K.C.S. Paniker (India), Words and Symbols, 1968.

के.सी.एस. पणिकर (भारत), शब्द और प्रतीक, 1968.

 

प्यारे दोस्तों,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

1845 में, कार्ल मार्क्स ने जर्मन आइडियोलॉजी के लिए कुछ नोट्स लिखे, एक ऐसी किताब जो उन्होंने अपने क़रीबी दोस्त फ़्रेडरिक एंगेल्स के साथ लिखी थी। मार्क्स की मृत्यु के पाँच साल बाद 1888 में एंगेल्स को ये नोट्स मिले और उन्होंने थीसिस ऑन फ़ायरबाख़ नाम से इसे प्रकाशित किया। ग्यारहवीं थीसिस सबसे प्रसिद्ध है: ‘दार्शनिकों ने केवल विभिन्न तरीक़ों से दुनिया की व्याख्या की है; हालाँकि, सवाल इसे बदलने का है

पिछले पाँच वर्षों से, हमने, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में, इस थीसिस पर बहुत ध्यान से विचार किया है। इस थीसिस की सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत व्याख्या यह है कि, इसमें, मार्क्स लोगों से केवल दुनिया की व्याख्या करने का आग्रह करते हैं, बल्कि इसे आज़माने और बदलने का भी आग्रह करते हैं। हालाँकि, हम यह नहीं मानते हैं कि यह व्याख्या इस वाक्य के अर्थ को पूरी तरह अभिव्यक्त करता है। हमारा मानना ​​है कि मार्क्स कह रहे हैं कि जो लोग दुनिया को बदलने की कोशिश करते हैं, उन्हें इसकी बाधाओं और संभावनाओं का बेहतर बोध होता है, इसके लिए वे उन चीज़ों से टकराते हैं, जिसे फ़्रांत्ज़ फ़ैनन शक्ति, संपत्ति और विशेषाधिकार काग्रेनाइट ब्लॉककहते हैं, जो अन्याय से न्याय की ओर जाने के रास्ते में बाधा उत्पन्न करते हैं। यही कारण है कि ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में हम अपने विश्लेषण को उस ज्ञान से विकसित करते हैं जिसे राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों ने वर्षों से संचित किया है। हमारा मानना ​​है कि जो लोग दुनिया को बदलने के लिए संघर्ष करते हैं, उनके पास इसे परिभाषित करने वाली संरचनाओं के बारे में एक निश्चित समझ होती है।

 

Francis Newton Souza (India), The Foreman, 1961.

फ्रांसिस न्यूटन सूजा (भारत), फोरमैन, 1961.

 

दुनिया भर में जन आंदोलन श्रमिकों और किसानों की शिकायतों और आशाओं से निकलते हैं, ऐसे लोग जो थोड़ीसी संपत्ति के लिए पूँजी जमा करने के लिए शोषित होते हैं और सामाजिक पदानुक्रम द्वारा उत्पीड़ित होते हैं। यदि पर्याप्त लोग भूख या निरक्षरता की कठोर वास्तविकताओं के सामने समर्पण करने से इनकार करते हैं, तो उनके कार्य विद्रोह में बदल सकते हैं, या क्रांति में भी बदल सकते हैं। समर्पण करने से इंकार करने के लिए आत्मविश्वास और स्पष्टता की आवश्यकता होती है।

आत्मविश्वास रहस्यमयी चीज़ है, कभी यह व्यक्तित्व की शक्ति से आती है तो कभी अनुभव की शक्ति से। यह जानने से स्पष्टता आती है कि शोषण और दमन का हथौड़ा कौन चला रहा है और शोषण तथा उत्पीड़न की ये प्रणालियाँ कैसे काम करती हैं। यह ज्ञान काम और जीवन के अनुभवों से निकलता है, लेकिन इन स्थितियों से ऊपर उठने के संघर्ष के माध्यम से इसे तेज़ किया जाता है।

 

 

संघर्ष में निर्मित आत्मविश्वास और स्पष्टता आसानी से समाप्त हो सकती है अगर उसे संगठन का जामा पहनाया जाए, चाहे वह किसान संगठन हो, महिला संगठन हो, ट्रेड यूनियन हो, कोई सामुदायिक समूह हो या एक राजनीतिक दल। जैसेजैसे ये संगठन विकसित होते हैं और परिपक्व होते हैं, वे लोगों के नेतृत्व में अनुसंधान करने की आदत को विकसित करते हैं और ऐसा करते हुए एक ऐतिहासिक चेतना का निर्माण करते हैं, राजनीतिक संयोजन का विश्लेषण करते हैं, और पदानुक्रम के कारकों का स्पष्ट मूल्यांकन करते हैं।

एक्टिविस्ट रिसर्च करने की यह प्रक्रिया हमारे साक्षात्कार का केंद्र बिंदु है, जो साक्षात्कार हमने अपने डोजियर संख्या 58 (नवंबर 2022) के लिए अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA) की आर. चंद्रा के साथ किया है। चंद्रा हमें बताती हैं कि कैसे AIDWA कार्यकर्ताओं ने दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में महिलाओं के रहने और काम करने की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए सर्वेक्षण किया, और वह यह भी बताती हैं कि कैसे इन सर्वेक्षणों से शोषण और उत्पीड़न के बारे में जानकारी मिली जो AIDWA के अभियान का आधार बन गए हैं। इन अभियानों के माध्यम से, AIDWA ने सत्ता, विशेषाधिकार और संपत्ति केग्रेनाइट ब्लॉकके बारे में और अधिक जाना है। संघर्ष और सर्वेक्षण के बीच पुनरावर्ती प्रक्रिया ने संगठन को अपना सिद्धांत बनाने और अपने संघर्ष को मज़बूत करने में सक्षम बनाया है।

 

 

चंद्रा हमें विस्तार से बताती हैं कि कैसे AIDWA ने सर्वेक्षणों की रूपरेखा तैयार की, कैसे स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उन्हें संचालित किया, कैसे उनके परिणामों ने ठोस संघर्षों को जन्म दिया, और कैसे उन्होंने AIDWA के सदस्यों को अपने समाज का एक स्पष्ट मूल्यांकन विकसित करने के लिए प्रशिक्षित किया और लोगों की समस्याओं का समाधान करने के लिए किस प्रकार संघर्ष करना पड़ता है। चंद्रा हमें बताती हैं, ‘एडवा के सदस्यों को अब अपनी मदद के लिए प्रोफ़ेसर की ज़रूरत नहीं है। जब वे कोई मुद्दा उठाती हैं तो स्वयं प्रश्न तैयार करती हैं और अपने क्षेत्र स्वयं अध्ययन करती हैं। चूँकि वे महिलाएँ अध्ययन के महत्व को जानती हैं, इसलिए वे AIDWA के स्थानीय कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं, चाहे इस शोध को संगठन के अभियानों के लिए इस्तेमाल में लाना हो, शोध के निष्कर्षों पर हमारी विभिन्न समितियों में चर्चा करना हो, तथा इसे हमारे विभिन्न सम्मेलनों में प्रस्तुत करना हो

इस एक्टिविस्ट रिसर्च से केवल उन पदानुक्रमों के बारे जानाकारी मिलती है जो किसी विशेष स्थान पर संचालित होते हैं, बल्कि यह कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए प्रशिक्षित भी करता है वे अपने संघर्षों केनये बुद्धिजीवीतथा अपने समुदायों के नेता भी बनें।

 

 

पिछले कुछ वर्षों में, अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के आंदोलन के नेताओं के साक्षात्कार के आधार पर ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में हमारी टीम ने एक्टिविस्ट रिसर्च की अपनी शोध प्रविधि विकसित करनी शुरू कर की है, प्रैक्सिस (सिद्धांत और व्यवहार का द्वंद्वात्मक संबंध) से ज्ञान का निर्माण करने की एक प्रविधि। इस शोध प्रविधि में पाँच मुख्य अक्ष होते हैं:

  1. हमारे शोधकर्ता लोकप्रिय आंदोलनों के नेताओं से मिलते हैं और निम्नलिखित के बारे में उनके साथ लंबे साक्षात्कार करते हैं::
    1. आंदोलन का इतिहास
    2. आंदोलन बनाने की प्रक्रिया
    3. आंदोलन की सीमाएँ और शक्ति
  2. फिर हमारी टीम साक्षात्कार का अध्ययन करती है, लिखित प्रतिलिपि (ट्रांसक्रिप्ट) को ध्यान से पढ़ती है, और इस बात का विश्लेषण प्रस्तुत करती है कि आंदोलन का सार क्या रहा और यह किस प्रकार का सिद्धांत विकसित कर रहा है। प्रारंभिक साक्षात्कार को ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान द्वारा एक पाठ (टेक्स्ट) के रूप में प्रकाशित किया जा सकता है, जैसा कि हमने सेंटर ऑफ़ ट्रेड यूनियन (CITU) की अध्यक्ष के. हेमलता, दक्षिण अफ्रीका के झोपड़पट्टियों के आंदोलन अबाहलाली बासेमजोंदोलो के सुबु ज़िकोदे और ब्राजील के भूमिहीन श्रमिक आंदोलन के नेउरी रोसेटो के साक्षात्कार के साथ किया।
  3. साक्षात्कार में प्रस्तुत विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ता उन मुख्य विषयों को अलग करते हैं जो उपयोगी जान पड़ते हैं और इन विषयों को विस्तृत अध्ययन के लिए अलग रख लिया जाता है। फिर इन विषयों को आंदोलन के नेताओं के साथ सझा किया जाता है और उनका इनपुट लिया जाता है।
  4. जब इन विषयों पर सहमति बन जाती है, तो हमारे शोधकर्ताकभीकभी आंदोलन के शोधकर्ताओं के साथसाथ, कभीकभी अपने दम परप्रासंगिक अकादमिक साहित्य को पढ़कर इन विषयों के अध्ययन की रूपरेखा बनाते हैं और आंदोलन के साथ तालमेल बिठाकर इन विषयों का अध्ययन करते हैं (जैसे और अधिक साक्षात्कार) और साथ ही लोगों के बीच सर्वेक्षण करते हैं। इस प्रकार का शोध परियोजना का केंद्र बिंदु बन जाता है।
  5. फिर अनुसंधान का विश्लेषण किया जाता है, एक लेख (टेक्स्ट) की तरह विस्तार दिया जाता है, और आंदोलन के नेताओं के साथ उनके इनपुट और मूल्यांकन के लिए साझा किया जाता है। आंदोलन के सहयोग से प्रकाशन के लिए एक अंतिम पाठ तैयार किया जाता है।

इस तरह से हम अपना काम करते हैं, यह एक्टिविस्ट रिसर्च का हमारा स्वरूप है जिसे हमने AIDWA जैसे संगठनों से सीखा है।

 

 

जब हम एक्टिविस्ट रिसर्च पर आधारित अपना डोजियर प्रकाशित कर रहे हैं, उसी समय दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ़्रेमवर्क कन्वेंशन के लिए पार्टियों के सम्मेलन (COP) के 27वें संस्करण के लिए शर्मअलशेख (मिस्र) में इकट्ठा हुए, एक ऐसा सम्मेलन जिसका लोगों की भावनाओं से कोई तालमेल नहीं रह गया है। यह 27वीं सीओपी है, जिसकी फ़ंडिंग अन्य लोगों/समूहों के साथसाथ कोकाकोला ने भी की है, जो पानी और धरती को बर्बाद करने वालों में से एक है। इस बीच, काहिरा में, इस रिसॉर्ट शहर से कुछ ही दूरी पर, मानवाधिकार कार्यकर्ता अला अब्द अलफ़तह जेल में बंद हैं, जहाँ वह पिछले एक दशक से हैं। उन्होंने फ़ैसला किया है कि अब वे अपनी भूख हड़ताल के दौरान पानी भी नहीं पिएंगे, वह पानी जिसका कोकाकोला जैसी कंपनियों द्वारा तेज़ी से निजीकरण किया जा रहा है और चोरी भी, जैसा कि गाइ स्टैंडिंग ने इसे ब्लू कॉमन्स नामक किताब में दर्ज किया है। इस COP से कुछ भी अच्छा नहीं निकलेगा, जलवायु आपदा को रोकने के लिए कोई समझौता नहीं होगा।

पिछले साल, मैंने ग्लासगो में COP26 बैठक में भाग लिया था। पीसीआर परीक्षण के लिए क़तार में खड़े होने के दौरान, मैं तेल कम्पनी के अधिकारियों के एक समूह से मिला, जिनमें से एक ने मेरे प्रेस बैच को देखा और मुझसे पूछा कि मैं सम्मेलन में क्या कर रहा था। मैंने उन्हें बताया कि मैंने हाल ही में उत्तरी मोज़ाम्बिक के काबो डेलगाडो में भयानक स्थिति के बारे में रिपोर्ट की थी, जहाँ लोग फ़्रांसीसी कम्पनी टोटल और अमेरिकी कम्पनी एक्सॉनमोबिल के नेतृत्व वाली गैस उत्खनन परियोजना के ख़िलाफ़ खुला विद्रोह कर रहे थे। उनके क्षेत्र से निकाली गई गैस से होने वाले लाभ के बावजूद वहाँ को लोग अत्यधिक ग़रीबी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस असमानता का समाधान करने के बजाय, मोज़ाम्बिक, फ़्रांस और संयुक्त राज्य की सरकारों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारी आतंकवादी थे और रवांडा की सेना से हस्तक्षेप करने के लिए कहा।

जैसे ही हम लाइन में खड़े हुए, एक तेल कम्पनी के अधिकारी ने मुझसे कहा, ‘आप जो कुछ भी कह रहे हैं वह सच है। लेकिन किसी को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता है एक घंटे बाद, ग्लासगो के एक हॉल में जलवायु बहस के बारे में मुझसे मेरी राय पूछी गई, जिसकी शर्तों को जीवाश्म ईंधन के अधिकारियों और प्रकृति के निजीकरणकर्ताओं द्वारा तय किया गया है। मैंने ये कहा:

 

 

अफ़सोस की बात है कि एक साल बाद भी हस्तक्षेप की ज़रूरत बरक़रार है।

स्नेहसहित

विजय