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स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़, महान समंदर का दरवाज़ा: पंद्रहवाँ न्यूज़लेटर (2026)

ईरान के ख़िलाफ़ यूएस-इज़राइली युद्ध के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था नए संकट में फँसने जा रही है, जिसका सबसे बुरा असर ग़रीब देशों पर पड़ने वाला है।

आख़िरी झलक, लतीफ़ा बिंत मखतूम (यूएई), 2009.

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन। 

नोट: 7 अप्रैल को, भयानक नरसंहार की अपनी धमकी कि ‘आज रात एक पूरी सभ्यता ख़त्म हो जाएगी’ के बाद यूएस राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने कथित तौर पर ईरान के प्रस्तावों के आधार पर दो हफ़्तों के एक अस्थायी युद्धविराम पर सहमति जताई। 8 अप्रैल तक, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज से आवाजाही फिर से शुरू होने की संभावना है, हालाँकि शर्तें स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन अमेरिकी-इज़राइली हमले से स्ट्रेट में पैदा हुई अराजकता बनी हुई है, और क्षेत्र पर ख़तरा भी मंडरा रहा है। एक वास्तविक और स्थायी शांति आवश्यक है – लेकिन 7 अप्रैल को जो घोषित किया गया, वह शांति नहीं है, केवल दो सप्ताह के लिए टकराव को स्थगित किया जाना है।

तेरहवीं सदी में महान अरबी भूगोलवेत्ता याकूत अल-हमावी ने फ़ारस सागर (فارس) [इसे अब फ़ारस की खाड़ी कहा जाता है] को ‘महान समंदर की एक शाखा’ कहा था। अपने संग्रह मु’जम अल-बुल्दान (भूगौलिक विश्वकोष) में उन्होंने लिखा कि फ़ारस सागर से होकर ‘भारत, ओमान और बसरा के लिए जहाज़ जाएँगे’। होर्मुज़ उस समंदर का नाम नहीं था बल्कि एक ‘व्यापार का बड़ा बाज़ार था जिसके व्यापारी भारत और दूसरी जगहों पर रहते थे’।

सदियों बाद, इस जगह को स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ [होर्मुज़ जलडमरूमध्य] कहा जाने वाला था: ओमान की सल्तनत के मसुंदम प्रायद्वीप और इस्लामिक गणराज्य ईरान के बीच से गुज़रता चौवन किलोमीटर लंबा रास्ता। 

यह स्ट्रेट कभी भी एक अलग-थलग पड़ा भूगौलिक स्थान नहीं रहा है। यह अरब क्षेत्र को भारतीय उपमहाद्वीप, मलय द्वीपसमूह और आगे चीन तक से जोड़ने वाले समुद्री मार्ग का हिस्सा रहा है। सहस्राब्दियों तक हिंद महासागर में होने वाला व्यापार फलता-फूलता रहा और दालचीनी और हाथीदाँत जैसी विलासिता की वस्तुओं से लेकर घोड़ों और बाद में बारूद जैसे जंगी समान से लदे जहाज़ यहाँ से गुज़रते रहे। इतनी सदियों में स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर तमाम तरह के शासन रहे – सोलहवीं सदी में और सत्रहवीं सदी की शुरुआत में पुर्तगाली से लेकर उन्नीसवीं सदी से लेकर 1971 तक ब्रिटिश का दबदबा रहा और आधुनिक दौर में यह ओमान और ईरान के तहत है, फिर भी यह हमेशा खुला रहा। विशाल समंदर साम्राज्यवादी विजय और क्षेत्रीय युद्धों के दौरन भी बंद नहीं हुआ।

शीरीन और फ़रहाद का प्रस्थान, बाबक काज़मी (ईरान), 2012.

28 फ़रवरी को जब संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ग़लती करते हुए ईरान पर हमला किया तब तक इस स्ट्रेट के ज़रिए हो रहे व्यापार में कोई रुकावट नहीं थी। सब कुछ वैसा ही था जैसा सदियों से चला आ रहा था, विश्व अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए तेल और प्राकृतिक गैस जैसे संसाधनों की आवाजाही बेरोकटोक जारी थी। लेकिन स्वेज़ और पनामा जैसी दूसरी नहरों के साथ ऐसा नहीं है, ईरान और ओमान दोनों ने कभी भी स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से गुज़रने या उसकी देखभाल के लिए कोई फ़ीस नहीं माँगी।

इस जंग के शुरू होने के बाद या कहें कि मार्च के अंत में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से आवाजाही पर कुछ प्रतिबंध लगाए ताकि ईरान के नागरिकों और आधारभूत ढाँचे पर यूएस और इज़राइल के हमलों का जवाब दिया जा सके। इन प्रतिबंधों में शामिल था यूएस, इज़राइल और दूसरे विरोधी देशों के जहाज़ों के गुज़रने की मनाही; गुज़रने के लिए ईरानी अधिकारियों के साथ मिलकर काम करना; और कुछ जहाज़ों के लिए टोल जैसी फ़ीस देना जिसका भुगतान चीनी मुद्रा यूआन में हो। इसके साथ ही यूएस के हिंद महासागर में आईआरआईएस डेना को बमबारी कर डुबा देने से और स्ट्रेट के दोनों ओर लगातार मिसाइलें दागे जाने से बीमा कंपनियों को अपने प्रीमियम बढ़ाने का मौक़ा मिल गया, इससे भी जहाज़ों को यहाँ से ले जाने से बचा जा रहा है। इन वजहों से इस स्ट्रेट में आवाजाही 95% गिर गई है।

ज्ञात मानव इतिहास में पहली बार महान समुद्र का द्वार – स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ – लगभग बंद हो गया।

ईरान की सरकार को गिरा पाने में नाकाम होने के बाद ट्रम्प ने ईरान पर थोपी गई इस जंग का एक नया लक्ष्य तय किया स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को ‘खोलना’; दूसरे शब्दों में जंग से पहले की स्थिति में लौटना।

परियों की कहानियाँ, इब्राहिम बुसाद (बहरीन), 2023.

दुनिया में जितना भी तेल समंदर के रास्ते से जाता है उसका एक-चौथाई हिस्सा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से होकर गुज़रता है, एशिया का तो लगभग 90% (इसमें से तीन-चौथाई चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया आयात करते हैं)। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और तैयार पेट्रोलियम पदार्थों की आवाजाही में आई इस रुकावट ने सिर्फ़ इन देशों पर ही नहीं बल्कि सीधे-सीधे पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाला है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) की रिपोर्ट है कि ‘इसका प्रभाव इस क्षेत्र से बाहर तक हुआ है, ऊर्जा बाज़ारों, समुद्री यातायात और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं तक’। जैसे-जैसे प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ रहे हैं वैसे-वैसे नाइट्रोजन युक्त उर्वरक के दाम भी बढ़ रहे हैं। जैसे तेल और उर्वरक के दाम बढ़ रहे हैं वैसे ही खाद्य पदार्थों के दाम भी बढ़ रहे हैं – और यह सिर्फ़ फ़ौरी नहीं बल्कि सालों तक बढ़े रहेंगे क्योंकि उर्वरकों के दाम बढ़ने से फसल चक्र पर प्रभाव पड़ेगा। इस बीच बीमा प्रीमियमों में 300% उछाल आया और बांड प्रतिफल (बांड यील्ड) बढ़ रहे हैं, इससे क़र्ज़ लेना काफ़ी महँगा होता जा रहा है। इन सबको देखते हुए लगता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था एक संकट की ओर जा रही है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की रिपोर्ट है कि ‘यह झटका वैश्विक होते हुए भी एक समान नहीं है। ऊर्जा आयात करने वाले, निर्यात करने वालों से ज़्यादा ख़राब स्थिति में हैं। ग़रीब देश अमीर देशों के मुक़ाबले और वे देश जिनके पास भंडार दूसरों के मुक़ाबले काफ़ी कम हैं,  ज़्यादा ख़राब स्थिति में है’। परिणामस्वरूप, यूएनसीटीएडी (UNCTAD) ने भविष्यवाणी की कि मई की शुरुआत में ऋण चुकाने के बढ़ते बोझ तले दबे ग़रीब देशों को राजकोषीय तनाव का सामना करना पड़ेगा, जिससे ‘घर के बजट पर दबाव बढ़ेगा, संभावित रूप से आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ेगा और सतत विकास की ओर प्रगति मुश्किल होगी।’

ये सभी ग़रीब देश वैश्विक दक्षिण में हैं।

अंतिम मुक्तिदाता, मेहरदाद जाफ़री (ईरान), 2020.

आईएमएफ़ का पोर्टवॉच दिखाता है कि कैसे स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ जैसी समुद्री रुकावटें वैश्विक व्यापार नेटवर्क के हर हिस्से को प्रभावित करती हैं। 2021 में एवर गिवन नाम के एक जहाज़ की वजह से स्वेज कनाल में छह दिन तक आवाजाही बंद हो गई थी जिससे एक अरब अमेरिकी डॉलर का फ़ौरी नुक़सान और ज़रूरी आपूर्ति शृंखला में रुकावट की वजह से लंबी अवधि का नुक़सान हुआ। तभी यह साबित हो गया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इतनी नाज़ुक है कि एक घटना से भी उसे भारी नुक़सान होता है। यूएनसीटीएडी के रिव्यू ऑफ़ मैरिटाइम ट्रांसपोर्ट 2024 में चेतावनी दी गई कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में ऐसे कई अहम ‘अवरोध बिंदु’ (चेकपोईंट) हैं जिन पर पहले ही बहुत दबाव है – पनामा कनाल में सूखे की वजह से पानी की कमी हो गई है; लाल सागर-स्वेज कॉरिडोर में इज़राइल द्वारा फ़िलिस्तीनियों के जारी जनसंहार और इज़राइल पर यमन की जवाबी कार्रवाई की वजह से; और काले सागर में यूक्रेन युद्ध की वजह से। इसलिए, पिछले कुछ सालों में समंदर से व्यापार बढ़ने के बावजूद जिन रास्तों से व्यापार होता है वो काफ़ी कमज़ोर, ज़्यादा महँगे और युद्ध तथा रुकावटों के सामने कमज़ोर हो चुके हैं। स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में लगे प्रतिबंधों के पहले से ही वैश्विक चेकपोईंटों ने दिखा दिया था कि युद्धों के भूगोल के सामने वैश्विक अर्थव्यवस्था संस्थागत रूप से कितनी कमज़ोर है।

किस क़ीमत पर, महमूद अल-ज़दजली (ओमान), 2020.

मार्च के आख़िरी दिन यूएस के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने दावा किया कि ईरान जंग हार चुका है और वहाँ ‘नई सत्ता क़ाबिज़ हो चुकी है’। ऐसी बातों से वॉशिंगटन अपनी जीत घोषित करना और जंग को धीरे-धीरे ख़त्म करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ छेड़ी गई यूएस-इज़राइल की यह जंग रुके या न रुके, ग़रीब देशों का भारी आर्थिक नुक़सान तो हो चुका है। कई ग़रीब देशों के लिए तो यह जंग ऐसे समय पर आई है जब कि वे दशकों से नवउदारवादी पुनरसंरचना और क़र्ज़-सरकारी खर्च में कटौती को झेल रहे हैं। यह जंग इनमें से कई देशों को बेहद ख़राब हालात में ले जा सकती है इसलिए इसका जवाब देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत है। हम नहीं जानते कि ऐसा क़दम उठाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है कि नहीं। फिर भी ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से हम कुछ संभावित नीतियाँ पेश कर रहे हैं जिससे ईरान पर थोपी इस जंग के असमान परिणामों को जल्दी-से-जल्दी हल किया जा सके, ये नीतियाँ चार खंडों में विभाजित हैं:

  1. वित्तीय तरलता (फ़ायनैन्शल लिक्विडिटी) का विस्तार:
    • मुद्रा विनिमय लाइनों (करेंसी स्वैप लाइन) तक पहुँच प्रदान करें, जैसे कि पीपल्स बैंक ऑफ चाइना के माध्यम से, ताकि आयात-निर्भर देशों के लिए विनिमय दरों को स्थिर किया जा सके।
    • विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे बहुपक्षीय बैंकों के संकट विंडो के माध्यम से संभावित भुगतान संतुलन के झटकों के लिए त्वरित वित्त प्रदान करें।
    • रैपिड क्रेडिट फैसिलिटी (RCF) और रैपिड फाइनेंसिंग इंस्ट्रूमेंट (RFI) के माध्यम से वैश्विक दक्षिण के लिए आईएमएफ के आपातकालीन वित्तपोषण का विस्तार करें, जिसमें तेज़ और बड़े भुगतान हों और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि बिना किसी शर्त के।
    • आईएमएफ के अप्रयुक्त विशेष आहरण अधिकारों (SDRs) – जो सदस्य देशों द्वारा रखी गई आरक्षित परिसंपत्तियाँ हैं – को अमीर देशों से कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं की ओर पुनर्निर्देशित करें।
    • उधार लागत को कम करने के लिए आईएमएफ के अधिभार (सरचार्ज) को अस्थायी रूप से निलंबित करें।
  2. ऊर्जा मूल्य बफर (सुरक्षा कवच) प्रदान करें:
    • कम आय वाले देशों के लिए आवश्यक ईंधन आयात को सब्सिडी देने हेतु एक वैश्विक ईंधन मूल्य स्थिरीकरण कोष बनाया जाए।
    • बाज़ार को स्थिर करने और निगमों द्वारा मुनाफ़ाखोरी व क़ीमतों में मनमानी वृद्धि को रोकने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों के वितरण में समन्वय किया जाए।
    • तेल और प्राकृतिक गैस बाज़ारों में सीमित सौदेबाजी शक्ति वाले अल्पविकसित देशों के लिए ऊर्जा आपूर्ति गलियारों की गारंटी दी जाए।
    • नवीकरणीय और ऑफ-ग्रिड ऊर्जा के लिए एक विशाल आपातकालीन सब्सिडी प्रदान की जाए, जिसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षेत्रीय आपूर्ति विविधीकरण (वैकल्पिक पाइपलाइनों और भंडारण के माध्यम से) शामिल हो।
    • इन उपायों को ऊर्जा कंपनियों पर अस्थायी अतिरिक्त लाभ कर (विंडफॉल टैक्स) और वस्तु बाज़ारों में सट्टेबाजी विरोधी उपायों के माध्यम से वित्तपोषित किया जाए।

मेरे दोस्त, आलिया अल-फ़ारसी (ओमान), 2015.

  1. लॉजिस्टिक्स (रसद) का समर्थन और स्थिरीकरण करें:
    • ऊर्जा और शिपिंग बाज़ारों के लिए पारदर्शिता को लागू करके घबराहट-प्रेरित मूल्य वृद्धि को कम किया जाए।
    • उच्च जोखिम वाले मार्गों के लिए शिपिंग बीमा को सब्सिडी देकर आवश्यक आयातों पर लागत वृद्धि को कम किया जाए।
    • माल ढुलाई समानता योजनाओं (फ्रेट इक्वलाइजेशन स्कीम) को लागू करके ग़रीब देशों तक उच्च परिवहन लागत की भरपाई की जाए।
    • बंदरगाहों और प्रमुख अवरोध बिंदुओं (चोकपॉइंट्स) पर आवश्यक वस्तुओं के लिए त्वरित लेन (फास्ट लेन) बनाई जाएं।
  2. खाद्य क़ीमतों को स्थिर करने के लिए हस्तक्षेप करें:
    • खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की वैश्विक खाद्य आयात वित्तपोषण सुविधा (Global Food Import Financing Facility) द्वारा प्रस्तावित आपातकालीन खाद्य आयात वित्तपोषण तंत्रों के माध्यम से उच्च खाद्य आयात बिलों को कवर किया जाए।
    • एफएओ और अंतर्राष्ट्रीय उर्वरक उद्योग संघ (IFA) के उर्वरक वितरण तंत्र का एक वैश्विक संस्करण बनाकर उर्वरकों तक पहुँच सुनिश्चित की जाए।
    • कमज़ोर देशों के लिए तरजीही पहुँच की गारंटी देने हेतु प्रमुख खाद्य निर्यातकों के बीच एकजुटता-आधारित समन्वय लागू कर बाज़ार-आधारित निर्यात प्रतिबंध अनुशासन को हटाया जाए।
    • सार्वजनिक वितरण प्रणालियों के माध्यम से ग़रीब आबादी को सब्सिडी देकर कम दाम पर भोजन और ईंधन प्रदान किया जाए, और यदि आवश्यक हो, तो आवश्यक वस्तुओं तक पहुँच की गारंटी के लिए मात्रात्मक राशनिंग शुरू की जाए। यदि संकट गहराता है तो सार्वजनिक परिवहन के लिए सब्सिडी वाले ईंधन और निजी ऑटोमोबाइल उपयोग को हतोत्साहित करने वाले उपायों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

हमने जो उपाय दिए हैं वे दिखाते हैं कि मौजूदा व्यवस्था के दायरों में भी ऐसे क़दम उठाए जा सकते हैं जिनसे ग़रीब देशों की संकट से जूझ रही आबादी की परेशनियाँ कम की जा सकती हैं, वे परेशनियाँ जो एक ऐसे युद्ध की वजह से पैदा हुई हैं जो इन लोगों ने न चुना है और न इसका समर्थन करते हैं। अगर इन प्रस्तावों में से चंद भी लागू किए जाते हैं तो ये करोड़ों लोगों को राहत दे सकते हैं। इस पीड़ा को दूर करने का उपाय भी हमारी ही इस वास्तविकता में मौजूद हैं; इन्हें इस्तेमाल न किया जाना दरसल एक राजनीतिक निर्णय है। यह स्वीकार करना भी निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण है कि जो संस्थान इन प्रस्तावों को आगे बढ़ा सकते हैं, वे या तो वैश्विक उत्तर के देशों के हाथों में हैं — जैसे अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन द्वारा नियंत्रित) और आईएमएफ (जिसमें वैश्विक उत्तर के पास वैश्विक दक्षिण की तुलना में नौ गुना अधिक मतदान शक्ति है) — या फिर वे बहुराष्ट्रीय शिपिंग निगमों (जैसे डेनिश कंपनी मेर्स्क और स्विस कंपनी एमएससी) के हाथों में हैं।

सवाल यह है कि ऐसे उपायों को लागू करने या इनके लिए समर्थन जुटाने तक का राजनीतिक नेतृत्व कौन देगा। हम ख़तरनाक एकतरफ़ावाद के दौर में जी रहे हैं और वैश्विक दक्षिण में उभरा नया भाव अब तक संस्थागत रूप नहीं ले पाया है। ब्रिक्स+ जैसी एक प्रक्रिया, जिसमें वैश्विक उत्तर के बाहर युद्ध से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले कुछ राष्ट्र शामिल हैं, के पास ईंधन, उर्वरक और भोजन से संबंधित मामलों पर बातचीत करने के लिए राजनीतिक महत्त्व और आर्थिक स्थिति है। ईरान स्वयं ब्रिक्स+ का सदस्य होने के साथ-साथ सिद्धांत रूप में वैश्विक दक्षिण के लिए व्यापार पहुँच सुनिश्चित करने को तैयार है, ऐसे में मुक्त व्यापार के बजाय एकजुटता पर आधारित समझौतों की संभावना मौजूद है।

शीर्षकहीन, सोहराब सेपहरी (ईरान), c. 1960s

जलाल अल-दीन मुहम्मद रूमी (1207–1273) से लेकर आगे तक सदियों से फ़ारसी कविता ने जीवन के मूलभूत प्रश्नों के उत्तर खोजे हैं। फ़ारसी कवियों ने मानवीय पीड़ा पर चिंतन किया और कल्पना की कि समाधान कहीं न कहीं प्रकृति के रहस्यों के भीतर मौजूद हैं। बीसवीं सदी में, उस परंपरा की महान आधुनिक आवाज़ों में से एक ईरानी कवि और चित्रकार सोहराब सेपेहरी (1928–1980) थे। अपने संग्रह *हज्म-ए-सब्ज़ (हरा खंड, 1968) में, सेपेहरी की एक कविता है जिसका शीर्षक है पोश्त-ए-दरयाहा (समुद्रों के परे), जो रूमी जैसी उस इच्छा के साथ शुरू होती है कि वह वायुमंडल में विलीन हो जाए:

मैं एक नाव बनाऊँगा 

और उसे पानी में उतारूँगा

और इस अजीब जगह से दूर चला जाऊँगा

जहाँ कोई नायकों को जगाता न हो

प्रेम के मैदानों से;

एक बिना जाल वाली नव 

और एक दिल जिसमें मोतियों की ख्वाहिश न हो 

मैं नाव को आगे ले जाता रहूँगा 

और नीले समंदर को नहीं दूँगा अपना दिल 

न ही किसी जलपरी को 

जो पानी से निकलकर अपने बालों के जाल में 

अकेले नाविक को फँसाती है।

….

समंदरों से परे एक शहर है 

जहाँ खिड़कियाँ के खुलने से खुलते हैं रहस्य 

छतों पर रहते हीयन कबूतर 

मानव बुद्धि के फ़व्वारों को निहारते हैं 

हर दस साल के बच्चे के पास होता है ज्ञान का भंडार 

शहर वाले ईंटों की क़तारों में देखते हैं रौशनी,

या एक नाज़ुक ख़्वाब;

धूल तुम्हारे अहसास का गीत सुन सकती है 

रहस्यमयी पंछियों के परों की आवाज़ें घुलती हैं हवा में

समंदरों से परे एक शहर है 

जहाँ सूरज सुबह उठे लोगों की आँखों की तरह रौशन है 

शायर पानी, ज्ञान और रौशनी के वारिस हैं 

समंदरों के पार है एक शहर,

कि फिर न बनानी पड़े किसी को कोई नाव।

स्नेह सहित,

विजय