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जलवायु परिवर्तन की भट्टी में जल रहा है मेहनतक़श वर्ग: बयालीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)

आज दुनिया में करोड़ों मज़दूर भीषण गर्मी में काम करने को मजबूर हैं। इस कारण वे अनेक तरह की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।

ट्राईकॉन्टिनेंटल के डोसियर न. 93, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis, में प्रयुक्त एक चित्र

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

बीती गर्मियों में उष्णकटिबंधीय शहरों में कुछ दिन इतने गर्म थे कि धूप में निकल पाना भी असहनीय था। उदाहरण के लिए टोगो के मांगो शहर में मार्च और अप्रैल का तापमान 44°C तक पहुँच गया। तापमान दिखाने वाले नक़्शों से लगा मानो दुनिया जल रही हो, भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर जाती हुईं लाल लपटों ने जैसे इसे लील लिया हो। अगर हवा का तापमान 44°C होता है तो डामर और बजरी से बनी सतहों का तापमान 60°C तक जा सकता है। 60°C पर पाँच सेकंड से भी कम में जलने की वजह से द्वितीय डिग्री के छाले पड़ सकते हैं इसलिए जो लोग भी इतने तापमान का सामना करते हैं उनकी त्वचा जल सकती है। इन जलते हुए शहरों की सड़कों पर जूते पहनकर ही बमुश्किल चला जाता है।

सोचिए उन लाखों लोगों का क्या होता होगा जिनके पास ढंग के जूते-चप्पल नहीं हैं, लेकिन उन्हें भरी दोपहर में रोज़ी-रोटी कमाने के लिए निकलना पड़ता है। बढ़ते तापमान के कारण लोग बीमार न पड़ जाएँ इसलिए मुट्ठीभर देशों ने बाहर काम करने पर प्रतिबंध लगाया है, इनमें से अधिकतर देश अरब प्रायद्वीप और दक्षिणी यूरोप के हैं। लेकिन इन देशों में भी गर्मी का सामना करते हुए निर्माण मज़दूर और सफ़ाई कर्मचारी खुले में काम करते नज़र आ जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में काम करना जानलेवा हो सकता है, जैसे कि 2022 के क़तर फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप के लिए स्टेडियमों के निर्माण के समय देखा गया।

वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाईज़ेशन और विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक नई रिपोर्ट, Climate Change and Workplace Heat Stress [जलवायु परिवर्तन और काम की जगह पर हीटस्ट्रेस] के अनुसार दुनिया के श्रमबल का 70% – यानी 240 करोड़ मज़दूर अत्यधिक गर्मी की चपेट में आने का ख़तरा झेल रहे हैं। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 20°C तापमान से ऊपर प्रति डिग्री मज़दूरों की उत्पादकता 2% से 3% घट जाती है। धूप में काम करने वाले मज़दूर हीटस्ट्रोक, शरीर में पानी की कमी, गुर्दों के काम न करने और तंत्रिका-तंत्र से जुड़ी बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। इसके बावजूद दुनिया में गर्मी या तापमान संबंधी समस्याओं की वजह से काम की जगह पर मरने वाले लोगों का कोई सही आंकड़ा नहीं रखा जाता।

ट्राईकॉन्टिनेंटल के डोसियर न. 93,The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis, का मुख्य चित्र, साभार ©️ Sebastião Salgado

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की ओर से एक अच्छी खबर यह है कि इसने एक कमेटी का गठन किया है जो जलवायु परिवर्तन और शहरों पर विशेष रिपोर्ट तैयार करेगी, जो मार्च 2027 में जारी की जाएगी। इस विषय पर अब तक हमारे सामने सिर्फ़ एक ही व्यापक अध्ययन आया है, 2022 की आईपीसीसी रिपोर्ट का अध्याय छह जो शहरी केंद्रों की चर्चा करता है। इस अध्याय का शीर्षक था ‘Cities, Settlements, and Key Infrastructure’ [शहर, बसावटें और आवश्यक आधारभूत संरचना/इंफ़्रास्ट्रक्चर]। इसमें जो मुख्य बात सामने आयी वह यह कि वैश्विक दक्षिण की अनधिकृत शहरी बसावटों में रहने वाली 100 करोड़ जनता जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएँ झेलने को मजबूर है। मैंग्रोव और वेटलैंड जैसे ग्रीन और ब्ल्यू इंफ़्रास्ट्रक्चरों का निजीकरण किया जा रहा है, या इनके ऊपर इमारतें बन रही हैं या इन्हें बर्बाद किया जा रहा है, इसकी वजह से निरंतर फैल रहे शहर जलवायु परिवर्तन के अनुसार ख़ुद को ढाल नहीं पा रहे। इस रिपोर्ट की जानकारियों के आधार पर इंटरनेशनल इन्स्टिट्यूट फ़ॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट शहरी इलाक़ों में गर्मियों में बढ़ते तापमान का अध्ययन कर रहा है और इसने 30 सितंबर 2025 की अपनी ब्रिफिंग में बताया कि दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले चालीस शहरों में 35°C से अधिक तापमान वाले दिनों की संख्या 1994 के मुक़ाबले 26% बढ़ गई है। दुनिया का 70% उत्सर्जन और ऊर्जा की खपत शहरों में होती है; हमें उम्मीद है कि 2027 में आने वाली आईपीसीसी की रिपोर्ट इस तथ्य पर ध्यान देगी कि कैसे दुनिया का श्रमिक वर्ग बढ़ते तापमान के प्रभावों को अपेक्षाकृत अधिक झेलने पर मजबूर है। आशा है इससे शहरों और जलवायु परिवर्तन को लेकर विचार-विमर्श आगे बढ़ेगा।

फ़िलहाल, मैं आप सभी से अपना नवीनतम डोसियर, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis [पर्यावरण संकट पूँजीवाद से उपजा संकट है], पढ़ने, डाउनलोड करने और दूसरों के साथ ज़्यादा-से-ज़्यादा साझा करने तथा इस पर चर्चा करने का निवेदन करता हूँ। इसे लिखा है ब्राज़ील की हमारी टीम ने। अगले महीने ब्राज़ील के बेलेम में होने वाले संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन यानी COP 30 से पहले इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि सम्मेलन से पहले दुनियाभर में होने वाली बैठकों में इसे उन लोगों के साथ साझा किया जा सके जो जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव कम करने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

COP प्रक्रिया से हमें ज़्यादा उम्मीद नहीं क्योंकि यह पूरी प्रणाली ही जलवायु परिवर्तन से लड़ने का दिखावा करने वाले पूँजीपतियों के हाथों में जा चुकी है, ये पूँजीपति मसीहा बनने का स्वाँग रचकर यथास्थिति को ही बनाए रखना चाहते हैं। उदाहरण के लिए:

  • ग्लोबल विट्नस के अनुसार मिस्र के शर्म अल शेख़ में हुए COP 27 में जीवाश्म ईंधन (फ़ॉसिल फ़्यूअल) की पैरवी करने वाले 636 लोगों को आने की अनुमति दी गई। इसका मतलब है कि मूलनिवासियों के यूएन के मान्यता प्राप्त क्षेत्रों के अधिकारों से दोगुना जीवाश्म ईंधन की पैरवी करने वाले लोगवहाँ थे।
  • किक आउट बिग पोल्यूटरस् के मुताबिक़ संयुक्त अरब अमीरात के दुबई में हुए COP 28 में जीवाश्म ईंधन की पैरवी करने वाले 2,456 लोगों ने शिरकत की थी। यह ग्रुप इस सम्मेलन में आए किसी भी अन्य प्रतिनिधि मंडल से बड़ा था।
  • अज़रबैजान के बाकू में हुए COP 29 में जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा दंश झेल रहे दुनिया के दस देशों के प्रतिनिधियों से ज़्यादा जीवाश्म ईंधन की पैरवी करने वाले मौजूद थे।

इसके बावजूद हम इतना ज़रूर मानते हैं कि COP की प्रक्रिया उन बहसों को फिर ज़िंदा करती हैं जो जन आंदोलनों की चेतना को आकार देने और जीवित रखने के लिए ज़रूरी हैं।

ट्राईकॉन्टिनेंटल के डोसियर न. 93,The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis, में प्रयुक्त एक चित्र

हमारे डोसियर के कई अहम पहलुओं में से मैं आठ माँगों पर रौशनी डालना चाहूँगा जो जलवायु परिवर्तन संकट का सामना करने के लिए ब्राज़ील के भूमिहीन मज़दूर आंदोलन (एमएसटी) के साथ मिलकर तैयार किए गए एक अजेंडे से लिए गए हैं:

  1. पर्यावरणीय ऋण के लिए वैश्विक उत्तर की जवाबदेही तय हो। भूतपूर्व उपनिवेशवादी राष्ट्रों ने कार्बन उत्सर्जन की ऊपरी सीमा का ज़बर्दस्त फ़ायदा उठाया है और ग्रीन क्लाइमेट फंड में धन देने के खोखले वादे करते हैं। अब समय आ गया है कि वे अपना ये क़र्ज़ चुकाएँ।
  2. ग्रीनवॉशिंग (पर्यावरण की रक्षा का झूठा दिखावा) बंद किया जाए। कार्बन बाज़ारों और इससे जुड़ी तमाम उन योजनाओं के विचार को ख़ारिज किया जाए जो साझी संपदा (वायु, जैवविविधता और जंगलों) को बिकाऊ वस्तु बना देना चाहती हैं।
  3. पर्यावरण नीति पर कॉर्पोरेट की जगह सामूहिकता के विचार की पैरवी की जाए।
  4. कृषि सुधारों को बढ़ावा दिया जाए और किसानों तथा मूलनिवासियों के समुदायों की ज़मीनों की रक्षा की जाए। भूमि पुनर्वितरण, सामूहिक भूमि अधिकारों, बीजों पर अधिकार और जैव विविधता को बचाने के लिए संवैधानिक नियम बनाए और लागू किए जाएँ।
  5. खाद्य और जल संप्रभुता का निर्माण। निर्यातोन्मुख एकफसली कृषि (मोनोकल्चर) को ऐसी कृषि-पारिस्थितिकी और सहकारी खाद्य प्रणालियों से बदलें जो खाद्य उत्पादन और वितरण को लोकतांत्रित बनाएँ। खाद्य सामग्री से मुनाफ़ा कमाने की होड़ की जगह भोजन के अधिकार को तरजीह दी जाए।
  6. सामुदायिक नियंत्रण में पुनर्वनरोपण किया जाए। कार्बन उत्सर्जन पर क़ाबू पाने में मददगार बड़े वर्षावनों की रक्षा की जाए।
  7. पर्यावरण की बर्बादी को अपराध घोषित किया जाए। जो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ प्रकृति का विनाश कर रही हैं उन्हें सज़ा देने के लिए क़ानूनी प्रणाली तैयार की जाए और ऐसी कंपनियों के ख़िलाफ़ अपने देशों और जहाँ अपराध हुए उन देशों, दोनों जगह मुक़दमें चलाए जाने चाहिए।
  8. ऊर्जा परिवर्तन की एक न्यायोचित, योजनाबद्ध और सामाजिक नीति लागू की जाए। ऊर्जा के नए स्रोतों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण होना चाहिए और इनको मुनाफ़ाखोरी से दूर रखा जाना चाहिए।

हम इन बिंदुओं पर दुनियाभर के अपने सहयोगियों से बातचीत करने को उत्सुक हैं। ऐसी बातचीत बंद दरवाज़ों के पीछे नहीं होनी चाहिए।

COP 30 से जुड़ी बहस को व्यापक करने के लिए हमारे शोधकर्ता होज़े सेओने ने स्पैनिश भाषा में एक पॉड्कास्ट शुरू किया है जिसका नाम है Los pueblos frente a la crisis climática [जलवायु परिवर्तन का सामना करती जनता] आप इसके पहले तीन एपिसोड यहाँ सुन सकते हैं।

इस डोसियर में इस्तेमाल किए गए चित्र एमएसटी के दोस्त सबस्तीयो सल्गाडो (1944-2025) की एक बेहतरीन शृंखला से लिए गए हैं। सल्गाडो ने अपने जन्मस्थान मिनास गेरास में पुनर्वनरोपण के लिए एक संस्था बनायी है। कम ही लोग जानते हैं कि सल्गाडो ने अपने करियर की शुरुआत इंटरनेशनल कॉफ़ी ऑर्गनाइज़ेशन में एक अर्थशास्त्री के रूप में की थी, इस एजेंसी को यूएन का समर्थन प्राप्त था। दुनियाभर के कॉफ़ी प्लांटों का दौरा करते-करते ही उन्होंने मज़दूरों की ताक़त को सराहना सीखा। उन्होंने कलम की जगह तूलिका उठा ली।

ट्राईकॉन्टिनेंटल के डोसियर न. 93,The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis, में प्रयुक्त एक चित्र

13 मार्च, 2024 को जूलियो सेसर सेंटेनो ग्रुपो लेडेसमा के संतरे और नींबू के बाग़ों में काम करने गए। यह अर्जेंटीना का एक अत्यंत लाभदायक व्यवसाय है, जिसने पिछले बारह महीनों में 82.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आय हासिल की। ये बाग़ उत्तरी अर्जेंटीना के जूजूय प्रांत के लिबर्टाडोर जनरल सान मार्टिन शहर में स्थित हैं, इसका नाम स्पेन के विरुद्ध दक्षिण अमेरिका की आज़ादी की लड़ाई के एक नेता के नाम पर रखा गया। उस दिन तापमान 40°C से ज़्यादा था। सेंटेनो, जिन्हें Penano (शोषित) और Brujo (जादूगर) भी कहा जाता है, ने सुबह 10 बजे काम शुरू होने के कुछ ही समय बाद गर्मी से हो रही परेशानी की शिकायत की। लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। उन्हें ManpowerGroup नाम की अमेरिका (यूएस) स्थित एक अस्थाई मज़दूर मुहैया करवाने वाली कंपनी ने काम दिया था। सेंटेनो को बार-बार सीढ़ी चढ़ते-उतरते नींबू तोड़ने का काम जारी रखने पर मजबूर किया गया। दोपहर बारह बजते-बजते उन्हें एक दौरा पड़ा और वे बेहोश हो गए। एम्बुलेंस को वहाँ पहुँचने में एक घंटा लगा जिसके बाद सेंटेनो को ओस्कर ओरीयस रीजनल हॉस्पिटल पहुँचाया गया। वहाँ के डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन शरीर में ज़हर फैलने की वजह से सेंटेनो की मौत हो गई।                  

लेडेसमा का एक बहुत भयानक इतिहास है। कंपनी ने अर्जेंटीना में 1976-1983 में तानाशाही के दौरान दर्जनों मज़दूरों को ग़ायब कर दिया था। सेंटेनो की मौत के बाद भी कंपनी ने मज़दूरों को काम जारी रखने के लिए मजबूर किया। ये मज़दूर हर दिन 500 किलो फल तोड़ते थे। अर्जेंटीना यूनियन ऑफ़ रूरल वर्कर्स एंड स्टीवडॉर्ज़ (UATRE) ने दो दिन बाद मज़दूरों के साथ एकजुटता दिखाते हुए बयान जारी किया, लेकिन इन मज़दूरों के पास कंपनी पर दबाव डाल पाने की कोई शक्ति नहीं है।

सेंटेनो की मौत कोई ख़ास घटना नहीं। हमारे सामने ऐसी कितने ही मज़दूरों की कहानियाँ हैं जिन्हें क़ानूनी या यूनियन की सुरक्षा के बग़ैर काम पर रखा जाता है जो मुनाफ़ाखोरों के लालच के लिए तिल-तिलकर मरने को मजबूर हैं।

स्नेह सहित,

विजय