढ़ने का प्रयास करना अनिवार्य है। इसलिए ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित वेनहुआ ज़ोंगहेंग का जून 2025 का अंक Chinese Experiments in Socialist Modernisation’ [समाजवादी आधुनिकीकरण के चीनी प्रयोग] पर केंद्रित है। इसका पहला लेख चीनी लेखक ली थूओ ने लिखा है जिसका शीर्षक है ‘On the Experimental Nature of Socialism and the Complexity of China’s Reform and Opening Up’ [समाजवाद के प्रयोगात्मक स्वरूप और चीन में सुधारों तथा उदारीकरण की पेचीदगियों के विषय में]। ली थूओ का यह बेहतरीन लेख पेरिस कम्यून से लेकर चीन में सुधारों और उदारीकरण तक को समेटता है। इस लेख के प्रमुख विचारों में से एक यह है कि समाजवादी क्रांतियाँ, ख़ासतौर से उपनिवेश रह चुके या अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में, एकाएक ‘संपूर्ण समाजवादकी स्थिति में छलांग नहीं लगा सकतीं। लेनिन के हवाले से लेख में कहा गया है कि इन क्रांतियों को अलग-अलग तरह के समाजवादी राज्य गढ़ने की विभिन्न, त्रुटिपूर्ण और ठोस प्रयासों की एक शृंखलासे होकर गुज़रना पड़ता है।

मैं यहाँ अलग-अलग तरह के समाजवादी राज्योंपर ज़ोर देना चाहूँगा। इसका कोई ख़ाका नहीं है लेकिन ऐसे उदाहरण हैं जिनका अध्ययन किया जाना चाहिए और ऐसे इतिहास भी जिन्हें सही से समझा जाना चाहिए। और यही ली थूओ अपने लेख में किया है जिसके अंत में वे चीन की तेज़-गति की रेल प्रणाली के निर्माण की अद्भुत घटना का ज़िक़्र करते हैं। 

इसमें अगला लेख मंग चिए और झांग ज़पिन का लिखा हुआ है और इसका शीर्षक है ‘Industrial Policy with Chinese Characteristics: The Political Economy of China’s Intermediary Institutions’ [चीनी विशेषताओं वाली औद्योगिक नीति: चीन के मध्यवर्ती संस्थानों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था]। यह लेख चीन के समाजवादी आधुनिकीकरण की सावधानी से जाँच करती है, यह सिर्फ़ उस पर मुग्ध नहीं होता बल्कि नज़दीकी से उसका अध्ययन करता है। चीन की बाज़ार अर्थव्यवस्था पर जब भी मैं मंग चिए का कोई व्याख्यान सुनता हूँ या उनका कोई लेख पड़ता हूँ तो मैं उनके इस आग्रह से बहुत प्रभावित होता हूँ कि आधुनिक चीन के लिए जिन फ़ैक्टरियों में सामान बनाया जा रहा है उन्हीं में सक्रिय रिसर्च द्वारा सिद्धांतों का निर्माण किया जाए। मंग चिए और झांग ज़पिन का लेख भी यही करता है। यह तेज़-गति की रेल के निर्माण की विभिन्न फ़ैक्टरियों में फ़ील्ड रिसर्च को अपना आधार बनाता है।     

लेखकों ने पाया कि चीन की तेज़-गति रेल की उत्पादन प्रणाली तो सरकारी क्षेत्र में तैयार की गई लेकिन इसे एक रचनात्मक बाजारढांचे के तहत संकल्पित किया गया था, जहाँ सरकारी-आंतरिक प्रतिस्पर्धानवाचार का इंजन बनी। दूसरे शब्दों में, चीन सरकार ने एक ऐसा बाज़ार रचा जिसमें न केवल लाभ-केंद्रित निजी क्षेत्र शामिल था, बल्कि एक उत्पाद-उन्मुख सार्वजनिक क्षेत्र भी था, जहाँ संस्थान राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते थे। इस पूरी प्रणाली के लिए वित्त राज्य-स्वामित्व वाले वित्तीय संस्थानों से आया, जिसने पूँजी संचय को सामाजिक उपयोग की दिशा में मोड़ा, न कि केवल ऊँचे मुनाफ़े की ओर। मंग चिए और झांग ज़पिन के शब्दों में, “राज्य-स्वामित्व वाली पूँजी का प्राथमिक लक्ष्य समाजवादी उत्पादन के उद्देश्यों को लागू करना और राष्ट्रीय विकास योजनाओं व रणनीतियों द्वारा निर्धारित कार्यों को पूरा करना है।” यह निबंध मंग चिए और उनके सहयोगियों के एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है, जिसमें वे चीन द्वारा विकसित उत्पादन संबंधों और नवाचार की प्रणाली को समझने की कोशिश कर रहे हैं यह जाँच का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है क्योंकि देश नई गुणवत्ता वाले उत्पादक बलों‘ (new quality productive forces) के युग में प्रवेश कर रहा है, जो समकालीन चीनी विकास नीति में एक प्रमुख अवधारणा है। 

वेनहुआ ज़ोंगहेंग के इस नवीनतम अंक का एक प्रमुख विचार यह पेश करना है कि समाजवाद के निर्माण के दौरान भी वर्ग संघर्ष जारी रहता है। यानी उत्पादक शक्तियों के विकास और अधिक समतामूलक सामाजिक संबंधों की स्थापना के रास्ते में तमाम प्रयोग करके यह देखना पड़ता है कि क्या काम करता है और क्या नहीं। इस प्रक्रिया में चीन के भीतर एक निरंतर विचारधारात्मक संघर्ष चलता रहा है क्योंकि पूंजीपति फिर से मज़बूत होने के तरीक़े ढूंढते रहते हैं। लेकिन चीन की समाजवादी व्यवस्था के तहत वहाँ का पूँजीपति वर्ग मीडिया, वित्तीय व्यवस्थाओं, राजनीतिक दलों या अन्य संस्थानों में स्वामित्व के ज़रिए ख़ुद को एक राजनीतिक ताक़त रखने वाले वर्ग के तौर पर संगठित नहीं कर सकता। वे अपने मुनाफे को स्वतंत्र रूप से विदेश नहीं ले जा सकते या जहाँ चाहें वहाँ निवेश नहीं कर सकते। पूंजी नियंत्रण सहित कई रणनीतिक रुकावटें हैं जो पूंजी के प्रवाह को विनियमित करती हैं और चीनी पूंजीपतियों को कुलीनतंत्र में बदलने या अपने देश में निवेश करने से इनकार करने से रोकती हैं (एक ऐसी समस्या जिसका सामना वैश्विक उत्तर और दक्षिण दोनों की कई सरकारों को करना पड़ता है, जहाँ कुलीनतंत्र अपनी पूंजी को जहाँ चाहें ले जा सकता है और यहाँ तक कि बुनियादी ढाँचे या उद्योग में निवेश करने से इनकार करके हड़तालपर भी चला जाता है)। चीन की पूंजी देश के भीतर ही रहती है और एक राज्य-स्वामित्व वाली बैंकिंग प्रणाली की पहुँच में रहती है, जो उस पूंजी को राष्ट्रीय विकास योजना के दायरे में होने वाले काम के लिए लगाती है। पूंजीपति देश में काम कर सकते हैं, लेकिन वे व्यवस्था पर हावी नहीं हो सकते हैं और न ही अपने लाभ-केंद्रित व्यवहार को सर्वोपरि बना सकते हैं। इस तरह वर्ग संघर्ष जनता के पक्ष में झुका हुआ है। यही वह बात है जो चीन की समाजवादी व्यवस्था को अन्य देशों की पूंजीवादी व्यवस्थाओं से अलग करती है।

द जर्मन आइडियोलॉजी (1846) में मार्क्स और एंगेल्स ने युगों की कीचड़‘ (‘muck of ages’) के बारे में लिखा था जिसे एक नई दुनिया के जन्म के लिए हटाने की आवश्यकता थी। इस हटानेकी प्रक्रिया में बहुत लंबा समय लगने वाला है।

अभी लक्ष्य दूर है लेकिन उसकी ओर बढ़ना भी जारी है।

स्नेह सहित,

विजय