महत्त्वपूर्ण खनिजों पर क़ब्ज़े की साम्राज्यवादी होड़ बढ़ी है। सैन्य और औद्योगिक ज़रूरतों के बहाने ग्लोबल साउथ के देशों को पश्चिमी पूँजी पर निर्भर बनाया जा रहा है।
पूँजीवाद मुनाफ़े के लिए आप्रवासी श्रमिकों का इस्तेमाल करता है; नव-उदारवादी नीतियों से आए संकट से ध्यान भटकाने के लिए इन्हीं के ख़िलाफ़ माहौल भी तैयार करता है।
पूँजीवाद वैश्विक दक्षिण को कच्चा माल निकालने और सस्ते निर्यात तक सीमित रखता है। लोकतांत्रिक योजना से निर्भरता टूटेगी और संसाधन सामूहिक आर्थिक शक्ति का रूप लेंगे।
पूँजीवादी व्यवस्था जल्दी-जल्दी होने वाले चुनावों को तरजीह देती है, लेकिन गरिमामय भविष्य के निर्माण में सामाजिक शक्तियों को लंबे समय, संघर्ष और संगठन की ज़रूरत पड़ती है।