पूँजीवादी जलवायु संकट से त्रस्त है धरती: उनचासवाँ न्यूज़लेटर (2025)
वैश्विक उत्तर जलवायु संकट रोकने के लिए अपनी वित्तीय ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहा। वहीं COP30 ने उजागर किया कि जलवायु संरक्षण में वर्ग संघर्ष का क्या महत्व है।
घुलनशील पदार्थ, नाज़गुल अंसारिनिया (ईरान), 2020
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
ब्राज़ील के बेलेम दो पारा में हुए 30वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ़्रेमवर्क सम्मेलन (COP30) की समापन बैठक में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने एक दमदार भाषण दिया। ग्रेनेडा के स्टील एक लंबे समय तक कॉर्पोरेट क्षेत्र में नौकरी करने के बाद, अपने देश की कॉर्पोरेटपरस्त न्यू नेशनल पार्टी की सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि ‘इस साल अस्वीकृति, विभाजन और भूराजनीति ने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को काफ़ी नुक़सान पहुँचाया है’। इसके बावजूद उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘जलवायु पर आपसी सहयोग जीवित और सक्रिय है, तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के दृढ़ संकल्प के साथ पृथ्वी को मानवता के रहने योग्य बनाने की लड़ाई जारी है।’ जब मैंने स्टील का भाषण सुना तो मुझे लगा कि वे शायद किसी और ही ग्रह की बात कर रहे हैं।
मई 2025 में, विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने एक रिपोर्ट जारी कर चेतावनी दी कि 86% आशंका है कि 2025 और 2029 के बीच कम से कम एक वर्ष में वैश्विक औसत सतह-समीप तापमान पूर्व-औद्योगिक (1850–1900) औसत से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाएगा – जो 2015 में पेरिस समझौते में निर्धारित सीमा है; इसने यह भी चेतावनी दी कि 70% आशंका है कि 2025–2029 के लिए पाँच-वर्षीय औसत भी उस औसत से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगा। अक्टूबर 2025 के अंत में, COP30 से महज़ कुछ हफ़्ते पहले, अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज ने ‘द 2025 स्टेट ऑफ द क्लाइमेट रिपोर्ट: अ प्लैनेट ऑन द ब्रिंक‘ प्रकाशित की, जिसमें पाया गया कि ‘वर्ष 2024 ने एक नया वैश्विक सतह तापमान का रिकॉर्ड क़ायम किया, जो जलवायु संबंधी उथल-पुथल के बढ़ने का संकेत है‘ और कि ’34 ग्रह संबंधी महत्त्वपूर्ण संकेतकों में से 22 रिकॉर्ड स्तर पर हैं‘। एक बात ज़रूर है कि स्टील ने यह भी नहीं कहा कि हम आत्मसंतुष्ट हो जाएँ। उन्होंने कहा कि ‘मैं यह नहीं कह रहा कि हम जलवायु लड़ाई जीत रहे हैं। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि हम अभी इस लड़ाई में बने हुए हैं और हम पलटवार कर रहे हैं‘।
इस एक बात पर हमारे बीच सहमति है।
पिघलता हिमखंड, सू यू (चीन), 2022
उसी महीने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने ‘अनुकूलन अंतराल रिपोर्ट 2025: रनिंग ऑन एम्प्टी‘ नामक एक चौंकाने वाली रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट केवल वैश्विक उत्तर से जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए मिलने वाली अपर्याप्त वित्तीय सहायता की तस्वीर ही नहीं पेश करती बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे वैश्विक दक्षिण को व्यवस्थित तरीक़े से उसके हाल पर छोड़ दिया गया है; यह एक ऐसी दुनिया का वर्णन करती है जो ‘जलवायु परिवर्तन से लड़ने की तैयारी कर रही है – लेकिन वहाँ पहुँचने के लिए अनिवार्य संसाधनों के बिना‘। इस पूरे मुद्दे के केंद्र में तो धन ही है। जलवायु परिवर्तन को रोकने या पलटने के लिए निधि देने का वादा सबसे पहले COP3 (क्योटो, 1997) में स्वच्छ विकास तंत्र के तहत किया गया, फिर COP7 (मराकेश, 2001) में अल्प विकसित देश कोष और विशेष जलवायु परिवर्तन कोष के ज़रिए। लेकिन इसमें कुछ सफलता मिली COP15 (कोपेनहेगन, 2009) में जब उत्तर के धनी देशों ने 2020 तक विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त में 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष जुटाने का संकल्प लिया। लेकिन कोपेनहेगन में किए गए वादे भी खोखले थे: अमीर राष्ट्रों पर इस 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को पूरा करने की कोई संधिगत बाध्यता नहीं थी, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई, जिससे सुनिश्चित किया जा सके कि ये देश वादे को पूरा करें, और जितनी धन राशि का वादा किया गया था उसका अधिकांश हिस्सा अनुदान के बजाय ऋण के रूप में दिया गया।
कोपेनहेगन के 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष के संकल्प को COP21 (पेरिस, 2015) में दोहराया गया और इसकी सीमा बढ़ाकर 2025 कर दी गई। COP26 (ग्लासगो, 2021) में अमीर राष्ट्रों ने स्वीकार किया कि वे अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाए हैं और 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष के लक्ष्य के लिए फिर से प्रतिबद्धता ज़ाहिर की। UNEP की रिपोर्ट टूटे वादों और झूठे बयानों का एक गंभीर विवरण देती है। इसे समझने के लिए तीन बिंदु आवश्यक हैं:
- विकासशील देशों को केवल जलवायु अनुकूलन (शमन तथा हानि और क्षति के अतिरिक्त) के लिए ही 2035 तक प्रति वर्ष 310 अरब से 365 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी। यदि मुद्रास्फीति प्रति वर्ष 3% मानी जाए, तो 2035 तक वास्तविक अनुकूलन आवश्यकताएँ प्रति वर्ष 440 अरब से 520 अरब डॉलर तक पहुँच जाएँगी।
- 2023 में विकसित से विकासशील देशों को अनुकूलन के लिए मिले महज 26 अरब डॉलर, जो 2022 से कम था, और 58% धन अनुदान के बजाय ऋण के माध्यम से आया – एक प्रकार का हरित संरचनात्मक समायोजन। जो देश जलवायु परिवर्तन संकट के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार हैं, उन्हीं को आपदाओं के प्रभाव से निपटने के लिए उधार लेने को मजबूर कर दिया गया है।
- एक साधारण अनुमान के मुताबिक़ जितने की ज़रूरत है वह मौजूदा राशि से बारह से चौदह गुना ज़्यादा है, जिसकी वजह से प्रति वर्ष 284 अरब से 339 अरब डॉलर का अंतर पैदा हो रहा है।
बस इसे स्कैन करें, नोर तिजान फ़िरदौस (मलेशिया), 2021
जलवायु परिवर्तन संकट से जुड़ी बहस की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि 172 देशों – ज़्यादातर गरीब राष्ट्रों – ने पहले ही राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाएँ, नीतियाँ और रणनीतियाँ विकसित कर ली हैं। लेकिन जैसा कि UNEP की रिपोर्ट बताती है, इन योजनाओं का पाँचवा हिस्सा कमज़ोर संस्थागत ढाँचे, सीमित तकनीकी क्षमता, जलवायु डेटा तक पहुँच के अभाव और अप्रत्याशित व देर से मिलने वाले धन के कारण पुराना पड़ चुका है। ग़रीब राष्ट्रों के लिए, राजनीतिक उदासीनता से ज़्यादा बड़ी बाधा संसाधनों की कमी है। यहाँ तक कि जब वे सबसे बुरी परिस्थिति के लिए तैयार होने की कोशिश करते हैं, तब भी वे ठीक से काम कर पाने के लिए आवश्यक संसाधन जुटा नहीं पाते। लंबे समय से चली आ रही यह स्थिति पूरी प्रक्रिया को एक खोखली रस्म बना देती है: अनुपालन के लिए दस्तावेज़ तैयार किए जाते हैं।
जैसे ही जलवायु ऋण की बात आती है तो दावे किए जाते हैं कि हरित वित्त व्यवस्था निजी पूँजी को आकर्षित करेगी। लेकिन यह भी बस एक मिथ्या है। UNEP की रिपोर्ट दिखाती है कि अनुकूलन में निजी क्षेत्र का निवेश 5 अरब डॉलर से कम है, बल्कि सबसे अच्छी स्थिति में भी निजी पूँजी अनुकूलन के लिए 50 अरब डॉलर प्रति वर्ष से अधिक नहीं जुटाएगी (यह ज़रूरत से काफ़ी कम है)। वास्तव में निजी निवेशक केवल तभी अनुकूलन परियोजनाओं में शामिल होते हैं जब सार्वजनिक धन का उपयोग उनकी आय की गारंटी या सब्सिडी देने के लिए किया जाता है – तथाकथित ‘अभिनव वित्त‘ या ‘मिश्रित वित्त‘ तंत्र निजी निवेश को ‘जोखिम-मुक्त‘ बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसलिए अंततः लागत ग़रीब राष्ट्रों के राजकोष से दी जाती है, ये सरकारें प्रभावी रूप से उस धन की गारंटी देती हैं जो वे उन अनुकूलन परियोजनाओं को निधि देने के लिए उधार लेती हैं जिन्हें निजी निवेशक ऐसी गारंटियों के बिना बहुत जोख़िम भरा मानते हैं। जैसा कि हमने डोसियर संख्या 93 (अक्टूबर 2025), ‘द एनवायरनमेंटल क्राइसिस इज अ कैपिटलिस्ट क्राइसिस‘ में तर्क दिया था कि यह हरित वित्त का मॉडल जलवायु ऋण को हल करने के बजाय उसे और गहरा करता है, जो ग्लोबल साउथ पर बकाया है।
दमघोंटू ज़िंदगी, तपस दास (भारत), 2021.
इस वर्ष, हमारे संस्थान के सदस्य बेलेम में COP30 के लिए गए। उन्होंने ‘पीपल्स समिट टुवर्ड्स COP30′ में भाग लिया – जो 12 से 16 नवंबर 2025 तक आयोजित किया गया और जिसका उद्देश्य आधिकारिक सम्मेलन के समकक्ष एक और बहस शुरू करना था – यहाँ उन्होंने डोसियर संख्या 93 के निष्कर्ष दूसरों से साझा किए। इस शिखर सम्मेलन में 25,000 से अधिक लोगों और 1,200 से अधिक संगठनों ने भाग लिया। इसके बाद हमारे Nuestra América दफ़्तर ने ब्राज़ील के भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (MST) की बारबरा लौरेरो से COP30 पर एक न्यूज़लेटर लिखने को कहा। उन्होंने लिखा कि इस सम्मेलन की कार्यवाही का ‘अदृश्य जनरल‘ ब्राज़ील का कृषि-व्यवसाय उद्योग था, जो अपने तौर-तरीकों को हरित/ग्रीन साबित करने, सार्वजनिक धन तक अपनी पहुँच बढ़ाने और बहस को परिस्थिति बेहतर करने से हटाकर रिब्रांडिंग की ओर मोड़ने की कोशिश में लगा था।
फिर भी, आधिकारिक COP की कार्यवाही देखते हुए एक साधारण सवाल उठता है: क्या यह प्रक्रिया जारी रखने लायक़ है या हमें COP व्यवस्था को ख़त्म होने देना चाहिए? COP प्रक्रिया से जुड़े रहने के तीन प्रमुख कारण हैं:
- COP एक वैश्विक मंच देता करता है जहाँ वैश्विक दक्षिण मुआवज़े, हानि और क्षतिपूर्ति, और अनुकूलन प्रक्रिया के लिए सहायता की माँग कर सकता है। और COP में ही जलवायु ऋण वित्त और स्वैच्छिक लक्ष्यों के खिलाफ तर्क भी दिए जा सकते हैं। COP निर्वाण प्राप्त करने की जगह नहीं है, लेकिन यह अभी भी संघर्ष का स्थान बन सकता है।
- COP वैश्विक दक्षिण को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (1992) की रियो घोषणा में स्थापित ‘साझा लेकिन अलग-अलग ज़िम्मेदारियों‘ के सिद्धांत को बनाए रखने का मौक़ा देता है।
- COP अमीर राष्ट्रों को चोरी-छिपे बात करने के बजाय खुले में बातचीत करने के लिए मजबूर करता है, क्योंकि बंद कमरों में हुई वार्ताओं से जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयास पूरी तरह से निजी पूँजी और अमीरों की अनौपचारिकता के हाथों में चले जाएंगे। जलवायु वित्त के क्या मायने हैं, इस (या तो ऋण के रूप में या मुआवजे के रूप में) पर बहस जारी रह सकती है।
COP30 के बाद, मैंने फ़्रेंड्स ऑफ़ द अर्थ के असद रहमान से पूछा कि उन्हें क्यों लगता है कि COP के हॉलों के बाहर सड़कों पर संघर्ष करना जरूरी है। असद के लिए पहली लड़ाई जलवायु आंदोलन को यह स्वीकार करने के लिए राज़ी करना है कि लड़ाई केवल जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से ही जुड़ी नहीं है, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्थाओं और समाजों के संकट के बारे में है, जिन्हें बदला जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने मुझे बताया, ‘कुछ उम्मीद तो ज़रूर है’। ऐसा इसलिए है क्योंकि जलवायु आंदोलन कह रहा है कि समस्या वित्त की कमी नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। धन तो उपलब्ध है (जैसा कि संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन की एक नई रिपोर्ट, ‘ऑल रोड्स लीड टु रिफॉर्म: अ फाइनेंशियल सिस्टम फिट टु मोबिलाइज़ $1.3 ट्रिलियन फॉर क्लाइमेट फाइनेंस‘ में तर्क दिया गया है)। जब COP30 चल रहा था, तब केन्या के नैरोबी में अंतर्राष्ट्रीय कर सहयोग पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क सम्मेलन की एक बैठक हुई, जहाँ सबसे अमीर देशों ने एक निष्पक्ष कॉर्पोरेट कर पर आगे बात होने से रोक दिया, जिससे प्रदूषकों को उनके कारण होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की कीमत चुकानी पड़ती। यदि यह लागू किया जाता है तो इस कर से प्रति वर्ष 500 अरब डॉलर जुटाए जा सकते हैं जो जलवायु नुक़सान के मुआवज़े के लिए एक अच्छी ख़बर होती। फिर भी वैश्विक उत्तर जोर देकर कहता है कि जलवायु वित्त के लिए कोई पैसा नहीं है, लेकिन नाटो देश सैन्य ख़र्च को सकल घरेलू उत्पाद के 5% तक बढ़ाने के लिए सहमत हो जाते हैं – जबकि यह साबित हो चुका है कि सैन्यवाद ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक प्रमुख कारण है। असद ने कहा, ‘जलवायु आंदोलन को ऋण रद्दीकरण, सम्पत्ति कर और व्यापार नियमों में सुधार के लिए तर्क देते देखना एक सकारात्मक कदम है। अब जलवायु आंदोलन यह समझने लगा है कि यह एक आर्थिक सवाल है। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है‘।
La masia (द फार्म), जोन मीरो (स्पेन), 1921–1922.
हमारे Nuestra América दफ़्तर के लिए लिखे पत्र में MST की लौरेरो ने COP30 को दो पहलुओं वाला सिक्का बताया: ‘एक तरफ, तथाकथित ‘बाज़ार समाधानों’ और वित्तीय कार्बन मुक्तीकरण का जश्न; दूसरी तरफ… जन आंदोलन की बढ़ती ताकत, जिसने बेलेम को आलोचना, अंतर्राष्ट्रवादी एकजुटता और वास्तविक विकल्पों के निर्माण का क्षेत्र बना दिया‘। अपने निष्कर्ष में वह आह्वान करती हैं कि हम जलवायु संकट को वर्ग संघर्ष का ही एक क्षेत्र समझें, जिसे पूँजीवाद से हटकर ही हल किया जा सकता है:
पूँजीवादी मॉडल के साथ पूरी तरह अलग हुए बिना जलवायु संकट से बाहर निकलने का कोई असली रास्ता नहीं है, और लोकप्रिय संगठन खड़ा किए बिना, सामूहिक संघर्ष के बिना, और उन संरचनाओं का सामना किए बिना जो विनाश से मुनाफ़ा कमाती हैं, पूँजीवादी मॉडल से अलग नहीं हुआ जा सकता।
स्नेह सहित,
विजय