चरम दक्षिणपंथ ने महिलाओं के विरुद्ध छेड़ी जंग: ग्यारहवाँ न्यूज़लेटर (2026)
हाल के वर्षों में दक्षिण अमेरिका के चरम दक्षिणपंथ ने महिलाओं और लैंगिक-यौन अल्पसंख्यकों के अधिकारों के ख़िलाफ़ एक अभियान शुरू कर दिया है।
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
पूरे दक्षिण अमेरिका में एक अजीब सी जंग शुरू कर दी गई है। यह सिर्फ़ संसदों और अदालतों में ही नहीं लड़ी जा रही बल्कि कक्षाओं, रसोईघरों, गिरजाघरों और इंटरनेट की अशांत दुनिया तक पहुँच चुकी है। इस जंग के निशाने पर हैं महिलाएँ, क्वीर और ट्रांस लोग और वे आंदोलन, जो मानते हैं कि ज़िंदगी जीने के और भी तरीक़े हो सकते हैं। मौजूदा ख़ास क़िस्म का चरम दक्षिणपंथ दावा करता है कि वह पितृसत्तात्मक परिवार, नैतिकता और परंपरा की रक्षा करता है। लेकिन इन बातों के नीचे एक और कार्यक्रम चल रहा है: उन तमाम ऊँच-नीच और भेदभावों को दोबारा स्थापित करना जिन्हें बनाए रखने वाली दुनिया फ़िलहाल ख़ुद डगमगा रही है।
दशकों तक, दक्षिण अमेरिका में महिलाओं के आंदोलनों ने सत्ता की नींव को हिलाया है। 1970 और 1980 के दशकों में तानाशाही के ख़िलाफ़ लड़े गए आंदोलनों से 21वीं सदी में स्त्रीहत्या के ख़िलाफ़ और प्रजनन अधिकारों के लिए हुए विशाल प्रदर्शनों तक महिलाओं और लिंग-जेंडर की अवधारणाओं से असहमत लोगों ने नई संभावनाओं का दायरा बढ़ाया है। उन्होंने वह सबके सामने रखा है जो कभी अदृश्य था। उन्होंने घंटों के उस अवैतनिक श्रम के बारे में बताया है जिससे समाज चलता है। उन्होंने उस हिंसा को उजागर किया है जो घरों में छिपी रहती है। उन्होंने इस बात को पुरज़ोर तरीक़े से रखा है कि देह, इच्छाएँ और पहचान पर राज्य या चर्च का अनुशासन नहीं हो सकता। और ये सब काम उन्होंने सड़कों पर किया – एक साथ।
हालाँकि, ये सब नवउदारवाद के लंबे साए में हुआ। पूरे दक्षिण अमेरिका में, और बाक़ी दुनिया में भी, देखभाल के काम का भार ज़्यादा-से-ज़्यादा महिलाओं के कंधों पर है। महिलाएँ कम वेतन पर ज़्यादा घंटों तक काम करती हैं जबकि लाखों तो अब भी आर्थिक स्वतंत्रता से वंचित हैं। अगस्त 2025 में मेक्सिको सिटी में हुए दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन में महिलाओं के सोलहवें क्षेत्रीय सम्मेलन में इस सच्चाई को पहचाना गया। वहाँ इन क्षेत्रों के देशों ने ट्लाटेलोल्को प्रतिबद्धता को स्वीकृति दी, जिसके तहत डेकेड ऑफ़ ऐक्शन (2025-2035) [क्रियान्वयन का दशक] तय किया गया। इसके ज़रिए व्यापक जेंडर समानता स्थापित करने और ‘केयर सोसाइटी’ [देखभाल का समाज] के निर्माण का निर्णय लिया गया – ऐसा समाज जहाँ देखभाल के काम, यानी मानव समाज के अस्तित्व को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी सामूहिक हो और इसका भार केवल महिलाओं पर नहीं लादा जाए। मेक्सिको की महिला सचिव (महिला मंत्रालय) सिटाल्ली एर्नान्देज़ मोरा ने अपने समापन भाषण में कहा यह प्रतिबद्धता आने वाले सालों के लिए एक नक़्शा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस क्षेत्र के देशों को मंज़ूर नहीं कि ‘अधिकारों को छीना जाए, हम किसी दोषी का सज़ा के बग़ैर छूट जाना बर्दाश्त नहीं करेंगे और अपने आंदोलनों के ज़रिए और अपने आपसी सहयोग के माध्यम से एक देखभाल आधारित समाज बनाएँगे जो शांति, न्याय, समानता और भविष्य की नींव बनेगा’। इस सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों ने उस सच को पहचाना जो महिला आंदोलन लंबे समय से उजागर करते आए हैं: कि मौजूदा व्यवस्था – पूँजीवादी व्यवस्था – श्रम के लैंगिक विभाजन के आधार पर टिकी हुई है जिसमें अवैतनिक घरेलू और देखभाल का काम परिवारों का अस्तित्व बनाए रखता है, श्रम बल का पुनरुत्पादन करता है और समाज को चलाता है, दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन में महिलाओं द्वारा किया गया यह अवैतनिक काम जीडीपी का 15.9%-25.3% है।
1975 में संयुक्त राष्ट्र ने मेक्सिको सिटी में अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष पर विश्व सम्मेलन का आयोजन किया था। इसके अगले साल इसने डेकड ऑफ़ ऐक्शन (1976-1985) की शुरुआत की, जिसका समापन 1985 में केन्या के नैरोबी में हुए विश्व सम्मेलन के साथ हुआ। अगस्त 2025 में उठाई गईं कई समस्याएँ चालीस साल पहले नैरोबी में उठाई गईं समस्याओं से ही मिलती-जुलती थीं। 2025 में सम्मेलन में साफ़ तौर से इन मुद्दों पर हुई प्रगति दिखनी चाहिए थी लेकिन यहाँ दिखाई दिया कि कैसे कई मुद्दों पर आगे बढ़ने की बजाय हालात फिर बिगड़ गए हैं – यह न सिर्फ़ राष्ट्र नीतियों से स्पष्ट था बल्कि महिलाओं की समानता को लेकर जिस भाषा का प्रयोग हो रहा था उससे भी साफ़ था।
संकट के दौर में, यथास्थिति से खुश साधन-संपन्न वर्ग प्रगति की राह में रुकावट खड़ी करने के लिए ‘दुश्मनों’ की खोज में रहता है। हालिया दशकों में ख़ास क़िस्म के चरम दक्षिणपंथ ने अपने एक मुख्य दुश्मन के रूप में एक ऐसी सोच को स्थापित किया है जिसे यह ‘जेंडर विचारधारा’ कहता है – ये शब्द अनगिनत भाषणों और प्रवचनों में दोहराए जाते हैं, इनके ज़रिए गरिमा की एक सहज सी माँग को भयानक आपदा में बदल दिया जाता है। इस सोच के मुताबिक़ स्त्रीवाद न्याय का आंदोलन नहीं, बल्कि मानवता के ख़िलाफ़ एक साज़िश है, क्योंकि विविधता एक मानवीय सच्चाई नहीं बल्कि सभ्यता के लिए ही एक ख़तरा है। डर की इस कहानी में, ‘परिवार’ का मतलब है माता-पिता और बच्चे, इसे एक ऐसे क़िले के रूप में पेश किया जाता है जिस पर हमला हो रह है। दुनिया के सामने जो संकट है उसकी असल वजह – सार्वजनिक खर्च में कटौती, शोषण और ग़रीबी – को बड़ी सलीके से छिपा दिया जाता है और उन आंदोलनों को इनके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जो दरअसल समाज को बेहतर बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस तरह संकट के कारणों के लिए जो ग़ुस्सा होना चाहिए था उसे ग़लत दिशा में मोड़कर बदलाव की किरण को ही शक़ के दायरे में डाल दिया है।
इसका सबसे साफ़ उदाहरण है Con Mis Hijos No Te Metas (‘हमारे बच्चों से खिलवाड़ मत करो’) नाम का अभियान। यह नारा सबसे पहले 2016 में कोलंबिया में विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुनाई दिया। ये प्रदर्शन यौन शिक्षा कार्यक्रमों के ख़िलाफ़ हुए थे जिन्हें इवेंजेलिकल चर्चों, रूढ़िवादी एनजीओ और दक्षिणपंथी नेताओं ने पूरे दक्षिण अमेरिका में फैला दिया। इन सरल से शब्दों के पीछे ऐसे संगठनों का पेचीदा जाल है जो जेंडर समानता के तथाकथित ख़तरों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन आयोजित करने, क़ानूनों को प्रभावित करने और सोशल मीडिया पर भारी विरोध करने का काम करता है – और यह सब ‘मासूम बचपन’ को बचाने के बहाने से किया जाता है। जबकि ये ताक़तें हिंसा के उन रूपों को छिपाती हैं जो महिलाओं के जीवन को बुनियादी तौर से प्रभावित करते हैं: पूरे दक्षिण अमेरिका के देशों में हुए राष्ट्रीय सर्वे बताते हैं कि 63% से 76% महिलाओं ने अपनी ज़िंदगी में कभी-न-कभी जेंडर आधारित हिंसा का सामना किया है, और इस क्षेत्र की हर चार में से एक महिला जीवन में कम-से-कम एक बार अपने अंतरंग साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार हुई है। चौंकाने वाली बात है कि 2023 में स्त्री हत्या के आँकड़े जारी करने वाले 18 दक्षिण अमेरिकी देशों में से 11 में यह दर प्रति 1,00,000 में 1 से अधिक पीड़िता की दर्ज की गई। पूरे दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन में उस साल 3,897 मामले दर्ज किए गए थे – यानी प्रतिदिन 11 मामले – यह दर लगातार बढ़ रही है। इन गंभीर समस्याओं के हल खोजने की बजाय ख़ास क़िस्म का चरम दक्षिणपंथ ‘जेंडर के विचार’ के ख़ौफ़ का इस्तेमाल कर उस सोच को दबाने की कोशिश कर रहा है जो असल में एक बेहतर दुनिया का रास्ता नई पीढ़ी को दिखा सकती है।
हमारा नया डोसियर, दक्षिण अमेरिकी चरम दक्षिणपंथ का स्त्री-विरोधी एजेंडा (मार्च 2026), चरम दक्षिणपंथ द्वारा छेड़े गए महिला विरोधी इसी युद्ध की पड़ताल करता है। हमने दिखाया है कि ये आंदोलन अकेले काम नहीं करता बल्कि वॉशिंगटन से बुडापेस्ट और ब्रासीलिया तक फैले रूढ़िवादी ताक़तों के एक बहुराष्ट्रीय जाल का एक हिस्सा है। कन्सर्वटिव पोलिटिकल ऐक्शन कॉन्फ़्रेन्स जैसे सम्मेलनों में चरम दक्षिणपंथी नेता, इवेंजेलिकल नेता और इन्हें आर्थिक मदद देने वाले अमीर लोग इकट्ठा होकर अपने इन अभियानों को ठोस आकार देते हैं। ऐसी जगहों पर स्त्री आंदोलन एक साझा दुश्मन बन जाता है और ‘आज़ादी’ की भाषा को तोड़-मरोड़कर इसका इस्तेमाल निजीकरण, अलगाव और ऊँच-नीच को बचाए रखने के लिए किया जाता है। सरहदों के आर-पार धन भेजा जाता है, रणनीतियाँ तैयार की जातीं और अपने विचारों को तराशकर बार-बार दोहराया जाता है। डिजिटल प्लैटफॉर्म जो बने ही उत्तेजना, डर और ग़लत खबरों को बढ़ावा देने के लिए, वे इस झूठ को सच से कहीं आगे कर देते हैं।
जैसे ही जेंडर-विरोधी आक्रामकता पूरे दक्षिण अमेरिका में फैली, उसका सामना हाल के सबसे शक्तिशाली स्त्रीवादी आंदोलनों (2015–2019) में से एक से हुआ। महिलाएँ गर्भपात के अधिकार की मांग को लेकर हरे रंग के दुपट्टे (ग्रीन स्कार्व्स) के साथ सड़कों पर उतर आईं। समुदायों ने जेंडर आधारित हिंसा के ख़िलाफ़ संगठित होना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय स्त्रीवादी प्रदर्शनों ने श्रम के शोषण को पितृसत्ता, नस्लवाद और संसाधन दोहन (एक्सट्रैक्टिविज्म) की हिंसा से जोड़कर दिखाया। ऐसा करके, उन्होंने एक मौलिक सच्चाई उजागर कर दी: जेंडर से जुड़े संघर्ष केवल पहचान या संस्कृति के बारे में नहीं है, बल्कि समाज की संरचना से जुड़े है। चरम दक्षिणपंथी एक व्यक्तिवादी और घोर निजी व्यवस्था चाहता है, जो सत्ता, ऊँच-नीच और आज्ञाकारिता से चलती हो – एक ऐसी दुनिया जहाँ पितृसत्तात्मक परिवार आर्थिक संकट के झटकों को इस तरह सोख लेता है कि महिलाएं अपनी आज़ादी और जीवन के निर्णयों का बलिदान देकर, अवैतनिक और अदृश्य देखभाल के काम में और भी अधिक घंटे लगाने को मजबूर हो जाती हैं। इस व्यवस्था में असमानता को स्वाभाविक मान लिया जाता है। लेकिन स्त्री आंदोलन कुछ और ही कल्पना करते हैं। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जो मुनाफ़े की बजाय देखभाल पर, प्रतिस्पर्धा की बजाय एकजुटता पर और संचय (पूंजी जमा करने) की बजाय जीवन पर आधारित हो। इन दो दृष्टिकोणों के बीच हमारे समय का संघर्ष है: पूंजीवादी बर्बरता या जीवन और गरिमा। पूरे दक्षिण अमेरिका में, शहर की सड़कों से लेकर मज़दूर-वर्ग के इलाक़ों और सामुदायिक रसोईघरों तक, लाखों लोग डर और ऊँच-नीच पर आधारित दुनिया की बजाय एक उज्ज्वल दुनिया के निर्माण पर जोर दे रहे हैं।
कुछ दिन पहले जब इज़राइल ईरान और लेबनान पर बमबारी कर रहा था, मैं मैक्सिकन स्त्रीवादी कवि रोसारियो कास्तेयानोस की एक संक्षिप्त जीवनी पढ़ रहा था, जिन्होंने 1971 से 1974 में अपनी मृत्यु तक इज़राइल में मैक्सिको की राजदूत के रूप में कार्य किया। तेल अवीव में उनका 49 वर्ष की आयु में बिजली का झटका लगने से निधन हो गया – दुर्घटना के अलग-अलग विवरण हैं, घर पर एक लैंप को छूने, नहाने के बाद बिजली का स्विच छूने या लैंप का प्लग लगाने से झटका लगने की बात कही जाती है। मुझे लगता है कि यह संवेदनशील महिला फिलिस्तीनियों पर क़ब्ज़े और 1973 के योम किप्पुर युद्ध से गहराई से प्रभावित हुई होगी। हालाँकि एक राजदूत के रूप में उन्होंने फिलिस्तीनियों की स्थिति के बारे में बहुत कम सार्वजनिक बयान दिए, लेकिन एक दिलचस्प कविता मौजूद है। 1972 में, मैक्सिकन अख़बार ‘एक्सेलसियोर’ में अपने नियमित कॉलम में, उन्होंने ‘पासापोर्टे’ (Pasaporte) नाम से एक कविता प्रस्तुत की, जो महमूद दरवेश (Mahmoud Darwish) की 1964 की कविता ‘जवाज अल-सफर’ (Jawaz al-Safar – पासपोर्ट) की याद दिलाती है। दोनों कविताओं में, दस्तावेज़ तटस्थ नहीं। वे जीवन को अनुशासित करते हैं, पहचान को निर्धारित करते हैं, और तय करते हैं कि किसकी मानवता मायने रखेगी:
एक औरत जो सोचती हो? नहीं, मैंने कभी कुछ नहीं सोचा।
न ही किसी और के विचार दोहराए कभी (शालीनता के ख़याल से या शायद कमज़ोर याददाश्त)।
कुछ कर-गुज़रने वाली औरत? नहीं, वो भी नहीं।
लोगों को तो बस मेरे हाथ-पैर का नाप ही देखना है।तो क्या, एक औरत जो बोलती है? नहीं, मैं अपनी बात बोलती नहीं।
लेकिन जो बोलती हूँ –
अधिकतर, अंतर्विरोधी, आह, ग़ैर-ज़रूरी,
सिर्फ़ ध्वनि, खोखले बनावटी शब्द,
किसी खेल, चुग़ली, झाग-से, अँधी खोह जैसे।लेकिन फिर भी पहचान पत्र के लिए
ज़रूरी है कोई शब्द, तो लिख दो
कि मैं हूँ एक नेक़ नीयत औरत,
और कि मैंने रस्ता बनाया है
सीधा और सरल, जहन्नुम जाने का।
स्नेह सहित,
विजय
पुनश्च: इस न्यूज़लेटर में प्रयुक्त चित्र ट्राईकॉन्टिनेंटल के कला विभाग की हास्य कलाकार डैनी रूगरी के Colectivo (कलेक्टिव, 2026) से लिए गए हैं।