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ग़ज़ा पट्टी में जनसंहार कर रहा है इज़राइल: चालीसवां न्यूज़लेटर (2025)

7 अक्टूबर 2025 को ग़ज़ा में जारी इज़राइली जनसंहार को दो साल हो जाएँगे। इस दौरान 66,000 फिलिस्तीनियों की मौत ही चुकी है।

समंदर मेरा है, स्लिमान मान्सूर (फिलिस्तीन),2016

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

7 अक्टूबर 2025 को ग़ज़ा में इज़राइल द्वारा किए जा रहे जनसंहार को दो साल हो जाएँगे। फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के आधार पर फिलिस्तीन में हो रही मौतों का विश्व स्वास्थ्य संगठन का डाटा पेज बताता है कि पिछले दो वर्षों में ग़ज़ा में लगभग 66,000 फिलिस्तीनियों की मौत हुई है यानी ग़ज़ा में रहने वाले प्रत्येक 1,000 लोगों में से 30 (हालाँकि, संभव है कि आँकड़ा इससे बहुत अधिक हो क्योंकि मंत्रालय ने अक्सर यह स्वीकार किया है कि मौतों का रिकॉर्ड रखने की उसकी कोई क्षमता नहीं है और वह नहीं जानता कि इतने सारे मलबे के नीचे कितने लोग दफ़्न हैं)।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के अनुसार, 50,000 फिलिस्तीनी बच्चे या तो मारे गए हैं या घायल हुए हैं। जैसा कि यूनिसेफ के मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के क्षेत्रीय निदेशक और यूनिसेफ से बीस साल से जुड़े, एडौर्ड बेइगबेडर ने कहा:

ये बच्चे – जिन्हें क़तई सिर्फ़ आँकड़ों में समेट नहीं दिया जाना चाहिए था- अब अकल्पनीय भयावहताओं की एक लंबी, दारुण सूची का हिस्सा हैं: बच्चों के अधिकारों के गंभीर उल्लंघन, उन तक सहायता न पहुँचने देना, भुखमरी, लगातार जबरन विस्थापन, और अस्पतालों, जल प्रणालियों, स्कूलों और घरों की तबाही। संक्षेप में, ग़ज़ा पट्टी में मौजूद लोगों की पूरी ज़िंदगी को ही बर्बाद किया जा रहा है।

बेइगबेडर का बयान पिछले दो वर्षों के तथ्यों के आकलन पर आधारित था। वास्तव में, इससे एक साल पहले, संयुक्त राष्ट्र की फिलिस्तीनी एजेंसी (UNRWA) के आयुक्त जनरल फिलिप लज़ारिनी ने कहा था कि इज़राइल की बमबारी के कारण हर दिन, दस बच्चे अपना एक या दोनों पैर खो रहे हैं। कुछ महीने बाद, संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता समन्वय कार्यालय की लिसा डॉटन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि आधुनिक इतिहास में विकलांग हुए बच्चों की सबसे बड़ी संख्या ग़ज़ा में है। इन ख़बरों पर मुख्यधारा के मीडिया में बहुत कम या बिलकुल ही ध्यान नहीं दिया गया।

मातृभूमि, हलीमा आज़िज (फिलिस्तीन), 2023

16 सितंबर को, संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग (Independent International Commission of Inquiry) ने अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र पर बहत्तर पृष्ठों की एक रिपोर्ट जारी की, जो तथ्यों से भरी हुई थी और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि उचित आधारोंपर इज़राइली सरकार, उसके उच्च अधिकारियों और सेना ने जनसंहार की कार्रवाइयाँ (actus reus) की हैं और अब भी कर रहे हैं, और इन कृत्यों को करने की उनकी मंशा (mens rea) भी है। यह निर्णय अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा जनवरी 2025 में जनसंहार के संभावितसबूत मिलने के निष्कर्ष से कहीं अधिक व्यापक है। इस आयोग का नेतृत्व नवी पिल्ले कर रही हैं, जो दक्षिण अफ्रीकी उच्च न्यायालय और अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं और जिन्होंने 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया था। रिपोर्ट जारी होने के बाद प्रेस को दिए अपने बयान में वह साफ़-साफ़ कहती हैं: आयोग इस नतीजे पर पहुँचा है कि इज़राइल ने ग़ज़ा में जनसंहार किया है। यह स्पष्ट है कि ग़ज़ा में फ़िलिस्तीनियों को ख़त्म करने की मंशा है और इसके लिए अपनाए गए तरीक़े जनसंहार सम्मेलन में जनसंहार के निर्धारित मापदंडों को पूरा करते हैं

अब इस विषय पर और बहस करने की आवश्यकता नहीं है। इससे ज़्यादा मज़बूती और स्पष्टता से सच को नहीं रखा जा सकता।

मरियम, मोहम्मद अल-हवाजरी (फिलिस्तीन), 2015

सितंबर के मध्य में मैंने लेबनान में फिलिस्तीनी शरणार्थी शिविरों का दौरा किया, जहाँ का माहौल निराशा और जीवटता के बीच झूलता रहता है। लेबनान के तीन सबसे बड़े फिलिस्तीनी शिविरों में कम से कम चार पीढ़ियों के फिलिस्तीनी रहते हैं: अल-हिलवे, 1948 में साइदा में इंटरनेशनल कमिटी ऑफ द रेड क्रॉस (ICRC) द्वारा स्थापित; शातिला, 1949 में बेरुत में ICRC द्वारा स्थापित; और मार एलियास, 1952 में बेरुत में कॉन्ग्रिगेशन ऑफ सेंट एलियास द्वारा स्थापित।

  1. नक़बा (तबाही/ 1948 में फ़िलिस्तीनी जनता जब अपने घरों और ज़मीन से जबरन विस्थापित की गई तो उस घटना को नक़बा कहा गया) की पीढ़ी, जो 1948 में बच्चों या युवा वयस्कों के रूप में ज्यादातर वर्तमान के उत्तरी इज़राइल से लेबनान आई थी।
  2. फिलिस्तीनी शरणार्थियों की दूसरी पीढ़ी, जो शिविरों में जन्म लेने वाली पहली पीढ़ी थी। उन्होंने फ़तह (1957 में स्थापित), फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (1964 में स्थापित), और पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ़ पैलेस्टाइन (1967 में स्थापित) जैसे विभिन्न नए फिलिस्तीनी राजनीतिक संगठनों के माध्यम से सशस्त्र प्रतिरोध के फ़िदायीन (लड़ाकों) के रूप में मुख्य भूमिका निभाई।
  3. तीसरी पीढ़ी, जो 1970 और 1980 के दशक में पैदा हुई, जो लेबनान में इज़राइली क़ब्ज़े (1982-2000) के दौरान युवा हुई और पहले इंतिफादा (1987-1993) और दूसरे इंतिफादा (2000-2005) के दौरान उसकी राजनीतिक समझ विकसित हुई। उनमें से कई लोग पिछली पीढ़ी के संगठनों से अलग हो गए और पैलेस्टाइन इस्लामिक जिहाद (1981 में स्थापित) और हमास (1987 में स्थापित) में शामिल हो गए।
  4. चौथी पीढ़ी, जो 1990 के दशक और उसके बाद पैदा हुई, जो शिविरों में कम होते अवसरों तथा व्यर्थता और क्रोध की बढ़ती भावना के बीच पली-बढ़ी।

1948 से फिलिस्तीन में अपने घरों से दूर चार पीढ़ियाँ इन शिविरों में रह रही हैं। वे लोग दक्षिण की ओर देखते हैं और सोचते हैं कि कब उन्हें वापसी के अपने अधिकार का प्रयोग करने का मौका मिलेगा, एक अधिकार जिसकी गारंटी दिसंबर 1948 में संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 194 में दी गई थी।

चाहे वेस्ट बैंक हो, जॉर्डन हो या लेबनान, शिविरों में क्रोध और निराशा की भावना चरम पर है। वहां रहने वाले फिलिस्तीनी ग़ज़ा से आ रही तस्वीरों, पूर्ण विनाश और निरंतर जारी जनसंहार को देख रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे वे कुछ नहीं कर सकते। बंदूक उठाकर ग़ज़ा के लोगों की रक्षा के लिए लड़ने की इच्छा तो है लेकिन ऐसा कर पाना असंभव है। उन्हें लगता है इज़राइली उन्हें चिढ़ा रहे हैं, वे इज़राइली जो फिलिस्तीनी बच्चों की निर्मम हत्या कर रहे हैं। इनमें से कुछ युवाओं ने मुझे शातिला में कोने में ले जाकर एक वायरल वीडियो दिखाया, जिसमें सितंबर 2025 में बीजिंग में जियांगशान फोरम में एक चीनी प्रोफेसर, त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय के डॉ. यान ज़ुएतोंग, एक इज़राइली सैन्य प्रतिनिधि कर्नल एलाद शोशान से बहस कर रहे थे।

सितंबर 2025 में चीनी विद्वान का इज़राइली कमांडर के साथ विवाद

जब कर्नल शोशान ने जनसंहार का बचाव करने की कोशिश की, तो डॉ. यान ने बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘आपकी सरकार के पास कोई वैधता [या] अधिकार नहीं है कि वह तय करे या परिभाषित करे कि तथ्य क्या है। डॉ. यान ने आतंकवाद के बारे में शोशान की बड़बड़ाहट को काटते हुए सीधे तौर पर कहा कि बहुत अधिक प्रॉपगंडाफैलाया जा रहा है, और चंद इज़राइलियों को छोड़कर कोई इस पर विश्वास नहीं करता। डॉ. यान के ग़ुस्से ने युवा फिलिस्तीनियों को खुश किया, जिन्होंने अपनी भावनाओं को उनके शब्दों और दृढ़ विश्वास में देखा। उनके पास बाल की खाल निकालने का वक़्त नहीं है। वे चाहते हैं कि हिंसा ख़त्म हो और फिलिस्तीन आज़ाद हो।

फ़िलिस्तीनी नायक, नबील अनानी (फिलिस्तीन), 2010

इस बीच, ग़ज़ा शहर के मिदान अल-जुंदी अल-मजहूल (गुमनाम सैनिक का चौक) में, हवा में संगीत की धुन तैरती है। एडवर्ड सईद नेशनल कंज़र्वेटरी ऑफ म्यूजिक में संगीत शिक्षक अहमद अबू अम्शा, जिन्हें जनसंहार के दौरान कम से कम बारह बार विस्थापित किया गया है, ने बच्चों को इकट्ठा करके “ग़ज़ा बर्ड्स सिंगिंग” [ग़ज़ा के गाते पंछी] नामक एक समूह बनाया है। अबू अम्शा और उनके छात्र ऊपर से उड़ने वाले ड्रोन की गूंजती आवाज़ के बीच, गिटार बजाते और गीत गाते हैं।

ग़ज़ा बर्ड्स सिंगिंग अगस्त 2025 में ड्रोन की आवाज के साथ “शील शील या जमाली” गाते हुए

उनके सबसे लोकप्रिय गानों में से एक है “शील शील या जमाली” (बढ़ो, बढ़ो, बढ़ो ओ मेरे ऊँट), एक परिचित फिलिस्तीनी गीत:

बढ़ो, बढ़ो, बढ़ो ओ मेरे ऊँट,
अल्लाह के नाम पर बोझ उठा ले।
शहीद का खून इलायची की खुशबू से महकता है,
ओ रात, सुबह को रास्ता दे दे।

लानत, लानत ज़ालिम पर,
अल्लाह अपना फ़ैसला सुनाएगा।
सितारों भरी रात पर किसी का साया नहीं छा सकता
मैं उसे पुकारता हूँ।

हमें ज़ालिम को घुटनों पर लाना ही होगा।

स्नेह सहित,

विजय