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मृतकों की खोपड़ियाँ चमकाते बमः आठवाँ न्यूजलेटर (2026)

न्यू स्टार्ट का अंत, यूएस का हथियार नियंत्रण संधियों से पीछे हटना और परमाणु ‘युद्ध’ की संभावना, नाभिकीय शक्तियों में भयानक टकराव की आशंका पैदा कर चुका है।

हिरोशिमा, योशितो मात्सुशिगे (जापान), 1945

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

5 फ़रवरी 2026 को नई सामरिक शस्त्र कटौती संधि (न्यू स्टार्ट) ख़त्म हो गई और इसके साथ ही वह आख़िरी क़ानूनी बाध्यता भी ख़त्म हो गई जो संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और रूस के रणनीतिक परमाणु हथियारों पर लागू थी। न्यू स्टार्ट पर 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे और यह 2011 में लागू हुई थी, और इसके ख़त्म होने से पहले इसकी जगह एक और संधि की जानी चाहिए थी। इस संधि के तहत दोनों पक्षों के रणनीतिक वॉरहेड और सामग्री पहुँचाने वाले वाहनों की संख्या को सीमित किया गया, साथ ही निरीक्षण, नोटिफ़िकेशन और सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए वेरिफ़िकेशन (सत्यापन) की व्यवस्था भी स्थापित की गई। ये सब उपाय सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं थे; यह बारीकियों वाली एक ऐसी व्यवस्था थी जो सबसे ज़्यादा तबाही ला सकने वाले हथियारों पर लगाम कसती थी।

न्यू स्टार्ट का अंत अचानक नहीं हुआ। एक दशक से यूएस और रूस के संबंध ख़राब चल रहे हैं, मार्च 2020 में ज़मीनी निरीक्षण पर रोक लगा दी गई थी और फिर हटाई नहीं गई। फ़रवरी 2023 में रूस ने न्यू स्टार्ट में अपनी भागीदारी स्थगित कर दी और यूएस ने भी कुछ ऐसा ही किया (रूस ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह न्यू स्टार्ट के तहत हथियारों की निर्धारित संख्या का पालन करने को तैयार है बशर्ते यूएस भी ऐसा करे)। जब तक संधि ख़त्म हुई उससे पहले ही इसमें दी गई वेरिफ़िकेशन की सुविधा ख़त्म की जा चुकी थी।

अब हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों पर किसी तरह की संधि की कोई बाध्यता नहीं है।

द ऐटम सिरीज़ नं. 7, हिल्मा अफ़ क्लिंट (स्वीडन), 1917

2020 से यूएस लगातार एक के बाद एक हथियारों पर नियंत्रण करने वाली संधियों से हाथ खींचने का एकतरफ़ा क़दम उठा रहा है, और उस प्रणाली को कमज़ोर कर रहा है, जिसने हथियारों के प्रयोग पर रोक लगाने में मदद की। ये संधियाँ इस प्रकार हैं:

  1. 1972 की एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल संधि – यूएस जून 2002 में इससे अलग हुआ।

  2. 1987 की इंटरमीडीएट-रेंज न्यूक्लीयर फ़ॉर्सेज़ संधि – अगस्त 2019 में यूएस अलग हुआ।

  3. 1992 की ओपन स्काइज़ संधि – नवंबर 2020 में यूएस पीछे हटा।

  4. 2011 की न्यू स्टार्ट संधि – फ़रवरी 2026 में ख़त्म हुई।

न्यू स्टार्ट का अंत, परमाणु ‘युद्ध-लड़ाई’ सिद्धांतों से जुड़े एक व्यापक बदलाव के तहत हो रहा है, जिसमें प्रति-बल (काउंटरफोर्स) के भयावह विचार पर फिर से ज़ोर दिया जा रहा है। इसकी रूपरेखा 2018 की अमेरिकी परमाणु स्थिति समीक्षा (एनपीआर) में दिखाई देती है। यह विचार सरल है: किसी प्रतिद्वंद्वी के शहरों के बजाय उसकी परमाणु सेनाओं और कमांड प्रणालियों पर हमला करना। इस तरह के हमले को ज़्यादा तर्कसंगत और यहाँ तक कि ज़्यादा मानवीय भी माना जाता है। लेकिन वास्तव में, इस प्रकार का हमला सभी निरोध प्रणालियों को अस्थिर कर देता है। प्रति-बल सिद्धांत गति, पूर्व-प्रहरण और पहले हमले की सोच को बढ़ावा देते हैं, जिससे निर्णय लेने का समय बहुत कम हो जाता है। यह सिद्धांत ‘इस्तेमाल करो या गवाँ दो’ (यूज़-इट-ऑर-लूज़-इट) का दबाव बनाता है – यह डर कि आपको अपनी सेनाओं के नष्ट होने से पहले हमला कर देना चाहिए – जो ग़लत आकलन को आकस्मिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक बना देता है। जैसे-जैसे युद्ध प्रौद्योगिकियाँ उन्नत होती हैं, यह तर्क और मज़बूत होता जाता है। उच्च विकसित पारंपरिक हमला प्रणालियाँ, मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ, हाइपरसोनिक डिलीवरी प्रणालियाँ और एकीकृत कमान-और-नियंत्रण नेटवर्क (साझा प्रणालियाँ जो सेंसर, संचार और निर्णय को आपस में जोड़ती हैं) परमाणु और ग़ैर-परमाणु युद्ध के बीच की रेखा को धुंधला कर देती हैं। कन्वेन्शनल इंटेंट (ग़ैर-परमाणु वॉरहेड) से दागी गई मिसाइल को परमाणु हमले समझने की ग़लती की जा सकती है। दोहरे उपयोग वाले प्लैटफॉर्म (प्रणालियाँ जो ग़ैर-परमाणु और परमाणु दोनों पेलोड ले जा सकती हैं) की वजह से संकेत अस्पष्ट हो जाते हैं और यह फ़ैसला करना मुश्किल हो जाता है कि कोई लांच परमाणु है या ग़ैर-परमाणु। इससे स्थिति और जल्दी बिगड़ती है। सही ग़लत की पहचान कर पाना सिर्फ़ कुल पलों का खेल बन जाता है।

परमाणु हमले की रात में दो बच्चे, एनरिको बाज (इटली), 1956

प्रति-बल का सिद्धांत सिर्फ़ कोई हवाई बहस नहीं है बल्कि यह सरकारी बजटों और हथियार ख़रीदने के समझौतों में साकार होते दिखाई देता है। 2022 के यूएस एनपीआर ने परमाणु त्रयी (ट्रीयाड) के आधुनिकीकरण की पुष्टि की: ज़मीनी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, पनडुब्बी से लांच होने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें और परमाणु-सक्षम सामरिक बमवर्षक। सबसे ज़रूरी बात यह है कि 2022 की एनपीआर ‘नो फर्स्ट यूज़’ (पहले प्रयोग न करने) और ‘सोल पर्पस’ (एकमात्र उद्देश्य) नीतियों को ख़ारिज करती है। (‘नो फर्स्ट यूज़’ का अर्थ है परमाणु हथियारों का पहले प्रयोग न करने की प्रतिबद्धता; ‘सोल पर्पस’ का अर्थ है उनकी भूमिका को निरोध तक सीमित करना और यदि आवश्यक हो, तो केवल परमाणु हमले का जवाब देना।) वर्तमान नीति यह कहती है कि अमेरिका अपने या अपने सहयोगियों एवं भागीदारों के महत्त्वपूर्ण हितों की रक्षा के लिए, केवल ‘चरम परिस्थितियों’ में, परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर विचार करेगा, लेकिन यह पहले प्रयोग की संभावना को समाप्त नहीं करता है, और ‘संकट की एक सीमित श्रेणी’ को खुला छोड़ देता है, जिसमें परमाणु हथियार ‘सामरिक प्रभाव’ वाले हमलों को रोक सकते हैं। यह रुख प्रति-बल सिद्धांत के लिए खुले तौर पर प्रतिबद्ध हुए बिना, प्रतिद्वंद्वी की सैन्य क्षमताओं को निशाना बनाने का विकल्प सुरक्षित रखता है – जिसमें यदि आवश्यक हो तो उनकी सामरिक सेनाएँ भी शामिल हैं। 2023 की कांग्रेशनल कमीशन ऑन द स्ट्रैटेजिक पोस्चर ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स ने इसे और आगे बढ़ाया, यह तर्क देते हुए कि यूएस की परमाणु रणनीति को उन चीजों को निशाना बनाना जारी रखना चाहिए जिन्हें प्रतिद्वंद्वी ‘सबसे अधिक महत्त्व देते हैं’। इन दस्तावेज़ों में परमाणु हथियारों को आधुनिक राज्य व्यवस्था की दुखद आवश्यकताओं के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य उपकरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिनका उपयोग कुछ परिस्थितियों में किया जा सकता है। 

इन दृष्टिकोणों के पीछे जो पागलपन है उसमें हथियार उद्योग का भारी मुनाफ़ा आग़ में घी डालने वाला काम करता है जो प्रति-बल सिद्धांत के इर्द-गिर्द परमाणु प्रणालियों के आधुनिकीकरण का प्रयास करता है। पीएएक्स और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु हथियार उन्मूलन अभियान (आईसीएएन) द्वारा जारी 2025 की रिपोर्ट “भारी कीमत: परमाणु हथियार बनाने वाली कंपनियाँ और उनके वित्तपोषक” में पाया गया कि जनवरी 2022 और अगस्त 2024 के बीच, 260 वैश्विक वित्तीय संस्थानों (पेंशन फंड, बीमा कंपनियों और परिसंपत्ति प्रबंधकों सहित) ने 24 परमाणु हथियार उत्पादकों को वित्त दिया, इनके पास निवेशकों के लगभग 514 अरब डॉलर के शेयर और बांड थे, और लगभग 270 अरब डॉलर ऋण और अंडरराइटिंग के रूप में प्रदान किए गए थे। इन कंपनियों में एयरबस, बीएई सिस्टम्स, बेकटेल, बोइंग, जनरल डायनेमिक्स, एल3हैरिस टेक्नोलॉजीज, नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन और रोल्स-रॉयस शामिल हैं। आईसीएएन की 2025 की रिपोर्ट “छिपी हुई लागत: 2024 में परमाणु हथियारों पर खर्च” का अनुमान है कि नौ परमाणु हथियार संपन्न राज्यों ने 2024 में अपने परमाणु हथियारों पर 100.2 अरब डॉलर खर्च किए, जिसमें निजी क्षेत्र ने परमाणु हथियार अनुबंधों से कम से कम 42.5 अरब डॉलर कमाए। इस राशि से संयुक्त राष्ट्र का बजट 28 बार दिया जा सकता था और भुखमरी का सामना कर रहे 34.5 करोड़ लोगों को लगभग दो वर्षों तक खाना दिया जा सकता था। परमाणु हथियार उद्योग मानव संसाधनों की एक चौंकाने वाली बर्बादी है।

Composition avec photo de la bombe ‘H’ (हाइड्रोजन बम की तस्वीर के साथ एक कलाकृति), ले कोर्बुज़िए (फ्रांस), 1952

द्विपक्षीय हथियार नियंत्रण व्यवस्था के पतन के बावजूद, वैश्विक परमाणु निरोध और उन्मूलन प्रणाली ग़ायब नहीं हुई है। लेकिन जो कुछ बचा है, वह परमाणु नीति की संरचना पर अमेरिकी प्रभुत्व से प्रभावित है:

  1. परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी, 1970) अब भी बनी हुई है, भले ही यह परमाणु भेदभाव (न्यूक्लियर अपार्थीड) की प्रणाली को मज़बूत करती है (अनुच्छेद VI के बावजूद, जो परमाणु हथियार संपन्न देशों से निरस्त्रीकरण करने का आग्रह करता है)। न्यू स्टार्ट की समाप्ति एनपीटी के वैधता संकट को गहरा करती है और निरस्त्रीकरण का वादा हमेशा के लिए स्थगित हुआ सा दिखता है। भारत, इज़राइल और पाकिस्तान ने कभी भी एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए; डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया (डीपीआरके) ने 1985 में इस पर हस्ताक्षर किए लेकिन 2003 में इसे वापस ले लिया।

  2. अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए, 1957) निरीक्षण, सामग्री लेखांकन और निगरानी की एक सुरक्षा उपाय व्यवस्था (सेफगार्ड्स रिजीम) संचालित करती है। 1997 का आईएईए का अतिरिक्त प्रोटोकॉल इन क्षमताओं का विस्तार करता है, फिर भी यह तंत्र असमान तौर पर ही लागू होता है। उदाहरण के लिए, ईरान की आईएईए की जांच, सबूतों से नहीं, बल्कि वैश्विक उत्तर के ईरानी सरकार के प्रति शत्रुता पर आधारित है।

  3. परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी, 1975) परमाणु ईंधन चक्र और हथियारों से संबंधित कार्यक्रमों में उपयोग की जाने वाली संवेदनशील प्रौद्योगिकियों और दोहरे उपयोग वाली सामग्रियों के लिए एक अनौपचारिक निर्यात-नियंत्रण व्यवस्था है। हालाँकि एनएसजी का उद्देश्य प्रसार को रोकना है (जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1540 द्वारा सुदृढ़ किया गया है), यह अंततः तकनीकी असमानता को मज़बूत करता है। परमाणु हथियार संपन्न राज्य इन अनौपचारिक संस्थानों पर हावी हैं, दूसरों से संयम बरतने पर ज़ोर देते हुए अपने अधिकार का प्रयोग करते हैं।

परिवार, क्रासिमिर टेरज़िएव (बुल्गारिया), 2015

कुछ नियम हैं जो यूएस के पूर्ण नियंत्रण के बाहर है लेकिन ये काफ़ी बिखरे हुए हैं और एक व्यापक एजेंडे को आगे नहीं ले जा सकते। इनमें शामिल हैं:

  1. परमाणु हथियार निषेध संधि (2017) – यह एक कानूनी रूप से बाध्यकारी साधन है जो परमाणु हथियारों को सिरे से नकारने की नीति का प्रतीक है। 2025 के अंत तक, निन्यानवे देशों ने या तो इस संधि की पुष्टि कर दी थी या उस पर हस्ताक्षर कर दिए थे, लेकिन दुनिया के नौ परमाणु हथियार संपन्न राज्यों में से कोई भी उनमें शामिल नहीं है। यूरोप में, केवल ऑस्ट्रिया, होली सी (वेटिकन), आयरलैंड, माल्टा और सैन मैरीनो ने संधि की पुष्टि की है। यह संधि, जिसे परमाणु हथियारों के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय अभियान (आईसीएएन) द्वारा संचालित किया गया था, मोटे तौर पर एक वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) पहल है।

  2. परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र – दुनिया के पाँच क्षेत्रों ने अपने इलाक़ों को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने के लिए संधियों को अपनाया। ये समझौते हैं: लैटिन अमेरिका और कैरेबियन को कवर करने वाली ट्लाटेलोल्को संधि (1967), दक्षिण प्रशांत पर लागू रारोटोंगा संधि (1985), दक्षिण पूर्व एशिया को कवर करने वाली बैंकॉक संधि (1995), अफ्रीका को कवर करने वाली पेलिंडाबा संधि (1996) और मध्य एशिया को कवर करने वाली सेमीपालाटिंस्क संधि (2006)। ये संधियाँ, व्यवहार में, परमाणु निरस्त्रीकरण की सबसे सफल उपलब्धियों में से एक हैं।

  3. व्यापक परमाणु-परीक्षण प्रतिबंध संधि (1996) – यह संधि लागू नहीं हो पाई है क्योंकि कई अहम देशों ने इसकी पुष्टि नहीं की है, फिर भी यह राजनीतिक रूप से अहम बनी हुई है क्योंकि यह परमाणु परीक्षण विस्फोटों को प्रतिबंधित करती है और इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु परीक्षण को वर्जित करवाने में मदद की है। संधि की निगरानी प्रणाली प्रतिदिन कार्य करती है, भूकंपीय और वायुमंडलीय संकेतों का पता लगाती है, जिससे परीक्षणों को छिपाना मुश्किल हो जाता है।

न्यू स्टार्ट के ख़त्म होने के बाद भी कुछ संस्थान और नियम बाक़ी हैं लेकिन सबसे बड़े परमाणु हथियारों पर जो मुख्य लगाम थी वह अब ख़त्म हो चुकी है। अब हमारे सामने तीन आपस में जुड़े हुए संकट हैं:

  1. स्थिरता का संकट – सबसे बड़े परमाणु हथियारों के विषय में अब न पारदर्शिता है और न ही उनका सत्यापन किया जा सकेगा, इससे दुनिया की प्रमुख ताक़तों के बीच केवल संदेश के लिए जगह बचती है।

  2. वैधता का संकट – जिन देशों के पास सबसे ज़्यादा हथियार हैं वे दूसरों से तो अप्रसार का पालन करने की माँग करते हैं जबकि उन्होंने निरस्त्रीकरण की अपनी सब संधियों से हाथ खींच लिए हैं।

  3. विवेक का संकट – भयावह बात यह है कि परमाणु हथियारों के बारे में ऐसे बात हो रही जैसे कि उन्हें इस्तेमाल किया जा सकता है और अनिवार्य हैं – जैसे कि जंग के दौरान उनका प्रयोग वैध है।

हथियार नियंत्रण की नीति की ओर लौटना बेहद ज़रूरी है। लेकिन इसके साथ ही हमें व्यापक एजेंडा के बारे में भी सोचना होगा। सबसे बेहतरीन संधियाँ भी ख़तरे को बाँधकर रखती हैं उसे ख़त्म नहीं करतीं। गहरा अंतर्विरोध जस-का-तस बना रहता है: एक ऐसी दुनिया जहाँ कुछ देश मानते हैं कि उन्हें सुरक्षा के नाम पर पूरी मानवता को तबाह करने का अधिकार है। न्यू स्टार्ट के ख़त्म होने से साफ़ हो गया है कि परमाणु हथियारों पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था मौजूद है जो सत्ता को बनाए रखती है और शांति स्थापित नहीं होने देना चाहती।

लीबिया ने दिसंबर 2003 में अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम बंद कर दिया था। आठ साल बाद नाटो ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव (संख्या 1973) का इस्तेमाल किया और लीबिया को बर्बाद कर दिया, यह प्रस्ताव हथियारों पर प्रतिबंध लगता है और नो-फ़्लाई ज़ोन (जहाँ हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की मनाही हो) स्थापित करता है। इसलिए यह तार्किक था कि 2006 में डीपीआरके (उत्तर कोरिया) ने परमाणु हथियारों का परीक्षण किया और यूएस और पूर्वी एशिया में इसके सहयोगियों के सत्ता पलट के सपने के ख़िलाफ़ एक सुरक्षा कवच तैयार किया। यूएस का प्रति-बल सिद्धांत दूसरे देशों को अपनी सुरक्षा दुरुस्त करने के लिए प्रेरित करता है, चरम-साम्राज्यवाद द्वारा उत्पन्न बेचैनी से जूझ रही दुनिया की यही दर्दभरी सच्चाई है।

धान की खेती, शिन हाक-चुल (कोरिया), 1987

2003 में ब्रिटिश नाटककार हैरल्ड पिंटर (1930-2008) ने आतंक के ख़िलाफ़ वैश्विक युद्ध से तंग आकर एक शक्तिशाली कविता लिखी। कविता का शीर्षक था ‘द बॉम्बस्’ (बम)। मैंने पिंटर को लंदन में यह कविता पढ़ते सुना था, वो मुझे आज भी याद है, वो प्रभावशाली लय, इतने बुरे दौर में भी साफ़ दिखाई देती उम्मीद। उनकी याद में यह कविता पेश है:

अब कहने को कुछ नहीं बचा
अब हमारे पास सिर्फ़ बम हैं
जो हमारे दिमाग़ में फटते हैं
अब सिर्फ़ बम बचे हैं
जो ख़ून चूसते हैं हमारा
अब हमारे पास सिर्फ़ बम बचे हैं
जो मृतकों की खोपड़ियाँ चमकाते हैं।

स्नेह सहित,

विजय