क्या विकास और संप्रभुता का नया ढाँचा गढ़ सकते हैं वैश्विक दक्षिण के देश?: तीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
ऋण के बोझ से दबे होने के बावजूद वैश्विक दक्षिण के देशों में वैकल्पिक रास्ते खोजने का एक नया भाव उभरता दिख रहा है।
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
ग़रीब देशों से एक बेहद परेशान करने वाला आंकड़ा सामने आया है: 3.4 अरब लोग उन देशों में रहते हैं जो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से ज़्यादा ख़र्च सार्वजनिक क़र्ज़ का ब्याज चुकाने पर करते हैं। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) की एक नई रिपोर्ट में कहा गया कि 2024 में वैश्विक सार्वजनिक ऋण 102 खरब अमेरिकी डॉलर हो चुका है – इसमें एक तिहाई हिस्सा विकासशील देशों का है। इसका इन देशों पर काफ़ी गहरा प्रभाव पड़ा है: ऋणदाता इन अपेक्षाकृत ग़रीब देशों से अमीर देशों के मुक़ाबले ज़्यादा ब्याज लेते हैं, जिससे वैश्विक दक्षिण के देशों को ऋण चुकाना अपेक्षाकृत महँगा पड़ता है। उदाहरण के तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) अगर क़र्ज़ लेता है तो उसके लिए ब्याज दर ग़रीब देशों के मुक़ाबले औसतन दो से चार गुना कम होती है।
UNCTAD के विश्लेषण के मुताबिक़ 2023 में ग़रीब देशों ने ‘बाहरी क़र्ज़ चुकाने के लिए जो पैसा दिया, वह उन्हें नए क़र्ज़ के रूप में मिले पैसे से 25 अरब डॉलर ज़्यादा था’। आसान भाषा में कहें तो: बड़े-बड़े करदाता (जो ज़्यादातर वैश्विक उत्तर में स्थित हैं) विकासशील देशों की सामाजिक संपदा को लगातार हड़पते जा रहे हैं।
पिछले एक दशक में ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान का काम इसी पर आधारित रहा है कि कैसे वैश्विक उत्तर लगातार दक्षिण की सामाजिक संपदा चुराता जा रहा है। दूसरी डिलेमास ऑफ़ ह्यूमैनिटी कॉन्फ्रेंस (जो 2015 में ब्राज़ील में हुई) के बाद हमारे संस्थान की स्थापना हुई ताकि राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को बौद्धिक सहायता दी जा सके तथा मुक्ति के उनके संघर्ष में भागीदारी निभाई जा सके। इन सालों में हमारा काम चार प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित रहा है:
- आंदोलनों के कामों को उजागर करना जैसा कि 2024 के हमारे डोसियर The Political Organisation of Brazil’s Landless Workers’ Movement (MST) [ब्राज़ील के भूमिहीन मज़दूर आंदोलन (एमएसटी) की राजनीतिक संगठन प्रक्रिया] किया गया है।
- आंदोलनों के नज़रिए से मौजूदा व्यवस्था का विश्लेषण, जिसका उदाहरण है हमारी नोटबुक आर्थिक अवसाद की गिरफ़्त में दुनिया: संकट का एक मार्क्सवादी विश्लेषण। इसमें 2008 में यूएस के मोर्गेज (एक प्रकार का ऋण) संकट की वजह से आई तीसरी महामंदी के जारी कुप्रभावों की पड़ताल की गई है।
- विकास का एक वैकल्पिक ढाँचा तैयार करना जो आईएमएफ़ के ऋण-सरकारी ख़र्च में कटौती के राज से मुक्त हो। ऐसा ही एक विचार हमने 2025 के अपने एक डोसियर वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की खोज में पेश किया है।
- अपने न्यूज़लेटरों के ज़रिए दुनियाभर में हो रही घटनाओं और राजनीतिक आंदोलनों का एक स्पष्ट, आसान विश्लेषण पेश करना। यह न्यूज़लेटर एशिया, अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका और यूरोप से निकलते हैं जिनका मक़सद है बहस, स्पष्ट राजनीतिक समझ और अंतर्राष्ट्रवादी चेतना को बढ़ावा देना।
अपनी दसवीं वर्षगाँठ पर हमने डोसियर संख्या 90 निकाला है How the World Looks from Tricontinental (जुलाई 2025) [ ट्राईकॉन्टिनेंटल की नज़र में दुनिया] इसमें मौजूदा परिस्थितियों को लेकर हमारा सामान्य दृष्टिकोण दिया गया है। हमारा विश्लेषण पाँच प्रमुख विचारों पर टिका है:
- भूमंडलीकरण और नवउदारवाद ने वैश्विक उत्तर के पूँजीपति वर्ग को अपने देशों में उत्पादक निवेश से पीछे हट जाने का अवसर दिया, जिसकी वजह से गतिहीनता और समाज कल्याण में सरकारी ख़र्च में कटौती को बढ़ावा मिला।
- वैश्विक दक्षिण के देशों को यह समझ में आ गया कि अब वैश्विक उत्तर अंतिम ऋणदाता नहीं रह गया है इसलिए दक्षिण के देशों में आपसी सहयोग और विकास का विचार फिर से उभरा। इसकी परिणति हुई 2009 में ब्रिक्स का गठन में जो अब विस्तृत होकर ब्रिक्स+ (संस्थापक और नए सदस्य) बन चुका है।
- विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी उत्तरी अटलांटिक से हटकर पूर्वी और दक्षिणपूर्वी एशिया की ओर चली गयी है, क्योंकि अब इसी क्षेत्र में उत्पादन और प्रौद्योगिकी आविष्कारों के मुख्य केंद्र हैं।
- वैश्विक उत्तर सैन्य और संचार के ढाँचे पर अपने दबदबे के बावजूद आर्थिक रूप से अब अपेक्षाकृत कमज़ोर हो चला है जिसकी वजह से वह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर अपना राजनीतिक वर्चस्व बरक़रार नहीं रख पा रहा।
- विकसित होती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं (चीन की अगुआई में) से आर्थिक क्षेत्र में मुक़ाबला करने की बजाय यूएस के नेतृत्व में वैश्विक उत्तर चीन के ख़िलाफ़ एक नए शीत युद्ध की ओर बढ़ रहा है। इस युद्ध में सैन्य और आर्थिक दबाव का इस्तेमाल कर चीन के तकनीकी तथा औद्योगिक विकास को रोकने की कोशिश की जा रही है।
हमारे डोसियर का अंत होता है इन तमाम बदलावों के बीच वर्ग संघर्ष की मौजूदा स्थिति पर एक छोटी सी टिप्पणी के साथ:
यह दुनिया बदल रही है, यह नवउदारवाद और साम्राज्यवाद की ज़ंजीरों से छूटने तथा संप्रभुता और विकास मार्ग पर बढ़ने की कोशिश कर रही है। दुनियाभर में लोगों को समझ आ रहा है कि सामाजिक विकास पर सरकारी ख़र्च में कटौती करते जाना एकदम व्यर्थ है। लेकिन फ़िलहाल मुक्ति के ये प्रयास ज़्यादा मज़बूत नहीं हैं और ऐसे रूपों में उभरकर आ रहे हैं जिन्हें प्रगतिशील नहीं माना जाता। फ़िलहाल, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से अलग होने के प्रयास व्यापक स्तर पर नहीं हो रहे और न ही इतने मज़बूत हैं कि व्यवस्था में गुणात्मक फ़र्क़ ला सकें। लेकिन फिर भी बदलाव आएगा। यह विश्व में वर्ग संघर्ष के केंद्र में है। कुछ तो ज़रूर होगा।
बदलाव के प्रयासों की व्यापकता और गुणवत्ता यहाँ मुख्य बातें हैं। दुनिया में कई बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और ऐसी भी कई सरकारें हैं जो नवउदारवादी व्यवस्था से ख़ुद को अलग कर लेना चाहती हैं। लेकिन विद्रोहों की यह शृंखला अब तक यूएस और उसके सहयोगियों के वर्चस्व वाली वैश्विक व्यवस्था को बुनियादी रूप से बदल नहीं पाई है।
2010 के दशक की शुरुआत में वैश्विक दक्षिण में आईएमएफ़ द्वारा थोपी गई ऋण और सामाजिक विकास पर सरकारी ख़र्च की कटौती की नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों की एक बाढ़ सी आई थी। उस समय लगा था कि इस समस्या का कोई हल हो ही नहीं सकता। ये विरोध प्रदर्शन ही महामंदी (Great Depression) के बाद की पहचान बन गए। लेकिन फिर कुछ बदलाव नज़र आने लगा: एक अधिक आत्मविश्वास से भरे दक्षिण का उभार हुआ – इस आत्मविश्वास को हम वैश्विक दक्षिण का ‘नया मूड’ कहते हैं। यह नया मूड या भाव श्रमिक वर्ग और किसानों के जन आंदोलनों की वजह से नहीं पैदा हुआ था बल्कि वैश्विक दक्षिण की सरकारों द्वारा राजनीतिक और आर्थिक संप्रभुता को स्थापित करने के बढ़ते प्रयासों से उभरा था। ब्रिक्स का गठन इस नई सोच का एक प्रमुख संकेत था। इसका एक दूसरा संकेत है वैश्विक दक्षिण के हितों को ध्यान में रखते हुए एक नए विकास सिद्धांत की मांग और वैकल्पिक संस्थानों का निर्माण, जैसे 2014 में ब्रिक्स देशों द्वारा स्थापित ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक‘।
इन प्रयासों ने हमें प्रतिरोध के दौर से नवनिर्माण के दौर की ओर अग्रसर किया है। क्या ग़रीब देश विकास और संप्रभुता का एक नया ढाँचा तैयार कर पाएँगे? क्या यह नया ढाँचा पुरानी व्यवस्था को उखाड़ फेंक सकेगा? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब हमें इस दौर में खोजने हैं।
मुझे बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि इस नए ढाँचे के निर्माण में हमारे योगदान को आगे बढ़ाने के लिए ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में एक नए मुख्य अर्थशास्त्री जुड़ चुके हैं, एमिलियानो लोपेज़। एमिलियानो लोपेज़ का ‘निर्भरता सूचकांक‘ (डिपेंडेंसी इंडेक्स) और असमानता की भू-राजनीति पर काम अभूतपूर्व रहा है। वे हमारी टीम का नेतृत्व करते हुए नए विकास सिद्धांत के निर्माण में हमारे योगदान को आकार देंगे।
फ़िलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि आईएमएफ़ की सोच बरक़रार रहेगी या एक नया विकास सिद्धांत विकसित होगा जो विकास का एक नया ढाँचा हमारे सामने रखेगा।
स्नेह सहित,
विजय