जनसंहार में भी अपनी उम्मीद नहीं मरने देंगे फ़िलिस्तीनी: सैंतालीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
फ़िलिस्तीनी जनता इज़राइल के अमानवीय क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ प्रतिरोध जारी रखते हुए कला और संस्कृति में स्मृति, गरिमा और उम्मीद गढ़ रही है।
ज़ैतून के पेड़ तले, पाब्लो कलाका (चिली और वेनेज़ुएला), 2023
[Utopix और आर्टिस्टस् अगेन्स्ट अपारथाइड से साभार]
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
ग़ज़ा पट्टी के लोगों के ताज़ा हालात पर हफ़्ते में दो बार जारी की जाने वाली संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट (Humanitarian Situation Update #340; 12 नवंबर 2025) के एक भाग में ग़ज़ा के दस लाख से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी बच्चों को हो रहे मानसिक तनाव पर चर्चा की गई है। इसके मुताबिक़ बच्चों में जो सबसे ज़्यादा लक्षण दिख रहे हैं वह हैं ‘आक्रामक व्यवहार (93 प्रतिशत), अपने से छोटे बच्चों के प्रति हिंसा (90 प्रतिशत), उदासी और समाज से दूरी (86 प्रतिशत), असंतुलित नींद (79 प्रतिशत) और शिक्षा से दुराव (69 प्रतिशत)’। ग़ज़ा की लगभग आधी आबादी बच्चों की है, यहाँ की मध्य आयु 19.6 वर्ष है। इन लक्षणों से उबरने के लिए इन्हें एक लंबा संघर्ष करना पड़ेगा। इन ठोस परिस्थितियों – मौजूदा जनसंहार और ज़मीन पर हो रहे लगातार क़ब्ज़े- के बदलने की कोई उम्मीद नहीं नज़र आ रही।
इज़राइली सेनाओं के बहुत तेज़ हमले ये बच्चे झेल रहे हैं। इनमें से कुछ हमले हाल ही में आई डिफ़ेन्स फ़ॉर चिल्ड्रन इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में दर्ज किए गए हैं। उदाहरण के लिए 22 अक्टूबर 2025 को सोलह साल का सादी मोहम्मद सादी हसनैन और कुछ अन्य बच्चे सादी के तबाह कर दिए घर गए ताकि वे उसका कुछ सामान और जलावन ला सकें। इज़राइल के क्वाडकॉप्टरों (हमले के लिए इस्तेमाल होने वाला एक तरह का ड्रोन) ने उन पर हमला कर दिया। इस पर लड़के इधर-उधर भागे। दो लड़के बच निकले, लेकिन सादी और एक दूसरा लड़का निकल नहीं पाए। अगली सुबह सादी के परिवार को उस दूसरे लड़के का शव मिला, उसका सिर लगभग चकनाचूर था। उसके पास ही उन्हें सादी का फ़ोन, उसके जूते और पतलून मिले। सादी की क़मीज़ से उस दूसरे लड़के के शव को बाँधा गया था। सादी का कोई पता नहीं चल सका है और उसके परिवार को डर है कि उसे इज़राइली सेना पकड़कर ले गयी है।
फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध, इल्गा (फ़िलिस्तीन और चिली), 2016। [Utopix से साभार]
हमारे नवीनतम डोसियर Despite Everything: Cultural Resistance for a Free Palestine [सबके बावजूद: आज़ाद फ़िलिस्तीन के लिए सांस्कृतिक प्रतिरोध जारी है] में ग़ज़ा की अठारह वर्षीय कलाकार इब्राहिम मोहाना की एक महत्त्वपूर्ण बात शामिल की गई है: ‘उन्होंने यह जंग हमारी उम्मीद को ख़त्म करने के लिए छेड़ी है, लेकिन हम ऐसा होने नहीं देंगे’। हम ऐसा होने नहीं देंगे। यह इंकार अपने आप में एक बहुत सशक्त भावना है।
इस डोसियर का शीर्षक फ़िलिस्तीनी अभिनेता और निर्देशक मोहम्मद बकरी की बात से प्रेरित है – मौजूदा जनसंहार सहित सब अत्याचारों के बावजूद फ़िलिस्तीनी संस्कृति बची रहेगी और फूले फलेगी। फ़िलिस्तीनी संस्कृति न सिर्फ़ ज़िंदा रहेगी बल्कि लोगों की सांस्कृतिक धरोहर बच्चों को मानसिक रूप से स्वस्थ होने में मदद करेगी और उन्हें फिर से सामान्य होने की राह पर ले जाएगी। कला एक सुरक्षित शरणस्थली है, जो लोगों को उस आघात से निपटने में मदद करती है जिसे वे अपने जीवन में स्वीकार नहीं कर सकते। फ़िलिस्तीनी जिस आघात को झेल रहे हैं वह कोई एक घटना नहीं बल्कि प्रक्रिया है, उनके लिए यही जीवन हो गया है। कला इस तरह के आघात से बचने की एक जगह बन जाती है। इसलिए इसमें कोई अचम्भा नहीं कि युद्ध और इसके मानसिक तथा शारीरिक आघात झेल चुके बच्चों को कला आधारित थेरपी से काफ़ी हद तक मदद मिलती है।
Símbolos de resistencia (प्रतिरोध के प्रतीक), केल ऐबलो (वेनेज़ुएला), 2024. [Utopix से साभार
कुछ बरस पहले फ़िलिस्तीन में मैं कुछ कलाकारों से आज़ादी के लिए संघर्षरत जनता के बीच कला की भूमिका पर चर्चा कर रहा था। हमारी बातचीत का मुख्य केंद्र था कि क्या सभी फ़िलिस्तीनी कला फ़िलिस्तीनियों की ज़मीन पर क़ब्ज़े के बारे में होनी चाहिए या अन्य विषय भी इसकी प्रेरणा बन सकते हैं। हम सभी के बीच यह सहमति थी कि फ़िलिस्तीनियों की यह कोई ज़िम्मेदारी नहीं है कि वे कब्ज़े में शामिल लोगों के सामने खुद को मानवीय साबित करें, और न ही यह कि वे केवल कब्ज़े को लेकर ही काम करें। जेनिन के एक युवा कलाकार उमर ने सवाल उठाया कि ‘कलाकार अपनी खुशी के लिए, या उन लोगों के लिए जो उसकी कला का आनंद लेते हैं, या यह दिखाने के लिए कि हम विनाश के बावजूद जीवित रह सकते हैं — क्यों नहीं रच सकता?’
हमेशा के लिए मिटा दिए जाने के विरुद्ध प्रतिरोध, साम्राज्यवादी आख्यानों का प्रति-विमर्श और ऐतिहासिक स्मृतियों को ज़िंदा रखने का एक प्रयास, ये सभी कला हो सकते हैं। दिवंगत फ़िलिस्तीनी उपन्यासकार और पॉप्युलर फ़्रंट फ़ॉर द लिबरेशन ऑफ़ फ़िलिस्तीन के एक योद्धा ग़स्सान कनफ़ानी ने लिखा था कि ‘ख़ुद को बचाए रखने के लिए मैं जिस भी चीज़ का इस्तेमाल कर सकता हूँ – तूलिका, क़लम, बंदूक़ – वे सभी आत्मरक्षा के साधन हैं’। फ़िलिस्तीनी कलाकारों ने कहा कि दक्षिण अफ़्रीकियों ने भित्तिचित्र, संगीत, कविता और रंगमंच आदि का इस्तेमाल नस्लवाद के विरुद्ध लड़ाई में किया (जैसा कि हमने मेदू आर्ट एन्सेम्बल पर अपने डोसियर में दर्ज किया है)। मानव गरिमा के लिए जारी संघर्ष की छाप सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों के मैदानों में ही नहीं दिखती बल्कि आज़ादी का ख़्वाब देखने वालों के मन में भी उतनी ही दिखाई पड़ती है, भले ही उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखने की कोशिशें जितनी भी तेज़ होती रहे। शोषित जनता द्वारा आज़ादी हासिल करने की लड़ाई, सांस्कृतिक संसाधनों को अपनी एक लोकतांत्रिक शक्ति के तौर पर सजीव करने का भी संघर्ष है।
ग़ज़ा, औदे अबू नसर (लेबनान), 2023।
[आर्टिस्टस् अगेन्स्ट अपारथाइड (नस्लभेद के विरुद्ध कलाकार) से साभार]
दरबत शम्स (धूप की मार) बैंड की मुख्य गायिका हनान वकीम ने डोसियर के लिए दिए गए साक्षात्कार में टिंग्स चक को बताया कि उनके और दूसरे फ़िलिस्तीनियों के लिए जनसंहार के शुरुआती महीने ‘बिलकुल चौंकाने वाले थे। कई कलाकार कुछ गा पाने, कहीं आने-जाने या कुछ भी रचने की स्थिति में नहीं थे। जनसंहार के दौर में कला की भूमिका को लेकर लगातार सवाल किए जा रहे थे।’ ‘क्या ऐसी परिस्थिति में संगीत रचना उचित है? अगर कोई गीत युद्ध के बारे में बात नहीं करता तो भी क्या उसे पेश किया जाना चाहिए?’ ऐसे सवाल हर समय खड़े किए जा रहे थे, बार-बार दोहराए जा रहे थे, क्योंकि हमारे इर्द-गिर्द सब कुछ जनसंहार की भेंट चढ़ रहा था।
इस जनसंहार की शुरुआत के बिलकुल पहले ही दरबत शम्स ने ‘रक़्सा’ (رَقْصة), नाम से एक गीत साझा किया था, इसका मतलब है ‘नृत्य’। इसके बोल बहुत प्रभावशाली हैं:
ज़मीन में गड़ाए पैर,
नज़र तारों की ओर।
वो निगाहें जिनसे पसीज जाए ख़ुद दुःख,
सूरज की किरणों में नहाया मन।हमें ज़िंदा रखने वाली साँस के सहारे,
अंधेरे रास्ते को रौशन करने।
किसी नज़र से गढ़ा ख़्याल,
दर्द पर पर्दा डालती मुस्कुराहट।ये हमारे अंदर की कहानी को जगाते हैं
और उसमें नायकों की जगह भर देते हैं।हम धरती के सीने में संगीत बोते हैं
और ऐसी दुनिया रचते हैं जो हमारा अक्स है।
जब मैंने यह डोसियर पढ़ा तो मुझे इस गीत की याद आई। कैसे यह गीत शक्तिशाली ढंग से काव्यात्मक और राजनीतिक बना हुआ है। साथ ही यह उस जनसंहार का अंदेशा भी देता है जो 1948 से फ़िलिस्तीनियों की ज़िंदगी में स्थाई तौर पर बना हुआ है।
Sabra y Shatila (सबरा और शतीला), ओलफेर लियोनार्डो (पेरू), 2021. [Utopix से साभार]
7 अक्टूबर 2023 से इज़राइली बम फ़िलिस्तीनी सामाजिक पुनरुत्पादन की जगहों (बेकरियों, मछुआरों की नावों, खेतों, घरों, अस्पतालों) और फ़िलिस्तीन में सांस्कृतिक जीवन के संस्थानों (विश्वविद्यालयों, गैलरियों, मस्जिदों और पुस्तकालयों) पर गिराए जा रहे हैं। इनमें से एक संस्थान है उत्तर ग़ज़ा स्थित एड्वर्ड सईद सार्वजनिक पुस्तकालय जहाँ हर रोज़ हज़ारों लोग आते थे। इसकी स्थापना 2017 में कवि मोसब अबू तोहा ने की थी और 2019 में उन्होंने ग़ज़ा शहर में इसकी एक शाखा खोलने के लिए धन इकट्ठा करने का फ़ैसला किया, इसमें एक कम्प्यूटर लैब थी जहाँ बच्चे और वयस्क कम्प्यूटर चलाना और वेबसाइट बनाना सीख सकते थे।
नवंबर 2023 में इज़राइलियों ने ग़ज़ा म्यूनिसिपल पुस्तकालय पर बमबारी की। इसके अगले कुछ महीनों में उन्होंने ग़ज़ा के सरकारी विश्वविद्यालयों पर बमबारी की और उनके पुस्तकालय भी बर्बाद कर दिए। अप्रैल 2024 तक तेरह सरकारी पुस्तकालयों को बर्बाद किया जा चुका था। ग़ज़ा में पुस्तकालयों की बर्बादी के चलते लायब्रेरीयन्स एंड आर्किविस्टस् विद पैलेस्टायन का गठन हुआ जिसने इन बर्बादी को दस्तावेज़ी तौर पर दर्ज करने का काम किया है। कुछ महीनों बाद ही इज़राइली बमों ने एड्वर्ड सईद पब्लिक लाइब्रेरी को तबाह कर दिया। अबू तोहा ने अपने बयान में कहा ‘मैं और ग़ज़ा तथा विदेशों में मौजूद मेरे दोस्त हमारे बच्चों के लिए जो भी सपने संजो रहे थे वे सब ग़ज़ा को मिटाने और यहाँ की हर ज़िंदा और प्यार की बात करने वाली चीज़ को बर्बाद कर देने के इज़राइल के इस जनसहर की आग़ में भस्म हो गए हैं’।
जब हम केरल, चीन और मेक्सिको के सार्वजनिक पुस्तकालयों के बारे में पढ़ना, एक बेहतर इंसान बनना है डोसियर में लिख रहे थे तब हमने ग़ज़ा के ऐसे ही पुस्तकालयों के बारे में भी सोचा था, जिनमें से कई स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित और संचालित थे। इज़राइल का इस तरह सार्वजनिक पुस्तकालयों पर हमला करना अनजाने में हुई घटनाएँ नहीं हैं: यह उन तमाम जगहों को बर्बाद कर रहा है जो जीवन की समूहिकता का प्रतीक हैं, जहाँ आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा दिया जाता है, जहाँ फ़िलिस्तीनी गरिमामयी विरासत देखी जा सकती है और उस चेतना का विकास किया जा सकता है जो भविष्य के स्वप्न देखने का विश्वास पैदा कर सके। उस डोसियर के लिए हमारे साथ बात करते हुए ब्रिगेड टू रीड इन फ़्रीडम की पलोमा साइज़ तेजेरो ने हमें बताया था ‘किताबें हमें हमारे होने, हमारे इतिहास के पीछे के कारणों को समझने का मौक़ा देती हैं; ये हमारी चेतना का विकास करती हैं, इसे हमारे अतीत और वर्तमान के स्थान और समय के दायरों से बाहर ले जाती हैं।… किताबों से ही हम असंभव में विश्वास करना सीखते हैं, प्रत्यक्ष में अविश्वास करना भी, ये हमने सिखाती हैं नागरिकों के तौर पर अपने अधिकारों की माँग करना, और अपने कर्तव्यों को पूरा करना भी’। इज़राइल नहीं चाहता कि फ़िलिस्तीनी जनता असंभव में विश्वास करे; वह उनके घरों, अस्पतालों और ज़िंदगियों की ही तरह ख़्वाब देखने की उनकी क्षमता को भी बर्बाद करना चाहता है।
अबू तोहा ने 2014 में ग़ज़ा पर इक्यावन दिनों की बमबारी के बाद एड्वर्ड सईद पब्लिक लाइब्रेरी का निर्माण किया था। उस बमबारी के दौरान कवि ख़ालिद जुमा ने फ़िलिस्तीनियों को बचाए रखने के लिए शायद सबसे सशक्त शोक-गीत लिखा था:
ओ, फ़िलिस्तीन के कमबख़्त बच्चो।
तुम जो मेरी खिड़की के नीचे शोर कर मुझे हर वक़्त सताते हो,
तुम जो मेरी हर सुबह हड़बड़ी और खलबली से भर देते हो,
तुमने जो तोड़ते हो मेरा गुलदान और चुराते हो मेरी बाल्कनी से फूल,
लौट आओ –
और जितना चाहे शोर मचाओ,
और मेरे सारे गुलदान तोड़ डालो,
सब फूल चुरा लो।
लौट आओ,
बस लौट आओ।
बस लौट आओ।
स्नेह सहित,
विजय