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हम अपने क़ातिलों की मेज़बानी नहीं करेंगे: बाईसवाँ न्यूज़लेटर (2026)

दोहन के आधुनिक ढाँचे के पीछे पुरानी उपनिवेशवादी लूट की व्यवस्था ही छिपी है। अफ़्रीका में संप्रभुता और असली आज़ादी के संघर्ष की नींव उपनिवेशवाद-विरोधी विरासत है।

Anthony Okello (Kenya), Orders from Above, 2012.

ऊपर से आदेश, ऐन्थॉनी ओकेल्लो (केन्या), 2012.

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

11 और 12 मई को केन्या के नैरोबी में अफ़्रीका फ़ॉर्वर्ड शिखर सम्मेलन में फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तीस से ज़्यादा अफ्रीकी देशों के नेताओं के सामने घोषणा की कि ‘हम सच्चे पैन-अफ़्रीकावादी [अखिल अफ़्रीका में विश्वास रखने वाले] हैं’। ‘विकास’, ‘नवाचार’ और ‘सहयोग’ की लालफ़ीताशाही वाली घिसीपिटी बातों के बीच कही गई यह एक निहायती बेहूदा बात थी। 

इसके जवाब में खुला पत्र टोगो लेखिका फ़रीदा बेम्बा नबूरेमा लिखा है ‘अपने मूल में पैन-अफ़्रीकावाद वह राजनीतिक दर्शन है जिसने हर उस चीज़ को न कहा जिसे फ़्रांस तीन सदियों से हाँ कहता आया था: दासप्रथा को, उपनिवेशवाद को और नवउपनिवेशवाद को’। नबूरेमा लिखती हैं कि यह दर्शन ‘दासों को ले जाने वाले जहाज़ों में, सेंट-डोमिंग्यू के बाग़ानों में’ उन लोगों ने शुरू किया जो ‘मानते थे कि अफ्रीकी और अफ्रीकी मूल की जनता अपना शासन ख़ुद चलाने का अधिकार रखती है’ और यह मैक्रों की लच्छेदार भाषा में नहीं फँसेगा।

यह 29वाँ फ़्रांस-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन था (जिसे नैरोबी के लिए अफ़्रीका फ़ॉर्वर्ड समिट का नाम दिया गया) लेकिन फिर भी यह पहला सम्मेलन था जो ऐसे अफ्रीकी देश में हुआ जहाँ की आधिकारिक या प्रमुख भाषा फ़्रेंच नहीं है। हालाँकि फ़्रांस इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि एक नया दौर आ चुका है जो कथित रूप से पुरानी फ्रांसाफ्रिक (वह पेचीदा राजनीतिक, आर्थिक, वित्तीय और सैन्य प्रणाली जिससे फ़्रांस ने अपने पुराने अफ़्रीकी उपनिवेशों पर नवउपनिवेशवादी नियंत्रण बनाए रखा) व्यवस्था से आगे निकल चुका है, फिर भी यह सम्मेलन केन्या में कराया जाना महज़ इत्तेफ़ाक नहीं था। यह पश्चिम अफ़्रीका और साहेल क्षेत्र में फ़्रांस की ताक़त के सामने खड़े बड़े संकट को दर्शाता है।

अमीरी से ग़रीबी तक, पॉल ओंडिटी (केन्या), 2020.

बुर्किना फ़ासो की राजधानी औगाडौगू से मैं यह न्यूज़लेटर लिख रहा हूँ और यहाँ लोगों की आम भावना संप्रभुता और फ़्रांसीसी नवउपनिवेशवाद के विरुद्ध है। साहेल के कुछ हिस्सों (बुर्किना फ़ासो, माली और नाइजर) में हुए लोकप्रिय आंदोलन और सैन्य विघटन ने लंबे समय से चले आ रहे फ़्रांसीसी सैन्य समझौतों को बर्बाद किया तथा उस राजनीतिक ढाँचे को नकारा जिसके तहत पेरिस ने यहाँ अपना वर्चस्व बनाए रखा था। नई सरकारों ने फ़्रांसीसी सैनिकों को निकाल दिया और रक्षा समझौते ख़त्म कर दिए। इसके साथ ही जनता में फैले रोष ने फ़्रांसीसी प्रभाव की वैचारिक वैधता को बर्बाद कर दिया। इन सरकारों ने नवउपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ अपनी एकजुटता को अलाइयन्स ऑफ़ साहेल स्टेट्स (साहेल देशों का संगठन/एईएस) के रूप में और पुख़्ता किया। साहेल देशों के किसी भी नेता ने नैरोबी में हुए अफ़्रीका फ़ॉर्वर्ड शिखर सम्मेलन में शिरकत नहीं की। 

फ़्रांस अब अफ़्रीका के पूर्व में आधिकारिक रूप से या मुख्यतः अंग्रेज़ी बोलने वाले देशों की ओर बढ़ रहा है क्योंकि साहेल क्षेत्र में यह अपना अधिकार फिर से स्थापित नहीं कर पा रहा। इसके लिए फ़्रांस नाइजीरिया और इकनॉमिक कम्यूनिटी ऑफ़ वेस्ट अफ़्रीकन स्टेट्स के ज़रिए सैन्य धमकियों तक की सहायता ले रहा है। अब फ़्रांस ख़ुद को नवउपनिवेशवाद के संरक्षक की जगह अफ़्रीकी संप्रभुता के सहयोगी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। 

इस शिखर सम्मेलन की आधिकारिक घोषणा की भाषा एक उदासीन ग़ैर-सरकारी उदारवाद से ली गई है: सह-विकास, डिजिटल बदलाव, ग्रीन औद्योगीकरण, परस्पर सम्मान, समावेशी विकास और वैश्विक शासन तथा वित्तीय ढाँचे में सुधार। लेकिन इस एनजीओवादी उदारवाद के नीचे साम्राज्यवादी शक्ति की वही जानी-पहचानी वास्तविकता है: दोहान के लिए किए जाने वाला निवेश, ऋण निर्भरता और सबसे नाटकीय सैन्य समझौते। यह शिखर सम्मेलन उस समय हुआ जब फ़्रांस और केन्या के बीच हुए हालिया रक्षा समझौते की काफ़ी आलोचना हो रही है और साथ ही केन्या में सैंकड़ों फ़्रांसीसी सैनिक पहुँच चुके हैं। बढ़ते विदेशी सैन्य प्रभाव और आर्थिक निर्भरता के यथार्थ के बीच इस सम्मेलन में संप्रभुता पर चर्चा होना किसी मज़ाक़ से कम नहीं था।

अति-साम्राज्यवादी ताक़तें – फ़्रांस, यूके और यूएस  – साहेल से खदेड़े जाने के बाद इसके किनारों पर सिमट गई हैं। घाना और नाइजीरिया में यूएस सेना मौजूद है तथा केन्या में ब्रिटिश सैन्य अड्डा है। जल्दी ही केन्या में एक फ़्रांसीसी सैन्य अड्डा भी बन जाएगा। इस सैन्य घेरेबंदी से वैश्विक उत्तर को एईएस के ख़िलाफ़ कदम उठाने के लिए आधारभूत ढाँचा मिल जाएगा।

मुखाकृतियों की जीवंतता, एल्तायेब दावेलबैत (सूडान), 2011.

इस शिखर सम्मेलन के बंद दरवाज़ों से परे एक दूसरा अफ़्रीका एकजुट हुआ। औपनिवेशिक दौर में नैरोबी में अश्वेत लोगों को सदस्यता देने वाले पहले संस्थान यूनाइटेड केन्या क्लब में पैन-अफ़्रीकैनिज़्म समिट अगेन्स्ट इम्पीरीयलिज़म (साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ अखिल-अफ़्रीकावादी शिखर सम्मेलन/पीएएसएआई) आयोजित हुआ। यह अफ़्रीका फ़ॉर्वर्ड शिखर सम्मेलन के बरक्स जनता का शिखर सम्मेलन था जिसमें सच्चे अखिल-अफ़्रीकावादी और अंतर्राष्ट्रीयतावादी शामिल हुए जिन्होंने इस महाद्वीप के लिए एक अलग तरह के भविष्य पर विचार किया। इस सम्मेलन के आयोजकों ने कहा कि अफ़्रीका फ़ॉर्वर्ड सम्मेलन ‘पुनः औपनिवेशीकरण’ के अलावा और कुछ नहीं। यह दोहन के पुराने तंत्र को ही एक नई भाषा में पेश कर रहा है। यूरोप में ऊर्जा परिवर्तन के लिए ज़रूरी खनिज, कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए आवश्यक ज़मीन और ट्रांसनेशनल मुनाफ़े के लिए ज़रूरी सस्ता श्रम का लगातार अफ़्रीका से बाहर जाना जारी है। और इसके पीछे छूट जाते हैं ग़रीबी, क़र्ज़ और पर्यावरणीय बर्बादी। पीएएसएआई की घोषणा में कहा गया कि ‘हम अपने क़ातिलों की मेज़बानी नहीं करेंगे। हम उपनिवेशवादी वर्चस्व की नई छावनियाँ नहीं बनेंगे’।

ये शब्द उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ लड़े गए अफ़्रीकी प्रतिरोध के एक सदी से अधिक लंबे इतिहास को समेटे हुए हैं। ये न केवल फ़्रांसीसी सत्ता को संबोधित करते हैं बल्कि उस व्यापक नव-औपनिवेशिक ढाँचे को भी, जो अफ्रीकी विकास को अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूँजी की ज़रूरतों के अधीन बनाए रखता है। अफ़्रीका की संप्रभुता पर शानदार होटलों में उत्तरी राजनीतिक अभिजात वर्ग, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकारियों और निर्भरता के स्थानीय संरक्षकों के बीच बातचीत नहीं की जा सकती है। संप्रभुता बंद कमरों में तैयार किए गए सामूहिक वक्तव्यों से जन्म नहीं लेती, बल्कि मज़दूरों, किसानों, छात्रों और महिलाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी और संगठन के माध्यम से निर्मित होती है। झंडे की आज़ादी से परे, वास्तविक स्वतंत्रता के लिए संसाधनों को नियंत्रित करने, सामाजिक विकास की दिशा, और दक्षिण के देशों द्वारा आकार दिए गए भू-राजनीतिक गठबंधनों के लिए एक एजेंडे की आवश्यकता है। फ़्रांस राजनयिक पुनर्संतुलन और वित्त पूँजी के माध्यम से अफ़्रीका के साथ अपने संबंधों को पुनर्गठित करना चाहता है, जिसमें अफ्रीका के शासक वर्ग के कुछ हिस्से वर्ग निर्भरता को आधुनिकीकरण के रूप में पेश करने को तैयार हैं, जबकि महाद्वीप के लाखों श्रमिक वर्ग के लोग मुद्रास्फीति, बेरोज़गारी, ज़मीन से बेदख़ली, ऋण-जनकल्याण योजनाओं में सरकारी ख़र्च में कटौती और बढ़ते दमन का सामना कर रहे हैं।

शांति के रक्षक, रूथ न्याकुंडी (केन्या), 2017.

पीएएसएआई की आलोचना नैरोबी में विशेष रूप से भारी पड़ी क्योंकि केन्या ख़ुद बीसवीं सदी के महान उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों में से एक के माध्यम से बना था। माउ माउ विद्रोह (1952–1960) की स्मृति आज भी निवेश शिखर सम्मेलनों और कूटनीतिक सजावटों की चमकदार भाषा के पीछे जीवित है। जब पीएएसएआई के प्रतिनिधि केन्याई स्वतंत्रता सेनानी देदान किमाथी की प्रतिमा की ओर मार्च कर रहे थे और उन्हें आँसू गैस झेलना पड़ा, गिरफ़्तार होना पड़ा, तो इस हमले में निहित प्रतीक एकदम साफ़ थे। किमाथी और भूमि एवं स्वतंत्रता सेना (माउ माउ) ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ युद्ध इसलिए नहीं लड़ा था कि ‘रक्षा सहयोग’ की लच्छेदार भाषा के तहत विदेशी सैनिक एक बार फिर केन्याई धरती पर अपनी पैठ बना सकें। न ही उन्होंने इसलिए लड़ाई लड़ी ताकि स्वतंत्रता ऋण निर्भरता, भूमि संकेंद्रण और अंतर्राष्ट्रीय वित्त से जुड़े कंप्राडोर (औपनिवेशिक शासन में विदेशी कंपनियों और साम्राज्यवादी ताक़तों के लिए बिचौलिये का काम करने वाला व्यापारिक वर्ग) अभिजात वर्ग के शासन का रूप ले लें। वामपंथ, ख़ासतौर से कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी – केन्या, के खिलाफ दमन यह दिखाता है कि राष्ट्रीय मुक्ति की याद और विरासत शासक वर्गों के लिए कितनी ख़तरनाक है। यह विरासत आज के अफ्रीका में भूमि, संप्रभुता और सत्ता से जुड़े अनसुलझे प्रश्न पूछती रहती है।

केन्या की अपनी बौद्धिक और साहित्यिक परंपराओं ने लंबे समय से राष्ट्रीय मुक्ति से विश्वासघात के बारे में चेतावनी दी है। मीसेरे गीथे मूगो की ‘डॉटर ऑफ माई पीपल, सिंग!’ (1976) से लेकर न्गुगी वा थिओंगो के ‘पेटल्स ऑफ ब्लड’ (1977) तक, केन्याई लेखक समझ गए थे कि औपनिवेशिक शासन की समाप्ति से शोषण के ढाँचे अपने आप नहीं ढह जाते। न्गुगी के उपन्यास बार-बार कंप्राडोर अभिजात वर्ग के चरित्र पर लौटते हैं, जो स्थानीय बिचौलिया होता है और औपनिवेशिक राज्य का उत्तराधिकारी बनकर उसे पूँजी के लिए काम करने के लिए तैयार करता है। पियो गामा पिंटो (1927–1965) केन्याई समाजवाद के महान शहीदों में से एक हैं। उन्होंने चेतावनी दी थी कि श्वेत उपनिवेशवादियों को अश्वेत पूँजीपति वर्ग से बदलना मुक्ति नहीं होगा। ये परंपराएँ इस बात पर ज़ोर देती हैं कि संप्रभुता को केवल झंडों, गानों या चुनावों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका असली मतलब है भूमि, श्रम, संसाधनों और लोगों का अपने सामाजिक भाग्य पर नियंत्रण होना।

केन्याटा मार्केट (नैरोबी, केन्या का एक प्रसिद्ध बाजार), नादिया वामुन्यु (केन्या), 2020.

माउ माउ के नेतृत्व में चले उपनिवेशवाद-विरोधी युद्ध के दौरान, ऐसे गीत गाँव-गाँव तक पहुँचते थे जो किसानों की कल्पना को जगाते थे और उन्हें संघर्ष में खींच लेते थे। इन गीतों ने उपनिवेशवाद-विरोधी दर्शन को प्रचारित किया, लोगों को विशाल चुनौतियों के ख़िलाफ़ उठने और लड़ने के लिए प्रेरित किया। ऐसे गीत इथाका ना वियाथी (भूमि और स्वतंत्रता) के उपनिवेशवाद-विरोधी नारे को दर्शाते हैं – एक भावना जो राष्ट्रीय मुक्ति को किसी समारोह के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक संघर्ष के रूप में देखती है। ये गीत उनके नेताओं, लड़ाइयों, दुश्मनों और विश्वासघातियों पर केंद्रित थे।

उनमें से एक है त्वारिकानिरे (हम सहमत हुए थे), जो आने वाले समय के बारे में चेतावनी देता है – लड़ाकों का एक दल जो ‘एक लट्ठा ढोने पर सहमत हुआ था, लेकिन नदी के बीच में कुछ भाग गए और हमारा घर बेच दिया।’ मुंडू नदांगिरिया किंदू अताथिथिनीरे वे गाते थे। ‘जिस चीज़ के लिए पसीना नहीं बहाया, उसे कोई नहीं खाता।’

स्नेह सहित,

विजय