dossier | Tricontinental: Institute for Social Research https://thetricontinental.org/hi/dossier/ international, movement-driven institution focused on stimulating intellectual debate that serves people’s aspirations. Wed, 13 May 2026 04:05:17 +0000 hi-IN hourly 1 भविष्य https://thetricontinental.org/hi/bhavishya/ Tue, 05 May 2026 08:00:53 +0000 https://thetricontinental.org/?p=143094 इस दस्तावेज़ में जो कलाकृतियाँ हैं, वे कासा दे लास अमेरिकास के ‘आर्ते दे न्वेस्त्रा अमेरिका आयदेए सांतामारिया’ (आयदेए सांतामारिया हमारे अमेरिका की कला) संग्रह से ली गई हैं। सन् 1959 में क्यूबा की क्रांति के बाद जब कासा दे लास अमेरिकास की स्थापना हुई, तब से यह संस्था साम्राज्यवाद-विरोधी सांस्कृतिक अंतरराष्ट्रीयता का एक प्रमुख मंच बनी रही है, और इसने नामी कलाकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं से गहरे संबंध बनाए हैं। कासा की दीर्घाओं में मुख्यतः लातिन अमेरिकी और कैरिबियाई कलाकारों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी की रचनाओं की प्रदर्शनियाँ लगती रही हैं — अनेक विधाओं, विषयों और तकनीकों में। इनमें से कई कलाकृतियाँ पहले कासा की दीर्घाओं में प्रदर्शित हुईं, कुछ ने इसकी प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते, और कुछ स्वयं कलाकारों ने भेंट में दीं। ये सब अब इस संग्रह का हिस्सा बन चुकी हैं, और मिलकर एक असाधारण कलात्मक विरासत रचती हैं।

होसे वेंचुरेली (चिली), सेरिग्राफ़ (प्रिंट), 1970, संस्करण 15/90, आकार: 260 x 430 मि.मी.

पिछले सौ महीनों से हर महीने ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की टीम ने किसी महत्त्वपूर्ण विषय का गहराई से अध्ययन करके एक डोसियर आपके सामने प्रस्तुत किया है। ये डोसियर साम्राज्यवाद के इतिहास और राष्ट्रीय मुक्ति से लेकर आर्थिक नीति, संप्रभुता, युद्ध और बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था के विश्लेषण से जुड़े हुए रहे हैं और दुनिया की अनेक भाषाओं में छपे, जिनमें अंग्रेज़ी, हिंदी और पुर्तगाली से लेकर अरबी, थाई और स्पैनिश तक शामिल हैं।1 यह हमारा सौवाँ डोसियर है, इसलिए हमने अपने संस्थान की एक प्रमुख अवधारणा—‘भविष्य’—का ऐतिहासिक-भौतिकवादी विवेचन प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।

जब 2015 में हमारे संस्थान की नींव पड़ी तो हमारे सामने शोध के लिए तीन प्रमुख विषय थे:

  1. समकालीन पूँजीवाद और इसे आकार देने वाले वर्ग संघर्ष को और बेहतर रूप से समझना।
  2. हमने जिसे ख़ास क़िस्म के चरम दक्षिणपंथ का नाम दिया है उसे और अच्छी तरह समझना।2
  3. भविष्य – या आने वाले दौर को बेहतर तरह से समझना।

यह तीसरा विषय ऐतिहासिक प्रक्रिया की भौतिकतावादी समझ से निकला है जो वर्तमान को शाश्वत यथार्थ नहीं मानता बल्कि उसमें परिवर्तन की संभावना देखता है। दूसरे शब्दों में, वर्तमान को एक नए भविष्य में बदला जा सकता है। हम जिस पूँजीवादी व्यवस्था में रहते हैं वह शाश्वत नहीं: इसे वर्ग संघर्ष और उत्पादक शक्तियों के विकास के ज़रिए एक समाजवादी व्यवस्था में बदला जा सकता है।

यहाँ, हम पहली बार भविष्य का एक दार्शनिक और राजनीतिक आकलन पेश कर रहे हैं। राष्ट्र मुक्ति पर आधारित मार्क्सवाद से प्रेरणा लेते हुए हमारा मत है कि इस भविष्य को सिर्फ़, लक्ष्य के आधार पर, समाजवाद ही नहीं कहा जाना चाहिए, बल्कि ऐसे भविष्य की संवेदना के आधार पर, उम्मीद भी कहा जाना चाहिए।3

हमें पूरा भरोसा है कि आप इस डोसियर को पिछले निन्यानवे डोसियरों की ही तरह पढ़ेंगे और इसे दूसरों के साथ साझा करेंगे, रीडिंग सर्कलों तथा राजनीतिक अध्ययन की दूसरी जगहों पर इस पर बातचीत और बहस करेंगे। आपके सुझावों का हमेशा स्वागत है।


दुनिया की हर भाषा में ‘भविष्य’ के लिए एक शब्द है, आने वाले कल के लिए। उदाहरण के लिए, दुनिया की कुछ सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में इसके लिए निम्नलिखित शब्द हैं:

अंग्रेज़ी: फ़्यूचर (future), वह वक़्त जो अभी आया नहीं है।
मैंडरिन चाइनीज़: वेलाय (未来), जो अब तक आया नहीं।
हिंदी: भविष्य, जो होने वाला है।
स्पैनिश: फूटूरो (futuro), आने वाला वक़्त।
फ़्रेंच: ऐवेनीर (avenir), जो आने वाला है।
अरबी: मुस्तक़बिल (مستقبل), जिससे सामना होने वाला है।
बंगाली: भोबिश्योत (ভবিষ্যৎ), जो होने वाला है।
पुर्तगाली: फूटूरो (futuro), आने वाला समय।
रूसी: बुदुश्ची (будущее), जो होने वाला है।
उर्दू: मुस्तक़बिल (مستقبل), जिससे सामना होने वाला हो।

ये तमाम शब्द एक ही अर्थ पेश नहीं करते; परिवर्तन के प्रति इनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। इनमें से कुछ खाली कैलेंडर के बारे में हैं, यह विचार कि कल भी है, जैसे आज है, जबकि अन्य उन मुलाकातों के बारे में हैं जो घटित होंगी और जिनका सामना करना होगा। यह ज़रूरी है कि आप जब इस तरह का एक दस्तावेज़ पढ़ रहे हैं – जो एक भाषा में लिखा गया और कई भाषाओं में जिसका अनुवाद हुआ है – तो इसमें भी ‘भविष्य’ शब्द अपने में अनेक ऐसे अर्थ समाहित किए हुए है जो एक भाषा से दूसरी भाषा के सफ़र में कुछ-कुछ पीछे छूट जाते हैं। हालाँकि ये शब्द अलग-अलग तरह से आने वाले वक़्त को दर्शाते हैं, लेकिन फिर भी पूँजीवादी सभ्यता में बोली जाने वाली हर भाषा में हम एक सवाल ज़रूर कर सकते हैं: क्या भविष्य सच में है या फिर हम उस सतत वर्तमान में ही रह रहे हैं जैसा कि पूँजीवादी यथार्थवाद हमें बताता है?4 क्या सच में ऐसा कोई आने वाला कल है जो आज से अलग हो सकता है?

हम जलवायु संकट और जलवायु नस्लभेद, निरंतर चल रहे युद्ध और अंतहीन जनसंहार, वित्तीय पूँजी की तानाशाही तथा सरकारी ख़र्च में कटौती को आम बात बना देने के इस दौर को जब समझने की कोशिश कर रहे हैं तो हमारे आंदोलनों के लिए ऊपर पूछे गए सवाल अहम हो जाते हैं।5 हमारी चेतना को दशकों से पूँजीवादी यथार्थवाद ने कोहरे से ढाँप रखा है जिसकी वजह से हम वैश्विक बर्बादी से आगे किसी और चीज़ की कल्पना ही नहीं कर पाए।

क्या कोई भविष्य है? बेशक, एक भविष्य है। हम उसके निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और हम अब भी उसका निर्माण कर रहे हैं।


एमिलियो पेट्टोरूटी (अर्जेंटीना), पाजारो रोहो (लाल पक्षी), 1959, कैनवास पर तेलचित्र, 116 x 63 से.मी.

भाग 1: विघटन

सत्ता की भाषा में भविष्य को वर्तमान का सीधा और सामान्य आगे बढ़ना माना जाता है। इसे कैलेंडर, विकास के आंकड़ों और अनुमान से समझाया जाता है। इस सोच में भविष्य के लिए लड़ना नहीं पड़ता, बस उसका इंतज़ार करना होता है। वह अपने आप आ जाता है, जैसे बही-खाते का अगला पन्ना। भविष्य की यह सोच काफी रूढ़िवादी है। यह मान लेती है कि वर्तमान को परिभाषित करने वाली शोषण, श्रेणीबद्धता और प्रभुत्व की संरचनाओं को पलटने के बजाय उन्हें संशोधित कर लिया जाएगा। भविष्य का ऐसा दृष्टिकोण पूँजीवादी समाज के सभी प्रमुख संस्थानों — जैसे मीडिया, स्कूल, विश्वविद्यालय, थिंक-टैंक और चैरिटी फ़ाउन्डेशनों — द्वारा प्रचारित-प्रसारित किया जाता है, जो परिवर्तन के खोखले नारों तो देते हैं लेकिन वास्तव में इसी विचार का प्रचार करते हैं कि ‘पूँजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है’, जबकि वो हमारा दम घोंट रही है।

हमारे नज़रिए में भविष्य सिर्फ कैलेंडर की कोई तारीख नहीं है। वह एक टूटन है। वह मौजूदा व्यवस्था से एक अलगाव है — सामाजिक संबंधों, राजनीतिक सत्ता और इंसानी संभावनाओं में गहरे बदलाव का नाम है। इस तरह भविष्य की बात करना यूटोपिया नहीं है, बल्कि राजनीति के उस पक्ष को दोबारा हासिल करना है जिसे जानबूझकर दबाया गया है। यानी जिस दुनिया में हम रहते हैं उससे मूलतः भिन्न दुनिया की कल्पना करने और उसका निर्माण करने की क्षमता को पुख़्ता करना, जिसे बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की समाजवादी और राष्ट्रीय मुक्ति परियोजनाओं ने बनाने का प्रयास किया था। वे प्रयास भले असमान रहे थे, लेकिन उनसे कुछ ठोस आकार बन रहा था। ऐसा दृष्टिकोण प्रबंधित निरंतरता (सुधारवाद) और अनियोजित विघटन (आपदावाद) दोनों विचारों को अस्वीकार करता है। शासक वर्ग झूठे भविष्यों के ख़्वाब बेचता है, जैसे उद्यमिता का मिथक, हरित पूँजीवाद, या सैन्यीकृत सुरक्षा, लेकिन ऐसी कोई योजना नहीं पेश करता जो मुक्तिकामी हो।

भविष्य के इस दृष्टिकोण का विकास मार्क्सवादी दार्शनिक अर्न्स्ट ब्लोख के ‘अभी-नहीं’ (Noch-Nicht) के विचार से हुआ है।6 मार्क्स के लेखों के आधार पर ब्लोख ने लिखा था कि भविष्य कोई अमूर्त चीज़ नहीं है जिसे कल पर टाल दिया जाए, बल्कि एक सक्रिय शक्ति है जो वर्तमान के भीतर समाई हुई है, और वर्तमान की बेड़ियों से बाहर आने के लिए संघर्षरत है। ब्लोख का मानना है कि वास्तविकता अधूरी है, और इसलिए वे उन दार्शनिक धाराओं से अलग हैं जो दुनिया को बंद, पूर्ण और पूरी तरह व्याख्यायित मानती हैं। उनका तर्क था कि वर्तमान ऐसी प्रवृत्तियों, आकांक्षाओं और विरोधाभासों से भरा है जो उससे आगे की ओर इशारा करते हैं। ‘अभी-नहीं’ कोई यूटोपिया नहीं है जो इतिहास के ऊपर तैरता हो, बल्कि एक अप्रकट संभावना है, जो भौतिक परिस्थितियों और सामूहिक संघर्ष में छिपी है। ‘अभी-नहीं’ का भाव हम बांडुंग सम्मेलन (1955) के अंतिम ज्ञापन में, गुटनिरपेक्ष आंदोलन शिखर सम्मेलन (1961) के बेलग्रेड घोषणापत्र में, ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन (1966) के प्रस्तावों में, और संयुक्त राष्ट्र महासभा (1974) द्वारा पारित नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की घोषणा में देख सकते हैं — जहाँ उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों के सपनों को अभिव्यक्ति मिली। इस भाव को हम अक्टूबर क्रान्ति (1917), वियतनामी क्रान्ति (1945), चीनी क्रान्ति (1949) और क्यूबाई क्रान्ति (1959) के बाद शुरू हुईं क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में भी देख सकते हैं।7

इस मार्क्सवादी परम्परा में भविष्य अपरिहार्य/अटल नहीं है। यह दृष्टि दो भौतिकवादी सिद्धांतों पर टिकी है जो पूँजीवादी व्यवस्था के विरोधाभासों से उभरते हैं।

पहला सिद्धांत यह है कि इतिहास की वास्तविक गति उत्पादक शक्तियों को विकसित करती है और सामाजिक अधिशेष का विस्तार करती है। पर क्योंकि यह विस्तार निजी सम्पत्ति के क़ब्ज़े में रहते हैं, इससे जनता के बड़े हिस्से के लिए असमानता और सामाजिक पीड़ा बढ़ती है। यह पहचानना ज़रूरी है कि आज की उत्पादक शक्तियाँ केवल कारखानों और मशीनरी तक सीमित नहीं हैं। उनमें देखभाल का काम, डिजिटल संरचनाएँ, और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ आदि भी शामिल हैं, जो सामूहिक श्रम से चलती हैं। यह नोट करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि पूँजीवाद इन शक्तियों का विकास तो करता है किन्तु उनकी संभावनाओं को कमज़ोर भी करता है — निजी स्वामित्व के ज़रिए, प्लैटफ़ॉर्म पूंजी की तानाशाही के ज़रिए, यूनियनें तोड़कर, कटौतियाँ करके, सेना को हावी करके या पूँजीवादी नियन्त्रण के दूसरे तरीक़ों से।

दूसरा सिद्धांत यह है कि पूँजीवाद से उत्पन्न सामाजिक पीड़ा ज़िल्लत और आक्रोश पैदा करती है, जिनसे स्वतःस्फूर्त विद्रोह खड़े हो सकते हैं। किन्तु ऐसे संघर्ष अपने आप ही मुक्तिकामी दिशा में नहीं बढ़ते। उन्हें राजनीतिक ताक़तें या तो लोगों की ठोस माँगों को आगे बढ़ाकर समाजवाद की ओर मोड़ सकती हैं, या उसके विपरीत, उन माँगों को विकृत करके लोगों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ एक विषैले, समाज-विरोधी एजेंडे की तरफ़ मोड़ सकती हैं।8 इसलिए भविष्य ऐसी चीज़ नहीं है जो हम पर घटित होती है, बल्कि ऐसी चीज़ है जिसे हमें निर्मित करना है। और हम उसका निर्माण केवल उन संरचनाओं में दरार डालकर ही कर सकते हैं जो ज़िल्लत और पीड़ा पैदा करती हैं। ऐसा दृष्टिकोण भाग्यवाद और अपरिहार्यता से बिलकुल अलग है, और हमें याद दिलाता है कि इतिहास खुला है और वर्तमान में कई संभावनाएँ मौजूद हैं जिन्हें संघर्ष के द्वारा सक्रिय किया जा सकता है।

इस परंपरा में उम्मीद कोरा आशावाद या निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं है, बल्कि बेहतर दुनिया रचने का दृढ़ संकल्प है। यह संकल्प ज़िल्लत, उत्पीड़न तथा मुसीबतों भरी ज़िंदगी को नियति के रूप में अस्वीकार करने से आता है। वैश्विक दक्षिण के आंदोलन, जो हमारे संस्थान के कार्य का मार्गनिर्देशन करते हैं, उम्मीद को विलासिता की चीज़ नहीं मानते। वे मानते हैं कि उम्मीद गरिमा के लिए सामूहिक प्रयास कर रहे किसानों, मज़दूरों और महिलाओं के अनेकों आंदोलनों तथा संगठनों के संघर्ष से पैदा होती है।9 ये आंदोलन वर्तमान के एक बेहतर रूप के लिए नहीं लड़ रहे, बल्कि एक बिल्कुल अलग सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए लड़ रहे हैं। उनके लिए भविष्य कैलेंडर के हिसाब से नहीं बल्कि संरचनात्मक रूपान्तरण से आएगा। उम्मीद करने का मतलब है यह पहचानना कि वर्तमान असह्य और परिवर्तनीय है, तथा शोषण व उत्पीड़न की स्थितियाँ न तो प्राकृतिक हैं और न ही अंतिम। ऐसी उम्मीद शासक वर्ग को अच्छी नहीं लगती, क्योंकि यह ऐसी शक्ति है जो इंसान की चेतना को बदल सकती है, और लोगों को वर्तमान को सहने की कोशिशों से हटाकर भविष्य बनाने के काम के लिए प्रेरित कर सकती है।

विघटन (मौजूदा व्यवस्था में दरार डालने) की इस परंपरा में भविष्य कोई व्यक्तिगत सर्जना नहीं है — उसका एक सामूहिक चरित्र है। पूँजीवादी संस्कृति हमें व्यक्तिगत भविष्यों के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित करती है, जैसे करियर, घर, व्यक्तिगत सुरक्षा, और ‘आत्म-सुधार’ की अंतहीन परियोजना, पर परिवर्तन की सामूहिक जगहों को बंद कर देती है। यह संस्कृति सामूहिक ज़िम्मेदारी या सामाजिक रूपान्तरण की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत चिंताओं को बढ़ाने की संस्कृति है। पूँजीवाद में कैलेंडरबद्ध भविष्य को कंट्रोल किया जा सकता है, यानी उसका पूर्वानुमान, निर्धारण, मूल्यांकन आदि कर उसे सुरक्षित किया जा सकता है। इसका प्रबंधन करने वाले संस्थानों को निष्पक्ष बताया जाता है तथा उनके निर्णयों को राजनीतिक नहीं तकनीकी अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस तरह जनता की बजाय जनता के भविष्य के बारे में विशेषज्ञ, बाज़ार नियम, सरकार तथा सुरक्षा तंत्र आदि फ़ैसला लेते हैं। ये संस्थान कोई मुक्तिकामी रास्ता नहीं दिखाते, बस आपदा/संकट को मैनेज करते हुए उसे जारी रखने की ज़मीन तैयार करते हैं। इसी ज़मीन से एक ख़ास क़िस्म की चरम दक्षिणपंथी कट्टरता पैदा होती है, जो सामाजिक बहिष्कार, श्रेणीबद्धता और हिंसा पर आधारित एक झूठे भविष्य की अवधारणा प्रस्तुत करता है। इस तरह का दक्षिणपंथ दरअसल पूँजीवाद की ही असमर्थता का एक लक्षण है क्योंकि वह सकारात्मक भविष्य बना नहीं कर सकता।10 लेकिन भविष्य इस दक्षिणपंथी कट्टरता द्वारा भी निर्मित नहीं किया जा सकता। इस काम को मेहनतकशों की सम्प्रभुता की जगह से पुनर्स्थापित करने की ज़रूरत है। न तो संकट अंतिम सच है, और न ही मुक्ति। संकट के ख़िलाफ़ लड़ना होगा और मुक्ति के लिए लड़ना होगा। विच्छेद (दरार) या संरचनात्मक बदलाव के दृष्टिकोण से इस काम के लिए हमें व्यक्तिगत प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने की नहीं, बल्कि संगठित शक्तियों की ज़रूरत होगी। ऐसी शक्तियाँ जो सत्ता का सामना कर सकें, जैसे राजनीतिक दल, ट्रेड यूनियन, और सामाजिक आंदोलन। इन शक्तियों के बिना ‘अभी-नहीं’ एक दिशाहीन सपना ही बना रहेगा। उम्मीद को बरकारार रखने के लिए ढाँचा, अनुशासन और दृढ़ता जरूरी हैं।

भविष्य ऐसी चीज़ नहीं है जो मानव इतिहास के बाहर स्थित हो। वह किसी न किसी रूप में उन संघर्षों में विद्यमान है जो एक नई वैकल्पिक दुनिया का पूर्वाभास देते हैं। ऐसे कई संघर्षों के उदाहरण हमारे सामने हैं। जैसे श्रम के सहकारी रूप, देखभाल की सहकारी प्रथाएँ, सहभागी लोकतंत्र के प्रयोग, तथा चीन व क्यूबा जैसे देशों में समाजवादी निर्माण की अधूरी और विवादित प्रक्रियाएँ।11 ये संघर्ष बेमतलब कोशिशें नहीं कर रहे बल्कि अपने-अपने तरीक़े से एक अलग सामाजिक व्यवस्था का नमूना पेश कर रहे हैं। इनका अध्ययन करने का उद्देश्य उन्हें रोमानी बनाना नहीं है, बल्कि उनके महत्त्व और उनकी अप्रकट संभावनाओं को समझना है। ये संघर्ष हमें याद दिलाते हैं कि जिस दुनिया का निर्माण हम करना चाहते हैं वह कोई अमूर्त क्षितिज नहीं, बल्कि एक ठोस संभावना है। एक मार्क्सवादी का काम भविष्य की भविष्यवाणी करना नहीं है, बल्कि उसके निर्माण के लिए जनता को संगठित करना है। वर्तमान से अलग कुछ देखने के लिए स्पष्टता, साहस और सामूहिक अनुशासन की आवश्यकता होती है। भविष्य तभी आ सकता है जब आज में दरार डालने की कोशिश करेंगे। इसलिए भविष्य संघर्ष का क्षेत्र है। उसके लिए लड़ने के लिए उन सभी शक्तियों की पहचान करना ज़रूरी है जो इस काम में रुकावटें खड़ी करती हैं।

सिल्वानो लोरा (डोमिनिकन गणराज्य), सेरिग्राफ़ (प्रिंट), 1976, संस्करण 18/60, आकार: 640 x 570 मि.मी.

भविष्य के शत्रु

भविष्य कोई खाली जगह नहीं है जो मानवीय आकांक्षा से भरे जाने की प्रतीक्षा कर रहा हो। शक्तिशाली ताक़तें उसके लिए सक्रिय रूप से योजनाएँ बनाती हैं, ढाँचे खड़े करती हैं और उसे रोकने के सभी प्रयास करती हैं ताकि प्रभुत्व के मौजूदा संबंध ज्यों के त्यों बने रह सकें। भविष्य के शत्रु अमूर्त नहीं हैं बल्कि वो ठोस शक्तियाँ हैं जो वर्तमान व्यवस्था को भविष्य तक ले जाना चाहती हैं।12 भविष्य के चार मुख्य शत्रु हैं — वित्तीय पूँजी, प्लैटफ़ॉर्म पूँजी, निष्कर्षणवाद और सैन्यवाद। ये शक्तियाँ केवल वर्तमान के सामाजिक संबंधों को बनाए रखने के साथ ही भविष्य पर भी ही क़ब्ज़ा जमाने का प्रयास करती हैं।

वित्तीय पूँजी इस तारामंडल के केन्द्र में विराजमान है। उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद की आमदनी, निवेश प्रवाहों, सट्टेबाज़ी के जादू और ऋण की शक्ति पर नियंत्रण के ज़रिए वित्तीय पूँजी राष्ट्रों और समाजों को अनुशासन में रखती है, और उनके सम्भावित भविष्यों के दायरे को संकुचित करती है।13 क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ, बहुपक्षीय ऋणदाता, और निजी वित्तीय संस्थान — जो अधिकतर उत्तरी वैश्विक क्षेत्र में स्थित हैं — उत्तर के शासक वर्ग के हक़ में भविष्य के योजनाकारों की तरह काम करते हैं। वे सुनिश्चित करते हुए कि आने वाला कल मानवीय समृद्धि के बजाय पूँजी संचय के लिए अनुकूल बना रहे। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और कई अन्य संस्थानों के आदेश ऋणग्रस्त पूर्व-उपनिवेशित देशों के लिए एक भौतिक वास्तविकता बन जाते हैं।14

प्लैटफ़ॉर्म पूँजी — पूँजीवादी टेक्नॉलजी एकाधिकार कंपनियाँ नवाचार और दक्षता को डाटा निष्कर्षण, श्रम के पुनर्संगठन और सामाजिक जीवन के विखण्डन की दिशा में मोड़ देती हैं। एल्गोरिदम समय, ध्यान (attention) और इच्छा का प्रबंधन करते हैं, जबकि प्लैटफ़ॉर्म श्रमिक मज़दूरों को उनकी स्थिरता और सामूहिक शक्ति से वंचित कर देता है।15

निष्कर्षणवाद — जलवायु आपदा के वैज्ञानिक साक्ष्यों के बावजूद, तेल, गैस, कोयला, खनन और कृषि-व्यवसाय समूह ऊर्जा प्रणालियों, श्रम बाज़ारों और राज्य की नीतियों को आकार दे रहे हैं। उनकी योजना के तीन ही स्तंभ हैं: निष्कर्षण करो, मुनाफ़ा कमाओ, और भूल जाओ। मिसाल के तौर पर, जलवायु संकट का कारण दूरदर्शिता का अभाव नहीं है, बल्कि पूँजीवादी निगमों के सोचे समझे फ़ैसलों का परिणाम है, क्योंकि उनके लिए ग्रह का विनाश संचय की एक स्वीकार्य लागत है।16

सैन्यवाद — पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा उत्पन्न युद्ध, विस्थापन और जलवायु संकटों का हल सामाजिक और राजनीतिक समाधान से नहीं किया जाता, बल्कि एक स्थायी युद्ध अर्थव्यवस्था से किया जाता है। यानी राजनीतिक समस्याओं पर सैन्य समाधान थोपती है। साम्राज्यवादी केन्द्रों में सैन्यवाद शस्त्र संचय, सीमा शासन, निगरानी और आपातकालीन शासन के सामान्यीकरण के रूप में प्रकट होता है। वैश्विक दक्षिण में यह साम्राज्यवादी आक्रमण, छद्म युद्ध, क़ब्ज़े, और दुर्लभ सार्वजनिक संसाधनों को सैन्य गतिविधियों या सुरक्षा संरचनाओं की ओर मोड़ दिए जाने के रूप में सामने आता है। इन उपायों से हमेशा हथियार उद्योग को फ़ायदा होता है। सैन्यवाद राजनीतिक संभावनाओं को कम कर देता है: आपातस्थितियों का हवाला देकर तानाशाही उपायों को न्यायसंगत ठहराया जाता हैं, असहमति का दमन किया जाता हैं, और डर का समाजीकरण किया जाता हैं। दुनिया के बड़े हिस्सों में, और विशेषकर वैश्विक दक्षिण में, भविष्य किसी वादे के रूप में नहीं बल्कि स्थायी अस्थिरता, विस्थापन और मृत्यु के रूप में दिखाई देता है। युद्ध उन संकटों के प्रबंधन का एक तंत्र बन जाता है जिन्हें पूँजीवाद स्वयं पैदा करता है।17

भविष्य के ये शत्रु केवल सामाजिक रूपान्तरण में बाधा नहीं डालते, वे सक्रिय रूप से एक ऐसे भविष्य का निर्माण करते हैं जिसमें मुट्ठी-भर लोगों के विशेषाधिकार सुरक्षित रहते हैं, जबकि अधिकतर मानवता को चिंताओं, असुरक्षा और निराशा। इन शक्तियों को चुनौती दिए बिना भविष्य को पुनः हासिल नहीं किया जा सकता।

परिवर्तन के लिए तैयार सामाजिक ताक़तें

जब सम्पत्तिधारी वर्ग शाश्वत वर्तमान पर ज़िद किए बैठा हो, तो भविष्य को सामूहिक जन-संघर्ष से ही वापस हासिल किया जा सकता है। मौजूदा व्यवस्था से विच्छेद कर पाने की सामर्थ्य रखने वाली सामाजिक ताक़तें यहीं मौजूद हैं, भले ही वे टुकड़ों में बँटी हैं, विषम हैं, और उन्हें जानबूझकर ओझल किया गया है। इनमें औपचारिक और अनौपचारिक दोनों सेक्टरों के मज़दूर, किसान और भूमिहीन खेतिहर मज़दूर, महिलाएँ, युवा, उत्पीड़ित समुदाय, और वे सभी समूह शामिल हैं जिन्हें मार्क्स ने ‘अतिरिक्त आबादी’ कहा था। यानी, वे सभी लोग जो पूँजीवादी संचय के कारण हाशिये पर हैं लेकिन पूँजीवाद के लिए अनिवार्य हैं, एक आरक्षित श्रम-सेना के रूप में या सामाजिक पुरुत्पादन श्रमिक के रूप में।18

‘उत्तर-मार्क्सवाद’ और बिखरे हुए राजनीतिक कर्ताओं पर नई-नई सैद्धान्तिक बहस के बावजूद, मज़दूर वर्ग — शहरी हो या ग्रामीण — अभी भी धुरी पर बना हुआ है, हालाँकि उसका गठन बदला ज़रूर है। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और विश्व बैंक की रिपोर्टें बताती हैं कि कुल वैश्विक श्रम-बल तक़रीबन चार अरब के आसपास है (यानी वे सब जो काम पर हैं और जो काम तलाश रहे हैं)। बड़े क्षेत्रों के हिसाब से वैश्विक रोज़गार का अनुमानित ब्यौरा कुछ इस तरह है:

  1. कृषि: 92 करोड़ 30 लाख
  2. उद्योग: 80 करोड़
  3. सेवाएँ: 1 अरब 80 करोड़
  4. परिवहन/रसद: 23 करोड़
  5. प्लैटफ़ॉर्म श्रमिक: 15 करोड़ 40 लाख से 43 करोड़ 50 लाख19

कारख़ानों के मज़दूर आज सेवा, परिवहन, गोदाम, देखभाल, डिलीवरी और प्लैटफ़ॉर्म (यानी उबरीकृत) कामगारों के बराबर में खड़े हैं। वैश्विक दक्षिण के अधिकतर हिस्सों में अनौपचारिक मज़दूरी अपवाद नहीं, बल्कि चलन है। ये कामगार — कारख़ाने में खटें, खेत में, या गोदाम में — हर वक़्त अनिश्चितता के साये में जीते हैं: क़ानूनी संरक्षण या तो कमज़ोर है या है ही नहीं, और बेरोज़गारी का डर हमेशा सिर पर मँडराता रहता है। फिर भी, यूनियनों की सिकुड़ती ताक़त के बावजूद, इन कामगारों के हाथ में एक निर्णायक शक्ति है: ये ही माल पैदा करते हैं, ये ही उसे ढोते हैं, ये ही ज़मीन जोतते हैं, ये ही खदानें खोदते हैं, ये ही बीमारों-बूढ़ों की देखभाल करते हैं, ये ही शहर बनाते हैं, और ये ही रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को चलाते हैं। उनके संघर्ष, वे चाहे रसद केन्द्रों में हड़तालें या लेकर भूमिहीन मज़दूरों की बग़ावतें या घरेलू कामगारों की काम-बन्दी, साबित करते हैं कि पूँजी और श्रम के बीच का अन्तर्विरोध ख़त्म नहीं हुआ है।

संघर्ष हमेशा ऐसे नहीं आते कि मज़दूर सचेतन रूप से पूँजी के ख़िलाफ़ संगठित हो। वे अक्सर दमन की दूसरी धुरियों — जैसे पितृसत्ता और सामाजिक ऊँच-नीच (जाति, नस्ल) — से होकर सतह पर आते हैं, या पीढ़ीगत तजुर्बे और दूसरी सामाजिक बुनावटों से गतिशील होते हैं। महिला आन्दोलनों ने, मिसाल के तौर पर, यह उजागर किया है कि आर्थिक व्यवस्थाएँ शरीरों और वक़्त के शोषण पर टिकी हैं — ख़ासकर स्त्रियों के शारीरिक श्रम और वक़्त पर, और उसमें भी ख़ासकर काली, प्रवासी, और नस्ली रूप से चिन्हित मज़दूर-तबक़े की महिलाओं पर। इसी तरह गरिमा के सवाल से जुड़े संघर्ष उन पहचानों से होकर गुज़रते हैं जो अपने-आप में वर्गीय नहीं हैं, लेकिन जो यह बताती हैं कि पूँजीवाद किस मक्कारी से पुरानी ऊँच-नीच को अपने संचय के काम में लगाता है। मिसाल के तौर पर, जाति और नस्ल की व्यवस्था को पूँजीवाद अपने मतलब के लिए इस्तेमाल और पुन: संगठित करता है। इसलिए गरिमा के लिए लड़ी जा रही लड़ाइयाँ भी समाजवादी संघर्ष का आधार तय करती हैं। ‘अतिरिक्त जनसंख्या’ — प्रवासी, बेरोज़गार, भूमिहीन किसान और शहरी ग़रीब — को अक्सर राजनीतिक रूप से सीमांत माना जाता है, लेकिन ये समूह ही पूँजीवादी व्यवस्था के सबसे गंदे रूप का अनुभव करते हैं। आवास, बुनियादी ज़रूरतों और सम्मान के लिए उनकी लड़ाइयाँ दरअसल ज़िन्दगी को क़ायम रखने की लड़ाइयाँ हैं। ये तमाम संघर्ष दिखाते हैं कि मज़दूर वर्ग के भीतर कितनी ऊर्जा है, जो पूँजीवाद के विरुद्ध एक ऐतिहासिक मोर्चा खड़ा करने और भविष्य के लिए लड़ने में समर्थ है।

हमारे शहरों और देहातों को हिला देने वाले बहुत-से बड़े विरोध संघर्ष या तो छोटे-छोटे संगठनों से आकार पाते हैं या सोशल मीडिया पर व्यक्तियों से की गई अपीलों से आगे खड़े होते हैं। पूँजी बँटवारे पर फलती-फूलती है: औपचारिक बनाम अनौपचारिक, शहर बनाम देहात, आदमी बनाम औरत, नागरिक बनाम प्रवासी।20 और आज, खण्डित वर्ग संरचना और सामाजिक संगठन का बिखराव राजनीतिक संगठन और सैद्धांतिक कार्य-एकता के आगे बड़ी रुकावटें बन कर खड़े हैं। इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने हैं कि जनता के आक्रोश को प्रतिक्रियावादी ताक़तें कैसे हड़पती हैं या आक्रोश मायूसी में कैसे बदल जाता है। वर्तमान से विच्छेद के लिए ज़रूरी है कि विविधता को मिटाए बिना एकता का निर्माण हो, ऐसी राजनीतिक परियोजनाएँ खड़ी की जाएँ जो साझा हितों को ज़बान दे सकें। ऐसे संगठन के बिना सामाजिक ताक़तें बस प्रतिक्रिया करती रह जाती हैं। पर ऐसा संगठन होने पर सामाजिक ताक़तें इतिहास की कर्ता बन जाती हैं — जो भविष्य को अपना बनाने की हैसियत रखती हैं। दुनिया भर में वामपन्थ के सामने आज असल संगठनात्मक सवाल यह है कि जनता जिस तकलीफ़ और ज़द्दोजहद से गुज़रती है उन वस्तुनिष्ट/तथ्यात्मक स्थितियों में से व्यक्तिपरक/विशेष समूहों की माँगों पर आधारित विभिन्न संघर्ष-मंचों का निर्माण कैसे किया जाए।

समय

पूँजीवाद समय के अपने विचार को समाजों पर थोपता है — एक ऐसा विचार जिसमें जल्दबाज़ी तो है पर दिशा नहीं, रफ़्तार तो है पर मंज़िल नहीं, संकट तो है पर हल नहीं। एक सनकी-सी हड़बड़ी सामाजिक ज़िन्दगी को अपनी गिरफ़्त में ले लेती है। अपने दिन पर क़ाबू रखने की हमारी ताक़त छिन जाती है, और एक अव्यवस्था पैदा होती है जो हमारे आराम और फ़ुरसत के समय को भीतर से खा जाती है। फ़ुरसत के समय के बिना, समुदाय निर्माण के लिए आसानी से वक्त नहीं निकलता। (हालाँकि यह भी देखा गया है कि सरकारों द्वारा सामाजिक नीति से हाथ खींच लेने के बाद मज़दूर-वर्ग की महिलाओं ने मिलकर सामाजिक पुनरुत्पादन (देखभाल कार्यों) के मंच बनाए, जिनके चलते अनेक विरोध आंदोलनों में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ी है)। समय के बिना, कार्य-स्थलों, गली-मोहल्लों और समुदायों में संगठनात्मक कार्य करना असम्भव है।

पूँजीवाद के अन्तर्विरोध ख़ुद-ब-ख़ुद संघर्ष उत्पन्न करते हैं। ऐसे संघर्ष अक्सर कम मज़दूरी और काम की ख़राब स्थितियों से भड़कते हैं, लेकिन बहुत बार सामाजिक पुनरुत्पादन की ज़रूरतों से भी उभरते हैं, जैसे पानी, सार्वजनिक जगह, सस्ते अनाज और ईंधन आदि की कमी से। ऐसे संघर्ष कभी उन सामाजिक ताने-बानों और रिश्तों पर खड़े होते हैं जो समय के साथ स्थापित हुए होते हैं, और कभी काम और जीवन-स्तर में तेज़ गिरावट से अचानक फूट पड़ते हैं। ये सहज उभार, वीरतापूर्ण तो होते हैं पर पर्याप्त नहीं हैं; ये अनुशासित संगठन के बग़ैर वर्तमान में उथल-पुथल तो मचा सकते हैं, पर शायद ही कभी भविष्य को नया रूप दे पाते हैं। इतिहास की प्रमुख क्रान्तियों, लंबे समयों तक चकी सन्तुलित क्रान्तिकारी गतिविधियों की कहानियाँ हैं, जिन्होंने समुदायों को दुनिया को बदल देने वाले महान संघर्षों के लिए तैयार किया। सहज संघर्ष वास्तविक क्रोध और शिकायतों का आईना हैं। वे सड़कें घेर सकते हैं, उम्मीद की चिनगारी जला सकते हैं, और हुकूमतें तक गिरा सकते हैं। लेकिन इतिहास का तजुर्बा (जैसे 2011 का मिस्र) बताता है कि संगठनात्मक निरन्तरता और मज़बूती के बिना ये लमहे दमन, सह-विलयन, और थकान की भेंट चढ़ जाते हैं। सम्पत्तिधारी वर्ग वक्त को रणनीतिक तरीक़े से बरतना जानता है — वे दशकों की योजनाएँ बनाते हैं। जो आंदोलन केवल विरोध की तात्कालिकता में कार्य करते हैं, वे भविष्य बनाने का दीर्घकालिक काम अपने शत्रुओं के हाथों सौंप देते हैं।

संगठन

तात्कालिकता से आगे जाकर कुछ टिकाऊ खड़ा करने के लिए संगठन चाहिए — जिनके सामाजिक आन्दोलनों से लेकर लोकतान्त्रिक-केन्द्रवादी लेनिनवादी पार्टियों जैसे कई रूप हो सकते हैं। इन दो रूपों के बीच की बहस इस डोसियर का विषय नहीं है। हमारा मक़सद यह बताना है कि राजनीतिक संगठन (भले उसका जो भी रूप हो) ही वो ज़रिया है जिससे वक़्त को मुक्ति की दिशा में ढाला जाता है। पार्टियाँ, मोर्चे, ट्रेड यूनियन, किसान संगठन, महिला संघ और युवा आंदोलन — ये सब विशिष्ट किन्तु अन्तर्सम्बद्ध भूमिकाएँ निभाते हैं। लेनिनवादी ढाँचे की पार्टियाँ दूरगामी कार्यक्रमों की योजना बना सकती हैं और राज्य सत्ता को चुनौती दे सकती हैं। जन संगठन संघर्षों को दैनिक जीवन में स्थापित कर सकते हैं और समुदायों को ठहराव और निरन्तरता मुहैय्या करा सकते हैं। मोर्चे विविध ताक़तों के दरमियान वैचारिक एकरूपता की माँग किए बग़ैर एकता को सम्भव बना सकते हैं। संगठन ही बिखरे और परेशानहाल मज़दूर वर्ग को अपने बचे-खुचे समय को साझा करने का (सामाजिक बानाने का), और उन्हें अपनी शर्तों पर समाज बनाने का मौक़ा देता है।

अनुशासन

लेनिनवादी पार्टी की ख़ूबी यही है कि इस परम्परा में अनुशासन को केन्द्रीय स्थान हासिल है। अनुशासन का मतलब आज्ञापालन या नौकरशाही कठोरता से नहीं है (हालाँकि ऐसी पार्टियाँ ध्यान न देने पर इन बुराइयों में गिर सकती हैं)। अनुशासन का मतलब है ऐसे कैडर तैयार करना जो राजनीतिक रूप से शिक्षित हों और पार्टी-स्वरूप की अनिवार्यता को समझें, उन सामूहिक प्रक्रियाओं को समझें जो एक साझा राजनीतिक समझ या कार्यक्रम गढ़ने के लिए जरूरी हैं, पार्टी के भीतर प्रतिनिधित्ववादी नेतृत्व की आवश्यक संरचनाओं को समझें, और साझा लक्ष्यों, रणनीतियों, और जवाबदेही के तरीक़ों के प्रति पूर्ण समर्पण रखें। अनुशासन संगठनों को ऊर्जा सहेजने, तजुर्बे से सीखने, और संकट के लमहों से आगे भी टिके रहने का माद्दा देता है — संगठन विद्रोह को एक परियोजना में बदल देता है।

इस पूरे काम में मुख्य एजेंट वे लोग हैं जिन्हें अंतोनियो ग्राम्शी ने ‘नए बुद्धिजीवी’ का नाम दिया था। राजनीतिक परियोजना के वे स्थायी क़ार्यकर्ता जो मज़दूर वर्ग, किसानों और जनआन्दोलनों की भीतर से आते हैं।21 उनका काम है स्पष्टीकरण, विश्लेषण-संश्लेषण और संचार के ज़रिए जीवित अनुभव को राजनीतिक रणनीति में बदलना। वे आंदोलनों को यह समझने में मदद करते हैं कि वे किसके ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं — और यह भी कि भविष्य में क्या-क्या शामिल होना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीयतावाद

पूँजीवाद में दरार डालने का काम राष्ट्रीय सरहदों के भीतर टिकाऊ नहीं रह सकता। पूँजीवाद वित्त, व्यापार, सैन्य गुटों, आपूर्ति शृंखलाओं और वैचारिक संस्थानों अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संगठित है। इसलिए जो ताक़तें भविष्य का निर्माण करना चाहती हैं, उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित होना होगा। अंतरराष्ट्रीयतावाद नैतिकता या भावुकता की जगह से आना चाहिए। विश्व अर्थव्यवस्था की संरचना और उत्पीड़ितों के समान हालात अंतरराष्ट्रीयतावाद को व्यावहारिक अनिवार्यता बनाते हैं। इसका मतलब है मुल्कों और संघर्षों के आर-पार रिश्ते बनाना, इन्क़लाबी प्रक्रियाओं से सबक़ लेना, साम्राज्यवाद के विरुद्ध सम्प्रभुता की रक्षा करना, और राजनीतिक शिक्षा, अभियानों और भौतिक एकजुटता के विभिन्न रूपों में तालमेल बैठाना। अंतरराष्ट्रीयतावाद के बिना सफलताएँ अकेली और बेसहारा रह जाती हैं, लेकिन उसके साथ, स्थानीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर संघर्ष उस पैमाने तक पहुँचने लगते हैं जो एक वैश्विक पूँजीवादी व्यवस्था का सामना करने के लिए आवश्यक है।

भविष्य को एक ही वार में नहीं छीना जा सकता। उसे सब्र से, सामूहिक ढंग से, और होशियारी से खड़ा करना होगा। वक़्त संघर्ष के लिए गुंजाइश पैदा करता है, संगठन उसे शक्ल देता है, अनुशासन उसे सहनशक्ति देता है, और अंतरराष्ट्रीयतावाद उसे विस्तार देता है। शासक वर्ग के उस नियोजित भविष्य के मुक़ाबले, जो शोषण और बहिष्कार पर खड़ा है, ये औज़ार उत्पीड़ितों को अपने ख़ुद के भविष्य की योजना बनाने की हिम्मत देते हैं — एक ऐसा भविष्य जो गरिमा और बराबरी, और ज़िन्दगी से जुड़ा हो।

अल्फ्रेडो प्लांक, इग्नासियो कोलोम्ब्रेस, कार्लोस सेस्सानो, हुआन मैनुएल सांचेज़ और नानी कैपुरो (अर्जेंटीना), चे (सामूहिक श्रृंखला), 1968, कैनवास पर तेलचित्र, प्रत्येक 195 x 150 से.मी.

भाग 2: भविष्य का निर्माण

वर्तमान के स्थान पर क्या बनाया जाना चाहिए? भविष्य केवल संघर्ष, संगठन और अनुशासन का विषय बनकर नहीं रह सकता; उसे भौतिक, संस्थागत और अंतरराष्ट्रीय रूप भी लेना होगा। इसका अर्थ है स्वामित्व, योजना, संप्रभुता और उन समन्वय के रूपों से जुड़े प्रश्नों का सामना करना, जिनके माध्यम से एक अलग सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखा जा सकता है।

सार्वजनिक स्वामित्व और योजना

भविष्य का प्रश्न स्वामित्व और समन्वय के प्रश्न से अलग नहीं किया जा सकता। पूँजीवाद के तहत, उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व एक छोटे वर्ग को यह तय करने की शक्ति देता है कि क्या उत्पादन होगा, कैसे होगा और किसके लिए होगा। यह शक्ति पूरे समाज के हित में नहीं, बल्कि लाभ, प्रतिस्पर्धा और अल्पकालिक संचय की अनिवार्यताओं के अनुसार प्रयोग की जाती है। परिणामस्वरूप एक गहरा विरोधाभास उत्पन्न होता है: उत्पादन शक्तियाँ अत्यधिक सामाजिकीकृत हो चुकी हैं, जबकि उन पर नियंत्रण सीमित रूप से निजी हाथों में बना रहता है। आज श्रम पहले से ही सामूहिक और अंतरराष्ट्रीय है, लेकिन इस सामूहिक प्रयास के तकनीकी आधार और आर्थिक अधिशेष पर एक अल्पसंख्यक वर्ग का क़ब्ज़ा है। इसलिए, किसी भी समाजवादी भविष्य पर गंभीर चर्चा को इस विरोधाभास का सामना करते हुए संपत्ति संबंधों में परिवर्तन करना होगा।

सार्वजनिक स्वामित्व का मतलब संपत्तियों को निजी हाथों से राज्य के हाथों में कानूनी रूप से स्थानांतरित करना भर नहीं है। स्वयं राज्य भी वर्ग संघर्ष का एक क्षेत्र है और उसे विकास की दिशा को निर्देशित करने के एक साधन के रूप में हासिल करना आवश्यक है। जब ऊर्जा, परिवहन, वित्त, भूमि, संचार और भारी उद्योग जैसे रणनीतिक क्षेत्र सार्वजनिक स्वामित्व में होते हैं, तो समाज को उत्पादन और नवाचार को निजी संचय के बजाय सामूहिक आवश्यकताओं की ओर मोड़ने की क्षमता मिलती है। पूँजीवाद संसाधनों का व्यवस्थित रूप से ग़लत आवंटन करता है—विलासिता संबंधी उपभोग और विनाशकारी उद्योगों का अत्यधिक उत्पादन करता है, जबकि देखभाल, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे क्षेत्रों में कमी बनी रहती है। सार्वजनिक स्वामित्व उत्पादन को सामाजिक पुनरुत्पादन, दीर्घकालिक निवेश और साझा समृद्धि की ओर पुनर्निर्देशित करने के लिए भौतिक आधार प्रदान करता है।

सार्वजनिक स्वामित्व के पक्ष में तर्क तकनीक से भी जुड़ा हुआ है। निजी स्वामित्व के तहत, तकनीकी विकास को लाभप्रदता, बौद्धिक संपदा के एकाधिकार और श्रम अनुशासन के अधीन कर दिया जाता है। नवाचार को लागत कम करने, निगरानी, सैन्यीकरण और ज्ञान की घेरेबंदी की ओर निर्देशित किया जाता है, बजाय इसके कि वह सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम समय को कम करे या सामूहिक कल्याण को बेहतर बनाए। उत्पादन की शक्तियों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण से तकनीक का उपयोग सामाजिक हित में किया जा सकता है: कार्यदिवस को छोटा करने, रोजगार सृजित करने, सार्वजनिक सेवाओं का विस्तार करने, मानव कौशल को बढ़ाने और पारिस्थितिक नुक़सान को कम करने के लिए। वही डिजिटल और लॉजिस्टिक प्रणालियाँ, जिनका उपयोग पूँजीवाद शोषण को तीव्र करने के लिए करता है, अपने भीतर तर्कसंगत और मानवीय उत्पादन तथा वितरण की संभावना भी समेटे हुए हैं।

पूँजीवादी विचारधारा योजना को स्वभावतः अधिनायकवादी और अक्षम बताती है, जबकि बाज़ार को समन्वय के एक तटस्थ और लोकतांत्रिक तंत्र के रूप में प्रस्तुत करती है। वास्तव में पूँजीवाद पहले से ही अत्यधिक योजनाबद्ध है—लेकिन यह योजना पूँजीपतियों के हितों में होती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, वित्तीय संस्थान और सैन्य गठबंधन व्यापक आंतरिक योजना, दीर्घकालिक पूर्वानुमान और रणनीतिक समन्वय में संलग्न रहते हैं। बाज़ार योजना का स्थान नहीं लेता; बल्कि यह सामाजिक निर्णय-प्रक्रिया को खंडित करता है, ज़िम्मेदारी को अस्पष्ट बनाता है और सामूहिक जीवन को संचय की संकीर्ण तर्क प्रणाली के अधीन कर देता है। क़ीमतें संकेत तो देती हैं, लेकिन तब, जब सामाजिक और पारिस्थितिक क्षति पहले ही हो चुकी होती है। बाज़ार अल्पकालिक लाभप्रदता को बढ़ावा देता है, न कि दीर्घकालिक सामाजिक तर्कसंगतता को।

समाजवादी योजना का अर्थ लोकप्रिय जीवन से कटा हुआ नौकरशाही आदेश नहीं है; बल्कि यह समय के साथ सामाजिक श्रम के सचेत और लोकतांत्रिक समन्वय से संबंधित है। योजना पूँजीवादी अल्पकालिकता के ख़िलाफ़ एक समयगत हथियार है। यह समाज को सामूहिक प्राथमिकताएँ तय करने की ओर प्रेरित करती है—जैसे डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी), औद्योगिक विविधीकरण, खाद्य संप्रभुता और सार्वभौमिक देखभाल—और उनके अनुसार संसाधनों को संगठित करने की क्षमता देती है। यह क्षेत्रों (सेक्टर्स) और सामाजिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना संभव बनाती है, बजाय इसके कि विकास को बाज़ार प्रतिस्पर्धा के असमान और विनाशकारी परिणामों पर छोड़ दिया जाए। योजना वह माध्यम है जिसके द्वारा समाज इस समझ पर कार्य कर सकता है कि भविष्य स्वतः नहीं बनता, बल्कि उसे सचेत रूप से निर्मित करना पड़ता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना लोकतंत्र को नकारती नहीं है; बल्कि इसके विस्तार की माँग करती है। योजनाबद्ध व्यवस्था को मुक्ति-दायी बनाने के लिए उसे जनभागीदारी, श्रमिक नियंत्रण और सामाजिक आवश्यकताओं को व्यक्त करने में सक्षम जनसंगठनों में निहित होना चाहिए। पूँजीवाद के तहत श्रम का समाजीकरण पहले से ही विशाल नेटवर्कों के पार समन्वय की माँग करता है; समाजवाद इस समन्वय को पारदर्शी, जवाबदेह और मानव विकास की ओर उन्मुख बनाने का प्रयास करता है। जब श्रमिक, समुदाय और सार्वजनिक संस्थाएँ लक्ष्यों को निर्धारित करने और परिणामों की निगरानी में भाग लेते हैं, तो योजना एक तकनीकी थोपने के बजाय सामूहिक सीखने की प्रक्रिया बन जाती है। इसी प्रकार की प्रक्रियाओं के माध्यम से सामाजिक अधिशेष को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, संस्कृति और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन की ओर सचेत रूप से निर्देशित किया जा सकता है।22

एक नए अंतरराष्ट्रीयतावाद की ओर

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, एक शक्तिशाली समाजवादी गुट के उदय और उपनिवेशवाद-उन्मूलन की लगातार लहरों ने ऐसे अंतरराष्ट्रीयतावाद की नींव रखी, जो साम्राज्यवाद और नव-उपनिवेशवाद के विरोध पर आधारित था। यह नए आर्थिक और सामाजिक मॉडल बनाने और एक नई वैश्विक व्यवस्था बनाने का प्रयास था।23

यह अंतरराष्ट्रीयतावाद ऋण संकट, नवउदारवाद के आक्रमण और सोवियत संघ तथा समाजवादी गुट के पतन के साथ ढह गया। इसके स्थान पर अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) द्वारा थोपा गया एक दिखावटी वैश्वीकरण आया—बाज़ारों का खुलना, उत्पादक क्षेत्रों से राज्य की वापसी, पूँजी नियंत्रणों का हटना, संसाधनों का समर्पण, और शैक्षणिक व सांस्कृतिक अधीनता—जो संप्रभुता के व्यापक क्षरण का प्रतीक था। सोवियत संघ के पतन के दशकों बाद, एक नए अंतरराष्ट्रीयतावाद के उदय के लिए वस्तुगत परिस्थितियाँ उभर रही हैं। ग्लोबल उत्तर गहरे संकट से गुज़र रहा है, जिसकी पहचान उद्योग-विहीनता और उत्पादन क्षमता के क्षरण से होती है, जबकि चीन और ग्लोबल दक्षिण के देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के इंजन के रूप में उभर रहे हैं। ब्रिक्स, शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और अन्य द्विपक्षीय मंचों का उदय इन बदलती वस्तुगत परिस्थितियों को दर्शाता है।

हालाँकि संयुक्त राष्ट्र और इसकी एजेंसियों पर अब भी संयुक्त राज्य अमेरिका(यूएस) तथा उसके सहयोगियों का प्रभाव बना हुआ है, जिससे उनका प्रभाव कई मामलों में कम हो गया है। दुनिया भर में बढ़ते संघर्ष—ग़ज़ा, वेनेज़ुएला, क्यूबा से लेकर कांगो गणतंत्र और ईरान तक—इस असंतुलन को उजागर करते हैं। इसी तरह आईएमएफ और विश्व बैंक संरचनात्मक समायोजन (Structural Adjustment) नीतियों के माध्यम से अपना प्रभाव बनाए रखते हैं। जलवायु पर बने ढाँचे लोगों के लिए उपयोगी साबित नहीं हुए हैं। महामारी अपने साथ ‘वैक्सीन रंगभेद’ लेकर आई। इससे भी बुरा यह है कि ग्लोबल दक्षिण के कई बहुपक्षीय संगठन निष्क्रिय हैं या नवउदारवाद की सोच से प्रभावित हैं।

एक नई वैश्विक संरचना पर बहस अक्सर ‘बहुध्रुवीयता’(multipolarity) पर केंद्रित रही है, लेकिन इसकी सीमाएँ हैं क्योंकि यह शीतयुद्ध जैसी प्रतिस्पर्धात्मक मानसिकता को दोहरा सकती है। इसके विपरीत, नए अंतरराष्ट्रीयतावाद को ‘बहुपक्षवाद’ (multilateralism) पर आधारित होना चाहिए। इस संदर्भ में सयुक्त राष्ट्र को पुनः सक्रिय करना और यूएन चार्टर को विश्व के लोगों की साझा धरोहर के रूप में बनाए रखना ख़ास महत्त्व रखता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा, दोनों में सुधार की आवश्यकता है, और ग्लोबल दक्षिण के देशों को विश्व स्वास्थ्य संगठन, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन और अंकटाड जैसी एजेंसियों के लिए एक साझा एजेंडा विकसित करना होगा। इन संस्थाओं के लिए ऐसी नीतियाँ और कार्यक्रम तैयार करने हेतु नए बौद्धिक और राजनीतिक संघर्ष की तत्काल आवश्यकता है, जो ग्लोबल दक्षिण के लोगों की आकांक्षाओं को सही रूप में व्यक्त कर सकें।

नए बहुपक्षवाद के साथ-साथ, वामपंथी और देशभक्त शक्तियों को उन क्षेत्रीय संगठनों का समर्थन और सुदृढ़ीकरण करना चाहिए, जिन्होंने पिछले तीस वर्षों में अपनी दिशा खो दी है, और जहाँ यह संभव न हो, वहाँ नए संगठनों के निर्माण की वकालत करनी चाहिए। 2000 के दशक और शुरुआती 2010 के वर्षों में लैटिन अमेरिका में पिंक टाइड के दौरान बने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन इस बात का उदाहरण हैं कि क्या संभव है।
समकालीन समय में साहेल देशों के गठबंधन ने अफ्रीका में अधिक सशक्त एकीकरण की इच्छा को व्यक्त किया है, जबकि ECOWAS (पश्चिमी अफ्रीकी देशों का आर्थिक समुदाय) की नव-उपनिवेशवादी तर्क प्रणाली का प्रतिरोध भी किया है।24 इसी तरह, ब्रिक्स द्वारा वित्त, व्यापार, अवसंरचना से लेकर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, जलवायु सहयोग और अनुसंधान तक विभिन्न क्षेत्रों में शुरू की गई प्रक्रियाएँ ऐसे क्षेत्रीय संगठनों के लिए एक और मॉडल प्रस्तुत करती हैं।

नया अंतरराष्ट्रीयतावाद संप्रभुता की रक्षा से शुरू होता है, लेकिन वहीं समाप्त नहीं होता। इसे परिवर्तित सामाजिक संबंधों पर आधारित भविष्य की एक अंतरराष्ट्रीयवादी दृष्टि को भी समाहित करना होगा। यह दृष्टि केवल एक देश में साकार नहीं की जा सकती—और न ही केवल राज्यों द्वारा आगे बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए दुनिया भर के आंदोलनों की लामबंदी आवश्यक है, ताकि पूँजीवाद से आगे बढ़ा जा सके। समाजवादियों को चाहिए कि वे भविष्य की दिशा में मज़बूत आधार स्थापित करें, उन परियोजनाओं को बढ़ावा देते हुए, उनसे सीखते हुए और उन पर आगे निर्माण करते हुए, जिनमें शक्तियों के संतुलन को बदलने की क्षमता हो।

फिर भी, कोई भी कार्यक्रम—चाहे वह कितना ही आवश्यक क्यों न हो—अपने आप कायम नहीं रह सकता, जब तक उसे आगे बढ़ाने वाली सामाजिक शक्ति न हो और संघर्ष को प्रेरित करने वाला कोई क्षितिज न हो। यदि भविष्य को संस्थाओं, स्वामित्व, योजना और अंतरराष्ट्रीय समन्वय के माध्यम से निर्मित करना है, तो उसे एक राजनीतिक संवेदना के रूप में भी जिया जाना चाहिए।
वह संवेदना है—आशा।

लुइस गोंज़ालेज़ पाल्मा (ग्वाटेमाला), ला रोसा (गुलाब), 1991, टोनिंग और हस्त-रंगांकन के साथ जेलटिन सिल्वर प्रिंट, 47 x 48.5 से.मी.

 भाग 3: आशा

आज पूँजीवाद अपनी वैधता के संकट से गुजर रहा है, क्योंकि इसके विचार और मूल्य—व्यक्तिवाद, उद्यमिता, उपभोक्तावाद—अब वह सामाजिक गतिशीलता और भौतिक समृद्धि प्रदान नहीं कर पा रहे हैं, जिनका वादा लंबे समय से नवउदारवाद करता आया है। साथ ही, जैसे-जैसे यूएस के नेतृत्व वाला साम्राज्यवादी गुट आर्थिक और राजनीतिक रूप से अपनी शक्ति में गिरावट देख रहा है, वह उन दो क्षेत्रों में और अधिक ज़ोर लगा रहा है, जहाँ उसकी शक्ति अभी भी काफ़ी हद तक अप्रतिद्वंद्वी बनी हुई है: सांस्कृतिक उत्पादन और सैन्य शक्ति। हालाँकि इनकी अभिव्यक्तियाँ बहुत भिन्न हैं, लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही है—वर्तमान को बनाए रखना और भविष्य की संभावनाओं को सीमित करना। सैन्य आक्रामकता के माध्यम से, यूएस के नेतृत्व वाला गुट उन सभी देशों को दबाव में रखना चाहता है, जो ‘वाशिंगटन कन्शेंसस’ और निजी पूँजी के हितों के आगे झुकने से इनकार करते हैं, और इस तरह वह अधीनता को अस्वीकार करने वाले किसी भी राजनीतिक परिदृश्य को बंद कर देता है। सांस्कृतिक उत्पादन के साधनों पर अपने एकाधिकार के ज़रिए, इसका उद्देश्य न केवल सूचना को नियंत्रित करना है – यानी सत्य के रूप में स्वीकृत जानकारी को नियंत्रित करना – बल्कि शोषित जनसमूह की संस्कृति और मूल्यों को भी आकार देना है। इस प्रक्रिया में, यह हमारी कल्पना की सीमाओं को संकुचित कर देता है और अंततः इस बात को भी सीमित कर देता है कि हम किस प्रकार की आशा करने का साहस कर सकते हैं। आशा के अभाव में, श्रमिक वर्ग को दो प्रकार की राजनीतिक स्थितियों में धकेल दिया जाता है: या तो उसे अति-दक्षिणपंथ के कठोर निराशावाद की ओर धकेल दिया जाता है, जहाँ एक अलग भविष्य की कल्पना का ही उपहास किया जाता है; या फिर वह पलायनवादी पराजयवाद के अधीन हो जाता है, जो यह मान लेता है कि भविष्य पहले ही खो चुका है।

चीनी भाषा में ‘भविष्य’ की दो अवधारणाएँ यह स्पष्ट करने में मदद करती हैं कि यहाँ क्या दाँव पर लगा है। ‘未来’ (wèilái) शब्द, जिसका अर्थ भविष्य है—या शाब्दिक रूप से ‘जो अभी तक आया नहीं है’—दो भागों से मिलकर बना है: 未 (wèi) का अर्थ है ‘अभी नहीं’ या ‘नहीं हुआ’, और 来 (lái) का अर्थ है ‘आना’ या ‘पहुँचना’। साथ मिलकर, ये भविष्य की मूल विशेषता—उसकी अपूर्णता—पर ज़ोर देते हैं। निराशावाद और आशा के बीच का फ़र्क़ इसी में निहित है: भविष्य पूर्वनिर्धारित नहीं है। यह एक संभावना है, और यहीं मानव क्रिया की भूमिका सामने आती है।

इस संदर्भ में, आशा विचारों और भावनाओं के संघर्ष का मैदान बन जाती है। यही कारण है कि आशा को महज़ एक भावना से कहीं अधिक, एक अभ्यास के रूप में विकसित होना चाहिए – एक ऐसा अभ्यास जो जन शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से निर्मित हो, इतिहास में निहित हो, और जिसे हमारे दैनिक जीवन में सक्रिय रूप से जिया जाए।

विचारों की लड़ाई

शासक वर्ग अपने मूल्यों—व्यक्तिवाद, निर्दयता और रूढ़िवाद—को बढ़ावा देकर वर्ग संबंधों और साझा वर्ग हितों को धुँधला करने का काम करता है। वह प्रभुत्वशाली वर्गों के अधीन लोगों को इस तरह प्रशिक्षित करता है कि वे राजनीतिक गतिविधियों को समय की बर्बादी, अव्यावहारिक या काल्पनिक मानकर तुरंत ख़ारिज कर दें, और सामूहिक कार्रवाई को या तो भोलापन या ख़तरनाक समझें। ऐसी परिस्थितियों में, आशा के व्यक्तिगत रूप से उत्पन्न होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसे एक अभ्यास के रूप में निर्मित करना होगा, जो संभावनाओं के क्षितिज को फिर से खोल सके और पूँजीवादी वर्तमान के रोज़मर्रा की ‘सामान्य समझ’ को चुनौती दे सके।

इसलिए, आशा को ठोस राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से संगठित करना आवश्यक है, जो संभावनाओं के क्षितिज को फिर से खोलें। इसके लिए हमें:

राजनीतिक कल्पना विकसित करनी होगी– वामपंथी शक्तियों को संगठित श्रम और सामाजिक संबंधों के वैकल्पिक रूपों का निर्माण करके भविष्य को स्पष्ट और समझने योग्य बनाना होगा। भविष्य की आशा को तब संगठित किया जा सकता है जब वह वर्तमान में लोगों की भौतिक परिस्थितियों को बदलने वाली ठोस कार्रवाइयों से जुड़ी हो, और जब श्रमिक वर्ग स्वयं को पूँजीवादी संकटों के दर्शक के बजाय इतिहास के नायक के रूप में पहचान सके।

पढ़ो ताकि सीख सको, और सीखो ताकि कर सको– हो ची मिन्ह ने कहा था, ‘आप हज़ार किताबें पढ़ सकते हैं, लेकिन अगर आप जो पढ़ते हैं उसे लागू नहीं करते, तो आप केवल किताबों की एक अलमारी हैं।’25 पढ़ना तब आशा का अभ्यास बनता है जब वह क्रिया से जुड़ता है। अध्ययन सामूहिक होना चाहिए और उन समस्याओं की ओर उन्मुख होना चाहिए जिनका सामना लोग अपने कार्यस्थलों, पड़ोस और संगठनों में करते हैं। उद्देश्य केवल ज्ञान का संचय नहीं है, बल्कि एक साझा भाषा, विश्लेषण और आत्मविश्वास का विकास करना है, जिसे व्यवहार में परखा जा सके।

लोकप्रिय प्रति-संस्कृति का विकास करें– एक प्रति-विचारधारा बिना प्रति-संस्कृति के नहीं बनाई जा सकती। इसका अर्थ है लोकप्रिय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के ऐसे रूपों का निर्माण करना जो व्यक्तिवाद और निराशावाद के प्रभाव को तोड़ें, गरिमा का निर्माण करें और एकजुटता को आकर्षक बनाएँ, साथ ही श्रमिक वर्ग की संस्कृति का सम्मान करें।

भविष्य की बात लोगों तक पहुँचाएँ– वामपंथ को अपने कार्यक्रम को ऐसे आसान रूप में बदलना चाहिए, जिसे लोग आसानी से समझ सकें। ‘शिक्षाप्रद’ (didactic) होने का अर्थ लोगों से ऊपर से बात करना नहीं है; इसका अर्थ है रणनीतिक होना और प्रस्तावों को इस तरह स्पष्ट रूप से संप्रेषित करना कि वे लोगों के अनुभवों से जुड़े हों और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाए जा सकें। उद्देश्य अमूर्तता से आगे बढ़कर दिशा प्रदान करना है, ताकि लोग समझ सकें कि क्या किया जा सकता है, किसके द्वारा, और किन संसाधनों के साथ।26

स्रोत की ओर लौटें- क्रांतिकारी इतिहास और संस्कृति और सामान्य रूप से इतिहास और संस्कृति को बचाएँ। इतिहास आशा का एक अभ्यास है क्योंकि यह इस विचार को तोड़ता है कि वर्तमान शाश्वत है। विघटन, सामूहिक संघर्ष और परिवर्तन के क्षणों की ओर लौटकर, लोग इस बात के प्रमाण प्राप्त करते हैं कि बदलाव संभव है और यह भी सीखते हैं कि उसे कैसे हासिल किया गया। इतिहास केवल पुरानी यादों में खोना नहीं है—यह रणनीति, त्याग और आत्मविश्वास का एक विद्यालय है।27

स्थायी प्रेरक बनें– वामपंथ को हर सामूहिक मंच पर काम करना चाहिए ताकि मजदूर वर्ग के विचार फैलाए जा सकें। उसे वहाँ उपस्थित होना चाहिए जहाँ लोग एकत्र होते हैं—एक अतिथि वक्ता के रूप में नहीं, बल्कि एक संगठित करने वाली शक्ति के रूप में। अंतोनियो ग्राम्शी के ‘नए बुद्धिजीवी’ की अवधारणा एक ‘निर्माता’ और ‘संगठक’ की है—एक ‘स्थायी प्रेरक’, जो कभी-कभार की वाकपटुता के बजाय व्यावहारिक जीवन से जुड़ा होता है।

भावनाओं की लड़ाई

शासक वर्ग को लगातार यह कोशिश करनी पड़ती है कि पूँजीवादी समाज में होने वाले शोषण और अभाव के कारण पैदा होने वाले लोगों के ग़ुस्से और असंतोष को एक अलग दिशा में मोड़ दे। असंतोष तब ख़तरनाक हो जाता है जब वह संगठित हो, जब वह अपने दुश्मन को पहचानता हो, और जब वह एकजुटता के साथ प्रतिक्रिया देता हो। इसलिए इसे लगातार सामूहिक संघर्ष से हटाकर डर, नाराज़गी, निराशा और हार मान लेने की ओर मोड़ दिया जाता है। आज यह संघर्ष और तीव्र हो गया है, क्योंकि आज का मीडिया और इंटरनेट ऐसा हो गया है कि युवा मज़दूरों को ऑनलाइन प्लैटफॉर्मों में खींच लिया जाता है। यहाँ उनके भीतर व्यक्तिगत सोच (सिर्फ अपने बारे में सोचने) को बढ़ावा मिलता है। उन्हें इसमें फँसाकर पैसा बनाया जाता है। इन माध्यमों का उनकी विवेकबुद्धि पर असर पड़ता है और उनकी चेतना कुंद होती है। इन प्लैटफॉर्मों पर कट्टर दक्षिणपंथी ताक़तों का असर रहता है।28 इन स्थानों में असंतोष को भाँपकर क्षणिक भावनात्मक भागीदारी के माध्यम से अस्थायी राहत दी जाती है। परिणाम यह नहीं होता कि असंतोष समाप्त हो जाए, बल्कि उसका (लाभकारी) प्रबंधन होता है—जिससे श्रमिक वर्ग अलग-थलग, विभाजित और मूकदर्शक हो जाता है। वह प्रतिक्रिया को ही राजनीति समझने लगता है।

इस परिदृश्य में, हमें ग़ुस्से और भ्रम को स्पष्टता में, स्पष्टता को आशा में, और आशा को सामूहिक कार्रवाई में बदलना होगा। इसके लिए आवश्यक है:

मीडिया साक्षरता- वामपंथ को श्रमिक वर्ग को आभासी स्थानों और तकनीकों की संरचना, उनके उद्देश्य (इच्छित और अनपेक्षित) और उनकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बारे में शिक्षित करना होगा। इसका मतलब है प्रबंधित भागीदारी और वास्तविक शक्ति के बीच के अंतर को उजागर करना—पोस्ट करने और संगठित होने के बीच का फ़र्क़ दिखाना—और यह सिखाना कि शासक वर्ग कैसे इन आभासी मंचों पर अपने नियंत्रण के ज़रिए सूचना को नियंत्रित करता है, आक्रोश को बढ़ाता है और अलगाव को सामान्य बनाता है। लक्ष्य इन स्थानों से हटना नहीं है, बल्कि लोगों को उन्हें समझने, उपयोग करने और उनकी सीमाओं को पहचानने के उपकरण देना है।

ज़मीनी राजनीति- आभासी मंचों का उपयोग शिक्षा और लामबंदी के लिए करते हुए भी, वामपंथ को ऐसे अवसर बनाने होंगे जहाँ लोग सीधे तौर पर देख सकें कि वर्तमान को बदलकर बेहतर भविष्य कैसे बनाया जा सकता है। इसके लिए ऐसे संगठित अवसर जरूरी हैं जहाँ एल्गोरिदम की मध्यस्थता के बिना लोग मिल सकें, विचारों का आदान-प्रदान कर सकें, संगठित हो सकें, निर्णय ले सकें, सामूहिक कार्य कर सकें और उसके परिणाम देख सकें। उद्देश्य क्षणिक और सीमित रुचियों पर आधारित संपर्क से आगे बढ़कर साझा वर्ग हितों पर आधारित दीर्घकालिक संगठन बनाना है।

प्रति-मूल्य (काउंटर-वैल्यूज़)- वामपंथ को समाजवादी मूल्यों का विकास करना होगा और उन्हें राजनीतिक कार्रवाई के माध्यम से व्यवहार में लाना होगा। इसका अर्थ है एकजुटता, देखभाल, अनुशासन और भाईबंदी (कॉमरेडशिप) को केवल नारे नहीं, बल्कि वास्तविकता बनाना। मूल्य तब विश्वसनीय बनते हैं जब वे हमारे संगठन के तरीक़ों में दिखाई देते हैं—हम एक-दूसरे के साथ कैसे व्यवहार करते हैं, कैसे मिलकर काम करते हैं, मतभेदों को कैसे सुलझाते हैं, और जिन समुदायों की सेवा का दावा करते हैं, उनसे कैसे संबंध रखते हैं। ऐसी संस्कृति में, जो निर्दयी व्यक्तिवाद और निराशावाद को बढ़ावा देती है, समाजवादी मूल्यों को व्यवहार में दिखाना स्वयं भावनाओं की लड़ाई में एक रणनीति बन जाता है। यह एक अलग प्रकार के सामाजिक संबंधों की झलक देता है—और इस प्रकार यह स्पष्ट करता है कि अलग मूल्यों पर आधारित भविष्य का समाज कैसा हो सकता है।

आशा एक प्रैक्सिस के रूप में

यदि भविष्य ‘未来’ (wèilái) है—वह ‘अभी-नहीं’ जो आने वाला है—तो आशा वह संवेदना है जो इस ‘अभी-नहीं’ को खुला रखती है, और वह अभ्यास है जो इसे निराशावाद, तमाशे और समर्पण द्वारा बंद होने से रोकता है। शासक वर्ग ‘wèilái’ को एक क़ैदखाने में बदलने, वर्तमान को शाश्वत बनाने और पूँजीवादी असंतोष को निराशावाद या क्रूरता में बदलने का प्रयास करता है। इसके विपरीत, हमारी परंपरा यह कहती है कि आशा कोई निष्क्रिय आशावाद या सिर्फ़ उम्मीद नहीं है, बल्कि यह दुनिया के अधूरे स्वरूप की ओर एक संघर्षशील दृष्टि है—जो वैश्विक दक्षिण में गरिमा के लिए हुए संघर्षों में गढ़ी गई है। यह इसलिए ख़तरनाक है क्योंकि यह भौतिक है: यह चेतना को ऊँचा उठाती है और लोगों को मात्र सहन करने से कार्रवाई की ओर ले जाती है।

इसी कारण आशा को संरचना, अनुशासन और संगठन की आवश्यकता होती है। जब गतिशील समाज की संस्कृति और विचार पूँजीवादी ‘सामान्य समझ’ के दोहराव में बाधा डालते हैं, तो वे निर्णायक बन सकते हैं—यह भौतिकवाद का खंडन नहीं, बल्कि उसकी द्वंद्वात्मक पूर्णता है। इस अर्थ में, ‘大同’ (dàtóng)—‘सार्वभौमिक समरसता’ से युक्त एक आदर्श स्थिति—सिर्फ एक सजावटी कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षितिज है जो रणनीति को दिशा देता है। वहीं ‘小康’ (xiǎokāng, ‘मध्यम समृद्ध समाज’) उन ठोस क़दमों को दर्शाता है जो सीमित संसाधनों के भीतर भी गरिमा के साथ विकास को संभव बनाते हैं। आशा तब वास्तविक बनती है जब वह ‘将来’ (jiānglái, ‘भविष्य’), यानी ‘जो आने वाला है’, को एक वादे से बदलकर एक योजना में परिवर्तित कर देती है। कार्य केवल अमूर्त सपने देखना नहीं है, बल्कि एक ठोस यूटोपिया का निर्माण करना है—जो वास्तविक प्रवृत्तियों में निहित हो और अभ्यास के माध्यम से मज़बूत हो—ताकि ‘अभी-नहीं’ एक ठोस भविष्य में बदल सके, जिसे वर्तमान में ही निर्मित किया जा रहा हो।


अल्फोंसो सोतेनो फर्नांदेस (मेटेपेक, मेक्सिको राज्य, मेक्सिको), आर्बोल दे ला विदा (जीवन का वृक्ष), 1975, खुली भट्टी में पकाई गई मिट्टी पर वार्निश युक्त विनाइल रंग, 6 मी.

Notes

1 Tricontinental: Institute for Social Research, The Anti-Feminist Agenda of the Latin American Far Right, dossier no. 98, 3 March 2026, https://thetricontinental.org/dossier-agenda-right-against-women/; Tricontinental: Institute for Social Research, The War on the Poor: Narcotics, Campesinos, and Capitalism, dossier no. 97, 3 February 2026, https://thetricontinental.org/dossier-war-on-the-poor/; Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialism Will Inevitably Be Defeated: The Re-Emergence of the Tricontinental Spirit, dossier no. 95, 9 December 2025, https://thetricontinental.org/dossier-tricontinental-conference-60/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis, dossier no. 93, 14 October 2025, https://thetricontinental.org/dossier-environmental-crisis/; Tricontinental: Institute for Social Research, How the World Looks from Tricontinental, dossier no. 90, 15 July 2025, https://thetricontinental.org/dossier-tricontinental-anniversary-global-south-sovereignty/; Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism: A Dangerous Decadent New Stage, Contemporary Dilemmas no. 4, 23 January 2024, https://thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/.

2 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, ‘खास किस्म के चरम दक्षिणपंथ पर दस विचार: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2024)’, 15 अगस्त 2024, https://thetricontinental.org/hi/newsletterissue/hindi-nl33-daxinpanth-pas-das-vichar/.

3 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, सुबह: मार्क्सवाद और राष्ट्रीय मुक्ति, https://thetricontinental.org/hi/dawn_marxvaad_rashtriya_mukti/.

4 Mark Fisher, Capitalist Realism: Is There No Alternative? (Winchester: Zero Books, 2009).

5 Tricontinental: Institute for Social Research, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis; Tricontinental: Institute for Social Research, Class Struggle and Climate Catastrophe in the Sahel, dossier no. 99, April 2026, https://thetricontinental.org/dossier-class-struggle-climate-sahel/; Tricontinental: Institute for Social Research, Africa’s Faustian Bargain with the International Monetary Fund, dossier no. 88, 13 May 2025, https://thetricontinental.org/dossier-faustian-bargain-imf-africa/.

6 Ernst Bloch, The Principle of Hope, Volume 1 (Cambridge: MIT Press, 1986) and The Spirit of Utopia (Palo Alto: Stanford University Press, 2000).

7 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, बांडुंग भावना, डोसियर संख्या 87, 8 अप्रैल 2025, https://thetricontinental.org/hi/bandung-bhawna/; Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialism Will Inevitably Be Defeated; Tricontinental: Institute for Social Research, The 80th Anniversary of the Victory in the World Anti-Fascist War, Understanding Who Saved Humanity: A Restorationist History, Contemporary Dilemmas no. 5, 12 November 2025, https://thetricontinental.org/the-80th-anniversary-of-the-victory-in-the-world-anti-fascist-war/.

8 Tricontinental: Institute for Social Research, The False Concept of Populism and the Challenges facing the Left: A Conjunctural Analysis of Politics in the North Atlantic, dossier no. 83, 17 December 2024, https://thetricontinental.org/the-false-concept-of-populism-and-the-challenges-facing-the-left-north-atlantic/.

9 Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialist War and Feminist Resistance in the Global South, dossier no. 86, 5 March 2025, https://thetricontinental.org/dossier-imperialist-war-and-feminist-resistance-in-the-global-south/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Political Organisation of Brazil’s Landless Workers’ Movement (MST), dossier no. 75, 16 April 2024, https://thetricontinental.org/dossier-75-landless-workers-movement-brazil/.

10 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, ‘खास किस्म के चरम दक्षिणपंथ पर दस विचार: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2024)’, 15 अगस्त 2024.

11 Tricontinental: Institute for Social Research, Serve the People: The Eradication of Extreme Poverty in China, Studies on Socialist Construction no. 1, https://thetricontinental.org/studies-1-socialist-construction/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Art of the Revolution will be Internationalist, dossier no. 15, https://thetricontinental.org/the-art-of-the-revolution-will-be-internationalist/.

12 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, ‘खास किस्म के चरम दक्षिणपंथ पर दस विचार: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2024)’, 15 अगस्त 2024.

13 Tricontinental: Institute for Social Research, How Neoliberalism Has Wielded ‘Corruption’ to Privatise Life in Africa, dossier no. 82, 24 November 2024, https://thetricontinental.org/dossier-how-neoliberalism-has-wielded-corruption-to-privatise-africa/.

14 Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt: The Stranglehold of Neocolonialism and Africa’s Search for Alternatives, dossier no. 63, 9 June 2023, https://thetricontinental.org/pan-africa/dossier-63-african-debt-crisis/.

15 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, वर्ग संघर्ष: बड़ी प्रौद्योगिकी कम्पनियाँ और वर्तमान समय की अन्य चुनौतियाँ, डोसियर संख्या 46, 1 नवंबर 2021, https://thetricontinental.org/hi/varg-sangharsh-badi-pradyogiki-aur-kampniyan/.

16 Tricontinental: Institute for Social Research, The Congolese Fight for Their Own Wealth, dossier no. 77, 25 June 2024, https://thetricontinental.org/dossier-77-the-congolese-fight-for-their-own-wealth/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Environmental Crisis Is a Capitalist Crisis.

17 Tricontinental: Institute for Social Research, NATO: The Most Dangerous Organisation on Earth, dossier no. 89, 10 June 2025, https://thetricontinental.org/dossier-nato-the-most-dangerous-organisation/; Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism.

18 Karl Marx, Capital: A Critique of Political Economy, Volume 1, trans. Ben Fowkes (London: Penguin Books, 1976).

19 World Bank, ‘Labor force, total’, World Development Indicators, https://data.worldbank.org/indicator/SL.TLF.TOTL.IN; International Labour Organization, ‘Employment in agriculture (% of total employment)’, ‘Employment in industry (% of total employment)’, and ‘Employment in services (% of total employment)’, ILOSTAT modelled estimates, https://data.worldbank.org/indicator/SL.AGR.EMPL.ZS, https://data.worldbank.org/indicator/SL.IND.EMPL.ZS, and https://data.worldbank.org/indicator/SL.SRV.EMPL.ZS; Datta, Namita; Rong, Chen; Singh, Sunamika; Stinshoff, Clara; Iacob, Nadina; Nigatu, Natnael Simachew; Nxumalo, Mpumelelo; and Klimaviciute, Luka, Working Without Borders: The Promise and Peril of Online Gig Work, International Bank for Reconstruction and Development / The World Bank, 2023, https://openknowledge.worldbank.org/entities/publication/ebc4a7e2-85c6-467b-8713-e2d77e954c6c?utm.

20 Tricontinental: Institute for Social Research, The Anti-Feminist Agenda of the Latin American Far Right.

21 Tricontinental: Institute for Social Research, The New Intellectual, dossier no. 12, 11 February 2019, https://thetricontinental.org/the-new-intellectual/.

22 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की खोज, डोसियर संख्या 84, 14 जनवरी 2025, https://thetricontinental.org/hi/vaishvik-dakshin-ke-liye-vikas-ke-naye-siddhant-ki-khoj/.

23 Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialism Will Inevitably Be Defeated; Tricontinental: Institute for Social Research, The Bandung Spirit.

24 Tricontinental: Institute for Social Research, The Sahel Seeks Sovereignty, dossier no. 91, 12 August 2025, https://thetricontinental.org/dossier-sahel-alliance-sovereignty/.

25 Ho Chi Minh, ‘Modifying Working Methods’, in Selected Works, vol. 2 (Hanoi: Foreign Languages Publishing House, 1961), 496.

26 ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की खोज.

27 Tricontinental: Institute for Social Research, ‘Cabral: A Revolutionary of Double Belonging: The Ninth Pan-Africa Newsletter (2024)’, 27 September 2024, https://thetricontinental.org/pan-africa/newsletterissue-cabral-centenary/.

28 Julian Assange, When Google Met Wikileaks (New York: OR Books, 2014) and Franklin Foer, World Without Mind: The Existential Threat of Big Tech (New York: Penguin Press, 2017).

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भारतीय अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल का दौर https://thetricontinental.org/hi/bharteey-arthvyavastha-me-uthal-puthal-ka-daur/ Tue, 06 Jan 2026 08:00:51 +0000 https://thetricontinental.org/?p=135378 इस डोसियर में भारतीय कलाकार गिगी स्कारिया की कलाकृतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। उन्होंने चित्रकला, फ़ोटोग्राफ़ी, इंस्टॉलेशन आर्ट, मूर्तिकला और वीडियो के ज़रिए भारत के शहरी और ग्रामीण जीवन के बदलावों तथा देश के विभिन्न सामाजिक समूहों पर पड़ने वाले उनके प्रभावों को अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत मूर्तियाँ और इंस्टॉलेशन भारत के लोगों के जीवंत अनुभवों का स्मारक हैं— विरोधाभासों, बढ़ती असमानताओं और अविकास से जन्मी अधूरी आकांक्षाओं के बीच।


गिगी स्कारिया, व्हील, 2009

भूमिका

दुनिया की आर्थिक व्यवस्था लगातार बदल रही है और भूमंडलीकरण एक लंबे संकट से गुज़र रहा है। नब्बे के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) की अगुआई में पश्चिमी पूंजी ने व्यापार में उदारीकरण और वैश्विक आपूर्ति शृंखला को बढ़ावा दिया, इसने वैश्विक दक्षिण और उत्तर के बीच श्रम की लागत के अंतर का बेजा फ़ायदा उठाया। आज ट्रम्प के नेतृत्व में वर्चस्ववादी यूएस अपनी ही प्रसारित इन प्रक्रियाओं को कमज़ोर कर रहा है ताकि भूमंडलीकरण के अनचाहे परिणामों को पलटा जा सके: ये परिणाम हैं यूएस का आर्थिक पतन और वैश्विक दक्षिण की एक उभरती हुई ताक़त का प्रौद्योगिकी विकास।

हालाँकि दुनिया की आर्थिक व्यवस्था नया आकार ले रही है, लेकिन इसके बीच भारतीय अर्थव्यवस्था उदारीकरण की पैंतीस सालों की जकड़न में क़ैद है। इसकी संरचनात्मक समस्याएँ हैं जिनकी जड़ गहरी असमानताओं में है और जो उदारवादी नीतियों से और भी बढ़ गई हैं। इन समस्याओं ने एक व्यापक, तकनीकी रूप से विकसित घरेलू औद्योगिक ढाँचा तैयार नहीं होने दिया। भारतीय उद्योगों की इस ख़राब हालत के कारण देश के श्रमबल का बड़ा हिस्सा इनसे बाहर है और रोज़ी-रोटी कमाने भर के लिए असुरक्षित, कम आय, कम उत्पादकता वाले काम करने को मजबूर है। नतीजतन देश की ज़्यादातर आबादी ग़रीबी में जीने को मजबूर है, जबकि अधिकारिक दावे किए जा रहे हैं कि इसमें भारी गिरावट आ रही है जो कि जबरन गढ़े गए आँकड़ों के सहारे टिके हैं।1

उद्योगों के निरंतर अल्पविकास, ख़ासतौर से विनिर्माण क्षेत्र में, का कारण भारत के भूमंडलीकरण से रिश्ते में छिपा है। उदारीकरण का वादा था कि वह भारत की छिपी निहित संभवनाओं को आज़ाद कर सकता है, लेकिन इसने एक ऐसा रुझान तैयार किया जिसके केंद्र में विऔद्योगीकरण, संगठित रोज़गार को ख़त्म करना, उत्पादक क्षमता को कमज़ोर करना और सामाजिक असमानताओं को बढ़ाना है।

नरेंद्र मोदी सरकार की हिंदुत्व की राजनीति भारत के ‘विश्वगुरु’ होने का डंका पीट रही है, लेकिन इसके ऊँची विकास दर के दावे विवादास्पद आँकड़ों पर टिके हैं। जब सरकार से इसके बारे में सवाल किए जाएँ तो जवाब में गोलमोल बातें और दूसरों पर आरोप लगा दिए जाते हैं। 2014 में जब से मोदी सत्ता में आए हैं तब से उनकी राजनीतिक रणनीति रही है कि ख़राब हालात के लिए विपक्ष और पिछली सरकारों को दोषी क़रार दिया जाए। और उनके प्रधानमंत्री पद पर रहने के एक दशक बाद भी यही रणनीति जारी है। इसमें कोई दोराय नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा ख़स्ता हालत का कारण हैं नब्बे के दशक की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा लागू नवउदारवादी नीतियाँ, जिन्हें बाद की सब सरकारों ने भी अपनाया, इनमें मोदी-नीत भाजपा सरकार भी शामिल है जो इन नीतियों की सबसे कट्टर समर्थक है। 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने लंबे शासनकाल में मोदी ने भारतीय और विदेशी पूंजी की नज़र में अपनी नवउदारवादी छवि को और भी चमकाया।

लेकिन वे जिस आक्रामकता से इन्हीं नीतियों के और भी भयानक रूप को लागू कर रहे हैं उनकी वजह से समस्याएँ और बढ़ गई हैं, असमानता की खाई गहरी होती जा रही है और संकट बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद से उन्होंने कई नई नीतियों की घोषणा की जैसे मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, डिज़ाइन इन इंडिया और डिज़ाइन फ़ॉर द वर्ल्ड। इन नई पहलों का काम था कि ये विश्व बाज़ार के लिए भारत में डिज़ाइन और विनिर्माण के क्षेत्र में विदेशी पूंजी लाएँ, भारतीय स्टार्टअपों को नए तकनीकी क्षेत्रों में काम करने और वैश्विक स्तर के हिसाब से भारतीय श्रमबल के कौशल का विकास करें – ये सब काम भारतीय विनिर्माण में फिर से जान फूँकने के लिए किया जाना था लेकिन पश्चिमी बाज़ारों की ज़रूरतों के हिसाब से। सच्चाई यह है कि ये सब क़दम विनिर्माण को मज़बूत करने या विऔद्योगिकरण को पलटने में असफल रहे हैं। इनमें से अधिकतर सिर्फ़ कॉर्पोरेटों को सब्सिडी और करों में छूट देने का ही काम करते हैं, इस उम्मीद में कि इससे अपने आप ही औद्योगिक विस्तार हो जाएगा, ज़ाहिर है इसके नतीजे काफ़ी ख़राब रहे।

इसी तर्ज़ पर जो एक क़दम उठाया गया था, जिसका काफ़ी प्रचार किया गया, वह है उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना। यह चौदह उद्योगों के लिए बनाई गई जिनमें से इलेक्ट्रॉनिक्स सबसे आगे रहा, इस क्षेत्र की भारतीय और विदेशी कंपनियों को उत्पादन के लिए सरकार ने सबसे ज़्यादा सब्सिडी दी। लेकिन यह योजना मुख्य रूप से आयातित घटकों की असेंबलिंग के लिए ही सब्सिडी देती है, इससे न तो भारत में बहुत अधिक धन आता है है और न ही तकनीकी क्षमता। भारत में बने स्मार्टफ़ोनों जैसे सामान में अधिकतर मूल्य वृद्धि विदेशों में ही होती है जबकि इन सब्सिडियों का बोझ आख़िरकार सार्वजनिक निवेश और सरकार के सामाजिक ख़र्च में कटौती के ज़रिए जनता को ही उठाना पड़ता है। भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योगों के विकास में जो संरचनात्मक रुकावटें हैं उन्हें कॉर्पोरेटों को सब्सिडी देकर या बेतहाशा विदेशी निवेश से हटाया नहीं जा सकता; बल्कि ये नीतियाँ उसी संरचनात्मक बदहाली को फिर से स्थापित करती है जो भारत को आज़ादी के समय विरासत में मिली थी, जो उदारीकरण के बाद कई गुना बढ़ गई।


गहन असमानताएँ: आज़ादी के बाद औद्योगीकरण की रुकावटें

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो प्रौद्योगिकी और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को बेहद अहम माना गया – सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राजनीतिक आज़ादी बरक़रार रखी जा सके और पश्चिम के साथ औपनिवेशिक आर्थिक संबंधों को बदला जा सके, इसलिए भी कि बेरोज़गार खेत मज़दूरों को उद्योगों में लाकर उनका जीवन स्तर बढ़ाया जा सके। पंचवर्षीय योजनाओं के ज़रिए भारत ने औद्योगीकरण के एक तेज़ रफ़्तार कार्यक्रम की अपनी यात्रा शुरू की, यह कार्यक्रम सरकारी बड़े उद्योगों के विकास के इर्द-गिर्द चला। इस दौरान निजी पूंजी ने राज्य द्वारा निर्मित इस आधार से उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन किया। नतीजतन, आज़ादी के बाद के लगभग पंद्रह साल (लगभग 1947-1962) में सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व में अभूतपूर्व औद्योगीकरण का दौर देखा, जिसमें जीडीपी का 7% से 15.9% हिस्सा विनिर्माण का था – इसके बाद औद्योगीकरण का यह स्तर नहीं देखा गया।2 लेकिन जल्दी ही औद्योगीकरण की प्रक्रिया का सामना हुआ भारतीय समाज की गहन कृषि संबंधी और वर्गीय असमानताओं से।

अधिकांश भूमि का स्वामित्व एक छोटे-से ग्रामीण अभिजात वर्ग के पास था जबकि जनता का बड़ा हिस्सा भूमिहीन था और रोज़मर्रा की ज़रूरतों तक के लिए जूझ रहा था। समतामूलक भूमि सुधारों के अभाव में व्यापक ग़रीबी ने घरेलू माँग को कमज़ोर कर एक अंदरूनी रुकावट खड़ी की जिसकी वजह से भारतीय उद्योग निरंतर विकास के लिए ज़रूरी स्तर हासिल नहीं कर पाए। इसी दौर में अभिजात वर्ग के पश्चिमी ढर्रे के उपभोग के आयात केंद्रित तरीक़े ने विदेशी मुद्रा की कमी पैदा कर विकास को विदेशी जकड़न में भी डाल दिया।

भारत ने आयात को कम करने के लिए औद्योगीकरण की जो नीति अपनाई, वह भले ही वह व्यापक और गतिशील औद्योगिक क्षेत्र का निर्माण न कर पाई हो, लेकिन इसने देश के कुछ चुनिंदा बड़े व्यावसायिक घरानों वाले पूंजीपति वर्ग को ज़रूर मज़बूत किया। इन घरानों ने अपनी मौजूदगी को प्रभावी बनाया और राज्य की नीतियों पर असर डालने की अपनी क्षमता बढ़ाई।

एक तरफ़ दबदबे वाले भूस्वामी और पूंजीपति थे और दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता, भूमिहीन मज़दूर और औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वालों का छोटा सा वर्ग, राज्य ने इस दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। सत्ताधारियों ने ऐसी नीतियों से किनारा किया जो अभिजात वर्ग के हितों के ख़िलाफ़ थीं – जैसे सही अर्थों में कृषि सुधार या संपत्तिधारी वर्गों पर पर्याप्त कर लगाना। इसका नतीजा हुआ कि राज्य द्वारा किया जा रहा औद्योगीकरण, प्रगतिशील कराधान (मोटे तौर पर, आय के आधार पर कर लगाना) की बजाय राजकोषीय घाटे पर निर्भर हो गया। विस्तारवादी राजकोषीय नीति (आर्थिक प्रगति के लिए सरकार द्वारा खर्च में बढ़ोतरी और करों में कटौती) के हर दौर ने ज़्यादा से ज़्यादा अधिशेष बड़े बुर्जुआ तक पहुँचाकर असमानताओं को और बढ़ाया। संचय की उनकी लालसा तो बढ़ती गई लेकिन संकीर्ण घरेलू बाज़ार ने उनकी संचय की संभावना को सीमित रखा। इसलिए भारतीय बुर्जुआ वर्ग के हाथों में पहुँचे निवेश करने योग्य अधिशेष का काफ़ी बड़ा हिस्सा औद्योगिक विस्तार की बजाय अन्य जगहों पर लगाया गया।

नतीजतन, औद्योगीकरण की प्रक्रिया अस्थिर और रुक-रुक कर आगे बढ़ी, कयोंकि राज्य द्वारा समन्वित विस्तार का हर प्रयास जल्दी ही उन्हीं संरचनात्मक बाधाओं से टकराता रहा। ये अनसुलझी बाधाएँ गंभीर भुगतान संतुलन संकट में बदल गईं, इसके साथ भारत ने एक प्रमुख व्यापारिक एवं वित्तीय सहयोगी यानी सोवियत रूस को भी खो दिया (रूबल-रुपए व्यापार ने भारत को वैश्विक मुद्रा में आए झटकों से बचाए रखा था)। अंतत: इस सबके चलते भारत 1991 में नवउदारवादी मोड़ पर निहत्था खड़ा हो गया, एक ऐसी व्यवस्था जो ब्रेटन वुड्ज़ संस्थानों (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक) द्वारा संचालित थी।

उदारीकरण के बाद

1991 में भारत ने औपचारिक तौर पर अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण कर दिया, लेकिन इसने औद्योगिक विकास के सामने खड़ी रुकावटों को दूर करने के कोई ख़ास प्रयास नहीं किए। बल्कि इसने भारतीय बुर्जुआ के लिए पूंजी संचय का काम आसान कर दिया और पहले आयात नियंत्रण के ज़रिए अभिजात वर्ग के उपभोग पर जो कुछ नियंत्रण किया गया था उसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया। यह सब एक मजबूत घरेलू विनिर्माण आधार विकसित करने की कठिनाइयों के बिना हासिल किया गया।

भारत की अपनी क्षमता भले ही गिरती गई लेकिन भारतीय अभिजात वर्ग विदेशों में बनी उपभोग की चीज़ों का मज़ा उठाता रहा और एक अल्पविकसित देश में रहते हुए भी दुनिया की बेहतरीन जीवनशैली का लुत्फ़ लेता रहा। इस प्रक्रिया ने भारतीय पूंजी का तेज़ रफ़्तार और अबाधित संचय होने दिया, चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों पर अतिक्रमण के ज़रिए हो, घरेलू बाज़ार के आयात पर ज़ोर देने वाले उत्पादन में विस्तार के माध्यम से या छोटे उत्पादकों, व्यापारियों और लघु उद्योगपतियों को ख़त्म करके।

गिगी स्कारिया, अनटाइटल्ड, 2020

भारतीय नवउदारवाद के चार सिद्धांत

भारत में नवउदारवाद चार सिद्धांतों पर आधारित है, जिनसे सीधे तौर पर भारतीय विनिर्माण कमज़ोर हुआ है: व्यापार बाधाओं को हटाने का सिद्धांत; निजीकरण को बढ़ावा देने और सार्वजनिक क्षेत्र को कमज़ोर करने का सिद्धांत; सार्वजनिक ख़र्च में कटौती का सिद्धांत; और अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का सिद्धांत, जिसके तहत उत्पादक पूंजी (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, या एफडीआई) तथा वित्तीय पूंजी (पोर्टफोलियो निवेश) दोनों के लिए रास्ता बनाया गया। इनसे निकली नीतियों ने मिलकर एक ऐसा पैटर्न रचा है, जहाँ विकास, ऋण और विदेशी वित्तीय प्रवाह पर निर्भर है, न कि औद्योगीकरण और स्वायत्त तकनीकी विकास पर।

व्यापार उदारीकरण

भारत ने अपनी टैरिफ बाधाओं को 1990 के दशक की शुरुआत में हटाना शुरू किया, जिसके कारण साल 1995 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत को सदस्यता मिली। कृषि उत्पादों पर टैरिफ में बड़ी कटौती के चलते, शुरू के सालों में ही गहरा कृषि संकट पैदा हो गया, जिसके ख़िलाफ राजनीतिक विरोध भी बढ़ा।3 इसके कारण 1996 के बाद से कृषि क्षेत्र में टैरिफ कटौती को रोकना पड़ा। लेकिन, विनिर्माण क्षेत्र में उदारीकरण जारी रहा।

साल 2000 के बाद के दौर में, भारत ने आयात-निर्यात पर लगी पाबंदियाँ और तेज़ी से घटानी शुरू कर दीं।4 विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र के अनुरूप चलने के लिए, जिस पर अमेरिका और यूरोपीय संघ लगातार दबाव डाल रहे थे, भारत को वे आख़िरी संरक्षात्मक दीवारें भी गिरानी पड़ीं जो देश के छोटे व मझोले उद्योगों को सस्ते विदेशी माल से बचा रही थीं।

‘मुक्त’ व्यापार को औद्योगिक विकास से ऊपर रखने के फ़ैसले ने घरेलू विनिर्माण को नुकसान पहुँचाया, खास तौर पर उन क्षेत्रों में जो मशीनें (पूंजीगत वस्तुएँ) और उत्पादन की बुनियादी सामग्री (मध्यवर्ती वस्तुएँ) बनाते हैं। औसत आयात शुल्क तो कम किए ही गए थे, लेकिन मशीनों और बुनियादी सामग्रियों पर लगने वाला शुल्क, सीधे इस्तेमाल होने वाली तैयार वस्तुओं (उपभोक्ता वस्तुओं) के मुक़ाबले काफ़ी कम था। इसका मतलब यह हुआ कि टैरिफ व्यवस्था ने भारत में उपभोक्ता वस्तुएँ (तैयार सामान) बनाने वाली कंपनियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से एक सीमित सुरक्षा (‘ढाल’) दी, लेकिन वे भारतीय कंपनियाँ जो वो मशीनें या कच्चा माल बनाती थीं जिनसे ये तैयार सामान बनते हैं, उनके पास कोई ऐसी सुरक्षा नहीं थी। उन्हें सीधे सस्ते आयातों से मुक़ाबला करना पड़ा।

नई टैरिफ व्यवस्था से टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण करने वाली घरेलू और विदेशी फर्मों को लाभ हुआ। ऐतिहासिक रूप से घरेलू बाज़ार के लिए उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करने वाली बड़ी भारतीय कंपनियों ने घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को विकसित करने के बजाय सस्ती मशीनरी और मध्यवर्ती वस्तुओं को आयात करने का रास्ता चुना। विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तो भारत को मुख्य रूप से एक असेंबली बेस के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय विनिर्माण की प्रक्रिया आयातों पर कहीं अधिक निर्भर हो गई।5 उदाहरण के लिए, फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में, सक्रिय औषधीय घटक (एपीआई) के उत्पादन में भारत काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर था। लेकिन उदारीकरण के बाद भारत फार्मास्यूटिकल इंटरमीडिएट्स (दवाएँ बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री) के आयात पर निर्भर हो गया। भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग अब 70% एपीआई चीन से आयात करता है, कुछ दवाएँ, जैसे पेनिसिलिन, पूरी तरह से चीनी आयात पर निर्भर हैं।6

आयात पर भारी निर्भरता ने पूंजीगत और मध्यवर्ती वस्तुओं के घरेलू उत्पादन को कमज़ोर किया।7 घरेलू पूंजीगत वस्तु उद्योग तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देता है, इसके कमज़ोर होने के साथ-साथ भारतीय उद्योग की तकनीकी क्षमताएँ भी सीमित होती गईं। और सीमित तकनीकी क्षमताओं के चलते देश का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में लगातार कमज़ोर होता गया।

सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण

1991 के बाद सार्वजनिक क्षेत्र को आक्रामक निजीकरण और लगातार उपेक्षा से व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया गया, जिसका विनिर्माण पर भी असर हुआ। भारत का पूंजीगत वस्तु उद्योग, सार्वजनिक उद्यमों का बड़ा हिस्सा था, विद्युत मशीनरी, मशीन टूल्स, प्रक्रिया संयंत्र उपकरण, अर्थ-मूविंग उपकरण और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन करता था। व्यापार उदारीकरण और राज्य की अनदेखी के बीच यह क्षेत्र तबाह हो गया। इन भारी उद्योगों को घटक आपूर्ति करने वाले सहायक छोटे और मंझोले उद्यम भी आयात प्रतिस्पर्धा और संस्थागत समर्थन ख़त्म होने के कारण कमज़ोर होते गए।

आज उद्योग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्रीय स्थान रखता है। ऐसे में 1990 के दशक में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की दुर्दशा, सार्वजनिक क्षेत्र की अनदेखी और व्यापार उदारीकरण से हुए संयुक्त नुक़सान का एक प्रमाण है।

1970 के दशक में, भारत ने सार्वजनिक कंपनियों के ज़रिए घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर उद्योग बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम उठाए थे। इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) ने परमाणु और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए स्वदेशी नियंत्रण प्रणालियाँ विकसित कीं। अस्सी के दशक में सरकार ने सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड (एससीएल) और हिंदुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड स्थापित किए ताकि देश सेमीकंडक्टर, एकीकृत सर्किट और कंप्यूटिंग क्षमताएँ विकसित की जाएँ। भारत ने एससीएल की स्थापना 1984 में की थी। ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) इसके तीन साल बाद शुरू हुई थी, लेकिन आज वैश्विक सेमीकंडक्टर बाज़ार में उसकी बादशाहत है।

उदारीकरण के बाद सरकार ने अपने इन प्रयासों को त्याग दिया। टैरिफ सुरक्षा हटाने तथा राज्य का समर्थन वापस लेने के साथ ही देश का उभरता इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र तबाह हो गया। भारत ने 1997 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सूचना प्रौद्योगिकी समझौते (आईटीए) पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत कई इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुओं पर टैरिफ हटाए गए और मज़बूत स्थानीय उद्योग खड़े करने के लिए आवश्यक नीतिगत गुंजाइश भी ख़त्म हो गई। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में विनिर्माण क्षमताओं में निवेश करने के बजाय, बाद की सभी सरकारों ने निर्यातोन्मुख मॉडल को बढ़ावा दिया। यानी विनिर्माण (चीज़ें बनाना) के बजाय सिर्फ पश्चिमी कंपनियों के लिए निम्न व मध्यम स्किल वाली आईटी और बैक-ऑफिस सेवाओं के निर्यात पर ज़ोर दिया गया। इस तरह इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में लॉन्ग-टर्म तकनीकी विकास रुक गया, जिसके परिणाम चौंकाने वाले हैं: आज, भारत अपने 80% आईटी हार्डवेयर, 70% इलेक्ट्रॉनिक्स घटक (जिसमें से 62% चीन से) और 90% दूरसंचार उपकरण आयात करता है।8 यहाँ तक कि घरेलू स्तर पर असेंबल किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स भी आयातित घटकों पर निर्भर हैं, जिनमें स्थानीय मूल्यवर्धन बहुत कम होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के बर्बाद होने के बाद आज भारत काफ़ी हद तक तकनीकी रूप से दूसरों पर निर्भर है।9

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के साथ जो कुछ किया गया, वही दूसरे क्षेत्रों में दोहराया गया है – सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में पूंजीगत वस्तुओं और भारी उद्योगों की या तो उपेक्षा की है या उन्हें बेच दिया है। इन क्षेत्रों में बड़े भारतीय निवेशक पैसा लगाने से बचते हैं, जबकि तकनीकी विकास के लिए यह बहुत ज़रूरी है।

गिगी स्कारिया, पोस्ट लैंड, 2008

सार्वजनिक ख़र्च में कटौती

नवउदारवादी दौर में अपनाई गई सार्वजनिक ख़र्च में कटौती की नीति विकास की कच्ची नींव से लेकर कमज़ोर उत्पादन तक, भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े संकट का एक प्रमुख कारण है। भारत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और उससे जुड़े निवेश प्रवाह के लिए इतना मोहताज हो गया कि सरकारें इस बात से डरने लगीं कि देश में बुनियादी ढाँचे या उद्योगों पर ख़र्च बढ़ाने की स्थिति में विदेशी निवेशक अपना पैसा वापस लेकर चले न जाएं। 2003 में, अंतरराष्ट्रीय वित्त जगत को ख़ुश करने के लिए, भारत ने राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) लागू किया, जिसके बाद राजकोषीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) की सीमा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3% पर तय कर दी गई।10 हालाँकि इस नियम को अक्सर तोड़ा जाता रहा है, पर फिर भी यह सीमा एक आधार बिंदु बन गई, जिसे घरेलू उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र या कृषि के समर्थन में सार्वजनिक ख़र्च रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। इस दौर में एक के बाद एक सरकार लगातार मुनाफ़ा कमा रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों से अपना हिस्सा निजी कंपनियों को बेचती रही है और अपना निवेश योग्य फंड भी बजट के ख़र्चों को पूरा करने में झोंक रही है। जबकि कॉर्पोरेट मुनाफे पर टैक्स लगातार कम किए गए हैं। इससे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के पास विस्तार और तकनीकी के आधुनिकीकरण के लिए फंड लगतार कम होता गया है। एक तरफ़ भारत की बड़ी प्राइवेट कंपनियों ने लगतार मुनाफ़ा कमाने के बावजूद शोध एवं विकास (आरएंडडी) में निवेश करने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई है, दूसरी तरफ़ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को ऐसा करने के साधनों से ही वंचित कर दिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र आयातित तकनीकों पर निर्भर है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)

1991 में उदारीकरण के बाद से, भारत सरकारों ने उद्योग और वित्त, दोनों क्षेत्रों में विदेशी पूंजी के लिए रुकावटों को लगतार ख़त्म किया है। आज, जुआ, परमाणु ऊर्जा और रेलवे जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़कर – जहाँ भारतीय निजी फ़र्में भी प्रतिबंधित हैं –लगभग हर क्षेत्र में, अक्सर 100% विदेशी स्वामित्व, के साथ एफडीआई हो सकता है। भारत ने पूंजी खाते (कैपिटल अकाउंट) पर प्रतिबंधों को भी ढीला किया है, जिससे अल्पकालिक सट्टा वित्त (स्पेक्युलेटिव फाइनेंस) की आवक बढ़ी है। आधिकारिक आँकड़े दिखाते हैं कि साल 2000 के बाद से कुल विदेशी निवेश प्रवाह में औसतन लगभग 30% अस्थिर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) के रूप में आया है। यहाँ तक कि जिसे एफडीआई के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, उसमें भी एक बड़ा हिस्सा सट्टा पूंजी का है। क्योंकि भारत में साल 2000 के बाद से एफडीआई की नई परिभाषा में किसी भारतीय कंपनी में 10% से अधिक की इक्विटी हिस्सेदारी वाले पोर्टफोलियो होल्डिंग्स भी शामिल हैं।11

आधिकारिक तौर पर विदेशी निवेश को औद्योगीकरण, तकनीकी उन्नयन और निर्यात वृद्धि तेज़ करने के साधन के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन ये वादे काफ़ी हद तक अधूरे रहे हैं। व्यवहार में, विदेशी पूंजी ने मुख्य रूप से उदारीकरण के बाद के विकास के आयात-गहन पैटर्न को बढ़ावा दिया है, जिससे घरेलू उद्योग लगतार कमज़ोर हुए।

व्यापार बाधाएँ हटाने की नीति के साथ बहुत कम नियम या दिशा-निर्देश जोड़े गए। उदाहरण के लिए, भारत सरकार ने यह सुनिश्चित नहीं किया कि घरेलू फर्मों में एफडीआई के साथ तकनीकी हस्तांतरण, स्थानीय सोर्सिंग और डाउनस्ट्रीम औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया जाए, घरेलू आरएंडडी में निवेश हो, या रॉयल्टी के प्रत्यावर्तन (विदेश भेजने) पर कोई सीमा हो। ऐसे दिशा-निर्देश लागू करने के अधूरे प्रयास भी विदेशी पूंजी के दबाव में ही छोड़ दिए गए।

कुल मिलाकर, एफडीआई ने भारतीय उद्योग में तकनीकी प्रगति में बहुत कम योगदान दिया है, और विदेशी फर्मों ने देश के भीतर बहुत कम आरएंडडी सुविधाएँ स्थापित की हैं। उनका उत्पादन भारी मात्रा में आयात पर निर्भर रहा है। भारत में काम करने वाली विदेशी स्वामित्व वाली फर्मों का आयात उनके निर्यात से अधिक है, जिससे घरेलू औद्योगिक संबंध कमज़ोर हुए हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में विऔद्योगीकरण (डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन) की प्रक्रिया को बल मिला है।

विदेशी निवेश ने जो लाभ के वादे किए थे, वे तो पूरे नहीं हुए, लेकिन उससे आई विदेशी मुद्रा की बाढ़ ने भारतीय बैंकिंग तंत्र में इतनी नकदी भर दी कि बैंकों पर ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गईं और उन्हें कर्ज़ बाँटने के नए-नए रास्ते तलाशने पड़े। इसका नतीजा यह हुआ कि विकास का एक ऐसा मॉडल बन गया जो कर्ज़ और आयात पर टिका है। अमीर तबक़े द्वारा संचालित खपत से चलने वाले इस मॉडल में पूंजी सिर्फ़ कुछ घरेलू एकाधिकारी समूहों के हाथों में केंद्रित हो गई है। और इस सब का नुक़सान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को उठाना पड़ा है।

साथ ही, विदेशी निवेश ने बाहरी बोझ को लगातार बढ़ाया है। क्योंकि विदेशी फर्मों ने जितना निर्यात किया उससे अधिक आयात किया और रॉयल्टी भुगतान और मुनाफ़ा प्रत्यावर्तन (रिपैट्रिएशन) के ज़रिए बढ़ती रक़म विदेशों में भेजी है। साल 2024 में, हर 100 डॉलर के विदेशी निवेश (एफडीआई और एफपीआई मिलाकर) में से 50 डॉलर विदेशी निवेशक अपना मुनाफ़ा और ब्याज वसूल कर वापस ले गए। जो मुनाफ़ा फिर से भारत में लगाया गया (रिइन्वेस्टमेंट) – जो नई विदेशी मुद्रा नहीं लाता – उसे छोड़ दें तो हालत और भी चौंकाने वाली है: हर 100 डॉलर की शुद्ध आवक पर 66 डॉलर बाहर भेज दिए गए। हाल के वर्षों में, इस तरह के आय आउटफ्लो अक्सर कुल चालू खाता घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) से ज़्यादा रहे हैं। 2024 में जितनी निवेश आय बाहर भेजी गई, वह भारत के व्यापार घाटे से तीन गुना ज्यादा थी। जैसे-जैसे मुनाफ़ा-ब्याज का विदेश जाना बढ़ेगा, भारत का बाहरी खाता (एक्सटर्नल अकाउंट) और नाजुक होता जाएगा, जो आने वाले वर्षों में भुगतान संतुलन के गहरे संकट की ज़मीन तैयार कर रहा है। ऐसे भविष्य की एक झलक 2023 में देखने को मिली, जब भारत की अर्थव्यवस्था से विदेशी निवेश आवक के हर 100 डॉलर के बदले 116 डॉलर निवेश आय के रूप में बाहर भेजे गए।12

विदेशी पूंजी की आवक से पैदा हुई तरलता (बैंकों में पैसा) ने कर्ज़-आधारित, आयात-केंद्रित विकास और बड़े व्यापार घाटे को हवा दी। इन घाटों ने बदले में और अधिक विदेशी आवक को ज़रूरी बना दिया, जिसने विदेशी मुद्रा के रिसाव को गहरा किया। इस तरह भारत के भुगतान संतुलन को संभालने के लिए बाहरी वित्तीय प्रवाह पर निर्भरता का एक चक्रव्यूह बन गया है जो लगातार गहराता जा रहा है।

एक ऐसा विकास मॉडल, जहाँ औद्योगिक विकास ‘संयोग’ है

भारत की नवउदारवादी दिशा और उसके चार मुख्य सिद्धांतों के कारण, औद्योगिक विकास, विकास मॉडल का केंद्रीय लक्ष्य न होकर एक संयोग बनकर रह गया है। सरकारें कभी भी ठोस औद्योगिक नियोजन पर नहीं चलीं, बल्कि उन्होंने विकास का इंजन बैंक कर्ज़ (और सेवा निर्यात) को बनाया – ताकि मांग बढ़े और औद्योगिक ढाँचे के लिए पैसा मिले। इसके विपरीत, 1947 से 1991 तक, भारत में संस्थागत कर्ज़ ज़्यादातर आर्थिक नियोजन के दायरे में कृषि, उद्योग और व्यापार क्षेत्र में दिया जाता था। उपभोक्ता कर्ज़ की भूमिका बहुत कम थी।

1991 के बाद से, उपभोक्ता कर्ज़ लगातार बढ़ा है। बैंकिंग क्षेत्र, ख़ासकर निजी बैंक, लगातार कर्ज़ देने को होम लोन, वाहन लोन, टिकाऊ उपभोक्ता सामान और क्रेडिट कार्ड्स की ओर मोड़ रहे हैं। बैंक कर्ज़ में व्यक्तिगत ऋण की हिस्सेदारी 1990 में 9.4% से बढ़कर 2005 में 25.2% हो गई थी, और 2024 में यह 32.4% तक पहुँच गई है।13

आज घर और कार ख़रीदने के लिए लिया जाने वाला कर्ज़ विकास का एक बड़ा चालक बन गया है। आवास ऋण के विस्तार से जीडीपी में निर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़ी है।

इसी तरह, ऑटोमोबाइल के लिए बढ़ती कर्ज़ देने की प्रवृत्ति ने विनिर्माण क्षेत्र में कार उद्योग को अतिशय महत्त्व दिया और परिवहन व्यवस्था को गाड़ियों का गुलाम बना दिया, जिससे देश के बुनियादी ढाँचे की मुश्किलें और बढ़ीं हैं।

वाहन ऋण और ऑटोमोबाइल उत्पादन में बड़े पूंजीपतियों की मौजूदगी ने सरकार के रुख को निजी परिवहन और सड़क निर्माण के पक्ष में और झुका दिया। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत का सड़क नेटवर्क दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा नेट्वर्क है, जो जल्द ही अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा।14 भारत का भूभाग चीन के मुकाबले एक-तिहाई है, फिर भी भारत का सड़क नेटवर्क चीन से 20 लाख किलोमीटर ज़्यादा लंबा है। पिछले एक दशक में ख़ासकर हाइवे और एक्सप्रेसवे का निर्माण तेज़ी से हुआ है। पर इस विस्तार की एक बड़ी समस्या है, ज़मीन अधिग्रहण की चुनौतियाँ। जनसंख्या घनत्व अधिक होने और कृषि पर गहरी निर्भरता के कारण ज़मीन अधिग्रहण राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सामाजिक रूप से विघटनकारी हो जाता है। किसान, जिनके लिए ज़मीनी संपत्ति ही सब कुछ है, अक्सर विस्थापन का विरोध करते हैं। नतीजतन, ज़मीन अधिग्रहण धीमा, महँगा और अक्सर विवादित रहता है – इससे भारत की सड़क-केंद्रित लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में रुकावटें आती हैं।.

दूसरी ओर, परिवहन व्यवस्था के ऑटोमोबाइल (जिसमें ट्रक भी शामिल हैं) पर निर्भर होने से ईंधन आयात बढ़ गया है। 40% से अधिक पेट्रोलियम उत्पाद सिर्फ परिवहन क्षेत्र द्वारा खपत किए जाते हैं।15 इससे व्यापार घाटा बढ़ा है और औद्योगीकरण में कोई योगदान नहीं मिला है।

ऑटोमोबाइल-सड़क विकास के रास्ते पर चलने से व्यापक विनिर्माण तंत्र कमज़ोर हुआ है। भारत की रसद लागत चीन से दो से तीन गुना अधिक है, जिसकी बड़ी वजह है रेलवे तंत्र में न के बराबर निवेश करने की प्रवृति। रेल परिवहन, जो कि सस्ता है, कम ज़मीन लेता है, ऊर्जा कुशल है और भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त है, को जानबूझकर नज़रंदाज़ कर सड़क परिवहन को तरजीह दी गई है।

रेलवे में कम निवेश का मतलब है रेल परिवहन की गुणवत्ता और गति का गिरना: भारत में पारंपरिक रेलगाड़ियों की औसत गति 43 किमी/घंटा है, जबकि चीन में यह 90 किमी/घंटा है। भारत में हाई-स्पीड रेल 180 किमी/घंटा की रफ्तार पा सकती है, जबकि चीन में हाई-स्पीड ट्रेनें 430 किमी/घंटा तक जाती हैं।

कर्ज़-आधारित, ऑटोमोबाइल-केंद्रित परिवहन प्रणाली से रसद की लागत बढ़ी है और परिवहन समय भी बढ़ा है, जिससे कुल मिलाकर उत्पादन लागत बढ़ी है। इस तरह व्यापार उदारीकरण के बीच भारतीय विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा लगातार कमज़ोर हुई है।

गिगी स्कारिया, हेज़िटेंट अटेम्प्ट, 2018

कर्ज़ से चलने वाले निवेश और बैड लोन (NPA)

भारत में नवउदारवादी विकास सिर्फ़ खपत से नहीं चला। 2004 से 2010 के बीच, जब देश में जीडीपी में बड़ी वृद्धि हुई, तब यह विस्तार सिर्फ खपत से ही नहीं, बल्कि बैंक कर्ज़ से चलने वाले निवेश से भी बना रहा, जो कि विदेशी पूंजी के आवक से पैदा हुई अतिरिक्त नकदी (लिक्विडिटी) के चलते संभव हुआ। बैंकिंग प्रणाली में पैसे की बाढ़ आई, तो निजी बैंकों ने रिटेल कर्ज़ (व्यक्तिगत ऋण) बढ़ाए, और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बड़े-बड़े कॉर्पोरेट्स को अचल संपत्ति, बिजली तथा स्टील जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए भारी कर्ज़ दिए।

इससे निवेश-आधारित विकास को बल तो मिला, पर इस व्यवस्था ने एक गंभीर संकट भी पैदा किया। बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में निवेश का रिटर्न तुरंत नहीं मिलता, यानी बैंक ने लंबी अवधि की परियोजनाओं को कर्ज़ दिया, जबकि उन्हें अपने जमाकर्ताओं को कम समय में पैसा लौटाना होता है। इसके साथ ही कॉर्पोरेट को खुली छूट और ख़राब निगरानी ने इस मिसमैच के संकट को विनाशकारी बना दिया। वाणिज्यिक बैंक – जो ऐसी परियोजनाओं के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए तैयार नहीं थे (क्योंकि यह काम विकास बैंकों का होना चाहिए था) – सरकार के इशारे पर निजी स्वामित्व वाली बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को कर्ज़ देने लगे। नतीजा: गैर-निष्पादित आस्तियों (नॉन-परफोर्मिंग ऐसेट्स-एनपीए) का भारी ढेर लग गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एनपीए की कुल राशि का मूल्य 82.3 अरब डॉलर तक पहुँच गया। दूसरी ओर, इन कर्ज़ों से बनी भौतिक संपत्तियाँ (जैसे पावर प्लांट, स्टील प्लांट) एनपीए संकट के समाधान के नाम पर भारत के बड़े पूंजीपतियों के हाथों में न्यूनतम क़ीमत पर बेच दी गईं।16

इस अवधि में नवउदारवादी विकास नीति ने यह सुनिश्चित किया कि बाज़ार की अराजकता ही भारतीय विनिर्माण की दिशा और संरचना निर्धारित करे। घरेलू पूंजी हितों, बैंकिंग प्रणाली की कर्ज़ प्राथमिकताओं और अमीर तबके के खपत पैटर्नों के आपसी संबंध, तथा वैश्विक मुक्त व्यापार व अबाधित वित्तीय प्रवाह के माहौल ने भारतीय उद्योग की दिशा तय की है। आप इसे विकास कहेंगे या पतन, आप पर है।

व्यापार घाटा और विऔद्योगीकरण: एक ही सिक्के के दो पहलू

भारत, आयातित सामान, ईंधन और विदेशी धन पर बहुत अधिक निर्भर है। इसी कारण लगभग हर साल देश का चालू खाता घाटे में रहता है। केवल कोविड-19 के समय, जब दुनिया भर में व्यापार अचानक कम हो गया था, यह स्थिति कुछ समय के लिए बदली थी। आम तौर पर चालू खाता घाटा तभी कम होता है जब अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है।
1991 में भारत का वस्तु व्यापार घाटा सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) का 2% था, जो बढ़कर 7% हो गया और 2011 में 10% तक पहुँच गया।17 इस घाटे का लगभग आधा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों के कारण है। सेवाओं के निर्यात से होने वाली कमाई और विदेशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजे गए पैसे (रेमिटेंस) की वजह से ही चालू खाता घाटा इतना

विऔद्योगीकरण

लंबे समय तक भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर होने वाली चर्चाओं में ‘विऔद्योगीकरण’ शब्द का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के दौरान गैर-कृषि शिल्पों और पारंपरिक उद्योगों के पतन को बताने के लिए किया जाता रहा है। इस प्रक्रिया ने लाखों लोगों को उनके पारंपरिक काम-धंधों से अलग कर दिया और उन्हें ग़रीबी व भूख की ओर धकेल दिया।

स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद यह शब्द एक बार फिर प्रचलन में है—इस बार उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा को बताने के लिए। इसके प्रभाव पिछले एक दशक में साफ़ दिखाई देने लगे हैं। ऋण के सहारे तेज़ आर्थिक वृद्धि के दौर में जो औद्योगिक ह्रास छिपा हुआ था, वह हाल के वर्षों में पूरी तरह सामने आ गया है, ख़ासकर मोदी सरकार के कार्यकाल में।

जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 2008 में 18.9% से घटकर 2023 में 14.3% रह गई, जो भारत के औद्योगीकरण के शुरुआती दौर में, साठ से भी अधिक वर्ष पहले, देखे गए स्तर के बराबर है। नए आधार वर्ष के साथ जारी नई जीडीपी श्रृंखला में विनिर्माण उत्पादन के अधिक आकलन की संभावना को देखते हुए, वास्तविक हिस्सेदारी, आधिकारिक आँकड़ों से भी कम हो सकती है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) इस तस्वीर को और स्पष्ट करता है। आईआईपी के अनुसार, 2011–2012 से 2024–2025 के बीच विनिर्माण उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि दर केवल 3.3% रही, जबकि 2003–2004 से 2010–2011 के दौरान यह 10.1% थी। लंबे समय के परिप्रेक्ष्य में देखें तो विनिर्माण क्षेत्र में यह मंदी और भी स्पष्ट दिखाई देती है। 1981–1982 से 1989–1990 के बीच आईआईपी के विनिर्माण घटक की औसत वार्षिक वृद्धि दर 7.5% थी, 1991–1992 से 1996–1997 के बीच 8.0%, और 1997–1998 से 2002–2003 के बीच 5.4% रही।18 वास्तव में, 2011 के बाद से विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले तीन दशकों की किसी भी समान अवधि की तुलना में कम रही है। ऐसे में भारत में आगे और अधिक विऔद्योगीकरण का ख़तरा दिखाई देता है।

सेवा क्षेत्र: उद्योग का कमज़ोर विकल्प

पिछले पंद्रह वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र के तुलनात्मक पतन ने भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे संरचनात्मक असंतुलनों को और मज़बूत किया है। आज भारत की जीडीपी का अधिकांश हिस्सा सेवा क्षेत्र से आता है।

1947 के बाद, नवस्वतंत्र भारतीय गणराज्य ने एक ऐसे विकास मॉडल को अपनाया जिसका केंद्र एक मज़बूत औद्योगिक आधार का निर्माण था। 1951 में, पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत के समय, जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 12% थी, जबकि सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 36% थी। 1990 तक ये हिस्सेदारियाँ बढ़कर उद्योग के लिए 19% और सेवाओं के लिए 41% हो गईं। 1991 में औद्योगीकरण आधारित विकास मॉडल छोड़ दिया गया, जब भारत सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण—या अधिक सही शब्दों में नवउदारीकरण—करने और उसे अधिक सेवा-उन्मुख बनाने का निर्णय लिया। 1991 के बाद से विनिर्माण की हिस्सेदारी घटकर 14% रह गई, जबकि सेवाओं की हिस्सेदारी 2008 में बढ़कर 48% और 2024 में 55% हो गई। हालाँकि मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासन के दौरान भारतीय विनिर्माण की समस्याएँ और गहरी हुईं, लेकिन उसके कमज़ोर होने की शुरुआत 1991 में अपनाए गए नवउदारवादी रास्ते पर चलने वाली एक के बाद एक सरकारों के दौर में ही हो गई थी।

विनिर्माण के विपरीत—जो तकनीकी आधार को मज़बूत करता है और वास्तविक मज़दूरी में वृद्धि को सहारा देता है—सेवा क्षेत्र का विस्तार ज़रूरी नहीं कि ऐसा ही प्रभाव पैदा करे। एक मज़बूत विनिर्माण क्षेत्र परिवहन, दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सेवाओं की क्षमताओं को बढ़ा सकता है। लेकिन जब कमज़ोर औद्योगिक आधार के साथ सेवाएँ हावी हो जाती हैं, तो वे आयातित मशीनरी और विदेशी तकनीकों पर बहुत अधिक निर्भर हो जाती हैं, जैसा कि भारत के मामले में है।

भारत में सेवा क्षेत्र एक व्यापक श्रेणी है, जिसे आसानी से एक जैसा नहीं बताया जा सकता। फिर भी इसमें एक स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। एक ओर ऐसी कई तरह की सेवाएँ हैं—स्वरूप में भिन्न, लेकिन अनौपचारिकता में समान—जो कम मज़दूरी, असुरक्षित और बड़े पैमाने पर अनियंत्रित रोज़गार प्रदान करती हैं तथा जिनकी उत्पादकता कम होती है। इन गतिविधियों में काम करने वाले श्रमिक अक्सर काम की उपलब्धता के अनुसार गाँव और शहर के बीच, तथा कृषि और सेवा क्षेत्रों के बीच आते-जाते रहते हैं। ये क्षेत्र वास्तव में कृषि से निकलने वाले अतिरिक्त श्रम के लिए शरणस्थल का काम करते हैं—ऐसा श्रम जो कृषि में रोज़गार के ठहराव के कारण बाहर धकेला गया है और जिसे विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर विऔद्योगीकरण की स्थिति में, बढ़ती श्रम शक्ति को समाहित करने में असमर्थ रहने के कारण सेवा क्षेत्र की ओर खींच लिया जाता है। वास्तव में, 2017–2018 के बाद से कुल रोज़गार में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी घटती गई है।

खुदरा व्यापार और परिवहन, ऐसे ही दो क्षेत्र हैं। लेकिन इन क्षेत्रों के भीतर भी रोज़गार का दायरा बहुत व्यापक है। उदाहरण के लिए, खुदरा व्यापार में छोटे दुकानदार, ठेला-पटरी वाले, फेरीवाले, किराना (पड़ोस की) दुकानों के कर्मचारी और थोक मंडियों में काम करने वाले सहायक शामिल होते हैं। वहीं परिवहन क्षेत्र में ऑटो और टैक्सी चालक, ट्रक चालक, बस कंडक्टर तथा माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कामगार शामिल होते हैं। कुल रोज़गार में खुदरा व्यापार की हिस्सेदारी 12.2% और परिवहन की लगभग 5.6% है, और ये दोनों जीडीपी में लगभग समान योगदान देते हैं।19

इन गतिविधियों को अक्सर ‘सेवा क्षेत्र’ के बजाय ‘असंगठित क्षेत्र’ का हिस्सा कहा जाता है। ‘सेवा क्षेत्र’ शब्द आमतौर पर आईटी, वित्त और अन्य आधुनिक सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो इस विभाजन का दूसरा पक्ष हैं। सेवा अर्थव्यवस्था के ये दोनों हिस्से पिछले साढ़े तीन दशकों में लगातार ऊँची वृद्धि दर दर्ज करते रहे हैं। आईटी और वित्त क्षेत्र, अत्यधिक पूंजी-प्रधान होने और सीमित रोज़गार देने के बावजूद, जीडीपी में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। 1990 के शुरुआती वर्षों में आईटी क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान नगण्य था (जीडीपी का लगभग 0.1%), और रोज़गार में इसकी हिस्सेदारी तो इससे भी कम थी। 2024 तक यह मुख्यतः निर्यातोन्मुख उद्योग तेज़ी से फैलकर जीडीपी का 7.5% हो गया, जबकि इसमें कुल श्रम शक्ति का केवल 1% ही कार्यरत है।20 वित्तीय सेवाओं का विकास भी इसी तरह हुआ—जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 1990 में 3% से बढ़कर 2004 में 6% हो गई, जबकि रोज़गार में इसकी हिस्सेदारी 1% से कम ही रही।21

आईटी और वित्तीय सेवा क्षेत्र मिलकर जीडीपी का 13.5% योगदान करते हैं, जो विनिर्माण क्षेत्र के योगदान के बराबर है, लेकिन रोज़गार में इनका योगदान 2% से भी कम है, जबकि विनिर्माण क्षेत्र 11.4% रोज़गार प्रदान करता है।22 ग़ैर-कृषि अर्थव्यवस्था में, विनिर्माण का हिस्सा जीडीपी का 17% और रोज़गार का 20% है, जबकि आईटी और वित्तीय सेवा क्षेत्र (जो दोनों ही अत्यधिक पूंजी-गहन हैं) ग़ैर-कृषि जीडीपी का 16.5% योगदान करते हैं, लेकिन रोज़गार में इनकी हिस्सेदारी केवल 3.5% है। इन दोनों क्षेत्रों द्वारा उत्पन्न उच्च-वेतन वाली नौकरियों की संख्या सीमित है और घरेलू अर्थव्यवस्था में इनके गुणक प्रभाव कमज़ोर हैं, क्योंकि श्रम बल के इस वर्ग की उपभोग प्रवृत्तियाँ आयात-प्रधान हैं।

यह अंतर दिखाता है कि भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले क्षेत्र—आईटी और वित्त—बहुत कम लोगों को रोज़गार देते हैं। इससे यह भी साफ़ होता है कि जब विनिर्माण को नज़रअंदाज़ करके केवल हाई-टेक सेवा क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है, तो उसके नकारात्मक परिणाम होते हैं। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्त्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र में व्यापार को पूरी तरह खोल दिया है, ताकि आईटी जैसी सेवाएँ, जो ज़्यादातर अमेरिका और पश्चिमी देशों को निर्यात होती हैं, बढ़ सकें। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में उद्योग कमज़ोर हुए और आज भी लगभग आधा कार्यबल कृषि पर निर्भर है।

कृषि जीडीपी का केवल 18% योगदान करती है, लेकिन इसमें 46% लोग काम करते हैं। दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र जीडीपी के आधे से ज़्यादा हिस्से का योगदान करता है, फिर भी 2023–24 में उसने केवल 30% लोगों को ही रोज़गार दिया। विनिर्माण क्षेत्र, जिसे पहले कृषि से लोगों को बाहर लाने का ज़रिया माना गया था, अब जीडीपी का लगभग 14% ही योगदान करता है और सिर्फ़ 11% लोगों को रोज़गार देता है।23

गिगी स्कारिया, सेटलमेंट, 2010

भारत के नवउदारवादी विकास मॉडल के तहत, पश्चिमी बाज़ारों को कुशल श्रम और सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विनिर्माण क्षेत्र की बलि दी गई है। यह उम्मीद की गई कि इन निर्यातों से होने वाली कमाई बढ़ते आयात की भरपाई कर देगी और एक मज़बूत विनिर्माण क्षेत्र की कमी की क्षतिपूर्ति हो जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह हुआ कि भारत की दीर्घकालिक औद्योगिक और तकनीकी क्षमताओं को विदेशी मुद्रा के अस्थिर और बाहरी रूप से निर्भर स्रोतों के लिए त्याग दिया गया। अंततः इससे देश की आर्थिक और तकनीकी संप्रभुता कमज़ोर हुई, जबकि इसके लिए एक मजबूत विनिर्माण क्षेत्र अत्यंत आवश्यक है।

विऔद्योगीकरण के मानवीय प्रभाव

भारत की आबादी युवा है—जिसे अक्सर ‘जनसांख्यिकीय लाभ’ कहा जाता है—और यही एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के निर्माण तथा तकनीकी प्रगति के लाभों को व्यापक रूप से साझा करने का आधार बन सकता था। युवाओं का जीवन स्तर बेहतर होना चाहिए था और उन्हें सुरक्षित रोज़गार मिलना चाहिए था, ताकि वे काम, आराम और अवकाश के बीच संतुलित जीवन जी सकें। लेकिन भारत को एक बड़ी अर्थव्यवस्था बताने के तमाम दावों के बावजूद, यह अब भी एक अविकसित अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जहाँ श्रमिकों की आय का बड़ा हिस्सा भोजन जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर खर्च हो जाता है और जहाँ युवा असुरक्षित नौकरियों में काम कर रहे हैं, जिनका भविष्य अनिश्चित है।

भारत अपने कार्यबल के युवाओं को ठहरे हुए वेतन वाली अस्थायी और समझौता-आधारित नौकरियों में खपा रहा है। कार्यशील आयु की आबादी पर निर्भर लोगों—यानी बच्चों और बुज़ुर्गों—का अनुपात तेज़ी से घटा है: यह 1966 में 83% से घटकर 2024 में 47% हो गया।24 इससे अत्यधिक ग़रीबी में कुछ कमी तो आई, लेकिन इसका प्रभाव सीमित रहा। अब, जब 2041 के बाद इस अनुपात के फिर से बढ़ने की उम्मीद है, तो भारत के संरचनात्मक रूपांतरण की गुंजाइश और सिमटती दिख रही है।25 औद्योगिक विकास—जिसे अतिरिक्त श्रम को समाहित करना था और उत्पादकता व तकनीकी प्रगति को आगे बढ़ाना था—मौजूदा आर्थिक विकास मॉडल के भीतर एक ठहराव के बिंदु पर पहुँचता हुआ लग रहा है।

आगे का रास्ता

यदि भारत को वर्तमान अविकास के जाल से निर्णायक रूप से बाहर निकलना है, तो आर्थिक नीति के केंद्र में औद्योगिकीकरण को लाना अत्यंत आवश्यक है। इस पर बहुत कम मतभेद हैं। औद्योगिकीकरण का महत्त्व और सेवा-आधारित आर्थिक विस्तार की सीमाएँ अब भारत में नवउदारवाद के समर्थकों के भी सामने स्पष्ट होने लगी हैं। यह बात प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बार-बार उल्लेख में दिखाई देती है, भले ही उनकी सरकार अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में नवउदारवादी सिद्धांतों का कहीं अधिक उत्साह से पालन करती रही हो—जैसे सार्वजनिक क्षेत्र का परिसमापन, विदेशी पूंजी के लिए शेष बाधाओं को हटाना, ऑटोमोबाइल-आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना, और निवेश को प्रोत्साहित करने के नाम पर कॉर्पोरेट क्षेत्र को उदारतापूर्वक टैक्सों में छूट और सब्सिडी देना।

हालाँकि मोदी सरकार ने कुछ चुनिंदा विनिर्मित वस्तुओं पर सीमा शुल्क में सीमित वृद्धि की है, लेकिन व्यापार उदारीकरण का व्यापक ढाँचा अब भी कायम है। अपेक्षा के अनुरूप, इन उपायों से विनिर्माण के विस्तार के संदर्भ में कोई विशेष परिणाम नहीं निकले हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था का विऔद्योगीकरण मानो अपने तय रास्ते पर ही आगे बढ़ता दिख रहा है।

निस्संदेह भारत के औद्योगिक कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने के लिए वर्तमान आर्थिक नीति के बुनियादी तत्त्वों यानी नवउदारवादी सिद्धांतों से निर्णायक रूप से अलग होना आवश्यक है। लेकिन उदारीकरण के लंबे दौर ने ऐसी संरचनात्मक स्थितियाँ पैदा कर दी हैं, जिनके कारण नवउदारवाद से किसी भी तरह का विचलन एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बन गया है।

इस दौर ने पहले से मौजूद उन बाधाओं को और मज़बूत कर दिया—जिनकी चर्चा पहले की जा चुकी है—जो उदारीकरण से पहले भी औद्योगिकीकरण को सीमित करती थीं, और साथ ही जिसने विऔद्योगीकरण की प्रक्रिया को और गहरा किया। घरेलू बाज़ार को सीमित करने वाली असमानताएँ कई गुना बढ़ गई हैं, जबकि भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग का क़द असाधारण रूप से बढ़ा है—राज्य पर उसका प्रभाव, नीति को आकार देने की उसकी क्षमता और शक्ति सभी में भारी वृद्धि हुई है। यह वर्ग भारतीय स्वतंत्रता के बाद से आज अपने सबसे शक्तिशाली दौर में है। इस अवधि में इसने भारी संपत्ति अर्जित की, जबकि आबादी के बहुसंख्यक हिस्से को केवल सीमित लाभ ही मिल पाए।

ऑटोमोबाइल, पेट्रोकेमिकल्स, ऊर्जा, इस्पात और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में बड़े भारतीय कॉर्पोरेट समूहों के विशाल औद्योगिक परिसरों का निर्माण और संचालन बड़े पैमाने पर आयातित मशीनरी और तकनीक के सहारे किया गया, जिसका लाभ व्यापार उदारीकरण से मिला। इनके विस्तार के लिए सस्ती पूंजी उपलब्ध हुई, जो शेयर बाज़ार में ऊँचे मूल्यांकन के ज़रिये संभव हुई और भारतीय इक्विटी बाज़ारों में पोर्टफोलियो निवेश के बड़े प्रवाह से इसे लगातार सहारा मिला। भारत के बड़े पूंजीपतियों ने विदेशी पूंजी के साथ कामकाजी क़िस्म के संबंध बनाए, अपने तात्कालिक हितों की रक्षा के लिए किसी भी टकराहट को टालने की हरसंभव कोशिश की। ज़रूरत पड़ा तो कभी अड़े, कभी झुक गए। इस दौरान, जहाँ विदेशी कंपनियों ने कई प्रमुख क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र को पीछे धकेला और छोटे घरेलू उत्पादकों को हाशिये पर पहुँचा दिया, वहीं भारत के बड़े कॉर्पोरेट समूहों ने अपनी स्थिति बनाए रखी और उसे और मज़बूत किया। उन्होंने अपने विशाल आकार, वित्तीय शक्ति और राज्य की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता का उपयोग कर अपने वर्चस्व को और अधिक सुदृढ़ किया।

परिणामस्वरूप, वे दिन बीत गए जब इसने ज़मींदार वर्ग के साथ एक समान भागीदार के रूप में सौदेबाजी की। यद्यपि पूर्व जमींदार वर्ग आज ग्रामीण और शहरी, कृषि और ग़ैर-कृषि क्षेत्रों में बरक़रार है, फिर भी वह भारतीय अभिजात वर्ग का हिस्सा बना हुआ है और उसका भी वर्गीय हित वही है, जो बड़े पूंजीपतियों का है। राज्य की नीतियों की बागडोर अब शक्तिशाली पारिवारिक व्यापारिक घरानों से बने भारतीय बड़े पूंजीपति वर्ग के हाथों में कहीं अधिक मज़बूती से है, हालांकि मोदी सरकार के कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ किसान और ज़मींदार वर्गों के सफल विरोध जैसी छिटपुट घटनाएं भी हुई हैं।

आज, बड़े पूंजीपतियों का वर्ग ज़मींदार वर्ग के साथ कम और विदेशी पूंजी के साथ अधिक जुड़ा हुआ है। भारतीय पूंजीपति वर्ग और विदेशी – मुख्य रूप से पश्चिमी – पूंजी के गठजोड़ ने भारत की आर्थिक स्वतंत्रता के क्षरण को तेज़ कर दिया है और निवेश तथा राजनीतिक गठबंधन दोनों के लिए पश्चिम पर इसकी निर्भरता को गहरा कर दिया है।

अनुसंधान एवं विकास पर स्थानीय निवेश के माध्यम से प्रौद्योगिकी विकसित करने में रुचि न रखने वाले ये व्यापारिक घराने विनिर्माण के नए क्षेत्रों में अपना विस्तार करने के लिए पश्चिमी देशों – विशेष रूप से अमेरिका – की पूंजी के साथ साझेदारी की तलाश कर रहे हैं। वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन से दूर करने के अमेरिकी सरकार के दृढ़ संकल्प से उत्पन्न अवसरों का लाभ उठाने की उम्मीद कर रहे हैं।

भारत के व्यापारिक घराने रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और भुगतान प्रणालियों जैसे क्षेत्रों में पश्चिमी कंपनियों के साथ सहयोग करने का प्रयास कर रहे हैं।

इन योजनाओं के बावजूद, इस वर्ग के हित भारत के औद्योगीकरण के प्रतिकूल हैं। ट्रंप के शासनकाल में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं के दौरान हुए घटनाक्रम ने औद्योगिक विकास के लिए पश्चिम के साथ सहयोग पर निर्भरता की सीमाओं को उजागर कर दिया। भले ही अमेरिका के साथ कोई अनुकूल व्यापार समझौता हो जाए, परिणाम में शायद ही कोई बदलाव आएगा: यदि नवउदारवाद का पहला चरण विफल रहा है, तो इसका दूसरा चरण – ‘नवउदारवाद 2.0’ – भी उतना ही असफल होने की संभावना है। उदारीकरण से पहले के दौर में औद्योगीकरण को बाधित करने वाले कारणों – गहरी असमानता और जन क्रय शक्ति की कमी – की वजह से यह रणनीति सफल होने की संभावना नहीं है। उदारीकरण के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो गई है, और अब तो यह कई गुना अधिक व्यापक रूप से सामने आ रही है। आज असमानता इतनी चरम सीमा पर पहुँच गई है कि राष्ट्रीय औसत आय अर्जित करने के लिए किसी व्यक्ति का भारत के शीर्ष 11% आय वर्ग में होना आवश्यक है। दूसरे शब्दों में, 89% वयस्क इस राष्ट्रीय औसत से कम कमाते हैं। धन की असमानता और भी अधिक स्पष्ट है: शीर्ष 1% लोगों के पास कुल धन का 40.1% हिस्सा है – जो विश्व स्तर पर सबसे अधिक है। इस समूह के भीतर की असमानता और भी अधिक है, क्योंकि 2022 में केवल 162 व्यक्तियों के पास देश की 24.6% संपत्ति थी।26

वो दिन बीत गए जब कृषि सुधार मात्र से ही व्यापक जनसमुदाय के हाथों में क्रय शक्ति देकर एक विशाल बाजार का निर्माण किया जा सकता था। हालांकि भूमि स्वामित्व में गंभीर असमानता आज भी एक वास्तविकता है, लेकिन जनसंख्या की भारी वृद्धि और भूमि के व्यापक विखंडन का अर्थ यह है कि कृषि सुधार में अभी भी गुंजाइश है, लेकिन यह अब भारत के श्रमशक्ति के हाथों में पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं करा सकता।

स्वतंत्रता के बाद का वह दौर बीत चुका है, जब भारतीय पूंजीपति वर्ग, श्रमिक वर्ग तथा किसान वर्ग राज्य-नेतृत्व वाले औद्योगिक एवं तकनीकी विकास में समान हित साझा करते थे। अब कोई साझा आधार नहीं बचा है। भारतीय पूंजीपति वर्ग, जो कभी अंतरराष्ट्रीय पूंजी से सावधान रहता था, अब उसके साथ साझेदारी की ओर बढ़ रहा है।

इसलिए, नवउदारवादी विचारधारा से हटकर भारतीय बाज़ार का विस्तार करने और असमानता को कम करने की दिशा में कोई भी बदलाव तभी संभव है जब मेहनतकश वर्ग देश के बड़े पूंजीपति वर्ग और उसके सहयोगियों के साथ, चाहे यह गठबंधन किसी भी रूप में हो, आमने-सामने हो। हालांकि, वर्तमान में अति-धार्मिकता के भ्रम और फासीवादी धार्मिक राजनीति की गिरफ्त में (जिसे वही बड़ा पूंजीपति वर्ग वित्तपोषित कर रहा है) भारतीय जनता को इस शक्तिशाली वर्ग का सामना करने से पहले लंबा रास्ता तय करना है।

फिर भी, वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में वर्तमान उथल-पुथल और इससे भारतीय पूंजी के लिए उत्पन्न अनिश्चितताएं, भारत में वामपंथियों के लिए अपनी राजनीतिक उपस्थिति को पुनर्जीवित करने और आर्थिक नीतिगत चर्चा को स्वायत्त राष्ट्रीय विकास की ओर मोड़ने के अवसर पैदा करती हैं।


गिगी स्कारिया, ह्यूमन पुल, 2018.

Notes

1 Misra, ‘ExplainSpeaking: The truth about poverty in India’.

2 a. अलग से उल्लिखित आँकड़ों को छोड़कर इस दस्तावेज़ में दिए गए सभी GDP आँकड़े—जिसमें क्षेत्रवार हिस्सेदारी भी शामिल है—लेखकों द्वारा भारत की राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (NAS) 2011–2012 श्रृंखला (वर्तमान कीमतों पर) और उससे संबंधित पिछली श्रृंखलाओं के आधार पर तैयार किए गए हैं। ये आँकड़े भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) से लिए गए हैं, जिन्हें 2 दिसंबर 2025 को https://esankhyiki.mospi.gov.in/catalogue-main/catalogue?page=0&product=NAS से प्राप्त किया गया।

3 1990 और 1996 के बीच, कृषि उत्पादों पर औसत टैरिफ 82% से घटकर 39% हो गया, जबकि विनिर्माण वस्तुओं पर टैरिफ 51% से घटकर 40% हो गया। S. Ramachandran Pillai, ‘Agrarian Crisis and the Way Out’, The Marxist 23, no. 3 (July–September 2007); Venkatesh Athreya, ‘The Current Agrarian Crisis in India: An Overview’, The Marxist 29, no. 3 (July–September 2013); and P. Sainath, Everybody Loves a Good Drought (New Delhi: Penguin, 1996).

4 सरकार ने विनिर्माण वस्तुओं पर टैरिफ 2000 में 33.2% से घटाकर 2008 में 9% कर दिया। Kumar, Ramaa Arun,, and Biswajit Dhar, Trade Liberalisation and Export Competitiveness of Indian Manufacturing Industries, Working Paper 230, Institute for Studies in Industrial Development (ISID), October 2020.

5 उदाहरण के लिए, भारत के विनिर्माण निर्यात में आयात की तीव्रता 1993-1994 में 12.89% से बढ़कर 2003-2004 में 24.04% और 2013-2014 में 51% हो गई। Paul, Mahua, and Ramaa Arun Kumar, Import Intensity of India’s Manufactured Exports: An Industry-Level Analysis, Working Paper 220, Institute for Studies in Industrial Development (ISID), February 2020.

6 ANI, ‘India to Boost Drug Ingredient Output’.

7 यह क्षरण औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में पूंजीगत वस्तुओं और मध्यवर्ती वस्तुओं के योगदान में आई गिरावट के रूप में दिखता है, जो 1993-1994 में 35.5% से घटकर 2011-2012 में 29.63% हो गया। Reserve Bank of India, Handbook of Statistics on the Indian Economy 2024–25 (Mumbai: Reserve Bank of India, 29 August 2025), Table 29: ‘Index Numbers of Industrial Production – Use-Based Classification’, https://www.rbi.org.in/Scripts/PublicationsView.aspx?id=23203.

8 IANS, ‘Centre Aims to Meet 70% of India’s IT Hardware Demand’; Mallick and Aryan, ‘India’s Electronic Industry Poised for Transformation’; Barik, ‘China Dominates Supply of Electronic Components’; Surajeet, ‘Over 90% of Telecom Gear in India’s Rs 50,000-Cr Market Is Imported’.

9 आज, भारतीय आईटी उद्योग की कुल आय का 79% हिस्सा निर्यात से आता है, जबकि यह क्षेत्र हार्डवेयर के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। Government of India, Ministry of Commerce and Industry, Department of Commerce, ‘Commerce and Industry Minister Holds Discussions with CEOs of Indian IT Companies; Urges Them to Explore New Markets, Government to Support Global Growth of India’s IT Industry: Piyush Goyal’, press release, New Delhi, 1 August 2019, https://www.commerce.gov.in/press-releases/commerce-industry-minister-holds-discussions-with-ceos-of-indian-it-companies-urges-them-to-explore-new-markets-government-to-support-global-growth-of-indias-it-industry-piyush-goyal/.

10 P. Chakraborty and L. Chakraborty, ‘New FRBM Framework’.

11 भारत द्वारा 10% मताधार अधिकार सीमा को अपनाने और इसके परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश के बीच आए धुंधलेपन पर, देखें Rao and Dhar, India’s FDI Inflows: Trends and Concepts; for the current official definition of FDI, see Government of India, ‘FAQs related to FDI Policy Section’.

12 Reserve Bank of India, Database on Indian Economy; authors’ calculations based on balance of payments data.

13 Mujumdar, ‘Transformation of the Banking System’; ANI, ‘Personal Loans and Services Sector Key Drivers of Credit Growth’.

14 IANS, ‘India’s National Highways Record 60% Growth in Last 10 Years’.

15 Government of India, ‘Diesel and Petrol Consumed by Transport Sector’.

16 Economic Times Bureau, ‘NPAs of 26 Banks Rise’.

17 Reserve Bank of India, Database on Indian Economy.

18 Reserve Bank of India, Handbook of Statistics on Indian Economy, 2024–25; Mazumdar, ‘Industrial Development in India under Liberalisation’.

19 Government of India, Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024, 15–16.

20 India Brand Equity Foundation, Electronic and Computer Software Industry.

21 बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में 20 लाख कर्मचारियों के ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’ के आकलन को वित्तीय क्षेत्र के लिए प्रॉक्सी (अनुमानित आधार) के रूप में इस्तेमाल कर, एक उदार ऊपरी समायोजन के बाद भी, वित्तीय क्षेत्र में कुल रोजगार का आँकड़ा भारत के कार्यबल के 1% से काफी नीचे ही रहता है।  Krishna Kant, ‘BFSI on Hiring Sprint, IT Sector Stumbles in Headcount Marathon in FY24’, Business Standard, 4 September 2024, https://www.business-standard.com/industry/news/bfsi-on-hiring-sprint-it-sector-stumbles-in-headcount-marathon-in-fy24-124090401152_1.html.

22 रोज़गार हिस्सेदारी के आंकड़े लेखिका की स्वयं की गणना पर आधारित हैं, जो भारत सरकार के Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024 तथा ‘Number of employees in IT’ से प्राप्त क्षेत्रीय आंकड़ों पर निर्भर हैं।

23 Government of India, Annual Report, Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024, 15–16; Government of India, Provisional Estimates of Annual National Income, 2024–25 and Quarterly GDP, Q4 2024–25; Government of India, Provisional Estimates of Annual GDP for 2024-25 and Quarterly Estimates of GDP, Q4 2024–25.

24 World Bank, ‘Age dependency ratio – India’.

25 Kapil, ‘India’s Growing and Aging Populations’.

26 Bharti, Chancel, Piketty, and Somanchi, Income and Wealth Inequality in India, 1922–2023, 1, 3, 44, 77.

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बांडुंग भावना https://thetricontinental.org/hi/bandung-bhawna/ Tue, 08 Apr 2025 08:00:37 +0000 https://thetricontinental.org/?p=123811

इस डोसियर में प्रयुक्त चित्र बांडुंग सम्मेलन को समर्पित हैं, जहाँ विविध लोग, राष्ट्र और राजनीतिक परियोजनाएँ—जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट रास्ता या धुरी थी—एक साझा संघर्ष के इर्द-गिर्द जुटे, उपनिवेशवाद से परे एक दुनिया के निर्माण के लिए। उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं और राष्ट्रों को बांडुंग भावना एक साथ लाई जिसे इस डोसियर में पीली धारियों द्वारा दर्शाया गया है। राष्ट्रीय मुक्ति के उस दौर की आकांक्षाओं से आज वैश्विक दक्षिण में नए सूत्र, नई दिशाएँ और एक नया मिज़ाज उभर रहा है।


सात दशक पहले 1955 में अफ्रीका और एशिया के उनत्तीस देशों की सरकारों के प्रमुख और साथ ही उन उपनिवेशों, जो तब तक आज़ाद नहीं हुए थे, के प्रतिनिधि इंडोनेशिया के बांडुंग में एशिया-अफ्रीका सम्मेलन के लिए एकत्रित हुए। यह विऔपनिवेशीकरण (उपनिवेशवाद के ख़त्म होने) की प्रक्रिया का चरम बिंदु था। यह एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि पहली बार तीसरी दुनिया के लाखों लोगों के प्रतिनिधि विऔपनिवेशीकरण की विशाल प्रक्रिया और इसके प्रभावों का आकलन करने के लिए एक जगह इकट्ठा हुए था। इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो (1901-1970) ने इस सम्मेलन का आयोजन किया था और उद्घाटन भाषण भी दिया था जिसमें यह सम्मेलन आयोजित करने वालों की आकांक्षाएँ झलकती थीं। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि यह सम्मेलन ‘मानवता का मार्गदर्शन करे’ और यह मार्ग ‘मानवता को सुरक्षा और शांति प्राप्त करने की ओर ले चले’। वे तमाम राष्ट्र प्रमुख वहाँ केवल भारत की आज़ादी (1947), चीनी क्रांति (1949) और गोल्ड कोस्ट में सत्ता के हस्तांतरण (1951) जिससे अंतत: घाना को आज़ादी मिली (1957) का जश्न मानने ही इकट्ठा नहीं हुए थे; बल्कि वे साबित करना चाहते थे कि एक नए एशिया और नए अफ्रीका का जन्म हो चुका है।1

सुकर्णो के साथी रुसलान अब्दुलगनी (1914-2005) बांडुंग सम्मेलन के प्रधान सचिव थे। सम्मेलन के दौरान और बाद में वे एक ‘बांडुंग भावना’ के बारे में चर्चा करते रहे। इसकी व्याख्या उन्होंने ‘शांतिप्रिय, हिंसा विरोधी, भेदभाव विरोधी और सबके विकास की भावना’ के रूप में की ‘जो एक दूसरे के मामलों में ग़लत ढंग से हस्तक्षेप नहीं करती बल्कि एक दूसरे के लिए अत्यंत आदर’ रखती है।2 यह ‘बांडुंग भावना’ आदर्शवादी नहीं थी; इसकी जड़ें उपनिवेशों की जनता के स्वतंत्रता आंदोलनों में थीं, इन आंदोलनों को पाँच साल बाद संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने उपनिवेशों और उनकी जनता द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने की घोषणा में ‘मुक्ति की प्रक्रिया’ कहा जो ‘अप्रतिरोध्य और अपरिवर्तनीय’ है।3

यह ‘बांडुंग भावना’ आदर्शवादी नहीं थी; इसकी जड़ें उपनिवेशों की जनता के स्वतंत्रता आंदोलनों में थीं, इन आंदोलनों को पाँच साल बाद संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने उपनिवेशों और उनकी जनता द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने की घोषणा में ‘मुक्ति की प्रक्रिया’ कहा जो ‘अप्रतिरोध्य और अपरिवर्तनीय’ है।4 बांडुंग भावना उन लाखों करोड़ों लोगों की आवाज़ थी जो उपनिवेशवादी शासन में रह रहे थे और जो उपनिवेशवाद की भयावहता के ख़िलाफ़ तथा एक नई दुनिया की अपनी उम्मीद के लिए लड़ रहे थे।

बांडुंग भावना के विलुप्त हो जाने की कई वजहें रहीं। एक तो यह कि औपचारिक रूप से तो औपनिवेशिक शासन ख़त्म हो गए थे लेकिन नवउदारवादी ढाँचे का दबाव फिर भी बरक़रार था। इस भावना की अब केवल याद रह गई है। औपनिवेशिक शासन के बाद पैदा हुई पीढ़ियों ने उपनिवेशवाद विरोधी लंबे और कठिन संघर्षों की विरासत को संजोकर नहीं रखा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अजेंडा नवउदारवादी ढाँचे के सामने कमज़ोर पड़ गया; उत्तर-औपनिवेशिक दौर में किसानों और मज़दूरों ने अपने देश के शासक वर्ग को तो समस्या के रूप में देखा लेकिन इस दुस्साध्य ढाँचे को अपने शत्रु के रूप में नहीं पहचाना। बांडुंग सम्मेलन के सत्तर साल बाद यह सवाल करना ज़रूरी है कि क्या यह भावना अब भी कहीं मौजूद है, भले ही वैश्विक दक्षिण में कहीं भूली-बिसरी याद के रूप में ही। इस डोसियर का यही उद्देश्य है, इसे एक लंबा निबंध भी कहा जा सकता है जो किसी लंबे शोध के निष्कर्षों को पेश करने की बजाय कुछ विचारोत्तेजक प्रश्न उठाना चाहता है।5 हमें आशा है कि इन प्रश्नों से आपसी बातचीत और बहस का दौर शुरू होगा।


भाग 1: बांडुंग भावना का अर्थ क्या था

पूर्वी दुनिया में घुसपैठिए

5 अक्टूबर 1953 को संयुक्त राज्य अमेरिका (अमेरिका) के उपराष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन एशिया के लंबे दौरे पर निकले, वे (जापान से ईरान तक) यहाँ के चौदह देशों की यात्रा करने वाले थे और इससे लगे दो देशों (ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड) की भी। निक्सन कुछ ज़रूरी उद्देश्यों के साथ एशिया आए थे: जुलाई में कोरियाई प्रायद्वीप में हुए युद्धविराम को लेकर अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को आश्वस्त करने के लिए; इंडोचाइना में अमेरिका की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए, यहाँ पर अधिकांश सैन्य वित्तपोषण अमेरिका ने फ्रांस से हथिया लिया था और फिर मई 1954 में डिएन बिएन फु में फ्रांस की हार के बाद समस्त सैन्य भूमिका अमेरिका के हाथ में आ गई; तथा एशिया में चीनी क्रांति की नई भूमिका को समझने के लिए। दो दशक बाद अपने संस्मरण में निक्सन ने इस यात्रा के बारे में लिखा ‘वॉशिंगटन और दूसरे पश्चिमी देशों की राजधानियों में जब स्वप्नजीवी लोग कह रहे थे कि एशिया में कम्युनिस्ट चीन कोई ख़तरा नहीं बन सकता क्योंकि यह पिछड़ा और अल्पविकसित है’ तब उन्होंने ‘ख़ुद महसूस किया कि इसका प्रभाव इस पूरे क्षेत्र में फैलना शुरू हो चुका था’। निक्सन ने लिखा कि ‘हमारी ही तरह पूर्वी दुनिया में हस्तक्षेप करने वाले’ सोवियत संघ के उलट ‘चीन के कम्युनिस्टों ने स्टूडेंट एक्स्चेंज कार्यक्रम शुरू कर दिए थे और बड़ी संख्या में छात्रों को लाल चीन में कॉलेजों में मुफ़्त पढ़ाई के लिए भेजा जा रहा था’।6 निक्सन ने अपनी सरकार को रिपोर्ट दी कि अमेरिका को एशिया में चीनी क्रांति की वजह से हो रही इन नई गतिविधियों का ज़ोरदार जवाब देना होगा।

सितंबर 1954 में मनीला पैक्ट नाम से एक साझा सैन्य संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद आठ देशों ने दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संगठन (SEATO) का गठन किया। इनमें सिर्फ़ तीन देश एशिया के थे (पाकिस्तान, फ़िलीपीन्स और थाईलैंड) जबकि दो यूरोपीय देश थे (फ्रांस और यूके)। इसके तीन अन्य सदस्य राष्ट्रों ने 1951 में एक अन्य सैन्य समझौता किया था जिसका नाम था ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और यूनाइटेड स्टेट्स सिक्योरिटी (ANZUS) संधि। इस संधि और SEATO के साथ ही एशिया के प्रशांत क्षेत्र में तीन अन्य प्रमुख संधियाँ भी हुईं: 1951 में जापान और मित्र राष्ट्रों के बीच हुई सैन फ्रांसिस्को शांति संधि, 1953 में दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच हुई म्यूचूअल डिफ़ेंस संधि और 1954 में चीन गणराज्य (तब फ़ोर्मोसा अब ताइवान) और अमेरिका के बीच हुई म्यूचूअल डिफ़ेंस संधि।7 1951 में जॉन फोस्टर डलेस , जो 1953 में अमेरिका के विदेश मंत्री बने, ने सुझाव दिया कि अमेरिका को जापान से मलय प्रायद्वीप (यह म्यांमर, थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर के कुछ हिस्से से बना है) तक नौसैनिक अड्डों के टापुओं की एक शृंखला का निर्माण करने की ज़रूरत है ताकि सोवियत संघ और चीनी जनवादी गणराज्य (पीआरसी) को घेरा जा सके। इन पाँच संधियों ने जापान से थाईलैंड तक इस शृंखला के निर्माण की नींव रखी।8 1956 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी को ब्रिटिश ज्ञापन मिला जो ‘SEATO सैन्य योजना के बारे में था जो मानकर चल रहा था कि परमाणु और ग़ैर-परमाणु हथियारों का प्रयोग इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए किया जाएगा… जो भी भविष्य की योजना परमाणु हथियारों को ध्यान में रखकर नहीं की जाएगी वह ज़ाहिर है अव्यवहारिक और अनुपयोगी होगी’।9 दूसरे शब्दों में जिन पाँच संधियों ने चीन को घेरा उन्होंने एशिया के मुहानों पर परमाणु हथियारों की तैनाती को बढ़ावा दिया और ज़रूरत पड़ने पर इनके प्रयोग की अनुमति भी दी।

यह याद रखना ज़रूरी है कि यह सब सिर्फ़ काग़ज़ों पर नहीं हो रहा था। अमेरिका 1945 में ही जापान पर एटम बम गिरा चुका था और 1951 के अंत तक कोरिया के उत्तरी हिस्से में हर तरह के बुनियादी ढांचे को बम से उड़ा चुका था (बमबारी हालाँकि 1953 तक चली थी)।10 अमेरिकी वायु सेना ने कोरिया पर बमबारी की थी उसके कमांडर मेजर जेनरल एमेट ओ’डॉनल ने जून 1951 में अमेरिकी सीनेट को बताया ‘सब तबाह किया जा चुका है। अब वहाँ नाममात्र के लिए भी कुछ नहीं बचा है’। ओ’डॉनल ने यह भी कहा कि जब नवंबर 1950 में चीनी सेनाओं ने उत्तर कोरिया की सरहद पर यालू नदी पार की तो अमेरिकी वायु सेना ने अपने बम से लैस जहाज़ ज़मीन पर ही रखे क्योंकि ‘कोरिया में और कोई निशाने नहीं बचे थे’।11 दिसंबर 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने विन्स्टन चर्चिल को सुझाव दिया कि अगर चीन कोरिया में हुए युद्धविराम का उल्लंघन करता है तो अमेरिका चीन पर एटम बम गिरा देगा। इसके कुछ ही समय बाद मार्च 1955 में अमेरिका की सरकार ने पीआरसी (चीन) को स्पष्ट कर दिया कि अगर पीपल्स लिबरेशन आर्मी फ़ोर्मोसा (अब ताइवान) में दाखिल होती है तो अमेरिका परमाणु हथियार इस्तेमाल कर सकता है।12

शांतिपूर्ण सहअस्तित्व

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ख़ुद को पुराने साम्राज्यवादी धड़े के नेता के रूप में स्थापित करने लगा ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि बर्बाद हो चुके यूरोप के मुक़ाबले इसके पास विशाल सैन्य और आर्थिक शक्ति थी। उसी दौरान, ब्रिटेन मलय प्रायद्वीप में विद्रोह (1948-1960 का मलय आपातकाल) दबाने का एक हिंसक अभियान चला रहा था, और फ्रांस इंडोचाइना में एक हारता हुआ युद्ध लड़ रहा था (1949 तक इंडोनेशिया में डच को पहले ही हराया जा चुका था)। एशिया की धरती ख़ून से भीग रही थी और यही ख़ून उन उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं की आँखों में उतर आया था जो बांडुंग में इकट्ठा हुए थे। इसीलिए इस सम्मेलन में चर्चा का मुख्य विषय शांति और नस्लभेद ही रहे: यहाँ आए उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं को डर था कि मानवता के अंतर्राष्ट्रीय बँटवारे की पुरानी उपनिवेशवादी मानसिकता कहीं उत्तर-औपनिवेशिक दौर में भी बरकरार न रहे, और साथ ही वह हिंसा भी जो उपनिवेशवादियों के विरोधियों पर बरपाई जाती थी। बांडुंग सम्मेलन के दस शील (दस आदर्श) ने 1954 में चीन और भारत द्वारा प्रस्तुत पंचशील को आगे बढ़ाया जिसके आधार पर वे आपसी मतभेदों के बावजूद मिलकर काम कर सकें। ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ के यह आदर्श एशिया में सैन्य संधियाँ करने और महाद्वीप के इर्द-गिर्द सैन्य अड्डे स्थापित करने तथा राष्ट्रों को परमाणु हमलों से डराने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं।

तुर्की के नाटो में शामिल होने के चार साल बाद 1956 में, तुर्की के एक कम्युनिस्ट शायर, नाज़िम हिक़मत ने हिरोशिमा की सात साल की एक बच्ची के लिए एक शोकगीत लिखा। गीत का शीर्षक था ‘हिरोशिमा चाइल्ड’ (हिरोशिमा की बच्ची) जो अपने ‘मारे हुए बच्चे, फिर से उगते नहीं’ वाक्य के लिए मशहूर है:

शांति के लिए मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए
तुम आज लड़ो, तुम लड़ो आज
ताकि दुनिया के बच्चे
ज़िंदा रह सकें, बड़े हो सकें और हँस सकें, खेल सकें।

यही बांडुंग भावना का सार है। यह बिल्कुल सरल और स्पष्ट था। यही भावना उस दस आदर्शों में व्याप्त है जो 24 अप्रैल 1955 को सम्मेलन की अंतिम प्रेस विज्ञप्ति में जारी किए गए थे:

1. मौलिक मनवाधिकारों और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के उद्देश्यों और आदर्शों का सम्मान।
2. सभी राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय सीमाओं का सम्मान।
3. सभी नस्लों की बराबरी और छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों की समानता को मान्यता।
4. किसी भी राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप या दख़ल देने से बचना।
5. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप किसी भी राष्ट्र के, अकेले या दूसरों के साथ मिलकर, अपनी रक्षा के अधिकार का सम्मान।
6. (क) किसी बड़ी ताक़त के विशेष हितों के लिए एकजुट सैन्य समझौतों के प्रयोग से बचना।
(ख) किसी एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर दबाव डालने से बचना।
7. किसी भी राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलफ उग्रता या बलप्रयोग करने या धमकी देने से बचना।
8. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप, सभी अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण तरीकों से निपटारा, जैसे कि बातचीत, समझौता, मध्यस्थता, या न्यायिक समाधान, साथ ही पक्षों की अपनी पसंद के अन्य शांतिपूर्ण तरीकों से।
9. पारस्परिक हितों और सहयोग को बढ़ावा देना।
10. न्याय और अंतर्राष्ट्रीय बाध्यताओं का सम्मान।13

प्रभावी रूप से इन आदर्शों ने एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की अवधारणा रखी, जिसका आधार संयुक्त राष्ट्र का चार्टर (1945) था न कि ऐसी व्यवस्था जो सैन्य गुटों और सैन्य शक्ति के प्रयोग से दुनिया को आकार देना तथा संप्रभुता को कमज़ोर करना चाहे। अब्दुलग़नी ने बांडुंग सम्मेलन पर अपने विचार रखते हुए बताया कि यह ‘मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मानक और प्रक्रियाएँ तय करने’ का एक फ़ोरम था और यह सर्वनाश की जगह सहअस्तित्व के विचार का समर्थक था।14 1955 तक छिहत्तर देश संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर कर चुके थे जिसमें इस पर हस्ताक्षर करने वालों के लिए संधि निभाने के दायित्व थे; अफ्रीका महाद्वीप के अधिकांश हिस्से और प्रशांत द्वीपों के बहुत बड़े हिस्से सहित लगभग अस्सी देश अब भी औपनिवेशिक शासन झेल रहे थे। तब और अब भी संयुक्त राष्ट्र का चार्टर दुनिया में सहमति का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है; 50 और 60 के दशक में जैसे-जैसे देशों ने आज़ादी हासिल की वे संयुक्त राष्ट्र के पूर्ण सदस्य बनते चले गए।

बांडुंग भावना बहुत तेज़ी से दुनिया में फैलने लगी। 1957-1958 में काहिरा में हुए एफ़्रो-एशियाई जनवादी एकजुटता सम्मेलन, फिर 1958 में अक्रा में आयोजित अखिल अफ्रीकी जनवादी सम्मेलन, और इसके बाद 1960 में ट्यूनिस में दूसरे अखिल अफ्रीकी जनवादी सम्मेलन, 1961 में बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का शिखर सम्मेलन, और अंततः 1966 में हवाना में त्रि-महाद्वीपीय सम्मेलन तक इसकी यात्रा जारी रही। इन प्रत्येक सम्मेलनों ने संस्थागत ढांचे गढ़े: अफ़्रो-एशियाई जनवादी एकजुटता संगठन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन और अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका की जनता के साथ एकजुटता संगठन। इनकी मूल भावना साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष थी – परमाणु खतरे एवं निरस्त्रीकरण पर केंद्रित और इस विचार पर कि हथियारों पर कीमती सामाजिक संपदा की बर्बादी का मतलब था विकास का अजेंडा भुला दिया जाएगा। इन सम्मेलनों के विचार-विमर्श का केंद्रीय बिंदु था बंदूक़ बनाम रोटी। 1963 की सीमित परीक्षण प्रतिबंध संधि जैसे हथियार नियंत्रण के जो भी तंत्र इस दौर में सामने आए, वे सब इन गुटनिरपेक्ष तीसरी दुनिया के देशों के कार्यक्रमों के दबाव में हुए समझौतों का नतीजा थे।15

विकासात्मक सहयोग

संप्रभुता और शांति के आह्वान के अतिरिक्त बांडुंग दौर के भीतर एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का बीज भी था। बांडुंग में दक्षिण-दक्षिण सहयोग का नारा दिया गया था। इसकी अंतिम प्रेस विज्ञप्ति का पहला भाग पूरी तरह से आर्थिक सहयोग को समर्पित था और इसमें आर्थिक विकास तथा तकनीकी सहायता की आकांक्षा की रूपरेखा पेश की गई थी। यह माँग भी उठाई गयी थी कि संयुक्त राष्ट्र आर्थिक विकास विशेष कोष की स्थापना की जाए ताकि इन देशों में निवेश के लिए धन मुहैया करवाया जा सके। चूँकि साम्राज्यवाद ने उपनिवेशों में उतना ही विकास करना ठीक समझा जितना कच्चे माल के उत्पादन के लिए ज़रूरी था इसलिए ज़्यादा ध्यान वस्तुओं के दामों को स्थिर रखने और निर्यात से पहले इस माल को प्रॉसेस करने की घरेलू क्षमताओं पर ही दिया गया।

बांडुंग सम्मेलन का दीर्घकालिक प्रभाव यह था कि इसने बहुपक्षीय संस्थानों और प्रक्रियाओं के आकार को काफ़ी प्रभावित किया। ये संस्थान और प्रक्रियाएँ आज भी बरकरार हैं, हालाँकि इनका स्वरूप या तो कमज़ोर कर दिया गया या इन्हें क़ब्ज़ा लिया गया है।16 इनमें 1958 में संयुक्त राष्ट्र आर्थिक विकास विशेष कोष की स्थापना शामिल है, जो 1965 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम बन गया। 1964 में संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन की स्थापना हुई और इसके नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था प्रस्तावों को 1974 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वीकार कर लिया। 2024 में UNCTAD की साठवीं वर्षगांठ पर उप महासचिव पेड्रो मैनुअल मोरेनो ने घोषणा की: ‘ऐसी ही भावना [बांडुंग सम्मेलन जैसी] के साथ ही नौ वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) का जन्म हुआ’।17

तख़्तापलट का संसार

अप्रैल 1955 में बांडुंग सम्मेलन के आयोजन से कुछ हफ़्ते पहले अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फ़ोस्टर डलेस ने अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत सर रॉजर मकिंस के साथ एक मुलाक़ात की। डलेस ने मकिंस को बताया कि वे ‘एशिया के हालात’ की वजह से ‘काफ़ी अवसाद’ में हैं। यह ‘हालात’ आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 31 मार्च 1955 को भारतीय सांसद में दिए गए भाषण से स्पष्ट होते हैं। यह भाषण बांडुंग सम्मेलन से कुछ ही पहले दिया गया था और इसमें उन्होंने जिन चीज़ों के ख़िलाफ़ बोला उनमें शामिल थीं – SEATO जिसे उन्होंने एक शत्रुतापूर्ण समझौता कहा, नाटो क्योंकि इसने गोवा में पुर्तगाल को समर्थन दिया, दक्षिण अफ्रीका में चल रहे नस्लभेद और साथ ही पश्चिमी देश क्योंकि वे पश्चिमी एशिया में ‘दखलंदजी’ कर रहे थे। डलेस ने कहा कि नेहरू का भाषण ‘का मूल विचार यही था कि पश्चिमी सभ्यता परास्त हो चुकी है और इसकी जगह अब एक नई सभ्यता को लाना ज़रूरी है’। डलेस के भीतर इसी बात से अवसाद पैदा हो रहा था और वे चाहते थे कि बांडुंग सम्मेलन असफल हो जाए क्योंकि उनके मुताबिक़ इसका ‘मूल स्वरूप और विचार ही पश्चिम विरोधी है’।18

ईरान (1953) और ग्वाटेमाला (1954) में हुए तख़्तापलटों के माध्यम से पश्चिम ने घोषणा कर दी कि वह एक नयी तरह की दुनिया का निर्माण नहीं होने देगा। इसके बाद अफ्रीका (1961 में कांगो और 1966 में घाना की जनता के विरुद्ध), दक्षिण अफ्रीका (1964 में ब्राज़ील के लोगों के ख़िलाफ़) और एशिया (1965 में इंडोनेशिया की जनता के विरुद्ध) में तख़्तापलटों की एक झड़ी लग गई। ये चारों तख़्तापलट सांप्रदायिक ताक़तों की प्रतिक्रियाओं के केंद्र बने, इन देशों पर थोपी गई नए सैन्य शासनों अपने महाद्वीपों में किसी भी तरह के प्रगतिशील विकास के प्रयासों का दम घोंटने में भूमिका निभाई। इंडोनेशिया के तख़्तापलट में लाखों कम्युनिस्टों की हत्या कर दी गई, मानो बांडुंग सम्मेलन का बदला लिया गया हो।19

भाग 2: आज बांडुंग भावना ग़ायब क्यों है?

स्मृतियों में सराबोर

अप्रैल 1965 में सुकर्णो की संकटग्रस्त सरकार ने इस सम्मेलन की दसवीं वर्षगाँठ मनाई जिसमें तीस देशों के प्रतिनिधियों पहुँचे। फिर भी यह पहले सम्मेलन के सामने फीका था: जनवरी में इंडोनेशिया ने अपनी संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता निलंबित कर दी थी और आने वाले अक्टूबर में देश की सेना अपने बैरक से निकलकर सुकर्णो का तख़्तापलट करने वाली थी। 1965 में अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स में दूसरा ऐफ़्रो-एशियाई सम्मेलन आयोजित करने की कोशिश हुई लेकिन इसे रद्द करना पड़ा जिसकी वजहें थीं- जून 1965 में बेन बेला का तख़्तापलट कर दिया गया; चीन-सोवियत विवाद; और नव स्वतंत्र अफ्रीकी देशों के आपसी मतभेद, कासाब्लांका समूह मज़बूती से अफ्रीकावाद के पक्ष में खड़ा था जबकि ब्राज़ाविल समूह चाहता था कि पुराने औपनिवेशिक शासकों से क़रीबी रिश्ते बने रहें। चूँकि बांडुंग सम्मेलन से निकले कई संस्थान बरक़रार रहे और दशकों तक दुनिया पर अपना प्रभाव डालते रहे इसलिए दूसरा सम्मेलन नहीं करवा पाने से कोई ख़ास असर पड़ा हो ऐसा नहीं लगता। बांडुंग भावना को जिस चीज़ ने तबाह किया वह था तीसरी दुनिया का ऋण संकट जिसने विकासशील देशों को ऋण और जन कल्याण कार्यक्रमों पर सरकारी ख़र्च में कटौती की स्थाई स्थिति में फँसा दिया तथा उनकी विकास से जुड़ी आकांक्षाओं को कुचल दिया। बांडुंग भावना के मिट जाने की यह वजह थी।

तीसरी दुनिया में जो ऋण का संकट खड़ा हुआ वह अपने आप में दर्शाता है कि इतने कम समय में बांडुंग भावना नवउपनिवेशवादी श्रम विभाजन के भौतिक आधार से जीत नहीं पाई। सहयोग और आदान-प्रदान की आत्मनिष्ठ परिस्थितियाँ तो मौजूद थीं लेकिन वस्तुनिष्ठ परिस्थितियाँ नहीं। नए-नए आज़ाद हुए देशों में जितना भी इंफ़्रास्ट्रक्चर मौजूद था वह साम्राज्यवाद की देन था, और हाशिए के देशों से शक्तिशाली देशों तक लूट पहुँचाने के लिए बना था। 1963 में विकासशील देशों का 70% से ज़्यादा निर्यात विकसित देशों में ही जाता था।20 अब जिसे वैश्विक दक्षिण कहा जाता है उसके पारस्परिक प्राचीन व्यापारिक रिश्ते उपनिवेशवाद ने बर्बाद कर दिए और उन्हें फिर से बनाना कोई आसान काम नहीं था। इसके ऊपर ये नए स्वतंत्र हुए देश, दुनिया की अधिकांश आबादी का घर होने के बावजूद वैश्विक व्यापार का एक बहुत छोटा सा भाग थे। इनका निम्न स्तरीय तकनीकी विकास भी तकनीक विशेषज्ञताएं एक-दूसरे के साथ सुचारू रूप से साझा करने में रुकावट था।

बांडुंग प्रक्रिया में साथ आए इन नए-नए आज़ाद देशों में से हरेक का पूँजी सृजन और अंदरूनी वर्ग संरचना का विशिष्ट चरित्र था और सब तब भी साम्राज्यवाद द्वारा निर्धारित अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन के खाँचों में सीमित थे।21xvii औपनिवेशिक दौर के अल्पविकास और साम्राज्यवादी तख़्तापलट तथा विद्रोह-दमन के हमलों से बच न पाने के कारण तीसरी दुनिया के ऋण संकट ने सहयोग की भावना की जगह प्रतियोगिता के नियम को स्थापित कर दिया। इस संकट ने हाशिए के देशों को आपस में बाँटा और इस प्रकार अनुशासित किया कि वे बहुराष्ट्रीय पूँजी की शर्तों पर फिर से वैश्विक बाज़ार का हिस्सा बना दिए गए।22

2005 में अफ्रीका और एशिया के लगभग सभी यानी 177 में से 106 देशों ने बांडुंग में एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन की पचासवीं वर्षगाँठ में शिरकत की (इज़राइल को न्यौता नहीं दिया गया था, न ही ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड को, लेकिन अधिकांश प्रशांत सागर के द्वीप राष्ट्र और फ़िलिस्तीन इसमें शामिल हुए थे), और साथ ही कई लैटिन अमेरिकी देश प्रेक्षक के रूप में मौजूद रहे। तमाम देशों की सरकारों के मुखिया सवोय होमन होटल से निकले और एशियन-अफ्रीकन स्ट्रीट (पहले सम्मेलन की याद में सड़क का नाम रखा गया था) पर चलते हुए कार्यक्रम के स्थान तक पहुँचे, बिलकुल वैसे ही जैसे पचास साल पहले उनके पूर्ववर्ती नेताओं ने किया था। यह सम्मेलन नॉस्टैल्जिया (बीते समय की स्मृतियों) में डूबा हुआ था, लेकिन इसमें यह भाव भी निहित था कि दुनिया एक संक्रमण काल से गुज़र रही थी – और यह सम्मेलन उस समय हो रहा था जब ‘वॉर ऑन टेरर’ (आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध) का क्रूर दौर जारी था जिसने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान और इराक को तबाह कर दिया था और जल्द ही कई अन्य देशों में भी तबाही लाने वाला था (इनमें इंडोनेशिया भी शामिल है जहाँ अक्टूबर 2002 में बाली में हुए बम विस्फोटों ने इस युद्ध को दक्षिणपूर्व एशिया तक पहुँचा दिया)। इस सम्मेलन की घोषणा, एक नई एशियाई-अफ्रीकी रणनीतिक साझेदारी, तुलनात्मक लाभ और विकास के लक्ष्यों जैसी नवउदारवादी अवधारणाओं से ग्रस्त थी और प्रथम घोषणा के साम्राज्यवाद विरोधी तर्क से भटकी हुई थी। बांडुंग भावना बिसराई जा चुकी थी और कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। इसलिए इसके मुर्दा शरीर की चिंता न कर बांडुंग की सच्ची भावना को एक बार फिर खोजने की ज़रूरत थी।

वैश्विक दक्षिण का नया मिज़ाज

जब तक तीसरी महामंदी (2007-2008) नहीं आई तब तक यह अहम समझ नहीं बन पाई थी कि पश्चिम न तो वैश्विक दक्षिण को प्रगति करने देगा और न ही उसे सक्षम बनाएगा। 2009 में, इसी समझ ने ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) की प्रक्रिया को जन्म दिया, जिसमें 2025 में पाँच अन्य देश (मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात) और तेरह साझीदार देश शामिल हो चुके हैं।23 शुरुआती ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों में दक्षिण-दक्षिण के पारस्परिक सहयोग या वैश्विक दक्षिण में व्यापार और निवेश पर ध्यान केंद्रित किया गया, लेकिन बाद के शिखर सम्मेलनों ने वैश्विक उत्तर से आर्थिक स्वतंत्रता और अमेरिका-प्रेरित एकध्रुवीय दुनिया के बजाय बहुपक्षवाद के विचार को फिर से स्थापित किया। ब्रिक्स प्रोजेक्ट के पूर्ण मूल्यांकन के लिए सोलह साल का समय पर्याप्त नहीं है। इन वर्षों में भी, इसने अपने सदस्य देशों (जैसे चीन और भारत) के बीच राजनीतिक मतभेदों और उनके नेताओं के बदलते स्वरूप को देखा (जैसे ब्राज़ील में दिल्मा रूसेफ़ के उदारवादी-वामपंथी सरकार की जगह जायर बोल्सोनारो की नव-फ़ासिस्ट सरकार आना और फिर लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा के नेतृत्व में मध्यम-वामपंथ की वापसी)। ब्रिक्स प्रक्रिया और अन्य दक्षिण-दक्षिण संरचनाओं के लिए उत्साह तब पैदा हुआ जब एशिया के बड़े देशों (विशेष रूप से चीन, वियतनाम, भारत, बांग्लादेश और इंडोनेशिया) में आर्थिक विकास हुआ। जनवरी 2025 में, बांडुंग सम्मेलन की सत्रहवीं वर्षगांठ के साल में इंडोनेशिया ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य बन गया।

विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया की ओर सरक जाने से वैश्विक दक्षिण में एक नया आत्मविश्वास या ‘नया मिज़ाज’ पैदा हुआ, क्योंकि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों को अब वित्तीय सहायता और तकनीकी विकास के लिए वैश्विक उत्तर की संस्थाओं की ज़्यादा ज़रूरत नहीं रह गई थी। 2013 में तीसरी महामंदी के जवाब में चीन ने जो बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) की वह इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण क़दम थी, क्योंकि इसने दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए वे वस्तुपरक परिस्थितियाँ पैदा कीं जो बांडुंग सम्मेलन के समय मौजूद नहीं थीं। पूर्वी अफ्रीका में रेलवे के निर्माण और पेरू में एक नए बंदरगाह के खुलने जैसे क़दमों ने वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच आंतरिक व्यापार के लिए आधार खड़ा किया है। 2023 तक चीन का 46.6% व्यापार BRI नेटवर्क के देशों के साथ होने लगा।24 हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ‘विच्छेदन’ (डीलिंकिंग) जैसा कुछ हो चुका है, लेकिन यह स्पष्ट है कि एक बड़ा बदलाव हो रहा है क्योंकि चीन अब 120 से अधिक देशों का प्रमुख व्यापारिक साझीदार है।25 इस बीच BRI को भी कई उतार-चढ़ाव देखने पड़े हैं और ज़रूरी है कि इसके सदस्य देश अपनी राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं को इसकी चर्चाओं में शामिल करें।

ट्राईकॉन्टिनेंटल के कई दस्तावेज़ों में मौजूदा माहौल को परिभाषित करने के लिए ‘नया मिज़ाज’ शब्दों का इस्तेमाल किया है। ‘वैश्विक दक्षिण के नए मिज़ाज’ के प्रमुख उद्देश्य दो अवधारणाओं में निहित हैं – क्षेत्रवाद और बहुपक्षवाद, दोनों आर्थिक और राजनीतिक रूप से विश्व व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाने की इच्छा से प्रेरित हैं। शंघाई सहयोग संगठन से लेकर दक्षिणी आम बाजार (मर्कोसुर) तक, यह क्षेत्रवाद पहले से ही विकसित हो रहा है और स्थानीय मुद्रा-आधारित व्यापार में वृद्धि से मजबूत हुआ है, जिससे ‘आर्थिक आत्मनिर्णय’ और ‘क्षेत्रीय संपूरकता’ को प्राप्त करना भौतिक रूप से संभव हो गया है, जैसा कि क्यूबा के विदेश मंत्रालय की इंदिरा लोपेज़ अर्गुएल्स ने कहा है।26 इस क्षेत्रवाद से जुड़ा है बहुपक्षवाद के विचार का विस्तार, यह विश्वास कि वैश्विक संस्थान (जैसे संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन) वैश्विक उत्तर के हाथ की कठपुतलियाँ नहीं होने चाहिए बल्कि उन्हें वह अजेंडा अपनाना चाहिए जिसे उनके सभी सदस्य देशों ने आकार दिया हो।

आज बांडुंग भावना मौजूद नहीं है

1950 और 1960 के दशक में, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का एक जनाधार था (अक्सर इन आंदोलनों को उनकी अधिकांश आबादी का समर्थन रहा)। अधिकांश मामलों में इनका नेतृत्व छोटे बुर्जुआ और ज़मींदार अभिजात वर्ग के कुछ हिस्सों ने किया लेकिन राष्ट्रीय मुक्ति के प्रति इन आंदोलनों की प्रतिबद्धता ने उन्हें एक समाजवादी रास्ते पर चलते हुए नव-उपनिवेशवाद की संरचनाओं की सीमाओं में ही सरकारें बनाने को मजबूर किया और अपने संगठित जनाधार को जवाब देने के लिए भी। ये ‘समाजवाद’ अलग-अलग विचारों के साथ आए चाहे वह भारत की दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961) का ‘समाज का समाजवादी रास्ता’ हो, (तंजानिया के जूलियस न्येरेरे द्वारा 1967 में लिखित) अरुषा घोषणा का अफ्रीकी समाजवाद हो या लैटिन अमेरिका में पोपुलिज़्म के तमाम प्रकारों की राजनीति हो जैसे अर्जेंटीना का पेरोनिज़्म (¡Ni yanquis, ni marxistas!, ¡peronistas!, या ‘यैंकी नहीं, मार्क्सवादी नहीं, पेरोनिस्ट!’)। इन प्रवृत्तियों के नेतृत्व के वर्गीय रुझान और उनके अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के बावजूद सक्रिय जनता ने उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति के व्यापक लक्ष्य से भटकने की अनुमति नहीं दी। इसीलिए हम ज़मीनी स्तर से ऊपर की ओर एक बांडुंग [भावना] की बात कर सकते हैं।

आज जन आंदोलनों की स्थिति बहुत कमज़ोर है। वैश्विक दक्षिण के केवल कुछ ही देशों में वे समाज का नेतृत्व करते हैं। हमारे समय की प्रगतिशील सरकारों में विभिन्न वर्गों के गठबंधन हैं – जिसमें एक छोटा बुर्जुआ और उदार बुर्जुआ भी शामिल है जो नवउदारवाद के अत्याचारों को बर्दाश्त तो नहीं कर पा रहा लेकिन आसानी से उसकी रूढ़ियों से छूटेगा भी नहीं। जबकि, उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिका में दूसरी गुलाबी लहर (पिंक टाइड) और सेनेगल और श्रीलंका जैसे देशों में प्रगतिशील सरकारों का उदय नवउदारवाद के पतन की प्रतिक्रिया और दक्षिणपंथी भय का जवाब हैं, वे संगठित जन आंदोलनों की पीठ पर सवार नहीं हैं और न ही वे नवउदारवाद से टूटने के विचार के इर्द-गिर्द एकजुट हैं।27 अफ्रीका के साहेल क्षेत्र – नाइजर, माली और बुर्किना फासो में – साम्राज्यवाद-विरोधी सैन्य तख़्तापलटों को सामाजिक आंदोलनों की एक नई लहर का समर्थन प्राप्त है जो अभी भी संप्रभुता और विकास के लिए एक व्यापक परियोजना तैयार करने की प्रक्रिया में हैं। ये विकास एक नए मिज़ाज को जन्म देने में सक्षम हैं – उदाहरण के लिए, एक ‘ब्रिक्स भावना’ – लेकिन यह अभी तक बांडुंग भावना जैसी नहीं हैं। यह घोषणा कर देना जल्दबाज़ी या फिर आदर्शवादी तक कहा जा सकता है कि हमारे समय में ज़मीन से एक बांडुंग भावना जैसी कोई नई भावना सिर उठा रही है जो इतिहास की वास्तविक गति देने वाली एक सक्षम, एक जन परिघटना है।

इस नए मिज़ाज को आकार देने वाला मूलभूत संदर्भ और बांडुंग भावना को फिर से जगाने की ज़रूरत के पीछे एक बड़ा खतरा है, जिसका नाम है अति-साम्राज्यवाद।28  ट्राईकॉन्टिनेंटल में अपने शोध द्वारा हमने प्रस्तावित किया है कि दुनिया में केवल एक ही राजनीतिक-आर्थिक-सैन्य गुट है: अमेरिका के नेतृत्व वाला नाटो और इज़राइल का गठबंधन। घटती आर्थिक और तकनीकी शक्ति के बावजूद यह गुट अद्वितीय सैन्य शक्ति रखता है और वैश्विक सूचना तंत्र पर ज़बरदस्त नियंत्रण बनाए हुए है। छद्म युद्ध रणनीतियों का उपयोग और यहाँ तक कि मामूली संप्रभुता चाहने वाले राष्ट्रों के खिलाफ हिंसा की धमकी या उपयोग का जवाब वैश्विक दक्षिण मिलकर देना होगा जिसका स्वरूप शायद बांडुंग भावना का फिर से उभरना हो सकता है।

हालाँकि, कुछ ऐसे कारक हैं जो वैश्विक दक्षिण में एक नए बांडुंग युग के उदय में रुकावट पैदा करते हैं:

  1. पश्चिमी देशों के नेतृत्व की कई विफलताओं, पतन और ख़तरे के बावजूद इससे डर और इसकी लालसा दोनों बरकरार हैं। यह तर्कसंगत है कि वैश्विक दक्षिण के देश हर तरह के युद्ध की आशंका से डरते हैं (इनमें एकतरफ़ा बलपूर्वक उपाय से लेकर हवाई बमबारी तक सब शामिल है), क्योंकि यह सिर्फ़ एक सैद्धांतिक धारणा नहीं बल्कि एक वास्तविक तथ्य है।29 इसके साथ ही पश्चिमी वर्चस्व वाली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के अवशेषों की वजह से उनके नेतृत्व की अनिवार्यता का मनमोहक भाव भी बना हुआ है।
  2. वैश्विक दक्षिण में एशिया में हुई प्रगति के बारे में अभी इतना प्रचार नहीं हुआ है विशेष रूप से चीन द्वारा की गई प्रगति के बारे में। गुणात्मक रूप से नई उत्पादक शक्तियों के संदर्भ में ख़ासतौर से अन्य देश इस तमाम विकास को आसानी से दोहराने योग्य नहीं मान रहे हैं, जिससे वैश्विक दक्षिण की सामूहिक शक्ति की संभावना को कम आंका जाता है। इसके अलावा और वास्तविक हालात को झुठलाते हुए वैश्विक उत्तर द्वारा यह धारणा फैलाई जा रही है कि वैश्विक दक्षिण में विकास को गति दे रहे देशों की प्रगति ग़रीब देशों के लिए ख़तरनाक होगी। यह बताया जा रहा है कि सैकड़ों वर्षों से वैश्विक उत्तर का जो ख़तरा दुनिया ने देखा है उसके मुकाबले ख़ासतौर से एशियाई देशों की प्रगति ज़्यादा ख़तरनाक है।
  3. डिजिटल, मीडिया और वित्तीय क्षेत्रों में पश्चिम के नियंत्रण की वास्तविकता के आगे घुटने टेक दिए गए हैं, जिसे अजेय मान लिया गया है।
  4. वैश्विक दक्षिण के सत्तारूढ़ आर्थिक अभिजात वर्ग का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक वित्तीय पूंजी के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यह विशेष रूप से निवेश के लिए एक सुरक्षित आश्रय के तौर पर अमेरिकी डॉलर पर उसकी निर्भरता और वैश्विक उत्तर के रियल एस्टेट और वित्तीय बाजारों में निवेश करने के लिए अपने ही देशों से धन निकालने में उसकी भागीदारी में प्रकट होता है। इन वर्गीय हितों को बौद्धिकों और नीति निर्माताओं द्वारा आसानी से समर्थन दिया जाता है जो नवक्लासिकल अर्थशास्त्र और वाशिंगटन कंसेंसस के सिद्धांतों से आगे नहीं देख सकते।30 इसीलिए हम ट्राईकॉन्टिनेंटल में वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की वकालत करते हैं।31
  5. हमारे कई सामाजिक आंदोलन मानकर चलते हैं कि वाम को वर्ग राजनीति की वास्तविकताओं का स्थायी रूप से विरोध करना चाहिए, हम इन परिस्थितियों में सत्ता नहीं जीत सकते। सत्ता लेने और अपने अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए वास्तविकता के साथ किसी भी तरह का समझौता हमारे अंतिम लक्ष्यों से भटकाव के रूप में देखा जाता है। जीत पाने में विफलता की लुभावनी भावना राष्ट्रीय मुक्ति के दौर में मौजूद नहीं थी, जब राज्यसत्ता हासिल करना ही तात्कालिक और अटल लक्ष्य था। एक ऐसा दृष्टिकोण भी है जो कहता है कि वाम आंदोलनों को दक्षिणपंथ से लड़ना चाहिए, नवउदारवाद के ख़िलाफ़ सक्रिय होना चाहिए और राज्य की सत्ता की माँग या उस पर क़ाबिज़ होने की बजाय मध्यम-वामपंथ को सत्ता हासिल करने में मदद देनी चाहिए। और सबसे ख़राब नज़रिया है राज्य सत्ता हासिल करने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए।

जब तक वैश्विक दक्षिण की जनता इनमें से कुछ (और इनसे भी ज़्यादा) चुनौतियों पर काबू नहीं कर पाती तब तक बांडुंग भावना के इतिहास की मुख्यधारा का हिस्सा बनने की संभावना नहीं है। हम इतिहास के एक समाप्त युग, साम्राज्यवाद के युग से धीरे-धीरे बाहर निकल रहे हैं। लेकिन हम अभी तक एक नए युग में प्रवेश नहीं कर पाए हैं, जो साम्राज्यवाद से परे हो – वह ढांचा जिससे बाहर निकलना सबसे कठिन है।


Notes

1 Sukarno, ‘Opening address given by Sukarno (Bandung, 18 April 1955)’, Asia-Africa Speak from Bandung (Djakarta: Ministry of Foreign Affairs, Republic of Indonesia, 1955), 19–29.

2 Roeslan Abdulgani, Bandung Spirit: Moving on the Tide of History (Djakarta: Prapantja, 1964) and The Bandung Connection: The Asia-Africa Conference in Bandung in 1955 (Singapore: Gunung Aguna, 1981), 89.

3 The poetic resolution was formally placed before the UN General Assembly by the Soviet diplomat Vasily Kuznetsov. See United Nations General Assembly, Declaration on the Granting of Independence to Colonial Countries and Peoples (A/RES/1514), December 14, 1960. The president of the General Assembly at that time was the Irish diplomat Frederick Boland. Boland’s daughter Eavan became a famous poet and in 1998 published ‘Witness’, which contains these lines:
What is a colony
if not the brutal truth
that when we speak
the graves open.
And the dead walk?

4 Abdulgani, The Bandung Connection, 11.

5 The overall narrative in this dossier draws heavily from Vijay Prashad, The Darker Nations: A People’s History of the Third World (New York: The New Press, 2007) and The Poorer Nations: A Possible History of the Global South (New Delhi: LeftWord, 2013). It will form part of the basis for The Brighter Nations (2026).

6 Richard Nixon, RN: The Memoirs of Richard Nixon (New York: Grosset and Dunlap, 1978), 136. Also see Richard Nixon, ‘Asia After Viet Nam’, Foreign Affairs, 1 October 1967, https://www.foreignaffairs.com/articles/united-states/1967-10-01/asia-after-viet-nam.

7 For more on the San Francisco Treaty, see Tricontinental: Institute for Social Research, The New Cold War Is Sending Tremors through Northeast Asia, dossier no. 76, 21 May 2024, https://thetricontinental.org/dossier-76-new-cold-war-northeast-asia/.

8 For a full sense of the argument, see John Foster Dulles, Policy for the Far East (Washington: US Government Publishing Office, 1958).

9 ‘Memorandum of a Conversation Between the Counsellor of the Department of State (MacArthur) and the British Ambassador (Makins), Department of State, Washington, February 29, 1956’, US Department of State, Conference Files: Lot 62 D 181, CF 656, Secret; John P. Glennon, Edward C. Keefer, and David W. Mabon, eds., Foreign Relations of the United States, 1955–1957, East Asian Security; Cambodia; Laos, Volume XXI, (Washington: United States Government Printing Office, 1990), 180–181.

10 Su-kyoung Hwang, Korea’s Grievous War (Philadelphia: University of Pennsylvania Press, 2016).

11 I. F. Stone, The Hidden History of the Korean War, 1950–1951 (New York: Little Brown, 1969), 312.

12 At a press conference on 15 March 1955, John Foster Dulles explained the doctrine of ‘less-than-massive retaliation’. If China crossed into Formosa, Dulles said, the US would use tactical nuclear weapons against the Chinese forces. See Elie Abel, ‘Dulles Says US Pins Retaliation on Small A-Bomb’, New York Times, 16 March 1955, https://www.nytimes.com/1955/03/16/archives/dulles-says-us-pins-retaliation-on-small-abomb-lessthanmassive.html.
When Eisenhower was asked to confirm Dulles’ statement the next day, he said that tactical nuclear weapons should not be used ‘just exactly as you would use a bullet or anything else. I believe that the great question about these things comes when you begin to get into those areas where you cannot make sure that you are operating merely against military targets. But with that one qualification, I would say, yes, of course they would be used’. See William Klingaman, David S. Patterson, and Ilana Stern, eds., Foreign Relations of the United States, 1955–1957, National Security Policy, Volume XIX (Washington: United States Government Printing Office, 1990), 61. For Churchill’s diary notes, see John Colville, The Fringes of Power: Downing Street Diaries, 1939–1955 (London: Hodder and Stoughton, 1985), 687. On the broader question of nuclear retaliation, see Matthew Jones, ‘Targeting China: US Nuclear Planning the “Massive Retaliation” in East Asia, 1953–1955’, Journal of Cold War Studies 10, no. 4 (Fall 2008): 37–65.

13 Asia-Africa Speak from Bandung, 161–169.

14 Abdulgani, Bandung Spirit, 72.

15 For example, L. C. N. Obi of Nigeria was a key, but now forgotten, figure in the debate around the 1968 Nuclear Non-Proliferation Treaty while Ismael Moreno Pino of Mexico was the central negotiator for the 1967 Treaty for the Prohibition of Nuclear Weapons in Latin America and the Caribbean, known as the Tlatelolco Treaty, the first to establish a nuclear weapons free zone.

16 Gilbert Rist, The History of Development: From Western Origins to Global Faith (London: Zed Books, 2008).

17 Pedro Manuel Moreno, 60 years of UNCTAD: Charting a New Development Course in a Changing World, UN Trade and Development, 14 May 2024, https://unctad.org/osgstatement/60-years-unctad-charting-new-development-course-changing-world-session-1.

18 John P., Harriet D. Schwar, and Louis J. Smith, eds., ‘Memorandum of a Conversation, Department of State, Washington, April 7, 1955’, in Foreign Relations of the United States, 1955–1957, China, Volume II (Washington: United States Government Printing Office, 1986), 454.

19 Alan Burns, the governor of the Gold Coast and Nigeria from 1941 to 1947, was appointed to be the United Kingdom’s permanent representative at the UN Trusteeship Council from 1947 to 1956. Soon after leaving the UN, Burns published a book that went after Bandung and argued that it represented ‘the resentment of the darker peoples against the past domination of the world by European nations’. See Alan Burns, In Defence of Colonies (London: George Allen and Unwin, 1957), 5. For more on the coup in Indonesia, see Tricontinental: Institute for Social Research, The Legacy of Lekra: Organising Revolutionary Culture in Indonesia, dossier no. 35, December 2020, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2020/12/20210127_Dossier-35_EN_Web.pdf.

20 Bela Balassa, Trends in Developing Country Exports, 1963–88, Policy, Research, and External Affairs working papers no. WPS 634, World Bank World Development Report, 31 March 1991, http://documents.worldbank.org/curated/en/561401468766799448/Trends-in-developing-country-exports-1963-88.

21 Aijaz Ahmad, In Theory: Classes, Nations, Literatures (London: Verso, 1992), 16.

22 S. B. D. de Silva, The Political Economy of Underdevelopment (London: Routledge, 1982), 506.

23 For more on the Third Great Depression, see Tricontinental: Institute for Social Research, The World in Economic Depression: A Marxist Analysis of Crisis, notebook no. 4, 10 October 2023, https://thetricontinental.org/dossier-notebook-4-economic-crisis/.

24 The State Council Information Office, ‘China’s Trade with BRI Countries Booms in 2023, press release, 12 January 2024, http://english.scio.gov.cn/m/pressroom/2024-01/12/content_116937407.htm#:~:text=China’s%20trade%20with%20countries%20participating,2022%2C%20customs%20data%20showed%20Friday.

25 Alessandro Nicita and Carlos Razo, ‘China: The Rise of a Trade Titan’, UN Conference on Trade and Development, 27 April 2021, https://unctad.org/news/china-rise-trade-titan. For more on delinking, see Tricontinental: Institute for Social Research, Globalisation and Its Alternative: An Interview with Samir Amin, notebook no. 1, 29 October 2018, https://thetricontinental.org/globalisation-and-its-alternative/.

26 For more on regionalism, see Tricontinental: Institute for Social Research, Sovereignty, Dignity, and Regionalism in the New International Order, dossier no. 62, 14 March 2023, https://thetricontinental.org/dossier-regionalism-new-international-order/.

27 For more on the second pink tide in Latin America, see Tricontinental: Institute for Social Research, To Confront Rising Neofascism, the Latin American Left Must Rediscover Itself, dossier no. 79, 13 August 2024, https://thetricontinental.org/dossier-neofascism-latin-america/.

28 Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism: A Dangerous Decadent New Stage, Contemporary Dilemmas no. 4, 23 January 2024, https://thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Churning of the Global Order, dossier no. 72, 23 January 2024, https://thetricontinental.org/dossier-72-the-churning-of-the-global-order/.

29 For more on unilateral coercive measures, see Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialist War and Feminist Resistance in the Global South, dossier no. 86, 5 March 2025 https://thetricontinental.org/dossier-imperialism-feminist-resistance.

30 For more on the role of intellectuals on both sides of the class struggle, see Tricontinental: Institute for Social Research, The New Intellectual, dossier no. 12, 11 February 2019, https://thetricontinental.org/the-new-intellectual/.

31 Tricontinental: Institute for Social Research, Towards a New Development Theory for the Global South, dossier no. 84, 14 January 2025, https://thetricontinental.org/towards-a-new-development-theory-for-the-global-south/.

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पढ़ना, एक बेहतर इंसान बनना है https://thetricontinental.org/hi/padhana-ek-behtar-insan-banana-hai/ Tue, 11 Feb 2025 08:00:48 +0000 https://thetricontinental.org/?p=119396

Tricontinental: Insitute for Social Research logo

इस डोसियर में शामिल चित्र रेड बुक्स डे 2025 के उपलक्ष्य पर जारी किए गए कैलेंडर से लिए गए हैं। इंटरनेशनल यूनियन ऑफ लेफ्ट पब्लिशर्स के सहयोग से तैयार किए गए ये बारह चित्र दुनिया के अलग-अलग हिस्से की किसी क्रांतिकारी किताब से प्रेरित है। रेड बुक्स डे क्रांतिकारी किताबों, उनके लेखकों और जन आंदोलनों का जश्न मनाने का दिन है, जिसे हम 21 फ़रवरी को मनाते हैं, क्योंकि साल 1848 में इसी दिन कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र प्रकाशित किया था। इस उत्सव के साथ हम दुनिया से कहना चाहते हैं कि पढ़ना, एक बेहतर इंसान बनना है।


पूरा रूस पढ़ना सीख रहा था और पढ़ रहा था – राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास – क्योंकि लोग जानना चाहते थे… हर शहर में, अधिकतर क़स्बों में, मोर्चे के साथ चलते हुए, हर राजनीतिक संगठन का अपना एक अख़बार था – [और] कहीं-कहीं एक से ज़्यादा भी। हज़ारों संगठनों द्वारा लाखों पर्चे बांटे जा रहे थे जो क्रांतिकारियों की फ़ौजों से लेकर गांवों, कारख़ानों, सड़कों तक पहुँच रहे थे। शिक्षा की भूख, जो लंबे समय से दबी पड़ी थी, क्रांति के साथ अभिव्यक्ति के उन्माद में बदल गई। अकेले स्मोल्नी इंस्टीट्यूट से ही पहले छह महीनों के भीतर, हर दिन हज़ार किलो साहित्य निकल रहा था, जो कारों और ट्रेनों में लद कर देश भर में जाता। रूस पढ़ने की चीज़ों को ऐसे पी रहा था जैसे अतृप्त गर्म रेत पानी पीती है। और लोग दंतकथाएँ, मिथ्या इतिहास, सस्ती धार्मिक व्याख्याएँ या भ्रष्ट करने वाला पल्प फ़िक्शन नहीं पढ़ रहे थे – वे पढ़ रहे थे सामाजिक और आर्थिक सिद्धांत, दर्शन, टॉल्स्टॉय, गोगोल और गोर्की की रचनाएँ…

जॉन रीड, टेन डेज़ दैट शुक द वर्ल्ड, 19191

आम मेहनतकश लोगों की क्रांतियों ने समाज की बेड़ियाँ तोड़कर नई दुनिया बनाने पर ज़ोर दिया। ऐसी हर क्रांति, चाहे वह सीधे तौर पर समाजवादी हो या राष्ट्रीय मुक्ति से प्रेरित रही हो, समाज के पुराने तौर-तरीक़ों को हटा कर आपसी मेलजोल पर आधारित समतावादी समाज के निर्माण की आकांक्षा को दर्शाती है। बीसवीं सदी की ज़्यादातर क्रांतियाँ (मेक्सिको, 1910; चीन, 1911; ईरान, 1905-1911; रूस और मध्य एशिया, 1917) किसानों और मज़दूरों के नेतृत्व में हुई थीं, इसलिए यहां अक्सर ज़मींदारी के कठोर ढाँचे को बदलने का सवाल केंद्र में दिखाई देता है। जमींदारों की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए केवल अधिशेष भूमि वितरण जैसे भूमि सुधार के उपाय करना काफ़ी नहीं था; ज़मींदारों की ताक़त की जड़ें सामाजिक ढाँचे में जमी थीं, जिसे भगवान के नियम की तरह माना जाता था। किसानों का उत्पीड़न भूमि अभिलेखों, बही खातों, साहूकारों और पुजारियों के दस्तावेज़ों में दर्ज समझ में न आने वाली लिखाई के ज़रिए किया जाता था। किसानों को पढ़ने की क्षमता से वंचित रख कर उन्हें शक्तिहीन बनाया गया। लेकिन दुनिया के तमाम पिछड़े इलाक़ों में हुई क्रांतियाँ इस बात की गवाह हैं कि किसानों ने यह शक्ति हासिल कर समाज में बदलाव किए।

उन्नीसवीं सदी में इन देशों में व्याप्त बुर्जुआ संस्कृति में पढ़ना-लिखना व्यक्ति के वर्ग से जुड़ा हुआ था। हालाँकि व्यावसायिक प्रकाशन शुरू होने के साथ किताबों और समाचार पत्रों की उपलब्धता बढ़ी, लेकिन ये सब मुख्य रूप से पूंजीपति वर्ग और – कहीं कहीं – पेटी बुर्जुआ वर्ग में ही पढ़े जाते थे। मेक्सिको में राष्ट्रपति बेनिटो जुआरेज़ (1858-1872) ने स्कूली शिक्षा और प्रकाशन उद्योग का विस्तार तो किया लेकिन एक समाचार पत्र की लागत मज़दूरों (या किसानों) की औसत दैनिक आय से कहीं ज़्यादा थी।2 मेक्सिको व रूस जैसे देशों में तथा भारत व अफ्रीकी महाद्वीप जैसे उपनिवेशों में ज़मींदारों के शासन के चलते, मज़दूरों और किसानों के लिए साक्षर होने के बहुत कम अवसर मौजूद थे। इन देशों में ट्रेड यूनियन और कम्युनिस्ट आंदोलन शुरू होने के साथ उनके संगठनों से छपने वाले समाचार पत्र और पर्चे जब कार्यकर्ताओं द्वारा श्रमिकों और किसानों के बीच उपलब्ध कराए जाने लगे तब जाकर उन्होंने कुछ पढ़ना शुरू किया। सामूहिक शिक्षा का यह रूप साक्षरता का शुरुआती ज़रिया बना।

यह डोसियर, ‘पढ़ना, एक बेहतर इंसान बनना है’ ऐसे ही प्रयासों से प्रेरित है तथा मेक्सिको से लेकर भारत व चीन में चले लोकप्रिय साक्षरता अभियानों के उदाहरण पेश करता है। डोसियर का अंतिम भाग रेड बुक्स डे के बारे में है। इस कार्यक्रम की शुरुआत सबसे पहले भारत में हुई थी और अब इंटरनेशनल यूनियन ऑफ लेफ्ट पब्लिशर्स की पहल के ज़रिए यह कार्यक्रम पूरी दुनिया में आयोजित होता है।


वेलेंटिना एगुइरे (वेनेज़ुएला/यूटोपिक्स) द्वारा बनाया गया चित्र।

मेक्सिको रीड्स

1910 की मेक्सिकन क्रांति के समय, देश की 1.51 करोड़ आबादी में से केवल 22% लोग ही साक्षर थे।3 इसके बाद मेक्सिको में अशांति का एक दशक लंबा दौर चला। 1920 में अल्वारो ओब्रेगॉन ने राष्ट्रपति पद जीतने के बाद सुधार प्रक्रिया शुरू की, जिसमें कई सामूहिक सांस्कृतिक गतिविधियाँ शामिल थीं, जैसे ग्रामीण स्कूल खोले गए, शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया, सार्वजनिक पुस्तकालय तथा कला विद्यालय बनाए गए और नव-साक्षरों के लिए पर्चे व किताबें प्रकाशित की जाने लगीं। 1921 में, जोस वास्कोनसेलोस सार्वजनिक शिक्षा मंत्रालय के पहले सचिव बने और राष्ट्रपति ओब्रेगॉन ने उन्हें मेक्सिकन संस्कृति को लोकतांत्रिक बनाने का काम सौंपा।4 इसके लिए सरकार ने हज़ारों ग्रामीण विद्यालय और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान बनाए और ग्रामीण शिक्षकों का वेतन एक पेसो से बढ़ाकर तीन पेसो प्रतिदिन कर दिया।5 मुख्य प्रशिक्षण संस्थान चलाने की ज़िम्मेदारी वास्कोनसेलोस ने मेक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य एलेना टोरेस क्यूएलर को सौंपी , जिन्होंने इस सांस्कृतिक मिशन का विस्तार देश भर में किया और एक दशक के भीतर चार हज़ार से ज़्यादा शिक्षकों को प्रशिक्षित किया। टोरेस ने देश के हज़ारों बच्चों का पोषण सुनिश्चित करने के लिए 1921 में स्कूलों में निःशुल्क आहार की योजना शुरू की।6

वास्कोनसेलोस के नेतृत्व में सार्वजनिक शिक्षा मंत्रालय ने ग्रामीण इलाक़ों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास पर जोर दिया। इस दिशा में मंत्रालय ने पुस्तकालयों के निर्माण के लिए धन वितरित करने के साथ ग्रामीण पुस्तकालयों के लिए पचास पुस्तकों का सेट और शहरी पुस्तकालयों के लिए हज़ार किताबों का सेट तैयार किया। इन किताबों को मंत्रालय द्वारा प्रकाशित कर हर पुस्तकालय में पहुँचाया गया ताकि किसानों तक इनकी पहुँच बढ़े और उनके सांस्कृतिक जीवन व रोज़मर्रा के व्यावहारिक व किसानी से संबंधित ज्ञान में इज़ाफ़ा हो। ग्रीक के बेहतरीन साहित्य से लेकर मेक्सिको के इतिहास और घरेलू प्रबंधन तथा कृषि विज्ञान से संबंधित किताबें इन सेट्स में शामिल थीं।7 मंत्रालय ने शिक्षकों के लिए एक पत्रिका ‘एल मेस्ट्रो’ (शिक्षक), का प्रकाशन भी शुरू किया। इस पत्रिका में शिक्षण शैली और शिक्षा क्षेत्र में उठ रहे नए विचारों पर जानकारी के साथ पुस्तक समीक्षाएँ शामिल होती थीं। इस सरकारी पहल के अलावा 1934 में समाजशास्त्री व अर्थशास्त्री डैनियल कोसियो विलेगास ने नेशनल स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (जिसे अब नेशनल ऑटोनॉमस यूनिवर्सिटी ऑफ मेक्सिको के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के रूप में जाना जाता है) में आर्थिक संस्कृति कोष की स्थापना की। इसका उद्देश्य था अर्थशास्त्र के छात्रों को किताबें वितरित करना। पर आगे चल कर इस कोष के ज़रिए पूरे लैटिन अमेरिका में विस्तृत विषयों पर कई किताबें पहुँचाई गईं।

मेक्सिकन क्रांति ज्यो-ज्यों संस्थागत रूप लेती गई वहाँ का वर्ग चरित्र बदलने लगा। इसी के साथ संस्कृति को लोकतांत्रिक बनाने पर से ध्यान हटता गया। साक्षरता दर बढ़ी तो थी, लेकिन 70% के आसपास आकर रुक गई। सरकार की शैक्षिक व सार्वजनिक पुस्तकालय प्रणाली साक्षरता की गुणवत्ता में सुधार नहीं कर पा रही थी। दूसरी तरफ़ वित्तीय संकट बढ़ रहा था, जो कि 1982 में मेक्सिकन ऋण संकट के रूप में सामने आया। इस लगातार बढ़ते संकट के चलते शिक्षा और सार्वजनिक पुस्तकालयों की अनदेखी होने लगी थी। मेक्सिको के नीति निर्माता नवउदारवाद की आदतों में ढल रहे थे और समाज के भीतर मौजूद प्रगतिकामी धाराएँ साक्षरता की अनदेखी को रोकने का संघर्ष कर रही थीं। 1986 में पुस्तकालयों के महानिदेशालय ने लाइब्रेरी में ‘मेरी गर्मियों की छुट्टियां’ (मिस वैकेशनेस एन ला बिब्लियोटेका) नामक एक कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम के माध्यम से दस लाख बच्चों व युवाओं ने सार्वजनिक पुस्तकालयों द्वारा आयोजित विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में भाग लिया।8 मेक्सिको के लाइब्रेरी सिस्टम ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया और संस्कृति, संगीत और कथा-वाचन के कई उत्सव आयोजित किए। 1993 में पाठ्यक्रम में बदलाव के ज़रिए हुए शैक्षिक सुधारों की रोशनी में 1995 में सार्वजनिक शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय पठन कार्यक्रम (प्रोग्रामा नैशनल पैरा ला लेक्टुरा) शुरू किया। साल 2000 में इसका नाम बदल कर ‘पाठकों का देश बनाने की मुहिम’ (हैसिया अन पैस डे लेक्टोरेस) कर दिया गया। इस कार्यक्रम की एक ख़ासियत यह थी कि हर साल पचहत्तर किताबें चुनकर उनका प्रकाशन किया जाता और देश भर के स्कूल-पुस्तकालयों में उन्हें पहुँचाया जाता।

2008 में मेक्सिको के राष्ट्रीय पठन एवं पुस्तक संवर्धन कार्यक्रम (प्रोग्रामा डे फ़ोमेंटो पैरा एल लिब्रो वाई ला लेक्टुरा) ने साक्षरता को सामाजिक असमानता कम करने और ज्ञान तक पहुँच बढ़ाने के साधन के रूप में उपयोग करने के उद्देश्य से मेक्सिको रीड्स (मेक्सिको ली) परियोजना की स्थापना की। यह परियोजना मेक्सिको के साक्षरता अभियानों के अपने इतिहास और क्यूबाई क्रांति के वयस्क साक्षरता पाठ्यक्रम “यो, सी पुएदो (हाँ, मैं कर सकता हूँ)” से प्रेरित थी। क्यूबा में 1961 के साक्षरता कार्यक्रम से मिली सीख के आधार पर “यो, सी पुएदो” पाठ्यक्रम को 2001 में तैयार किया गया था और यह पाठ्यक्रम पूरे लैटिन अमेरिका के साक्षरता अभियानों में काफ़ी प्रभावशाली रहा है। 2009 में मेक्सिको के आर्थिक संस्कृति कोष के तत्कालीन निदेशक पाको इग्नासियो ताइबो-द्वितीय और लेखिका पालोमा सैज़ तेजेरो ने मिलकर एक ब्रिगेड (ब्रिगेड पैरा लीयर एन लिबर्टाड) की स्थापना की। इस ब्रिगेड का उद्देश्य था ऐसी किताबें प्रकाशित करना जिन्हें जनता निःशुल्क डाउनलोड कर सके या पुस्तक मेलों व सांस्कृतिक उत्सवों से बिना ख़र्च ले सके। ब्रिगेड का मिशन है पढ़ने के आनंद को सब के बीच पहुँचाना। इस विषय में पालोमा सैज़ तेजेरो कहती हैं:

पढ़ने से नए सपने और ज्ञान के नए स्रोत खुलते हैं, जो आम तौर पर किसी के पास पहले नहीं होते; पढ़ना आपमें आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करता है और आपको अपने जीवन में हर दिन खुद का बचाव करने के लिए हथियार देता है; पढ़ना आपको पहले से ज़्यादा सुंदर या अमीर नहीं बनाएगा; वे किताबें जो आपको बताती हैं कि अगर आप उन्हें पढ़ेंगे तो ऐसी चीजें होंगी, वे सफ़ेद झूठ हैं, ऐसा नहीं होता, आप पहले से अधिक बुद्धिमान भी नहीं बन जाएँगे; लेकिन पढ़ना आपको यह तय करने की स्पष्टता देता है कि आप क्या करना चाहते हैं और क्या नहीं करना चाहते हैं।9

ओथमान घाल्मी (मोरक्को/वर्कर्स डेमोक्रेटिक वे) द्वारा बनाया गया चित्र।

किताबों से मिला चीनियों को हौसला

1911 में किंग राजवंश के पतन से पहले चीन की अधिकांश आबादी – विशेष रूप से महिलाएँ – निरक्षर थी। 1900 में अनुमानित साक्षरता दर केवल 10-15% थी।10 समाज में व्याप्त उथल-पुथल के बीच किंग राजवंश के बाद भी साक्षरता में बहुत सुधार नहीं हुआ। 1949 की चीनी क्रांति के बाद यह तस्वीर बदली। 1950 के दशक में ही साक्षरता दर में बड़ी वृद्धि दिखाई देने लगी। 1959 आते तक 57% आबादी साक्षर हो गई थी।11 और 2021 आते तक, चीन में वयस्क साक्षरता दर बढ़कर 97% पर पहुँच गई। इस आँकड़े में चीन आज दुनिया में सबसे आगे है। पिछले सात दशकों में चीन ने साक्षरता में जिस तरह क़दम बढ़ाया है, उसे ‘शायद मानव इतिहास में सबसे बड़ा शैक्षिक प्रयास’ कहा गया।12

यह उपलब्धि 1949 की क्रांति के तुरंत बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) द्वारा लागू की गई परियोजनाओं का परिणाम है। इन परियोजनाओं के प्रेरणास्रोत थे- दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-मध्य चीन में क्रमशः जियांग्शी सोवियत (1931-1934) और यान’आन सोवियत (1936-1948) जैसे प्रयासों के तहत ग्रामीणों और वयस्कों के बीच साक्षरता बढ़ाने के लिए चले विभिन्न साक्षरता अभियान। ये अभियान सोवियत संघ के “लिकबेज़” व अन्य साक्षरता कार्यक्रमों पर आधारित थे। लिकबेज़ एक निरक्षरता उन्मूलन कार्यक्रम था, जिसके तहत प्रौढ़ साक्षरता कार्यक्रमों से जुड़े ज्ञान व समझ को व्यवस्थित किया गया और जिससे सभी सोवियत गणराज्यों में साक्षरता के क्षेत्र में उल्लेखनीय लाभ मिला था।13 1921 में वी. आई. लेनिन ने आर्थिक नीति पर आयोजित एक सम्मेलन में घोषणा की थी कि यदि निरक्षरता बरक़रार रही तो कोई प्रगति नहीं होगी। लेनिन ने कहा कि ‘साक्षरता के बिना कोई राजनीति नहीं हो सकती; इसके बिना अफ़वाहें, गप, परीकथाएँ और पूर्वाग्रह ही चल सकते हैं, राजनीति नहीं’।14

हालाँकि, नए चीन के साक्षरता अभियान से जुड़ी सभी गतिविधियों को यहाँ प्रस्तुत करना असंभव है, लेकिन उनमें से तीन गतिविधियों के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है:

  1. निरक्षरता को चीनी भाषा में 文盲 लिखा जाता है, जिसका मतलब है ‘टेक्स्ट ब्लाइंड’, यानी जो लिपि ना पढ़ सके, क्योंकि साक्षर माने जाने के लिए चीनी भाषा के अक्षरों को जानना ऐतिहासिक रूप से पहली शर्त माना गया है। एक लाख से भी ज़्यादा ऐसे अक्षरों से बनी चीनी भाषा समाज में पूर्ण साक्षरता प्राप्त करने की दिशा में बाधाएँ पैदा करती रही। 1955 में, क्रांतिकारी सरकार ने साक्षरता को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिए ‘चीनी लिखित भाषा सुधार समिति’ का गठन किया। इसके तहत साक्षरता का न्यूनतम मापदंड नए सिरे से तय किया गया, और ग्रामीण निवासियों के लिए 1500 अक्षरों तथा शहरी निवासियों व ग्रामीण नेताओं के लिए 2,000 अक्षरों की सूची तैयार की गई।15 इसके अलावा 1958 में, प्राथमिक विद्यालयों में पिनयिन लिपि (चीनी अक्षरों का रोमानीकरण) का इस्तेमाल शुरू कर चीनी अक्षरों के उपयोग को सरल बनाया गया।
  2. मेक्सिको और रूस की तरह चीनी क्रांति ने ग्रामीण साक्षरता और वयस्क साक्षरता दोनों के महत्त्व पर ज़ोर दिया: यदि अभिभावक लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी नहीं लेंगे तो बच्चे भी पढ़ने के आनंद से वंचित रहेंगे। लिन हांडा, जो चीन के निरक्षरता-विरोधी अभियान के प्रमुख नेताओं में से एक थे, ने 1955 में कहा था कि साक्षरता केवल अक्षरों की पहचान भर नहीं है; साक्षरता के अभियान का अंतिम लक्ष्य यह होना चाहिए कि किसान अपने जीवन को समृद्ध बना सकें और अपनी उत्पादकता बढ़ा सकें। इसके अगले वर्ष जारी की गई निरक्षरता-विरोधी उद्घोषणा के अनुसार ग्रामीण वयस्क साक्षरता मुहिम के दो सिद्धांत थे: ज्ञान को ‘व्यवहार में जोड़ना’ (लियानक्सी शिजी) और ‘लागू करने के उद्देश्य से सीखना’ (ज़ुए यी ज़ी योंग)।16
  3. चीनी क्रांति ने अपने साक्षरता कार्यक्रमों में सार्वजनिक पुस्तकालयों की भूमिका पर ज़ोर डाला। 1949 में चीन में केवल पचपन सार्वजनिक पुस्तकालय थे। लोकतंत्र के प्रसार के लिए, नए चीन ने किसानों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों और श्रमिकों के लिए कारख़ाना पुस्तकालयों का निर्माण किया। 1956 आते तक, चीन के गाँवों में 1,82,960 वाचनालय बन चुके थे, जहां विस्तृत विषयों पर पठन सामग्री उपलब्ध थी।17

इस तरह की परियोजनाओं ने चीनी समाज को निरक्षरता से उबरने में मदद की। आज चीन नई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे कि युवाओं में स्क्रीन और वीडियो गेम की लत। इस मामले में 2021 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार युवाओं के बीच ऑनलाइन वीडियो गेम के उपयोग को प्रति सप्ताह तीन घंटे तक सीमित करने का क़दम उठाएगी, जिसे वीडियो गेम उद्योग और अभिभावक दोनों नियंत्रित करेंगे। 2022 में राष्ट्रपति शी ने पठन-पाठन पर आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में पढ़ने को ज्ञान प्राप्त करने के साधन के अलावा, ज्ञान का विस्तार करने और सद्गुण सीखने का ज़रिया बताते हुए कहा कि:

प्राचीन काल से चीनी लोगों ने पढ़ने की वकालत की है और चीज़ों की प्रकृति का अध्ययन करके ज्ञान प्राप्त करने और विवेक का इस्तेमाल करते हुए व्यक्तित्व में सुधार करने पर जोर दिया है। पढ़ने की आदत चीनी लोगों में संयम की पारंपरिक भावना को मज़बूती देने, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

मैं पार्टी के सदस्यों और पदाधिकारियों से पठन-पाठन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हुए, सद्गुण व आदर्श का रास्ता अपनाने और अपनी क्षमताओं में सुधार करने का आह्वान करता हूँ। मुझे उम्मीद है कि हमारे सभी बच्चों को पढ़ने की आदत लगेगी, उन्हें पढ़ने में आनंद आएगा और वे स्वस्थ रूप में बड़े होंगे। मैं चाहता हूं कि हमारी जनता पढ़ने में रूचि ले और ऐसा माहौल बनाने में योगदान करे जहां हर कोई पढ़ना पसंद करता हो, सबके पास पढ़ने के लिए अच्छी किताबें हों और सबको पढ़कर कुछ सीखना आता हो।18

उसी साल शंघाई लाइब्रेरी की पूर्वी शाखा को जनता के लिए खोल दिया गया था। पुडोंग जिले में स्थित सेंचुरी पार्क के ठीक सामने इस लाइब्रेरी में हर दिन चहल-पहल रहती है, लेकिन रविवार की शाम देखने लायक होती है। ग्लोबल दक्षिण के कई ग़रीब देशों में उस समय बच्चों को सड़क पर खेलते हुए देखा जा सकता है। ग्लोबल उत्तर में शायद उस समय बच्चे घर के अंदर स्क्रीन के सामने चिपके होते होंगे। लेकिन शंघाई में बच्चे किताबों के ढेर उठाकर, अपने पापा-मम्मी, या दादा-दादी की गोद में बैठकर, उन्हें एक-एक कर उत्साह से पढ़ते हैं।

लाइब्रेरी के एक छोटे पर महत्त्वपूर्ण हिस्से में मार्क्सवादी साहित्य रखा है। इस हिस्से में रखी किताबें लेखकों के आधार पर लगाई गई हैं: कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स, माओ ज़ेडोंग, डेंग शियाओपिंग तथा शी जिनपिंग। लाइब्रेरी का सबसे प्यारा हिस्सा बच्चों का सेक्शन है, जिसमें रंग-बिरंगी किताबों की क़तारें लगी हुई हैं, और पास के सोफे, टेबल आप में बैठकर पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करते हैं। मानवाधिकारों पर 1948 की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 26 के अनुसार हर इंसान को पढ़ने का अधिकार प्राप्त है। यह पुस्कालय वो जगह है जहाँ लोग -चाहे वयस्क हों या बच्चे– अपने पढ़ने के अधिकार का प्रयोग करने आते हैं। इस परंपरा में पठन-पाठन एक सामाजिक गतिविधि है जो इंसानों में, और ख़ासकर युवाओं में सहानुभूति और संज्ञानात्मक क्षमता विकसित करने में मदद करती है और लोगों को उनके इतिहास, संस्कृति, भाषा और पूर्वजों से जोड़ती है।

जुनैना मुहम्मद (भारत/यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स) द्वारा बनाया गया चित्र।

केरल में किताबों की भीनी महक

लगभग 3.34 करोड़ की आबादी वाले केरल राज्य में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की सरकार है, जिसमें मुख्य पार्टी भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) है।19 आप केरल के किसी भी क़स्बे या शहर में जाइए, आपको निश्चित रूप से वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालय दिखाई देंगे, जिनमें लोग साथ लेकर जाने के लिए किताबें ढूँढ़ रहे होंगे या टेबल पर बैठकर किताबें पढ़ रहे होंगे। केरल में नौ हज़ार से ज़्यादा सार्वजनिक पुस्तकालय हैं। यहाँ कम्युनिस्ट आंदोलन की सक्रिय उपस्थिति के कारण पढ़ने की एक स्थायी परंपरा रही है।

1920 के दशक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन के दौरान साक्षरता का मुद्दा उपनिवेशवाद-विरोधी भारतीय राष्ट्रवाद के एजेंडे का हिस्सा था। सार्वजनिक पुस्तकालयों को साक्षरता अभियान का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता था। पुस्तकालय भारत के उन राज्यों में विकास एजेंडे का अहम हिस्सा पहले से ही बन चुके थे जो उदार शासक के अधीन थे (जैसे बड़ौदा, जिसे अब वडोदरा के नाम से जाना जाता है)। भारत के लाइब्रेरी आंदोलन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत अधिकतर जगहों पर दोस्तों के किसी समूह द्वारा अपनी पुस्तकों और समाचार पत्रों को इकट्ठा कर अपने गाँव-क़स्बे में छोटा सा पुस्तकालय शुरू करने के साथ हुई थी। उदाहरण के लिए के.एन. पणिक्कर – जिन्हें केरल के लाइब्रेरी आंदोलन का जनक माना जाता है- बताते हैं कि समाचार पत्रों तक केवल अमीर लोगों की पहुँच थी। पर जब वह ख़ुद किसी तरह से एक समाचार पत्र की सदस्यता लेने में सफल हो गए, तो उनके घर पर आठ-दस लोग इकट्ठा होने लगे जो उनसे समाचार पढ़ कर सुनाने का आग्रह करते। उन्होंने कहा, ‘जब कभी अख़बार नहीं आता था, तो मैं उन्हें महान नायकों की जीवनियाँ पढ़कर सुनाता था’। वह आगे कहते हैं कि ‘मेरे एक दोस्त ने दो समाचार पत्र और लगवा लिए थे और उसके पास कुछ पुस्तकें भी थीं। इन पुस्तकों और समाचार पत्रों को एक छोटे से बिना किराए वाले कमरे में इकट्ठा कर हमने एक छोटा पुस्तकालय शुरू किया था’।20 इस तरह लाइब्रेरी शुरू करने से जुड़ी हज़ारों कहानियाँ हैं। ऐसे कई पुस्तकालयों को बाद में राज्य पुस्तकालय प्रणाली में शामिल कर लिया गया जिससे उन पुस्तकालयों को संसाधन मिले और उनका दायरा भी बढ़ा। इसी तरह के छोटे-छोटे पुस्तकालयों के साथ केरल में पुस्तकालय आंदोलन की शुरुआत हुई थी। भारत के अन्य राज्यों में भी लाइब्रेरी आंदोलन चले पर आज भी इसका केंद्र केरल ही है। और आज भी ऐसे छोटे पुस्तकालय इस आंदोलन की जान हैं।

इसका बेहतरीन उदाहरण हैं कन्नूर ज़िले के पुस्तकालय। केरल में सबसे ज़्यादा पुस्तकालय कन्नूर में हैं। लगभग 29,000 लोगों की आबादी वाले गाँव मायिल की ग्राम पंचायत, कन्नूर ज़िले की 93 स्थानीय सरकारों में से एक है। इस इलाक़े में केरल राज्य पुस्तकालय परिषद से संबद्ध 34 पुस्तकालय हैं। इसका मतलब है कि हर वर्ग किलोमीटर में लगभग एक पुस्तकालय है, जिनमें से प्रत्येक पुस्तकालय लगभग 872 लोगों को सेवा प्रदान करने में सक्षम है। दुनिया के किसी भी हिस्से में पुस्तकालयों का इस कदर असाधारण घनत्व देखने को नहीं मिलेगा। ये सभी पुस्तकालय राज्य सरकार द्वारा वित्त-पोषित हैं और सभी में कंप्यूटर व एकीकृत कैटलॉग की सुविधा के साथ-साथ प्रशिक्षित लाइब्रेरियन हैं, जो आसपास के समुदाय के लिए बेहतरीन संसाधन की तरह हैं।

इनमें से हरेक पुस्तकालय की अपनी कहानी है, और कई पुस्तकालयों का नाम तो किसी राष्ट्रवादी या कम्युनिस्ट नेता के नाम पर रखा गया है। कन्नूर में मौजूद कुछ पुस्तकालयों के बारे में जानें:

  • मायिल में स्थित वेलम पब्लिक रीडिंग रूम हॉल (वेलम पोथुजना वायनशाला):21 1934 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य ईश्वरन नंबूथिरी ग्रामीणों के बीच हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए मायिल पंचायत (ग्राम परिषद) आए थे। उन्होंने अपने स्कूल के लिए एक छोटा सा शेड बनवाया, जो बाद में एक पुस्तकालय बन गया और जिसमें आज 18,000 पुस्तकें हैं।
  • थालास्सेरी में स्थित पराल पब्लिक रीडिंग रूम हॉल (पराल पोथुजना वायनशाला पब्लिक लाइब्रेरी): 1934 में कौमुदी नाम की एक सोलह वर्षीय लड़की ने ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ जारी स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान करने के लिए गांधी जी को अपने सोने के आभूषण दे दिए थे। सोने से मिले पैसे का इस्तेमाल लाइब्रेरी के निर्माण के लिए किया गया, जिसमें अब ज़िले के इतिहास का अभिलेखागार भी शामिल है।
  • कंदक्कई में स्थित एस.जे.एम. रीडिंग रूम हॉल एवं देशीय राष्ट्रीय पुस्तकालय (एस.जे.एम. वायनशाला और देशीय ग्रंथालयम): केरल में उन्नीसवीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों के दौरान श्री जथावेद गुरु नामक एक व्यक्ति कंदक्कई पहुँचे। उन्होंने वहाँ के ग्रामीणों को जातिगत पदानुक्रम और भेदभाव से लड़ने के लिए प्रेरित किया। इस संघर्ष को गति देने के लिए गुरु ने एक छोटी सी लाइब्रेरी की स्थापना की, जहां आज दस हज़ार से अधिक पुस्तकें मौजूद हैं।
  • पिनाराई में स्थित सी. माधवन मेमोरियल रीडिंग रूम हॉल (सी. माधवन स्मारक वायनशाला): भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का पहला सम्मेलन 1939 में केरल के पिनाराई में गुप्त रूप से आयोजित किया गया था। उसके दो दशक बाद प्रगतिशील युवा संगठन श्री श्री नारायण आश्रिता युवाजन संघम ने एक सामाजिक कार्यकर्ता के नाम पर सी. माधवन मेमोरियल लाइब्रेरी शुरू की। इस पुस्तकालय में स्थानीय स्तर पर डोनेशन सिस्टम के ज़रिए हर साल हज़ारों किताबें इकट्ठी की जाती हैं। सामुदायिक भावना का विस्तार इस कदर हुआ है कि आज जब भी इस क्षेत्र में नया घर बनता है, तो लाइब्रेरी के नाम पर उसके पास कोई फलदार पेड़ लगाया जाता है।
  • एज़होम स्थित कुलप्पुरम रीडिंग रूम हॉल और लाइब्रेरी (कुलप्पुरम वायनशाला और ग्रंथालयम): 1950 के दशक में एज़होम गाँव के बुनकरों ने यंग मेन्स क्लब के नाम से एक रीडिंग रूम शुरू किया। वह रीडिंग रूम अब तीन मंज़िल का जलवायु-नियंत्रित पुस्तकालय बन चुका है, जिसमें सार्वजनिक आयोजनों के लिए जगह है और एक बड़ा खेल का मैदान तथा शाक वाटिका (वेजिटेबल गार्डेन) भी है। यह पुस्तकालय कई तरह की सामाजिक सेवाएँ भी प्रदान करता है, जैसे पुस्तक वितरण और महिलाओं के लिए मोटरसाइकिल ड्राइविंग का कोर्स। इस कोर्स से अब तक सौ से अधिक महिलाएँ ड्राइविंग सीख कर लाइसेंस प्राप्त करने में सफल रही हैं। 2008 में, पुस्तकालय ने कन्नूर ज़िले के परियारम में स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के स्वास्थ्य-कर्मियों के साथ मिलकर गांव के 700 घरों का दौरा किया था। डॉक्टरों व पुस्तकालयकर्मियों ने पूरे गाँव से स्वास्थ्य संबंधी जानकारी इकट्ठा की और नगरपालिका की विभिन्न सेवाओं के बारे में ग्रामीण जनता को जानकारी दी।
  • नेशनल होमलैंड अपलिफ्टमेंट रीडिंग रूम हॉल और पब्लिक लाइब्रेरी (देशोद्धारना वायनशाला एवं पब्लिक लाइब्रेरी) तथा चला स्थित देशोद्धारना वायनशाला: खजूर के बाग के किनारे स्थित इस छोटे पुस्तकालय की स्थापना 1960 के दशक में किसानों ने की थी। ये किसान बीड़ी बनाने, बुनकरी जैसे दिहाड़ी मज़दूरी के काम करते थे। किसानों ने अपने पैसे जमा करके पठन-पाठन व चिंतन के लिए एक जगह बनाई। आज, इस लाइब्रेरी में क़रीब 9,000 किताबें हैं।
  • कावुम्बई में स्थित थलियान रमन नंबियार मेमोरियल पब्लिक रीडिंग रूम हॉल (थलियान रमन नंबियार मेमोरियल पब्लिक लाइब्रेरी स्मारक पोथुजना वायनशाला): किसान नेता थलियान रमन को 1946 में कावुम्बई के किसान विद्रोह के दौरान गिरफ़्तार किया गया था और चार साल बाद सलेम जेल में पुलिस द्वारा किए गए नरसंहार में उनकी हत्या हो गई। 1962 में स्थानीय किसानों ने उनके सम्मान में यह लाइब्रेरी बनवाई।
  • करिवेल्लूर स्थित एवन-वन लाइब्रेरी: एवन-वन क्लब के रूप में शुरू हुई इस लाइब्रेरी को 1973 के बाद से एवन लाइब्रेरी के नाम से जाना जाता है। इस लाइब्रेरी में आज 17,574 किताबें हैं और 619 सदस्य हैं। यह लाइब्रेरी बच्चों के लिए रीडिंग की गतिविधियाँ आयोजित करती है, समय-समय पर फिल्म स्क्रीनिंग आयोजित करती है और बुजुर्गों को उनके घरों तक किताबें पहुँचाती है। लाइब्रेरी के स्थानीय इतिहास समूह के साथ जुड़-कर दो स्थानीय शोधकर्ताओं ने इतिहास पर अपने शोध-ग्रंथ तैयार किए हैं।

महामारी के दौरान पुस्तकालय आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने देख-रेख कार्य में और छात्रों के लिए शिक्षा जारी रखने में महत्त्वपूर्ण मदद पहुँचाई। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण नेटवर्क परियोजना है, जो कन्नूर ज़िले के आदिवासी क्षेत्रों में सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुई थी। इस परियोजना की शुरुआत सीपीआई (एम) नेता और राज्यसभा सदस्य डॉ. वी. शिवदासन ने की थी और जल्द ही यह परियोजना पीपुल्स मिशन फॉर सोशल डेवलपमेंट (पीएमएसडी) ट्रस्ट का एक अभिन्न अंग बन गई। यह ट्रस्ट कन्नूर ज़िला पुस्तकालय परिषद के तहत काम करती है, और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन इसके मुख्य संरक्षक हैं तथा शिवदासन अध्यक्ष हैं। पीएमएसडी का संकल्प है हर वार्ड में एक पुस्तकालय स्थापित करने में सहयोग करना। इसी के साथ पीएमएसडी ने कन्नूर विश्वविद्यालय और केरल की लाइब्रेरी काउंसिल के साथ मिलकर जनवरी 2023 में पहली भारतीय लाइब्रेरी कांग्रेस की मेजबानी की, जिसमें पाँच लाख लोगों ने भाग लिया था। कांग्रेस की तैयारी के लिए आयोजकों ने विभिन्न विषयों पर 1,500 सेमिनार आयोजित किए। भाग लेने वालों में 3,000 लाइब्रेरियन के अलावा स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के कर्मचारी, सरकारी अधिकारी, सहकारी कार्यकर्ता, छात्र, शिक्षक और अन्य लोग शामिल थे।

भारतीय लाइब्रेरी कांग्रेस विभिन्न राज्यों में आयोजित होने वाला एक वार्षिक कार्यक्रम बन चुका है। इसका उद्देश्य निम्नलिखित विचारों को बढ़ावा देना है:

  1.  अधिक से अधिक स्थानों पर पुस्तकालय शुरू किए जाने चाहिए, जहां पुस्तकों के भंडार के साथ यथासंभव उन्नत तकनीक भी उपलब्ध हो।
  2. पुस्तकालय केवल शहरी क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाक़ों में भी स्थापित किए जाने चाहिए, जैसे पूर्वोत्तर केरल में वायनाड के पहाड़ी इलाके में।
  3. लोगों के लिए पुस्तकालय महत्त्वपूर्ण और सक्रिय सार्वजनिक स्थान बनें, जहां सांस्कृतिक विकास के पर्याप्त मौक़े मिलने के साथ फिल्म स्क्रीनिंग, खेल, कला मेले और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसी गतिविधियों के आयोजन हो। पुस्तकालयों के आसपास स्वास्थ्य केंद्र और विज्ञान कक्षाएं स्थापित की जानी चाहिए।22

लाइब्रेरी आंदोलन कामकाजी लोगों की मेहनत से चलता है। इनमें से एक हैं पय्यन्नूर अन्नूर के राजन वी.पी., जो छठी कक्षा तक पढ़े थे और एक बीड़ी मजदूर थे। जब राजन ने छोटी उम्र में एक बीड़ी फैक्ट्री में काम करना शुरू किया तो वे वहाँ के मज़दूरों की पढ़ने की आदत से खूब प्रभावित हुए। लंच ब्रेक से पहले मज़दूर एक-दूसरे को दैनिक समाचार पढ़कर सुनाते और लंच के बाद में कोई उपन्यास। ऐसा क्यूबा की सिगार फैक्टरियों में भी देखा जा सकता है। इस तरह रोज़ अख़बार और उपन्यास पढ़ते हुए राजन को आगे पढ़ने की प्रेरणा मिली, जिससे उन्हें अपने घर के पास स्थित एक सहकारी बैंक में क्लर्क के रूप में नई नौकरी मिल गई। 2008 तक वे बैंक के प्रबंधक रहे। उस वर्ष, राजन ने पीपुल्स लाइब्रेरी और रीडिंग रूम की स्थापना की, जो अब शहर में सांस्कृतिक जीवन का केंद्र बन गया है।

लाइब्रेरी आंदोलन की एक और अनूठी नेता हैं साठ साल की राधा वी.पी.। उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की है और एक बीड़ी मजदूर हैं। छोटी उम्र से ही उन्हें अपने घर के कामकाज की ज़िम्मेदारी उठानी पढ़ी। उन्होंने बचपन में ही सीपीआई (एम) की साप्ताहिक पत्रिका देशाभिमानी को पढ़ना शुरू कर दिया था। वह पत्रिका में शामिल कहानियों व कविताओं पर टिप्पणी करते हुए संपादकों को पत्र भी लिखतीं। 2002 में राधा ‘जवाहर मूविंग लाइब्रेरी’ से जुड़ीं। यह लाइब्रेरी 2001 में शुरू हुई थी, और पाठकों, ख़ास तौर पर महिलाओं और बुज़ुर्गों के घरों तक किताबें पहुँचाती है। काम के बाद राधा एक हाथ में लाइब्रेरी रजिस्टर और कंधे पर किताबों से भरा बैग लेकर घर-घर किताबें देने जाने लगीं। जल्द ही उन्हें इस रूप में आते देखना स्थानीय लोगों के लिए ख़ुशी का सबब बन गया। 2018 में उन्होंने दसवीं कक्षा पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए ज़रूरी राज्य परीक्षा पास की। अपनी पढ़ाई और काम के बीच भी लाइब्रेरी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कभी कम नहीं हुई। वो कहती हैं कि, ‘मुझे यह काम करना अच्छा लगता है। मुझे कभी भी अपना बैग भारी नहीं लगा, क्योंकि किताबों की भीनी महक से मुझे हमेशा बहुत ख़ुशी मिलती रही।’23

राजन और राधा जैसे कामकाजी लोग ही केरल के लाइब्रेरी आंदोलन को सुचारू रूप से चलाने में लगने वाली इंसानी मेहनत का प्रतीक हैं।

साल्वाटोर कार्लियो (इटली/पोटेरे अल पोपोलो!) द्वारा बनाया गया चित्र।

जापान से चाँद तक मनाएँगे रेड बुक्स डे

21 फरवरी 2019 को सीपीआई(एम) से जुड़े प्रकाशकों के समूह ‘इंडियन सोसाइटी फॉर लेफ्ट पब्लिशर्स’ ने एक अभियान शुरू किया था, जिसे अब रेड बुक्स डे के नाम से जाना जाने लगा है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन की 171वीं वर्षगांठ और अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य था धर्मनिरपेक्ष, सांस्कृतिक और समाजवादी सिद्धांतों के अनुरूप सामूहिक जीवन का विकास। दुनिया भर के प्रकाशकों का ध्यान रेड बुक्स डे की तरफ़ गया। और इसके अगले साल, 2020 में दक्षिण कोरिया से क्यूबा तक 30,000 से अधिक लोगों ने इसे मनाया।24 2024 में रेड बुक्स डे के तहत इंडोनेशिया से लेकर चिली तक आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में दस लाख से अधिक लोगों ने शिरकत की। अकेले केरल में ही विभिन्न शहरों, ज़िलों में आयोजित गतिविधियों में पाँच लाख लोग शामिल रहे थे।25

2020 में पहली बार यह उत्सव भारत से बाहर मनाया गया था। उस दिन तमिलनाडु में किसान संगठनों और ट्रेड यूनियनों के सदस्यों ने अपने-अपने गाँवों की सड़कों पर प्लास्टिक की कुर्सियों का घेरा बनाकर कम्युनिस्ट घोषणापत्र पर चर्चा की। ब्राज़ील के भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (एमएसटी) की बस्तियों में कार्निवल उत्सव के दौरान आंदोलन के सदस्य एक साथ बैठे और बारी-बारी से इसे जोर-जोर से पढ़ा। नेपाल के पहाड़ों में कृषि श्रमिक संघ ने अपने संगठन द्वारा प्रकाशित क्रांतिकारी किताबों पर चर्चा की। तंजानिया में भूमिहीन किसानों ने इकट्ठे होकर साक्षरता के महत्त्व के बारे में बात की।

2024 में क्यूबा में दस दिवसीय हवाना पुस्तक मेले के दौरान 21 फरवरी को रेड बुक्स डे के उपलक्ष्य में विशेष गतिविधियाँ आयोजित की गईं। केरल में, चेम्म पार्वती ने रेड बुक्स डे का एक वीडियो जारी किया, जिसमें वह त्रिवेंद्रम के बाज़ारों और कारख़ानों में ‘इंटरनैशनल’ के फ्रेंच संस्करण पर नृत्य करती हुई दिखाई देती हैं। वीडियो के अंत में चेम्म पार्वती समंदर के किनारे खड़ी दिखती हैं, उनके हाथ में लाल झंडा है और उनके पीछे क्षितिज पर लाल सूरज। इस वीडियो के साथ दुनिया भर से कलाकारों ने अपने पोस्टर जारी किए थे, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग अपने शहर-क़स्बे-गाँव में इस दिन को मनाने के लिए रीडिंग सेशन या अन्य गतिविधियाँ आयोजित करने की प्रेरणा ले सकें।

2020 में रेड बुक्स डे के पहले अंतर्राष्ट्रीय उत्सव की तैयारी के लिए इंडियन सोसाइटी ऑफ़ लेफ्ट पब्लिशर्स ने दुनिया भर के प्रकाशकों के साथ बैठकें की। इन बैठकों के परिणामस्वरूप इंटरनेशनल यूनियन ऑफ़ लेफ्ट पब्लिशर्स (आईयूएलपी) का गठन हुआ, जिसमें अब पैंतालीस प्रकाशक शामिल हैं।26 आईयूएलपी का गठन केवल रेड बुक्स डे मनाने के लिए नहीं हुआ था, बल्कि वामपंथी प्रकाशकों को दक्षिणपंथी हमलों से बचाने और तर्कसंगत व समाजवादी विचारों को आगे बढ़ाने के मक़सद से एक मंच प्रदान करने हेतु किया गया था। आईयूएलपी ने रेड बुक्स डे के ही दिन कई भाषाओं में संयुक्त पुस्तकें जारी की हैं। इनमें चे ग्वेरा के लेखों का संकलन और पैरिस कम्यून आदि किताबें शामिल हैं, जिन्हें रोमानियाई से लेकर इंडोनेशियाई भाषा में एक ही दिन प्रकाशित किया गया। इसके साथ ही लेखकों या प्रकाशकों पर जब हमले हुए तो आईयूएलपी ने उनके बचाव में संयुक्त बयान जारी किए हैं।27

लाइब्रेरी आंदोलन द्वारा केरल के विभिन्न सार्वजनिक पुस्तकालयों में हर साल रेड बुक्स डे कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। गीत व नाटक इन कार्यक्रमों का अहम हिस्सा हैं, जिनसे लाखों लोग तर्कसंगतता और समाजवाद के रास्ते पर चलने की नई ऊर्जा हासिल करते हैं।

रेड बुक्स डे, क्रांतिकारी किताबों के लेखन-प्रकाशन और पढ़ने के अधिकार की रक्षा के लिए तथा तर्क पर हमला करने वाले मौजूदा रूढ़िवादी विचारों से लड़ने के लिए एक व्यापक सांस्कृतिक संघर्ष का हिस्सा है। उम्मीद है कि यह दिन आईयूएलपी ही नहीं बल्कि दुनिया भर की प्रगतिशील ताक़तों के कैलेंडर में एक अहम तारीख़ बनेगा। रेड बुक्स डे की पहचान बढ़ने और प्रगतिशील ताक़तों के कैलेंडर पर इसे जगह मिलने के साथ हम देख रहे हैं कि आईयूएलपी और वामपंथी धाराओं के दायरे से बाहर के लोग व संगठन भी रेड बुक्स डे को अपना रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इस दशक के अंत तक दुनिया भर में एक करोड़ से भी ज़्यादा लोग रेड बुक्स डे में हिस्सा लेंगे।


1930 के दशक में उत्तरी काकेशस में स्थित जॉर्जीवस्की के सामूहिक खेतों से महिलाओं ने सोवियत सरकार को एक पत्र लिखा था। उन्होंने लिखा था, ‘हमें बड़े खेतों को ठीक से चलाने के लिए ज़रूर पढ़ाई करनी चाहिए। हम पूरी सर्दी पढ़ाई करना चाहती हैं; पढ़ना-लिखना सीखना चाहती हैं; राजनीतिक ज्ञान और वैज्ञानिक कृषि के मूल सिद्धांतों का अध्ययन करना चाहती हैं। हमें और किताबें व नोटबुक दीजिए, क्योंकि महिलाओं में पढ़ाई की इच्छा बहुत ज़्यादा है।’ इन महिलाओं में से एक, फ़ेकला गोलोवचेंको (जो लगभग पचास साल की थीं) ने लिखा था, ‘अगर मैं पर्याप्त रूप से शिक्षित नहीं हुई, तो मैं अपनी ब्रिगेड को संभाल नहीं पाऊँगी।’ महिलाओं ने लिखा, ‘शिक्षा अब विलास की चीज़ नहीं है। अब यह एक अहम ज़रूरत है, जैसे प्यासे आदमी के लिए पानी ज़रूरी होता है’।28

जॉर्जीवस्की की महिलाओं के शब्द मेक्सिको की ब्रिगेड (ब्रिगेड पैरा लीयर एन लिबर्टाड) की संस्थापक पालोमा सैज़ तेजेरो के शब्दों से मिलते हैं, जिन्होंने कहा था:

पढ़ने वाले लोगों का नज़रिया आलोचनात्मक होता है, वे महान आदर्शों की हिमायत करते हैं। अपने इतिहास को जानने वाले और उसे अपनी विरासत मानने वाले निश्चय ही अपनी जड़ों पर गर्व करेंगे। पढ़ना हमें सामाजिक बनाता है; हमारे अनुभवों और सूचनाओं को समृद्ध करता है। किताबें हमें ख़ुद को और हमारे इतिहास को समझने की दृष्टि देती हैं; किताबें हमारी चेतना को हमारे अतीत और वर्तमान की समझ से आगे बढ़ाती हैं। पढ़ना हमें बेहतर नागरिक बनाता है। किताबों की ही बदौलत हम असंभव पर विश्वास करना, प्रत्यक्ष पर अविश्वास करना, नागरिक के रूप में अपने अधिकारों की मांग करना, और अपने कर्त्तव्यों को पूरा करना सीखते हैं। पढ़ना इंसान के व्यक्तिगत और सामाजिक विकास को प्रभावित करता है; इसके बिना, कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता।


इंग्रिड नेवेस (ब्राजील/ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान) द्वारा बनाया गया चित्र।

Notes

1 John Reed, Ten Days That Shook the World (New Delhi: LeftWord Books, 2017), 53.

2 Omar Martínez Legorreta, Modernisation and Revolution in Mexico: A Comparative Approach (Tokyo: United Nations University, 1989), 71.

3 James Presley, ‘Mexican Views on Rural Education 1900–1910’, The Americas 20, no. 1 (July 1963): 64–71.

4 Jacqueline Paola Ayala Zamora, La obra educativa de José Vasconcelos [The Educational Work of José Vasconcelos] (Mexico City: Universidad Pedagógica Nacional, 2005).

5 José Vasconcelos, ‘Education in Mexico: Present Day Tendencies’, Bulletin of the Pan American Union 56, no. 3 (January–June 1923): 230–245.

6 Patience Alexandra Schell, Church and State Education in Revolutionary Mexico City (Tuscon: University of Arizona Press, 2003); Lloyd Hughes, Las misiones culturales mexicanas y su programa [Mexican Cultural Missions and their Programme] (Paris: UNESCO, 1950); Martha Eva Rocha Islas, Los rostros de la rebeldía. Veteranas de la Revolución Mexicana, 1910-1939 [The Faces of Rebellion: Women Veterans of the Mexican Revolution, (1910–1939)] (Mexico City: Secretaría de Cultura, 2016); Paco Ignacio Taibo, Bolcheviques: historia narrativa de los orígenes del comunismo en México 1919–1925 [The Bolsheviks: A Narrative History of the Origins of Communism in Mexico 1919–1925] (Mexico City: Joaquín Mortiz, 1986).

7 Louise Schoenhals, ‘Mexico Experiments in Rural and Primary Education, 1921–1930’, Hispanic American Historical Review 44, no. 1 (1 February 1964): 22–43.

8 Elsa Margarita Ramírez Leyva, ‘Mexico Reads: National Program for the Promotion of Reading and the Book’ (paper presented at the World Library and Information Congress: 77th IFLA General Conference and Assembly, San Juan, Puerto Rico, 13–14 August 2011).

9 Ángel Vargas, ‘“Leer te hace mucho más crítico y te da armas para defenderte todos los días”: Paloma Saiz’ [‘Reading Makes You Much More Critical and Gives You Weapons to Defend Yourself Every Day’: Paloma Saiz], La Jornada, 18 July 2024, https://www.jornada.com.mx/2024/07/18/cultura/a04n2cul.

10 ‘“The Single Greatest Educational Effort in Human History”’, Language Magazine (blog), 8 November 2024, https://www.languagemagazine.com/the-single-greatest-educational-effort-in-human-history/.

11 Wang Yianwei and Li Jiyuan, Reform in Literacy Education in China (Geneva: UNESCO, International Bureau of Education, 1990).

12 Glen Peterson, The Power of Words: Literacy and Revolution in South China, 1949–1995 (Vancouver: University of British Columbia Press, 1997), 3.

13इस डोसियर में हमने सोवियत संघ के साक्षरता अभियानों पर विस्तार से चर्चा नहीं की है, हालांकि उनकी उपलब्धि अपने आप में उल्लेखनीय रही थी। सोवियत संघ के साक्षरता के आँकड़े पूरी कहानी नहीं बता सकते, उनसे केवल यह पता चलता है कि सोवियत संघ निरक्षरता को किस तेज़ी से हराने में सक्षम रहा था। सोवियत संघ ने ज़ार साम्राज्य के पुराने ग्रामीण इलाकों में झोपड़ियाँ (इज़बी-चिटल’नी) और खुले मैदानों में टेंट (युर्ट) लगाए, जहां चिकित्सा कर्मियों के साथ साथ और साक्षरता कर्मी नियुक्त किए गए। यह कहानी यहाँ पूरी तरह से बताई नहीं गई है।

14 V. I. Lenin, ‘The New Economic Policy’, Lenin Collected Works, vol. 33, (Moscow: Progress Publishers, 1965), 78.

15 Heidi Ross, with contributions from Jingjing Lou, Lijing Yang, Olga Rybakova, and Phoebe Wakhunga, China Country Study, background paper commissioned for the Education for All Global Monitoring Report 2006: Literacy for Life (2005), UNESCO, 2006/ED/EFA/MRT/PI/85.

16 Peterson, The Power of Words, 85.

17 Priscilla C. Yu, ‘Leaning to One Side: The Impact of the Cold War on Chinese Library Collections’, Libraries and Culture 36, no. 1 (2001): 256; Zhixian Yi, ‘History of Library Developments in China’ (paper presented at the ‘Future Libraries: Infinite Possibilities’, session 164, Library History Special Interest Group, International Federation of Library Associations and Institutions Conference, Singapore, 15–23 August 2013), https://library.ifla.org/id/eprint/143/1/164-yi-en.pdf.

18 Xi Jinping, ‘Full Text of Xi Jinping’s Congratulatory Letter to the First National Conference on Reading’, China Daily, 23 April 2022, https://www.chinadaily.com.cn/a/202204/23/WS6263ad99a310fd2b29e58dbf.html.

19 State Planning Board, Government of Kerala, ‘Population and the Macro Economy’, in Economic Review 2017 (Thiruvananthapuram: Government of Kerala, January 2018), accessed 12 January 2025, https://spb.kerala.gov.in/economic-review/ER2017/web_e/ch11.php?id=1&ch=11.

20 Lawrence Liang and Aditya Gupta, The Public Library Movement in India: Bedrock of Democracy and Freedom (Public Resource, 2024), 54–55.

21मलयालम भाषा में ग्रंथालयम का अर्थ है पुस्तकालय, जबकि वायनशाला का अर्थ है वाचनालय, एक ऐसा स्थान जहाँ लोग बैठकर पढ़ सकते हैं। कुछ वायनशालाएँ छोटे कमरे के बराबर हैं, जहां कुछ अख़बार और पत्रिकाएँ हैं लेकिन बहुत कम किताबें हैं। हालाँकि, कभी-कभी वायनशाला का उपयोग पुस्तकालय के संदर्भ में भी किया जाता है। इस सूची में शामिल सभी लाइब्रेरियों में पुस्तकों के साथ बैठ कर पढ़ने की भी जगह है, जैसा कि केरल के अधिकांश पुस्तकालयों में पाया जाता है। ब्रैकिट में दिए गए नाम पुस्तकालयों के आधिकारिक नाम हैं।

22 P. Mohandas and Manu M. R., eds., People Own Spaces: Emergence of Libraries in Kerala (Kannur: Indian Library Congress, 2024).

23 M. A. Rajeev Kumar, ‘Bag Full of Joy and Wisdom’, The New Sunday Express, 26 June 2022.

24 ‘Red Books Day Celebrated on Each Continent’, Tricontinental: Institute for Social Research, 30 April 2020, https://thetricontinental.org/booklet-red-books-day/.

25 Nitheesh Narayanan, Sudhanva Deshpande, and Vijay Prashad, ‘Red Books Day 2024’, Peoples Democracy, 3 March 2024, https://peoplesdemocracy.in/2024/0303_pd/red-books-day-2024.

26 International Union of Left Publishers, ‘Who We Are’, https://iulp.org/about.

27 For a full list, see ‘Books’, Tricontinental: Institute for Social Research, https://thetricontinental.org/books/.

28 Georgii Nikolaevich Serebrennikov, The Position of Women in the USSR (London: Victor Gollancz, 1937), 81.

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वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की खोज https://thetricontinental.org/hi/vaishvik-dakshin-ke-liye-vikas-ke-naye-siddhant-ki-khoj/ Tue, 14 Jan 2025 08:00:41 +0000 https://thetricontinental.org/?p=121271

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दुनिया भर में प्रगतिशील सरकारें ज़रूर सत्ता में आई हैं, लेकिन अब तक उनके पास अपने समाजों को नवउदारवाद के चरमराते ढाँचे से निकालकर उनका नवनिर्माण करने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। होंडुरास, सेनेगल और श्रीलंका जैसे देश अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की क़र्ज़ और ख़र्चों में कटौती पर आधारित प्रणाली की अपनी आलोचना में बहुत स्पष्ट हैं, मगर इनके पास इससे आगे बढ़ने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है। नवउदारवाद से अलग एक नीति बनाने में असफल होने की वजह इनमें से कई सरकारें वापस नवउदारवादी दलदल में फँस जाती हैं।

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थान भी एक वैकल्पिक व्यवस्था पेश करने में असफल रहे हैं। लेकिन 2000 में एक ऐसी कोशिश हुई थी, जब यूएन ने ग़रीबी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर ज़ोर देने के लिए आठ मिलेनियम डेवेलप्मेंट गोल्स (एमडीजी) निर्धारित करते हुए विकास के परिणाम आधारित लक्ष्यों को केंद्र में लाने की प्रक्रिया शुरू की।1 एमडीजी के बाद 2015 में सत्रह सतत विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवेलप्मेंट गोल्स, एसडीजी) आए जिन्हें 2030 तक पूरा किया जाना है। लेकिन एमडीजी की ही तरह एसडीजी भी बिना किसी सिद्धांत या कार्यक्रम के बहुत सारे लक्ष्यों की एक कोरी रूपरेखा ही प्रदान करते हैं।

इसलिए हैरानी की बात नहीं है कि यूएन की 2023 की रिपोर्ट में लिखा गया कि कई एसडीजी ‘अपने लक्ष्य से काफ़ी हद तक या बहुत ज़्यादा भटक गए’ हैं। रिपोर्ट में इस असफलता की वजह तीसरी आर्थिक महामंदी (2006-2007), कोविड-19 महामारी, यूक्रेन युद्ध और फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार को बताया गया है। 140 लक्ष्यों में से महज़ 12% ही सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जबकि 50% अपने लक्ष्य से काफ़ी हद तक या बहुत ज़्यादा भटक चुके हैं और 30% में काम उसी जगह रुका हुआ है या पिछड़ गया है।2

वे लोग जो एसडीजी की कार्यप्रणाली के पक्ष में बोलते हैं उनका कहना है कि स्थिति बेहतर करने के लिए फंड में इज़ाफ़ा करना होगा। लेकिन यह सोच इस सच्चाई को नज़रंदाज़ करती है कि पश्चिम के वर्चस्व वाली वित्तीय व्यवस्था की तरफ़ से फंड मिल ही नहीं रहा। मौजूदा स्थिति यह है कि 2030 तक एसडीजी के लक्ष्य पूरा करने के लिए ज़रूरी सालाना धन में हर वर्ष 4 लाख करोड़ डॉलर की कमी रह रही है।3 1970 में वैश्विक उत्तर के देशों ने वादा किया था कि वे अपनी सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) का 0.7% ऑफ़िशियल डेवेलप्मेंट असिस्टेंस (यानी विदेशों की सहायता) के लिए खर्च करेंगे। इस लिहाज़ से यह एसडीजी कार्यक्रमों के लिए दिया जाना चाहिए, लेकिन यह खर्च नहीं किया गया: 2023 में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) ने अपनी जीएनआई का सिर्फ़ 0.24% विकास सहायता के लिए खर्च किया, फ़्रांस ने महज़ 0.5% और यूनाइटेड किंगडम ने 0.58% (दूसरी तरफ़ 2014 में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन ने सदस्यों ने वादा किया कि वे अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2% युद्धों पर खर्च करेंगे)।4 और तो और, वैश्विक दक्षिण के जो देश अपनी विकास योजनाओं को एसडीजी के मुताबिक़ तैयार करते हैं उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सहायता, क़र्ज़, विकास कार्यक्रमों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से क़र्ज़ मिलने में आसानी होनी चाहिए। इसके बावजूद क़र्ज़ मिलना अधिकतर इस बात पर निर्भर करता है कि वे देश ‘मुक्त बाज़ार सुधारों’ को कितना अपनाते हैं (जिसमें खर्चों में कटौती की नीतियाँ, अविनियमन और सरकारी कर्मचारियों की संख्या घटाना शामिल है)। इस तरह ग़रीब देशों को एसडीजी लक्ष्य पूरा करने और विकास कार्यों के लिए निवेश लाने के लिए ‘प्रोत्साहित’ (असल में, मजबूर) किया जाता है कि वे और क़र्ज़ लें या अपनी अर्थव्यवस्थाएं पश्चिमी निवेशकों के लिए खोल दें। और चूँकि एसडीजी के पीछे कोई ठोस सिद्धांत नहीं है और इनकी प्रगति के लिए सिर्फ़ क़र्ज़ लेना ही एकमात्र उपाय है, इसलिए एसडीजी को छलावा की तरह ज़्यादा और असलियत की तरह कम इस्तेमाल किया जाता है। यह वास्तविकता एसडीजी 17.4 के विपरीत है, जो ‘ऋण वित्तपोषण, ऋण राहत और ऋण पुनर्गठन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से समन्वित नीतियों के माध्यम से विकासशील देशों को दीर्घकालिक ऋण स्थिरता प्राप्त करने में सहायता करना’ है।5 दूसरे शब्दों में कहें तो एसडीजी के काम सिर्फ़ धन की कमी की वजह से ही नहीं रुके हुए हैं, जैसा कि इसके विरोधियों का कहना है। बल्कि ये एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था और विकास के कार्यक्रम की वजह से भी रुके हैं जो [वैश्विक] दक्षिण को अविकसित देखना चाहती है और साथ ही इस अवस्था से उबरने के लिए वैश्विक दक्षिण के पास एक वैकल्पिक विकास सिद्धांत और कार्यक्रम भी नहीं है।

एसडीजी की रूपरेखा तैयार होने और यूएन के सभी सदस्यों के इसे अपना लेने के तीन साल बाद 2018 में ही आईएमएफ के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर ताओ चांग ने लिखा कि 40% कम आय वाले देशों पर क़र्ज़ से जुड़ा भारी संकट है – 2015 में एसडीजी पारित होने के समय यह आँकड़ा 26% था – इसलिए वे ऋण नहीं चुका पा रहे हैं।6 यूएन के सतत विकास के लिए वित्तपोषण रिपोर्ट 2024 में दिखाया गया कि सबसे ग़रीब विकासशील देशों पर औसत ऋण का बोझ 2023 में बढ़कर 12% हो गया, ‘जोकि सन् 2000 के बाद का उच्चतम स्तर है’।7

वैश्विक दक्षिण के लिए विकास का एक नया सिद्धांत गढ़े जाने की सख़्त ज़रूरत है। एक ऐसा सिद्धांत जो एसडीजी जैसे प्रयासों के महत्वाकांक्षी उद्देश्यों या आईएमएफ और इसके ऋण-मितव्ययिता के राज के असफल तरीक़ों से आगे जाए। विकास के एक वैज्ञानिक सिद्धांत के बिना कोई भी विकास कार्यक्रम बन ही नहीं सकता।8 यह डोसियर ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान और ग्लोबल साउथ इन्साइट्स ने मिलकर तैयार किया है। यह नवउदारवाद के विकास के असफल सिद्धांतों और वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के नए सिद्धांत को विकसित करने की ज़रूरत से जुड़ी बहस को सामने रखता है। इसके साथ यह वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की शुरुआती रूपरेखा भी पेश करता है। अगले कुछ सालों में विकास के नए सिद्धांत पर इसी तरह के और दस्तावेज़ निकाले जाएंगे जो ख़ास देशों और क्षेत्रों के अध्ययन पर और व्यापक सम्भावनाओं पर आधारित होंगे।


अल्पविकास के सिद्धांत

इससे पहले कि हम विकास के नए सिद्धांत के ख़ास बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करें यह ज़रूरी है कि हम विकास के दूसरे नज़रियों पर निगाह डालें, जैसे आधुनिकता का सिद्धांत (जो डब्ल्यू. डब्ल्यू. रोस्तोव के विचारों से प्रचलित हुआ), वॉशिंगटन कॅन्सेंसस और निर्भरता के सिद्धांत जैसे अन्य परिवर्तनकामी सिद्धांत तथा इनकी वजह से वामपंथ में उभरे विमर्श।

आधुनिकता का सिद्धांत

अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों, लिंडन जॉनसन और जॉन एफ़. केनेडी के समाजवाद और राष्ट्रीय स्वतंत्रता विरोधी अभियानों में सलाहकार रहे अमेरिकी अर्थशास्त्री डब्ल्यू. डब्ल्यू. रोस्तोव ने 1960 में द स्टेजेस ऑफ़ इकोनॉमिक ग्रोथ: ए नॉन-कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो (आर्थिक विकास के चरण: एक ग़ैर–कम्युनिस्ट घोषणापत्र) नामक एक किताब लिखी। इसके शीर्षक से ही इसकी मंशा ज़ाहिर हो जाती है। रोस्तोव वैचारिक रूप से पक्के कम्युनिस्ट विरोधी और शीत युद्ध समर्थक थे। उन्होंने विकास का एक सार्वभौमिक और एकरेखीय प्रक्रिया का सिद्धांत पेश किया जो तथाकथित ‘पारम्परिक समाज’ को ‘उड़ान की पूर्वावस्था’ (preconditions for take-off) तक ले जाए, वहाँ से ‘उड़ान की अवस्था’ (take-off) तक, फिर ‘परिपक्वता की ओर अग्रसर अवस्था’ (drive to maturity) तक और अंतत: ‘जन उपभोग की अवस्था’ (age of mass consumption) तक।9 उनका मत था कि धर्मनिरपेक्ष शिक्षा एक ऐसे उद्यमी वर्ग को जन्म देगी जो तर्कशून्य परम्पराओं की बजाय ‘तर्कसंगत’ आर्थिक प्रोत्साहनों को तरजीह देगा। उनका मत था कि इससे निवेश की दरें ऊँची होंगी तथा आर्थिक विविधता बढ़ेगी जिसकी परिणति काफ़ी हद तक एक ऐसे उपभोक्तावादी समाज में होगी जिसे वैश्विक उत्तर में पहले ही हासिल किया जा चुका है।

रोस्तोव का सिद्धांत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की आधुनिकता के विचारों का एक मिलाजुला नमूना था जो सेंट लशिया के अर्थशास्त्री डब्ल्यू. आर्थर लुईस जैसे लोगों का अनुसरण करता है। यह सिद्धांत कहता है कि आर्थिक विकास तभी होगा जब बेशी श्रम/श्रमिक ग्रामीण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर मुख्यतः शहरी और औद्योगिक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में आ जाएँगे।10 रोस्तोव और आधुनिकता के अन्य सिद्धांतकारों ने विकास को पूँजीवाद की ओर बढ़ने की प्रक्रिया के रूप में देखा। उन्होंने यह भारी ग़लती अपने अनैतिहासिक सोच की वजह से की जो यह मानकर चलती है कि पाँच सौ वर्षों के उपनिवेशवादी शासन के बाद वैश्विक दक्षिण उसी बिंदु से शुरुआत कर रहा था जहाँ औद्योगिक क्रांति से पहले का यूरोप खड़ा था। उन्होंने अल्पविकास को एक मौलिक घटना समझ लिया। जबकि असल में वैश्विक दक्षिण में कोई ‘पारम्परिक समाज’ जैसी चीज़ थी ही नहीं। बल्कि वहाँ एक सर्वथा नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था थी जो उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ने जबरन और हिंसक तरीक़े से लागू की थी। और तो और, औद्योगिक क्रांति से पहले के यूरोप से उलट वैश्विक दक्षिण एक ऐसी दुनिया में जी रहा था जहाँ वैश्विक उत्तर का तकनीक, व्यापार और वित्तीय व्यवस्था पर एकाधिकार था। इस दुनिया में एक नवउपनिवेशवादी आर्थिक और राजनीतिक ढाँचा भी पहले से ही काम कर रहा था।

रोस्तोव की यह सोच उनके पिछले शोध जैसे ऐन अमेरिकन पॉलिटिक्स इन एशिया (1955, सहलेखक रिचर्ड डब्ल्यू. हैच) पर आधारित है जिसमें शीत युद्ध के संदर्भ में आधुनिकता शीत युद्ध के संदर्भ पर ज़्यादा खुलकर चर्चा मिलती है। ऐन अमेरिकन पॉलिटिक्स में रोस्तोव लिखते हैं कि ‘संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से छेड़े गए सम्पूर्ण युद्ध का विकल्प शांति नहीं है। जब तक मॉस्को और पेकिंग [sic] में एक अलग भावना और अलग नीति नहीं लागू होगी तब तक अमेरिका के सामने सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक रणनीतियों का प्रयोग करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।’11 दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरिका के लिए ज़रूरी है कि वह ‘सम्पूर्ण युद्ध’ (जिसमें विजय के लिए हर सम्भव प्रयास और बलिदान दे दिया जाए) सहित अपनी पूरी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल सोवियत यूनियन और चीन के जनवादी गणराज्य से कम्युनिज़्म को उखाड़ फेंकने के लिए करे। रोस्तोव जैसे सिद्धांतकारों के लिए साम्यवाद के ख़िलाफ़ युद्ध पैदा करना ज़्यादा ज़रूरी था बनिस्बत यह समझना कि इससे बहुमूल्य मानव श्रम ज़ाया होगा। कोई हैरानी नहीं कि 60 के दशक में राजनीति वैज्ञानिक सैम्यूअल हंटिंगटन ने ‘सैन्य आधुनिकता’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसमें तहत दो बातें कही गईं, पहली कि तीसरी दुनिया के देशों में ‘सामाजिक आधुनिकता’ हासिल करने का सबसे अच्छा तरीक़ा होगा इन देशों का सैन्यीकरण किया जाना, और दूसरी, इसका नतीजा यह हुआ कि कम्युनिज़्म से लड़ने और अमेरिका जैसे ‘आधुनिक समाज’ के निर्माण के लिए सैन्य शासन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।12

50 और 60 के दशकों में आईएमएफ और विश्व बैंक के लिए विकास के आदर्श की परिभाषा आधुनिकता का सिद्धांत बन गया। जब यह सिद्धांत तीसरी दुनिया को ‘उड़ान की अवस्था’ में पहुँचाने में असफल हो गया तब भी सत्ता के गलियारों में इसकी साख कम नहीं हुई। यूएस डॉलर के स्थिर और अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर निर्भर देशों पर जब तीसरी दुनिया के ऋण संकट की मार पड़ी तब इसका प्रभाव कम हुआ। जब 1979 में यूएस फ़ेडरल रिज़र्व ने जल्दी-जल्दी ब्याज दर बढ़ाई तो विकासशील देशों को ऋण मिलने में मुश्किल हुई और इससे कई ख़तरनाक आर्थिक परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं (इसमें 1982 में मेक्सिको का दिवालिया हो जाना भी शामिल है)।13 आधुनिकता का सिद्धांत पेसो (मेक्सिको की मुद्रा) के साथ ढह गया और आईएमएफ तथा विश्व बैंक का काम आगे बढ़ाने के लिए एक नए सिद्धांत का जन्म हुआ।

द वॉशिंगटन कॅन्सेंसस

नब्बे के दशक में एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री और पीटर्सन इन्स्टिट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में सीनियर फ़ेलो जॉन विल्यम्सन ने सरकारी उद्यमों (state-owned enterprises, SOE) के निजीकरण, सार्वजनिक उत्पादों को कॅमोडिटी में बदलने और पूंजी अकाउंट तथा व्यापार के उदारीकरण को परिभाषित करने के लिए वॉशिंगटन कॅन्सेंसस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल किया।14 अमेरिकी ट्रेज़री के हिसाब से IMF और विश्व बैंक की इस नीति को अपना सैद्धांतिक आधार नवशास्त्रीय अर्थशास्त्र और फ़्रीड्रिक हाइक जैसे विचारकों तथा नवउदारवादी मांट पेलेरीं सोसाइटी से जुड़े हुए लोगों में मिला।15 वॉशिंगटन कॅन्सेंसस शायद सबसे ज़्यादा तथाकथित संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (Structural Adjustment Programmes, SAP) में अपनी भूमिका के लिए मशहूर है जिसकी वजह से अफ्रीकी महाद्वीप ने अपना एक दशक खो दिया।16

पिछले कई दशकों से आईएमएफ उपनिवेशवाद के चंगुल से आज़ाद हुए देशों पर मितव्ययिता (जिसे वे ‘संतुलित बजट’ एजेंडा कहते हैं), निजीकरण और व्यापार के उदारीकरण की नीतियों को थोपता आ रहा है। इसने वैश्विक दक्षिण के देशों से उनकी अपनी विकास प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और अपेक्षाकृत नए उद्योगों को बचाने की क्षमता छीन ली। इसकी वजह से जो असंतुलन पैदा हुआ उससे निपटने के लिए आईएमएफ ने लगातार विकासशील देशों को निजी पूंजी बाज़ारों से ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे वे क़र्ज़ के जाल में फँसते चले गए। इस बीच वैश्विक दक्षिण के लिए विश्व बैंक के एजेंडे में बड़े स्तर पर औद्योगीकरण किए जाने का सुझाव कभी आया ही नहीं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के शुरुआती दौर में यही बात स्पष्ट दिखती है जब विश्व बैंक ने इन देशों को कच्चा माल निर्यात करने के अपने ‘तुलनात्मक सुलाभ’ (Comparative Advantage) काम से ही जुड़े रहने की सलाह दी। 90 के दशक तक आते-आते विश्व बैंक ‘वित्तीय गहनता’ को बढ़ावा देने लगा, यह और कुछ नहीं बल्कि विकास के लिए संसाधन जुटाने के रामबाण के रूप में वित्तीय विनियमन को बढ़ावा देना है।17 हाल के समय में विश्व बैंक ने अपना ध्यान सेवा क्षेत्र में विकास और लघु तथा मध्यम उद्योगों (SMEs) में निवेश को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित कर दिया है, दोनों का ही मतलब है कि राष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर ऋण का जाल कसता जाएगा। सेवा क्षेत्र में अधिकतर बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों (MNCs) का वर्चस्व होता है जिनकी आधारभूत संरचना ही इजारेदारी पर टिकी होती है। इसकी वजह से जो राष्ट्र अपने विकास का आधार सेवा क्षेत्र को बनाएँगे वे हमेशा ही वैश्विक उत्तर के बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों के भरोसे रह जाएँगे। SMEs के पास बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों का मुक़ाबला करने लायक संसाधन (इसमें सरकारी सब्सिडी भी शामिल है) नहीं होते और न ही वे बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों जितने बड़े होते हैं। इस कारण प्रभुत्वशाली बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन उनको निगल जाते हैं। वित्तीय उदारीकरण और SMEs को बढ़ावा देने की वजह से देश ऐसी स्थिति में फँस जाते हैं जिसे समीर अमीन ने सामान्यीकृत इजारेदारी पूँजी (generalised monopoly capital) का नाम दिया, जो ऊपर की ओर जाने वाले (कच्चा माल, तकनीक और पूँजी) तथा नीचे की ओर जाने वाले (वितरण, मार्केटिंग और उपभोक्ता तक पहुँच) दोनों नेटवर्कों पर नियंत्रण रखती है।18

वॉशिंगटन कॅन्सेंसस का एक प्रमुख नतीजा यह रहा कि आर्थिक प्रगति और संरचनात्मक परिवर्तन के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की ताक़त पर आँख मूँदकर भरोसा किया जाने लगा। FDI से जुड़ी इस सोच ने वैश्विक दक्षिण के देशों को एक संकीर्ण उद्देश्य तक सीमित कर दिया जिसमें उन्होंने अपने श्रम और प्राकृतिक संसाधनों के बाज़ार को पश्चिमी इजारेदारों के लिए खोल दिया, जिसकी वजह से उन्होंने अपने एजेंडे को अपने लोगों की विकास की आकांक्षाओं से जोड़ने की बजाय क़र्ज़ देने वालों की ब्याज़खोर ज़रूरतों से जोड़ दिया। जबकि इस बात के प्रमाण कम ही हैं कि FDI के आने से बहुत बदलाव आते हैं: इस तरह के निवेश से ऐसा सम्पूर्ण विकास नहीं होता जो क़र्ज़ मुक्ति और राष्ट्रीय संप्रभुता के रास्ते खोल सके, बल्कि यह अर्थव्यवस्था के निरर्थक क्षेत्रों को बढ़ावा देता है। FDI के निम्न विशेषताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए:

  1. FDI प्रवाह में गिरावट आ रही है। 2007 में FDI अपने चरम पर पहुँचा। इसी साल प्रमुख पूँजीवादी देशों को तीसरी आर्थिक महामंदी ने अपने चंगुल में ले लिया और तब से FDI में लगातार गिरावट आई है।19 संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के मुताबिक़ FDI और योजनाओं के लिए वित्तीय निवेश (दीर्घकालिक इन्फ़्रास्ट्रक्चर या उद्योगों के लिए निवेश) दोनों में निरंतर गिरावट आई है। मसलन 2022 से 2023 के बीच विकासशील देशों में FDI में 7% की गिरावट आई।20
  2. FDI का प्रवाह अनुत्पादक रहा है। पिछले कुछ सालों में UNCTAD के सालाना निवेश आँकड़ों में FDI के चरित्र में आए बदलाव दिखायी देते हैं। पहले यह मैन्युफ़ैक्चरिंग और औद्योगिक क्षेत्र में केंद्रित होता था और साथ ही साथ प्राकृतिक संसाधनों के खनन पर भी। लेकिन अब FDI काफ़ी हद तक वित्तीय और सेवा क्षेत्र में जा रहा है जहाँ यह ऐसे सम्पूर्ण या बदलाव लाने वाले विकास को जन्म नहीं देता जो उपनिवेशवादी काल के अल्पविकास से उबार पाए।
  3. FDI प्रगति या निवेश को बढ़ावा नहीं देता। UNCTAD की 1999 की रिपोर्ट के मुताबिक़ 90 के दशक में विकासशील देशों में बड़े स्तर पर हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ने निवेश के पैटर्न पर बहुत कम प्रभाव डाला।21 UNCTAD के हाल के अध्ययनों में साफ़ दिखता है कि तीसरे आर्थिक महाअवसाद के बाद से FDI प्रवाह और GDP संवृद्धि अलग-अलग रास्ते अपना रहे हैं।22 इसका मतलब है कि आर्थिक विकास FDI पर निर्भर नहीं करता है।

वॉशिंगटन कॅन्सेंसस ने उपनिवेशवादी दौर के अल्पविकास के पैटर्न को ही फिर से लागू कर दिया है जिसकी वजह से क़र्ज़ का बोझ इतना बढ़ गया है जो चुकाया नहीं जा पा रहा। निवेशक क़र्ज़ लेने वाले देशों की आर्थिक दशा को नज़रंदाज़ करते हुए बकाया और ब्याज वसूली पर आमादा हैं। क़र्ज़ का यह कुचक्र वह सारी आय निगल जाता है जो स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा और उत्पादक उद्योगों तथा इन्फ़्रास्ट्रक्चर के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। देश बस क़र्ज़ लेते हैं और उसमें डूबते चले जाते हैं। जब वो मौजूदा क़र्ज़ चुका नहीं पाते तो इसे चुकाने के लिए और क़र्ज़ लेते हैं और इस तरह एक कुचक्र चलता रहता है।23 2003 से 2007 तक आईएमएफ के प्रमुख अर्थशास्त्री रहे रघुराम राजन ने अपनी किताब फॉल्ट लाइन्स (2010) में लिखा, आईएमएफ की नीतियाँ ‘वित्तीय उपनिवेशवाद का एक नया रूप’ है।24

निर्भरता सिद्धांत

निर्भरता सिद्धांत आधुनिकता सिद्धांत के विरोध में विकसित हुआ और इसका एक लम्बा तथा प्रभुत्वशाली इतिहास है। इसकी जड़ें लैटिन अमेरिका के संरचनावाद और राउल प्रीबिश जैसे दिग्गजों तथा अन्य निर्भरता सिद्धांतकारों (dependencistas) के काम में देखी जा सकती हैं, जिनका मत था कि दुनिया की पूँजीवादी व्यवस्था दो स्तरों से बनी है: पहला, उन देशों का छोटा सघन समूह जिनका दुनिया की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर वर्चस्व है, तथा दूसरा स्तर, हाशिए के देशों का बड़ा समूह जो इस सत्ता से छूट पाने में असमर्थ हैं। जैसा कि निर्भरता सिद्धांतकारों ने दिखाया, औद्योगिक क्षमता वाले देशों के छोटे समूह और हाशिए पर धकेल दिए गए वे देश जो औद्योगिक रूप से सक्षम नहीं हैं, इनके बीच व्यापार की ख़राब शर्तों की वजह से हाशिए के देशों में अल्पविकास और अस्थिरता पैदा हुई।25 हाशिए के देश ज़्यादातर ऐसी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जो प्रासेस्ड नहीं होतीं, जिन्हें कम दामों पर ख़रीदा जाता है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ज़रिए औद्योगिक रूप से विकसित देशों को बेचा जाता है, जो अपनी औद्योगिक क्षमता से इसे पक्के माल में तब्दील करते हैं, फिर यही महँगी वस्तुएँ वापस हाशिए के देशों में बेची जाती हैं। इस छोटे विकसित समूह और हाशिए के देशों के बीच जिन शर्तों पर व्यापार होता है उसने इस विकसित देशों के समूह में पूँजीवादी संचय का होना संभव बनाया। इसका इस्तेमाल नए उत्पादों और तकनीक के आविष्कार के लिए किया गया। इसी वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के सहारे औद्योगिक क्षमता वाले देशों के गुट पूरी व्यवस्था पर नियंत्रण बनाए रखते हैं। इसे आंद्रे गंडर फ़्रैंक ने ‘अल्पविकास का विकास’ कहा है, एक निराशाजनक वास्तविकता का नकारात्मक विश्लेषण।26

निर्भरता सिद्धांत ने बिलकुल साफ़ कर दिया कि यह निराशाजनक वास्तविकता तीसरी दुनिया की संस्कृतियों से नहीं उपजी है बल्कि उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी दौर में जो नवउपनिवेशवादी व्यवस्था स्थापित हुई उससे निकली है। इसीलिए 1972 में प्रकाशित वॉल्टर रॉड्नी की क्लासिक किताब का शीर्षक है हाऊ यूरोप अंडरडेवल्पड अफ्रीका [यूरोप ने कैसे अफ़्रीका को अल्पविकसित बनाया], जिसमें यूरोपीय उपनिवेशवाद पर ख़ास ध्यान दिया गया।27 जैसा कि गंडर फ़्रैंक ने समझाया ‘अल्पविकास कोई मौलिक परिस्थिति नहीं है, यह विकसित महानगरीय पूँजीवाद द्वारा पिछड़े क्षेत्रों पर आर्थिक क़ब्ज़े और नियंत्रण से पैदा होती है’।28

इस सिद्धांत से निकली नकारात्मक्ता से ही समीर अमीन के इस मत को विकसित किया कि हाशिए के देशों को औद्योगिक रूप से विकसित देशों के समूह से ‘अलग’ होना होगा। अमीन ने 1987 में लिखा कि इस अलग होने का मतलब ‘राष्ट्रीय विकास की रणनीति को “भूमंडलीकरण” की अनिवार्यताओं के आगे समर्पित कर देने की अस्वीकृति’ है।29 चूँकि इस ‘अस्वीकृति’ की जड़ें राजनीतिक ताक़त में हैं और आर्थिक नीति में उतनी नहीं इसलिए विकासशील दुनिया के देशों के पास इतनी राजनीतिक शक्ति होनी चाहिए कि वे अपनी राष्ट्रीय विकास रणनीति ख़ुद तैयार कर सकें और वैश्विक मूल्य चेन (जिसे बेंजामिन सेल्वन ने ‘वैश्विक ग़रीबी चेन’ का सटीक नाम दिया) की दासता से मुक्त हो सकें या ‘अलग’ हो सकें।30

निर्भरता सिद्धांत की आलोचनाएँ

निर्भरता सिद्धांत विकास के एक नए सिद्धांत की ज़रूरत का तो बहुत सटीक विश्लेषण करता है लेकिन ख़ुद ऐसा कोई नया सिद्धांत पेश नहीं करता। दूसरे शब्दों में निर्भरता सिद्धांत सिर्फ़ नवउपनिवेशवादी व्यवस्था की आलोचना और राष्ट्रीय विकास रणनीति के लिए ज़मीन तैयार करने के लिए अलग होने की ज़रूरत तक ही ख़ुद को सीमित कर लेता है, लेकिन विचार की यह परंपरा – जो कि हमारी परंपरा भी है – कोई ऐसी रणनीति या योजना सामने नहीं रखती जो ये बदलाव ला सके।31

प्रगतिशील और मार्क्सवादी आर्थिक सोच रखने वालों के बीच निर्भरता सिद्धांत की आलोचना तीन प्रमुख विचारों पर देखी जा सकती है।

पहला, कुछ परिवर्तकामी अर्थशास्त्रियों का मानना था कि एशियन टाइगर्स कहे जाने वाले चार एशियाई देशों (हांगकांग, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और ताइवान) के उत्थान ने निर्भरता सिद्धांत के औचित्य को ही नकार दिया है और यह दावा भी किया कि व्यावहारिक मिश्रित अर्थव्यवस्था के साथ राज्य के समन्वित हस्तक्षेप द्वारा पूँजीवादी अल्पविकास की जड़ता से उबरा जा सकता है। एशियन टाइगर्स की परिघटना में दिलचस्पी ने विकासात्मक राज्य और औद्योगिक नीति पर एक नए विचार के पूरे साहित्य की ही शुरुआत कर दी। इस संदर्भ में बुनियादी किताबें हैं जॉनसन कामर की MITI and the Japanese Miracle (1982) और ऐलिस ऐम्स्डन की Asia’s Next Giant (1989)।32 विश्व बैंक ने भी इससे जुड़ी The East Asian Miracle (1993) नाम से एक लंबी रिपोर्ट निकाली, हालाँकि इसके विश्लेषण में राज्य की भूमिका को कमतर करके दिखाए जाने का प्रयास किया गया।33 इसमें कोई शक़ नहीं कि हा-जून छांग और मारीयाना मज़्ज़ुकटो जैसे हस्तियों ने भी वैश्विक दक्षिण में सेंटर-लेफ़्ट सरकारों के लिए लोगों को प्रभावित किया है।34 फिर भी इनके विचार पुराने उदाहरणों पर आधारित एक शासन चलने की एक रणनीति भर का प्रस्ताव देते हैं और विकास का एक नया सिद्धांत या पूरे वैश्विक दक्षिण की विभिन्न वास्तविकताओं को अपने विश्लेषण में जगह देने में असफल रहे। जहाँ चार एशियन टाइगर्स शीत युद्ध के दौरान अमेरिका की सुरक्षा में विकसित हुए, वहीं अफ़्रीकी, लैटिन अमेरिकी या अन्य एशियाई देशों को नवउदारवादी हस्तक्षेपों या साम्राज्यवादी और पूँजीवादी दायरों में अपना विकास करना पड़ा।35

दूसरा, ब्रिटिश विचारक बिल वॉरन जैसे कुछ मार्क्सवादी सक्रिय रूप से साम्राज्यवाद के तथाकथित प्रगतिशाली पहलुओं के पक्ष में मत रखते रहे। अपनी किताब Imperialism: Pioneer of Capitalism (1980) में वॉरन ने लिखा कि वैश्विक दक्षिण के पिछड़े देशों के आधुनिकीकरण में साम्राज्यवाद एक परिवर्तनकारी ऊर्जा की भूमिका निभा सकता है क्योंकि उनके मुताबिक़ यह औद्योगीकरण और लोकतंत्र दोनों की नींव रखता है।36 वॉरन ने जो साम्राज्यवाद को कथित वामपंथी जामा पहनाने की कोशिश की उसकी वैश्विक दक्षिण के मार्क्सवादी-लेनिनवादियों ने बहुत आलोचना की क्योंकि वे जानते थे कि कैपिटल इन मोशन (पूँजी की अंतर्राष्ट्रीय आवाजाही) के रूप में साम्राज्यवाद न सिर्फ़ [वैश्विक] दक्षिण की उत्पादन शक्तियों के विकास में विफल रहा है: साथ ही साथ इसने इनकी अर्थव्यवस्थाओं को बेहद अल्पविकसित रखा, इनके संसाधनों को लूटा और बर्बर युद्धों, शोषण और उत्पादन की स्थानीय व्यवस्थाओं को बर्बाद करके इन देशों को दूसरों पर निर्भर बना दिया।37 वॉरन का सिद्धांत नवक्लासिकीय आधुनिकता सिद्धांत के ही एक रूप के अलावा और कुछ नहीं था जो मार्क्सवादी शब्दों में लिखा गया था।

तीसरा, 70 और 80 के दशकों में राजनीतिक मार्क्सवादी कहे जाने वाले कुछ मार्क्सवादियों ने निर्भरता सिद्धांतकारों पर ‘नव-स्मिथवादी मार्क्सवादी’ होने का आरोप लगाया कि इन्होंने विकसित देशों के छोटे समूह और हाशिए के देशों के व्यापारिक संबंधों पर अत्यधिक ध्यान दिया जबकि हाशिए के देशों के आंतरिक सामाजिक और राजनीतिक संबंधों को नज़रंदाज़ कर दिया।38 इसके बावजूद नव-स्मिथवादियों और राजनीतिक मार्क्सवादियों के बीच समझौते की कुछ कसर रहती है, क्योंकि कुछ सिद्धांतकर्ताओं ने साम्राज्यवादी रिश्तों जैसे बाहरी कारणों को वर्गीय संबंधों जैसे आंतरिक सामाजिक-राजनीतिक पारस्परिक व्यवहारों को आपस में जोड़ने के प्रयास किए।

श्रीलंकाई मार्क्सवादी अर्थशास्त्री एस. बी. डी. डी. सिल्वा ने अपनी बेहतरीन किताब The Political Economy of Underdevelopment (1982) में कहा कि साम्राज्यवाद ने व्यापारिक पूँजी को विकसित और मज़बूत किया जबकि औद्योगिक पूँजी को कमज़ोर।39 डी सिल्वा का मानना था कि इस बात पर बहस करने की बजाय कि हाशिए के देश पूँजीवादी हो चुके हैं या नहीं (निर्भरता सिद्धांतकारों का मानना था कि ऐसा हो चुका जबकि रॉबर्ट ब्रेनर जैसे राजनीतिक मार्क्सवादी ऐसा नहीं मानते थे) से बेहतर होगा यह अध्ययन करना कि साम्राज्यवाद ने कैसे आंतरिक वर्गीय संरचना के ज़रिए उन तत्वों को बढ़ावा दिया जो औद्योगीकरण के ख़िलाफ़ थे। डी सिल्वा के अनुसार अल्पविकास एक ऐसे वर्गीय और आर्थिक ढाँचे की अनुपस्थिति से जुड़ा हुआ था जो न सिर्फ़ धन के स्तर पर पूँजी संचय करता है बल्कि उत्पादक स्थाई संपत्ति के स्तर पर भी।

इसी तरह पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के समाजवादी धड़ों के विचारकों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में नवउपनिवेशवादी निर्भरता और वैश्विक दक्षिण की अंदरूनी वर्गीय संरचना की भूमिका का अपना अलग विश्लेषण विकसित किया। उदाहरण के लिए सोवियत राजनीतिक अर्थशास्त्री सेर्गे ट्यूलपनोव का मत था कि राज्य को उन घरेलू शक्तियों को अलग-थलग करना होगा जो औद्योगीकरण में रुकावट पैदा कर रही हैं (ज़मींदार और व्यापारिक पूँजी) तथा एक मज़बूत सार्वजनिक क्षेत्र खड़ा करना होगा, साथ ही निजी क्षेत्र में राष्ट्रीय बुर्जुआ की प्रगतिशील भावी संभावनाओं को प्रेरित करना चाहिए।40 इस ‘ग़ैर-पूँजीवादी विकास’ की रणनीति के तहत यह ज़रूरी है कि राष्ट्रीय-लोकतांत्रिक दलों को नेतृत्व का भार उठाना होगा और बुर्जुआ के हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं देनी होगी।

विकास का एक मार्क्सवादी सिद्धांत

पिछले पचास सालों में, वॉशिंगटन कॅन्सेंसस जब अपने चरम पर था, अधिकतर ग़रीब देश ऋण और ख़र्चों में कटौती के कुचक्र, ग़रीबी की ऊँची दर और गहरी निराशा में डूब गए। लेकिन चीन 1949 की क्रांति के बाद से ‘अल्पविकास के विकास’ के दौर से बाहर निकल पाया है और ग़रीबी की ऊँची दर को कम करके एक ऐसे समाज की ओर बढ़ पाया है जिसने अति-ग़रीबी को ख़त्म कर दिया है और एक बड़ी आर्थिक ताक़त के रूप में उभरा है।41 चीन और बाक़ी देशों में अंतर यह है कि यहाँ राजनीतिक सत्ता का संतुलन पूँजीपति वर्ग (ख़ासतौर से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों) के हाथों में नहीं है और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाई जा रही चीनी सरकार ने योजना की एक प्रक्रिया विकसित की है जो द्वंद्वात्मक संतुलन बनाते हुए संसाधनों का वितरण विकास और सामाजिक बेहतरी दोनों के लिए करती है। किसी भी ठोस और व्यावहारिक विकास के मार्क्सवादी सिद्धांत को चीन की सफलताओं को समझना होगा। इस संदर्भ में दो बिंदुओं को उजागर करना ज़रूरी है।

पहला, हालाँकि चीन में पूँजीवादी वर्ग है लेकिन राजनीतिक सत्ता पर इसका प्रभुत्व स्थापित नहीं होने दिया गया है। वैश्विक उत्तर के समाजों में जो पारस्परिक संबंध मौजूद हैं – जहाँ राज्य और अन्य संस्थान निजी पूँजी के इशारों पर चलते हैं – वे चीन में नहीं हैं, यहाँ ये संस्थान राजनीतिक सत्ता द्वारा संचालित हैं जो समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही चीन में एक बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र है जिसमें भूमि, वित्त, व्यापार और बड़े उद्योग शामिल हैं। यह क्षेत्र अपने आप में इतना शक्तिशाली है कि चीन में आर्थिक निर्णयों पर मूल्य के पूँजीवादी नियम को हावी नहीं होने देता। इसलिए चीन के प्रयोग आधुनिकता के सिद्धांत के साँचे में नहीं ढलते।

दूसरा, चूँकि राजनीतिक सत्ता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में है इसलिए यहाँ राजनीतिक निर्णय दूसरे देशों या इकाइयों के हितों के आधार पर नहीं होते (जैसा कि वॉशिंगटन कॅन्सेंसस में दिखा)। जैसा कि अमीन ने कहा कि चीन ख़ुद को ‘अलग’ कर पाने में सफल रहा जिससे यह राष्ट्रीय विकास की रणनीति अपनी विकासात्मक नीति के आधार पर व्याख्यायित कर पाया।42 यह हासिल किया गया देश की ज़मीन और वित्त पर सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रण द्वारा जिससे राज्य व्यापार, निवेश और वैश्विक मूल्य की श्रृंखला के ज़रिए विश्व की अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहा, इससे श्रम का समाजीकरण हुए (जो मार्क्स की समाजवाद की राजनीतिक दृष्टि का एक अहम हिस्सा है)। इससे चीन निर्भरता सिद्धांत की नकारात्मकता से निकल पाया और दुनिया का एक बड़ा व्यापारिक देश बन पाया।

आधुनिकता और निर्भरता दोनों ही सिद्धांत चीन के उत्थान को पूरी तरह नहीं समझा पाते। चीन में एक विकासात्मक देश के कुछ पहलू दिखाई देते हैं जैसे सक्रिय औद्योगिक नीतियाँ, लेकिन इनके आधार पर इसके तीव्र विकास की सैद्धांतिक व्याख्या हमें नहीं मिल पाती। चीन का सुधार और खुलापन (1978) एक पुनरावृत्तीय और प्रायोगिक प्रक्रिया थी, जो हमेशा स्थानीय परिस्थितियों के महत्व पर जोर देती थी। हालाँकि यह अब तक एक विकसित अर्थव्यवस्था और समाज के रूप में स्थापित नहीं हुआ है लेकिन जैसा कि एनफ़ू छंग और छान त्ज़ाय का मत है चीन ने ‘समृद्धि की तरफ़ लगातार बढ़ते रहने की स्थिति’ को हासिल कर लिया है, यह हाशिए के देशों से निकलकर वैश्विक व्यवस्था के ‘अर्द्ध-केंद्रीय’ स्थान तक आ चुका है।43

इस स्थिति में भी चीन अति-ग़रीबी को ख़त्म करने में सफल हो पाया है और विज्ञान तथा तकनीक के क्षेत्र में बहुत अहम प्रगति कर पाया है। इसके पीछे क्या ख़ास वजह हैं? हमारे विकास के नए सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण घटक और शुरुआती बिंदु यह होना चाहिए कि चीन के आर्थिक मॉडल में निवेश और जीडीपी का अनुपात निरंतर ऊँचा रहा है जिससे इन्फ़्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक क्षमता के रूप में बहुत अधिक स्थाई पूँजी का निर्माण हुआ।

ग्लोबल साउथ इन्साइट्स (जीएसआई) के नए शोध से पता चलता है कि जीडीपी वृद्धि की उच्च मात्रा और स्थाई पूंजी निर्माण की उच्च हिस्सेदारी के बीच एक अति-उच्च सहसंबंध है, जिसे हम संक्षेप में शुद्ध स्थाई निवेश (एनएफआई) कहते हैं। शुद्ध स्थाई निवेश का मतलब है नया स्थाई पूँजी निवेश (मसलन किसी अवधि के दौरान मशीनों, इन्फ़्रास्ट्रक्चर इत्यादि के निर्माण पर हुए कुल खर्च में से इस दौरान ख़राब अथवा बेकार हुए मौजूदा पूँजी स्टॉक को घटाकर सकल स्थाई निर्माण की गणना की जाती है)। संक्षेप में, जीडीपी में शुद्ध स्थाई निवेश की हिस्सेदारी जितनी ज़्यादा रहेगी विकास की दर भी उतनी ऊँची रहेगी। यह उच्च सहसंबंध उन 50 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर लागू होती है जो दुनिया की जीडीपी का 88% बनाते हैं। यह वैश्विक दक्षिण की 50 से ज़्यादा छोटी अर्थव्यवस्थाओं पर भी लागू होता है।44 मतलब यह कि सिर्फ़ वित्तीय निवेश का आना ही काफ़ी नहीं है बल्कि जीडीपी के विकास के लिए ठोस परिसंपत्तियों में निवेश भी ज़रूरी है।

जीडीपी आर्थिक विकास मापने का एक अपूर्ण परिमाण है क्योंकि यह पर्यावरण के नुक़सान और सामाजिक विकास के तत्वों जैसे ‘बाह्य कारकों’ को नहीं गिनता। इसका मतलब यह नहीं कि जीडीपी ग़ैर-ज़रूरी है। ग्लोबल साउथ इन्साइट्स के शोध ने प्रति व्यक्ति जीडीपी और जीवन प्रत्याशा के बीच एक अहम और मज़बूत सहसंबंध पाया है। यह सहसंबंध 90 के दशक से लगातार बढ़ा है। इसके साथ ही प्रति व्यक्ति जीडीपी में बढ़ोत्तरी और कम आय वाले वर्गों के लोगों की जीवन प्रत्याशा में अनुपातिक वृद्धि में भी सहसंबंध है। दूसरे शब्दों में, जीडीपी के विकास से वैश्विक दक्षिण के लोगों के जीवन में बहुत वास्तविक भौतिक बदलाव आ सकते हैं। दूसरी ओर, जीडीपी विकास में ठहराव, जैसा कि तीसरी दुनिया के देशों में ऋण संकट और नवउदारवाद की शुरुआत की वजह से हुआ, दशकों तक ऐसा समय ला सकता है जब मानव विकास के संदर्भ में बहुत कम या नगण्य प्रगति होती है। ज़ाहिर है सामाजिक सुरक्षा की भी एक अहम भूमिका है: इस संदर्भ में कई बेहतरीन उदाहरण हमारे सामने हैं जैसे समाजवादी क्यूबा जिसने अमेरिका द्वारा छ: दशक के प्रतिबंध की वजह से तीव्र गति से आर्थिक प्रगति न होने के बावजूद ऊँची जीवन प्रत्याशा दर हासिल की।

जबकि हमें पता है कि NFI और जीडीपी विकास में सकारात्मक संबंध है और प्रति व्यक्ति जीडीपी विकास और जीवन प्रत्याशा दर में भी सकारात्मक संबंध है, तो वैश्विक दक्षिण की प्रगतिशील सरकारों के लिए बुनियादी काम यह है कि वे जीडीपी में NFI की हिस्सेदारी को बढ़ाएँ। लेकिन इसमें तीन चुनौतियाँ खड़ी होती हैं:

  1. NFI का जीडीपी में हिस्सा इस हद तक नहीं बढ़ाया जा सकता कि कुछ समय के लिए यह माँग को असह्य स्तर तक गिरा दे। इसके लिए ऐसे मददगार घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की ज़रूरत है जो NFI के लिए रियायती और दीर्घावधि वित्तीय मदद दे सकें।
  2. ऐसे तंत्रों की ज़रूरत है जो वैश्विक दक्षिण से संपदा की लूट को रोक सकें और उन्हें NFI के विकास में लगा सकें। इसके लिए कर की चोरी, ट्रान्स्फ़र प्राइसिंग और व्यापार में ग़लत बिल बनाने जैसे कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सामंजस्य की ज़रूरत है। इसके साथ ही वस्तुओं के दाम स्थिर करने के लिए बहुस्तरीय तंत्रों की भी ज़रूरत है।
  3. NFI उत्पादक और पर्यावरण के नज़रिए से उचित होना चाहिए (यानी अच्छे स्तर का)। यह स्पष्ट है कि रियल इस्टेट जैसे सट्टे के क्षेत्रों में NFI के वे परिणाम नहीं होते जो इन्फ़्रास्ट्रक्चर, खेती और आधुनिक उद्योगों जैसे उत्पादक क्षेत्रों में NFI के होते हैं। उत्पादक क्षेत्र स्किल, तकनीक के संचय के लिए और भौतिक पदार्थों के उत्पादन के लिए ज़्यादा बेहतर है। इसके साथ ही आवास और आवास से जुड़े इन्फ़्रास्ट्रक्चर में NFI का जीडीपी विकास दर और जीवन प्रत्याशा दर दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस सबके लिए ज़रूरी है देश के लिए विशिष्ट औद्योगिक और कल्याणकरी नीतियाँ जो तभी तैयार की जा सकती हैं जब हर विशेष मामले में वर्ग संघर्ष की ताक़तों में संतुलन हासिल किया जा सकेगा।

निष्कर्ष

1949 की क्रांति के बाद से चीन के तीव्र आर्थिक विकास और बढ़ते हुए जीवन स्तर को विकास के पारंपरिक सिद्धांतों द्वारा नहीं समझा जा सकता। लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा NFI की ऊँची दर को प्राथमिकता देने से ज़रिए इसे समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर, चीन का तेज़ रफ़्तार रेल तंत्र, जो दुनिया में सबसे बड़ा है – के निर्माण के लिए बहुत अधिक निवेश और लोगों को लामबंद करने की ज़रूरत थी। यह कोई नया विचार नहीं था। हालाँकि इस में मतभेद थे कि अर्द्ध-सामंती और साम्राज्यवादी दायरे के भीतर निवेश कैसे इकट्ठा किया जाए, मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचार की परंपरा ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया है कि बड़े स्तर के उद्योग समाजवाद के लिए भौतिक आधार बनाते हैं। 1920 में व्लादिमीर लेनिन ने जोर देते हुए कहा था कि कम्युनिस्ट विकास का मतलब है ‘सोवियत सत्ता और पूरे देश में बिजली पहुँचना’।45 आधी सदी के बाद अफ़्रीकी क्रांतिकारी अमिलकर कब्राल ने हमें सिखाया कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता का लक्ष्य है ‘राष्ट्रीय उत्पादक शक्तियों के विकास की प्रक्रिया को निर्बाध बनाना’।46 इसलिए वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत को गढ़ना अपने आप में साम्राज्यवाद और नवउदारवाद से आज़ादी पाने के संघर्षों की ओर लौटना भी है। इसके साथ हम पिछड़े देशों की विराट आकांक्षाओं की राह का नक़्शा तैयार करेंगे।


नोट

1 World Health Organisation, ‘Millennium Development Goals (MDGs)’, 19 February 2018, https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/millennium-development-goals-(mdgs).

2 UN Secretary-General, Progress Towards the Sustainable Development Goals: Towards a Rescue Plan for People and Planet: Report by the Secretary-General, United Nations Digital Library, July 2023, https://digitallibrary.un.org/record/4014344?ln=en&v=pdf, 1–2.

3 United Nations Department of Economic and Social Affairs, ‘UN Chief Urges “Surge in Investment” to Overcome $4 Trillion Financing Gap’, accessed 9 December 2024, https://www.un.org/en/desa/un-chief-urges-%E2%80%98surge-investment%E2%80%99-overcome-4-trillion-financing-gap.

4 Organisation of Economic Co-operation and Development, ‘The 0.7% ODA/GNI Target – A History’, accessed 9 December 2024, https://web-archive.oecd.org/temp/2024-06-17/63452-the07odagnitarget-ahistory.htm; United Nations Economic Commission for Europe, ‘Indicator 17.2.1 (a) Net Official Development Assistance (ODA) as a Percentage of OECD-DAC Donors GNI (Grant Equivalent Methodology), %’, accessed 9 December 2023, https://w3.unece.org/SDG/en/Indicator?id=72; Henry-Laur Allik, ‘Record Number of NATO Allies to Hit 2% Defense Spending Goal’, Deutsche Welle, 19 June 2024, https://www.dw.com/en/record-number-of-nato-allies-to-hit-2-defense-spending-goal/a-69401037. Our forthcoming publication, The Most Dangerous Organisation on Earth: the North Atlantic Treaty Organisation (NATO), Dossier no. 89, June 2025, will trace the implications to the world of this increase in military spending in the NATO countries.

5 United Nations Conference on Trade and Development, Division on Globalisation and Development Strategies, ‘Target 17.4: Long-Term Debt Sustainability’, accessed 9 December 2024, https://stats.unctad.org/Dgff2016/partnership/goal17/target_17_4.html.

6 Tao Zhang, ‘Managing Debt Vulnerabilities in Low-Income and Developing Countries’, IMF Blog, 22 March 2018, https://www.imf.org/en/Blogs/Articles/2018/03/22/managing-debt-vulnerabilities-in-low-income-and-developing-countries; International Monetary Fund, ‘Public Debt Vulnerabilities in Low-Income Countries: The Evolving Landscape’, December 2015, https://www.imf.org/external/np/pp/eng/2015/110215.pdf.

7 United Nations Inter-Agency Task Force on Financing for Development, Financing for Sustainable Development Report 2024: Financing for Development at a Crossroads (New York: United Nations, 2024), https://desapublications.un.org/publications/financing-sustainable-development-report-2024, xiv.

8 For more on the formulation of new development theories see Tricontinental: Institute for Social Research, The World Needs a New Socialist Development Theory, dossier no. 66, 4 July 2023, https://thetricontinental.org/dossier-66-development-theory/.

9 W. W. Rostow, The Stages of Economic Growth: A Non-Communist Manifesto (Cambridge: Cambridge University Press, 1960).

10 W. Arthur Lewis, The Theory of Economic Growth (Homewood, Illinois: Richard D. Irwin, 1955).

11 W. W. Rostow and Richard W. Hatch, An American Policy in Asia (Cambridge: MIT Press, 1955), vii.

12 Samuel P. Huntington, Political Order in Changing Societies (New Haven: Yale University Press, 1968). This book was far from the idealistic portrayal of civilian control over the military in Huntington’s The Soldier and the State: The Theory and Politics of Civil-Military Relations (Boston: Belknap of Harvard University Press, 1957).

13 Cheryl Payer, The Debt Trap: The International Monetary Fund and the Third World (New York: Monthly Review Press, 1974); Leo Panitch and Sam Gindin, ‘Finance and American Empire’, Socialist Register 41, 2005.

14 John Williamson, ed., Latin American Adjustment: How Much Has Happened? (Washington, DC: Institute for International Economics, 1990).

15 It is important to note that it was these same thinkers who engineered the neoliberal coup against the Third World, starting with Chile in the early 1970s as their laboratory. For more, see Tricontinental: Institute for Social Research, The Coup Against the Third World: Chile, 1973, dossier no. 68, 5 September 2023, https://thetricontinental.org/dossier-68-the-coup-against-the-third-world-chile-1973/.

16 For more on SAPs and the role of debt in Africa, see Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt: The Stranglehold of Neocolonialism and Africa’s Search for Alternatives, dossier no. 63, 11 April 2023, https://thetricontinental.org/dossier-63-african-debt-crisis.

17 World Bank, World Bank Development Report 1989: Financial Systems and Development (Washington, DC: World Bank, 1989); Era Dabla-Norris, ‘Financial Sector Deepening and Transformation’, in Frontier and Developing Asia (Washington, DC: International Monetary Fund, 2015), https://www.elibrary.imf.org/display/book/9781475595512/ch006.xml.

18 Samir Amin, The Implosion of Capitalism (New York: Monthly Review Press, 2014) and Tricontinental: Institute for Social Research, Globalisation and Its Alternative: An Interview with Samir Amin, notebook no. 1, 29 October 2019, https://thetricontinental.org/globalisation-and-its-alternative/.

19 Tricontinental: Institute for Social Research, The World in Economic Depression: A Marxist Analysis of Crisis, notebook no. 4, 10 October 2023, https://thetricontinental.org/dossier-notebook-4-economic-crisis/.

20 United Nations Conference on Trade and Development, World Investment Report 2024: Investment Facilitation and Digital Government (New York: United Nations, 20 June 2024), https://unctad.org/publication/world-investment-report-2024.

21 United Nations Conference on Trade and Development, Foreign Direct Investment and Development (New York: United Nations, 1999), https://unctad.org/system/files/official-document/psiteiitd10v1.en.pdf.

22 United Nations Conference on Trade and Development, Global Economic Fracturing and Shifting Investment Patterns (Washington, DC: United Nations, 23 April 2024), https://unctad.org/publication/global-economic-fracturing-and-shifting-investment-patterns.

23 Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt.

24 Raghuram Rajan, Fault Lines: How Hidden Fractures Still Threaten the World Economy (New Jersey: Princeton University Press, 2010), 93. For more on IMF policies and the Global South, see Tricontinental: Institute for Social Research, Life or Debt.

25 Raúl Prebisch, The Economic Development of Latin America and Its Principal Problems (New York: United Nations Economic Commission for Latin America, 1950). For more on Latin American structuralism, see Alfred Saad Filho, ‘The Rise and Decline of Latin American Structuralism and Dependency Theory’, in The Origins of Development Economics: How Schools of Economic Thought Have Addressed Development, edited by K. S. Jomo and E. S. Reinert (London: Zed Books, 2005).

26 Andre Gunder Frank, ‘The Development of Underdevelopment’, Monthly Review 18, no. 4, 1966.

27 Walter Rodney, How Europe Underdeveloped Africa (London: Verso, 1972).

28 Andre Gunder Frank, Crises in the Third World (New York: Holmes & Meier, 1967), 25.

29 Samir Amin, ‘A Note on the Concept of Delinking’, Review 10, no. 3 (Winter 1987): 435–444.

30 Benjamin Selwyn, ‘Why Global Value Chains Should Be Called Global Poverty Chains’, Developing Economics (blog), 13 January 2023, https://developingeconomics.org/2023/01/13/why-global-value-chains-should-be-called-global-poverty-chains/.

31 There are several exceptions to what we have said here, such as the work of Samir Amin on ‘delinking’ and the work of dependency theorists who operated in the early years of the Economic Commission of Asia (such as Ashok Mitra), the Economic Commission of Latin America (such as Osvaldo Sunkel, Theotônio dos Santos, and Vânia Bambirra), and the Economic Commission of Africa (such as Mekki Abbas and Robert K. A. Gardiner). See Tricontinental: Institute for Social Research, Dependency and Super-exploitation: The Relationship between Foreign Capital and Social Struggles in Latin America, dossier no. 67, 8 August 2023, https://thetricontinental.org/dossier-67-marxist-dependency-theory/.

32 Chalmers Johnson, MITI and the Japanese Miracle: The Growth of Industrial Policy, 1925–1975 (Stanford: Stanford University Press, 1982) and Alice H. Amsden, Asia’s Next Giant: South Korea and Late Industrialisation (Oxford: Oxford University Press, 1989).

33 The East Asian Miracle: Economic Growth and Public Policy was published by the World Bank in 1993. It was authored by Nancy Birdsall, José Edgardo L. Campos, Chang-Shik Kim, W. Max Corden, Lawrence MacDonald, Howard Pack, John Page, Richard Sabor, and Joseph E. Stiglitz.

34 Ha-Joon Chang, The Political Economy of Industrial Policy (New York: St. Martin’s Press, 1994) and Mariana Mazzucato, The Entrepreneurial State: Debunking Public vs. Private Sector Myths (London: Anthem Press, 2013).

35 The key text here is Nancy Birdsall and Frederick Jaspersen, eds., Pathways to Growth: Comparing East Asia and Latin America (Washington, DC: Inter-American Development Bank, 1997).

36 Bill Warren, Imperialism: Pioneer of Capitalism (London: Verso, 1980).

37 Aijaz Ahmad, ‘Imperialism and Progress’, in Lineages of the Present: Political Essays (New Delhi: Tulika, 1996).

38 Robert Brenner, ‘The Origins of Capitalist Development: A Critique of Neo-Smithian Marxism’, New Left Review, no. I/104 (July/August 1977): 25–92. Brenner’s essay occasioned a large debate, which began with Ben Fine’s ‘On the Origins of Capitalist Development’, New Left Review, no. I/109 (May/June 1978): 88–95 and Paul Sweezy’s short note ‘Comment on Brenner’, New Left Review, no. I/108 (March/April 1978): 94–95.

39 S. B. D. de Silva, The Political Economy of Underdevelopment (London: Routledge, 1982).

40 Sergei Tyulpanov, Politische Ökonomie und ihre Anwendung in den Entwicklungsländern [Political Economy and Its Application in the Developing States] (Frankfurt/Main: Verlag Marxistische Blätter, 1972).

41 Tricontinental: Institute for Social Research, Serve the People: The Eradication of Extreme Poverty in China, Studies in Socialist Construction no. 1, 23 July 2021, https://thetricontinental.org/studies-1-socialist-construction/.

42 Samir Amin, ‘China 2013’, Monthly Review 63, no. 10 (March 2013), https://monthlyreview.org/2013/03/01/china-2013/.

43 Enfu Cheng and Chan Zhai, ‘China as a “Quasi-Centre”’ in the World Economic System: Developing a New “Centre-Quasi-Centre-Semi-Periphery-Periphery” Theory’, World Review of Political Economy 12, no. 1 (Spring 2021): 22.

44 John Ross, Roy Singham, and Gisela Cernadas, “从210个经济体大数据中,我们发现了误解促消费对经济的危害” [From the Big Data of 210 Economies, We Found the Misunderstanding of Promoting Consumption to the Economy], Guancha, 21 October 2024, https://www.guancha.cn/LuoSiYi/2024_10_21_752447.shtml.

45 Vladimir Lenin, Lenin’s Collected Works, vol. 31 (Moscow: Progress Publishers, 1965), 408–426.

46 Amílcar Cabral, ‘The Weapon of Theory’, United Nations Economic Commission for Africa, African Institute for Economic Development and Planning, working paper, April 1978, https://repository.uneca.org/handle/10855/42836.

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ज़मीन और सपनों के लिए तेलुगूभाषी जनता का संघर्ष https://thetricontinental.org/hi/%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a5%81-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7/ Wed, 11 Sep 2024 09:00:32 +0000 https://thetricontinental.org/?p=110961  

1934 में तेलुगू कवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव (1910-1983), जिन्हें लोग प्यार से श्री श्री कहते थे, ने महा प्रस्थानम (महा प्रस्थान) शीर्षक से एक कविता लिखी। तब तक तेलुगू भाषा में इस कविता जैसा कुछ नहीं लिखा गया था। आज दक्षिण-मध्य भारत और दूसरे इलाक़ों में जाकर बसे यहाँ के लोगों को मिलाकर यह दस करोड़ लोगों की भाषा है। श्री श्री की कविता को एक युद्ध गीत की तरह गाया जाता था, हालांकि यह किसी सेना के लिए नहीं लिखी गई थी, बल्कि क्रांतिकारियों के लिए थी, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद को उखाड़ फेंक एक समाजवादी भारत का निर्माण करना चाहते थे। इसके शब्द बहुत सरल हैं, इतने आसान कि घिसे-पिटे मालूम होते हैं, लेकिन ये बोल सच कहते हैं:

लहरें उफन रही हैं।
घंटियाँ बज रही हैं।
एक दूसरी दुनिया पुकार रही है।
दूसरी, दूसरी, दूसरी दुनिया
उफनती, बजती, पुकारती
बढ़े चलो।
ओ, चलो, बढ़ो.
आगे, आगे, हमेशा बढ़े चलो।1
మరో ప్రపంచం,
మరో ప్రపంచం,
మరో ప్రపంచం పిలిచింది!
పదండి ముందుకు,
పదండి త్రోసుకు!
పోదాం, పోదాం పైపైకి!
కదం త్రొక్కుతూ,
పదం పాడుతూ,
హ్రుదంతరాళం గర్జిస్తూ-
పదండి పోదాం,
వినబడలేదా
మరో ప్రపంచపు జలపాతం?

यह गीत लोगों को उनकी क़ाबिलियत पर भरोसा दिलाने और साथ ही एक अजेय दिखने वाले दुश्मन से लड़ने के लिए ज़रूरी प्रेरणा देने के लिए लिखा गया था। श्री श्री मानो कहना चाहते हैं कि ख़ुद पर भरोसा हो तो कुछ भी मुमकिन है। लेकिन अगर अंत में हार हासिल हो तो बलिदान का क्या अर्थ रह जाता है? भविष्य जनता को पुकारते हुए कह रहा था कि तुम्हारा बलिदान बेकार नहीं जाएगा। अंतत: जीत हासिल होने की निश्चितता, जिसके लिए बलिदान और संघर्ष अनिवार्य है, ही सबसे बड़ी प्रेरणा थी। बस आगे बढ़ो।

  1. क्रांतिकारी कलाकार और गायिका विमलक्का। साभार: कुरेला श्रीनिवास
  2. महांकाली पार्वती (बाएं), मोटुरु उदयम (बीच में), और चिंतला कोटेश्वरम्मा (दाएं), द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने बुर्राकथा समूह के साथ युद्ध-विरोधी गीत प्रस्तुत कर रही हैं। साभार: प्रजा नाट्य मंडली फोटोग्राफी अभिलेखागार, फोटोग्राफर अज्ञात
  3. कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेता मल्लू स्वराज्यम (बाएं), 1940 के दशक के अंत में सशस्त्र संघर्ष की अन्य महिला सेनानियों के साथ। साभार: सुनील जाना

डोसियर, ‘ज़मीन और सपनों के लिए तेलुगू जनता का संघर्ष’, इस विचार पर आधारित है कि कला और संस्कृति दोनों वर्ग संघर्ष की उपज हैं और बदले में वे वर्ग संघर्ष पैदा भी करते हैं। इस डोसियर में हम उस व्यापक सांस्कृतिक सृजन का एक ब्योरा प्रस्तुत कर रहे हैं, जो भारत के इस हिस्से में चले महान संघर्षों से सामने आए और लोगों को लंबे प्रतिरोध में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया। यह क्रांतिकारी तेलुगू साहित्य का विस्तृत अध्ययन नहीं है और न ही यह भारत के तेलुगूभाषी क्षेत्र के कम्युनिस्ट आंदोलन का पूरा इतिहास है। हम यह दस्तावेज़ आपके साथ इस उम्मीद से साझा कर रहे हैं कि कला और राजनीति के बीच के संबंध का अध्ययन और साथ ही तेलुगू जनता के वर्ग संघर्ष के सांस्कृतिक संसार के अध्ययन में आम जिज्ञासा बढ़े।

हमने गीतों को चुना क्योंकि एक ऐसे समाज, जिसे पूरी तरह साक्षर होने से रोका गया हो, में सिनेमा के आने से पहले कहानी कहना और गीत गाना ही लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रमुख रूप थे। तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष की कम्युनिस्ट नेता मल्लू स्वराज्यम (1931-2022) का कहना था कि औरतें और दलित गांव में धान से भूसा अलग करते समय रात के आसमान को शोषितों के गीतों से भर दिया करते थे। वे गीत ईश्वर और उनके जीवन के बारे में हुआ करते थे। स्वराज्यम कहती थीं, वे गीत इतने ख़ूबसूरत थे कि ‘चाँदनी तले सोते हुए लोग भी उनका लुत्फ़ उठाते थे’।2

ये गीत तेलुगू समाज में प्रचलित लोककला परंपरा से निकले थे, जैसे क़िस्सागोई के वे रूप जो गायन एवं नाट्य शैली का इस्तेमाल कर कथा कहते हैं। उदाहरण के लिए हरिकथा (भगवान विष्णु की कथा),पाकिर पाटलु (सूफ़ी गीतों का संकलन), भागवतम् (महाभारत की कहानियाँ) और साथ ही मज़दूर-किसानों के जीवन पर आधारित बुर्राकथा और गोलासुद्दुलु जैसे गैर-धार्मिक क़िस्से, जिन्हें एक गायक दो ढोल की थाप के साथ गाता था। इन्हीं संगीतमय कला रूपों के ज़रिए मज़दूरों व किसानों ने दबंग जातियों के विचारों को चुनौती दी। और सामाजिक बदलाव के इस कलात्मक अभियान में वामपंथ शुरू से ही शामिल हो गया था। मल्लू स्वराज्यम ने बताया कि वे विद्रोह शुरू करने के लिए कम-से-कम तीस गाँवों में गईं थीं जहां ‘मैंने एक गीत के ज़रिए लोगों में क्रांति की लौ जलाई थी। मुझे इससे ज़्यादा और क्या चाहिए था?’3


  1. गुम्माडी विट्ठल राव, दर्शकों के सामने नाट्य करते हुए। इन्हें लोकप्रिय रूप से गदर के नाम से जाना जाता है, और ये तेलुगु के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी गीतकारों में से एक हैं। वे पहले अपने एक गीत की एक पंक्ति नाट्य शैली में गाते हैं और फिर उसका राजनीतिक व ऐतिहासिक महत्व समझाने के लिए रुकते हैं। साभार: के एन हरि
  2. श्री श्री के नाम से लोकप्रिय, तेलुगु कवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव अपने संकलन महा प्रस्थानम (नीचे दाईं ओर पीले कवर में) से एक कविता पढ़ते हुए, और (दाईं तरफ़ पीछे) लाल झंडे तले दूसरे संघर्ष के लिए आगे बढ़ते लोग। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2009
  3. नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत करते हुए प्रजा नाट्य मंडली। साभार: प्रजा नाट्य मंडली फ़ोटोग्राफ़ी अभिलेखागार

हमें गोरे स्वामियों का यह राज नहीं चाहिए

औपनिवेशिक राज ने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतर क्षेत्र में सामाजिक विकास को दबाकर रखा। इस सिलसिले में कुछ मूलभूत आँकड़े चौंकाने वाले हैं: 1881 से 1921 के बीच लोगों का अनुमानित जीवन काल 25 साल था और शिशु मृत्यु दर प्रति 1,000 जन्म पर 200 से अधिक थी।4 ज़मीन से जुड़े समाज सुधार आंदोलनों का भारत के उन बड़े हिस्सों में असर नहीं पड़ा था, जहां लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा को लेकर, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह को लेकर रूढ़िवादी, जातीय प्रतिबंधों ने सामाजिक जीवन की संभावनाओं को दबा रखा था।

लेकिन आंध्र-तेलंगाना क्षेत्र सहित भारत के दक्षिणी भाग में ऐसा नहीं था, यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक सामाजिक परिवर्तन ने जड़ें जमा ली थीं।5 कंडुकुरी वीरेसलिङ्गं (1848-1919), गुरुजाडा अप्पाराव (1862-1915) और गरिमेला सत्यनारायण (1893-1952) जैसे लेखकों ने लड़कियों की शिक्षा, विधवाओं के पुनर्विवाह के अधिकार के लिए अभियान चलाए तथा नौच या देवदासी प्रथा के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई। इस प्रथा के तहत निचली जातियों के परिवारों से युवा लड़कियों को ईश्वर को सौंप दिया जाता था (यानी उन्हें मंदिरों में रहने के लिए भेज दिया जाता था और वे मंदिरों की संपत्ति हो जाती थीं) और उच्च जातियों के पुरुष उनका यौन शोषण करते थे।6 साक्षरता दर कम होने की वजह से इस क्षेत्र के समाज सुधारक लोगों तक अपना संदेश गीतों और नाटकों के ज़रिए लेकर जाते थे।7 उदाहरण के लिए गुरुजाडा अप्पाराव ने जनपद लोक परंपरा में गीत लिखे, जिन्हें याद रखना और गाना आसान था क्योंकि वे जनभाषा में लिखे गए थे। गरिमेला सत्यनारायण का गीतलु (स्वराज के गीत) इतना प्रभावशाली था कि ब्रिटिश शासन ने 1912 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया था और कवि को कुल साढ़े तीन साल के लिए राजद्रोह के कानून में कैद रखा था।8 सत्यनारायण का बहुत लोकप्रसिद्ध गीत ‘मकोड्डी तेल्ला डोरा तनामु’ (हमें गोरे स्वामियों का राज नहीं चाहिए) पर भी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था, इस गीत की शुरूआत इन पंक्तियों से होती है::

हे ईश्वर, हमें गोरे स्वामियों का राज नहीं चाहिए!
हमारा जीवन दाँव पर है।
हमारा आत्मसम्मान छिन गया है।


हमें चावल का एक थाल नहीं मिलता।
नमक छूना हो चुका है अपराध।
वो हमारे मुँह में भर देगा मिट्टी और जाएगा [हमें दफ़नाने]।
हमें अन्न के लिए लड़ना होगा कुत्तों से [कचरे के ढेर में]।
लेकिन हमें गोरे स्वामियों का राज नहीं चाहिए, हे ईश्वर!9
మా కొద్దీ
తెల్లదొరతనము – దేవా
మా ప్రాణాలపై
పొంచి
మానాలు హరియించె



పట్టెడన్నమె
లోపమండి
ఉప్పు ! ముట్టుకుంటే
దోషమండి!
నోట – మట్టికొట్టి
పోతాడండి!
అయ్యొ! కుక్కలతో
పోరాడి – కూడు తింటామండీ
మా కొద్దీ
తెల్లదొరతనము – దేవా

इस उपमहाद्वीप में सीधे-सीधे राज करने की बजाय ब्रिटिश शासन ने ऐसे राजा और सामंत खड़े किए जो उनके नाम पर राज करें, औपनिवेशिक राज्य को राजस्व दें और इन सामंती शासकों के प्रशासनिक तंत्र के ज़रिए व्यवस्था बरक़रार रखी जाती थी। हैदराबाद का निज़ाम (पुश्तैनी शासक), जो दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक था, उसका दबदबा तीन भाषाई क्षेत्रों में था: तेलंगाना (तेलुगू भाषी), मराठवाड़ा (मराठी भाषी) और हैदराबाद-कर्णाटक (कन्नड़ भाषी)। निज़ाम ने अपने राज्यों की प्रजा की संस्कृतियों की उपेक्षा की, उसे औपचारिक कार्यों में उर्दू का इस्तेमाल करने पर मजबूर किया हालांकि उर्दू आबादी के सिर्फ़ 12 प्रतिशत लोगों की ज़बान थी।10 अत्याचार और शोषण के तमाम साधनों में से भाषा भी एक साधन थी। ब्रिटिश साम्राज्य के नाम पर निज़ाम ने एक सामंती व्यवस्था के तहत शासन किया जिसकी जड़ें इस क्षेत्र के एक अजीबोगरीब जातिगत विभाजन में थी। भूस्वामियों, जो केवल दबंग जातियों के होते थे, ने बहुत सी शोषित जातियों को दबाकर और विभिन्न प्रकार से उनका शोषण कर (इसमें जबरन श्रम लेना भी शामिल है) संपदा जुटाई और सत्ता बरक़रार रखी।

शोषण के विरुद्ध एकजुट होकर जनता ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया । इस क्षेत्र के लोगों ने कई तरीक़ों से ख़ुद को संगठित किया, लेकिन इनमें से बहुतों का विवरण इतिहास की किताबों में नहीं है। 1921 में मदापति हनुमंत राव (1885-1970) और बहादुर वेंकट राम रेड्डी (1869-1953), जो कि मध्यवर्गीय परिवारों में जन्मे थे और निज़ाम के प्रशासन में काम करते थे, ने आंध्र जन संगम (एजेएस) का गठन किया। वे अपनी भाषा के प्रति भेदभाव से परेशान हो चुके थे इसलिए उन्होंने पुस्तकालय, वाचनालय यानी रीडिंग रूम, और तेलुगू के स्कूल खोले (इनमें 1928 में हैदराबाद का पहला लड़कियों का स्कूल भी शामिल है)। तेलंगाना के सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन कर चुके प्रोफेसर अड़पा सत्यनारायण लिखते हैं कि एजेएस के ज़रिए पुस्तकालय आंदोलन बीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध के ‘सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों में से एक अहम आंदोलन बन कर उभरा और उसने जन जागृति में योगदान दिया’।11

1928 में मदापति हनुमंत राव के नेतृत्व में आंध्र जन संगम का नाम बदलकर आंध्र महासभा (एएमएस) हो गया। बद्दम येल्ला रेड्डी (1906-1979), रवि नारायण रेड्डी (1908-1991) और देवुलापल्ली वेंकटेश्वर राव (1912-1984) जैसे एएमएस के कई युवा नेता कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए और इस ‘उदारवादी सांस्कृतिक संगठन’ को, इतिहासकार सुनील पुरुषोतम के शब्दों में, ‘एक जुझारू जन संगठन’ बनाने पर ज़ोर दिया।12 एक जन संगठन के रूप में एएमएस प्रचलित लोक कलाओं के माध्यम से जनता के बीच अपना संदेश लेकर गया, जैसे कि गीत और नाटक, जो पर्दाफ़ाश करते थे ब्रिटिश उपनिवेशवाद के ढाँचे, निज़ाम के राज और ग्रामीण दुनिया पर भूस्वामियों के शिकंजे का। एएमएस के नेताओं ने किसानों के आंदोलन को यूरोप में नाज़ीवाद के ख़तरे और भारत में इसके असर की आशंका के मद्देनज़र पैदा हुई नाजीवाद विरोधी विश्वदृष्टि से भी जोड़ा। 1933 में क्रांतिकारी कवि श्री श्री ने जयभेरी (विजय नाद) लिखी जिसमें उनके दौर के कलाकारों के भीतर रिस रहे गुस्से के भाव को दिखाया:

मैंने भी
दी है समिधा
विश्व की अग्नि में।
मैंने भी
रोया है एक अश्रु
विश्व की वर्षा में।
मेरा भी
नाद शामिल है
विश्व की चिंघाड़ में।
.
నేను సైతం ప్రపంచాగ్నికి
సమిధ నొక్కటి
ఆహుతిచ్చాను!
నేను సైతం
విశ్వవ్రుష్టికి
అశ్రు వొక్కటి ధారపోశాను!
నేను సైతం
భువన ఘోషకు
వెర్రిగొంతుక విచ్చి మ్రోశాను!

उपनिवेशवाद, राजशाही और ज़मींदारी के विरुद्ध लड़ाई खेतों और सड़कों पर लड़ी जानी थी, लेकिन इन संघर्षों के लिए ज़रूरी था लोगों में आत्मविश्वास और यक़ीन पैदा होना कि वे न सिर्फ़ सत्ता के ढाँचे से लड़ सकते हैं बल्कि जीत भी सकते हैं। यह आत्मविश्वास और यक़ीन संघर्ष से तो पैदा होता ही है लेकिन साथ-साथ कल्पना से भी पनपता है। इसीलिए बहुत से अन्य उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों की तरह एएमएस ने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचने और दुनिया को लेकर उनकी समझ तैयार करने में गीतों और नाटकों की भूमिका पर ज़ोर दिया। इस काम से एएमएस पॉप्यूलर कल्चर यानी लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बना और उनके गीत इस क्षेत्र के संघर्षों से लगातार गहराई से जुड़े रहे हैं, जैसे कि पाडावेक्कू आंध्र महासभा पड़ाव (आंध्र महासभा की नाव पर सवार हो), जिसके लेखक का नाम कोई नहीं जानता:

ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु
ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु
आंध्र महासभा [एएमएस] की नाव, बंधु
रवि नारायणरेड्डी के हाथ है पतवार
बद्दम बालरेड्डी ने संभाली है पाल
नाव बढ़ रही है अपने लक्ष्य की ओर
ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु
सामंतों और लुटेरों की इस पर नहीं है जगह

जनता के शोषकों
सत्य भुलाया नहीं जाएगा
लक्ष्य है एक ऐसी जगह
जहाँ राज करेगा सर्वहारा
आँधियों से निकलकर,
और नौकाओं की पालों के परे
ओ बंधु, हो जाओ सवार नाव पर, मेरे बंधु।13

ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా
ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా
ఆంధ్ర సభయను
పడవెక్కు బాబా
చుక్కా నీ బట్టే
రావి నారాయణరెడ్డి
ఎతైనలే తెరచాప
బద్దం ఎల్లారెడ్డి
గడలు బట్టిరి
కార్యకర్తలు ప్రాణాలొడ్డి
కదులు తుందీ పడవ
గమ్య స్థానము జేరు
ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా
దొరలు దోపిడీ దార్లకు
దొరకదింత చోటైనా!
ప్రజా పీడితులకిచట
నిజము నిల్వ నీడవరు!
కష్ట జీవుల రాజ్యం
గమ్యముగా చేసుకొని
సుడిగుండముల రాటి
సూటిగా దాటిగ పోను
ఎక్కు బాబా – పడవెక్కు బాబా

Tricon

  1. गीत सुनें। सुड्डाला हनुमंथु द्वारा लिखा गया और 23 जुलाई 2024 को अब्बागनी बिक्षम द्वारा गाया गया गीत ‘कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ो, ओ बंधुआ खेतिहर मजदूर’।
  2. सुड्डाला हनुमंथु का यह चित्र उनके द्वारा निभाए गए विभिन्न किरदारों को दर्शाता है, बाएं से बीच तक, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष के एक क्रांतिकारी सेनानी के रूप में राइफल पकड़े हुए और उसकी दाईं ओर तानपुरा लिए, जिसे वे अक्सर अपने गीतों में इस्तेमाल करते थे। सबसे दाईं ओर का चित्र एक गाँव के लड़के को दर्शाता है जो हनुमंथु के गीत ‘पलेतुरी पिल्ला गड़ा पसूलगासे मोनागाड़’ (जानवरों को हाँकने में दक्ष गाँव का लड़का [बँधुआ बाल मज़दूर]) का नायक है, जिसे जमींदार ने उसकी माँ से दूर कर बंधुआ मज़दूर बना दिया और जो मजबूरी वश मवेशी चराने का काम करता है। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016
  3. प्रजा नाट्य मंडली द्वारा लिखे गए एक नुक्कड़ नाटक में घमंडी मध्यवर्गीय संवेदनाओं का मजाक उड़ाती एक अभिनेत्री। तारीख़ अज्ञात, साभार: प्रजा नाट्य मंडली फोटोग्राफी अभिलेखागार।
  4. विप्लव रचैतला संघम (विरासम) और जन नाट्य मंडली के सदस्य वरवर राव, के बालगोपाल, गुम्माडी विट्ठल राव (बाएं से दाएं), और वंगापंडु (सबसे दाएं) 1990. साभार: एन. वेणुगोपाल का निजी संग्रह
  5. प्रजा नाट्य मंडली के नाटकों और गीतों के कैसेट, वीएचएस, और सीडी कवर। साभार: प्रजा नाट्य मंडली, 2024

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन

1930 के दशक में एएमएस में युवा क्रांतिकारियों के शामिल होने से न सिर्फ़ संगठन में बदलाव आए बल्कि तेलंगाना की राजनीतिक दुनिया भी काफ़ी बदल गई। इन युवा कम्युनिस्टों ने एएमएस को अपने सदस्यता के नियम बदलने पर मजबूर किया जिससे ग़रीब और निरक्षर जनता भी बड़ी संख्या में संगठन से जुड़ सके। इन नए तबक़ों से आए सदस्यों ने माँग उठानी शुरू की कि संगठन अपने सांस्कृतिक कार्यों के साथ और पहलुओं में भी हस्तक्षेप करे। इसके चलते 1941 के पारित प्रस्तावों में माँग की गई कि वेट्टी (जाति आधारित बँधुआ मज़दूरी) और जाग़ीरदारी व्यवस्था को ख़त्म किया जाए और बटाईदारों के अधिकारों को लागू किया जाए। आमतौर पर संगम कहा जाने वाला एएमएस अपने रास्ते की रुकावटों को क्रांतिकारी ढंग से तोड़ते हुए पूरे ग्रामीण तेलंगाना तक पहुँच चुका था।14 एएमएस ने उन लेखकों और कलाकारों को भी आकर्षित किया जिन्होंने समाज को लोकतांत्रिक बनाने और औपनिवेशवादी निज़ाम के संस्थागत ढाँचे को ख़त्म करने के संघर्ष में अपनी कला से योगदान दिया।

क्रांतिकारी सोच केवल एएमएस के सदस्यों और उसकी कलात्मक क्रियाओं में ही नहीं पनप रही थी बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के कलाकारों और लेखकों में फैल रही थी। 1936 में वामपंथ से प्रभावित लेखकों और कलाकारों ने प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की स्थापना की जिसका नेतृत्व प्रेमचंद (1880-1936), रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941), मुल्क राज आनंद (1905-2004), ख्वाजा अहमद अब्बास (1914-1987) और सरोजिनी नायडू (1879-1949) जैसे दिग्गज कर रहे थे। 1943 तक रंगकर्मियों ने भारतीय जन नाट्य संघ या इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) का गठन कर लिया था।

आंध्र क्षेत्र भी प्रलेस और इप्टा के विकास से अछूता नहीं रहा। 1943 में प्रलेस का अधिवेशन पहली बार आंध्र में हुआ और इसी साल मुंबई में इप्टा बना। इप्टा के उद्घाटन समारोह में उर्दू शायर मखदूम मोहिउद्दीन (1908-1969) और तेलुगू नाटकों के निर्देशक गरिकापति राजाराव (1915-1963) मौजूद थे, जिन्होंने दो महीने के अंदर ही, 1 जून 1943 को आंध्र के विजयवाड़ा क्षेत्र में इप्टा की पहली मीटिंग रखवाई। तीन साल बाद, मई 1946 में प्रलेस ने अपना पहला ग्रीष्मकालीन साहित्यिक स्कूल लगाया जिससे निकली प्रजा नाट्य मंडली (पीएनएम)।15

आंध्र क्षेत्र में निज़ाम की ताक़तों और तेलंगाना के किसानों के संघर्ष की पृष्ठभूमि में प्रलेस और इप्टा विकसित हुए। ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन ने निज़ाम से कहा कि उसे युद्ध कर के रूप में अनाज मुहैया करवाए। निज़ाम ने ग़रीब किसानों की फसलें ज़ब्त करना शुरू कर दिया। कम्युनिस्ट कवि बंदी यदागिरी ने इस महान किसान संघर्ष पर निज़ाम सरकरोड़ा (ओ शासक, निज़ाम) लिखी:

ओ शासक, निज़ाम!
तुम तो नाज़ियों से भी क्रूर निकले
तुमने सताया हमें बहुत

ओ शासक, निज़ाम!
तुमने छीन ली सारी फसल
न छोड़ा एक भी दाना अन्न का

ओ शासक, निज़ाम!
न खेती को ज़मीन
न सिर पे छत
हम भागे अनजान जगह छिपने के लिए

तुमने सोचा था
देखे तुम्हारी पुलिस औ’ सेना
हम डाल देंगे हथियार

ओ शासक, निज़ाम!
न पुलिस न सेना
न डंडों की मार
न बम न हथियार
तुम ले आओ जितना भी अंबार
हम डालेंगे न हथियार
शासक निज़ाम

तुमने खड़ी की एक भ्रष्ट पुलिस
जो बचाए तुम्हें बनकर दीवार
ओ शासक, निज़ाम!
नलगोंडा है बीचोंबीच
किनारे की ओर है सूर्यपेटा
हैदराबाद है उससे परे
और फिर गोलकुंडा
गोलकुंडा किले के नीचे दफ़नाएंगे तुम्हें हम
शासक निज़ाम।16

నైజాము సర్కరోడా!
నైజాము సర్కరోడా
నాజీల మించినోడా
యమబాధ పెడ్తివి కొడుకో

నైజాము సర్కరోడా!
పండిన పంటనంత
తిండికైన ఉంచకుండ
తీసుక వెళ్ళినావు

నైజాము సర్కరోడా!
దున్నాను భూమిలేక
వుండాను ఇల్లులేక
పరదేశము వెల్తీమి కొడుకో

నైజాము సర్కరోడా!
పోలీసు మిల్ట్రి జూసి
మేము లొంగి వస్తామని
ఒక ఆశపడ్తివి కొడకో!

నైజాము సర్కరోడా!!
పోలీసు మిల్ట్రి గాని
లాఠీల దెబ్బలుగాని

మిషీను గన్నూలుగాని
తుపాకి బాంబులు గాని
నీ వెన్ని తెచ్చినగాని
మేం లొంగీరాం కొడకో!
నెజాము సర్కరోడా!!!

కంచారు గాడ్దులాను
లంచగొండి పోలీసోల్ల
నీవు పెంచినావు కొడకో
నైజాము సర్కరోడా!
చుట్టుముట్టు సూర్యపేట
నట్టనడుమ నల్లగొండ
ఆవాలా హైద్రాబాదా
తర్వాత గోలకొండ
గోలకొండాఖిల్లా కిందా నీ
గోరి కడ్తం కొడకో
నై జాము సర్కరోడా..!

पालकुर्ती गाँव में कम्युनिस्टों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए इस क्षेत्र पर शासन करने वाले निज़ाम के अधिकारी (जिसे देशमुख भी कहा जाता था) विष्णुर रामचंद्रा रेड्डी ने एएमएस सदस्य चित्यला ऐलम्मा की ज़मीन हड़प ली। अब तक किसानों को इस तरह की हरक़तों का तजुर्बा हो चुका था। एएमएस के स्थानीय नेताओं की अगुआई में अट्ठाईस किसान ऐलम्मा की फसल बचाने के लिए इकट्ठा हुए और देशमुख के दो सौ गुंडों को भगा डाला। इसके जवाब में देशमुख ने एएमएस के नेताओं को पकड़ने के लिए अपने लोग भेजे, नेताओं को गिरफ़्तार कर उन्हें यातनाएँ दी गईं। महीनों के संघर्ष के बाद 4 जुलाई 1946 को एक हज़ार किसानों ने देशमुख के ख़िलाफ़ जुलूस निकाला। उसके गुंडों ने जुलूस पर गोलियाँ चलाईं जिसमें डोड्डी कोमारैया की मौत हो गई। वह एक ग़रीब किसान, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य और एएमएस संगठन के स्थानीय नेता थे। जुलूस इकट्ठा होकर देशमुख के घर तक गया और घर को आग लगा दी। अगले हफ़्ते में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने किसानों को संगठित किया और उन्होंने देशमुख से दो सौ एकड़ ज़मीन छीनकर भूमिहीन किसानों में बाँट दी। तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का आग़ाज़ हो चुका था।17

सीपीआई के नेतृत्व में किसानों का आंदोलन पूरे ग्रामीण इलाक़े में फैल गया। न तो हैदराबाद राज्य का सैन्य बल और न ही रज़ाकार (हैदराबाद का एक स्वयंसेवी अर्द्धसैन्य बल) इस ज्वार को रोक पाए। एक के बाद एक गाँव ख़ुद को निज़ाम के राज से आज़ाद घोषित करते गए और वहां ग्राम राज्यमों (ग्रामीण कम्यून) की स्थापना हुई जिन्होंने सामाजिक ऊँच-नीच पर प्रहार किया और ज़मीन का पुनर्वितरण किया। सभी जातियों के पुरुष और महिलाओं ने सशस्त्र टुकड़ियों में हिस्सेदारी की और एक बहुत बड़े जनशासित मुक्त क्षेत्र के निर्माण के लिए लड़ाई लड़ी, इस क्षेत्र में लगभग पाँच हज़ार गाँव शामिल थे।18

प्रजा नाट्य मंडली ने आंदोलनरत किसानों को शिक्षित और प्रेरित करने के लिए तत्काल गीत और नाटक लिखे; आंध्र क्षेत्र से कार्यकर्ता रेल से तेलंगाना गए और लोगों को प्रेरित किया तथा इससे और भी कलाकार मंडली में शामिल हुए।19 इस दौर में जो सबसे यादगार नाटक लिखा गया वो था माँ भूमि, इसे कम्युनिस्ट कलाकार सनकारा सत्यनारायण और वासीरेड्डी भास्कर राव (ये दोनों आंध्र क्षेत्र के कृष्णा जिले से थे) ने 1947 में लिखा था।20 यह नाटक नलगोंडा जिले के दो सौ चालीस गाँवों में पुलिस के दमन पर लिखा गया था। यह ज़िला तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का केंद्र था और यहाँ निज़ाम के राज्य ने 15,350 लोगों को गिरफ़्तार किया था, उन्हें यातना दी थी (इसमें 74 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ भी शामिल हैं) और क़ैद में 52 लोगों की हत्या की थी। यह नाटक शुरू होता है एक मुसलमान किसान बंदगी की कहानी से जिसकी ज़मीन हथियाने के लिए देशमुख ने उसे मार डाला और इसके बाद कहानी बढ़ती है कि कैसे एएमएस के ज़रिए जनता उठ खड़ी हुई।21 देशमुख ने धार्मिक और जातीय भेदभाव के आधार पर एएमएस को तोड़ने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुआ। नाटक का अंत कब्रिस्तान में होता है जहाँ लोग बंदगी को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा होते हैं और कसम खाते हैं कि एएमएस के नेतृत्व में लड़ाई जारी रखेंगे, ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करेंगे और खेती करेंगे और निज़ाम के राज से जिसने भी हाथ मिलाया था गाँव में उसका बहिष्कार करेंगे। 1948 के अंत तक 125 मंडलियाँ माँ भूमि का मंचन कर चुकी थीं और कम-से-कम दो करोड़ लोग यह नाटक देख चुके थे।22

इन नाटकों के मंचन ने लोगों को प्रेरित और शिक्षित किया तथा साथ ही इस पूरे क्षेत्र में रंगमंच और कला की संस्कृति में भी बदलाव लाया। तेलंगाना आंदोलन में शामिल रही कम्युनिस्ट लेखिका कोंडापल्ली कोटेश्वरअम्मा (1918-2018) याद करती हैं ‘उस दौर में औरतों को नाटकों में अभिनय करने की आज़ादी नहीं थी। इसलिए महिला कॉमरेड ने बंगाल का उदाहरण दिया जहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर की बेटी एक नाटक में काम कर रही थीं। वरिष्ठ नेताओं ने हमारी माँग मान ली और हम नाटकों में अभिनय कर पाए’। शंकर वासी रेड्डी के नाटक मुंडाडुगु (एक कदम आगे की ओर) पहला नाटक था जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के साथ काम किया।23

एक कम्युनिस्ट और आंध्र महिला सभा की नेता मोटुरु उदयम (1924-2002) सशस्त्र आंदोलन के समय तो भूमिगत यानी अन्डरग्राउन्ड थीं लेकिन उन्होंने विजयवाड़ा में हुई इप्टा की पहली मीटिंग में शिरकत की। इस क्षेत्र में साइकिल चलाने वाली पहली महिला उद्यम ने बुर्राकथा स्क्वाड नाम के एक सांस्कृतिक समूह का नेतृत्व किया जो नाटकों इत्यादि का मंचन करते थे, इनमें एक नाटक सोवियत युद्ध की नायिका तान्या पर भी था।24 अपने कई जेलवासों में से एक में 1947 में उदयम ने जेलों की अमानवीय स्थिति को लेकर विरोध प्रकट करने के लिए चेवुलपिल्ली मैजिस्ट्रैट (खरगोश जैसे कानों वाला मैजिस्ट्रैट) लिखा। बाद में वह याद करती हैं कि कैसे जेल में वह नाटक देखने के बाद कुछ क़ैदी कम्युनिस्ट हो गए थे।25

सशस्त्र आंदोलन के दौरान कवि सुड्डाला हनुमंथु (1908-1982) ने एक गीत लिखा ‘पलेतुरी पिल्ला गड़ा पसूलगासे मोनागाड़’ (जानवरों को हाँकने में दक्ष गाँव का लड़का [बँधुआ बाल मज़दूर]) इसका इस्तेमाल ‘माँ भूमि’ नाटक में और फिर बाद में 1979 में इस पर बनी फिल्म में हुआ।26 हनुमंथु नलगोंडा से थे (तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का केंद्र), कम्युनिस्ट बनने से पहले उन्होंने थोड़े समय के लिए निज़ाम की सरकार के लिए काम किया था। निज़ाम के राज्य के तौर-तरीक़ों से क्षुब्ध होकर वह कम्युनिस्ट बन गए। उन्होंने कुछ वाकये बताए जिनका उन पर प्रभाव पड़ा जैसे कि एक सरकारी अधिकारी का एक बूढ़े आदमी को सिर्फ इसलिए मारना कि उसने अधिकारी का सामान उठाने से मना कर दिया था। निज़ाम की सरकार रोज़ाना जनता की बेइज़्ज़ती और शोषण करती थी और इसके विरुद्ध जनता के प्रतिरोध को देखकर हनुमंथु प्रेरित हुए। उन्होंने एक गीत लिखा ‘वे वे देब्बाकु देब्बा’ (हर धक्के का जवाब दो धक्के से), इसका शीर्षक एक बूढ़ी महिला की उस समय कही बात से लिया गया जब एएमएस की एक मीटिंग पर रज़ाकारों ने हमला किया:

हो! हो! हर धक्के का जवाब दो
हर धक्के का जवाब दो
निज़ाम की सेना के राक्षस
आयें हैं हमसे लड़ने
वार करो कुल्हाड़ी से
चाकू से कर दो उनके टुकड़े
जब वो चीखें चिल्लाएँ
कौवों और चीलों को उन्हें खाने दो!
हो! हो! हर धक्के का जवाब दो
सिपाही और रज़ाकार क्यों आए हैं इधर?
क्यों होती है लूट?
क्यों चलती हैं गोलियाँ?
क्यों मरते हैं लोग?
क्या समझता है निज़ाम खुद को?…
जब तक दुश्मन का नहीं हो खात्मा
वचन दो तुम हथियार नहीं छोड़ोगे!
दुश्मन से लड़ने में लगा दो पूरी जान
तुम्हारे अस्त्र उतने ही हैं बलवान
जितने इंद्र के
हो! हो! हर धक्के का जवाब दो
जागो और उठो, ओ किसान, ओ मेहनतकश
राव, रेड्डी, कुर्मा, गोल्ला
बढ़ई, कुम्हार, धोबी, नाई
हरिजन, आदिवासी
कसो अपनी कमर
उठाओ हसिया, भाला, कुल्हाड़ी
दांती, तलवार, बंदूक
कूद पड़ो युद्ध में
करो जयनाद…
एक गिरा एक झटके से
तीन गिरे एक फटके से
हो! हो! हर धक्के का जवाब दो।27
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ
దెబ్బకు దెబ్బ – వెయ్‌ వెయ్‌
దయ్యపు గుండా
గోయలు తుర్కలు
కయ్యమునకు మనపైబడి వచ్చిరి
ఇయ్యరమొయ్యర వేయర బడితను
కుయ్యో మొర్రన కోయర చురికతొ
చ్రియ్యలు, వ్రయ్యలు , వ్రయ్యలుగా ఎగ
రేయర కాకులుమేయగ గ్రద్దలు
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ
దెబ్బకు దెబ్బ – వెయ్‌ వెయ్‌
ఎక్కడి సైనికు లెక్కడి
రజా కార్లెందుకు ఇక్కడ?
ఎందుకు దోపిళ్ళెందుకు
కాల్పులు ఎందుకు
హత్యలు యెవడా? నైజామ్‌.

రాక్షస పాలన
విధ్వంసము గావించే వరకు
ఎత్తిన
ఆయుధ మెపుడు దించమని
శపథము చేసి,
శత్రమూకలను, చెండాడర, నీ
కందినదే వజ్రాయధమగునిల
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ
లేరాలేరా! రారా! వేగమే రైతా! కూలీ!
రావూరెడ్డి
కూర్మాగొల్ల కుమ్మర కమ్మర
చాకల, మంగల, హరిజన, గిరిజన,
నడవర ముందుకు, నడుం బిగించి,
కొడవలి కఠారి గొడ్డలి చిల్ల బాకూ
వడిళల బర్మి తుపాకిచేకొనిరణములొ
దూకర జై యని…
నరకర ఎగబడి పొడవర తెగబడి
ఏటుకు ఇద్దరు,
పోటుకు ముగ్గురు.
వెయ్‌ వెయ్‌ – వేయర దెబ్బ

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन 1946 से 1951 तक चला और किसानों ने इस दौरान ज़मींदारों को अपदस्थ करने और एक समाजवादी उत्पादन प्रणाली तैयार करने में काफ़ी सफलता हासिल कर ली थी। इस समय में 10 लाख एकड़ भूमि किसानों में बाँटी गई, इसके बाद जन समितियाँ इनको सुविधाएँ देतीं और सब चीज़ की देखरेख करतीं। वेट्टी (जाति आधारित बँधुआ मज़दूरी) को ख़त्म कर दिया गया और देवदासी प्रथा को भी। जनता ने संकीर्ण पहचान से जुड़े संबंधों को त्याग कर मज़बूत सामाजिक रिश्तों का निर्माण किया। सशस्त्र आंदोलन के लोकप्रिय गीतों से यह बात स्पष्ट होती है, उदाहरण के लिए ‘जाति से तुम्हें रोटी नहीं मिलती, मेरे भाई; हमें मिलकर लड़ना ही होगा’। यह सब बिना जन कलाकारों, गायकों और गाथागायकों के संभव नहीं था, जिनके गीतों और नाटकों ने लाखों ग़रीबों और शोषितों को एक ऐसी दुनिया की कल्पना करने के लिए प्रेरित किया जहाँ वे बेड़ियों में क़ैद नहीं थे और साथ ही इस दुनिया को हासिल करने के लिए उनमें आत्मविश्वास भी पैदा किया।28

1948 में निज़ाम हैदराबाद को नव-निर्मित भारत से आज़ाद रखने के लिए आतुर था जिससे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और भारत सरकार नाराज़ हो गए थे। इसलिए भारत सरकार ने हैदराबाद पर कब्ज़ा कर उसे भारतीय संघ में शामिल करने के लिए सेना भेजी। निज़ाम का राज खत्म होने के बाद भारतीय सेना ने अपनी बंदूकों की नली एएमएस के नेताओं और क्रांतिकारी किसानों की ओर मोड़ दी। कम्युनिस्ट नेता पी सुंदरैया (1913-1985) जिन्होंने तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई थी, के अनुसार:

4,000 कम्युनिस्टों और किसान क्रांतिकारियों को मार गिराया गया; 10,000 से ज़्यादा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और आम लड़ाकुओं को तीन-चार साल के लिए डिटेन्शन या हिरासत शिविरों तथा जेलों में ठूँस दिया गया; लगभग 50,000 लोगों को समय-समय पर पुलिस और सेना कैम्पों में घसीटकर ले जाया गया, वहाँ उन्हें हफ्तों तक पीटा गया, यातनाएँ दी गईं; हज़ारों गाँवों के लाखों लोगों को पुलिस और सेना के तलाशी अभियान का सामना करना पड़ा और बर्बरतापूर्ण लाठी चार्ज झेलना पड़ा; पुलिस और सेना की कार्रवाइयों के कारण लोगों को लाखों की संपत्ति गँवानी पड़ी जो या तो लूट ली गई या बर्बाद कर दी गई; [और] हज़ारों महिलाओं को यौन उत्पीड़न झेलना पड़ा और अन्य तरह की बेइज़्ज़ती भी सहनी पड़ी।29

1950 में श्री श्री का कविता संग्रह ‘महा प्रस्थानम’ प्रकाशित हुआ, जिससे इस कम्युनिस्ट कवि की कविताएँ जनता का गीत बन गईं। 1951 में सीपीआई ने औपचारिक तौर से तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन का अंत कर दिया, हालांकि इसके बाद भी कुछ इलाक़ो में लड़ाई जारी रही। 1956 में नई भारत सरकार ने बचे हुए सशस्त्र आंदोलन को भी कुचल दिया और आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना की। लेकिन इसके बावजूद इसकी विरासत बची रही। नेहरू को भी इस दौर में हुए भूमि पुनर्वितरण के कुछ पहलुओं को स्वीकार करना पड़ा, और जनता कभी उन गीतों को भूली नहीं।

Listen to a song by Suddala Hanumanthu about the importance of getting organised and fighting for a peasant-workers’ rule, like in the Soviet Union and China, performed by Abbagani Biksham on 23 July 2024

  1. प्रजा नाट्य मंडली के नुक्कड़ नाटक ‘वीर तेलंगाना’ में एक कलाकार लाल झंडा लहराते हुए। लाल झंडा कम्युनिस्ट आंदोलन के नेतृत्व में सामंती व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का प्रतीक है। साभार: प्रजा नाट्य मंडली, 2000 का दशक, फोटोग्राफर अज्ञात
  2. गीत सुनें। सोवियत संघ और चीन की तर्ज़ पर, मेहनतकशों का राज स्थापित करने में संघर्ष और संगठन के महत्त्व के बारे में सुड्डाला हनुमंथु द्वारा लिखा गया गीत, जिसे 23 जुलाई 2024 को अब्बागनी बिक्षम ने गाया था।
  3. मख़दूम मोहिउद्दीन, एक क्रांतिकारी उर्दू कवि जिन्होंने निज़ाम के राज के समय हैदराबाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016

लाल सितारा अब भी जगमगा रहा है

1950 में संविधान लागू होने के बाद 1952 के लोकसभा चुनावों में 16 कम्युनिस्ट जीतकर संसद पहुँचे। इनमें से सात सीटें तेलंगाना के उन हिस्सों में से थीं जहाँ सशस्त्र आंदोलन हुआ था। एक आठवीं सीट हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (1898-1990) ने जीती थी जो निर्दलीय लड़े थे और सीपीआई ने उन्हें समर्थन दिया था, वे सरोजिनी नायडू (कांग्रेस की भूतपूर्व अध्यक्ष और कवि) और विरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय (कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के एक नेता) के छोटे भाई थे। सशस्त्र आंदोलन के दौरान चट्टोपाध्याय ने ‘टेल्स ऑफ तेलंगाना’ (तेलंगाना की कहानियाँ) नाम से एक कविता लिखी जो इस क्षेत्र और देश भर में काफ़ी पढ़ी गई:

अब मुझे लिखने दो
एक कथा तेलंगाना की, एक दुखद कथा

[तेलंगाना] दूसरा नाम है इतिहास का

ये गूँजता है बार बार
भविष्य के अंधेरे गलियारों में
जिनसे गुज़रता है ऐतिहासिक तर्क और बढ़ता है
अपनी भव्य सिद्धि की ओर।30

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन की गूँज सही में समय से परे लगातार सुनाई देती रही है।

तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन दरअसल किसानों के अपनी मुक्ति के लिए लड़े गए संघर्ष के लंबे इतिहास का एक अध्याय है, जो 1946 में इस आंदोलन के शुरू होने से बहुत पहले से चला आ रहा है। इसमें किसानों के वे विरोध प्रदर्शन भी शामिल हैं जिनके चलते नेल्लोर में सितंबर 1931 में पहला आंध्र प्रदेश ज़मींदारी विरोधी सम्मेलन हुआ था और साथ ही 1937 में इच्छापूरम (श्रीकाकुलम जिला) से मद्रास तक किसानों का ऐतिहासिक जुलूस भी। किसानों के विरोध प्रदर्शनों की इसी कड़ी के चलते अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) की एक क्षेत्रीय इकाई का गठन हुआ और इसके बाद इस क्षेत्र को दो बार एआईकेएस के सम्मेलन की मेज़बानी भी मिली, एक बार पलासा (1940) और फिर विजयवाड़ा (1944)। विजयवाड़ा के सम्मेलन के लिए एआईकेएस ने 1,00,000 किसानों को लामबंद किया और इसके समापन के बाद एक बड़ा अभियान चला जिसमें 2,000 गाँव की जनता तक किसान संघर्ष का संदेश पहुँचाया गया। इसके अगले साल 50,000 किसानों ने आंध्र क्षेत्र की किसान सभा के सम्मेलन के लिए अपने-अपने गाँव से तेनाली (गुन्टूर जिला) तक रैली निकाली।31 किसानों का संघर्ष तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन में तब्दील हुआ और इसके बाद 1960 के दशक में विद्रोह की नई शृंखला के रूप में जारी रहा।

जब 1953 में आंध्र प्रदेश का गठन हुआ तो भारत सरकार ने इस क्षेत्र में वाणिज्यिक खेती का विकास शुरू किया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से मौजूद समस्याएँ और बढ़ गईं, जैसे जाति आधारित असमानता और कुछ दबंग जातियों द्वारा राज्य भर में कुछ सुविधाएँ हासिल कर लेना, इन दोनों की ही वजह से शोषित जातियों, ख़ासकर भूमिहीन मज़दूरों के खिलाफ हिंसा और उनकी क्षति और बढ़ गई। इससे इस क्षेत्र के किसानों में प्रतिरोध की भावना पैदा हुई जिससे सरकार एक भूमि सुधार जाँच कमेटी बैठाने को मजबूर हुई और 1955 के आंध्र प्रदेश (तेलंगाना क्षेत्र) इनाम उन्मूलन अधिनियम जैसे सुधार पारित हुए।32 यह संघर्ष इस क्षेत्र में किसान आंदोलन का सीधा परिणाम था।

भारत की आज़ादी के बाद हुए कुछ मामूली से सुधारों से खेत मज़दूरों और किसानों के सामने जो संकट था वह ख़त्म नहीं हुआ। तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन के जो संकल्प थे, वो आज भी ज़िंदा हैं और अलग-अलग रूपों में बार-बार उभरेंगे, जिसमें किसानों का सशस्त्र आंदोलन भी शामिल है और इन आंदोलनों के साथ जन्म लेने वाली कविता भी।

सशस्त्र आंदोलन ख़त्म होने के एक दशक बाद, 31 अक्टूबर 1967 को लेविडी गाँव के रहने वाले दो कम्युनिस्ट किसान, कोरन्ना और मन्गन्ना, गिरिजन समागम सम्मेलन (गिरिजन यानी भारत के पूर्वी घाट पर रहने वाले आदिवासी) में जा रहे थे। वो सम्मेलन में पहुँचे इससे पहले ही उन्हें गाँव के ज़मींदारों ने घेर लिया और मार डाला। जब उनकी हत्या की खबर सम्मेलन तक पहुँची तो गिरिजनों ने जवाब में ज़मींदारों पर हमला कर दिया और पूरे इलाक़े में संघर्ष फैल गया। पूरे एक साल तक गिरिजनों और दूसरे आदिवासी किसानों ने आंध्र प्रदेश के इस हिस्से में ज़मींदारों और पुलिस थानों पर हमले जारी रखे। यह शासन के ख़िलाफ़ किसानों के तीखे संघर्ष के एक नए दौर की शुरूआत थी। विद्रोह आस-पास के जिलों में फैला, जिसमें श्रीकाकुलम भी शामिल है जो इसका केंद्र बना। इस आंदोलन के तीन नेता उभरे: सुब्बा राव पाणिग्रही (1933-1969), जो एक मंदिर के पुजारी रह चुके थे, वेमपतापु सत्यनारायण या ‘सत्यम’ (1934-1970), जो एक स्कूल शिक्षक थे, और अदीभाटला कैलासम (1970 में सत्यम के साथ इनकी मृत्यु हुई), वे भी स्कूल शिक्षक थीं। इन्होंने आदिवासियों सहित बड़ी संख्या में किसानों को लामबंद किया कि वे माओवादी रुझान वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की सशस्त्र टुकड़ियों में शामिल हों। भारत सरकार इस माओवादी विद्रोह को कुचलने के लिए आतुर थी इसलिए इस इलाके में 12,000 सैनिक भेजे गए। इन तीनों नेताओं को मार डाला गया और यह आंदोलन अंतत: बिखर गया।

साठ के दशक के अंतिम सालों में इस क्रांतिकारी उबाल के बीच फिल्मकार बी. नरसिंह राव (जन्म 1946) ने ग्रामीण हैदराबाद में आर्ट लवर्स एसोसिएशन की स्थापना की, जहाँ हर हफ़्ते मीटिंग में यह चर्चा होती थी कि किसान संघर्ष की ज़रूरतें पूरी करने के लिए क्रांतिकारी कला की रचना करने की आवश्यकता है। इन्हीं मीटिंगों के दौरान, सदस्यों – जिनमें से अब कई माओवादी आंदोलन में शामिल हैं – ने जन नाट्य मंडली (जेएनएम) की स्थापना की। लोकप्रिय कला की कम्युनिस्ट परंपरा से प्रेरणा लेकर जेएनएम ने लोक गीतों और क्रांतिकारी गीतों को इकट्ठा किया, उन्हें सहेजा और दूसरों से साझा किया, हैदराबाद के आसपास के गाँव में घूमकर कविताएँ इकट्ठा कीं और उनके साथ अपनी कविताएँ साझा कीं।

4 जुलाई 1970 को क्रांतिकारी कलाकारों और लेखकों ने माओवादी रुझान वाले विप्लव रचैतल संगम (इसे विरासम भी कहा जाता था) की स्थापना की, इसके संस्थापक अध्यक्ष थे श्री श्री। ये लेखक और कलाकार जोसेफ स्टालिन और माओत्से तुंग की मार्क्सवादी सांस्कृतिक अवधारणाओं से प्रेरित थे, जिन्होंने कहा था कि कला विषयवस्तु में अनिवार्य रूप से ‘सर्वहारा से जुड़ी, रूप में राष्ट्रीय’ और ‘जनता से निकलकर जनता तक जानी चाहिए’।33 विरासम ने एक मासिक पत्रिका अरुणतारा निकाली, जिसमें कविताओं के साथ राजनीतिक विश्लेषण भी छपते थे। इसमें छपी सामग्री में से सबसे ज़रूरी रही के.जी. सत्यमूर्ति (1931-2012, जिन्हें उनके गुप्तवास के नाम शिवसागर से भी जाना जाता है) की लिखी एक कविता और गीत ‘नारूडो भसकरुडो’ (ओ मनुष्य! ओ भास्कर!, 1970)। यह इतनी महत्त्वपूर्ण इसलिए थी कि यह जनता के लिए बोलचाल की भाषा में लिखी तेलुगू साहित्य में अपनी किस्म की पहली कविता थी।34 यह गीत एक भास्कर नाम के शहीद को श्रद्धांजलि देता है:

तुम सुंदर वृक्ष के बीचे बैठे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम्हारी आँखें हैं लाल
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम कूद पड़े संघर्ष में
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक बैरंका वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने उठाए हथियार
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
हथियार उठाकर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने तोड़ दिए संबंध अपने परिवार और समुदाय से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक गोड़दंगी वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ की
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
धारदार कुल्हाड़ी से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने वार किया भालू पर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक महुआ वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम लड़े तीर कमान से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तीर कमान से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने हासिल की विजय
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

तुम्हारी वीरता देखी
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
उन्होंने [राज्य] ज़हरीली आँखों से

ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
उन्होंने [राज्य] काट दिया तुम्हारा सिर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
सिंगनेरी सीमा के पास
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

जो राह दिखाई तुमने
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
है हमारा पथ महान
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुम्हारी दिखाई राह पर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
हम लेंगे शस्त्र थाम
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!

एक बैरंका वृक्ष के नीचे
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने उठाए हथियार
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
हथियार उठाकर
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!
तुमने तोड़ दिए संबंध अपने परिवार और समुदाय से
ओ मनुष्य! ओ भास्कर!35

నర్రెంగ సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
కన్నెర సేస్తివయ్యా నరుడో! భాస్కరుడా!
కన్నార సేసి నీవు నరుడో! భాస్కరుడా!
కదనాన దూకితివా నరుడో! భాస్కరుడా!

బర్రెంక సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు పడ్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు సేతబట్టి నరుడో! భాస్కరుడా!
బంధాలు తెంచ్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!

గొట్టంకి సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
గొడ్డళ్ళు నూర్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
గొడ్డళ్ళు నూరి నీవు నరుడో! భాస్కరుడా!
గుడ్డెలుగు కొడ్తివయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!

విప్పపూ సెట్టుకింద
నరుడో! భాస్కరుడా!
విల్లు సారించితివా
నరుడో! భాస్కరుడా!

విల్లంబు సారించి
నరుడో! భాస్కరుడా!
విజయ మే అన్నావో నరుడో! భాస్కరుడా!

నీదు శౌర్యం సూసి నరుడో! భాస్కరుడా!
కళ్ళల్లో జిల్లేళ్ళు నరుడో! భాస్కరుడా!


నీ శిరసు తీస్తిరయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
శింగేరి గట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!


నీవు సూపినబాట నరుడో! భాస్కరుడా!
మాదొడ్డ బాటయ్య నరుడో! భాస్కరుడా!
నీ బాటనే మేము నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు పడ్తాము నరుడో! భాస్కరుడా!

బర్రెంక సెట్టుకింద నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు పట్టాము నరుడో! భాస్కరుడా!
బందూకు సేతబట్టి నరుడో! భాస్కరుడా!
బంధాలు తెంచాము నరుడో! భాస్కరుడా!

इन क्रांतिकारी परंपराओं से प्रेरित होकर युवा लोकगीत गायक गुम्मादी विट्ठल राव (1949-2023) – जिन्हें गदर भी कहा गया – विरासम की एक मीटिंग में गए और नरसिंह राव से मिले, जिन्होंने बाद में माँ भूमि (1979) और दासी (1988) जैसी क्रांतिकारी फिल्में बनाईं। नरसिंह ने गदर से कहा ‘एक क्रांतिकारी गीत में जनता की आजीविका के संघर्ष दिखने चाहिए और इस स्थिति से उबरने के उनके दैनिक संघर्ष भी’।.36

ऐसी ही क्रांतिकारी गीत रचने की अपनी तलाश में गदर और उनके ग्रुप को यह लोकप्रिय लोक गीत ‘अपुरा बंडोडो’ (रुको, ओ रिक्शेवाले) मिला:

रिक्शा रोको, रिक्शेवाले।
मैं तुम्हारे पास आती हूँ
तुम और मैं भागते हैं
मैं तुम्हारे गाल पर काट लूँगी!

रुको, रिक्शेवाले!
मैं तुम्हारे रिक्शे के पीछे चलूँगी।
रुको ज़रा पहनने दो मुझे साड़ी
पहनने दो ज़रा ब्लाउज़।
रुको, रिक्शेवाले!
मैं तुम्हारे रिक्शे के पीछे चलूँगी।37

అపుర బండోడో బండెంట నేనొస్తా
నిలుపుర బండోడో బండిమీద నేనొస్తా
నువ్వు నేను పారిపోదాం
నీ బుగ్గ కొరుకుత

అపుర బండోడో బండెంట నేనొస్తా
చీరగట్టిందాకా
రైకా దొడిగిందాకా
అపుర బండోడో
బందెంటనేనొస్తా..

गौर करने पर यह काफी रूमानी लगा और एक रिक्शेवाले की परेशानियों से भरी ज़िंदगी इसमें नहीं दिखाई दी। इस गीत की धुन पर गदर ने इसका एक रूपांतर लिखा जो लोगों की ज़िंदगी से ज़्यादा जुड़ा हुआ था:

गोलनाका पर मैं तुम्हें गोल मिठाई खिलाऊँगी।
सत्य थिएटर में दिखाऊँगी तुम्हें फिल्में।
लाल बाज़ार में दूँगी तुम्हें
खाने को लड्डू।
कारखाने में दिलाऊँगी तुम्हें ताड़ी।
अल्फा होटल में दिलाऊँगी तुम्हें आलू बिरयानी
रुको, रिक्शेवाले
मैं तुम्हारे रिक्शे के पीछे चलूँगी।38
గోల్నాక కాడ నీకు- గోల్‌ మిఠాయ్‌ దినిపిస్తా
సత్యా టాకీస్‌లోన నీక్‌ సిన్మా జూపిస్తా
లాల్‌బజార్‌ కాడా లడ్డు మిఠాయ్‌ దినిపిస్తా
కార్ఖాన కాడా – నిక్‌ కల్లు బోపిస్తా
ఆల్ఫా హోటల్లో ఆలు బిర్యాని దినిపిస్తా
ఆపుర రిక్షోడో రిక్షెంట నేనొస్తా
నిలుపుర రిక్షోడో    రీక్ష మీద నేనొస్తా

लेकिन यह भी नाकाफ़ी लगा। रिक्शेवाले के लिए इतना सब लेने के लिए महिला के पास पैसा कहाँ से आएगा? इसलिए गदर सही संदर्भ की तलाश में लगे रहे:

अगर नहीं चले तुम्हारे हाथ-पाँव, तो खाली रहेंगे हमारे पेट!
हम कर लें जितनी भी मेहनत, खाली रहेंगे हमारे पेट।
इस कांग्रेस राज में, खाली रहेंगे हमारे पेट।
तुम चलाओ अपना रिक्शा और मैं दूँगी तुम्हारा साथ।39
రెక్కలాడితే గాని
డొక్క నిండని మనకు
కాయ కష్టం జేశ్నా – కడుపే నిండని
మనకు
ఈ కాంగ్రెస్ పాలనలో
మన కడుపు నిండదిరా
నిలుపుర రిక్షోడో – రిక్ష మీద నేనొస్తా

यह गीत अपने नवीनतम और अंतिम स्वरूप में बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके रचयिता गदर भी। पिछले साल यानी 2023 में 74 बरस की उम्र में गदर की मौत हो गई। वे जन नाट्य मंडली के सबसे प्रसिद्ध कलाकार थे और उन्होंने अपने जीवन काल में 5,000 से ज़्यादा गीत लिखे व गाए थे, जिनमें से कई लोककथाओं में शामिल हो चुके हैं, और लाखों लोग बिना इनके स्रोत को जाने इन्हें बहुत पसंद करते हैं।40

गदर तेलंगाना के मेडक जिले के तुपरण गाँव की एक शोषित जाति से थे और उन्हें पैसों की कमी के चलते इंजीनियरिंग कॉलेज छोड़ना पड़ा। 1972 में वे पीपल्स वॉर ग्रुप में शामिल हुए। आपातकाल (1975-1977) के दौरान जब भारत सरकार ने संविधान की धज्जियां उड़ानी शुरू की तो उन्हें गिरफ़्तार कर पैंतालीस दिन जेल में रखा गया। 1986 में वे अन्डरग्राउन्ड हो गए और आठ महीने दण्डकारण्य जंगल में काम किया। 1992 में उन्होंने ग़रीब परिवारों के बच्चों और पुलिस एनकाउन्टरों में जिनके माँ-बाप मारे गए, उन बच्चों के लिए बोधि स्कूल शुरू किया। 1995 में मुख्यधारा की एक फिल्म के लिए गीत लिखने के लिए पीपल्स वॉर ग्रुप से उन्हें निलंबित कर दिया गया। 6 अप्रैल 1997 को एक अज्ञात व्यक्ति ने उनकी हत्या की कोशिश की। उन्हें छह गोलियाँ मारी गई थीं। वे बच तो गए लेकिन ताउम्र उनकी रीढ़ की हड्डी में एक गोली फँसी रही। लेकिन इस सबके बावजूद उनके गीत नहीं रुके।41

  1. 1940 के दशक के अंत में चले तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष का एक दल (दलम) मार्च करते हुए। साभार: सुनील जाना
  2. १६) के जी सत्यमूर्ति, जिन्हें शिवसागर के नाम से जाना जाता है, पीपुल्स वॉर ग्रुप के संस्थापक थे जिन्होंने तेलुगु कविता ‘नारूडो भसकरुडो’ लिखी थी। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016
  3. 1940 के दशक के अंत में चले सशस्त्र संघर्ष में शामिल एक दल के सदस्य खाना खाने के लिए रुके। साभार: सुनील जाना
  4. एक जुलूस के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ आदिवासी कलाकार। साभार: प्रजा नाट्य मंडली फ़ोटोग्राफ़ी अभिलेखागार, तारीख़ अज्ञात

कला को जनता से निकल, जनता तक जाना चाहिए

तेलुगूभाषी लोगों के संघर्षों और जीवन में गीत बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। गीतों में ही इतिहास को बचाए रखा जाता है; गीतों में ही ऐतिहासिक व्याख्याओं को चुनौती देकर वर्ग संघर्ष दिखाया जाता है; और गीतों के ज़रिए ही सामाजिक एकजुटता और आत्मविश्वास के नए संघर्ष जन्म लेते हैं।

दुनियाभर में कई ऐसी कलाकृतियाँ हैं जो ज़मींदारों की निर्दयी सत्ता को चुनौती देती हैं। ज़मींदार न सिर्फ़ किसानों द्वारा पैदा की गई अतिरिक्त फसल पर अपना अधिकार चाहते हैं बल्कि वो अपने प्रति ऐसी श्रद्धा भी चाहते हैं जिसका इंसानियत से कोई मेल नहीं। 1927 में युवा माओत्से तुंग (1893-1976) किसानों की स्थिति का जायज़ा लेने हुनान गए और पूछा:

हज़ारों कानून और राजनीतिक विज्ञान के स्कूल खोले गए हैं, लेकिन क्या ये स्कूल जनता, पुरुषों और महिलाओं तक, ग्रामीण इलाकों के दूरदराज़ के कोनों तक, उतनी राजनीतिक शिक्षा पहुँचा पाए हैं जितनी किसान संगठनों ने इतने कम समय में पहुँचाई है?42

किसान संगठनों ने ही किसानों को नए नारों से अवगत करवाया और उनमें आत्मविश्वास जगाया। किसान संगठनों और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक इकाइयों ने ही अपने नाटकों, गीतों और नारों से हज़ार साल की ज़मींदार वर्ग की सत्ता को तोड़ने में मदद दी।

किसानों के ज़हन में यह विचार बहुत गहराई से बैठा हुआ है कि राजाओं और ज़मींदारों के वर्ग को आर्थिक और राजनीतिक ताक़त भगवान ने दी है। इस विचार को ख़त्म करने के लिए साहस, संगठन और आत्मविश्वास की ज़रूरत होती है, और ये मिलते हैं संयुक्त राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष से। अगर भूमि पुनर्वितरण के बावजूद किसान ज़मींदारों को दैविक ही मानते रहेंगे तो दबंग जातियाँ हर बार सत्ता में वापसी करती रहेंगी। राजनीतिक संघर्ष सत्तारूढ़ वर्ग की ताक़त को तोड़ता है लेकिन इस जीत को बरक़रार सांस्कृतिक संघर्ष रखता है, और यही सांस्कृतिक संघर्ष ज़मींदारों और किसानों, दोनों को अंतत: इंसान बनने की आज़ादी देता है।


Listen to the song Palleturi pillagada pasulagaase monagaada (Village Boy [bonded child worker] Who Can Herd the Animal Expertly), written by Suddala Hanumanthu and performed by Abbagani Biksham on 23 July 2024

  1. गीत सुनें। सुड्डाला हनुमंथु का गीत ‘पलेतुरी पिल्ला गड़ा पसूलगासे मोनागाड़’ (जानवरों को हाँकने में दक्ष गाँव का लड़का [बँधुआ बाल मज़दूर]) सुनें, जिसे 23 जुलाई 2024 को अब्बागनी बिक्षम ने गाया था।
  2. 1940 के दशक के अंत में छद्मवेश में सशस्त्र संघर्ष की एक टुकड़ी के सदस्य। साभार: सुनील जाना
  3. 1940 के दशक के अंत में, कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य मुक्त हुए गांवों में भूमिहीनों के बीच ज़मीन बाँटने के लिए रस्सी से ज़मीन को मापते और चिह्नित करते हुए। साभार: सुनील जाना
  4. 1940 के दशक के अंत में कम्युनिस्ट पार्टी का एक सदस्य गाँववासियों को शरीर की संरचना के बारे में बताते हुए। इस तरह कम्युनिस्ट पार्टी ने मुक्त हुए गांवों की जनता तक साक्षरता और विज्ञान पहुंचाने का काम भी किया। साभार: सुनील जाना
  5. कम्युनिस्ट कवि और क्रांतिकारी, बंदी यादगिरी जिन्होंने ‘ओ शासक, निज़ाम’ कविता लिखी थी। साभार: कुरेला श्रीनिवास, 2016

संदर्भ सूची

1 V. Ramakrishna, ‘Left Cultural Movement in Andhra Pradesh: 1930s to 1950s’, Social Scientist 40, no. 1–2 (January–February 2012), 21–30.

2 मल्लू स्वराज्यम, ‘न माते तुपाकी तुतलु’ [गोलियों जैसे मेरे शब्द]। (हैदराबाद, हैदराबाद बुक ट्रस्ट, 2019), 23, हमारा अनुवाद।

3 स्वराज्यम, ‘न माते’, हमारा अनुवाद।

4 K. Navaneetham and C. S. Krishnakumar, ‘Mortality Trends and Patterns in India: Historical and Contemporary Perspectives’, in Shaping India: Economic Change in Historical Perspective, eds. D. Narayana and Raman Mahadevan (New Delhi: Routledge, 2020), 266–294.

5 आंध्र और तेलंगाना दोनों तेलुगूभाषी क्षेत्र हैं। आज़ादी से पहले आंध्र ब्रिटिश राज के अंतर्गत आता था जबकि तेलंगाना हैदराबाद के निज़ाम के अधीन था। आज़ादी के बाद और संगठित संघर्ष के बाद इन दो क्षेत्रों को मिलाकर आंध्र प्रदेश (1956) राज्य बनाया गया। 2014 में राज्य को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया गया – आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।

6 Tameshnie Deane, ‘The Devadasi System: An Exploitation of Women and Children in the Name of God and Culture’, Journal of International Women’s Studies 24, no. 1 (2022): 8.

7 A. K. Prabhakar, M A Telugu Janapada Vibhagam (Hyderabad: Dr B. R. Ambedkar Open University, 2009).

8 एस वी सत्यनारायण, ‘तेलगुलो उद्यम गीतलु’ (तेलुगू में आंदोलन के गीत)। हैदराबाद: ए पी प्रग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन, 2005, 54–56, हमारा अनुवाद।

9 सत्यनारायण, ‘तेलगुलो उद्यम गीतलु’।

10 P. Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons (Calcutta: Communist Party of India (Marxist), 1972), 3.

11 Adapa Satyanarayana and Dyavanapalli Satyanarayana, Telangana History, Culture, and Movements (From Pre-History to Formation of the State) (Hyderabad: Telangana Publications, 2022); Adapa Satyanarayana, ‘The Pioneer of People’s Literature in Telangana’, The Hans, 1 November 2016, https://www.thehansindia.com/hans/opinion/news-analysis/how-hurricanes-will-change-as-earth-warms-890664?infinitescroll=1.

12 Sunil Purushotham, From Raj to Republic: Sovereignty, Violence, and Democracy in India (Redwood City: Stanford University Press, 2021), 190. इसके साथ ही देखें Rama Sundari Mantena, ‘The Andhra Movement, Hyderabad State, and the Historical Origins of the Telangana demand: Public Life and Political Aspirations in India, 1900–1956’, India Review 13, no. 4 (2014): 337­­–357.

13 ‘पड़ाव पत’, जयधीर तिरुमाला राय द्वारा संपादित पुस्तक ‘तेलंगाना पोराता पटलु’ में से। हैदराबाद: सहिति सर्कल, 1990, पेज नं 37, हमारा अनुवाद।

14 Purushotham, Raj to Republic, 191.

15 Ramarao Peddi, ‘Theatre of the Marginalised. Politics of Representation’ (Ph.D. Thesis, University of Hyderabad, 2003), 200.

16 यादगिरी, ‘नैज़ामु सरकरोड़ा’, पुस्तक ‘तेलंगाना पोराता पटलु’ में से, पेज नं 96। हमारा अनुवाद।

17 Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons, 26. See also, G. Kamalakar, ‘Tribal and Peasant Armed Struggle in Telangana’, Interaction 36, no. 1 (2018): 51–60; Dhanaraju Vulli, ‘Making Peoples History in Telangana Movement: Remembering Voyya Raja Ram Dhanaraju’, International Research Journal of Social Sciences 3, no. 6 (June 2014): 37–43.

18 Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons; Mohan Ram, ‘The Telangana Peasant Armed Struggle, 1946–1951’, Economic and Political Weekly 8, no. 23 (June 1973); Mohan Ram, ‘The Communist Movement in Andhra Pradesh’, Radical Politics in South Asia, eds. Paul Brass and Marcus Franda (Cambridge: MIT Press, 1973); Ravi Narayana Reddy, Heroic Telangana: Reminiscences & Experiences, no.17, October 1973 (New Delhi: Communist Party Publications).

19 V. Ramakrishna, ‘Left Cultural Movement in Andhra Pradesh’.

20 Srinath Sriperumbudur, ‘The Freedom Struggle and the Telugu Song, Theatre, and Cinema in South India’, Journal of Indian History and Culture, no. 28 (December 2021): 448–465.

21 शेख बंदगी के संघर्ष के बारे में और जानने के लिए देखें, Devulapalli Venkateswara Rao, Telangana Peoples’ Armed Struggle (Devulapalli Venkateshwara Rao Research Centre, 2002), 31–39.

22 Ramarao Peddi, ‘Theatre of the Marginalised’, 252–288.

23 Stree Shakti Sanghatana, We Were Making History: Life Stories of Women in the Telangana People’s Struggle (London: Zed Books, 1989), 123.

24 तान्या नाज़ियों से लड़ने वाली एक युवा सोवियत कम्युनिस्ट ज़ोया कोस्मोडेम्यास्काया का छद्मनाम था, इन्हें युद्ध के शुरुआती दौर में ही पकड़ कर फाँसी दे दी गई थी। इनकी कहानी पूरे यूएसएसआर और दुनियाभर के कम्युनिस्टों में फैल गई। 1944 में इनके जीवन पर लेव आर्नश्तम ने बेहतरीन फिल्म ज़ोया बनाई। Ramarao Peddi, ‘Theatre of the Marginalised’, 201.

25 Sanghatana, We Were Making History, 194–195.

26 Vulli Dhanaraju, ‘Voice of the Subaltern Poet: Contribution of Suddala Hanumanthu in Telangana Peoples’ Movement’, Research Journal of Language, Literature, and Humanities 2, no. 7 (2015); और देखें: के आनंदाचारी द्वारा संपादित पुस्तक ‘प्रजाकवि सुड्डाला हनुमंथु समग्र साहित्यम-जीवितम’ [जनकवि सुड्डाला हनुमंथु का संपूर्ण साहित्य एवं जीवनी] (हैदराबाद: नव तेलंगाना पब्लिशिंग हाउस, 2024)।

27 जयधीर तिरुमाला राय, ‘तेलंगाना पोराता पटलु’, पेज नं 146, हमारा अनुवाद।

28 पसनूरी रविंदर, ‘तेलंगाना उद्यम पाट-प्रदेशिका’ [तेलंगाना आंदोलन के गीत: क्षेत्रीय अवलोकन] (हैदराबाद: तेना, 2016); एस वी सत्यनारायण, ‘तेलगुलो उद्यम गीतलु’ [तेलुगू में आंदोलन के गीत], (हैदराबाद: पोत्ती श्रीरामुलू तेलुगु यूनिवर्सिटी, 2019)।

29 Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons, vii.

30 Reproduced in Sundarayya, Telangana People’s Struggle and Its Lessons, 383–414.

31 Telakapalli Ravi, ‘Peasant Struggles in Andhra Pradesh and Telangana: Reports from the Field’, Review of Agrarian Studies 5, no. 2 (2015): 114; तेलकपल्ली रवि, जी रघुपाल, साय्याद निसार, एवं महेंद्र एम रेडी, ‘वीर तेलंगाना माड़ी’ [हमारा वीर तेलंगाना] (हैदराबाद: भारत की कोम्मनस्त पार्टी (मार्क्सवादी), 2006); जी रघुपाल एवं बी वेंकटेश्वरलु, ‘सी सी ओ नलगोंडा वीरूलु’ [तैयार रहो, नलगोंडा के नायक](हैदराबाद: प्रजाशक्ति, 2011); यू रामकृष्ण, ‘कृष्णा ज़िला कम्युनिस्ट उद्यम गाथालु: त्यागदनुला वीरचरित्रालु’ [कृष्णा ज़िला के कम्युनिस्ट आंदोलन और वीरतापूर्ण बलिदान की कहानियाँ] (विजयवाड़ा: भारत की कॉम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), 2012); के आनन्दाचारी, पी वी कृष्णा राव, एवं नन्ना नगेस्वर राव, ‘खम्माम ज़िला कम्युनिस्ट योधुलू’ [खम्माम ज़िला के कम्युनिस्ट योद्धा] (खम्माम: बोडेपड़ि विज्ञान केंद्र, 2012); एम वी एस कोटेस्वर राव, सी एच हरी बाबू, एवं सुधा किरण, ‘गुंटूर डिस्ट्रिक्ट कम्युनिस्ट वीरूलू’ [गुंटूर ज़िला के कम्युनिस्ट शहीद] (हैदराबाद: प्रजाशक्ति बुक हाउस, 2013); जी रघुपाल, एवं एस यादगिरी, ‘वारंगल वीर गाथालु’ [वारंगल की वीर गठाएँ] (वारंगल: भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), 2006); वाई सिद्दय्या, ‘प्रकासम ज़िला अमर वीरुलु’ [प्रकासम ज़िला के अमर सैनिक] (हैदराबाद: प्रजाशक्ति बुक हाउस, 2012).

32 K. Srinivasulu, ‘Caste, Class, and Social Articulation in Andhra Pradesh: Mapping Differential Regional Trajectories’, Working Paper no. 179, Overseas Development Institute, Osmania University, 2002, 8.

33 Joseph Stalin, J. V. Stalin Works, vol. 7 (Moscow: Foreign Languages Publishing House, 1954); N. Venugopal Rao, Understanding Maoists: Notes of a Participant Observer from Andhra Pradesh (Kolkata: Setu Prakashani, 2013), 99; Tricontinental: Institute for Social Research, Go to Yan’an: Culture and National Liberation, dossier no. 52, 16 May 2022, https://thetricontinental.org/dossier-yanan-forum/.

34 Venugopal, Understanding Maoists.

35 K. G. Satyamurthy, ‘Narudo Bhaskarudo’, in Shivasagar Poetry, ed. Gurram Sitharamulu (Hyderabad: Anvikshi Publishers, 2019), 36–38.

36 बी नर्सिंग राव, ‘अग्नि सरस्सुना विरिसिना वज्रम’ [अग्नि ताल में खिला हीरा] (हैदराबाद: विस्वनाथ साहित्य पीठम, 2023), 5, हमारा अनुवाद।

37 Gaddar, My Life Is a Song: Gaddar’s Anthems for the Revolution, trans.Vasanth Kannabiran (New Delhi: Speaking Tiger Books, 2021), E-book.

38 Gaddar, My Life Is a Song, 44–64.

39 Gaddar, My Life Is a Song.

40 For more on Gaddar and for a selection of his songs in English translation, see My Life Is a Song.

41 Gaddar, My Life Is a Song; Keshav Kumar, ‘Singing for Revolution: Revisiting the Life and Lyrics of Gaddar’, Maidaanam, 3 October 2023, https://maidaanam.com/singing-for-revolution-revisiting-the-life-and-lyrics-of-gaddar/.

42 Mao Zedong, ‘Report on an Investigation of the Peasant Movement in Hunan’, in Selected Works of Mao Tse-tung, vol. 1 (Peking: Foreign Languages Press, 1965), 47.

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एक नए शीत युद्ध से उत्तर-पूर्व एशिया में हड़कंप https://thetricontinental.org/hi/sheet-yuddh-uttar-purv-asia/ Tue, 21 May 2024 08:00:48 +0000 https://thetricontinental.org/?p=113153

यह डोसियर सियोल स्थित इंटरनैशनल स्ट्रैटिजी सेंटर (आईएससी) के साथ मिलकर तैयार किया गया है और इसे डे-हान सॉन्ग ने लिखा है। आईएससी की सामग्री तैयार करने वाली टीम (एलिस किम, जिओवानी वासतीदा, ग्रेग चंग, मरियम इब्राहीम, मैथ्यू फिलिप्स और ज़ोइ युंगमि ब्लैंक) का ख़ास तौर से शुक्रिया और साथ ही ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान का उनके सहयोग, सुझाव और संपादन के लिए शुक्रिया, जिससे यह डोसियर संभव हो सका।

जापानी दंपति मारुकी इरी (1901-1995) और मारुकी तोषी (1912-2000) ने बत्तीस साल में ‘द हिरोशिमा पैनल्स’ (चित्रों की एक शृंखला) तैयार किया। इनके ज़रिए वे अगस्त 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बमों से हुई तबाही को दिखाना चाहते थे। इस बत्तीस साल के अरसे में उन्होंने हिरोशिमा और नागासाकी के नरसंहार को दर्शाते हुए लगभग 900 मानव आकृतियां बनाईं (इस हमले में कितने लोग मारे गए, इसका सटीक आँकड़ा नहीं है, लेकिन अनुमान है कि 220,000 लोगों की मौत हुई थी)।1 सुमी-ई नाम की पारंपरिक जापानी वाश तकनीक से बनी यह शृंखला जंग के ख़िलाफ़ और शांति के पक्ष में एक ज़ोरदार आवाज़ है और यही आवाज़ यह डोसियर इस क्षेत्र और बाक़ी दुनिया के लिए बुलंद कर रहा है।

इरी और तोषी मारुकी, I प्रेत, 1950 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

18 अगस्त 2023 को संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया के राष्ट्र प्रमुख कैम्प डेविड में एक ऐतिहासिक सम्मेलन के लिए इकट्ठा हुए। मेरीलैंड के फ्रेडरिक काउंटी में राष्ट्रपति के एकांतवास पर तीनों नेताओं ने उत्तर-पूर्व एशिया में मुख्यत: चीन के उभार को रोकने के लिए ‘त्रिपक्षीय सुरक्षा सहयोग’ के लिए एक नए समझौते की घोषणा की।2 इससे पहले ऐसी संधि करने की वाशिंगटन की कोशिशों पर जापान और दक्षिण कोरिया के आपसी संबंधों की कटुता की छाया पड़ती रही थी, जिसकी जड़ें जापानी उपनिवेशवाद के इतिहास में हैं। लेकिन इस बार यह सैन्य गुट बन पाया क्योंकि औपनिवेशिक और युद्ध अपराधों के लिए जापान को जो क्षतिपूर्ति चुकानी थी, वो दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यूं सुक येओल ने माफ़ कर दी।

यूएस के नेतृत्व में चीन के ख़िलाफ़ चल रहे नए शीत युद्ध की वजह से उत्तर-पूर्व एशिया में अस्थिरता पैदा हो रही है। आपसी टकराहट की वजह से अशांति के ख़तरे से ग्रस्त इस इलाक़े में एक विस्तृत सैन्यकरण अभियान चल रहा है, जो जापान और दक्षिण कोरिया से लेकर ताइवान जलडमरूमध्य और फ़िलिपींस से लेकर ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत महासागर के द्वीपों तक फैला हुआ है। वाशिंगटन की शह पर जापान के प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा ने अपने देश को फिर से हथियारबंद करने की प्रक्रिया तेज़ कर दी है। उनका लक्ष्य है 2027 तक सैन्य ख़र्च को दोगुना करना और दुश्मन पर निशाना साधने के लिए लंबी दूरी की मिसाइलें हासिल करना।3 इस बीच जैसे-जैसे यूएस इस क्षेत्र में अपनी शक्ति बढ़ाने की कोशिश कर रहा है कोरिया की शांति प्रक्रिया कमज़ोर हो गई है। हालांकि सैन्यकरण के लिए प्रायः उत्तरी कोरिया को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है लेकिन यह हमेशा से अपना दबदबा बनाए रखने की रणनीतियों के लिए एक बहाना रहा है – पहले यह सोवियत संघ के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता था और अब चीन के विरुद्ध।

सच कहा जाए तो उत्तर-पूर्व एशिया में ‘पुराना’ शीत युद्ध कभी ख़त्म ही नहीं हुआ, आज भी इसकी आग कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान जलडमरूमध्य में सुलग रही है। सोवियत संघ के विघटन और वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन को सम्मिलित किए जाने के बावजूद, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद द्विपक्षीय सैन्य समझौतों का जो यूएस नेटवर्क या जाल तैयार किया गया था, उसने आज भी इस क्षेत्र को विभाजित कर रखा है। पर आपसी टकराहट के बीच ऐसे बहुत से सकारात्मक आंदोलन हैं, जो ओकिनावा द्वीप से लेकर चहल-पहल भरे सियोल महानगर तक उत्तरपूर्व एशिया में शांति, पर्यावरण को बचाने और लोगों की बेहतरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शांतिमय और सहयोगपूर्ण भविष्य के लिए ज़रूरी है कि यूएस के नेतृत्व में चल रहे इस नए शीत युद्ध को रोका जाए और पिछले 70 सालों से इस क्षेत्र में न्याय और सुलह के रास्ते का रोड़ा बने द्विपक्षीय समझौतों को ख़त्म किया जाए।


इरी और तोषी मारुकी, II अग्नि, 1950 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

भाग I: नया शीत युद्ध

 यूएस की एशिया केंद्रित नीति

2008 के अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संकट के बाद से वैश्विक व्यवस्था में बदलाव आया है। यह अब संयुक्त राज्य अमेरिका की अगुआई वाले सात देशों के समूह (जी7) पर केंद्रित न रहकर कुछ कम एकध्रुवीय हो गई है, हालांकि अब तक इस नई व्यवस्था को ठीक से परिभाषित नहीं किया जा सका है। विश्व में जारी आर्थिक संकट (या तीसरी महामंदी) से निपट पाने में अमेरिका और उसके साथियों की अक्षमता, चीन के आर्थिक उत्थान और विश्व राजनीतिक परिदृश्य में ग्लोबल दक्षिण के मुल्कों के, ख़ासकर ब्रिक्स के ज़रिए आगमन से पश्चिमी ताक़तों के नेतृत्व और उनकी नीतियों की वैधता ख़तरे में पड़ गई है।4

इस संदर्भ में यूएस की तमाम सरकारों की विदेश नीति लगातार पूर्व की ओर केंद्रित होती जा रही है ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके। वाशिंगटन विश्व में चले आ रहे अपने वर्चस्व के लिए चीन को सबसे बड़ा ख़तरा समझता है। ओबामा प्रशासन ने इस नीति को ‘पिवट टू एशिया’ (एशिया केंद्रित नीति) का नाम दिया। यह एक रणनीतिक परिवर्तन था जिसके आर्थिक और सैन्य, दोनों पहलू थे। एक तरफ ट्रांस-पेसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) का ओबामा के शब्दों में उद्देश्य था ‘इस सदी में दुनिया की अर्थव्यवस्था के नियम संयुक्त राज्य अमेरिका लिखे न कि चीन जैसे देश’।5 दूसरी तरफ़ यह तय हुआ कि यूएस पेसिफिक कमांड (जिसका नाम 2018 में इंडो-पेसिफिक कमांड कर दिया गया) के विस्तार के साथ साल 2020 तक यूएस के 60% युद्धपोत एशिया- प्रशांत क्षेत्र में तैनात हों।6 यहाँ याद रखना चाहिए कि चीनी सरकार ने साफ़ कर दिया था कि वह विश्व पर अपना वर्चस्व नहीं जमाना चाहती। उसके बाद भी यूएस ने इस शत्रुतापूर्ण विदेश नीति की शुरुआत की। उदाहरण के लिए, 2012 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) ने अपनी 18वें राष्ट्रीय कांग्रेस में एक ऐसी विदेश नीति पेश की जिसका मकसद ‘एक नए तरीके के शक्ति संबंध’ बनाना था, जिसमें चीन का ‘शांतिपूर्ण उत्थान’ सीधे-सीधे संयुक्त राज्य अमेरिका के विरोध में नहीं होगा।7

ट्रम्प और बाइडन दोनों ने अपने-अपने तरीक़ों से ओबामा की एशिया केंद्रित नीति को ही जारी रखा, लेकिन इसमें एक बड़ा अंतर भी था। जब तक ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद संभाला तब तक साफ़ हो चुका था कि यूएस कांग्रेस टीपीपी का समर्थन नहीं करने वाली। यह जल्दी ही बिखर गया (जबकि एशियाई देश – जिनमें चीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है – 2020 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) पर हस्ताक्षर कर एकजुट हो गए)। चीन के ख़िलाफ़ ट्रम्प के व्यापार युद्ध ने इस क्षेत्र में ओबामा के बहुपक्षीय आर्थिक हस्तक्षेप की जगह ले ली, क्योंकि वाशिंगटन अब बीजिंग के प्रति ज़्यादा आक्रामक रुख अपना रहा था।8 ट्रम्प सरकार ने अपनी नैशनल सिक्युरिटी स्ट्रैटिजी,2017 (राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति, 2017) में ‘फ्री एण्ड ओपन इंडो-पेसिफिक’ (मुक्त और खुला हिंद-प्रशांत) को रेखांकित करते हुए चीन को एक मुख्य ख़तरे के रूप में पेश किया; उस पर आरोप लगाया कि वह ‘अमेरिका की ताक़त, प्रभाव और हितों को चुनौती देना’ चाहता है और अंतत: ‘अमेरिकी मूल्यों और हितों के विपरीत एक दुनिया गढ़ना’ चाहता है।9

बाइडन सरकार ने ट्रम्प की आर्थिक संरक्षणवाद (जिसे कई बार ‘डिकप्लिंग’ यानी अलग होने की नीति भी कहा जाता है) और सैन्यवाद की नीति को और सख़्त बनाया। बाइडन सरकार ने कई तरह के निर्यात नियंत्रणों के ज़रिए कोशिश की चीन के लिए सबसे बेहतरीन सेमीकंडक्टर (जिन्हें चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए सबसे अहम माना जाता है) हासिल करना मुश्किल हो जाए और इससे जुड़ी अन्य तकनीकें भी; साथ ही सेमीकंडक्टर उद्योग में अग्रणी देशों जैसे दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और नीदरलैंड पर भी दबाव डाला कि वे चीन पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाएँ।10 इसी बीच चिप्स एण्ड साइंस ऐक्ट (2022) के ज़रिए बाइडन ने सेमीकंडक्टर निर्माण की यूएस में ‘पुनर्स्थापना’ को बढ़ावा देने की कोशिश की।11 पेंटागन के एक भूतपूर्व अधिकारी जॉन बेटमैन ने जो बाइडन की नीतियों के बारे में कहा, ‘रणनीतिक लक्ष्य और राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ इससे पहले कभी इतनी स्पष्ट नहीं थीं। चीन का तकनीकी विकास किसी भी क़ीमत पर धीमा कर दिया जाएगा।… [यूएस] खुले तौर पर चीन को अपना एक विकसित आर्थिक समकक्ष बनने से रोकेगा।’12

इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक यह है कि बाइडन ने अपनी पिछली सरकारों के इंडो-पेसिफिक सैन्यकरण की रणनीति को और भी तेज़ कर दिया। बाइडन प्रशासन ने ट्रम्प शासन के दौर में दोबारा शुरू हुए ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और यूएस के एक रणनीतिक ग्रुप ‘ चतुर्भुज सुरक्षा संवाद’ (क्वाड) को और भी मज़बूत किया, इसके साथ ही नए गुट भी बनाए गए जैसे ऑस्ट्रेलिया-यूनाइटेड किंगडम-संयुक्त राज्य अमेरिका (AUKUS) परमाणु-संचालित पनडुब्बी समझौता और जापान-दक्षिण कोरिया-संयुक्त राज्य अमेरिका (JAKUS) सुरक्षा पार्टनरशिप। इन सब क़दमों से एशिया में तनाव और हथियारों के लिए होड़ बढ़ रही है, ख़ासतौर से उत्तर-पूर्व एशिया में जहाँ यूएस सेना की विदेशी क्षेत्रों में मौजूदगी दुनिया में किसी दूसरे क्षेत्र से सबसे ज़्यादा है।13

इरी और तोषी मारुकी, III जल, 1950 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

एक एशियाई नाटो के निर्माण की कोशिश?

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के नेतृत्व वाली ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ को उसकी भारी-भरकम सैन्य उपस्थिति के माध्यम से बनाए रखा जाता है, जो हवाई और गुआम से लेकर चीन के तट तक फैली हुई है। उत्तर-पूर्व एशिया में यह सेना मुख्यत: जापान और दक्षिण कोरिया में मौजूद है। इन दोनों को मिलाकर 80,000 से ज़्यादा सैनिक और 193 अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, जो यूएस के विदेशी ज़मीन पर सैन्य अड्डों का लगभग एक चौथाई हैं।14 इतने बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती से अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया की त्रिपक्षीय सैन्य साझेदारी काफ़ी हद तक उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के स्तर पर पहुंच गई है। 2023 कैम्प डेविड सम्मेलन के अंत में अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया ने एक साझा वक्तव्य जारी किया, जो उनकी ‘त्रिपक्षीय सुरक्षा सहयोग’ का ख़ाका सामने रखता है। इसमें उन्होंने ‘एक-दूसरे से मशविरा करने’ और ‘क्षेत्रीय चुनौतियों, उकसावे और ख़तरों का जवाब देने में समन्वय’ का वादा किया, उन्होंने चीन और उत्तर कोरिया का नाम अपनी ‘साझा चिंताओं’ के तौर पर सामने रखा। सबसे बड़ी बात यह कि यूएस ने स्पष्ट शब्दों में दोहराया कि वह जापान और दक्षिण कोरिया को किसी भी तरह के सैन्य हमले से बचाने के लिए दृढ़संकल्प है और इसके लिए अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करेगा।15 इन्हें समग्रता में देखने से पता चलता है कि ये वादे नाटो सैन्य संधि के ‘संयुक्त सुरक्षा’ के सिद्धांत के कितने ज़्यादा करीब हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका इस तरह की तुलना को छुपाने की फ़िराक़ में रहता है। इसके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सलीवन ने कहा कि JAKUS समझौता ‘पेसिफिक के लिए एक नाटो नहीं’ है और इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह यूएस की विदेश नीति के लिए कोई ‘नया कदम’ भी नहीं। लेकिन इसके साथ ही सलीवन ने इस समझौते को एक ‘महत्त्वपूर्ण सफलता’ मानते हुए ख़ुशी भी ज़ाहिर की।16 JAKUS समझौते के तहत जो ‘मशविरा’ और ‘संयुक्त जवाबी कारवाई’ के वादे हैं, वे भले ही नाटो के ‘संयुक्त सुरक्षा’ के सिद्धांत से कुछ कम हों, लेकिन यूएस अधिकारियों ने फिर भी इस समझौते को ‘सुरक्षा और व्यापक सहयोग को बुनियादी तौर से अगले स्तर तक पहुँचाने’ वाला समझौता कहकर ख़ूब सराहा है।17 तीनों देशों ने कुछ साझे मूल्यों की रक्षा करने का वचन दिया, चीन को एक ख़तरा माना और मिसाइल सुरक्षा और सालाना त्रिपक्षीय अभ्यासों के लिए भी हामी भरी, इससे ज़ाहिर है कि JAKUS सुरक्षा समझौते में अहम सैन्य संधि वाले पहलू हैं जो दक्षिण कोरिया और जापान को यूएस-चीन के बीच के किसी तनाव में घसीट सकते हैं, खासतौर से ताइवान के इर्द-गिर्द।

सैन्य दृष्टि से देखें तो JAKUS समझौता चीन के तट के पास ‘प्रथम द्वीप शृंखला’- जो जापान से शुरू होकर ताइवान और फ़िलिपींस से होते हुए मलेशिया तक फैली है- तक यूएस की पहुँच बना देगा। शीत युद्ध के दौरान यूएस अधिकारियों ने इस द्वीपों की ‘शृंखला’ की अवधारणा तैयार की थी, यह उनके लिए नियंत्रण रेखा थी, जिसका इस्तेमाल उन्होंने सोवियत संघ और चीन पर अंकुश लगाने की अपनी रणनीति के तहत किया। पहले सैन्य अभ्यास कभी-कभार ज़रूरत के आधार पर होते थे, लेकिन अब ये वार्षिक, बहु-क्षेत्रीय त्रिपक्षीय अभ्यासों की तरह नियमित रूप ले चुके हैं, जिनसे इन तीनों देशों की सेनाओं में आपसी तालमेल बेहतर हुआ है।18 व्यापक स्तर पर देखा जाए तो संयुक्त राज्य अमेरिका इस त्रिपक्षीय समझौते का इस्तेमाल इस क्षेत्र में अपनी ताक़त को बचाए रखने और मज़बूत करने के लिए करना चाहता है। इसके लिए वह एकीकृत वायु और मिसाइल सुरक्षा (आईएएमडी) रणनीति के ज़रिए चीन के ए2/एडी (एंटी एक्सेस/एरिया डिनायल) मिसाइल सिस्टम को निशाना बनाना चाहता है, जो यूएस नौसेना के जहाज़ों को इस क्षेत्र तक पहुंचने और किसी तरह की घेरेबंदी का प्रयास करने से रोकता है।19 चीन की ए2/एडी रणनीति के तहत लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात की गई हैं, जो यूएस विमान वाहक पोतों को चीनी तटों के आसपास किसी तरह की कार्रवाई नहीं करने देतीं। इसके जवाब में IAMD ने कोरिया में टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) मिसाइलों से लेकर जापानी एजिस युद्धपोतों तक सैन्य प्रणाली को ‘आक्रामक-रक्षात्मक एकीकरण’ के तहत एक संयुक्त नेटवर्क में जोड़ने की योजना बनाई है ताकि किसी भी तरह के हमले से बचाव हो सके।20 इसके साथ ही तीनों देशों के रडारों को भी हवाई में यूएस के प्लैटफॉर्म में ही एकीकृत कर दिया जाएगा।21

दक्षिण कोरिया और जापान पर अधिक सुरक्षा सहयोग स्थापित करने के लिए जो अमेरिकी दबाव रहा है, वह मुख्यतः इस एकीकृत नेटवर्क के निर्माण के लिए ही है, जिसमें 2016 में हस्ताक्षरित सैन्य सूचना समझौते की सामान्य सुरक्षा (GSOMIA) के माध्यम से सैन्य खुफ़िया जानकारी साझा करना शामिल है। GSOMIA को वैसे तो उत्तर कोरिया की मिसाइली कार्रवाई से निपटने के लिए एक ज़रिया बताया जाता है लेकिन इसके तहत व्यापक जानकारियां साझा करने का मतलब है कि समझौते के सभी पक्षों के लिए चीन और रूस से जुड़ी जानकारियाँ भी साझा करना अनिवार्य है। यूएस के साथ दक्षिण कोरिया और जापान के पहले से मौजूद द्विपक्षीय समझौतों की बुनियाद पर GSOMIA ने रियल-टाइम मिसाइल की चेतावनी का डाटा सहित त्रिपक्षीय खुफ़िया जानकारी साझा करने के रास्ते खोल दिए हैं।23

इरी और तोषी मारुकी, IV इंद्रधनुष, 1951, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

उत्तर कोरिया का हौवा

दूसरा ताइवान की ‘रक्षा’ की ज़रूरत। लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि यूएस के लिए उत्तर कोरिया के साथ शांति क़ायम करना कभी भी सोवियत संघ और चीन के प्रभाव को रोकने की रणनीतियाँ बनाने से ज़्यादा ज़रूरी नहीं रहा। 1953 में कोरिया युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद से यूएस ने कभी भी उत्तर कोरिया के साथ अमन क़ायम करने की कोई निरंतर प्रक्रिया चलाने की कोशिश नहीं की है। इतने दशकों में अगर कभी बातचीत की शुरुआत भी हुई तो उसे नाकाम किया गया, रोक दिया गया या सत्ता परिवर्तन की वजह से नज़रंदाज़ किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए क्लिंटन के कार्यकाल में यूएस और उत्तर कोरिया ने ‘अग्रीड फ्रेमवर्क’ (1994) पर हस्ताक्षर किए, जिससे शांति क़ायम होने और परमाणु हथियारों से मुक्ति का रास्ता लगभग खुल रहा था, लेकिन रिप्ब्लिकन पार्टी के दबदबे वाली यूएस कांग्रेस ने इसे रोक दिया और फिर बुश द्वितीय के शासन काल में नवरूढ़िवादी जॉन बोल्टन और रॉबर्ट जोसेफ ने इसे ख़त्म कर दिया।24 यही सिलसिला 2019 में दोहराया गया, जब यूएस और उत्तर कोरिया की बातचीत बंद हो गई क्योंकि ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम के हनोई में एक सम्मेलन के दौरान संभावित समझौते की शर्तें अचानक बदल दीं (एक बार फिर बोल्टन ने इसमें अहम भूमिका निभाई)।25

कोरियाई प्रायद्वीप में एक नियंत्रित तनाव और टकराव बनाए रखना यूएस के लिए इस क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई बरक़रार रखने का एक अच्छा बहाना है। मसलन 2017 में यूएस के THAAD मिसाइल रोधी सिस्टम दक्षिण कोरिया में यह कहकर लगाया गया कि यह उत्तर कोरिया के हमले से रक्षा करेगा, लेकिन इसे जहाँ लगाया गया था वहाँ से यह सियोल महानगरीय क्षेत्र समेत देश की आधी आबादी की रक्षा नहीं कर सकता था।26 लेकिन THAAD इस जगह से चीन के मिसाइल सिस्टम को काफी अंदर तक भेद सकता है।27 नए शीत युद्ध के ज़रिए यूएस ने कोरियाई प्रायद्वीप में शांति प्रक्रिया को लटका रखा है और भू-राजनीतिक बँटवारों को और बढ़ा रहा है, इस बँटवारे में दक्षिण के देश अमेरिका की तरफ़ और उत्तर के मुल्क रूस और चीन की तरफ़ जा रहे हैं।

इरी और तोषी मारुकी, V लड़के और लड़कियाँ, 1951 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

तनाव का केंद्र ताइवान

इसी तरह ताइवान जलडमरूमध्य में भी शांति स्थापित करना यूएस के लिए कभी मुख्य उद्देश्य नहीं रहा है। वैसे तो बीजिंग, ताइपे और वाशिंगटन, तीनों ही ने औपचारिक तौर पर इस द्वीप और मुख्य भूमि को ‘एक चीन’ का हिस्सा स्वीकार किया है, लेकिन यूएस की दखलंदाजी की वजह से 1949 में चीन के गृहयुद्ध खत्म होने के बाद से ही ये दोनों बँटे हुए हैं। ताइवान से जुड़ा हालिया तनाव 2016 में हुआ, जब यूएस-समर्थक और अलगाववादी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) के साई इंग-वन चुनाव जीते। डीपीपी का मानना है कि ताइवान एक ‘संप्रभु राज्य’ है और ‘चीनी जनवादी गणराज्य का हिस्सा नहीं है’।28 यह स्थिति ट्रम्प और बाइडन दोनों के ही शासन में बिगड़ी है, जब इस दौरान यूएस अधिकारियों और दोनों ही मुख्य राजनीतिक दलों से जुड़े नीति निर्माताओं के इस द्वीप पर अभूतपूर्व और विवादित दौरे हुए। 2020 में ट्रम्प के स्वास्थ्य मंत्री एलेक्स अज़ार 1979 के बाद ताइवान के आधिकारिक दौरे पर जाने वाले अमेरिकी मंत्रिमंडल के सबसे बड़े अधिकारी बने। इसके दो साल बाद बाइडन के कार्यकाल में अमेरिकी सभा की स्पीकर नैन्सी पेलोसी इस द्वीप के दौरे पर गईं और 1997 के बाद ऐसा करने वाली पहली पदेन स्पीकर बनीं। इनके दौरों ने चीन को व्यापक स्तर के सैन्य अभ्यासों के ज़रिए जवाब देने के लिए उकसाया, जो उसके 2005 के अलगाव-विरोधी क़ानून के मुताबिक था कि ‘चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने के लिए ग़ैर-शांतिपूर्ण तरीके और अन्य आवश्यक तरीके अपनाये जा सकते है’ यदि ‘पुन: एकीकरण की शांतिपूर्ण संभावनाएँ… पूर्ण रूप से चुक गई हों’।29 2022 में सीपीसी की 20वीं राष्ट्रीय कांग्रेस में चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने पुरज़ोर तरीक़े से अपना मत फिर से सामने रखा:

ताइवान चीन का ताइवान है। ताइवान का प्रश्न सुलझाना चीन का मुद्दा है और इसे चीन ही सुलझाएगा। हम शांतिपूर्ण तरीके से पुन: एकीकरण की पूरी ईमानदारी से कोशिश करेंगे, लेकिन हम ताकत का इस्तेमाल न करने का वादा कभी नहीं करेंगे और हम हर आवश्यक विकल्प चुनने का अधिकार रखते हैं। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ इस मामले में हस्तक्षेप कर रही बाहरी ताक़तों और ‘स्वतंत्र ताइवान’ चाहने वाले कुछ अलगाववादियों और उनकी फिरकापरस्त गतिविधियों के लिए है: यह बात ताइवान के हमारे हमवतनों के लिए बिल्कुल भी लागू नहीं होती।30

ताइवान पर वाशिंगटन का बढ़ता फोकस इस बात का संकेत है कि ताइवान में बैठी यूएस समर्थित सेना की ताक़त चीनी सामने कमज़ोर पड़ रही है। जैसा कि 2002 में यूएस कांग्रेस की अनुसंधान सेवा की एक रिपोर्ट में माना गया था, ‘दशकों तक ताइवान की सेना चीन की सेना से ज़्यादा विकसित थी… जैसे-जैसे चीन की वायु, जल, मिसाइल और उभयचर सेनाएँ और सक्षम हुईं, ताइवान जलडमरूमध्य में शक्ति का संतुलन बहुत हद तक पीआरसी (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) के पक्ष में झुक गया है’।31 एक अधिक सक्षम चीन का सामना होने पर यूनाइटिड स्टेट्स ने ताइवान पर ‘ पॉर्क्यूपाइन रणनीति’ ( इसे साही रणनीति कहते हैं। साही एक जानवर है, जिसके पूरे बदन पर कांटे होते हैं। कोई जानवर उस पर हमला करता है तो वे कांटे खड़े हो जाते हैं, जिससे हमलावर जानवर घायल होकर भाग खड़ा होता है। ऐसे ही कोई कमज़ोर देश इस तरह अपनी तैयारी करता है कि वह बड़े हमलावर देश को भारी नुक़सान पहुंचाकर अपने क़दम पीछे खींचने पर मजबूर कर सके। इसके तहत ताइवान ने अपने समुद्री तटों में ‘साही के कांटों’ की तरह घातक हथियार जमा रखे हैं। शहरों में छापामार युद्ध की योजना बनाई है। ताइपे में कुछ भवनों का निर्माण ऐसा किया गया है कि इसे कभी भी हालात के अनुसार बैरक में बदला जा सकता है।) अपनाने का दबाव डाला जिसके तहत इस द्वीप को धड़ल्ले से हथियार बेचे गए ताकि अगर बीजिंग जबरन पुन: एकीकरण की कोशिश करे तो चीन की मुख्य धरती को काफी हद तक नुकसान पहुँचाना ताइवान के लिए मुमकिन हो।32 यह रणनीति अंतत: इस बात पर निर्भर करती है कि ताइवान, चीन की धरती पर भारी जनहानि और बर्बादी तथा उससे भी बड़े स्तर पर ताइवान के विध्वंस को स्वीकार करने के लिए तैयार है कि नहीं।

इरी और तोषी मारुकी, VI परमाणु रण, 1952 , हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

सैन्य तनाव बढ़ने का ख़तरा

अगर यह माना जाए कि मिसाइल रक्षा तकनीक यूएस और उसके साथियों की हिफ़ाज़त करेगी, जिससे नए शीतयुद्ध में सैन्य तनाव कम होगा, तो इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यह सुरक्षा कवच अपने आप में अभेद्य नहीं है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मिसाइलों का पता लगाने के लिए रडार और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए इंटरसेप्टर बनाने में कितने संसाधन ख़र्च किए जाते हैं, मिसाइलों की अपेक्षाकृत सस्ती लागत और आसान उत्पादन हमलावर देश को इस सुरक्षा तंत्र को छिन्न-भिन्न करने के लिए और अधिक मिसाइलें बनाने को प्रेरित करता है।33 ऐसा इसलिए है क्योंकि सुरक्षा तंत्र को आक्रामक मिसाइलों की तुलना में अधिक सटीकता की आवश्यकता होती है, क्योंकि उन्हें आकाश में एक गतिशील वस्तु पर निशाना लगाकर उसे नष्ट करना होता है। इसका मतलब हुआ कि आत्मरक्षा के लिए एक गोली को गोली से तबाह करना होता है। सही मायनों में ग्राउन्ड-बेस्ड मिडकोर्स डिफेन्स (GMD) सिस्टम, जो मिसाइल हमलों से यूएस की रक्षा करता है, बेहद नियंत्रित अभ्यासों के दौरान सिर्फ़ 55% ही कारगर रहा है। 90 % तक कारगर होने के लिए GMD सिस्टम को आते हुए हर वॉरहेड (मिसाइल) के लिए तीन इंटरसेप्टर (हमलावर मिसाइल को नष्ट करने के लिए जवाबी मिसाइल) दागने पड़ेंगे। पूरे यूएस मिसाइल आत्मरक्षा नेटवर्क में अब तक के अभ्यासों में सफलता लगभग 80% तक ही सीमित रही है।34 मिसाइल आत्मरक्षा तकनीक संयुक्त राज्य अमेरिका को भी पूरी तरह से बचाने के लिए नाकाफ़ी हैं, ताइवान, दक्षिण कोरिया और जापान की क्या ही बात की जाए। परिस्थिति का बिगड़ना सिर्फ़ एक चीज़ से ‘रुका हुआ’ है, वह है तुरंत व्यापक स्तर पर जवाबी कार्रवाई का डर जिसकी वजह से टकराव नियंत्रण से बाहर हो जाएगा और परिणाम होगा दोनों पक्षों की भारी क्षति।

इरी और तोषी मारुकी, VII बैम्बू ग्रोव, 1954, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

भाग II: ‘पुराना’ शीत युद्ध कभी ख़त्म हुआ ही नहीं

उत्तर-पूर्व एशिया में मौजूदा तनाव इस क्षेत्र में ‘पुराने’ शीत युद्ध के दौरान पड़ी दरार के अंदर ही सुलगता चला आ रहा है। इस दरार के एक तरफ़ थे यूएस, दक्षिण कोरिया, जापान और ताइवान तो दूसरी तरफ़ थे सोवियत संघ, चीन और उत्तर कोरिया। इस नए शीत युद्ध को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि इस इतिहास ने किस तरह जापान, कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान को गढ़ा है।

इरी और तोषी मारुकी, VIII राहत कार्य, 1954, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

जापान की फिर से हथियारबंदी

1947 में द्वितीय विश्व युद्ध में हार के बाद जापान ने एक नया ‘शांति संविधान’ लागू किया जिसमें इसने संकल्प लिया कि ‘हमेशा के लिए युद्ध… और अंतर्राष्ट्रीय मतभेदों को खत्म करने के लिए धमकी या ताकत के इस्तेमाल को त्याग देगा’।35 लेकिन जल्द ही चीनी क्रांति हुई और कम्यूनिज़्म के विस्तार के डर से संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान को इस क्षेत्र में एक कम्युनिस्ट-विरोधी दीवार बनाने का काम किया। जैसा कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय के इतिहासकार याद करते हैं, ‘एक बार फिर से हथियारबंद और युद्धप्रिय जापान का विचार अब यूएस अधिकारियों को नहीं डराता था; बल्कि असली ख़तरा कम्यूनिज़्म के विस्तार का लगने लगा था, ख़ासतौर से एशिया में’।36 मित्र देशों और जापान के बीच 1951 में सैन फ्रांसिस्को शांति संधि की शुरुआत करते हुए, अमेरिका ने इस क्षेत्र में द्विपक्षीय गठबंधनों का एक नेटवर्क बनाया, जिसे सैन फ्रांसिस्को प्रणाली के रूप में जाना जाता है, जिसने पूर्वोत्तर एशिया को ताइवान जलडमरूमध्य और कोरियाई प्रायद्वीप के साथ विभाजित किया।37 सात दशकों से भी ज़्यादा से सैन फ्रांसिस्को प्रणाली ने इस क्षेत्र में एक अंदरूनी बँटवारे को बनाए रखा है, साथ ही ताइवान जलडमरूमध्य और कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव की चिंगारी को भी।

संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए मुख्य मुद्दा युद्धोत्तर एशिया में शांति स्थापित करना नहीं था, बल्कि कम्यूनिज़्म के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई के लिए सैन्य शक्ति को बढ़ाना था। सैन फ्रांसिस्को संधि में यूएस की तरफ से मुख्य मध्यस्थ जॉन फॉस्टर डल्स ने वाशिंगटन का मत इस तरह पेश किया: ‘क्या हमें जापान में अपने जितने चाहे सैनिक, जहाँ चाहे और जब तक चाहे रखने का अधिकार है? यही मुख्य प्रश्न है’।38 यह लक्ष्य पाने के लिए यूएस ने युद्ध के बाद न्याय की प्रक्रियाओं को बाधित किया, उपनिवेशवादी और युद्ध अपराधों के लिए जापान की जिम्मेदारियों को नज़रंदाज किया (जिसमें नरसंहार, जैविक युद्ध, यौन ग़ुलामी, मनुष्यों पर परीक्षण और बंधुआ मज़दूरी शामिल थे)।39 जापान के युद्ध अपराधों का जिन्होंने सबसे ज़्यादा दंश झेला, उन्हें किसी भी तरह की क्षतिपूर्ति देने से जापान को इस संधि ने आज़ाद कर दिया। लेकिन सैन फ्रांसिस्को संधि पर हस्ताक्षर करने वाले 51 भागीदारों में जो देश नहीं शामिल थे वे थे चीन, ताइवान और उत्तर तथा दक्षिण कोरिया – इन सब ने जापान का क़ब्ज़ा झेला था। इसके साथ ही जापानी साम्राज्य (1868-1945) के कई युद्ध अपराधियों और उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों को द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद यूएस द्वारा माफ़ी दे दी गई और उन्हें उनके पदों पर बहाल भी कर दिया गया। यूएस का ध्यान सिर्फ और सिर्फ शीत युद्ध में ख़ुद को मज़बूत करने पर था।

इनमें से ही था उत्तरपूर्व चीन में जापान के कठपुतली राज्य मान्चुको का गवर्नर नोबुसुके किशी, जो ‘शोवा युग के राक्षस’ के तौर पर कुख्यात था।40 युद्ध के बाद किशी को प्रथम श्रेणी के युद्ध अपराधी के रूप में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन उसे रिहा कर दिया गया, और यूएस के समर्थन से वह 1957 से 1960 तक जापान का राष्ट्रपति रहा।41 किशी की दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी को शीतयुद्ध के दौरान सीआईए से लाखों डॉलर की सहायता मिली और जापान में 1955 से (1993-1994 और 2009-2012 को छोड़कर) लगातार इसी का शासन रहा है।42 इतिहासकार एंड्रू लेवीडिस के शब्दों में, ‘किशी और वर्तमान के बीच एक सीधी रेखा है जो जापान के [मौजूदा] रूढ़िवादी अभिजात वर्ग और साम्राज्यवादी युग को जोड़ती है’।43

दक्षिणपंथ को सत्ता में रखकर, संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान को अपने साम्राज्यवादी अतीत पर विचार करने से रोका और जापान के फिर से सैन्यीकरण को बढ़ावा देने और एशिया में अमेरिकी रणनीतिक स्थिति को मज़बूत करने के लिए उसके इतिहास पर पर्दा डाल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के ख़त्म होने के बाद से यूएस ने जापान में सैन्य मौजूदगी बनाए रखी है जिसमें ओकिनावा पर कब्ज़ा भी शामिल है जो 1945 से 1972 तक चला (1972 में ओकिनावा को जापान को लौटा दिया गया लेकिन इस द्वीप पर यूएस सेना बनी रही)। इस दौर में यूएस के कहने पर जापान लगातार फिर से हथियारबंद हुआ है और उसने अपनी सेना का विस्तार किया है। इस संबंध में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य हैं:

  • 1954 में एक नई सेना तैयार की गई जपानीज़ सेल्फ-डिफेन्स फोर्सेस (JSDF) जबकि युद्ध से परेशान देश की जनता इसके प्रतिरोध में खड़ी हुई।
  • 1960 में JSDF ने प्रतिबद्धता ज़ाहिर की कि वह जापानी क्षेत्रों में मौजूद यूएस की सेना पर हमलों का जवाब देगा।
  • 1992 में जापानी सेना ने अंतर्राष्ट्रीय शांति मिशनों में हिस्सा लेना शुरू किया।
  • 1997 में यूएस और जापान ने नए नियम अपनाये जिनसे JSDF को ‘आस-पास के क्षेत्रों’ में कार्रवाई करने की छूट मिल गई।
  • 2000 के दशक में जापान ने यूएस के समर्थन से अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में विदेशी क्षेत्र में सैन्य कार्रवाइयों में हिस्सेदारी की।44

आज दुनिया के किसी भी दूसरे देश से ज़्यादा यूएस के सैनिक अड्डे (120) और सैनिक (लगभग 54,000) जापान में हैं।45

यूएस के एशिया की ओर रुझान के साथ ही जापान की नए सिरे से हथियारबंदी बहुत तेज़ी से बढ़ी है। 2014 में तत्कालीन प्रधानमंत्री आबे शिन्ज़ो (नोबुसुके किशी के पोते) ने जापान के युद्धोत्तर संविधान की पुनर्व्याख्या करने के लिए ‘सक्रिय शांतिवाद’ का विचार सामने रखा।46 इस पुनर्व्याख्या ने जापान को ‘सामूहिक आत्म-रक्षा’ की स्थिति में शक्ति का प्रयोग करने की इजाज़त दे दी, इस ‘सामूहिक आत्म-रक्षा’ की स्थिति में ‘किसी ऐसी विदेशी राष्ट्र पर सशस्त्र हमला जिसके जापान से करीबी रिश्ते हों और ऐसे हमले की वजह से जापान के अस्तित्व को ख़तरा हो’।47 दिसम्बर 2022 में प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा के शासन में जापान ने एक नई नैशनल सिक्युरिटी स्ट्रैटिजी (राष्ट्रीय सुरक्षा नीति) जारी की जिसमें चीन को ‘जापान में शांति और सुरक्षा बरक़रार रखने तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में शांति और स्थिरता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा’ बताया गया।48 इसके साथ ही किशिदा ने सैन्य ख़र्च पर 1976 से लागू उच्च सीमा को भी ख़त्म कर दिया जिसके तहत यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1% से ज़्यादा नहीं हो सकता था और घोषणा की कि जापान 2027 तक इसे बढ़ाकर जीडीपी का 2% कर देगा – यह नाटो सदस्यों के ख़र्च के लक्ष्य के बराबर है और इससे जापान दुनिया में सैन्य ख़र्च के मामले में तीसरे नंबर का देश बन जाएगा।49 2022 में ही जापान का प्रति व्यक्ति सैन्य ख़र्च चीन से लगभग दोगुना था, जापान का सैन्य खर्च बढ़ाने से यह फ़र्क भी बढ़ता ही जाएगा।50

इरी और तोषी मारुकी, IX Yaizu, 1955, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

कोरिया का बँटवारा

जापान के औपनिवेशिक शासन (1910-1945) से कोरिया के आज़ादी हासिल करने के तुरंत बाद 15 अगस्त 1945 को यूएस ने 38 डिग्री उत्तरी अक्षांश के आधार पर प्रायद्वीप का बँटवारा कर दिया, जिससे दक्षिण में कोरिया गणराज्य (ROK) बना और उत्तर में कोरिया लोकतांत्रिक जनवादी गणराज्य (DPRK) बना। इस बँटवारे का, जो आज भी बरक़रार है, कोई भी ऐतिहासिक आधार नहीं, सिवाय यूएस हस्तक्षेप के: दो यूएस कर्नलों ने एक नैशनल जिओग्रैफिक के मानचित्र पर मनमर्ज़ी से लकीर खींच दी और एक झटके में एक जनता को दो हिस्सों में बाँट दिया।51 इसके पाँच साल बाद कोरिया युद्ध छिड़ गया। यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी मिलिटरी गवर्नमेंट (USAMGIK) यूँ तो उदार लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने का दावा करता है लेकिन दक्षिण में इसने, इतिहासकार ब्रूस कमिंगस के शब्दों में, ‘कोरिया को कोरिया की जनता के हवाले’ करने से मना कर दिया।52 कोरिया प्रायद्वीप में ज़मीनी स्तर पर लोकतांत्रिक जनता की विधानसभाओं को मान्यता देने की बजाय USAMGIK ने उन्हें कम्युनिस्ट होने का आरोप लगाकर उनका दमन किया, उन्हें तरह-तरह से परेशान किया। दक्षिण की आबादी – जिसके बारे में कमिंगस कहते हैं ‘इसमें बड़ा हिस्सा गरीब किसानों का था और आबादी के बहुत छोटे हिस्से के पास ही ज़्यादातर संपत्ति केंद्रित थी’ – के भीतर बाज़ार व्यवस्था के प्रति रुझान पैदा करने के लिए यूएस ने छोटे से अभिजात वर्ग को सहारा देकर ऊँचा उठाया, यह वही वर्ग था जिसने जापानी कब्ज़े के दौरान भी उनसे हाथ मिलाया था।53

यह थी कोरियाई प्रायद्वीप के विभाजन और कोरिया युद्ध की पृष्ठभूमि। इस युद्ध के छद्म चरित्र के बावजूद इसकी विभीषिका, मौतों और बर्बादी ने दक्षिण में एक कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा को पनपने की ज़मीन दी जिससे तानाशाहों को सहारा मिला और दशकों तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत असहमति की आवाज़ को लगातार कुचला गया।54 उत्तर कोरिया के साथ मेल-मिलाप के सिलसिले ने रेड-बेटिंग (किसी विचार को कम्युनिस्ट मानकर उस पर हमला करना) के ज़रिए पैदा ध्रुवीकरण को कम ज़रूर किया है, लेकिन कम्युनिस्ट-विरोधी सोच की वजह से दक्षिण कोरिया में अब भी सही और खुली बहस नहीं हो पा रही। इसके साथ ही औपनिवेशिक काल के दौरान दक्षिण में साथ मिलकर चलने की परंपरा के बारे में चर्चा नहीं होती और यही आज उसका चरित्र बन गया है। कोरिया की आज़ादी की 70वीं वर्षगांठ के मौके पर समाचार समूह Newstapa ने एक डाक्यूमेंट्री Collaboration and Forgetting (2015) [समझौते करना और भूल जाना] में ख़ुलासा किया कि दक्षिण में कोरिया के कई स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज ग़रीबी में जी रहे हैं क्योंकि उनके परिवारों को कम्युनिस्ट मानकर उनका बहिष्कार किया गया, जबकि जापानी शासन से समझौते करने वालों के वंशज अपनी बड़ी ज़मीनों के सहारे बड़े आराम की ज़िंदगी काट रहे हैं।55

JAKUS त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौता इसी इतिहास का नया अध्याय है। पहले कोरिया के एक जापानी उपनिवेश होने की सच्चाई ने कभी भी जापान और दक्षिण कोरिया में इस तरह की कोई साझेदारी नहीं होने दी। इस रुकावट को पार करने के लिए दक्षिण कोरिया के रूढ़िवादी यूं सुक-येओल ने जापान को उसके अपराधों की ज़िम्मेदारी से आज़ाद कर दिया। उदाहरण के लिए यूं ने 2018 में आए दक्षिण कोरिया के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नज़रअंदाज़ किया, जिसमें जापानी कंपनी मित्सुबिशी को कोरियाई लोगों से जबरन काम कराने के लिए ज़िम्मेदार माना गया था।56 इसके अतिरिक्त यूएस और चीन के प्रति पूर्ववर्ती प्रशासन (मून जे-इन) की संतुलित नीति के उलट यूं प्रशासन ने खुले तौर पर यूएस परस्त नीति अपनाई है।57 यूं की पीपल्स पावर पार्टी दक्षिण कोरिया के रूढ़िवादी आंदोलन की सबसे बड़ा राजनीतिक पुनरावृत्ति है, इस आंदोलन की जड़ें जापानी उपनिवेशवाद से समझौते और यूएस कब्ज़े में दिखती हैं।58

इरी और तोषी मारुकी, X अर्ज़ी, 1955, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

ताइवान, एक ‘न डूब सकने वाला विमान वाहक पोत’

चीन का गृह युद्ध कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) और राष्ट्रवादी कुओमिनतांग (KMT) के बीच 1927 से लेकर 1945 तक रुक-रुक कर चला। किसी भी हाल में कम्युनिस्टों की विजय को रोकने के मकसद से यूएस ने KMT की हर संभव मदद की, जैसे इसे 1945 और 1949 के बीच 200 करोड़ डॉलर की मदद दी।59 फिर भी जीत CPC की हुई और चीन की मुख्य भूमि पर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) की नींव पड़ी जबकि KMT भागकर ताइवान चली गई, जहाँ उसने एक निर्वासित सरकार बनाई यानी रिपब्लिक ऑफ चाइना (POC)। मुख्यभूमि से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित ताइवान को वाशिंगटन ने बीजिंग पर दबाव बनाने और उसे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग करने के लिए इस्तेमाल किया (मसलन, 1949-1971 के बीच यूएस और KMT, PRC को संयुक्त राष्ट्र से बाहर रखने में कामयाब रहे क्योंकि उनका मत था कि ताइवान स्थित ROC प्रशासन ही पूरे चीन की एकमात्र जायज़ सरकार थी)। यूएस अधिकारी तो खुलेआम इस द्वीप को एक ‘न डूब सकने वाला विमान वाहक पोत’ कहते थे।60

शीत युद्ध के दौरान यूएस के समर्थन वाली ROC ने ताइवान में एक दमनकारी तानाशाही स्थापित की, जिसमें 1949-1987 का 38 साल का लंबा सैन्य शासन भी शामिल है जिसे ‘व्हाइट टेरर’ [सफेद आतंक] कहा गया। इन सालों में जबर्दस्त राजनीतिक दमन किया गया। 140,000-200,000 लोग जेल और और उत्पीड़न के शिकार हुए और 3,000-4,000 लोगों को मृत्युदंड दिया गया।61 हालांकि वाशिंगटन ने 1970 के दशक में चीन से अपने संबंधों को सामान्य करने के दौरान आधिकारिक तौर से ताइवान से अपने संबंध ख़त्म कर दिए लेकिन इसने द्वीप से ‘अनौपचारिक’ रिश्ते बनाए रखे जिसमें बहुत गहरे सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक संबंध शामिल हैं। अब अपने नए शीत युद्ध के तहत यूएस ताइवान के शस्त्रीकरण के अपने कार्यक्रम को ज़ोर-शोर से चला रहा है जिसमें इसका साथ अलगाववादी ताक़तें दे रही हैं।62 चीन ने साफ़ कर दिया है कि उसके लिए ताइवान एक ‘लक्ष्मण रेखा है जिसे लाँघा नहीं जाना चाहिए’, ऐसे में यूएस के लगातार हस्तक्षेप से इस क्षेत्र में बड़ा तनाव शुरू होने का ख़तरा मंडरा रहा है।63

इरी और तोषी मारुकी, XI माँ और बच्चा, 1959, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

भाग III: उत्तर-पूर्व एशिया में शांति की राह

उत्तर-पूर्व एशिया में टकराव शुरू होने से रोकने के लिए ज़रूरी है कि यूएस के नेतृत्व में सैन्य समझौतों की योजना और इस क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाले सैन्यीकरण की प्रवृत्ति समाप्त हो। लेकिन सतत शांति स्थापित करने के लिए सामाजिक आंदोलनों और सरकारों को इससे भी आगे जाना होगा और उपनिवेशवाद, शीत युद्ध और लगातार चल रहे विदेशी हस्तक्षेप ने यहाँ जो ऐतिहासिक बँटवारे तैयार कर दिए हैं, उन्हें ख़त्म करना होगा। दोनों कोरियाई देशों को शांति और सुलह का अपना रास्ता चुनने की आज़ादी दी जानी चाहिए। चीन की मुख्यभूमि और ताइवान को विदेशी दख़ल के बिना अपने आज़ाद भविष्य को चुनने की आज़ादी दी जानी चाहिए। जापान को अपने साम्राज्यवादी इतिहास की ज़िम्मेदारी लेनी होगी और उसके साथ जीना सीखना होगा। और इस सबसे बढ़कर यूएस को यहाँ से बाहर होना होगा।

28-29 अक्टूबर 2023 को इंटरनैशनल स्ट्रैटिजी सेंटर (ISC) [अंतर्राष्ट्रीय रणनीति केंद्र] ने एक अंतर्राष्ट्रीय फ़ोरम आयोजित किया जिसका नाम था ‘शांति की स्थापना : उत्तर-पूर्व एशिया में युद्ध का प्रतिकार’ इसमें यूएस सैन्यवाद के ख़िलाफ़ पहली पंक्ति में लड़ाई लड़ रहे कई संगठनों और व्यक्तियों ने हिस्सा लिया।64 इस फ़ोरम और दूसरी जगहों से प्राप्त इस क्षेत्र में ज़मीनी आंदोलनों के अनुभव ने शांति की राह की रुकावटों और संभावनाओं दोनों को रेखांकित करने में मदद की।

इरी और तोषी मारुकी, XII तैरते चिराग़, 1968, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

ओकिनावा में सैन्यीकरण विरोधी संघर्ष

ओकिनावा द्वीप जापान की कुल ज़मीन के महज़ 1% हिस्से में है, लेकिन यूएस सेना ने अपने कुल अड्डों का 74% यहीं बना रखा है।65 2019 में एक ग़ैर-बाध्यकारी जनमत संग्रह में ओकिनावा की 72% जनता ने फूटेनमा मरीन कॉर्प्स एयर स्टेशन के बदले हेनोको-औरा खाड़ी में यूएस के एक नए सैन्य अड्डे के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट किया।66 यह विरोध यूएस क़ब्ज़े के एक बेहद हिंसक इतिहास – जिसमें 1995 में यूएस सैनिकों द्वारा एक बारह साल की लड़की का सामूहिक बलात्कार भी शामिल है – और इस द्वीप से जापान की धोखाधड़ी के इतिहास की वजह से है। उदाहरण के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब यूएस सेना इस ओर बढ़ रही थी तो सबसे भीषण लड़ाइयों में जापान ने मुख्य भूमि को बचाने के लिए ओकिनावा के नागरिकों को ढाल की तरह इस्तेमाल किया।67 ओकिनावा को तब अमेरिकी सैन्य शासन के लिए बलिदान कर दिया गया था ताकि जापान सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के हिस्से के रूप में अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता को पुनः प्राप्त कर सके।

शांति की तलाश के साथ-साथ ओकिनावा के सामाजिक आंदोलनकारी पर्यावरण, जन स्वास्थ्य और जेन्डर-आधारित हिंसा से जुड़े कारणों की वजह से यूएस सेना के अड्डों की मौजूदगी के ख़िलाफ़ भी लड़ाई लड़ रहे हैं। मसलन, ओकिनावा एनवायरनमेंट जस्टिस प्रोजेक्ट [ओकिनावा पर्यावरण न्याय कार्यक्रम] फूटेनमा अड्डे को हेनोको-औरा खाड़ी ले जाने का विरोध कर रहा है क्योंकि यूएस सैनिक अड्डों से जहरीला प्रदूषण फैलता हैं।68 जबकि कादेना एयर बेस के ख़िलाफ़ संघर्ष यूएस सैनिकों द्वारा यौन हिंसा के साथ-साथ शहरी इलाक़ों के ऊपर से उड़ने वाले विमानों से जुड़े हादसों के मामलों को लेकर किया जा रहा है। अमूमन जो आंदोलन किन्हीं अन्य कारणों से शुरू होते हैं वो शांति और न्याय के संघर्षों में तब्दील हो जाते हैं।

जापान में सैन्य ख़र्च बढ़ाने के लिए सरकार को या तो करों में बढ़ोत्तरी करनी होगी या सामाजिक कल्याण की योजनाओं के ख़र्च में कटौती, दोनों ही सूरतों में उसके लिए जनता का समर्थन कम हो जाएगा। इस समर्थन को बढ़ाने के लिए जापान की सरकार ने JSDF सेना को ओकिनावा के दक्षिणी द्वीपों के कुछ हिस्सों में तैनात करने की कोशिश की है। इन द्वीपों की जनता के युद्ध और क़ब्ज़े को लेकर वे अनुभव नहीं, जो दूसरों के हैं और यह काफ़ी हद तक चीन, ताइवान और उत्तर कोरिया को ख़तरनाक साबित करने वाले दुष्प्रचार पर भरोसा करके चलती है। ओकिनावा एनवायरनमेंट जस्टिस प्रोजेक्ट के निर्देशक हिदेकी योशीकावा के मुताबिक ज़मीनी संगठन कोशिश कर रहे हैं कि ‘एक व्यापक और समन्वित शांति आंदोलन तैयार करें’, कार्यक्रम और रैलियाँ आयोजित करें जिनसे जापान की मुख्यभूमि और विदेशों के शांति संगठन एक साथ आ सकें। योशीकावा का कहना है कि बढ़ते हुए JAKUS त्रिपक्षीय समझौते ने तीनों देशों में ‘शांति आंदोलनों के बीच एक जवाबी समझौते की नींव रख दी है’।69

इरी और तोषी मारुकी, XIII अमेरिकी युद्ध बंधकों की मौत, 1971, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

कोरियाई प्रायद्वीप में एक शांति समझौता

जून 2020 से जुलाई 2023 तक यानी कोरिया युद्ध छिड़ने और युद्धविराम समझौते की क्रमश: 70वीं वर्षगांठों के मौक़े पर दक्षिण कोरिया और दुनिया के बाक़ी हिस्सों के आंदोलनों और लोगों ने कोरिया युद्ध को हमेशा के लिए ख़त्म करने के लिए एक शांति संधि की माँग के समर्थन में हज़ारों हस्ताक्षर इकट्ठा किए। शांति और पुनर्एकीकरण का यह संघर्ष सिविल सोसाइटी के प्रयासों से शुरू हुआ और 13-15 जून 2000 को प्योंगयांग में आयोजित पहले अंतर-कोरिया सम्मेलन में इसका व्यापक और संगठित रूप सामने आया, जहाँ दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति किम डे-जुंग और उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग-इल द्वारा संयुक्त घोषणा जारी हुई। यह मुलाक़ात उत्तर कोरिया में गुप्त रूप से हुई (ताकि यूएस अड़ंगा न लगाए), जिसमें घोषणा हुई कि शांति और पुनर्एकीकरण का रास्ता ‘देश के सर्वेसर्वा कोरिया के लोगों के संयुक्त प्रयासों’ से हासिल किया जाएगा। 70 लेकिन यूएस की मंशा कुछ और ही थी। 11 सितंबर के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमलों के बाद यूएस राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने उत्तर कोरिया को ईरान और इराक़ के साथ ‘बुराई की धुरी’ का हिस्सा बताया, जिससे दक्षिण कोरिया के लिए उम्मीद के स्रोत की तरह आई प्रारम्भिक शांति प्रक्रिया का रास्ता रुक गया। इस प्रक्रिया का समर्थन बुश के पूर्ववर्ती बिल क्लिंटन ने भी किया था। यह एक और मौक़ा था जब कोरियाई प्रायद्वीप में शांति यूएस के भूराजनीतिक हितों की गिरफ़्त में आ गई।

कोरियाई युद्ध को ख़त्म करने के इन सिविल और राजनयिक कोशिशों के अलावा दक्षिण कोरिया के लोगों ने प्रायद्वीप में यूएस की सेना की मौजूदगी के ख़िलाफ़ हमेशा संघर्ष जारी रखा है। 2007 से गैंगजेओंग के गाँववासियों ने एक नौसेना अड्डे के निर्माण का विरोध किया है, जिससे जेजू आइलैंड पर यूएस के युद्धपोत खड़े हो सकेंगे। ओकिनावा के हेनोको-औरा खाड़ी के संघर्ष की ही तरह यह आंदोलन भी पहले पर्यावरण को ख़तरे के अंदेशे से शुरू हुआ लेकिन जल्दी ही सैन्यीकरण के ख़िलाफ़ एक बड़ी लड़ाई में बदल गया। जेजू में सैन्य अड्डा विरोधी आंदोलन वक़्त के साथ छोटा हो गया है लेकिन इसके बावजूद यह जारी है और साबित कर रहा है कि सैन्यीकरण कैसे प्रभावित समुदायों को शांति की लौ में बदल देता है।

इरी और तोषी मारुकी, XIV कौवे, 1972, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

ताइवान जलडमरूमध्य में शांति

दक्षिण कोरिया और जापान के मुकाबले ताइवान में शांति आंदोलन कम विकसित है। नैशनल यांग-मिंग चाओ-थोंग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और ISC के अंतर्राष्ट्रीय फ़ोरम में भाग लेने वाले, तायवे फ़ू के मुताबिक ताइवान की आबादी लगभग द्वीप की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के मुताबिक ही बँटी हुई है, 50% चाहते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ जुड़े रहना चाहिए (इनमें भी 10% स्वतंत्रता के पक्ष में हैं जबकि 40% यूएस परस्त स्थिति के) और बाकी के 50% चाहते हैं चीन की तरह ज़्यादा संतुलन फिर से बैठाया जाए (इनमें 10% फिर से चीन में विलय चाहते हैं और बाकी 40% एक तटस्थ स्थिति)। फू पॉर्क्युपाइन रणनीति की आलोचना करते हुए कहते हैं कि यह रणनीति ताइवान के सैन्यकरण और ज्यादा सामाजिक व्यय की ज़रूरत के बीच विरोधाभास को सामने लाती है। यह रणनीति अमेरिका की सलाह पर ताइपेई ने यह मानकर अपनाई कि उसके ऊपर हमले का अंदेशा है, जिसमें ताइवान जलडमरूमध्य के असंख्य नागरिक मारे जा सकते हैं।

हालांकि जनवरी 2024 के आम चुनावों में सत्तारूढ़, अलगाववादी रुझान वाली डेमोक्रैटिक प्रग्रेसिव पार्टी (DPP) की जीत हुई लेकिन हाल के चुनावी आँकड़ों से पता चलता है कि ताइवान की जनता के विचार शायद बदल रहे हैं। 2016 और 2020 के चुनावों में जहाँ DPP को बहुमत मिला था, 2024 के चुनावों में DPP का वोट प्रतिशत गिरकर 40% रह गया, 2020 से सत्रह अंक नीचे। जबकि बीजिंग के साथ अच्छे संबंध रखने वाली विपक्षी पार्टियाँ – KMT और ताइवान पीपल्स पार्टी – ने मिलकर 2024 में 60% वोट हासिल किए। इसके साथ ही चुनावों से पहले अमेरिकन पोर्ट्रेट सर्वे में पता चला कि ताइवान की 34% आबादी मानती है कि यूएस भरोसेमंद देश है, यह आँकड़ा 2021 के आँकड़े से ग्यारह अंक नीचे आ गया, कुछ समीक्षकों ने इशारा किया कि यूक्रेन में चल रहे युद्ध की वजह से यूएस की साख को धक्का लगा है।71

इरी और तोषी मारुकी, XV नागासाकी, 1972, हिरोशिमा पैनलस् से। काग़ज़ पर सु’मी स्याही, रंग, गोंद, चारकोल से बने, 180 x 720 cm

शांति आंदोलन के लिए एक प्रस्ताव

संयुक्त राज्य अमेरिका चीन के विरुद्ध एक नया शीत युद्ध चला रहा है ताकि उसका वैश्विक वर्चस्व बना रहे और साथ ही उसकी बनाई हुई ‘नियम बद्ध व्यवस्था’ भी। इन ‘नियमों’ को अमूमन संयुक्त राष्ट्र के चार्टरों के समान बताया जाता है लेकिन ये दोनों एक समान नहीं हैं।72 यूएन के चार्टर 193 सदस्य देशों की सर्वसम्मति को दर्शाते हैं जबकि ‘नियम बद्ध व्यवस्था’ के ‘नियम’ अंतर्राष्ट्रीय कानूनों से नहीं निकले; बल्कि इन्हें यूएस ने अपने हितों की रक्षा के लिए थोपा है। इसी बिन्दु पर ‘काउन्सल ऑन फ़ॉरन रिलेशन्स’ की 2022 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ‘मानव अधिकारों और पर्यावरण संधियों की पुष्टि के मामले में यूएस सबसे खराब रिकार्ड वाले देशों में से है’।73

‘नियम बद्ध व्यवस्था’ की अमानवीयता इज़राइल द्वारा गज़ा में फिलिस्तीनियों के क़त्लेआम में पूरी तरह खुलकर सामने आ गई है, क्योंकि इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका पूरी तरह इज़राइल को समर्थन दे रहा है। इस सबसे से कहीं ज़्यादा, यह व्यवस्था मानव अधिकारों, न्याय या आज़ादी को बचाने की कोशिश नहीं कर रही बल्कि यह रक्षा कर रही है उस दुनिया की जिसमें यूएस का वर्चस्व है और जो 900 यूएस सैन्य अड्डों – जिनमें से सैंकड़ों चीन को घेरे हुए हैं – के वैश्विक जाल को कमर पर बाँधे खड़ी है।74

उत्तर-पूर्व एशिया में जो भारी बदलाव हो रहे हैं, वो इस क्षेत्र को युद्ध की ओर धकेल रहे हैं। ऐसे समय में इस क्षेत्र के शांति आंदोलनों को कुछ विशेष माँगों और आदर्शों के आधार पर एकजुट हो जाना चाहिए, जिनमें महत्त्वपूर्ण हैं:

  1. JAKUS सुरक्षा समझौते की समाप्ति- बहुआयामी सैन्य समझौते, जिनका स्वरूप ही दूसरे देशों को अकेला कर देना या निशाना बनाना है, क्षेत्रों को विपरीत गुटों या कैम्पों में बाँटते हैं, तनाव बढ़ाते और सैन्य ख़र्च को बढ़ावा देते हैं। यूएस, जापान और दक्षिक कोरिया के बीच का त्रिपक्षीय समझौता भी इससे अलग नहीं है।
  2. यूएस के युद्ध अभ्यासों का ख़ात्मा- वैसे तो इन सैन्य अभ्यासों को ‘सामान्य’ कह दिया जाता है लेकिन ये शत्रुतापूर्ण और भड़काऊ होते हैं। उदाहरण के लिए, यूएस और दक्षिण कोरिया के बीच संयुक्त युद्ध अभ्यासों में उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ परमाणु हमले का, इसके राजनीतिक नेतृत्व के ‘सर कलम’ करने और पूरी तरह से घुसपैठ करने का अभ्यास हुआ। जबकि यूएस और ऑस्ट्रेलिया तथा फ़िलिपींस के युद्ध अभ्यासों में चीन की मुख्य भूमि पर लंबी दूरी की मिसाइल दागने का अभ्यास किया गया। ये बाज जैसी कार्रवाइयाँ राजनयिक बातचीत के रास्ते बंद कर देती हैं और दूसरे देशों के पास अपनी सेनाओं को जवाबी कार्रवाई के लिए संगठित करने के अलावा और कोई चारा नहीं छोड़तीं।
  3. यूएस के हस्तक्षेप का ख़ात्मा- सत्तर साल से ज़्यादा से यूएस ने उत्तर-पूर्व एशिया, ख़ासतौर से कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान की खाड़ी में तनाव को हवा देने का काम कर रहा है। पूरे एशिया-प्रशांत में, यहाँ के लोगों को अपना भविष्य और शांति पथ चुनने का अधिकार होना चाहिए, इसमें किसी भी तरह के विदेशी हस्तक्षेप और सैन्यीकरण की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
  4. एक दूसरे के संघर्षों का सहयोग- उत्तर-पूर्व एशिया में शांति के लिए संघर्ष पूरे क्षेत्र का होना चाहिए। हालांकि स्थानीय संघर्षों की तत्काल माँगों में खो जाना आसान है लेकिन इस क्षेत्र के मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं। इन्हें सुलझाने के लिए दूरदर्शी होना और तमाम संघर्षों को मज़बूत करने की प्रतिबद्धता होना ज़रूरी है। इसके लिए संगठनों को सक्रिय रूप से पूरे क्षेत्र में चल रहे अभियानों और संघर्षों का हिस्सा बनना पड़ेगा न कि सिर्फ़ अपने देश के, जैसे कि हर साल मई में ओकिनावा में एक शांति मार्च निकलता है, 15 जून 2000 को अंतर-कोरियाई सम्मेलन और दूसरे प्रयासों को याद करने के लिए।
  5. अगली पंक्ति के संघर्षों का सहयोग- युद्ध और सैन्यीकरण भले ही अमूर्त और रोज़मर्रा के जीवन से दूर की चीज़ लगते हों, लेकिन जो लोग संघर्ष की ज़मीन पर रह रहे हैं, उन अग्रिम पंक्ति के पास रह रहे लोगों के लिए ये बहुत ठोस और तत्कालीन सच्चाई हैं, जैसे कि कादेना एयर बेस और हेनोको खाड़ी (ओकिनावा में) और सोसेओन्ग-री में THAAD का लगाया जाना और जेजू में नेवल बेस बनाया जाना (दक्षिण कोरिया में)। इन जगहों पर संघर्षों की शुरुआत तो कमोबेश लोगों के जीवन पर पड़ रहे तात्कालिक, स्थानीय प्रभावों की वजह से हुई लेकिन प्रतिरोध ने इसमें शामिल लोगों और व्यापक जनता में बदलाव लाने का काम किया।

हम जोख़िम भरे दौर में रह रहे हैं। यह जरूरी है कि हम साझा ज़मीन और समझ तलाशें ताकि हम सामरिक और रणनीतिक उद्देश्यों पर मिलकर काम कर सकें। ऐसा कर पाने की हमारी क्षमता ही यह तय करेगी कि हम युद्ध रोक पाते हैं या नहीं और इस क्षेत्र में तथा सारी दुनिया में शांति बहाल कर पाते हैं या नहीं। ऐसा करके ही हम लोगों और दुनिया में सुधार पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।


Notes

1 Alex Wellerstein, ‘Counting the dead at Hiroshima and Nagasaki’, Bulletin of the Atomic Scientists, 4 August 2020, https://thebulletin.org/2020/08/counting-the-dead-at-hiroshima-and-nagasaki/.

2 ‘The Spirit of Camp David: Joint Statement of Japan, the Republic of Korea, and the United States’, The White House, 18 August 2023, https://www.whitehouse.gov/briefing-room/statements-releases/2023/08/18/the-spirit-of-camp-david-joint-statement-of-japan-the-republic-of-korea-and-the-united-states/.

3 Mike Yeo, ‘New Japanese Strategy to up Defence Spending, Counterstrike Purchases’, Defence News, 20 December 2022, https://www.defensenews.com/global/asia-pacific/2022/12/20/new-japanese-strategy-to-up-defense-spending-counterstrike-purchases/.

4 For more on the Third Great Depression, see Tricontinental: Institute for Social Research, The World in Economic Depression: A Marxist Analysis of Crisis, notebook no. 4, 10 October 2023, https://thetricontinental.org/dossier-notebook-4-economic-crisis/; for more on the Global North economies and contemporary imperialism, see Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism: A Dangerous Decadent New Stage, Studies on Contemporary Dilemmas no. 4, 23 January 2024, https://thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/.

5 ‘President Obama: “Writing the Rules for 21st Century Trade”’, The White House, 18 February 2015, https://obamawhitehouse.archives.gov/blog/2015/02/18/president-obama-writing-rules-21st-century-trade.

6 ‘Leon Panetta: US to Deploy 60% of Navy Fleet to Pacific’, BBC News, 2 June 2012, https://www.bbc.com/news/world-us-canada-18305750.

7 Ren Xiao, ‘Modeling a “New Type of Great Power Relations”: A Chinese Viewpoint’, The Asan Forum, 4 October 2013, https://theasanforum.org/modeling-a-new-type-of-great-power-relations-a-chinese-viewpoint/.

8 For more on trade wars, see Tricontinental: Institute for Social Research, The Imperialism of Finance Capital and ‘Trade Wars’, dossier no. 7, 5 August 2018 https://thetricontinental.org/the-imperialism-of-finance-capital-and-trade-wars/.

9 Donald J. Trump, National Security Strategy of the United States of America (Washington, DC: The White House, 2017), https://trumpwhitehouse.archives.gov/wp-content/uploads/2017/12/NSS-Final-12-18-2017-0905.pdf.

10 Sujai Shivakumar, Charles Wessner, and Thomas Howell, ‘Balancing the Ledger: Export Controls on US Chip Technology to China’, Center for Strategic and International Studies, 21 February 2024, https://www.csis.org/analysis/balancing-ledger-export-controls-us-chip-technology-china.

11 Mary Lovely, ‘US CHIPS Act Threatens to Hollow out Asian Semiconductor Industry’, East Asia Forum Quarterly 15, no. 4 (November 2023), https://eastasiaforum.org/2023/11/26/us-chips-act-threatens-to-hollow-out-asian-semiconductor-industry/.

12 Jon Bateman, ‘Biden Is All-In on Taking Out China, Whatever the Consequences’, Foreign Policy, 12 October 2022, https://foreignpolicy.com/2022/10/12/biden-china-semiconductor-chips-exports-decouple/.

13 Mohammed Hussein and Mohammed Haddad, ‘US Military Presence around the World’, Al Jazeera, 10 September 2021, https://www.aljazeera.com/news/2021/9/10/infographic-us-military-presence-around-the-world-interactive.

14 Hussein and Haddad, ‘US Military Presence around the World’.

15 ‘The Spirit of Camp David’.

16 ‘Press Gaggle by National Security Advisor Jake Sullivan’, The White House, 18 August 2023, https://www.whitehouse.gov/briefing-room/statements-releases/2023/08/18/press-gaggle-by-national-security-advisor-jake-sullivan-thurmont-md/.

17 Justin Katz, ‘US-Japan-ROK to Make “Pledge” to Consult Each Other in Security Crises’, Breaking Defence, 18 August 2023, https://breakingdefense.sites.breakingmedia.com/2023/08/us-japan-rok-to-make-pledge-to-consult-each-other-in-security-crises/.

18 ‘US, Japan, Republic of Korea Conduct Trilateral Aerial Exercise’, United States Indo-Pacific Command, 22 October 2023, https://www.pacom.mil/Media/News/Spotlight/Article/3564925/us-japan-republic-of-korea-conduct-trilateral-aerial-exercise/.

19 Lynn Savage, ‘US INDOPACOM’s Integrated Air and Missile Defence Vision 2028: Integrated Deterrence toward a Free and Open Indo-Pacific’, Journal of Indo-Pacific Affairs, January 2022, https://media.defense.gov/2022/Jan/27/2002929057/-1/-1/1/JIPA%20-%20SAVAGE.PDF.

20 ‘INDOPACOM IAMD Vision 2028’, United States Indo-Pacific Command, 3 November 2021, https://community.apan.org/wg/pic/philippines-pic-portal/m/documents/396455.

21 Gabriel Dominguez, ‘Japan, US, South Korea to Share Missile-Warning Data’, The Japan Times, 13 November 2023, https://www.japantimes.co.jp/news/2023/11/13/japan/politics/japan-us-south-korea-trilateral-analysis/.

22 ‘GSOMIA vs TISA: What is the Big Deal?’, Pacific Forum, 11 February 2020, https://pacforum.org/publications/yl-blog-19-gsomia-vs-tisa-what-is-the-big-deal/.

23 Dominguez, ‘Japan, US, South Korea to Share Missile-Warning Data’.

24 Siegfried Hecker, Hinge Points: An Inside Look at North Korea’s Nuclear Program, (Stanford: Stanford University Press, 2023), 77, 86.

25 Yeon-cheol Seong, ‘Bolton Sabotaged the Korean Peninsula Peace Process at Every Opportunity’, The Hankyoreh, 24 June 2020, https://english.hani.co.kr/arti/PRINT/950798.html.

26 Chery Kang, ‘“THAAD” Anti-Missile System Can’t Protect South Korea from Missile Attacks by Itself’, CNBC, 11 September 2017, https://www.cnbc.com/2017/09/11/south-korea-missile-defense-thaad-system-cant-do-the-job-alone.html.

27 Adam Taylor, ‘Why China Is So Mad about THAAD, a Missile Defence System Aimed at Deterring North Korea’, The Washington Post, 7 March 2017, https://www.washingtonpost.com/news/worldviews/wp/2017/03/07/why-china-is-so-mad-about-thaad-a-missile-defense-system-aimed-at-deterring-north-korea/.

28 Democratic Progressive Party of Taiwan, ‘Party Platform’, accessed 9 April 2024, https://www.dpp.org.tw/en/upload/download/Party_Platform.pdf.

29 ‘Anti-Secession Law (Full Text)’, Embassy of the People’s Republic of China in the United States, 15 March 2005, http://us.china-embassy.gov.cn/eng/zt/twwt/200503/t20050315_4912997.htm.

30 Xi Jinping, ‘Hold High the Great Banner of Socialism with Chinese Characteristics and Strive in Unity to Build a Modern Socialist Country in All Respects: Report to the 20th National Congress of the Communist Party of China’, 16 October 2022, https://www.fmprc.gov.cn/eng/zxxx_662805/202210/t20221025_10791908.html.

31 Susan V. Lawrence and Caitlin Campbell, ‘Taiwan: Political and Security Issues’ (Washington, DC: Congressional Research Service, 4 April 2022), https://crsreports.congress.gov/product/pdf/IF/IF10275/57.

32 Siddarth Kaushal, ‘US Weapons Sales to Taiwan: Upholding the Porcupine Strategy’, Royal United Services Institute, 8 December 2020, https://rusi.org/explore-our-research/publications/commentary/us-weapons-sales-taiwan-upholding-porcupine-strategy.

33 ‘GMD: Frequently Asked Questions’, Center for Arms Control and Non-Proliferation, accessed 6 March 2024, https://armscontrolcenter.org/issues/missile-defense/gmd-frequently-asked-questions/.

34 ‘GMD: Frequently Asked Questions’.

35 ‘The Constitution of Japan’, Prime Minister’s Office of Japan, 1947, https://japan.kantei.go.jp/constitution_and_government_of_japan/constitution_e.html.

36 ‘Occupation and Reconstruction of Japan, 1945-52’, United States Department of State, Office of the Historian, accessed 10 April 2024, https://history.state.gov/milestones/1945-1952/japan-reconstruction.

37 San Francisco Peace Treaty Project, accessed 10 April 2024, http://www.sfpeacetreaty.org/.

38 Foreign Relations of the United States, 1951: Asia and the Pacific, Volume VI, Part 1 (Washington, DC: US Government Printing Office, 1977), 812, https://books.google.ca/books?id=gm5NEc9kWSEC;pg=PA812#v=onepage;f=false.

39 For further reading on the role of the United States in rehabilitating war criminals in Japan, see Jeanne Guillemin, Hidden Atrocities: Japanese Germ Warfare and American Obstruction of Justice at the Tokyo Trial (Ithaca: Cornell University Press, 2017).

40 The Shōwa era refers to the reign of Emperor Shōwa (1926–1989), the beginning of which marked the rise of militarism in Japan.

41 Andrew Levidis, ‘The End of the Kishi Era’, East Asia Forum Quarterly 14, no. 3 (July–September 2022), https://eastasiaforum.org/2022/09/13/the-end-of-the-kishi-era/.

42 Tim Weiner, ‘CIA Spent Millions to Support Japanese Right in 50’s and 60’s’, The New York Times, 9 October 1994, https://www.nytimes.com/1994/10/09/world/cia-spent-millions-to-support-japanese-right-in-50-s-and-60-s.html.

43 Levidis, ‘The End of the Kishi Era’.

44 Lindsay Maizland and Nathanael Cheng, ‘The US-Japan Security Alliance’, Council on Foreign Relations, 4 November 2021, https://www.cfr.org/backgrounder/us-japan-security-alliance.

45 Hussein and Haddad, ‘US Military Presence around the World’.

46 The 2014 reinterpretation of the post-war constitution circumvented the established process of constitutional amendment and was instead made by way of a cabinet decision. Abe’s cabinet was dominated by members of the Nippon Kaigi, a far-right Japanese non-governmental organisation of which Abe himself is also a member. See Akira Kawasaki and Céline Nahory, ‘Japan’s Decision on Collective Self-Defence in Context’, The Diplomat, 3 October 2014, https://thediplomat.com/2014/10/japans-decision-on-collective-self-defense-in-context/.

47 ‘Cabinet Decision on Development of Seamless Security Legislation to Ensure Japan’s Survival and Protect Its People’, Ministry of Foreign Affairs of Japan, 1 July 2014, https://www.mofa.go.jp/fp/nsp/page23e_000273.html.

48 National Security Strategy of Japan (Tokyo: The Government of Japan, 2022), https://www.cas.go.jp/jp/siryou/221216anzenhoshou/national_security_strategy_2022_pamphlet-e.pdf.

49 Yeo, ‘New Japanese Strategy’.

50 Stockholm International Peace Research Institute, ‘SIPRI Military Expenditure Database’, accessed 10 April 2024, https://milex.sipri.org/sipri.

51 Michael Fry, ‘National Geographic, Korea, and the 38th Parallel’, National Geographic, 8 May 2013, https://www.nationalgeographic.com/science/article/130805-korean-war-dmz-armistice-38-parallel-geography.

52 Bruce Cumings, Korea’s Place in the Sun: A Modern History (New York: WW Norton & Company, 2005), 200.

53 Cumings, Korea’s Place in the Sun, 193.

54 Kim-Hwang Kyung-san, ‘Peace, A New Beginning – National Security Law, Our Task Ahead’, The International Strategy Center, 7 June 2018, https://www.goisc.org/englishblog/2018/6/7/peace-a-new-beginning-national-security-law-our-task-ahead.

55 Of the 430 square kilometres of South Korean land that was owned by collaborationists during the Japanese occupation – equivalent to roughly two-thirds the size of Seoul – only 3% has returned to state ownership since liberation. See Kim Ri-taek, ‘The Ever Persistent Cancer of Japanese Collaborators in Modern S Korean History’, The Hankyoreh, 26 February 2019, https://english.hani.co.kr/arti/english_edition/english_editorials/883678.

56 Lee Je-Hun, ‘Yoon Suk-Yeol’s Plan for Forced Labor Compensation Is a Complete Victory for Japan’, The Hankyoreh, 6 March 2023, https://english.hani.co.kr/arti/english_edition/e_national/1082375.

57 The Moon administration committed to the ‘three no’s’: no additional THAAD deployment, no participation in the US missile defence network, and no establishment of a trilateral military alliance with the US and Japan. The Yoon Administration, on the other hand, embraced the US’s ‘free and open Indo-Pacific’. Furthermore, Yoon was the first president to participate in a NATO summit. See Park Byong-su, ‘South Korea’s “Three No’s’”. Announcement Key to Restoring Relations with China’, The Hankyoreh, 2 November 2017, https://english.hani.co.kr/arti/english_edition/e_international/817213.

58 The roots of the People’s Power Party and broader conservative movement in South Korea can be traced back to the Park Chung-hee military dictatorship (1961–1979) and are steeped in an anti-communist ideology. Prior to Korea’s liberation from Japan, Park served in the Imperial Japanese Army, helping to hunt independence fighters. Later, Japan would provide both the inspiration and the funds for Park’s modernisation projects. Park’s daughter, Park Geun-hye, served as South Korea’s president from 2013 to 2017, when she was impeached and convicted on corruption charges. In the aftermath of this scandal, the People’s Power Party was formed through the merger of multiple conservative parties, including the successor to Park Geun-Hye’s Saenuri Party.

59 United States Department of State, The China White Paper, August 1949, ed. Lyman P. Van Slyke (Stanford: Stanford University Press, 1967).

60 ‘National Affairs: An Unsinkable Aircraft Carrier’, Time, 4 September 1950, https://content.time.com/time/subscriber/article/0,33009,856644,00.html.

61 ‘Teaching Human Rights through Documentaries’, Ministry of Culture (Taiwan), 20 April 2014, https://web.archive.org/web/20230330181047/https://www.moc.gov.tw/en/information_196_75811.html.

62 Rupert Wingfield-Hayes, ‘The US Is Quietly Arming Taiwan to the Teeth’, BBC News, 5 November 2023, https://www.bbc.com/news/world-asia-67282107.

63 No Cold War, ‘Taiwan Is a Red Line Issue’, briefing no. 6, 9 February 2023, https://thetricontinental.org/newsletterissue/taiwan/.

64 ‘Building Peace: Preventing War in Northeast Asia’, International Strategy Center, 28–29 October 2023, available at https://www.youtube.com/watch?v=ep4sMtZz5cE.

65 Maia Hibbett, ‘In Their Fight to Stop a New US Military Base, Okinawans Confront Two Colonizers’, The Nation, 16 May 2019, https://www.thenation.com/article/archive/okinawa-japan-us-military/.

66 Hibbett, ‘In Their Fight’.

67 Dae-Han Song, ‘Okinawa: A Bastion for Peace?’, CounterPunch, 6 October 2023, https://www.counterpunch.org/2023/10/06/okinawa-a-bastion-for-peace/.

68 ‘About the Project’, Okinawa Environmental Justice Project, accessed 11 April 2024, https://okinawaejp.blogspot.com/p/about-project.html.

69 Song, ‘Okinawa’.

70 ‘South-North Joint Declaration’, United Nations Peacemaker, 15 June 2000, https://peacemaker.un.org/koreadprk-southnorthdeclaration.

71 Chi Hui Lin, ‘Taiwan Poll Shows Dip in US Trust amid Growing Concern over China’, The Guardian, 23 November 2023, https://www.theguardian.com/world/2023/nov/23/taiwan-poll-shows-dip-in-us-trust-amid-growing-concern-over-china.

72 For more on the ‘rules-based order’ and the UN system, see Tricontinental: Institute for Social Research, Sovereignty, Dignity, and Regionalism in the New International Order, dossier no. 62, 14 March 2023, https://thetricontinental.org/dossier-regionalism-new-international-order/.

73 Anya Wahal, ‘On International Treaties, the United States Refuses to Play Ball’, Council on Foreign Relations, 7 January 2022, https://www.cfr.org/blog/international-treaties-united-states-refuses-play-ball.

74 Tricontinental: Institute for Social Research, The Churning of the Global Order, dossier no. 72, 23 January 2024, https://thetricontinental.org/dossier-72-the-churning-of-the-global-order/; Hussein and Haddad, ‘US Military Presence around the World’.

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अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के शिकंजे में लहूलुहान पाकिस्तान https://thetricontinental.org/hi/imf-ke-shikanje-me-lahuloohan-pakistan/ Tue, 17 Oct 2023 08:00:14 +0000 https://thetricontinental.org/?p=93408

यह डोसियर रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर (लाहौर, पाकिस्तान) के सहयोग से तैयार किया गया है और इसे लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेज़ (एलयूएमएस) में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफ़ेसर, लाल बैंड के प्रवक्ता और मज़दूर किसान पार्टी तथा लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट के महासचिव तैमूर रहमान ने लिखा है।

इस डोसियर में छपी तस्वीरें अली अब्बास (‘नाद ई अली’) की हैं, जो एक दृश्य (visual) कलाकार हैं और लाहौर, पाकिस्तान में रहते हैं। इनकी कृतियाँ अलगाव, अपनेपन और सभी संस्कृतियों में सामान्य तौर पर मौजूद साझा विषयों की खोज करती हैं। ये तस्वीरें उनकी ‘हॉन्टोलॉजी ऑफ़ लाहौर’ (2017-वर्तमान) नामक श्रृंखला से ली गई हैं। ‘हॉन्टोलॉजी शब्द को दार्शनिक ज़ाक देरिदा से उधार लिया गया है। अब्बास के शब्दों में, ‘लाहौर के परिदृश्य के भीतर, इसकी हलचल भरी सड़कों, प्राचीन संरचनाओं और जीवंत समुदायों के बीच अप्रयुक्त भविष्य और अप्राप्त संभावनाओं का भंडार है।’ यह डोसियर न केवल पाकिस्तान के बल्कि व्यापक रूप से तीसरी दुनिया के उत्पीड़ित लोगों के आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक अर्थ में अप्रयुक्त भविष्य और अप्राप्त संभावनाओं के भंडार पर प्रकाश डालता है।

पाकिस्तान पिछले साल लगातार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में रहा, दुर्भाग्य से लगभग हर बार ग़लत वजहों से। हालाँकि दो दशकों से अधिक समय से देश की पहचान उग्रवाद और आतंकवाद से जुड़ी रही है, मगर हाल ही में पाकिस्तान प्राकृतिक आपदाओं और राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से चर्चा में है। विनाशकारी बाढ़ ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया है, जबकि मार्च 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के एक विवादास्पद वोट ने प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ यानी पीटीआई को सत्ता से बेदख़ल कर दिया।1

देश की अर्थव्यवस्था में होने वाले भारी और अभूतपूर्व संकुचन पर गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अनुमान लगाया था कि 2023 में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था केवल 0.5% बढ़ेगी और जनता को 27% से अधिक मुद्रास्फीति दर का सामना करना पड़ेगा।2 सरकार का अपना आँकड़ा बताता है कि 2023 में पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था केवल 0.29% बढ़ी है।3 पाकिस्तान की जनसंख्या 1.8% की दर से बढ़ रही है, जो देश की आर्थिक वृद्धि दर को पछाड़ देगी। इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) घट जाएगा।4 आसान शब्दों में इसका मतलब यह है कि औसत पाकिस्तानी आने वाले सालों में काफ़ी ग़रीब होने जा रहा है।

विश्व बैंक के अनुसार, 2022 में मुद्रास्फीति तथा बाढ़ से फ़सलों के नष्ट होने की वजह से, जिसके कारण पाकिस्तान की एक तिहाई कृषि भूमि जलमग्न हो गई, पाकिस्तान में 84 से 91 लाख लोग संभवतः ग़रीबी रेखा से नीचे चले गए।5 बाढ़ के कारण होने वाली तबाही तथा आर्थिक नुक़सान का अनुमान 30 बिलियन डॉलर से अधिक लगाया जा रहा है, और पुनर्निर्माण के लिए कम-से-कम 16 बिलियन डॉलर की आवश्यकता है।6
1961-2003 के बीच पाकिस्तान की जीडीपी वृद्धि दर

स्रोत: Macrotrends.7

बाढ़ से पहले कोविड-19 महामारी ने अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र में अवरोध और संकुचन पैदा कर दिया था। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 2018 में 6.15% से गिरकर 2020 में -1.27% हो गई। यह गिरावट सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से थोक और खुदरा व्यापार के साथ-साथ परिवहन और संचार क्षेत्रों में तेज़ संकुचन की वजह से आई थी। महामारी ने बेरोज़गारी और ग़रीबी को बढ़ा दिया, क्योंकि लॉकडाउन और सामाजिक दूरी के उपायों के कारण कई व्यवसायों का संचालन बंद हो गया या उन्हें अपनी गतिविधि सीमित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।8 महामारी ने पाकिस्तान के राजकोषीय और बाहरी असंतुलन को गंभीर रूप से बढ़ा दिया है क्योंकि कर राजस्व में गिरावट आई, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर ख़र्च बढ़ गया और निर्यात तथा पाकिस्तानी व्यक्तियों द्वारा विदेशों से भेजी गई रकम में कमी आई। आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, जमाख़ोरी और घबराहट में की गई ख़रीदारी के कारण खाद्य क़ीमतें बढ़ीं और 2021 में मुद्रास्फीति की दर दोहरे अंक में पहुँच गई।

हालाँकि कोविड-19 के बाद पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था ने तेज़ी से उबरना शुरू किया, लेकिन ऐसा कम समयावधि के लिए ही हो पाया। 2023 में व्यापार की प्रतिकूल शर्तों की वजह से अर्थव्यवस्था को फिर से संकटों का सामना करना पड़ा। जैसे ही अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले पाकिस्तानी रुपये में गिरावट आती है, पाकिस्तान का आयात ख़र्च बढ़ जाता है, जिससे बड़े पैमाने पर लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति होती है (यानी, जब मज़दूरी और कच्चे माल जैसी उत्पादन लागत में बढ़ोत्तरी के कारण क़ीमतें बढ़ती हैं)। आयात ख़र्च बढ़ने से बिजली, परिवहन और यहाँ तक कि कच्चे माल की लागत भी बढ़ जाती है, जिसका मतलब है कि स्थानीय उद्योग अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं। इस प्रकार, देश के आयात का मूल्य उसके निर्यात के मूल्य से अधिक हो जाता है, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ जाता है। अंग्रेज़ी भाषा की एक फिल्म ग्राउंडहोग डे (1993) के समय-चक्र (time loop) की भाँति यह चक्र भी बिना किसी सुखद अंत के खुद को दोहराता रहता है।

वर्तमान पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट गठबंधन की सरकार, जो अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के बाद सत्ता में आई थी, भारी आर्थिक और राजनीतिक कठिनाइयों का सामना कर रही है। सरकार के कदमों को असंवैधानिक ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए सरकार ने प्रांतीय चुनावों में देरी की। इस बीच, रोटी के लिए आतुर क़तारें लंबी होती जा रही हैं और आटा वितरण केंद्रों पर भगदड़ में बेहद ग़रीब लोग कुचले जा रहे हैं।9

कुल मिलाकर स्थितियाँ गंभीर हैं। ऐसा क्यों हो रहा है?

कुछ लोगों का आरोप है कि पाकिस्तान की परेशानियों के लिए रूस के व्लादिमीर पुतिन और चीन के शी जिनपिंग ज़िम्मेदार हैं।10 हालाँकि यह बहुत मासूम तर्क है। इस विचार के अनुसार यूक्रेन में युद्ध और चीनी क़र्ज़ देश की ऋण समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार हैं। जैसा कि अमेरिकी विदेश विभाग के काउंसलर डेरेक चॉलेट ने फ़रवरी 2023 में इस्लामाबाद की यात्रा के दौरान कहा था, ‘हम न केवल यहाँ पाकिस्तान में, बल्कि दुनिया भर में चीनी ऋण, या चीन के बक़ाया ऋण के बारे में अपनी चिंताओं को लेकर बहुत स्पष्ट हैं।’11

इस तरह की सोच तीन वजहों से ग़लत है। सबसे पहले, पाकिस्तान के व्यापार घाटे का संतुलन, जिसके कारण सरकार को ऋण लेना पड़ता है, यूक्रेन-युद्ध से बहुत पहले से चल रहा है। दूसरा, हालाँकि पाकिस्तान के विदेशी ऋण का लगभग 30% हिस्सा चीन द्वारा उपलब्ध कराया गया है, इस ऋण का अधिकांश हिस्सा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) से जुड़ी परियोजना ऋण के रूप में है, जो बेल्ट एंड रोड पहल का हिस्सा है। दूसरे शब्दों में, इस ऋण का उपयोग सीधे तौर पर देश के बुनियादी ढाँचे और आर्थिक विकास की संभावनाओं में सुधार के लिए किया जा रहा है।12 सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चीन ने पाकिस्तान के लिए कोई विशिष्ट आर्थिक मॉडल या नीति निर्धारित नहीं की है। यह आईएमएफ की सिफ़ारिशों का पालन करने के पाकिस्तान के लंबे इतिहास के बिलकुल विपरीत है: अपनी आज़ादी के बाद से 76 वर्षों में पाकिस्तान ने आईएमएफ के साथ 23 समझौते किए हैं- यानी, औसतन हर तीन साल में एक समझौता। इसके अलावा, मौजूदा नवउदारवादी कटौतियों पर आधारित उपायों की सिफ़ारिश आईएमएफ द्वारा की गई थी, जिसके कारण बिजली, ईंधन और गैस की क़ीमतें आसमान छू रही हैं।13

1995 में, पाकिस्तान विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शामिल हो गया और देश का औसत आयात शुल्क 45% से घटकर 8.6% हो गया।14 पिछले 20 वर्षों से, विदेशी आयात के कारण स्थानीय बाज़ार में विदेशी सामान की बाढ़ आ गई है, और उपभोग आधारित नयी अर्थव्यवस्था उभरी है, जिसके कारण 2003 के बाद से व्यापार संतुलन में गंभीर रूप से गिरावट देखी गई है।15 पाकिस्तान अपनी भुगतान संतुलन की समस्याओं को हल करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका से अपने भू-रणनीतिक मूल्य को लंबे समय से भुनाता रहा है। जब 2001 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया तो उसे पाकिस्तान के समर्थन की आवश्यकता थी और इसलिए उसने देश के ख़िलाफ़ अपने आर्थिक प्रतिबंध हटा दिए और उसे आर्थिक, सुरक्षा और सैन्य सहायता प्रदान की। इसी अवधि में, ‘आतंकवाद के खिलाफ़युद्ध’ में पाकिस्तान के रणनीतिक महत्व के कारण पेरिस क्लब ने पाकिस्तान पर बक़ाया 13.5 बिलियन डॉलर के कुल ऋण में से 12.5 बिलियन डॉलर का पुनर्निर्धारण किया।16 इसके अलावा, इसने देश को कुछ व्यापार रियायतें भी दीं।17 यह लगभग वैसा ही था जैसे पाकिस्तान को एक नई शुरूआत करने का मौका मिल गया हो।। लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं था।

2004 के बाद से, पाकिस्तान का आयात उसके निर्यात को पछाड़ने लगा।18 विदेशों से श्रमिकों द्वारा भेजे गए पैसे से इस असंतुलन को कुछ हद तक कम किया गया। हालाँकि, 2015 और 2018 के बीच पाकिस्तान का चालू खाता घाटा 2.8 बिलियन डॉलर से बढ़कर 18 बिलियन डॉलर हो गया।19 यह यूक्रेन युद्ध से पहले की स्थिति थी। बढ़ते चालू खाता घाटे का सहारा लेकर तथ्यों से ध्यान भटकाया गया तथा चीन और रूस के ख़िलाफ़ नये शीत युद्ध का माहौल बनाया गया। इसका सीपीईसी से कोई ख़ास लेना-देना नहीं था। पाकिस्तान का अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धी नहीं होना और अपनी वहन क्षमता से ऊँची दरों पर वस्तुओं और सेवाओं का आयात जारी रखना बढ़ते घाटे का मुख्य कारण थे।

पाकिस्तान का अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा करने में विफल रहने का कारण श्रम लागत का अधिक होना नहीं है, बल्कि इसका कारण पिछले चार दशकों से निर्यात प्रोत्साहन लाभ प्राप्त करते रहने के बावजूद श्रम उत्पादकता बढ़ा पाने में असमर्थ कपड़ा निर्यातक हैं।20* देश के तकनीकी बुनियादी ढाँचे में सुधार के लिए सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में किसी प्रकार का गंभीर प्रयास भी नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप समय के साथ बांग्लादेश, चीन और वियतनाम जैसे देशों ने कपड़ा उत्पादकता और निर्यात में पाकिस्तान को पीछे छोड़ दिया है।

साथ ही, अत्यधिक महंगी वस्तुओं के आयात में इतनी अधिक बढ़ोत्तरी हो गई है कि पाकिस्तान का व्यापार घाटा अब 42 बिलियन डॉलर है, जिसमें से लगभग 30 बिलियन डॉलर का भुगतान श्रमिकों द्वारा भेजे गए धन से किया जाता है।21 देश की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ दशकों में पूरी तरह बदल गई गई है। 1960 और 1970 के दशक में हरित क्रांति के दौरान मुख्य रूप से कपास और कपास से संबंधित उत्पादों का निर्यात होता था, अब मुख्य रूप से कार्यबल और श्रम शक्ति का निर्यात हो रहा है।


आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था

1990 के दशक में जब वैश्विक नवउदारवादी लहर पाकिस्तान पहुँची, उस समय देश का सार्वजनिक स्वामित्व वाला बिजली क्षेत्र बढ़ती माँग के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ था। सरकार इस विशाल प्राकृतिक एकाधिकार का निजीकरण नहीं कर सकती थी, इसलिए निजीकरण के बजाय सरकार 1994 की स्वतंत्र बिजली उत्पादक नीति (आईपीपी) लेकर आई। इसके तहत विदेशी निवेशकों को बिजली संयंत्र बनाने के लिए आमंत्रित किया। आईपीपी को अनुबंध जारी करना 1990 के दशक के मध्य में पाकिस्तान के बिजली क्षेत्र सुधार कार्यक्रम का एक प्रमुख घटक था। इसका उद्देश्य बिजली उत्पादन में निजी निवेश को आकर्षित करना और सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनियों पर देश की निर्भरता को कम करना था। आज, पाकिस्तान की लगभग आधी बिजली का उत्पादन इन निजी स्वामित्व वाले बिजली उत्पादकों द्वारा किया जाता है जिन्हें आईपीपी कहा जाता है।

इस व्यवस्था के तहत सरकार आईपीपी इकाइयों को ऐसे अनुबंध प्रदान करती है जो प्रभावी रूप से उन्हें अमेरिकी डॉलर में लाभ की गारंटी देते हैं। चूँकि ईंधन और बिजली की दरें अनुबंध के तहत डॉलर में अनुबंध द्वारा पूर्व निर्धारित होती हैं, इसलिए जब डॉलर की क़ीमत बढ़ती है तो आईपीपी इकाइयों के मुनाफ़े पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ता, लेकिन इससे सरकार की लागत बढ़ जाती है। आईपीपी इकाइयों ने सरकार से क्षमता शुल्क की व्यवस्था भी करा रखी है। इसके तहत जब ऊर्जा संयंत्र बिजली का उत्पादन करना शुरू करेंगे तब सरकार को उनसे बिजली न खरीदने की स्थिति में भी एक निश्चित रकम देनी होगी। दूसरे शब्दों में, बाज़ार का सारा जोखिम सरकार के सिर पर है और सारा मुनाफ़ा आईपीपी इकाईयों की झोली में।

इन निवेशकों के साथ समझौते ने आईपीपी इकाइयों को यह चुनने की पूरी आज़ादी दी कि वे बिजली का उत्पादन कैसे करेंगे। उन्होंने भट्ठी का तेल, तरल प्राकृतिक गैस और आयातित कोयले का उपयोग करके बिजली बनाने का विकल्प चुना, जिससे देश में बांधों के माध्यम से बिजली उत्पादन की जगह जीवाश्म ईंधन जलाकर बिजली बनाई जाने लगी। यह न केवल पर्यावरण के लिए ख़तरनाक है, बल्कि इन ईंधनों से बिजली उत्पादन की प्रति यूनिट लागत पानी से उत्पादित बिजली की तुलना में लगभग आठ गुना अधिक है।22 चूँकि पाकिस्तान अधिक मात्रा में तेल का उत्पादन नहीं करता है, इसलिए उसे तेल आयात के मद में काफ़ी पैसा ख़र्च करना पड़ता है। इसको इस बात से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान अपनी कुल आयात लागत का लगभग एक-चौथाई तेल और गैस पर ख़र्च करता है।23

इसके अलावा, निजीकृत बिजली वितरण कंपनियाँ उत्पादन जारी रखने के लिए मुख्य रूप से सरकारी सब्सिडी पर निर्भर हैं।24 यह ऊर्जा नीति पाकिस्तान के चक्रीय ऋण संकट के पीछे के मुख्य कारणों में से एक है। जब सरकार आईपीपी इकाइयों का भुगतान करने में असमर्थ होती है, तो देश अचानक अंधेरे में डूब जाता है। बार-बार होने वाली बिजली कटौती ने कई उद्योगों को नष्ट कर दिया है, ख़ासकर फ़ैसलाबाद में बढ़ते पावरलूम क्षेत्र को।

इन संरचनात्मक मुद्दों के कारण जब तेल की क़ीमत बढ़ती है या जब डॉलर पाकिस्तानी रुपये के मुक़ाबले मज़बूत होता है, तो तेल आयात अधिक महंगा हो जाता है।25 नतीजतन, परिवहन और बिजली की लागत बढ़ जाती है, निर्यातक प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर पाते हैं और बिजली की मांग कम होने के कारण आईपीपी इकाइयों का बिल सरकार को चुकाना पड़ता है जिससे सरकार घाटे में चली जाती है। वास्तव में, जिन सरकारी संस्थानों को सबसे ज़्यादा नुक़सान होता है, वे वितरण कंपनियाँ हैं जो आईपीपी इकाइयों से बिजली ख़रीदती हैं और इससे अपने संबंधित क्षेत्रों में आपूर्ति करती हैं।

सैद्धांतिक नज़रिये से देखा जाए तो डॉलर की बढ़ती क़ीमतों से कमज़ोर मुद्रा वाले देश पाकिस्तान को निर्यात बाज़ार में और अधिक प्रतिस्पर्धी होना चाहिए। आयात अधिक महंगा और निर्यात सस्ता होना चाहिए। हालाँकि, आयात पर निर्भर एक अर्थव्यवस्था के लिए हक़ीक़त दीगर होती है।। चूँकि निर्यात वस्तुओं का उत्पादन आयात से जुड़ा हुआ है, ऐसे में डॉलर की बढ़ती क़ीमतों की वजह से व्यापार संतुलन बिगड़ जाता है। पाकिस्तान के उद्योग आवश्यक कच्चे माल और सामग्रियों का आयात किए बिना स्थानीय रूप से उत्पादित वस्तुओं या सेवाओं का निर्यात नहीं कर सकते हैं। यदि कोई देश अपने निर्यात के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, तो आयात की लागत बढ़ने पर उत्पादन की लागत बढ़ जाती है और उसकी घरेलू मुद्रा का मूल्य उसके व्यापारिक भागीदारों की मुद्राओं की तुलना में गिर जाता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ सकती है और अंततः देश के निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।

निर्यात बढ़ाना मुश्किल क्यों

लघु अवधि में निर्यात बढ़ाना आसान नहीं है। पाकिस्तान के विनिर्माण क्षेत्र में निजी और सार्वजनिक निवेश की कमी के कारण तकनीक पुरानी पड़ गई है और बुनियादी ढाँचा जर्जर हो गया है, जिससे स्थानीय निर्माताओं के लिए विदेशी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो गया है। आईएमएफ की शर्तों ने बुनियादी ढाँचे को उन्नत बनाने और औद्योगीकरण में तेज़ी लाने के लिए आवश्यक निर्यात की मात्रा को और कम कर दिया है।

निर्यात बढ़ाने में एक और बड़ी बाधा यह है कि ईंधन की बढ़ी हुई क़ीमत व्यवसाय करने के लिए आवश्यक परिवहन और अन्य रसद की लागत को बढ़ा देती है। इन बाधाओं की वजह से स्थानीय निर्माताओं के मुनाफ़े में गिरावट आ जाती है, जिससे कई कारख़ाने बंद हो गए हैं और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आई है। अल्पकालिक आईएमएफ ऋणों द्वारा निर्धारित शर्तें इस इस समस्या की गंभीरता को बढ़ाती हैं।

निर्यात बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में श्रमिकों को प्रशिक्षित करना, प्रौद्योगिकियों का नवीनीकरण करना और निर्यात वस्तुओं के निर्माण में निवेश बढ़ाना आवश्यक है। नवउदारवादी मितव्ययिता की नीतियों का पालन करने वाली सरकार उपरोक्त उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सकती। पाकिस्तान पर आईएमएफ द्वारा थोपे गए मितव्ययिता के नवउदारवादी एजेंडे के कारण सरकार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का उदारीकरण करने तथा डॉलर की क़ीमत को नियंत्रित करने हेतु राजकीय नियंत्रण का प्रयोग न करने के लिए बाध्य है। यही कारण है कि वित्त मंत्री इशाक डार समेत पाकिस्तान के अधिकारी लगातार डॉलर की क़ीमत कम करने की कोशिश कर रहे हैं।


आईएमएफ द्वारा थोपा गया निजीकरण

आईएमएफ तक़रीबन 1991 से पाकिस्तान पर राजकीय स्वामित्व वाले उद्यमों (एसओई) का निजीकरण करने के लिए दबाव डाल रहा है। 1991 और 2015 के बीच 172 सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर के 6.5 बिलियन डॉलर इकट्ठा करने के बावजूद पाकिस्तान  अपने बजटीय घाटे अथवा  विकास के दीर्घकालिक मुद्दों को हल करने में असमर्थ रहा है।26 वर्तमान में, सार्वजनिक क्षेत्र के 85 उपक्रम बचे हुए हैं, जो सात क्षेत्रों में काम करते हैं: बिजली; तेल और गैस; बुनियादी ढाँचा, परिवहन और संचार; विनिर्माण, खनन और इंजीनियरिंग; वित्त; औद्योगिक संपदा विकास और प्रबंधन; तथा थोक, खुदरा और मार्केटिंग।27 इनमें से दो-तिहाई, यानी 51 लाभ कमा रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र का लगभग 80-90% घाटा केवल नौ उद्यमों से होता है: पाकिस्तान रेलवे, पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस, पाकिस्तान स्टील मिल्स कॉर्पोरेशन, ज़रई तरक़्क़ियाती बैंक लिमिटेड और पाँच बिजली वितरण कंपनियाँ।28 दूसरे शब्दों में, महंगा बिजली क्षेत्र पाकिस्तान के भारी बजट घाटे का मुख्य कारण है और इसके घाटे का सीधा संबंध ऊर्जा उत्पादन के निजीकरण के निर्णय से है।29

1994 की निजी विद्युत नीति का उद्देश्य बिजली कटौती (load-shedding) की समस्या का समाधान करना था। इसे विश्व बैंक का पूरा समर्थन प्राप्त था और तत्कालीन अमेरिकी ऊर्जा सचिव हेज़ल आर. ओ’लेरी ने ‘पूरी दुनिया में सबसे अच्छी ऊर्जा नीति’ के रूप में इसकी सराहना की थी।30 पूँजीवादी संस्थानों के इस तरह के ज़ोरदार समर्थन के बाद उत्सुक पाकिस्तानी सरकार ने बहुत जल्दी इस नीति को अपना लिया। हालाँकि, 1994 की नीति ने ऊर्जा क्षेत्र में 5 अरब डॉलर का नया निवेश आकर्षित किया और देश की बिजली पैदा करने की क्षमता 4,500 मेगावाट तक बढ़ गई, लेकिन ऊर्जा और इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए इसका दीर्घकालिक परिणाम विनाशकारी सिद्ध हुआ।31

सबसे पहले, बिजली की बढ़ती लागत के परिणामस्वरूप सभी उद्योगों में मुनाफ़ा की दरें कम हो गईं। दूसरा, आईपीपी इकाइयों को इक्विटी पर डॉलर-सूचकांकित रिटर्न की गारंटी ने निवेश जोख़िम का पूरा बोझ पाकिस्तानी सरकार पर डाल दिया। तेल की क़ीमत या डॉलर के उतार-चढ़ाव और क्षमता शुल्क32 के कारण बढ़ते ईंधन शुल्क का पूरा बोझ पाकिस्तानी जनता को वहन करना पड़ा। तीसरा, जैसा कि पाकिस्तान की सीनेट की बिजली पर स्थायी समिति की उपसमिति की रिपोर्ट (2020) से पता चलता है कि कई मौक़ों पर आईपीपी इकाईयों ने राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक पावर नियामक प्राधिकरण (एनईपीआरए) विनियमों द्वारा इक्विटी पर तय 15% से अधिक एकाधिकार मुनाफ़ा (monopoly profit) अर्जित करने के लिए लेखांकन (accounting) में हेरफेर किया, जिसका बोझ सरकारी खजाने को वहन करना पड़ा।33 चौथा, बिजली की बढ़ी हुई क़ीमतों की वजह से एक समय में देश का लाभकारी कपड़ा निर्यात क्षेत्र अब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धी नहीं रहा। हाल ही में, ऑल-पाकिस्तान टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन ने आशंका व्यक्त की है कि बिजली की बढ़ी क़ीमतों की वजह से पंजाब में बने कपड़े का निर्यात पूरी तरह से बंद हो सकता है। पाँचवाँ, आईपीपी को समय पर क्षमता शुल्क का भुगतान करने में सरकार की असमर्थता के कारण देश को लगातार बिजली कटौती या कम बिजली आपूर्ति का सामना करना पड़ता है। पूरे पाकिस्तान में व्यवसायों ने अपने संयंत्रों को चालू रखने के लिए बिजली के वैकल्पिक निजी स्रोत स्थापित कर रखे हैं। अंत में, आईपीपी अनुबंधों ने पाकिस्तान के व्यापार घाटे के संतुलन को बिगाड़कर रख दिया है, जिससे देश को आवश्यक अल्पकालिक ऋणों के लिए आईएमएफ के पास जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। अंततः, बिजली के निजीकरण ने पाकिस्तान के बजट और व्यापार घाटे को काफ़ी बढ़ा दिया है।

पाकिस्तान में सत्ता में आने वाली किसी भी सरकार को चालू खाते के घाटे को कम करने और कम होते हुए विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जैसे-जैसे इस भंडार में गिरावट आती है, नेताओं को डिफ़ॉल्ट का डर सताने लगता है और वे विदेशी वित्तीय सहायता पाने की कोशिश में लग जाते हैं। हालाँकि, आईएमएफ की मंज़ूरी के बिना अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान (आईएफ़आई) देश को ऋण देने के इच्छुक नहीं हैं। परिणामस्वरूप, डिफ़ॉल्ट के इस डर से निर्वाचित प्रतिनिधियों को ऋण माँगने के लिए आईएमएफ की शरण में जाना पड़ा है।

पूर्व प्रधान मंत्री शहबाज़ शरीफ़ द्वारा अप्रैल 2022 में अपना कार्यकाल शुरू करने के कुछ महीने बाद सरकार ने आईएमएफ के साथ एक स्टैंड-बाय व्यवस्था (एसबीए) पर बातचीत की जिसके तहत ज़रूरत पड़ने पर पाकिस्तानी सरकार 3 बिलियन डॉलर तक की रकम आईएमएफ से उधार ले सकती है। प्रशासन ने इस सौदे को ऐसे प्रदर्शित किया मानो उसने प्राचीन फ़ारस साम्राज्य पर विजय प्राप्त कर ली हो। यह तेईसवाँ आईएमएफ कार्यक्रम है जिस पर पाकिस्तानी सरकार ने आईएमएफ के साथ ‘बातचीत’ की है, जिस बातचीत में कहा गया कि पाकिस्तान को स्थिरता प्रदान करने के लिए ऐसे और अधिक कार्यक्रमों की आवश्यकता है।34 धन के साथ यह शर्त लगा दी गई है कि सरकार को निम्नलिखित उपाय करने होंगे: (1) बिजली, गैस और ईंधन से संबंधित सभी सब्सिडी समाप्त करना; (2) ब्याज दर बढ़ाना; (3) बाज़ार को विनिमय दर निर्धारित करने की अनुमति देना; और (4) एसओई का पुनर्गठन। पाकिस्तान के पास इन शर्तों का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, जिसके बाद मुद्रास्फीति अपरिहार्य रूप से बढ़ गई।

औंधे मुंह गिरा राष्ट्रीय बजट

जून 2023 में, वित्त मंत्री इशाक डार ने पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में सरकार का वार्षिक बजट पेश किया। हालाँकि व्यापक रूप से यह उम्मीद की जा रही थी कि बजट अत्यधिक नवउदारवादी कटौती पर आधारित होगा। अक्टूबर में चुनाव की संभावनाओं के कारण पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) ने करों में वृद्धि अथवा राज्य के ख़र्च को कम नहीं करने का फ़ैसला किया। इसके बजाय, इसने सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन में 35% तक की वृद्धि की।35 नया बजट इस कमज़ोर धारणा पर आधारित थी कि पाकिस्तान अन्य देशों और आईएफ़आई से 22 बिलियन डॉलर जुटाने में सक्षम होगा।36 इससे पाकिस्तान का विदेशी क़र्ज़ बढ़कर लगभग 150 बिलियन डॉलर हो जाएगा, देश की वार्षिक जीडीपी का लगभग आधा।

हालाँकि, नेशनल असेंबली द्वारा बजट को मंज़ूरी दिए जाने के बाद आईएमएफ एसबीए के लिए सहमत नहीं हुआ। आईएमएफ के साथ सौदा तय करने के लिए वित्त मंत्री ने सरकारी ख़र्च में 85 बिलियन रुपये (298 मिलियन डॉलर) की कटौती करके तथा 215 बिलियन रुपये (735 मिलियन डॉलर) के नये करों का प्रावधान करके मनमाने ढंग से बजट में बदलाव कर दिया।37 इनमें से किसी भी उपाय को नेशनल असेंबली द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया, न ही नये बजट पर सार्वजनिक बहस हुई। नये बजट के प्रावधानों से आश्वस्त हो जाने के बाद आईएमएफ एसबीए पर सहमत हुआ। आईएमएफ के इशारे पर वित्त मंत्री डार द्वारा पाकिस्तानी जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों को दरकिनार करना आज़ादी के बाद के 76 वर्षों में देश की आर्थिक संप्रभुता का सबसे बड़ा उल्लंघन था।

पाकिस्तान जैसे देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं पर से पूरी तरह नियंत्रण खो दिया है। इसका एक और प्रमाण यह है कि स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान क़ानूनी रूप से सरकार से स्वायत्त है और इसका नेतृत्व अक्सर पूर्व आईएमएफ अर्थशास्त्री करते हैं। आईएमएफ से किसी तरह का समझौता करने के लिए सरकार से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, ब्याज दरों, करों, सरकारी व्यय और यहाँ तक कि बिजली, पेट्रोल, डीज़ल और गैस जैसी आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों के संबंध में आईएमएफ नीतियों को स्वीकार करने की उम्मीद की जाती है। इसलिए मौद्रिक नीति, राजकोषीय नीति या समग्र आर्थिक नीति अब पाकिस्तानी नियंत्रण में नहीं है। यदि पाकिस्तानी सरकार एक विस्तारवादी मौद्रिक नीति (जैसा कि आधुनिक मौद्रिक सिद्धांत कहता है) के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र के ख़र्च को बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करना चाहे, तो वह ऐसा नहीं कर सकती। स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के गवर्नर के पास इतनी शक्ति है कि वह अधिक धन आपूर्ति करने के सरकारी निर्देशों को अस्वीकार कर सकता है।

‘अपने साधनों के दायरे में रहो’

तीसरी दुनिया के सभी देशों के लिए आईएमएफ का आदेश है कि ‘अपने साधनों के दायरे में रहो’। यह समझदारी भरी सलाह लगती है, क्योंकि आख़िरकार कोई भी परिवार, व्यवसाय या देश जो अपनी कमाई से अधिक ख़र्च करता है, तो वह क़र्ज़ में डूब जाएगा। इस प्रकार, सरकारों को करों द्वारा अर्जित आय से अधिक ख़र्च नहीं करना चाहिए और देशों को निर्यात से अधिक आयात नहीं करना चाहिए। बहरहाल, पाकिस्तान ये दोनों ‘पाप’ करता है, जिससे निम्नलिखित प्रश्न उठते हैं: पाकिस्तान अपने आयात को नियंत्रित क्यों नहीं कर सकता? सरकार के अत्यधिक योग्य अर्थशास्त्री बैठकर इस पर काम क्यों नहीं कर सकते? चूँकि देश प्रति वर्ष लगभग 50 बिलियन डॉलर (निर्यात से 20 बिलियन डॉलर और विदेशों में काम करनेवाले पाकिस्तानियों के भेजे पैसों से 30 बिलियन डॉलर) कमाता है, इसलिए इसका आयात 50 बिलियन डॉलर की सीमा के भीतर होना चाहिए – न कि उससे अधिक, जो राशि वर्तमान में 70 बिलियन डॉलर है। यदि हर परिवार को पता है कि आप अपनी कमाई से अधिक ख़र्च नहीं कर सकते हैं, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि ये अर्थशास्त्री, जो सबसे परिष्कृत गणितीय कौशल से लैस हैं, यह योजना नहीं बना सकते कि सरकार क्या और कितना आयात करेगी? यदि तीसरी दुनिया के देश इस प्रकार की योजनाएँ बना सकते हैं, तो उन्हें कभी भी भुगतान संतुलन घाटे, चालू खाता घाटे या घटते विदेशी मुद्रा भंडार का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्हें कभी भी किसी आईएफ़आई से पैसा उधार नहीं लेना पड़ेगा। मगर ऐसा क्यों नहीं होता?

इन सवालों का जवाब देने के लिए, आइए हम ऋण प्राप्तकर्ताओं के लिए आईएमएफ की चार प्रमुख सिफ़ारिशों के साथ-साथ पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों पर उनके प्रभाव पर गहराई से विचार करें। आईएमएफ की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सिफ़ारिश है कि पाकिस्तान निर्यात और आयात के लिए सभी बाधाओं को हटा दे और बाज़ार को डॉलर के मुक़ाबले रुपये की क़ीमत निर्धारित करने की अनुमति दे। इसका प्रभावी अर्थ यह है कि सरकार व्यापार घाटे को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करने में असमर्थ है। माना जाता है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपये की क़ीमत में उतार-चढ़ाव व्यापार को संतुलित करता है, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता है: जैसे-जैसे डॉलर बढ़ता है, वैसे-वैसे पाकिस्तान में निर्यात उद्योगों के लिए कच्चे माल की क़ीमत भी बढ़ती है। परिणामस्वरूप, पाकिस्तानी उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बनने में विफल हो जाते हैं और अर्थव्यवस्था लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति का अनुभव करती है।

आईएमएफ पाकिस्तान को अपने साधनों के दायरे में रहने के लिए कहता है, लेकिन सरकार को रुपये-डॉलर विनिमय दर को विनियमित करके अपने चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने की अनुमति नहीं देता है। जब आईएमएफ पाकिस्तान सरकार को ऋण देने के लिए तैयार नहीं था तब पाकिस्तान आयातकों के साख पत्र38 (letter of credit) पर पाबंदी लगा कर अपने चालू खाते के घाटे को 75% तक कम करने में सक्षम रहा था।39

विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से डॉलर में जमा विदेशी ऋण पर असर पड़ता है। इस वजह से डॉलर को विनियमित करने में सरकार की अक्षमता विदेशी ऋण को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, यदि डॉलर का मूल्य रुपये की तुलना में 10% बढ़ जाता है तो इससे पाकिस्तान के विदेशी ऋण की देनदारी में 10% की वृद्धि होगी, जो 37 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर 41 ट्रिलियन रुपये (130 बिलियन डॉलर से बढ़कर 144 बिलियन डॉलर) हो जाएगा। चूँकि पाकिस्तान की कुल ऋण देनदारियाँ उसके वार्षिक निर्यात से छह गुना से अधिक हैं, इसलिए अपने निर्यात को बढ़ाने में सक्षम होने की अवस्था में भी पाकिस्तान को बढ़े निर्यात के फायदे की तुलना में विदेशी ऋणों की वृद्धि से हुआ नुकसान बेहद ज्यादा होगा। इस तरह देश श्रम के अंतर्राष्ट्रीय विभाजन में एक पायदान और नीचे खिसक जाता है।

रुपये के अवमूल्यन से प्लास्टिक, धातु, स्टील और औद्योगिक रसायनों जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं की क़ीमत में भी नाटकीय वृद्धि होती है। अपने इतिहास में अधिकतर समय पाकिस्तान ने अन्य देशों को कपास का निर्यात किया, लेकिन हाल के वर्षों में आश्चर्यजनक रूप से इस ट्रेंड में परिवर्तन आ गया है, अब वह कच्चे कपास के आयात पर सालाना लगभग 2 बिलियन डॉलर ख़र्च करता है जिसका उपयोग निर्यात के लिए बनाए जाने वाले कपड़े के सामान में किया जाता है।40 घरेलू कपास का उत्पादन कम हो गया है इसका मुख्य कारण है नये बीजों की खोज न होना और घरेलू बाज़ार को गन्ने के उत्पादन के लिए मिलने वाला प्रोत्साहन। स्वाभाविक रूप से, जब डॉलर बढ़ता है तब कच्चे आयातित कपास की क़ीमत भी बढ़ती है, जिससे निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता और कम हो जाती है। यदि डॉलर मज़बूत होता है और अधिक परिष्कृत मशीनरी आयात करने की लागत बढ़ जाती है तो पाकिस्तान के उद्योगों के तकनीकी आधार को कैसे सुधारा जा सकता है?

इन मुद्दों को और भी गंभीर बनाने वाली सच्चाई यह है कि निजी पूँजी लगातार पाकिस्तान से पलायन कर रही है। पूँजीपति वर्ग ने हमेशा अपनी संपत्ति का निवेश देश के बाहर अलग-अलग क्षेत्रों में किया है। शासक वर्ग की कुछ संपत्तियाँ पाकिस्तान के भीतर हैं, लेकिन उनकी अधिकांश संपत्ति विदेशी बैंकों में जमा हैं और मध्य पूर्व में रियल एस्टेट में लगी हुई हैं। मुक्त व्यापार व्यवस्था पूँजी के आवागमन को आसान बनाती है जबकि श्रम को आव्रजन क़ानूनों (immigration laws) द्वारा सख़्ती से नियंत्रित किया जाता है।41 पाकिस्तान बहुत तेज़ी से पूँजी और श्रम दोनों को खो रहा है। आईएमएफ की मुक्त व्यापार व्यवस्था तीसरी दुनिया के देशों की पूँजी के पलायन (capital flight) को विनियमित करने की शक्ति को छीन लेती है।

द नेशन के अनुसार, 1978 और 2018 के बीच पाकिस्तान से पूँजी का कुल पलायन 333 बिलियन डॉलर (2010 की दर के अनुसार) था और अकेले 2013 और 2014 के बीच पाकिस्तानियों ने दुबई में 4.3 बिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति ख़रीदी।42 पाकिस्तान सरकार पूँजी के पलायन को रोकने तथा देश में घरेलू निवेश को बढ़ावा देने में असमर्थ है। लगातार मज़बूत होते डॉलर के परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान में उच्च ब्याज या लाभ दर भी रुपये के अवमूल्यन के कारण व्यवसायों को होने वाले नुक़सान की भरपाई नहीं कर सकती है। इसलिए, मध्य पूर्वी या पश्चिमी बैंकों से निम्न ब्याज दर मिलने के बादजूद पाकिस्तानी अपने देश में अपनी पूँजी निवेश करने का जोखिम उठाने के बजाय इन बैंकों में निवेश करना पसंद करते हैं।

कुशल श्रमिकों का पलायन या ‘प्रतिभा पलायन’ एक अतिरिक्त समस्या है। 2022 में 800,000 लोगों ने विदेशों में काम करने के लिए पाकिस्तान छोड़ दिया। 2023 में यह संख्या दस लाख तक पहुँचने की उम्मीद है।43 इनमें से बहुत से लोग अभी युवावस्था में हैं इसलिए उत्पादक श्रमिक हैं। क्या हर साल दस लाख शिक्षित श्रमिकों को खोने वाली कोई भी अर्थव्यवस्था प्रगति कर सकती है? मज़दूर पूँजी के पीछे जाएँगे, इसलिए दोनों पाकिस्तान से बाहर जा रहे हैं। पूँजी और मज़दूरों के पलायन के बाद एक ऐसा देश बचता है जो पुराने कपड़ा उद्योग से कुछ कपड़े तैयार करता है। पुराना कपड़ा उद्योग ऐसे दौर में स्थापित किया गया था जब पाकिस्तान पश्चिम के लिए रणनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था। अब पाकिस्तान मध्य-पूर्व और यूरोप के लिए अल्प-कुशल श्रम (low-skilled labour) शक्ति का आपूर्तिकर्ता बनकर रह गया है।

2023 के राष्ट्रीय बजट में सब्सिडी मद में काफ़ी पैसा रखा गया है।44 आईएमएफ की सिफ़ारिश है कि सरकार ईंधन और बिजली सब्सिडी ख़त्म कर दे। विडंबना यह है कि बिजली का निजीकरण पाकिस्तानी सरकार के बजट असंतुलन का मुख्य कारण है: 1 ट्रिलियन रुपये (3.7 बिलियन डॉलर) की सब्सिडी दी गई, जिसमें से बिजली क्षेत्र को 677 बिलियन रुपये (2.34 बिलियन डॉलर) का भुगतान किया गया।45 हालाँकि कुछ आईपीपी इकाइयों का स्वामित्व या संचालन पाकिस्तानियों द्वारा किया जाता है, मगर कई विदेशी स्वामित्व वाले हैं या विदेशों से किए गए बड़े निवेश द्वारा संचालित होते हैं।46 यदि सब्सिडी भुगतान नहीं किया जाता है, तो वैसी स्थिति में आईपीपी इकाइयाँ पाकिस्तान को निवेश विवादों के निपटान के लिए अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (आईसीएसआईडी) की अदालत में घसीट सकती है। ऐसे उदाहरण पहले से मौजूद हैं। 2020 में, पट्टा विवाद की वजह से पाकिस्तान द्वारा रेको डिक़ खनन परियोजना को रोकने के बाद आईसीएसआईडी ने कनाडाई-चिली कंपनी टेथियन कॉपर को लगभग 6 बिलियन डॉलर का हर्जाना दिया।47

देश आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, उसके बावजूद आईएमएफ मुद्रास्फीति से निपटने के लिए व्यय में कटौती, नये कर लगाने और अविश्वसनीय रूप से उच्च ब्याज दर बनाए रखने की सिफ़ारिश करता है (पाकिस्तान की अंतरबैंक ब्याज दर वर्तमान में 21% है)। दूसरे शब्दों में, ठीक उसी समय जब कुल माँग लड़खड़ा रही है, आईएमएफ की नीतिगत सिफ़ारिशें सार्वजनिक निवेश को कम करके और निजी निवेश को रोककर अर्थव्यवस्था को बेहतर करने के अवसरों को समाप्त कर देंगी, जिससे पाकिस्तान की मुद्रास्फीतिजनित मंदी और बढ़ जाएगी।

इसके अलावा, आईएमएफ एसओई के ‘पुनर्गठन’ की सिफ़ारिश करता है। हालाँकि दशकों से उपेक्षित इन संस्थाओं को निश्चित रूप से पुनर्गठित करने तथा निवेश की आवश्यकता है, लेकिन आईएमएफ का यह मतलब नहीं है। बल्कि, आईएमएफ सुझाव दे रहा है कि सरकार एसओई के स्वामित्व या प्रबंधन का निजीकरण करने पर विचार करे, जबकि आईएमएफ इस बात पर अड़ा हुआ है कि सरकार आईपीपी को भुगतान करे। आईपीपी को किया जाने वाला सरकारी भुगतान राज्य सब्सिडी का बड़ा हिस्सा है। यह रुख़ विरोधाभासी है: वे एसओई जो पहले से ही घाटे में हैं और लाभ कमाने के लिए जिसमें बड़े पैमाने पर नये निवेश की आवश्यकता है, उन्हें निजी कंपनियों द्वारा नहीं ख़रीदा जाएगा। साथ ही, आईएमएफ की नीतिगत सिफ़ारिशें सरकार को इन उद्यमों को आधुनिक तथा कुशल प्रदर्शन करने के काबिल बनाने वाले आवश्यक निवेश करने की अनुमति नहीं देती हैं।

व्यापार के लिए देश को खोलना

अपने मिशन वक्तव्य में आईएमएफ ‘उच्च रोज़गार और सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और दुनिया भर में ग़रीबी को कम करने’ का दावा करता है। हालाँकि, यह दावा इसके तीन प्राथमिक उद्देश्यों के लिए पूरी तरह से गौण है: पहला, ‘वैश्विक मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देना’ – अर्थात, यह सुनिश्चित करना कि बाज़ार डॉलर की दर निर्धारित करे; दूसरा, अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए घाटे वाले राजकोषीय ख़र्च की कीनेसियन नीति को समाप्त करके ‘वित्तीय स्थिरता को सुरक्षित करना’; और तीसरा, किसी भी प्रकार के आयात प्रतिबंध को हटाकर ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुविधाजनक बनाना’।48

आईएमएफ का यह दृढ़ विश्वास है कि बाज़ार के पास सब समस्याओं का समाधान है। वह अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्थाओं का विस्तार से अध्ययन किए बिना सभी देशों के लिए एक जैसे समाधान पेश कर देता है। उसके लिए लगभग हर आर्थिक समस्या का सीधा और सरल सा समाधान है बाज़ार को सभी चीजों की कीमतें निर्धारित करने देना। आईएमएफ़ मानता है कि इससे सारी समस्याएँ जादुई रूप से अपने आप हल हो जाएँगी। जिन देशों को वह ऋण देता है, उनकी विभिन्न वास्तविकताओं को समझने की कोशिश करने के बजाय आईएमएफ मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए चिंतित रहता है कि उसकी पहुँच के भीतर कोई भी देश निम्नलिखित फ़ॉर्मूले से विचलित न हो: वे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाएँ, राजकोषीय घाटे को ख़त्म करें, डॉलर की दर बाज़ार को निर्धारित करने दें, और अर्थव्यवस्था का निजीकरण करें।

आईएमएफ की रणनीति पाकिस्तान में विकास को बढ़ाने के लिए नहीं बनाई गई है, जिसके लिए कम-से-कम ब्याज दरों और/या उच्च सार्वजनिक ख़र्च की आवश्यकता होगी। इसके विपरीत, इसे इस तरह तैयार किया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय पूँजी को इस देश में व्यापार करने की खुली छूट मिले। पाकिस्तान का मामला कोई असाधारण मामला नहीं है; यह आईएमएफ की कार्यप्रणाली को दर्शाता जिसे वह छोटी बड़ी हर तरह की अर्थव्यवस्था पर लागू करता है। आईएमएफ़ की कारवाईयों के परिणामस्वरूप जब कोई देश मंदी की स्थिति में पहुँच जाता है तब वह उनसे अपना पल्ला झाड़ लेता है।

मुद्रास्फीति और वर्ग संघर्ष

कुल मिलाकर, इस प्रकार की आर्थिक नीति का पाकिस्तान में वर्ग संघर्ष पर दो विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। पहला, मुद्रास्फीति का पाकिस्तान के श्रमिक वर्ग तथा कुलीन वर्ग पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। मुद्रास्फीति का पाकिस्तानी अभिजात वर्ग पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, जो देश के भीतर अपना व्यवसाय चलाने के लिए तरल निवेश (liquid investments) बनाए रखते हैं और अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा विदेशों में रखते हैं। अक्सर डॉलर में होने के कारण स्थानीय मुद्रास्फीति से उनकी विदेशी स्वामित्व वाली संपत्तियों का मूल्य पाकिस्तान में बढ़ जाता है। श्रमिक वर्ग और ग़रीबी रेखा के आस-पास रहने वाले लोगों की स्थिति बिल्कुल अलग होती है। इन पर मुद्रास्फीति का बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। पाकिस्तान में, असमानता बहुत अधिक बढ़ गई है क्योंकि श्रमिक वर्ग और ग़रीबों के पास अगर संपत्ति होती भी है तो केवल देश के भीतर होती है।

दूसरा, मुद्रास्फीति ने पाकिस्तान की मुख्य आर्थिक समस्या, बढ़ते व्यापार घाटे को विकराल बना दिया है। वे देश जिनकी श्रम उत्पादकता नहीं बढ़ती है या जिनके पास बेचने के लिए मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन (जैसे तेल, गैस, सोना और खनिज) नहीं हैं, वे अनिवार्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में श्रम के वैश्विक विभाजन के मामले में पिछड़ जाते हैं। पूँजीवाद प्रतिस्पर्धा की एक प्रणाली है। श्रमिक श्रमिकों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, पूँजीपति पूँजीपतियों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, और देश अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। जो लोग प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते उन्हें व्यापार की प्रतिकूल शर्तों का सामना करना पड़ता है। जैसा कि वैश्वीकरण के समर्थक हमें याद दिलाते नहीं थकते कि लगभग सभी देश एक विश्व बाज़ार का हिस्सा हैं, और इसलिए राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के बिना काम नहीं कर सकती हैं।

जैसे ही पाकिस्तान दुनिया के लिए आवश्यक उत्पाद बनाने की दौड़ में पिछड़ गया वह एक चक्रीय संकट में उलझकर रह गया। आईएमएफ द्वारा सुझाए गए एकमात्र अल्पकालिक विकल्प यह सुनिश्चित करते हैं कि पाकिस्तान लंबे समय तक इस चक्र में उलझा रहे। आईएमएफ का नीतिगत ढाँचा एक अंतहीन दौड़ की तरह है जिसमें से तीसरी दुनिया के देशों के लिए बाहर निकल पाना असंभव है।  इन वजहों से पाकिस्तान आर्थिक रूप से आईएमएफ पर निर्भर रहेगा।

नवउदारवादी अर्थशास्त्री यह सुनते ही क्रोधित हो जाते हैं कि बाज़ार संसाधनों का कुशलतापूर्वक आवंटन नहीं करता है, या  बाज़ार अस्थिर होते हैं। यह सुनना उन्हें क़तई मंजूर नहीं होता कि तथाकथित बाज़ार संतुलित उत्पादन या विकास को बढ़ावा नहीं देते हैं बल्कि केवल मुनाफ़े को अधिकतम करना ही उनका लक्ष्य होता है। आईएमएफ के प्रति अपने दायित्वों को पूरा नहीं करने पर पाकिस्तानी मीडिया भी पाक सरकार पर उसी तरह बरसता है। लेकिन ये दृष्टिकोण इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करते हैं कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का दायित्व जनता के प्रति है। आईएमएफ के कार्यक्रमों की आर्थिक और मानवीय कीमत इतनी अधिक है कि कोई भी राजनीतिक नेतृत्व जिसे जनता के समर्थन की आवश्यकता है,  उन्हें पूरी तरह से लागू नहीं कर सकता, क्योंकि वे मूल रूप से लोकतंत्र विरोधी हैं। प्रतिनिधित्व आधारित लोकतंत्र के बुर्जुआ संसदीय स्वरूप को नष्ट करके ही आईएमएफ की माँगों को पूरा किया जा सकता है।

आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में पाकिस्तान जो पहला क़दम उठा सकता है, वह है अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विनिमय दर को विनियमित करना, स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान का नियंत्रण वापस लेना और ऐसे किसी भी बजट को अस्वीकार करना जिसे जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया है। हालाँकि अभी समाजवाद का रास्ता तय होना बाक़ी है, फिर भी कम-से-कम यह वर्तमान संदर्भ में एक बड़ा क़दम होगा, जहाँ दुनिया के अधिकांश हिस्सों से स्वतंत्र राष्ट्रीय पूँजीवादी विकास की संभावना भी ख़त्म कर दी गई है।

आर्थिक संकट के राजनीतिक और सैन्य प्रभाव

पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) गठबंधन सरकार, पाकिस्तान में सत्ता में आने वाले हर शासन की तरह आर्थिक विकास का एक कार्यक्रम शुरू करने के लिए बेताब थी। इसने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए एक नयी पहल शुरू की और ‘गेम चेंजर’, ‘सामूहिक सरकार’ और ‘वन विंडो ऑपरेशन’ जैसे प्रचलित शब्दों की एक श्रंखला शुरू की।49 हालाँकि, कड़वी सच्चाई यह है कि सरकार ने इस काम के लिए सेना को आमंत्रित किया है कि वह अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करे और सुनिश्चित करे कि सभी विदेशी निवेशों का ठीक से प्रबंधन और समन्वय किया जाए ताकि परियोजना समय से पूरी हो सके। यदि पर्यावरण या श्रमिक संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं, या यदि कोई विशेष प्रांत अपने व्यावसायिक हितों की वजह से हस्तक्षेप करती है, तो सेना इन तथाकथित बाधाओं को दूर कर देगी। निःसंदेह, इतिहास हमें बताता है कि आर्थिक बाधाएँ अक्सर इंसान की गर्दन पर कुल्हाड़ी मारकर समाप्त की जाती हैं।

पीडीएम सरकार के सैन्य-केंद्रित दृष्टिकोण के कारण संघीय सरकार तथा प्रांतीय सरकारों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होना निश्चित है। संविधान के अठारहवें संशोधन के तहत, शिक्षा, श्रम और पर्यावरण जैसे कई क्षेत्र अब प्रांतीय सरकारों के दायरे में आते हैं। चूँकि सेना ने पाकिस्तान के आर्थिक पुनरुद्धार की ज़िम्मेदारी ले ली है, ऐसे में अंतर-प्रांतीय संबंधों को प्रभावित करने वाली मेगा-परियोजनाओं पर किसी भी प्रकार की आपत्ति को सेना को सीधी चुनौती माना जा सकता है। इससे सैन्य-प्रभुत्व वाली केंद्र सरकार और राजनीतिक दलों के प्रभुत्व वाली प्रांतीय सरकारों के बीच अधिक तनाव पैदा होगा।

यह एक अभूतपूर्व परिवर्तन है जिस पर अधिकांश राजनीतिक टिप्पणीकारों का ध्यान लगभग पूरी तरह से नहीं गया है। वर्तमान पीडीएम गठबंधन सबसे पहले 2006 में एक साथ आया था जब वामपंथी रुझान वाली मध्यमार्गी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने दक्षिणपंथी रुझान वाली मध्यमार्गी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) को लोकतंत्र के चार्टर पर हस्ताक्षर करने के लिए आमंत्रित किया था, जिसमें कहा गया था कि कोई भी पार्टी दूसरे की सरकार को अपदस्थ करने के लिए सेना के साथ सहयोग नहीं करेगी। यह उल्लेखनीय था कि पाकिस्तान की दो सबसे बड़ी पार्टियाँ नागरिक मामलों में सेना की भूमिका के ख़िलाफ़ एकजुट हो गई थीं, क्योंकि देश के इतिहास में अधिकांश समय सरकार सैन्य तानाशाहों द्वारा या सेना की सक्रिय भागीदारी के साथ चलाई गई है। कुछ प्रगतिवादियों ने इस गठबंधन पर बहुत विश्वास किया, क्योंकि वह उम्मीद कर रहे थे कि यह पाकिस्तानी सेना के राजनीति से बाहर निकलने का संकेत है।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टियों के स्पष्ट रूप से सत्ता विरोधी गठबंधन की पृष्ठभूमि में ही सेना ने कथित तौर पर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) का समर्थन किया, ख़ासकर 2014 के बाद, जब नवाज़ सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच अनबन हो गई थी। पीटीआई ने अन्य पार्टियों पर भ्रष्ट और अक्षम होने का आरोप लगाते हुए हमला किया और (बड़े पैमाने पर सेना द्वारा नियंत्रित) मीडिया ने इसी बात को दोहराया। पीडीएम ने तर्क दिया कि पीटीआई के उम्मीदवार इमरान ख़ान केवल उन ताक़तों के लिए एक मुखौटा थे जो लोकतंत्र के चार्टर को कमज़ोर करना चाहते थे और सेना को सत्ता में वापस लाना चाहते थे। विपक्ष ने इमरान ख़ान को ‘निर्वाचित प्रधानमंत्री’ कह कर संबोधित किया और पीटीआई के कार्यकाल के दौरान मीडिया, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक निर्णयों पर बढ़ते सैन्य प्रभाव को रेखांकित किया।।

पीटीआई पर ‘हाइब्रिड शासन’ होने का आरोप लगाने वाला पीडीएम सत्ता में आने के बाद से हर स्तर पर सैन्यवादी रास्ते पर बहुत आगे चला गया है।50 पीटीआई तथा अन्य विपक्षी दलों का दमन करके सेना  ने न केवल देश की राजनीति को अपने हाथों में ले लिया है बल्कि इसे देश के आर्थिक मामलों को संभालने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित भी किया गया है। यह एक व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय पूँजी द्वारा तीसरी दुनिया के देशों पर थोपी गई आर्थिक बाधाएँ अंततः इन देशों के राजनीतिक नेतृत्व को अर्थव्यवस्था का प्रबंधन सेना के हाथों में सौंपने के लिए प्रेरित करती हैं।

यह धारणा अब समाप्त हो चुकी है कि सेना को अपनी ‘संवैधानिक भूमिका’ के भीतर नियंत्रित किया जाना चाहिए, क्योंकि पीडीएम आर्थिक संकट से घिरा हुआ है और उसे पीटीआई द्वारा चुनौती मिल रही है, ऐसे में न केवल विपक्ष का दमन करने के लिए बल्कि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने और आर्थिक परियोजनाओं को पूरा करने में मदद करने के लिए भी सेना पर भरोसा करना आसान हो गया है। लोकतंत्र का चार्टर रद्दी की टोकरी में चला गया है। इस संघर्ष में वास्तविक लाभार्थी पाकिस्तानी सेना है जिसका राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक क्षेत्र पर आधिपत्य अब मज़बूती से स्थापित हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय पूँजी और आईएमएफ द्वारा बनाई गई प्रतिकूल आर्थिक स्थितियों ने एक सत्तावादी राज्य और समाज के लिए ज़मीन तैयार की है।

निष्कर्ष: आख़िर पाकिस्तान किधर?

मार्क्सवादियों का मानना है कि इतिहास लगातार आगे बढ़ रहा है। मानवता के विकास के व्यापक ढाँचे में निस्संदेह रूप से यह सत्य है। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि प्रत्येक गाँव, क्षेत्र या देश हमेशा आगे बढ़ रहा है। जब इतिहास आगे बढ़ता है, तो कई समाज नष्ट हो जाते हैं (जैसा कि विभिन्न औपनिवेशिक परियोजनाओं के मामले में हुआ), स्थिर हो जाते हैं (बाइजैन्टाइन या ऑटोमन साम्राज्य), या उनका पतन हो जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि बाद की दो प्रवृत्तियाँ पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति पर लागू होती हैं।

स्वतंत्रता के बाद कुछ वास्तविक ऐतिहासिक प्रगति करने के बाद पाकिस्तान व्यापक सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक ठहराव, या शायद प्रतिगमन के दौर में प्रवेश कर गया है। इसलिए जिस तरह पाकिस्तान की जनता ने 1947 में ब्रिटिश उपनिवेशवाद से अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल की थी, उसी तरह आज उनके कंधों पर आर्थिक स्वतंत्रता के लिए संगठित होने, एकजुट होने और संघर्ष करने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है। यह लक्ष्य केवल पाकिस्तान के लिए नहीं है बल्कि संपूर्ण तीसरी दुनिया के लिए भी है, जो आर्थिक विकास के अवसरों को नष्ट करने वाली नव-उपनिवेशवादी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्थाओं की चपेट में है।


संदर्भ सूची

1  Tricontinental: Institute for Social Research, Pakistan Under Water, red alert no. 15, 8 September 2022,   https://thetricontinental.org/red-alert-15-pakistan- floods/.

2  ‘Pakistan’, IMF Country Information, International Monetary Fund, April 2023, https://www.imf.org/en/Countries/PAK

3  Economic Advisor’s Wing, Highlights: Pakistan Economic Survey 2022–23 (Islamabad: Finance Division, Government of Pakistan, June 2023), 1, https:// www.finance.gov.pk/survey/chapters_23/Highlights.pdf.

4 ‘Ranking by Population Growth Rate: All Countries in Asia’, Place Rankings, Data Commons, accessed 27 July 2023, https://datacommons.org/ranking/ GrowthRate_Count_Person/Country/asia?h=country/PAK&unit=%.

5 Erwin Knippenberg, Mattia Amadio, Nadeem Javaid, and Moritz Meyer, ‘Quantifying the Poverty Impact of the 2022 Floods in Pakistan’, World Bank Blog, 18 May 2023, https://blogs.worldbank.org/developmenttalk/quantifying- poverty-impact-2022-floods-pakistan.

6 The World Bank, ‘Pakistan: Flood Damages and Economic Losses Over USD 30 billion and Reconstruction Needs Over USD 16 billion – New Assessment’, The World Bank press release, 28 October 2022, https://www.worldbank.org/ en/news/press-release/2022/10/28/pakistan-flood-damages-and-economic- losses-over-usd-30-billion-and-reconstruction-needs-over-usd-16-billion- new-assessme.

7 ‘Pakistan GDP Growth Rate 1961–2023’, Macrotrends, accessed 17 July 2023, https://www.macrotrends.net/countries/PAK/pakistan/gdp-growth-rate

8 ‘Pakistan GDP’.

9 Mubasher Bukhari and Jibran Ahmad, ‘Five Killed in Stampedes at Flour Distribution Sites in Pakistan’, Reuters, 30 March 2023, https://www.reuters. com/world/asia-pacific/five-killed-stampedes-flour-distribution-sites- pakistan-2023-03-30/.

10 For examples of this reasoning, see Muslim Mooman, ‘Ukraine Crisis and Inflation’, The Express Tribune, 21 February 2022, https://tribune.com.pk/ story/2344472/ukraine-crisis-and-inflation; Gibran  Naiyyar  Peshimam, ‘US Concerned about Debt Pakistan Owes China, Official Says’, Reuters, 17 February 2023, https://www.reuters.com/world/asia-pacific/us-concerned- about-debt-pakistan-owes-china-official-says-2023-02-16/.

11 Gibran Naiyyar Peshimam, ‘US Concerned about Debt Pakistan Owes China, Official Says’, Reuters, 16 February 2023, https://www.reuters.com/ world/asia-pacific/us-concerned-about-debt-pakistan-owes-china-official- says-2023-02-16/.

12 Faseeh Mangi, ‘China’s Funding to Pakistan Stands at 30% of Foreign Debt’, Bloomberg, 2 September 2023, https://www.bloomberg.com/news/ articles/2022-09-02/china-s-funding-to-pakistan-stands-at-30-of-foreign- debt.

13 IMF Communications Department, ‘IMF Executive Board Approves US$3 billion Stand-By Arrangement for Pakistan’, International Monetary Fund, 23 July 2023, https://www.imf.org/en/News/Articles/2023/07/12/pr23261- pakistan-imf-exec-board-approves-us3bil-sba.

14 ‘Pakistan Tariff Rates 1995–2023’, Macrotrends, accessed 9 September 2023, https://www.macrotrends.net/countries/PAK/pakistan/tariff-rates.

15 ‘Pakistan Balance of Trade’, Trading Economics, accessed 16 September 2023, https://tradingeconomics.com/pakistan/balance-of-trade#:~:text=.

16 ‘Rescheduling of the Debt of Pakistan’, Paris Club, 13 December 2001, https:// clubdeparis.org/en/communications/press-release/rescheduling-of-the-debt- of-pakistan-13-12-2001.

17ये थे सिमिंगटन संशोधन (1976 में अपनाया गया और 1978 में लागू किया गया), प्रेसलर संशोधन (1990), और ग्लेन संशोधन (1977 में अपनाया गया लेकिन 1998 में पाकिस्तान पर लागू किया गया)। 2002-2003 के लिए पाकिस्तान को लगभग 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर की विदेशी सहायता देने का वादा किया गया था। देखें ‘The IMF, the US War on Terrorism, and Pakistan’, Asian Affair 31, no. 1 (2004), https://uwaterloo.ca/scholar/sites/ca.scholar/files/bmomani/files/the_imf_us_war_on_terrorism_and_pakistan_a_lesson_in_economic_ statecraft.pdf, 45.

18 Murtaza Haider, ‘Which Political Party Has Been the Best for Pakistan’s Economy? Trade Stats Reveal All’, DAWN, 16 May 2019, https://www.dawn. com/news/1482443.

19Salman Siddiqui, ‘Pakistan’s Current Account Deficit Peaks at $17.99b’, The Express Tribune, 20 July 2018, https://tribune.com.pk/story/1762078/ pakistans-current-account-deficit-peaks-17-99b.

20 1950 के दशक से पाकिस्तान सरकार कर में छूट और आयात लाइसेंसिग योजना के माध्यम से निर्यात को बढ़ावा देती रही है। उदाहरण के लिए देखें,  Federal Board of Revenue, ‘Export Facilitation Scheme’, Revenue Division, Government of Pakistan, 13 August 2020, https://www.fbr.gov.pk/export-facilitaion-schemes/51149/132200. निर्यात प्रोत्साहन लाभ के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखें Syed Zahid Abbass Naqvi, Aneeqa Nawaz, Ayesha Naeem, and Shahzad Ahmad, ‘Bearing of Export Subsidies on Pakistan’s Exports’, International Journal of Business Management and Economic Research 10, no. 3 (2019): 1587–1592, https://www. ijbmer.com/docs/volumes/vol10issue3/ijbmer2019100301.pdf.

21 ‘Pakistan Trade Balance 1960–2023’, Macrotrends, accessed 16 September 2023, https://www.macrotrends.net/countries/PAK/pakistan/trade-balance-deficit; Amna Puri-Mirza, ‘Value of Remittances Received in Pakistan from 2012 to 2022’, Statista, 9 August 2023, https://www.statista.com/statistics/880752/ pakistan-value-of-remittances/.

22 State Bank of Pakistan Infrastructure Taskforce, The Pakistan Infrastructure Report (Islamabad: State Bank of Pakistan, 2012), https://www.sbp.org.pk/ departments/ihfd/InfrastructureTaskForceReport.pdf; Khaleeq Kiani, ‘LNG Replaces Oil as Costliest Source of Power’, DAWN, 17 July 2023, https://www. dawn.com/news/1765123/lng-replaces-oil-as-costliest-source-of-power.

23 ‘Pakistan Imports by Category’, Trading Economics, accessed 26 September 2023, https://tradingeconomics.com/pakistan/imports-by-category.

24 Khaleeq Kiani, ‘Study Finds Fault with KESC Privatisation’, DAWN, 18 August 2012, https://www.dawn.com/news/743064/study-finds-fault-with- kesc-privatisation.

25 Zofeen T. Ebrahim, ‘Pakistan Energy Climate Change Future’, Reuters, 24 February 2021, https://www.reuters.com/article/us-pakistan-energy-climate- change-featur-idUSKBN2AO27C.

26    Ishrat Husain, ‘The Future of SOEs – Part 1’, The News International, 6 May 2023, https://www.thenews.com.pk/print/955466-the-future-of-soes

27 Husain, ‘The Future of SOEs’; Implementation and Economic Reforms Unit, Finance Division, Government of Pakistan, Federal Footprint: State Owned Entities (SOEs) Performance Review FY2013–14 (Islamabad: Finance Division, Government of Pakistan, 2014), https://www.finance.gov.pk/publications/ State_Owned_Entities_FY_2013_14.pdf.

28 Husain, ‘The Future of SOEs’; Implementation and Economic Reforms Unit, Finance Division, Government of Pakistan, Federal Footprint: SOEs Annual Report FY2019. Commercial SOEs, vol. 1 (Islamabad: Finance Division, Government of Pakistan, 2019), https://www.finance.gov.pk/publications/ SOE_Report_FY19_Vol_I.pdf

29 Implementation and Economic Reforms Unit, Finance Division, Government of Pakistan, ‘Special Section 2: Evaluating the Fiscal Burden of State-owned Enterprises in the Power Sector’, In The State of Pakistan’s Economy: Second Quarterly Report for FY19 (Islamabad: Finance Division, Government of Pakistan, 2019), https://www.sbp.org.pk/reports/quarterly/fy19/Second/ Special-Section-2.pdf.

30 Taimur Rahman, ‘Privatisation and Power’, Discourse, no. 2023–02 (May–June 2023), https://pide.org.pk/research/privatisation-and-power/.

31 Fahd Ali and Fatima Beg, The History of Private Power in Pakistan, Working Paper Series, no.106 (Sustainable Development Policy Institute, April 2007), https://sdpi.org/sdpiweb/publications/files/A106-A.pdf.

32 क्षमता शुल्क सरकार द्वारा निजी बिजली उत्पादकों को भूमि खरीद, डिज़ाइन, स्थापना, कर, बीमा, प्रशासन, ऋण सेवा और इक्विटी पर रिटर्न की लागत सहित निवेश पर  रिटर्न को कवर करने के लिए किया गया भुगतान है। ये शुल्क विनिमय दर और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव जैसे कारकों को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं।

33 Senate Standing Committee, Senate of Pakistan, Report of the Sub-Committee of the Standing Committee on Power, Report no. 1 of 2020 (11 September 2019), https://senate.gov.pk/uploads/documents/1583320128_224.pdf.

34 Khaleeq Kiani, ‘Pakistan Facing “Exceptionally High” Risks, Says IMF’, DAWN, 19 July 2023, https://www.dawn.com/news/1765586/pakistan-facing- exceptionally-high-risks-says-imf.

35 Anjum Shahnawaz, ‘Government Employees in Pakistan Granted Salary Increase of up to 35%’, Pakistan Revenue, 6 July 2023, https://pkrevenue. com/government-employees-in-pakistan-granted-salary-increase-of-

up-to-35/#:~:text=Islamabad%2C%20July%206%2C%202023%20%E2%80%93,details%20of%20this%20salary%20raise\.

36 ‘Why Did Pakistan Need the IMF Deal? What Does It Need to Do Now?’, Al Jazeera, 30 June 2023, https://www.aljazeera.com/news/2023/6/30/why-did- pakistan-need-the-imf-deal-what-does-it-need-to-do-now.

37 Mubarak Zeb Khan, ‘Rs215bn in New Taxes to Help Seal IMF Deal’, DAWN, 25 June 2023, https://www.dawn.com/news/1761637.

38 यह एक लिखित प्रमाणन है जो बैंक (जारीकर्ता बैंक) द्वारा माल क्रेता के अनुदेश पर विक्रेता को जारी किया जाता है। दस्तावेजी ऋण का प्रयोग शामिल पक्षों को सुरक्षा प्रदान करता है। विक्रेता को भुगतान सुनिश्चित किया जाता है बशर्ते वह सहमत निबंधनों का अनुपालन करे, जबकि क्रेता दस्तावेजी ऋण में माल की गुणवत्ता व संख्या को लेकर सारी शर्तें व निबंधन शामिल कर सकता है जो उसे स्वयं माल को देखे या जाँचे बिना संतुष्ट करें। चूंकि बैंक विश्वसनीय तीसरे पक्ष या मध्यस्थ की भूमिका निभाता है इसलिए वह क्रेता व विक्रेता के मध्य विश्वास संबंधी मुद्दों का ख्याल रखता है। स्रोत: https://www.idbibank.in/hindi/tradefinance-letterofcredit.aspx

39 Ali Salman, ‘We Need a Minister of Economy’, The Express Tribune, 26 June 2023, https://tribune.com.pk/story/2423561/we-need-a-minister-of-economy.

40 ‘Pakistan Imports of Cotton’, Trading Economics, accessed 2 August 2023, https://tradingeconomics.com/pakistan/imports/cotton.

41 To learn more about this dynamic, see Tricontinental: Institute for Social Research, In the Ruins of the Present, working document no. 1, 1 March 2018, https://thetricontinental.org/working-document-1/.

42 Malik Fahim Bashir, Taimur Khan, Yasir Bin Tariq, and Muhammad Akram, ‘Does Capital Flight Undermine Growth: A Case Study of Pakistan’, Journal of Money Laundering Control (31 August 2023), https://www.emerald.com/ insight/content/doi/10.1108/JMLC-07-2022-0100/full/html; ‘Capital Flight’, The Nation, 25 May 2015, https://www.nation.com.pk/25-May-2015/capital- flight?show=486.

43 ‘800,000 Professionals, Left Pakistan in 2022’, Daily Times, 1 February 2023, https://dailytimes.com.pk/1058262/800000-professionals-left-pakistan-in-2022/.

44 Zafar Bhutta, ‘Power Sector to Eat up Major Chunk of Subsidies’, The Express Tribune, 10 June 2023, https://tribune.com.pk/story/2421017/power-sector-to- eat-up-major-chunk-of-subsidies; ‘Pakistan Further Removes Fuel Subsidies to Win IMF Funding –Finmin’, Reuters, 15 June 2023, https://www.reuters. com/markets/asia/pakistan-further-removes-fuel-subsidies-win-imf-funding- finmin-2022-06-15/.

45 Bhutta, ‘Power Sector to Eat up Major Chunk of Subsidies’.

46 ‘IPPs’, Central Power Purchasing Agency (Market Operator), https://www. cppa.gov.pk/ipps.

47 ‘Decisions on Provisional Measures’, Tethyan Copper Company Pty Limited v. Islamic Republic of Pakistan, case no. ARB/12/1 (Washington, DC: International Centre for Settlement of Investment Disputes, 13 December 2012), http://icsidfiles.worldbank.org/icsid/icsidblobs/OnlineAwards/C3805/ DC4984_en.pdf.

48 ‘About the IMF’, International Monetary Fund, accessed 2 August 2023, https://www.imf.org/external/pubs/ft/ar/2016/eng/about.htm#:~:text=It%20 works%20to%20foster%20global,reduce%20poverty%20around%20the%20 world.

49 ‘Exporters’ Issues: PM for Establishing One-Window Facilitation Centres’, Business Recorder, 17 July 2023, https://www.brecorder.com/news/40252962.

50 Imitaz Alam, ‘As Imran Khan’s Populism Goes Bust, Pakistan’s Hybrid Regime Remains Mired in Crisis’, 1 June 2023, https://thewire.in/south-asia/imran- khan-pakistan-populism-hybrid-regime.

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तीसरी दुनिया के ख़िलाफ़ तख़्तापलट: चिली, 1973 https://thetricontinental.org/hi/teesari-duniya-ke-khilaf-takhtapalat-chile-1973/ Tue, 05 Sep 2023 08:00:19 +0000 https://thetricontinental.org/?p=85510 डोसियर नं. 68


पेट्रीसिया इज़राइल और अल्बर्टो पेरेज़ (चिली), अमेरिका जाग रहा है, 1972। सिल्कस्क्रीन प्रिंट, 144 x 110 सेमी।

 

इस डोसियर में शामिल तस्वीरें और कलाकृतियाँ 1973 के चिली तख़्तापलट के बाद सुरक्षित बची रहीं तस्वीरों और कलाकृतियों में से ली गई हैं। तख़्तापलट से पहले, ये Museo de la Solidaridad (सॉलिडेरिटी म्यूज़ियम) के संग्रह में शुमार थीं। यह म्यूज़ियम अमेरिका और यूरोप से कलाकृतियों के दान को प्रोत्साहित करने के लिए पॉपुलर यूनिटी सरकार द्वारा शुरू की गई एक परियोजना थी। यह परियोजना 1971 में शुरू होकर 1973 के तख़्तापलट तक जारी रही, और इसका उद्देश्य चिली के लोगों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कला का एक संग्रहालय बनाना था। हालाँकि, तख्तापलट के बाद, उनमें से कई कलाकृतियाँ नष्ट हो गईं।

संग्रहालय तबाह कर देने के लिए तख़्तापलट शासन के अनेकों प्रयासों के बावजूद, चिली के भूमिगत और निर्वासित सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने 1975 और 1990 के बीच साल्वाडोर अलेंदे इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ रेसिस्टेंस के नाम से विदेश में इस संस्थान को पुनर्जीवित किया। चिली में लोकतंत्र की वापसी के बाद, 1991 में इस परियोजना को वापस चिली में शुरू किया गया और अब इसे साल्वाडोर अलेंदे सॉलिडेरिटी म्यूजियम (MSSA) कहा जाता है।

(ऑगस्टो पिनोशे के सिपाहियों द्वारा मार्क्सवादी किताबों व अमेरिका जाग रहा हैतस्वीर के जलाए जाने वाली तस्वीर के अलावा) इस डोसियर में शामिल सभी छवियाँ MSSA से साभार ली गई हैं।



ऑगस्टो पिनोशे के सैनिक मार्क्सवादी किताबों और सिल्कस्क्रीन प्रिंट में बना अमेरिका जाग रहा हैचित्र जला रहे हैं, 28 सितंबर 1973श्रेय: सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी फ़्रीडम ओफ़ इन्फ़र्मेशन ऐक्ट, वीक्ली रिव्यू; विकिमीडिया कॉमन्स।

 

प्रस्तावना

पाब्लो मोनजेरेयेस, INSTITUTO DE CIENCIAS ALEJANDRO LIPSCHUTZ CENTRO DE PENSAMIENTO E INVESTIGACIÓN SOCIAL Y POLÍTICA के निदेशक

चिली, उसकी समाजवादी कोशिशों पर हुए दमन, और लैटिन अमेरिकी क्षेत्र के अन्य देशों तथा वैश्विक दक्षिण के तमाम देशों में आज जारी प्रक्रियाओं के बीच के संबंध को चिली के आधिकारिक इतिहास और मीडिया आख्यानों में से व्यवस्थित रूप से मिटा दिया गया है। इन प्रक्रियाओं की परस्पर निर्भरता, पॉपुलर यूनिटी परियोजना के लिए एकजुटता व समर्थन, और अंतर्राष्ट्रीयता के नए रूपों को जन्म देने के लिए उपयोग की जाने वाली रणनीतियाँ कुछ वामपंथियों के स्मृति पटल से भी ग़ायब हो गई हैं; और इससे नवउदारवादी परियोजना को मज़बूत करने के लिए चिली की एक आदर्श स्थल के रूप विशिष्टता की पुष्टि होती है।

चिली और उसके बाहर व्यापक समझ यह है कि 1973 के तख़्तापलट के वित्तपोषण, संगठन और निष्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका की भागीदारी का कारण था ताँबे का राष्ट्रीयकरण। लेकिन, यह दृष्टिकोण हमें राष्ट्रीयकरण परियोजना की ताक़त तथा पॉपुलर यूनिटी सरकार की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध नीति और रणनीतिक उपायों में इस परियोजना के प्रभावों की सराहना करने का मौक़ा नहीं देता है। डोसियर नं. 68, ‘तीसरी दुनिया के खिलाफ तख़्तापलट: चिली, 1973में चिली का Instituto de Ciencias Alejandro Lipschutz Centro de pensamiento e investigación social y política (ICAL) और ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान चिली के ख़िलाफ़ 1973 के तख्तापलट तथा तीसरी दुनिया और गुटनिरपेक्ष देशों पर उसके प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। यह डोसियर ऐसे सबक सिखाता है जो तीसरी दुनिया के लोगों को न केवल आज बल्कि हमेशा याद रखने चाहिए। यह डोसियर इस बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी देता है कि तख़्तापलट होते क्यों हैं। विशेष रूप से, यह डोसियर चिली के ख़िलाफ़ तख्तापलट की साजिश में संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका को उजागर करता है। इसका प्रमाण उन दस्तावेज़ों से मिलता है जिन्हें उस समय गुप्त रखा गया था, क्योंकि वे अपनी जनता के हित में एक नई सामाजिक परियोजना चलाने के लिए अपनी स्वायत्तता का दावा करने वाले एक लोकतांत्रिक देश के आंतरिक मामलों में एक साम्राज्यवादी राष्ट्र के हस्तक्षेप को प्रकट कर सकते थे। यह डोसियर दो मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करता है: पहला, ताँबे के राष्ट्रीयकरण के राजनीतिक उद्देश्य, और दूसरा, नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) के निर्माण के उद्देश्य से तीसरी दुनिया के देशों के बीच व्यापक बातचीत में राष्ट्रीयकरण की भूमिका।

चिली के आर्थिक विकास के ढांचे में राष्ट्रीयकरण कोई नवाचार नहीं था। इसे एडुआर्डो फ्रेई (1964-1970) की सरकार ने एक ज़रूरत के रूप में प्रस्तुत किया था, और आंशिक रूप से लागू किया था; लेकिन तत्कालीन सीनेटर साल्वाडोर अलेंदे ने पहली बार राष्ट्रीय संपत्तियों के उत्पादन का राष्ट्रीयकरण करने के लिए विभिन्न तरीकों का विषय उठाया था। 11 जुलाई 1971 (राष्ट्रीय गरिमा दिवस) के दिन कांग्रेस ने ताँबे के राष्ट्रीयकरण को मंजूरी दी थी। उस मौक़े पर राष्ट्रपति अलेंदे ने अपने भाषण के द्वारा यह ज़ाहिर कर दिया कि फ़्रेई का राष्ट्रीयकरण कार्यक्रम आगे क्यों नहीं बढ़ पाया:

हम ताँबा समझौतों की आलोचना करते हैं, हम चिलीकरण की आलोचना करते हैं, और हम उस राष्ट्रीयकरण की आलोचना करते हैं जिस पर अभी तक सहमति रही थी, औरहमने हमेशा कहा है, और हम अब दोहरा रहे हैं, कि हम व्यापक राष्ट्रीयकरण के पक्ष में हैं, ताकि धन का बड़ा हिस्सा देश से बाहर न जाए, ताकि चिली एक भिखारी देश न बना रहे जो हाथ फैलाकर कुछ मिलियन डॉलर की भीख मांगता है, जबकि हमारे देश का धन ताँबे की बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को सींचता है।

हम पूंजी निर्यात करने वाला विकासशील देश नहीं बनना चाहते; हम सस्ता बेचकर महंगा खरीदने वाली रीत जारी नहीं रखना चाहते। यही कारण है पॉपुलर यूनिटी परियोजना के होने का; यह एक ऐसी परियोजना है जो चिली और चिली के लोगों की सेवा के मौलिक देशभक्ति कार्यक्रम में जुटी है। और इसीलिए मैं यहाँ हूँ, जनता के राष्ट्रपति के रूप में, इस कार्यक्रम को आगे, हर हाल में, आगे बढ़ाने के लिए1

अलेंदे परिवर्तन की इस प्रक्रिया में ताँबा श्रमिकों की अग्रणी भूमिका के महत्व को पहचानते हुए उसके सशक्तिकरण पर ज़ोर देते हैं:

आर्थिक क्षेत्र में महत्व के अलावा… [इसकी] महत्वपूर्ण राजनीतिक अहमियत भी है। हम जो कदम उठाने जा रहे हैं, उससे हम अपनी निर्भरता, अपनी आर्थिक निर्भरता तोड़ सकेंगे। इसका मतलब होगा राजनीतिक स्वतंत्रता। हम अपने भविष्य के स्वामी स्वयं होंगे, अपने भाग्य के सच्चे संप्रभु स्वामी। हमारे ताँबे का हम क्या करेंगे यह हम पर, हमारी क्षमता पर, हमारे प्रयास पर और हमारे देश की प्रगति हेतु चिली में ताँबा उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए हमारे दृढ़ समर्पण पर निर्भर करेगा। लोगों को समझना होगा और वे समझते हैं कि यह एक बड़ी राष्ट्रीय चुनौती है, और इस पर खदान श्रमिकों को ही नहीं बल्कि चिली की पूरी जनता को ध्यान देना होगा2

अलेंदे इस प्रक्रिया को तीसरी दुनिया के परियोजना में मौजूद अंतर्राष्ट्रीयतावाद के नए रूपों से भी जोड़ते हैं:

वियतनाम युद्ध के कारण ताँबे की कीमत निर्विवाद रूप से ऊंची बनी हुई है। लेकिन हम चिलीवासी, अपनी चेतना से, ताँबे की कीमत में गिरावट पसंद करेंगे, और यह चाहेंगे कि अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ रही उस छोटे देश की संकल्पित जनता के खिलाफ यह हमला समाप्त हो। हमारे पास यह समझने के लिए पर्याप्त क्रांतिकारी चेतना है कि ताँबे की कीमत कम हो सकती है, और हम यह स्वीकार कर सकते हैं, बशर्ते वियतनाम में शांति बहाल हो और वियतनाम के लोगों को अपना जीवन जीने का अधिकार मिले। …

दूर बैठी [बाहरी] ताक़तों के योजनाबद्ध विकास और शोषण द्वारा हम पर थोपे गए विदेशी क़ब्ज़े की सीमाओं के कारण हम अपने लोगों की क्षमताओं को विकसित नहीं कर पाए। हमें यह भी समझना चाहिए कि यह [कदम] हमारी क्षमता के लिए चुनौतीपूर्ण होगा… [लेकिन] चिली के लोग अच्छा काम करेंगे, और सौभाग्य से हमारे पास विश्व बाजार में ज़ाम्बिया, कांगो, पेरू, और तांबा निर्यातक देशों की अंतर सरकारी परिषद (CIPEC), जिसे हमारे जैसे छोटे उत्पादक देशों के हितों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गठित किया गया था, [आदि] में हमारे हमवतन लोगों के साथ साझा करने को आम भाषा भी है3

चिली और NIEO के संबंध में, 1972 में सैंटियागो डे चिली में आयोजित व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) के तीसरे सत्र में अलेंदे का बयान विशेष तौर पर अहम है। इस सम्मेलन में, राष्ट्रपति अलेंदे ने एक क्रांतिकारी परिप्रेक्ष्य से अपनी सरकार की स्थिति और उसकी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध नीति के उद्देश्यों को रेखांकित किया, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। अलेंदे ने कहा कि इस क्रांतिकरी परिप्रेक्ष्य का उद्देश्य है रूढ़िवादी और मौलिक रूप से अन्यायपूर्ण आर्थिक एवं व्यापार व्यवस्था को हटा कर मानव और मानवीय गरिमा की नई अवधारणा पर आधारित एक न्यायपूर्ण व्यवस्था को स्थापित करना तथा अल्पविकसित देशों की प्रगति को बाधित कर समृद्ध देशों को लाभ पहुँचाने वाले अंतरराष्ट्रीय श्रम विभाजन का पुनर्निर्माण करना’4। इसका मतलब यह है कि अलेंदे ने जो कार्यक्रम संबंधी, राजनीतिक और वैचारिक मुद्दे उठाए वे साम्राज्यवाद के परिणामों से पीड़ित देशों/समाजों में आज भी प्रासंगिक हैं।

साल्वाडोर अलेंदे की अध्यक्षता में चली पॉपुलर यूनिटी परियोजना, एक व्यापक, मुक्तिकामी, तीसरी दुनियावादी परियोजना थी जिसने लोकतांत्रिक व संप्रभु आर्थिक पथ के ज़रिए एक समाजवादी समाज का निर्माण किया था। साम्राज्यवादियों को यह क़तई स्वीकार्य नहीं था।


ग्रेसिया बैरियोस (चिली), बहुलता III, 1972। पैचवर्क, 305 x 782 सेमी।

11 सितंबर 1973 को, जनरल ऑगस्टो पिनोशे के नेतृत्व में चिली की सेना का प्रतिक्रियावादी वर्ग बैरकों से निकलकर राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे व लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित पॉपुलर यूनिटी गठबंधन सरकार के तख़्तापलट के लिए निकल पड़ा। राष्ट्रपति निवास ला मोनेडा पर हुए हमले में अलेंदे की मौत हो गई। सेना और अन्य सुरक्षा बलों ने समाज के संगठित वर्गों पर हमला शुरू कर दिया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ हुईं और दमन का राज स्थापित किया गया। यातनाएँ देने और हत्याएँ करने के लिए ख़ास अड्डे बनाए गए। हत्या से बच निकले चिली के वामपंथियों के एक बड़े हिस्से ने अन्य देशों में पनाह ली, जहां उन्होंने नए सिरे से संगठित होकर तानाशाही के खिलाफ संघर्ष शुरू किया। इधर अपने नेताओं को खो चुके चिली के श्रमिक आंदोलनों को तख़्तापलट के नवनियुक्त नवउदारवादी प्रशासन के आगे झुकना पड़ा। पिनोशे ने खुद को राष्ट्र का सर्वोच्च अध्यक्षकरार दिया। पिनोशे प्रशासन के कई सदस्यों को संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रशिक्षण मिला था, जिनमें से कई लोग शिकागो विश्वविद्यालय में मिल्टन फ्रीडमैन के साथ काम कर चुके थे और शिकागो बॉयज़के नाम से जाने जाते थे। पॉपुलर यूनिटी सरकार के समाजवादी कार्यक्रमों और नीतियों को भंग कर दिया गया। चिली नवउदारवाद की प्रयोगशाला बन गया और अवसान की ओर बढ़ने लगा।

11 सितंबर की सुबह सिपाही बैरक से क्यों निकले थे? कानून और व्यवस्था के बारे में जनरल पिनोशे या उनके करीबी लोगों द्वारा दिए गए तर्क बेतुके हैं। सच्चाई यह है कि तख़्तापलट 1973 के उस दिन अचानक ही नहीं हुआ था; अवर्गीकृत दस्तावेज दिखाते हैं कि इसकी परिकल्पना, तैयारी और कार्यान्वयन अमेरिका ने किया था। अमेरिका स्थित बहुराष्ट्रीय निगमों और उन पर आश्रित चिली के पूंजीपतियों के हक़ में काम कर रही अमेरिकी सरकार अलेंदे को राष्ट्रपति पद पर जीतने ही नहीं देना चाहती थी। लेकिन अलेंदे 4 सितंबर 1970 को चुनाव जीत गए। इसीलिए नवंबर 1970 में उनके द्वारा कार्यभार संभालने के पहले दिन से ही पॉपुलर यूनिटी सरकार को अस्थिर बनाने की कोशिशें शुरू हो गई थीं।

अलेंदे सरकार ने ताँबे के राष्ट्रीयकरण की नीति लागू की, जिसके बाद तख़्तापलट की कोशिशें बढ़ गईं। ताँबे के राष्ट्रीयकरण की नीति, जिसे जुलाई 1971 में कांग्रेस में मंज़ूरी मिल गई थी लोकतांत्रिक तर्ज पर नवउपनिवेशवादी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली का लोकतांत्रिक तर्ज पर पुनर्गठन करने और तीसरी दुनिया के विचारों व लोगों को महत्व देने के मक़सद से तीसरी दुनिया में नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) बनाने हेतु जारी व्यापक कोशिशों का हिस्सा थी। NIEO का पहला मसौदा अर्जेंटीना के अर्थशास्त्री राउल प्रीबिश के नेतृत्व में व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) द्वारा तैयार किया गया था, तथा अप्रैल से मई 1972 तक सैंटियागो, चिली में चले UNCTAD के तीसरे सत्र (UNCTAD III) में उसका संशोधन हुआ। नए मसौदे पर 5 और 9 सितंबर 1973 के बीच अल्जीयर्स (अल्जीरिया) में आयोजित गुटनिरपेक्ष आंदोलन के चौथे शिखर सम्मेलन में चर्चा की गई। सम्मेलन में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अन्य नेताओं को सूचित किया कि अलेंदे अपने देश में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं और कहा कि हम शीघ्र ही सामान्य स्थिति बहाल होने की उम्मीद करते हैं1 मई 1974 को जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नई अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना की घोषणा की, तब तक उस नई व्यवस्था के विचारों को आगे बढ़ाना संभव ही नहीं रहा था। अलेंदे की सरकार के खिलाफ तख़्तापलट केवल चिली में ताँबे के राष्ट्रीयकरण की नीति अपनाने के लिए नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए भी हुआ था क्योंकि अलेंदे ने NIEO सिद्धांतों को लागू करने की मांग कर रहे अन्य विकासशील देशों को नेतृत्व और एक उदाहरण पेश किया था। यानी, चिली के खिलाफ अमेरिका द्वारा संचालित तख़्तापलट वास्तव में तीसरी दुनिया के खिलाफ तख़्तापलट था।

 

 

गुइलेर्मो नुनेज़ (चिली), स्वैच्छिक कार्य को श्रद्धांजलि, 1972। सिल्कस्क्रीन प्रिंट, 53.2 x 75 सेमी।

 

चिली में संप्रभुता और गरिमा

17 दिसंबर 1969 को, साल्वाडोर अलेंदे के नेतृत्व में छ: पार्टियों – सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, रेडिकल पार्टी, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी, पॉपुलर यूनिटरी एक्शन मूवमेंट और इंडिपेंडेंट पॉपुलर एक्शन – से बने पॉपुलर यूनिटी गठबंधन ने अपना घोषणापत्र जारी किया। इस घोषणा पत्र में प्रस्तावित कार्यक्रम के आधार पर गठबंधन की पार्टियों ने 4 सितंबर 1970 को होने वाले राष्ट्रपति चुनावों के लिए संयुक्त अभियान चलाया। उनके घोषणापत्र ने समस्या को सटीक और सीधे शब्दों में पेश किया:

सफेदपोश श्रमिकों, पेशेवरों और छोटे व मध्यम व्यापारियों के सामने बढ़ती कठिनाइयों; और महिलाओं व युवाओं के लिए उपलब्ध सीमित अवसरों के चलते चिली गहरे संकट की स्थिति में है, जो आर्थिक और सामाजिक ठहराव, व्यापक गरीबी और श्रमिकों, किसानों व अन्य शोषित वर्गों के मोर्चों की पूर्ण उपेक्षा के रूप में प्रकट हो रही है5

यह बात अफ़्रीका, एशिया या लैटिन अमेरिका के अन्य देशों के लोगों को अजीब नहीं लगेगी। 1960 के दशक के मध्य से औसत वार्षिक आर्थिक विकास में लगातार गिरावट की निराशा UNCTAD III सम्मेलन में भी दिखाई दे रही थी।6 सम्मेलन में भाग लेने वाली 121 सरकारों ने लिखा था कि, ‘गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी और अल्परोजगार की भयावह समस्याओं से दुनिया के लाखों लोग प्रभावित हैं यह निराशाजनक है, लेकिन एक चुनौती भी थी; ज़रूरतों के अनुसार कारवाई होनी चाहिए – तत्काल और ठोस कारवाई। ये आह्वान चिली के पॉपुलर यूनिटी गठबंधन के चुनावी घोषणापत्र से मेल खाता है, और इसे जारी करने वाले देश नवउपनिवेशवादी विश्व व्यवस्था द्वारा उत्पन्न सीमाओं को बखूबी पहचानते थे। इसीलिए UNCTAD III में शामिल सरकारों ने आगे लिखा कि यह नहीं भूलना चाहिए कि मौजूदा स्थिति कुछ शक्तियों द्वारा अपने हित में काम करने के कारण पैदा हुई है वो शक्ति जो अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को आज भी नियंत्रित करती है और नए देशों के विकास में बाधा डालती है।7

पॉपुलर यूनिटी के घोषणापत्र में यह समझाने की कोशिश की गई थी कि चिली की जनता को – ताँबे जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश में भी – अपना अस्त्तिव कायम रखने के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा था:

चिली की विफलता का कारण एक ऐसी प्रणाली है जो हमारे समय की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। चिली एक पूंजीवादी देश है, जो साम्राज्यवाद पर निर्भर है, और जिसपर संरचनात्मक रूप से विदेशी पूंजी से बंधे पूंजीपति वर्ग का प्रभुत्व है। ये सभी देश की मूलभूत समस्याओं को हल करने में असमर्थ हैं, क्योंकि ये समस्याएँ उनके वर्ग विशेषाधिकारों से उत्पन्न होती हैं, जिन्हें वे स्वेच्छा से कभी नहीं छोड़ेंगे।8

अलेंदे की पॉपुलर यूनिटी सरकार का ध्यान ताँबे पर था, जो कि आधुनिक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अलौह वाणिज्यिक धातुओं में से एक है। उस समय दुनिया के ज्ञात ताँबा भंडारों का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा चिली में था, जिसके अलावा संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, जाम्बिया, ज़ैरे और कनाडा में भी ताँबे के पर्याप्त भंडार थे।9 अमेरिका दुनिया में ताँबे का सबसे बड़ा आयातक था, और औद्योगिक उपयोग के लिए ताँबे का प्रसंस्करण करता था। चिली में कुल ताँबा उत्पादन के अस्सी प्रतिशत हिस्से पर तीन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एनाकोंडा, केनेकॉट और सेरो) से मिलकर बनी ग्रैन मिनेरिया निगम का क़ब्ज़ा था।10

1960 के दशक में ताँबे की ऊंची कीमतों और ग्रैन मिनेरिया के भारी मुनाफे से चिली में ताँबे के शीघ्र राष्ट्रीयकरण का दबाव बढ़ा। 1966 में, बढ़ते दबाव के चलते चिली के तत्कालीन राष्ट्रपति एडुआर्डो फ्रेई ने ताँबे के राष्ट्रीयकरण की नीति शुरू की। इस नीति के लागू होने से अमेरिकी कंपनियों का स्वामित्व धीरेधीरे कम होना था, लेकिन अचंभे की बात है कि 1965 और 1971 के बीच ग्रैन मिनेरिया के मुनाफे में अपार वृद्धि देखी गई।11 इधर जनआंदोलनों में देश के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग चिली की जनता के लिए करने की माँग लगातार तेज हो रही थी। यही कारण था कि 1970 के राष्ट्रपति चुनाव के दोनों उम्मीदवार पॉपुलर यूनिटी से अलेंदे और क्रिश्चियन डेमोक्रेट रेडोमिरो टोमिक राष्ट्रीयकरण का समर्थन कर रहे थे।12

दिसंबर 1970 में, पॉपुलर यूनिटी सरकार ने ग्रैन मिनेरिया के स्वामित्व वाली ताँबा खदानों का राष्ट्रीयकरण करने के लिए कांग्रेस के समक्ष एक संवैधानिक संशोधन रखा; इसके तहत ग्रैन मिनेरिया से खदानों का स्वामित्व लेने के बाद उसे किसी प्रकार का कोई मुआवजा नहीं दिया जाना था। मुआवज़ा न देने के हक़ में पॉपुलर यूनिटी सरकार ने – लैटिन अमेरिका के लिए संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक आयोग (CEPAL) के तर्क को पेश करते हुए – कहा कि ग्रैन मिनेरिया दशकों से देश से बाहर गए अतिरिक्त मुनाफे से लाभ कमाने के अलावा खदानों को काफी हद तक नष्ट कर चुका है।13 पॉपुलर यूनिटी सरकार द्वारा ग्रैन मिनेरिया को अतिरिक्त मुआवज़ा देने से इनकार करने पर अन्य राजनीतिक दल विचलित हो उठे, जो उसे खदानों के बदले मुआवज़ा देना चाहते थे।

21 दिसंबर को, अलेंदे ने प्लाजा डे ला कॉन्स्टिट्यूशन में बात रखते हुए, ‘कुछ आंकड़े14 सामने रखे। यह दिखाने के बाद कि कैसे चिली का खून चूसा गया है‘, अलेंदे ने स्पष्ट रूप से कहा कि, ‘[ताँबा] खदानों के लिए कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा। हम कानूनी और न्यायिक सीमाओं के भीतर कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा, यह इंगित करना प्रासंगिक है कि [14 दिसंबर 1962 के संयुक्त राष्ट्र महासभा संकल्प 1803 (XVII) ‘प्राकृतिक संसाधनों पर स्थायी संप्रभुतामें] संयुक्त राष्ट्र ने विदेशी पूंजी के हाथों में पड़ी महत्वपूर्ण संपदा का राष्ट्रीयकरण करने पर लोगों के अधिकार को मान्यता दी है15 11 जुलाई 1971 को, जिसे आज चिली में राष्ट्रीय गरिमा दिवस के रूप में मनाया जाता है, चिली की राष्ट्रीय कांग्रेस ने 17450वें क़ानून को मंज़ूरी देकर ताँबे के राष्ट्रीयकरण की पुष्टि की।

पॉपुलर यूनिटी सरकार ने ताँबे के निर्यात से बढ़े राजस्व का उपयोग चिली में जीवन स्तर को बेहतर बनाने के कार्यक्रमों में किया। स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और कृषि में सुधार शुरू हुए, श्रमिक वर्ग और किसानों के लिए घर बनाये गए, और बच्चों को प्रति दिन आधा लीटर मुफ्त दूध देने की परियोजना भी शुरू हुई। 1973 तक, इस योजना के माध्यम से 3.6 मिलियन बच्चों को दूध मिलने लगा था, जिससे बच्चों के कुपोषण की दर में भारी गिरावट आई थी; पॉपुलर यूनिटी सरकार के कार्यभार संभालने से पहले लगभग बीस प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे।16

13 जनवरी 1971 को, वलपरेसो स्थित चिली विश्वविद्यालय में एक नए ट्रेड यूनियन स्कूल के उद्घाटन पर अलेंदे ने घोषणा की कि उनका देश एक सामाजिक प्रयोगशालाहै और एक [ऐसी] अविराम व गंभीर क्रांतिकारी प्रक्रिया से गुजर रहा है.. जिसमें चिली के जीवन के सभी पहलुओं को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करने के गुण शामिल हैं17 अपनी अर्थव्यवस्था पर संप्रभुता स्थापित करने से चिली में समाजवाद का रास्ता खुला। भूमिहीन किसानों से लेकर नर्सों तक से, अलेंदे की सरकार ने एक नई वास्तविकता, एक समाजवादी भविष्य का वादा किया।

 

रॉबर्टो मैटा (चिली), नए मानव को जन्म देने के लिए आओ अपने भीतर गुरिल्ला युद्ध लड़ें, 1970। कैनवास पर तेल, 259 x 491 सेमी।

 

चिली और नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम

1961 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के गठन के बाद के लगभग दस सालों में पचास से ज़्यादा देश इससे जुड़ गए थे। 1971 में चिली NAM में पचपनवें पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हुआ। 1970 में लुसाका (ज़ाम्बिया) में हुए तीसरे NAM शिखर सम्मेलन तक, लैटिन अमेरिकी देशों में से केवल क्यूबा ही NAM का पूर्ण सदस्य था। चिली तीसरे शिखर सम्मेलन में शामिल हुए बारह पर्यवेक्षक देशों में से एक था। NAM और UNCTAD ने एक नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम के बारे में बहस शुरू की; जिसके तहत तीसरी दुनिया के देश अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने और अपनी औद्योगिक क्षमता बढ़ाने के मुद्दे पर एकजुट होकर नवउपनिवेशवादी विश्व प्रणाली को बदलने की माँग कर रहे थे। इस प्रक्रिया में राजनीतिक रूप से अपना दबाव बनाते हुए अफ़्रीकी और एशियाई देशों ने UNCTAD का तीसरा सत्र जिनेवा की बजाय किसी विकासशील देश में आयोजित करने की माँग की। अलेंदे ने सत्र की मेजबानी के लिए सैंटियागो का नाम सुझाया, जिसे कुछ विचारविमर्श के बाद स्वीकार कर लिया गया।18 सैंटियागो के जिस भवन में सत्र आयोजित होना था, उस भवन के उद्घाटन में अलेंदे ने कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय मंच विकासशील देशों को अपने अल्पविकसित देशों की बिगड़ी हालत को अचानक उजागर करनेका मौक़ा देगा।19

UNCTAD की नई इमारत लैटिन अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र आर्थिक आयोग (ECLAC) के कार्यालय से लगभग दस किलोमीटर दूर थी। ECLAC की स्थापना 1948 में हुई थी। ECLAC के लैटिन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों ने निर्भरता सिद्धांत विकसित किया था। इस सिद्धांत ने दुनिया की व्याख्या करते हुए कहा कि दुनिया में नवउपनिवेशवादी व्यवस्था चल रही है, जिसमें केंद्रीय देश (यानी पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियाँ) औपनिवेशिक युग में हुए लाभ के पुनरुत्पादन के माध्यम से परिधि देशों (यानी विकासशील देशों) पर आज भी हावी हैं; कि कच्चे माल के स्रोत और विनिर्मित माल के बाज़ार के रूप में परिधि देशों पर व्यापार की असमान शर्तें थोपी जाती हैं; और विकास सहायता परिधि देशों को उधार ग्रहण – क़र्ज़ – मितव्ययिता के व्यूह में फँसा कर रखती है।20 ECLAC के एक अर्थशास्त्री, पेड्रो वुस्कोविक, अलेंदे की सरकार में आर्थिक मामलों के मंत्री बने, और उन्होंने निर्भरता सिद्धांत को पॉपुलर यूनिटी सरकार के कार्यक्रम व सरकारी नीति का हिस्सा बनाया।21 कुछ समय के लिए, चिली नवउपनिवेशवादी विश्व व्यवस्था को तोड़ने और नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम को स्थापित करने की परियोजना का केंद्र बन गया था। ये वो अहम कारण हैं जिन्हें अमेरिकी सरकार और अंतरराष्ट्रीय निगम नागरिकसैन्य तख़्तापलट के कारणों के रूप में देखने से बचते हैं।

UNCTAD के तीसरे सत्र के उद्घाटन पर, अलेंदे ने कहा कि, ‘रूढ़िवादी और मौलिक रूप से अन्यायपूर्ण आर्थिक एवं व्यापार व्यवस्था को हटा कर मानव और मानवीय गरिमा की नई अवधारणा पर आधारित एक न्यायपूर्ण व्यवस्था को स्थापित करना तथा अल्पविकसित देशों की प्रगति को बाधित कर समृद्ध देशों को लाभ पहुँचाने वाले अंतरराष्ट्रीय श्रम विभाजन का पुन: निर्माण करनाइस सम्मेलन का मूल मिशन है।22 अलेंदे ने कहा कि, समृद्ध देश अथक दृढ़ताके साथ अपने हितों की रक्षा करेंगे, इसीलिए गरीब देशों को एकजुट और अपने उद्देश्यों के बारे में स्पष्ट होना होगा। उपस्थित लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि, जैसा कि अलेंदे ने आगे कहा, ‘यदि वर्तमान स्थिति जारी रही, तो तीसरी दुनिया की पंद्रह प्रतिशत आबादी भूख से मरने के लिए अभिशप्त है।23अलेंदे ने नवउपनिवेशवादी, पूंजीवादी विश्व व्यवस्था से मानवउन्नति पर आधारित विश्व व्यवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया के पांच प्रमुख बिंदुओं पर बात की:

1. मौद्रिक एवं व्यापार प्रणालियों में सुधार: संयुक्त राज्य अमेरिका में 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन हुआ, जहां अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की स्थापना की गई। इस सम्मेलन में तीसरी दुनिया के देशों का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य था। जब पश्चिमी देशों ने 1947 में व्यापार व टैरिफ़ पर सामान्य समझौता (GATT) बनाया, तो वहाँ भी कुछ उपनिवेशों को छोड़कर तीसरी दुनिया के देशों का कोई प्रतिनिधि नहीं था। इसलिए इन मौद्रिक एवं व्यापार प्रणालियों की संरचना इस प्रकार से हुई कि इनसे समृद्ध देशों को लाभ पहुंचे। तीसरी दुनिया ने इन प्रणालियों पर पुनर्विचार करने के लिए 1964 में UNCTAD का गठन किया। लेकिन इसकी स्थापना के बाद से ही पश्चिम ने UNCTAD को दरकीनार करने और उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए देशों को मौद्रिक एवं व्यापार नीति की चर्चाओं में अपनी नीतियाँ पेश करने से रोकने की कोशिशें शुरू कर दीं। 1971 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने एकतरफा रूप से स्वर्ण मानक प्रणाली को हटाकर डॉलर को वैश्विक फ़ीएट मुद्रा के रूप में स्थापित कर दिया। इसके अलावा GATT पर 1973 की टोक्यो वार्ता में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय आर्थिक समुदाय और जापान ने तीसरी दुनिया से सलाह किए बिना मौद्रिक एवं व्यापार प्रणाली पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया। इस परिदृश्य को देखते हुए, अलेंदे ने कहा था कि, UNCTAD को एक ऐसी व्यापार प्रणाली बनानी चाहिए जो जनता में खपत बढ़ाने, भुखमरी व निरक्षरता को खत्म करने और अंतरराष्ट्रीय निगमों की शक्ति को विनियमित करने को प्राथमिकता दे।

2. कर्ज का बोझ खत्म करें: UNCTAD के तीसरे सत्र के लगभग एक साल बाद नैरोबी (केन्या) में 1973 की विश्व बैंक बैठक हुई। विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष रॉबर्ट मैकनामारा ने कहा कि ऋण समस्या का कारणकर्ज की बड़ी रक़म नहीं, बल्कि राजस्व की तुलना में तेज़ी से बढ़ता ऋण और ऋण भुगतानहै।24 विकासशील देश निवेश के उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने ऋण चुकाने के लिए पूंजी ले रहे हैं।

UNCTAD III में, अलेंदे ने बताया था कि विकासशील देशों का कर्ज़ तब तक 70 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका था। उन्होंने कहा कि ये ऋण अक्सर अनुचित व्यापार प्रणाली से होने वाले नुकसान की भरपाई से बचने, हमारी सीमाओं के भीतर विदेशी उद्यमों की स्थापनालागत से बचने, [और] हमारे भंडारों पर सट्टाबाज़ारी के जोखिमों से बचने के लिए अनुबंधित किए गए हैं।25 1971 में प्रकाशित जी-77 लीमा घोषणा और संयुक्त राष्ट्र महासभा के ऋण सेवाओं का बढ़ता बोझप्रस्ताव जैसे प्रमुख दस्तावेजों में भी यह मुद्दा उठाया गया था, और संयुक्त राष्ट्र ने ऋणसंकट से लंबे समय तक बचे रहने के लिएलेनदारों से अपने कार्यों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया गया।26

3. प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण मजबूत करना: मई 1969 में विना डेल मार (चिली) में लैटिन अमेरिका की विभिन्न सरकारों ने अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस बैठक से निकला लेख लीमा घोषणा (1971) को तैयार करने में सहायक रहा, जिसे अलेंदे ने UNCTAD III के दौरान उद्धृत किया: ‘अपनी जनता के आर्थिक विकास व कल्याण हेतु अपने प्राकृतिक संसाधनों के स्वतंत्र इस्तेमाल पर प्रत्येक राष्ट्र के संप्रभु अधिकार की पुष्टिअंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।27 अलेंदे ने कहा कि, ‘चिली ने ताँबे का राष्ट्रीयकरण किया हैऔर इस राष्ट्रीयकरण के लिए ताँबा कंपनियों को अपने अतिरिक्त मुनाफेकी क़ीमत चुकानी पड़ी है। उन्होंने कहा कि, पॉपुलर यूनिटी सरकार केवल अमूर्त विचारों पर ज़ोर देने की बजाय विचारों को दृढ़ संकल्पके साथ व्यवहार में भी ला रही है।28

4. प्रौद्योगिकी व विज्ञान पर राष्ट्रों के अधिकार की पुष्टि करें: अलेंदे ने कहा कि तीसरी दुनिया के देश, ‘विज्ञान के विकास को बाहरी नज़र से देखते हैंऔर तकनीकी जानकारी का आयात करते हैं, जिससे अक्सर सांस्कृतिक अलगाव और निर्भरता बढ़ती है।चिली जैसे देशों को अपनी वैज्ञानिक व तकनीकी क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है, और उन्हें अपनी आवश्यकताओं तथा विकास योजनाओं के अनुरूपतकनीक बनाने के लिए अन्य देशों के साथ सहयोग करने की आवश्यकता है।29

5. शांति पर आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण करें: अलेंदे ने कहा कि समय युद्ध पर आधारित अर्थव्यवस्था को शांति पर आधारित अर्थव्यवस्था से बदलनेकी माँग कर रहा है। युद्ध और हथियारों पर व्यर्थ होने वाले धन का उपयोग वैश्विक स्तर पर एकजुटता की अर्थव्यवस्था को मजबूत करनेके लिए किया जाए।30 1970 में, स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने पाया था कि दुनिया अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग सात प्रतिशत हिस्सा सेना पर खर्च कर रही थी, जो कि दुनिया की आधी आबादी की कुल आय के बराबरथा।31 अलेंदे ने कहा कि, हथियारों के खर्च में कटौती कर ‘[तीसरी दुनिया के] देशों में प्रमुख परियोजनाओं और कार्यक्रमों को वित्तपोषित किया जा सकता है।32

अप्रैल 1972 में, अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर के लैटिन अमेरिकी मामलों के सहायक विलियम जोर्डन ने लिखा था कि अलेंदे तेज़ी से खुद को तीसरी दुनिया के नेता के रूप में स्थापित कर रहे हैं33 नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को लागू करते हुए समाजवादी पथ पर चल रहा चिली तेज़ी से अपने धातु भंडार का राष्ट्रीयकरण कर रहा था; जिसने अलेंदे को तीसरी दुनिया की एक स्पष्ट आवाज के रूप में उभरने का मौक़ा दिया। इसके परिणामस्वरूप, चिली के नेतृत्व में, और मेक्सिको सहित तीसरी दुनिया के अन्य देशों के लगातार कूटनीतिक कार्य की बदौलत UNCTAD III में राज्यों के आर्थिक अधिकारों एवं कर्तव्यों का चार्टरपारित हुआ। इस चार्टर को अंततः संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1974 के संकल्प के रूप में अपनाया।34

हालाँकि UNCTAD III के ज़्यादातर सरोकारों को स्वीकृति नहीं मिली थी, लेकिन फिर भी, तीसरी दुनिया में सामान्य दृष्टिकोण यही था कि परिवर्तन अनिवार्य है।35 (संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और जापान के) ट्रायड ने नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) को रोकने के लिए काफी प्रयास किए और फिर, 1973 में जी-7 का गठन किया। जी-7 की पहली बैठक में, पश्चिम जर्मनी के हेल्मुट श्मिट ने कहा कि पश्चिमी नेता अफ्रीका या किसी एशियाई राजधानी के अधिकारियोंको विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में निर्णय लेने की अनुमति नहीं दे सकते। यूनाइटेड किंगडम के प्रधान मंत्री हेरोल्ड विल्सन ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे निर्णय इस मेज पर बैठे लोगोंद्वारा लिए जाने चाहिए।36

 


ऊपर: लुइस पोयरोट (चिली), राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे और हॉर्टेंसिया बस्सी, 1970। फोटोग्राफ, 20 x 30 सेमी।

नीचे: लुइस पोयरोट (चिली), ला मोनेडा पैलेस की बालकनी, सितंबर 1973। फोटोग्राफ, 20 x 30 सेमी।

तख़्तापलट क्या करते हैं

5 अगस्त 1970 को, अलेंदे द्वारा राष्ट्रपति पद के चुनाव जीतने से एक महीने पहले ही, संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार अलेंदे के तख़्तापलट के लिए कारवाईकरने के बारे में सोच रही थी; अमेरिका के तत्कालीन सहायक विदेश सचिव जॉन क्रिमिंस ने अमेरिकी राजदूत एडवर्ड कोरी को उपरोक्त शब्द लिखे थे।37 आज से दो सौ साल पहले, 1823 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने मुनरो सिद्धांत प्रस्तुत किया था, जिसमें स्पष्ट रूप से अमेरिका ने गोलार्ध को अपना ‘बैकयार्ड (अहाता)’ कहते हुए यूरोप को अमेरिकाओं में हस्तक्षेप न करने की सलाह दी थी।38 लैटिन अमेरिका में अमेरिका के हस्तक्षेप आम बात हैं। चाहे वो 1848 में मेक्सिको के एक तिहाई हिस्से पर कब्ज़ा करना हो या 1898 में क्यूबा व प्यूर्टो रिको पर कब्ज़ा करना हो या कई लैटिन अमेरिकी देशों में सरकारों का तख़्तापलट हो। 1964 में, संयुक्त राज्य सरकार ने जोआओ गौलार्ट की लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को हटाने के लिए ब्राजीलियाई सेना की खुले तौर पर सहायता की। यह सैन्य तानाशाही इक्कीस सालों तक चली और इस दौरान दक्षिण अमेरिका के कई देशों में (बोलीविया, 1971; उरुग्वे, 1973; चिली, 1973; पेरू, 1975; अर्जेंटीना, 1976) तख़्तापलट करवाने में अमेरिका की मदद करती रही। इस दौर को ऑपरेशन कोंडोर के नाम से जाना जाता है।

1960 के दशक में क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स पर लाखों डॉलर खर्च करने के बावजूद, संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार अलेंदे को जीतने से नहीं रोक पाई। चुनाव के तेरह दिन बाद, अमेरिकी सरकार ने प्रोजेक्ट फ़्यूबेल्ट की स्थापना की; उद्देश्य था कि अलेंदे को सत्ता संभालने (यानी शपथ लेने) से रोका जाए और यदि अलेंदे शपथ लेने में कामयाब हो गए तो चिली में अस्थिरता फैलाकर उन्हें पद से हटा दिया जाए। सीआईए की चिली टास्क फोर्स ने सिचुएशन रिपोर्ट #2 में लिखा था कि, ‘अब तख़्तापलट की संभावना है।39

अमेरिका की सरकार ने अलेंदे को हटाने की हर संभव कोशिश की। एक सैन्य साजिश रची गई, जिसमें चिली की सेना के सर्वोच्च अधिकारी, जनरल रेने श्नाइडर की हत्या कर दी गई। अलेंदे से पहले राष्ट्रपति रहे फ्रेई पर चुनाव रद्द करने और सत्ता अपने हाथ में लेने का दबाव बनया गया। अमेरिकी राजदूत एडवर्ड कोरी ने दूतावास में व्यापारिक नेताओं को इकट्ठा कर उनसे कहा कि अलेंदे के शासन में नटबोल्ट तक चिली में नहीं पहुँचने दिए जाएँगे40 चिली के व्यापारिक नेता, एल मर्कुरियो जैसे समाचार पत्रों के मालिक और दक्षिणपंथी राजनेता हर सोमवार को लॉर्ड कोचरन स्ट्रीट (सैंटियागो) स्थित हर्नान क्यूबिलोस के कार्यालय में मिलते थे। तख़्तापलट के बाद 1978 से 1980 तक हर्नान क्यूबिलोस जनरल पिनोशे का विदेश मंत्री रहा। अमेरिकी राजदूत, कोरी और उनके बाद नथानिएल डेविस, इस सोमवार क्लब के सदस्यों के क़रीब रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के 15 सितंबर 1970 को चिली की अर्थव्यवस्था को घुटने पर ला देनेका निर्देश दिया41, जिसे पूरा करने में कोरी ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

अमेरिकी सरकार ने वाणिज्य के माध्यम से चिली की डॉलर तक पहुंच रोक दी। सहायता राशि भी बंद कर दी गई। शिपिंग कंपनियों को माल ढुलाई के लिए ज़्यादा रेट माँगने को मजबूर किया गया। राष्ट्रीयकरण में ज़ब्त की गई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को विदेशों में चिली की संपत्ति पर कब्जा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। 1971 में ताँबे की कीमतें गिरने पर भी अलेंदे की सरकार पर हमले बंद नहीं हुए।

अलेंदे की सरकार इन तमाम आर्थिक हमलों के बावजूद टिकी रही। उनकी राजनीतिक मज़बूती का एक उदाहरण है मार्च 1973 के संसदीय चुनाव, जिसमें पॉपुलर यूनिटी गठबंधन को 43.39 प्रतिशत वोट की अप्रत्याशित जीत हासिल हुई थी, जिसकी न तो खुद पार्टी और न ही अमेरिकी सरकार ने उम्मीद की थी। अमेरिकी राजदूत नथानिएल डेविस ने वाशिंगटन को बताया था कि, पॉपुलर यूनिटी सरकार की नीतियों ने जनता की परिस्थितियों को भौतिक रूप से बेहतरबनाया है और बढ़ती गरिमा व ऊँचे वर्गों को अपने बराबर आते देखने की संतुष्टिपाने के लिए लोग निस्संदेह कुछ आर्थिक कीमत चुकाने को भी तैयारहैं।42 एक महीने बाद, फ़्रेई और सीआईए की अन्य पूंजीवादसमर्थक राजनीतिक ताकतें, ‘इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि तथाकथित तीसरी दुनिया में परंपरावादी पूंजीवादी व्यवस्था विकास लक्ष्यों और आकांक्षाओं को साकार करने में सक्षम नहीं है। फ्रेई उस सापेक्ष सफलता और तेजी से भी प्रभावित हुए जिससे अलेंदे नेआर्थिक शक्ति के पूर्ववर्तीगढ़ों को ध्वस्त कर दिया है। फ्रेई मानते हैं कि यूपी [पॉपुलर यूनिटी] ने जो कुछ किया है, उसे वो पलट नहीं सकते।43 यानी, चिली की पुरानी दक्षिणपंथी पार्टियों ने हार मान ली थी। इसलिए चिली की समाजवादी प्रक्रिया ‘ला विया चिलीना’ और तीसरी दुनिया की परियोजना को कुचलने के लिए नई – ज़्यादा क्रूर ताकतों की ज़रूरत थी। जनरल ऑगस्टो पिनोशे के नेतृत्व में नई ताक़तें एकत्र हुईं और 11 सितंबर को पॉपुलर यूनिटी सरकार के तख़्तापलट के लिए निकल पड़ीं। इसके दो साल बाद, अमेरिकी कांग्रेस की चर्च समिति रिपोर्ट ने तख़्तापलट में संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका के कच्चे चिट्ठे सबके सामने खोल दिए (हालांकि इस रिपोर्ट पर दुनिया में कभी सही तरीक़े से चर्चा नहीं हुई)44


ज़िमेना अरमास (चिली), तख़्तापलट, 1973। कागज पर कोलाज, 60 x 40 सेमी।

चिली में तख़्तापलट से पहले – इंडोनेशिया में राष्ट्रपति सुकर्णो की वामपंथी सरकार के 1965 तख़्तापलट के बाद जनरल सुहार्तो की तानाशाही में दस लाख से ज़्यादा कम्युनिस्टों, ट्रेड यूनियन नेताओं, किसान नेताओं, कलाकारों और वामपंथी समर्थकों की हत्या की याद दिलाकर जनता को डराने के लिए – दक्षिणपंथी समूहों ने पूरे सैंटियागो की दीवारों पर जकार्ता याद रखनालिख दिया।45 सैंटियागो की दीवारों पर लिखे ये शब्द उस हिंसा का पूर्वाभास थे जो चिली में पिनोशे के तख़्तापलट शासन में दोहराई गई।46 लाखों लोगों की हत्या कर दी गई, हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया गया और सैंकड़ों को निर्वासित कर दिया गया। सीआईए के साथ मिलकर, चिली से वामपंथियों का सफाया करने और संप्रभुता व आत्मनिर्णय स्थापित करने की कोशिश कर रही तीसरी दुनिया की परियोजना को सबक सिखाने के लिए, क्रूर दमन का लम्बा सिलसिला चला। तख़्तापलट शासन की हिंसा ने आने वाले दशकों में चिली के राजकीय संस्थानों को आकार दिया। इसके तहत सुरक्षा बल, काराबिनेरोस, को बेहिचक दमन करने का प्रोत्साहन मिला। पाब्लो नेरुदा और विक्टर जारा जैसे विश्वविख्यात कलाकारों की नृशंस हत्या पिनोशे के तख़्तापलट शासन की वामपंथियों के प्रति गहरी नफरत और हिंसा पर अंतरराष्ट्रीय निंदा की ओर असंवेदनशीलता को दर्शाती है। पिनोशे का 1980 का संविधान, 1990 में लोकतंत्र की वापसी के बाद से उसे लगातार बदलने के प्रयासों के बावजूद यथावत बना हुआ है। इस संविधान के तहत नागरिक अधिकारों को निलंबित करने के लिए कार्यपालिकाके पास आज भी आपातकालीन शक्तियां मौजूद हैं (जिसका प्रयोग 2011-2013 और 2019 के विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ घातक रूप से किया गया)

1969 में, चिली के अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने एल लैड्रिलो रिपोर्ट लिखी47, जिसकी प्रस्तावना शिकागो विश्वविद्यालय में प्रशिक्षित सर्जियो डी कास्त्रो – जो बाद में पिनोशे के अर्थव्यवस्था मंत्री बने – ने लिखी थी। डी कास्त्रो और कार्लोस मसाद (जो 1967 से 1970 तक और 1996 से 2003 तक केंद्रीय बैंक के गवर्नर रहे थे), फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर फाउंडेशन द्वारा स्थापित एक कार्यक्रम में शिरकत करने शिकागो गए थे।48 डी कास्त्रो, मसाद और बाकी शिकागो बॉयज़ ने शॉक (झटका) थेरेपीका एजेंडा चलाया; जिसमें सरकारी खर्च में भारी कटौती, आयात का उदारीकरण और बड़े व्यापारिक समूहों को लाभ प्रदान करने के लिए सरकारी संस्थाओं का उपयोग जैसे उपाय शामिल थे। इन व्यापार समूहों में अंतरराष्ट्रीय निगम और व्यापारिक घराने शामिल थे, जिनके मालिक पिनोशे के करीबी लोग थे, जैसे कि ‘Piranhas’ के नाम से मशहूर बैंको हिपोटेकारियो ई दे फोमेंटो दे चिली और क्रुज़ैटलारेन साम्राज्य। 1978 तक, चिली के 250 प्रमुख निगमों में से 37 का नियंत्रण क्रुज़ैटलैरेन के हाथों में था, और वाइल 25 को नियंत्रित करता था। जोस पिनेरा, शिकागो बॉयज़ में से एक था और 2010-2013 2018-2022 में राष्ट्रपति रहे सेबेस्टियन पिनेरा का बड़ा भाई था। श्रम मंत्रालय के प्रमुख के रूप में जोस पिनेरा ने श्रम कानूनों को नष्ट करने और ट्रेड यूनियनों को ध्वस्त करने का काम किया। शिकागो बॉयज़ ने चिली को अपने नवउदारवादी धर्म के लिए एक प्रयोगशाला के रूप में इस्तेमाल किया, और नवउदारवाद के दो पुजारियों को पिनोशे से मिलने के लिए चिली में आमंत्रित किया। 1975 में मिल्टन फ्रीडमैन को बुलाया गया, जिसके साथ ब्राजील के तख़्तापलट शासन के अर्थशास्त्री कार्लोस लैंगोनी भी चिली आ और फिर 1977 में फ्रेडरिक हायेक को बुलाया गया।49 पिनोशे की नीतियों से अमीरों के मुनाफ़े कई गुना बढ़े, लेकिन अधिकांश आबादी गरीब होती गई।

तख़्तापलट शासन के क्रूर दमन के बावजूद, पॉपुलर यूनिटी सरकार को जन्म देने वाली सोच ने अपना रंग दिखाया और लोगों ने पुन:संगठित होकर प्रतिरोध की लंबी प्रक्रिया शुरू की और अंततः तख़्तापलट को हरा दिया। कम्युनिस्ट पार्टी (जिसकी चार पीढ़ियों को मार डाला गया था), फ़्रेन्टे पैट्रियोटिको मैनुअल रोड्रिग्ज, मोविमेंटो डी एस्क्वेरडा रेवोलुसियोनारिया (एमआईआर), और अन्य वामपंथी समूहों ने एक तरफ़ बहादुरी से अपने काडरों को संगठित कर एक्शन लेने शुरू किए, और दूसरी तरफ़ हताश व आतंकित जनता में राहत की प्रक्रिया शुरू की। लंबे समय से चिली के वामपंथ की रीढ़ रहे, लेकिन तख़्तापलट शासन में नेस्तनाबूत हो चुके ट्रेड यूनियन आंदोलन को सैंटियागो के गुडइयर कारखाने के मज़दूर, ऑस्कर पीनो, जैसे नए नेताओं से हौंसला मिला। इन प्रगतियों से भयभीत शासन ने कई नेताओं की हत्या कर दी। 1982 में 500,000 श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले मज़दूर संगठनों के संघ – ग्रुप ऑफ टेन – के संस्थापक तुकापेल जिमेनेज की हत्या कर दी गई थी। इसके बावजूद पुराने संगठनात्मक ढाँचे, जैसे कि 1930 के दशक में स्थापित सेंट्रोस डी मैड्रेस (‘माँओं का संघ‘), बेरोजगार श्रमिक केंद्रों, सामुदायिक रसोई, और बच्चों की कैंटीन के माध्यम से श्रमिक वर्ग को राहत प्रदान करने लगे। राहत और प्रतिरोध साथसाथ चले, बहादुर लोग अपने ऊपर थोपे गए तख़्तापलट शासन के खिलाफ मजबूती से खड़े हो गए। तख़्तापलट के एक दशक बाद, लोग अपने राजनीतिक दलों के झंडे हाथ में लेकर, 1980 के संविधान और तख़्तापलट शासन के विरोध में सड़कों पर लौट आए। 1983 में ताँबा खनिकों की सफल हड़ताल से प्रेरित होकर ट्रेड यूनियन के पुन:स्थापित हो रहे आंदोलन के नेतृत्व में 11 मई 1983 को विरोध का पहला राष्ट्रीय दिवस मनाया गया।

दुनिया भर में चिली के श्रमिकों के साथ एकजुटता में अनगिनत गतिविधियाँ आयोजित हुईं। विभिन्न यूनियनों और संगठनों ने एकजुटता आंदोलन में भाग लिया। इससे पहले एकजुटता का ऐसा नज़ारा शांति के हक़ में और वियतनाम में अमेरिकी युद्ध के खिलाफ हुए आंदोलन में ही देखने को मिला था। गुटनिरपेक्ष देशों की सरकारों और जनआंदोलनों ने चिली व दुनिया के लोकतंत्रसमर्थकों के साथ सहानुभूति व सहयोग क़ायम रखा। तीसरी दुनिया में ही नहीं बल्कि पूरे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चले एकजुटता आंदोलन ने पिनोशे को उसकी जगह दिखा दी।

तख़्तापलट की कोशिशों में लगे साम्राज्यवादी गुट का नारा था जकार्ता को याद रखना। लेकिन देशों की संप्रभुता और लोगों की गरिमा के लिए प्रयासरत हर परियोजना का नारा होना चाहिए चिली को याद रखना


 

एलेजांद्रो मोनोगोंज़ालेज़ (रमोना पारा ब्रिगेड, चिली), चौड़े गलियारों की नज़र, 2005। म्यूरल, 150 x 384.5 सेमी।

 

 

 

 

 

Notes

1 Salvador Allende, ‘Discurso con motivo de la nacionalización del cobre’ [ताँबे का राष्ट्रीयकरण करते हुए अलेंदे का भाषण], 11 July 1971, https://www.marxists.org/espanol/allende/1971/julio11.htm, हमारा अनुवाद।

2 Salvador Allende, ‘Discurso’, हमारा अनुवाद।

3 Salvador Allende, ‘Discurso​​’ हमारा अनुवाद।

4 Salvador Allende, Discurso del doctor Salvador Allende G. Presidente de Chile, inaugurando la Tercera Conferencia Mundial de Comercio y Desarrollo [व्यापार एवं विकास पर तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन में डॉ साल्वाडोर अलेंदे द्वारा दिया गया भाषण] (Santiago: UNCTAD, 1972), 9, हमारा अनुवाद। https://www.archivochile.com/S_Allende_UP/doc_de_sallende/SAde0027.pdf; United Nations, Proceedings of the United Nations Conference on Trade and Development. Second Session, vol. 1 (New York: United Nations, 1968), https://unctad.org/system/files/official-document/td180vol1_en.pdf.

5 Popular Unity, Programa básico de gobierno de la Unidad Popular. Candidatura presidencial de Salvador Allende [पॉपुलर यूनिटी का घोषणापत्र: साल्वाडोर अलेंदे की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी] (Santiago: Instituto Geográfico Militar, 1970), 3, हमारा अनुवाद।

6 United Nations, Proceedings of the United Nations Conference on Trade and Development [व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की कार्यवाही] Second Session, vol.1 (New York: United Nations, 1968) 7.

7 United Nations, Proceedings, 77, 73.

8 Popular Unity, Programa básico [घोषणापत्र], 4, हमारा अनुवाद।

9 C. J. Tesar and Sheila C. Tesar, ‘Recent Chilean Copper Policy’, Geography 58, no. 1 (January 1973): 9.

10 1970 में, केवल छह बहुराष्ट्रीय निगमों के पास दुनिया के साठ प्रतिशत तांबे के उत्पादन का स्वामित्व था, जिनमें इन तीन अमेरिकी कंपनियों, दो ब्रिटिश कंपनियाँ (ब्रिटिश इंसुलेटेड कॉलेंडर केबल्स और आईएमआई रिफाइनर्स), और एक बेल्जियम की कंपनी (मेटालर्जी होबोकेनओवरपेल्ट) शामिल थीं। देखें C. J. Tesar and Sheila C. Tesar, ‘Recent Chilean Copper Policy’, Geography 58, no. 1 (January 1973): 9.

11 Dale Johnson, ed., The Chilean Road to Socialism (Garden City: Anchor Press, 1973), 28.

12 Andrés Zauschquevich and Alexander Sutulov, El cobre chileno (Santiago: Corporacion del Cobre, 1975), 42–48; Norman Girvan, Copper in Chile (Mona: University of the West Indies, Institute of Social and Economic Research, 1972).

13 Comisión Económica Para America Latina (CEPAL), Estudio económico de america latina 1971 [लैटिन अमेरिका का आर्थिक सर्वेक्षण 1971] (New York: United Nations, 1972), 118.

14 Salvador Allende, ‘Nacionalizacion del cobre’ [ताँबे का राष्ट्रीयकरण], In La vía chilena hacia el socialismo (Santiago: Editorial Fundamentos, 1971), 71, हमारा अनुवाद।

15 Allende, ‘Nacionalizacion del cobre’, 74 and 76–77, हमारा अनुवाद।

16 Mario Amorós Quiles, Compañero Presidente: Salvador Allende, una vida por la democracia y el socialismo [कॉमरेड राष्ट्रपति: साल्वाडोर अलेंदे, लोकतंत्र और समाजवाद को समर्पित जीवन] (València: València University, 2008), 160–161; Fernando Mönckeberg Barros, ‘Prevención de la desnutrición en Chile. Experiencia vivida por un actor y espectador’ [चिली में कुपोषण की रोकथाम: एक अभिनेता और दर्शक का अनुभव], Revista Chilena de Nutrición 30, no. 1 (2003)’

17 Allende, ‘Participacion y movilizacion’ [भागीदारी और लामबंदी], In La via chilena hacia el socialismo, 99–100, हमारा अनुवाद।.

18 Tanya Harmer, Allende’s Chile and the Inter-American Cold War (Chapel Hill: University of North Carolina Press, 2011), 82–83.​

19 ‘Series S-0858: Commissions, Committees, and Conferences’, व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (विविध) के महासचिव यू. थांट की फ़ाइलें, 1961-1971, संयुक्त राष्ट्र अभिलेखागार, 23। इस सम्मेलन के भवन का निर्माण रिकॉर्ड समय में किया गया था, वॉलंटीयरों ने आगे बढ़ कर मजदूरों की मदद की थी। तख़्तापलट के बाद, चूंकि ला मोनेडा भवन क्षतिग्रस्त हो गया था, इसलिए इमारत का इस्तेमाल सैन्य जुंटा के मुख्यालय के रूप में किया गया था। भवन का एक हिस्से में अब सेंट्रो कल्चरल गैब्रिएला मिस्ट्रल चलता है।

20 Tricontinental: Institute for Social Research, ‘Dependency and Super-exploitation: The Relationship Between Foreign Capital and Social Struggles in Latin America’, dossier no. 67, August 2023; Margarita Fajardo, The World That Latin America Created: The United Nations Economic Commission for Latin America in the Development Era (Cambridge: Harvard University Press, 2022).

21 Pedro Vuskovic, ‘Algunas experiencias del desarrollo latinoamericano’ [लैटिन अमेरिका में विकास के कुछ अनुभव], In Dos polémicas sobre el Desarrollo de América Latina [लैटिन अमेरिका के विकास पर दो नज़रिए ] (Santiago: Editorial Universitaria, 1970) and ‘La política de transformación y el corto plazo’ [स्थानांतरण नीति और लघु काल], In El pensamiento económico del gobierno de Allende [अलेंदे सरकार की इकनॉमिक सोच], ed. Gonzalo Martner (Santiago: Editorial Universitaria, 1972).

22 United Nations, Proceedings, 16.

23 Salvador Allende, Discurso del doctor Salvador Allende G. Presidente de Chile, inaugurando la Tercera Conferencia Mundial de Comercio y Desarrollo [व्यापार एवं विकास पर तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन में डॉ साल्वाडोर अलेंदे द्वारा दिया गया भाषण] (Santiago: UNCTAD, 1972), 9, हमारा अनुवाद।

24 Robert S. McNamara, Address to the Board of Governors. Robert S. McNamara, President, World Bank Group (Nairobi, Kenya. Washington, DC: International Bank for Reconstruction and Development, 1973), 8.

25 United Nations, Proceedings, 354.

26 United Nations General Assembly, ‘The Increasing Burden of Debt Services’, A/RES/2807 (14 December 1971).​​

27 United Nations, Proceedings, 355.​​

28 United Nations, Proceedings, 351-55; Allende, Discurso, 23.

29 Salvador Allende, ‘El desarrollo del tercer mundo y las relaciones internacionales’ [तीसरी दुनिया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विकास], व्यापार एवं विकास पर थर्ड वर्ल्ड सम्मेलन में उद्घाटन भाषण (Santiago, 13 April 1972), हमारा अनुवाद।

30 United Nations, Proceedings, 357; Allende, Discurso, 28; Allende, ‘El desarrollo’, हमारा अनुवाद।

31 Stockholm International Peace Research Institute, SIPRI Yearbook of World Armaments and Disarmament 1969/70 (Stockholm: Almqvist & Wiksell, 1970), 3.

32 United Nations, Proceedings, 357.

33 Harmer, Allende’s Chile, 161.

34 1970 में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने ईरान के राजनीतिज्ञ मनौचेहर गंजी को विशेष प्रतिवेदक के रूप में नियुक्त किया। गंजी की रिपोर्ट – The Widening Gap: A Study of the Realisation of Economic, Social, and Cultural Rights (1973) – ने तीसरी दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक कमजोरियों पर जोर दिया और सुझाव दिया कि मानवाधिकारों की लड़ाई को एक नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम की स्थापना की लड़ाई से जुड़ा होना चाहिए।

35 अल्जीरिया के विदेश मंत्री, अब्देलअज़ीज़ बुउटफ्लिका ने 1972 में कहा था कि तीसरी दुनिया की आर्थिक मुक्ति का रास्ता… UNCTAD से होकर नहीं गुजरता‘; लेकिन उन्होंने अल्जीरिया में NAM के चौथे शिखर सम्मेलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जहां संयुक्त राष्ट्र महासभा में NIEO प्रस्ताव का आधार रखा गया था। Harmer, Allende’s Chile, 163

36 Vijay Prashad, The Poorer Nations: A Possible History of the Global South (Various publishers, 2013), 53, 54.

37 Peter Kornbluh, The Pinochet File. A Declassified Dossier on Atrocity and Accountability (New York: The New Press, 2013), 7.

38 हालाँकि, 1810 और 1814 के बीच, अमेरिकी सरकार ने स्पेनिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध में सहायता करने और अमेरिकी हितों की पैरवी के लिए जोएल रॉबर्ट्स पॉइन्सेट को अर्जेंटीना और चिली भेजा था।

39 The Pinochet File, 2.

40 The Pinochet File, 17.

41 The Pinochet File, 36.

42 Harmer, Allende’s Chile.

43 Harmer, Allende’s Chile, 205–206.

44 US Senate, Senate Select Committee to Study Governmental Operations with Respect to Intelligence Activities (Washington, 1976). बहुत सी जानकारी और CIA व निक्सन सरकार के दस्तावेज The Pinochet Files में मिल जाएगी. वॉशिंटन के हस्तक्षेपों के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए, देखें Vijay Prashad, Washington Bullets: A History of the CIA, Coups, and Assassinations (Various publishers, 2021).

45 Vincent Bevins, The Jakarta Method: Washington’s Anticommunist Crusade and the Mass Murder Program that Shaped Our World (New York: Public Affairs, 2020).

46 हालाँकि इन आँकड़ों पर विवाद बना हुआ है, लेकिन आधिकारिक आंकड़े Informe de la Comisión Nacional de Verdad y Reconciliación (सत्य व सलाह पर चिली के राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट) (Santiago: Comisión Nacional de Verdad y Reconciliación, 1991), जिसे Retting Commission भी कहा जाता है, और Informe de la Comisión Nacional Sobre Prisión Política y Tortura [राजनीतिक कारावास और यातना पर राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट] (Santiago: Comisión Nacional Sobre Politica y Tortura, 2004), जिसे Valech Commission भी कहा जाता है, में उपलब्ध हैं। The Pinochet Files, 220–225.

47 यह किताब 1992 में Centro de Estudios Públicos द्वारा प्रकाशित की गई थी; इस प्रकाशन घर की स्थापना 1980 में शिकागो बॉयज़ के काम का समन्वयन करने के उद्देश्य के साथ की गई थी।

48 Sebastian Edwards, The Chile Project: The Story of the Chicago Boys and the Downfall of Neoliberalism (Princeton: Princeton University Press, 2023); Javier Campos Gavilán, Antecedentes del neoliberalismo en Chile (1955–1975): El autoritarismo como camino a la libertad económica [चिली में नवउदारवाद की पृष्टभूमि (1955–1975): आर्थिक स्वतंत्रता के लिए अधिनायकवाद का रास्ता] (Santiago: Universidad de Chile, Facultad de Derecho, 2013).

49 फ्रीडमैन की यात्रा सर्वविदित है, लेकिन हायेक की यात्रा के बार में ज़्यादा लोग नहीं जानते। उस यात्रा के बारे में जानने के लिए देखें, Bruce Caldwell and Leonidas Montes, ‘Friedrich Hayek and his Visits to Chile’, Review of Austrian Economics 28, no. 3 (2015).

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दुनिया को एक नए समाजवादी विकास सिद्धांत की जरूरत है https://thetricontinental.org/hi/duniya_ko_ek_naye_samajwaadi_vikas_siddhant_ki_jaroorat_hai/ Tue, 04 Jul 2023 08:00:38 +0000 https://thetricontinental.org/?p=83657 डोजियर संख्या 66

1. संदर्भ हेतु प्रयुक्त परियोजनाएं: मिस्र में राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासेर के शासनकाल में 1960 और 1970 के दशक के दौरान नील नदी के ऊपर बना अस्वान उच्च बाँध, जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में सोवियन संघ की सहायता से 1959 में भारत के छत्तीसगढ़ में बना भिलाई स्टील कारखाना, और जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य में 1959 में बनकर तैयार हुई आइसेनहट्टेनस्टैड बहुमंज़िला आवासीय परियोजना।

 


इस डोसियर की कलाकृतियाँ तीसरी दुनिया के देशों और लोगों की विकास की आकांक्षाओं को श्रद्धा अर्पित करती हैं। 1950 के दशक से लेकर 1970 के दशक तक की हर एक परियोजना बाँध, रेल स्टील कारखाना, आवासीय खंड, सरकारी बिल्डिंग, या स्टेडियम सदियों की औपनिवेशिक लूट एवं अल्पविकास की विरासत की बुनियाद पर बने भविष्य की एक नई दृष्टि का प्रतिनिधित्व करती है। डोसियर के चित्रों का क्रम एक परियोजना की निर्माण प्रक्रिया पर आधारित है। यह क्रम स्केच, योजना एवं मॉडल बनाने से शुरू होकर निर्माण तथा अंत में उद्घाटन और जनता द्वारा उपयोग होने पर जाकर खत्म होता है। हर कोलॉज में हमने ऐतिहासिक तस्वीरों के ऊपर ग्रिडों को सजाया है। यह स्थापत्य कला के एक ऐसे कैनवास को निरुपित करता है जिसपर राष्ट्रीय मुक्ति की अधूरी परियोजनाओं के लिए नए निर्माणों की कल्पना की जा सकती है।


 

2. ब्राज़ील की विशाल राजधानी ब्रासीलिया का उद्घाटन इसके निर्माण के चार साल के बाद 1960 में राष्ट्रपति जुसेलिनो कुबित्सचेक के शासनकाल में हुआ था। इसे लैटिन अमेरिका की सबसे महत्वाकांक्षी महानगरीय परियोजनाओं में शुमार किया जाता है। नए सिरे से बनाए गए इस शहर के डिजाईन को शहरी नियोजक लुसियो कोस्टा द्वारा तैयार किया गया था, प्रमुख बिल्डिंगों को कम्युनिस्ट वास्तुशिल्पी ऑस्कर निमेयर ने डिजाईन किया था तथा शहर के मुख्य बगीचों की डिजाईन को भूदृश्य वास्तुशिल्पी रॉबर्टो बर्ल मार्क्स ने तैयार किया था।

 

नोट: पिछले साल, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान और डोंगशेंग ने वेन्हुआ ज़ोंगहेंग (文化纵横) के संपादकों के साथ बातचीत शुरू की। इस साझेदारी के परिणामस्वरुप एक अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका शुरू हुई। इस पत्रिका में चीनी संस्करण के चुनिंदा निबंधों का अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, और स्पेनिश अनुवाद प्रकाशित किया जाता है। यह पत्रिका अफ़्रीका, एशिया, और लैटिन अमेरिका को चीन के साथ संवादसूत्र में पिरोती है। इस डोजियर का एक पूर्व संस्करण, 重振社会主义发展理论的必要, चीनी भाषा में वेन्हुआ ज़ोंगहेंग के अप्रैल अंक में प्रकाशित हो चुका है।

हम बदहाली के साक्ष्यों से घिरे पड़े हैं। अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा इकट्ठा किए गए आँकड़े भयावह तथ्य उजागर करते हैं: कि अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पर्याप्त भोजन, आवास, उचित जानकारी और संस्कृति अभी भी दुनिया के अरबों लोगों की पहुँच से बाहर है। सरकारों और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों द्वारा हर साल एकत्रित किए जाने वाले इन आँकड़ों से किसी को असहमति नहीं है।

असहमतियाँ, भूख और बेहाली जैसे इन दुराग्रही तथ्यों के प्रति अपनाये जाने वाले रवैये में मौजूद हैं। लोकतांत्रिक समाजों से पहले और तंगहाली के युग में जन्मे पुरातन विचार आज भी फलफूल रहे हैं, जिनके अनुसार लोग भाग्य या अन्य धार्मिक प्रकोपों, अपने आलस या संसाधनों की कमी की वजह से बदहाली में जीते हैं। इस तरह के तर्क बेबुनियाद हैं। यह मान लेना कि भाग्य या कोई धार्मिक प्रकोप कामगार वर्ग के परिवारों को पीढ़ीदरपीढ़ी बदहाली में जकड़कर रखता है, अतार्किक है। यह कहना कि आधे से ज़्यादा दिन कड़ी मेहनत करने के बाद भी बमुश्किल गुजारा करने वाले मजदूर आलसी हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। सारे साक्ष्य इंगित करते हैं कि संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद दुनिया की ज्यादातर आबादी दयनीय हालातों में गुजरबसर करती है। उदाहरण के लिए, इस ग्रह की कुल जनसंख्या आठ बिलियन है, जबकि हम चौदह बिलियन लोगों का पेट भरने के लिए पर्याप्त भोजन पैदा करते हैं।1

बहरहाल, 2022 में दुनिया में कुपोषित लोगों की संख्या बढ़कर 828 मिलियन पहुँच गई। इसमें गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे 349 मिलियन लोग भी शामिल हैंगंभीर खाद्य असुरक्षा के आँकड़े रिकॉर्ड स्तर पर हैं।2 लोकतांत्रिक समाज के उद्भव से पूर्व उपजे भाग्यवाद और नवमाल्थसवाद जैसे ये विचार तथ्यों के बजाय भ्रांतियों पर आधारित हैं, लेकिन फिर भी बौद्धिक और राजनीतिक विमर्शों में इनकी बारंबार दुहाई दी जाती है।

उन्नीसवीं सदी में, कार्ल मार्क्स ने बदहाली के सवाल पर गहन मनन किया और पाया कि इन समस्याओं (भूख, बेघरता, निराशा) का मूल कारण आलस्य, अभिशाप या संसाधनों की कमी में नहीं, बल्कि पूंजीवाद की संरचना में निहित है। उत्पादन के साधनों का स्वामित्व लोगों को अपना जीवनयापन कर पाने में सक्षम बनाता है लेकिन हिंसा के बल पर दुनिया के ज्यादातर लोगों से उनके उत्पादन के साधनों का स्वामित्व छीन लिया गया। जीविकोपार्जन का साधन छिन जाने के पश्चात बेदखल हुए लोगों को उत्पादन के साधनों पर नया नियंत्रण स्थापित करने वालों (पूंजीपतियों) को अपनी क्षमता जिसे मार्क्स ने उनकी ‘श्रम शक्ति’ कहा बेचने पर मजबूर होना पड़ा। पूंजीपतियों ने काम की अवधि को लंबा करके और मशीनीकरण की सहायता से उत्पादकता बढ़ाकर मज़दूरों का शोषण करते हुए उनसे बेशी मूल्य हथियाया। इस तरह से पूंजीपति मज़दूरों से बेशी मूल्य चूसते रहे, जबकि मज़दूरों के लिए जिंदा रहना भी मुहाल हो गया। आपसी प्रतिस्पर्धा ने पूंजीपतियों को अपनी लागत को यथासंभव कम रखने के लिए बाध्य किया। इससे मज़दूरों की स्थिति बदसेबदतर होती गई और पूंजीपति मालामाल होते गए। इस तरह मार्क्स ने प्रचुरता के दरम्यान मौजूद बदहाली को समझने के लिए एक तर्कसंगत और तथ्यपरक सिद्धांत पेश किया। मार्क्स के अनुसार, इस बदहाली को तभी खत्म किया जा सकता है जब मज़दूर संगठित होकर एक ऐसे समाजवादी समाज का निर्माण करें जहां उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का नियंत्रण हो। इसलिए लोकतंत्र से पहले उपजे लेकिन आज भी क़ायम भाग्यवाद और नवमाल्थसवाद जैसे विचार न केवल लोकतंत्र के उदय से पहले का नज़रिया प्रस्तुत करते हैं, बल्कि वे मुद्दे को मार्क्स की बेशी मूल्य कार्यप्रणाली कि खोज से पहले के प्रतिगामी विचारों की ओर मोड़ना चाहते हैं।

पिछली सदी के दौरान मार्क्सवादी परंपरा के आँगन में पल रहे विमर्शों ने उल्लेखनीय प्रगति की है। कुछ विमर्शों ने आधुनिक समाज में मौजूद असामानता के विभिन्न स्तरों का वर्गीकरण करने का प्रयास किया है। इनमें तीन प्रमुख स्तर चिन्हित किये गए पहला, वर्ग के आधार पर; दूसरा, राष्ट्रीयता के आधार पर; और तीसरा, सामाजिक श्रेणियों (जैसे कि लिंग, नस्ल और जाति आदि बाधाओं) के आधार पर। हर मनुष्य इन तीनों तरह की असमानताओं से प्रभावित होता है, हालाँकि असमानता के इन तीन स्तरों की प्रभावशक्ति/भूमिका के विषय में विचार एकमत नहीं हैं। औपनिवेशिक तथा अर्धऔपनिवेशिक दुनिया के लोगों की सामाजिक प्रगति की संभावना को अवरुद्ध करने में साम्राज्यवाद की भूमिका को नकारने वाले मार्क्सवादी, वर्ग की प्रभुता को सामाजिक विभेदन का मुख्य कारक बताते हैं यह तर्क, कमजोर तो है, लेकिन यूरोप और अमेरिका के अकादमिक जगत में स्वीकार्यता पाता है। मार्क्सवादी राष्ट्रीय मुक्ति की परंपरा जो लेनिन के साथ शुरू होकर माओ से होते हुए कास्त्रो तक जाती है के अनुसार साम्राज्यवाद दुनिया की संरचना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है इसलिए औपनिवेशिक तथा नवऔपनिवेशिक संचयन के ढाँचों से पीड़ित लोगों की गरिमा के निर्माण में राष्ट्रीय संप्रभुता की स्थापना सबसे पहली शर्त होनी चाहिए। सामाजिक विभेदों की वीभिषिका से आक्रांत लोगों के संघर्षों से पितृसत्ता, जाति विभेद, नस्लवाद और अन्य सामाजिक विभेदों से लड़ने की जरूरत पनपी और इन विभेदों के खिलाफ लड़ाई मानवीय गरिमा के निर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग बन गई। राष्ट्र या वर्ग, वर्ग या जाति, किस प्रकार की असमानता को प्रमुखता दी जाए, इस विषय में भले ही सहमति नहीं बन पाई हो, लेकिन इस परंपरा में राष्ट्र, वर्ग तथा सामाजिक विभेद, तीनों स्तरों को स्वीकार करने की सहमति है।

द्वितीय विश्व युद्ध और विऔपनिवेशीकरण के युग से पहले, पूरी दुनिया के सामाजिक विकास की बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपनी उपनिवेशिकृत प्रजा की मानवीय संभावनाओं को सिरे से खारिज करती रहीं इसके परिणामस्वरूप, उस दौर में साम्राज्यवादी केंद्र ने विकास का कोई सिद्धांत नहीं दिया। विकास का शुरूआती सिद्धांत उपनिवेशवादविरोधी आंदोलन ने प्रतिपादित किया। विकास के इस शुरूआती सिद्धांत का तर्क था कि उपनिवेशवाद के अंत के बिना विकास की संभावना नगण्य रहेगी क्योंकि साम्राज्यवाद उपनिवेशों की अर्थव्यवस्थाओं को कंगाल कर चुका था (इस विषय पर भारत के दादाभाई नौरोजी द्वारा 1902 में लिखी गई भारत में ग़रीबी और ग़ैरब्रिटिश शासन एक महत्वपूर्ण पुस्तक थी)। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दो चीजें स्पष्ट हो गई थीं पहली, उपनिवेश साम्राज्यवादी केंद्रों को अपने ऊपर प्रत्यक्ष शासन नहीं करने देंगे दूसरी, शीर्ष साम्राज्यवादी देश जिनका अगुवा अमेरिका था ब्रेटन वुड संस्थाओं के माध्यम से दुनिया के ऊपर एक नया वित्तीय तथा विकास तंत्र थोपेंगे (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) तथा विश्व बैंक इस प्रक्रिया में दो महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान हैं)। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आए नए देशों के सामने कुछ गंभीर समस्याएँ मौजूद थीं। सबसे विकराल समस्या थी वित्तीय स्त्रोतों का अभाव। आज़ादी प्राप्त होने से पहले सैकड़ों सालों तक साम्राज्यवादी केंद्र इनका धन चूसते रहे, जिस कारण इन नए आज़ाद देशों के पास पर्याप्त वित्तीय स्त्रोत नहीं थे। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने इस समस्या का निराकरण नहीं होने दिया। उन्होंने इन देशों के ऊपर ‘बाहरी’ दबावों की उपस्थिति को खारिज कर सारा दोष इनकी ‘आंतरिक’ समस्याओं के ऊपर मढ़ दिया। उपनिवेशवादविरोधी प्रक्रिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था के नवऔपनिवेशिक ढाँचे के अंतर्द्वंद ने द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद शुरू हुए विमर्शों को आकार दिया। कई मायनों में विकास सम्बन्धी वर्तमान विमर्शों पर इसकी अमिट छाप आज भी विद्यमान है।

इन विमर्शों को ठीक से समझने के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर को चार भागों में बाँटा जा सकता है: 1944 से 1970 तक आधुनिकीकरण सिद्धांत का दौर, 1970 से 1979 तक नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम का दौर, 1979 से 2008 तक वैश्वीकरण तथा नवउदारवाद का दौर, और 2007-08 में आए वित्तीय संकट के बाद का संक्रमण काल जिसमें हम रह रहे हैं।

 


3. संयुक्त राष्ट्र ने 1959 में एशियाई राजमार्ग नेटवर्क को यूरोप और एशिया को जोड़ने के लिए शुरू किया था। प्रगति और ठहराव के चरणों से गुजरते हुए आज यह नेटवर्क 141,000 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ है। जापान से शुरू होकर 32 देशों को जोड़ते हुए यह नेटवर्क तुर्की पहुँचकर यूरोपीयन रूट E80 से जुड़ जाता है।

 

1. आधुनिकीकरण सिद्धांत का दौर (1944-1970)

 

1944 की ब्रेटन वुड्स कॉन्फ्रेंस ने विश्व अर्थव्यवस्था को संभालने में विफल रही अंतर्राष्ट्रीय संरचना में मौजूद खामियों को स्वीकार किया, लेकिन अर्थव्यवस्था के नवऔपनिवेशिक ढाँचे में निहित समस्याओं को नज़रअंदाज कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण हेतु धन जुटाने की बात तो शुरू की गई, लेकिन औपनिवेशिक लूट से पीड़ित अफ़्रीका, एशिया, तथा लैटिन अमेरिका के नवीन राष्ट्रों के पुनर्निर्माण के विषय में सुगबुगाहट भी नहीं हुई। ब्रेटन वुड्स द्वारा विकसित और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) तथा विश्व बैंक की कार्यप्रणाली को आकार प्रदान करने वाले आधुनिकीकरण सिद्धांत की एक प्रमुख विशेषता थी विश्व अर्थव्यवस्था की संरचना को अक्षुण्ण रखना। इस सिद्धांत ने सुनिश्चित किया कि यूरोप को मार्शल योजना के माध्यम से और अमेरिका अधिकृत जापान तथा दक्षिण कोरिया को पुनर्निर्माण हेतु अकूत धनराशि देने के अलावा किसी नये राष्ट्र को रियायती दरों पर धन कोष प्रदान न किया जाए।

1960 में, डब्ल्यू. डब्ल्यू. रोस्तोव ने आर्थिक विकास के चरण: एक ग़ैरकम्युनिस्ट घोषणापत्र प्रकाशित की। इस किताब के शीर्षक ने ही इसके कम्युनिस्टविरोधी तथा मार्क्सवादविरोधी नज़रिये को जाहिर कर दिया। रोस्तोव ने मार्शल योजना के निर्माण में योगदान दिया था और वो आगे चलकर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने। इन्होंने सामाजिक विकास के विभिन्न चरणों का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। रोस्तोव के अनुसार इन चरणों की शुरूआत एक ‘पारंपरिक समाज’ के साथ होती है जो औद्योगीकरण तथा एक राष्ट्रीय संभ्रांत वर्ग के उद्भव के बल पर तीव्र आर्थिक विकास तथा परिपक्वता की तरफ आसीन हो जाएगा। राष्ट्रीय संभ्रांत वर्ग के नेतृत्व में पूर्वकालिक ‘पारंपरिक समाज’ व्यापक स्तर पर जनउपभोग की वस्तुओं का इस्तेमाल करने वाले समाज में तब्दील हो जाएगा। इस मॉडल के अनुसार तीसरी दुनिया इस ‘पारंपरिक समाज’ के चरण में ही फंसी हुई थी। पारंपरिक समाज की यह अवधारणा ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल नहीं खाती है तथा इस तथ्य की अनदेखी करती है कि अफ़्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के समाज औपनिवेशिक लूट के कारण कंगाल हुए थे। ‘पारंपरिक समाज’ की सारी समस्याओं को आंतरिक (सांस्कृतिक) माना गया, जबकि सारी बाहरी समस्याओं (जैसे कि उपनिवेशवाद से उपजे अंतर्राष्ट्रीय श्रम के विषम विभाजन) के अस्तित्व को खारिज किया गया। रोस्तोव के पाश्चात्य एजेंडे में नव स्वाधीन देशों को साम्यवाद के मोह से दूर रखना सबसे महत्वपूर्ण कार्य था। रोस्तोव ने सुझाव दिया कि पश्चिमी देश विकास अनुदान का इस्तेमाल करके तीसरी दुनिया के देशों को समाजवादी विकल्पों से दूर रखें, उन्हें नवऔपनिवेशिक ढाँचे की आलोचना करने से रोकें, और तीसरी दुनिया के देशों में केवल उन सेक्टरों का औद्योगीकरण होने दें जिनमें पश्चिम के बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों की वाणिज्यिक रुचि न हो।

पहले विकास दशक (1960-70) में संयुक्त राष्ट्र संघ ने आधुनिकीकरण सिद्धांत अपनाया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के नवऔपनिवेशिक ढाँचे का ज़िक्र तक नहीं किया और देशों से ‘सहायता देना जारी रखने’ का आग्रह किया ताकि विकासशील देश ‘अपनी अर्थव्यवस्था को विकास और सामाजिक तरक्की की आत्मनिर्भर राह पर ला सकें जिससे कि हरेक विकासशील देश में विकास दर में ठोस वृद्धि हो सके’।3 यह इंगित किया गया कि उपनिवेश रह चुके देश आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे और उद्योगों के निर्माण हेतु बहुपक्षीय एजेंसियों तथा निजी वित्त बाजारों से कर्ज़ लें, और निर्यात से अपना कर्ज़ उतारते रहें। आधुनिकीकरण सिद्धांतकारों के इस तर्क को लैटिन अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र आर्थिक कमीशन [ECLA] और एशिया तथा सुदूर पूर्व के संयुक्त राष्ट्र आर्थिक कमीशन [ECAFE] ने ECLA के कार्यकारी सचिव राउल प्रीबिश द्वारा पेश किए गए सिद्धांत के आधार पर चुनौती दी। 1950 में प्रतिपादित इस सिद्धांत का तर्क था कि विनिर्मित माल निर्यातक देशों के सापेक्ष प्राथमिक माल निर्यातक देशों को मिलने वाली कीमतें समय के साथ गिरती जाएंगी और प्राथमिक माल निर्यातक देशों को दरिद्र बनाएंगी4 एशिया तथा लैटिन अमेरिका के अर्थशास्त्रीय कमीशनों ने 1950 के शुरूआती महीनों में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वाशिंगटन तथा यूरोप की अगुवाई में बेचा जा रहा आधुनिकीकरण सिद्धांत तीसरी दुनिया के देशों में तीव्र आर्थिक विकास की आधारशिला रख पाने में नाकाम साबित होगा। प्रीबिश के विचारों का प्रभाव बुर्जुआ अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों और वैकासिक अर्थशास्त्रियों पर भी पड़ा। उन्होंने प्रीबिश के विचारों से प्रभावित होकर ‘निम्नस्तरीयआय का व्यूह’ जैसे विचारों का विकास तो किया, लेकिन – ECLA और ECAFE के अर्थशास्त्रियों के विपरीत – उन्होंने विश्व अर्थव्यवस्था के नवऔपनिवेशिक ढाँचे को चुनौती नहीं दी (इसमें तीसरी दुनिया के देशों की कच्चे माल के निर्यात पर निर्भरता भी शामिल है)5

आधुनिकीकरण सिद्धांत के खिलाफ तीसरी दुनिया की मुखर आलोचनाओं के फलस्वरूप, प्रीबिश के निर्देशन में, 1964 में संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास कॉन्फ्रेंस (UNCTAD) की स्थापना हुई। प्रीबिश तथा UNCTAD के काम के साथसाथ नवऔपनिवेशिक ढाँचे के खिलाफ नए साहित्य के उद्भव (विशेषतौर पर क्वामे न्क्रूमा की पुस्तक नव उपनिवेशवाद: साम्राज्यवाद का आखिरी चरण, 1965) ने तीसरी दुनिया के देशों की राजधानियों में आधुनिकीकरण सिद्धांत के तथाकथित आधुनिकीकरण की कमियों पर केंद्रित चर्चाओं को जन्म दिया। तीसरी दुनिया के शिक्षाविदों के बीच आधुनिकीकरण सिद्धांत के सैद्धांतिक खोखलेपन के विषय में गर्म विमर्शों का दौर चल पड़ा। आधुनिकीकरण सिद्धांत के कार्यों में सामाजिक इतिहास की अनुपस्थिति, उपनिवेशों की ऐतिहासिक लूट तथा प्रीबिश प्रीबिश द्वारा प्रतिपादित व्यापार के सिद्धांत के समागम के फलस्वरूप निर्भरता सिद्धांत का निर्माण हुआ (जिसमें मार्क्सवादी तथा वैकासिक, दोनों धड़े मौजूद थे)6 उपरोक्त पहलुओं की स्वीकार्यता के परिणामस्वरूप राजनेताओं के बीच एक दशक तक भूतपूर्व उपनिवेशों के विकास को बाधित करने वाले बाहरी कारकों के विषय में विमर्श शुरू हुआ। इस विमर्श की परिणति नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम (New International Economic Order, NIEO) नामक योजना के मसौदे में हुई। आधुनिकीकरण सिद्धांत के विरुद्ध हुए गंभीर बौद्धिक एवं राजनीतिक कार्यों ने इसके खिलाफ न सिर्फ विश्वविद्यालयों की दीवारों के भीतर, अपितु संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के गलियारों में और न्यू यॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय में भी चुनौती पेश की।

 

The Akosombo Dam in the Volta River, inaugurated in 1965 during Kwame Nkrumah’s presidency, and at the time was the largest single development investment in Ghana’s history at the time. The planning of the project involved broad public consultation, including with different representatives of Traditional Councils.

4. नदी पर बने अकोसोम्बो बाँध का उद्घाटन 1965 में राष्ट्रपति क्वामे न्क्रूमा के शासनकाल में किया गया था। इस बाँध का निर्माण उस समय घाना के इतिहास में विकास के लिए किया गया सबसे बड़ा निवेश था। व्यापक जन परामर्श इसकी योजना निर्माण का हिस्सा था। जन परामर्श प्रक्रिया में पारंपरिक काउंसिलों के विभिन्न प्रतिनिधियों से परामर्श भी शामिल था।

 

2. नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम (NIEO) का दौर (1970-1979)

UNCTAD सम्मेलनों में, तीसरी दुनिया के देशों ने आधुनिकीकरण सिद्धांत की कमियों के साथ अपने अनुभवों को निर्भरता सिद्धांत के दृष्टिकोण से प्राप्त अंतर्दृष्टियों के साथ समाहित किया। UNCTAD की इस प्रक्रिया के फलस्वरूप, तीसरी दुनिया के देशों को उनकी आंतरिक समस्याओं के सामने विफल बनाने वाले बाहरी कारकों को रेखांकित करने वाले कई रिपोर्टों एवं अध्ययनों का प्रकाशन हुआ। इन देशों की खस्ताहाल आधारभूत संरचना के निर्माण हेतु रियायती दर पर मिलने वाले वित्त का अभाव, पश्चिम के देशों के भीतर तकनीक एवं विज्ञान साझा करने की अनिच्छा, पश्चिमी देशों द्वारा ज्यादातर एक वस्तु की प्रधानता वाली अर्थव्यवस्थाओं को औद्योगीकरण के माध्यम से विविध वस्तुओं वाली अर्थव्यवस्थाओं में बदलने हेतु आवश्यक प्रशुल्क और सब्सिडी आधारित व्यापार प्रणाली को फलीभूत होने से रोकना, तीसरी दुनिया के देशों का अपने भूतपूर्व औपनिवेशिक शासकों से पुराने जुड़ाव को तोड़कर उसके स्थान पर आपसी सहयोग स्थापित कर पाने की अक्षमता इन बाहरी कारकों में शामिल थे। जब तक बाहरी औपनिवेशिक वातावरण तीसरी दुनिया के देशों के संसाधनों को चूसता रहेगा, तब तक किसी भी स्तर का आंतरिक बदलाव जैसे कि सार्वभौमिक शिक्षा के माध्यम से जनता के भीतर तकनीकी कौशल का विकास, या कानून व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित रहने वाली राजकीय संस्थाओं के बजाय सामाजिक बराबरी के लिए प्रतिबद्ध राजकीय संस्थाओं का निर्माण या सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार विरोधी आदर्शों की स्थापना कर पाना असंभव रहेगा।

UNCTAD की बैठकों तथा 1961 में स्थापित गुटनिरपेक्ष आंदोलन में होने वाले विमर्शों ने नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक क्रम (NIEO) की रुपरेखा को आकार देना शुरू कर दिया था। अक्टूबर 1970 में, संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने द्वितीय संयुक्त राष्ट्र विकास दशक के लिए प्रस्ताव संख्या 2626 पारित किया। तीसरी दुनिया के देशों के दबाव के परिणामस्वरूप इस प्रस्ताव ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों का आह्वान किया कि वे ‘शपथ लें कि वो व्यक्तिगत एवं सामूहिक तौर पर उन नीतियों का अनुपालन करेंगे जो ऐसी न्यायशील तथा तर्कसंगत वैश्विक आर्थिक एवं सामाजिक प्रणाली के निर्माण हेतु प्रतिबद्ध होंगी जिसमें सभी देशों को और देशों के भीतर रहने वाले व्यक्तियों को भी अवसर की समानता सुलभ होगी’। संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र ने कहा कि, ‘आंचलिक, सेक्टरीय एवं सामाजिक असमानताओं को ठोस रूप से कम करने के लिए गुणात्मक तथा संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं’।7

संयुक्त राष्ट्र के इस घोषणापत्र ने अप्रैलमई 1972 में सैंटियागो (चिली) में हुई UNCTAD III की बैठकों के लिये ज़मीन तैयार की। इस बैठक में UNCTAD के महासचिव मैनुअल पेरेज़ गुरेरो ने रेखांकित किया कि ‘तीसरी दुनिया के देश वैश्विक मौद्रिक नीति से जुड़े फैसलों में अपनी न्यायसंगत भागीदारी की माँग कर रहे हैं। इस भागीदारी का अभाव उनके लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। चूँकि उनकी विदेशी आय का मुख्य हिस्सा प्राथमिक उत्पादों की बिक्री से आता है, इसलिए वो जाहिर तौर पर मानते हैं कि इस दिशा में उठाये गए कदम त्वरित और ठोस परिणाम लाएंगे’।8 ये दो मुद्दे वैश्विक मौद्रिक नीति निर्माण प्रक्रिया में भागीदारी तथा प्राथमिक उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण NIEO के दो प्रमुख स्तंभ बने।

1 मई 1974 को, संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने NIEO को पारित कर दिया। यह उपनिवेशवाद से विरासत में मिले संरचनात्मक कारकों से पार पाने की महत्ता तथा रोस्तोव के तीव्र विकास के वादे को पूरा करने की बजाय उधार ग्रहण – कर्ज़ मितव्ययिता के व्यूह में फँसाने वाले आधुनिकीकरण सिद्धांत पर दशकों तक चले विमर्श का परिणाम था। NIEO के सिद्धांत आज के समय में भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। उनमें से कुछ का ज़िक्र किया जाना जरूरी है:

  • सभी राज्यों की संप्रभु समानता, आंतरिक हस्तक्षेप की समाप्ति, विश्व की समस्याओं को सुलझाने में उनकी प्रभावकारी भागीदारी तथा अपनी आर्थिक एवं सामाजिक प्रणालियों को अपनाने का पूर्ण अधिकार

  • अपने प्राकृतिक संसाधनों एवं विकास के लिए आवश्यक अन्य आर्थिक गतिविधियों तथा बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों के नियमन पर हर राज्य की संपूर्ण संप्रभुता

  • विकासशील देशों द्वारा निर्यातित कच्चे माल तथा अन्य उत्पादों, और विकसित देशों द्वारा निर्यातित कच्चे माल तथा अन्य उत्पादों के बीच न्यायसंगत तथा समरूप सम्बन्ध

  • विकासशील देशों में औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए, विशेषकर पर्याप्त वित्तीय संसाधनों के प्रबंधन तथा यथोचित तकनीकों एवं प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण के माध्यम से, द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय सहायता का सशक्तिकरण।9

कुछ महीनों के पश्चात, अक्टूबर 1974 में, UNCTAD तथा संयुक्त राष्ट्र ऊर्जा कार्यक्रम कोकोयोक (मेक्सिको) में आयोजित एक बैठक में मिले। वहाँ उन्होंने NIEO परियोजना के मूल में निहित विकास की एक नई अवधारणा पर प्रकाश डाला:

हमारा पहला मकसद विकास के लक्ष्य को फिर से परिभाषित करना है। इसका लक्ष्य वस्तुओं का विकास नहीं, बल्कि इंसानों का विकास होना चाहिए। इंसानों की बुनियादी जरूरतें होती हैं: भोजन, मकान, कपड़ा, स्वास्थ्य, शिक्षा। विकास की कोई भी प्रक्रिया जो इनको पूरा नहीं करती, या फिर इनकी प्राप्ति में बाधक बनती है, विकास के विचार का उपहास है।10

भविष्य को एक उम्मीद भरे झरोखे से देखने वाला यह नजरिया बहुत सारी प्रतिकूल प्रक्रियाओं के कारण अपने आप को स्थापित करने में असफल रहा। मुख्य प्रतिकूल प्रक्रियाएं निम्नलिखित हैं:

  • नवस्थापित सात देशों के समूह (कनाडा, फ़्रांस, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, तथा पश्चिमी जर्मनी) का राजनीतिक आक्रमण। तेल के उत्पादकों द्वारा उत्पादक संघ बनाकर अपने बाहुबल के आधार पर 1973 में तेल संकट को जन्म देने के परिप्रेक्ष्य में NIEO को चुनौती देने के लिए 1974 में सात देशों के समूह की स्थापना की गई थी। पेट्रोलियम का निर्यात करने वाले देशों का संगठन (OPEC) ऐसा पहला उत्पादक संघ था जिसने निर्यात की कीमतें तय करने की शक्ति रखने वाले बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशनों को चुनौती देकर उत्पादक देशों को कीमतें तय करने की शक्ति दी थी।

  • तीसरी दुनिया के देशों के कर्ज़ की दरों को बढ़ाकर उनके ऊपर आर्थिक आक्रमण। इसे वोल्कर संकट के माध्यम से अंजाम दिया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने ब्याज दरों में इज़ाफ़ा करके तीसरी दुनिया के देशों में कर्ज़ संकट को पैदा किया।

  • IMF तथा विश्व बैंक ने तीसरी दुनिया के कर्ज़ संकट का फायदा उठाकर प्रभावित देशों को ‘संरचनात्मक समायोजन’ नीतियाँ लागू करने के लिए मजबूर किया। उन्होंने अल्पकालिक भुगतान संतुलन (Balance of Payments) समस्या से जूझ रहे देशों को संरचनात्मक समायोजन नीतियों के तहत बुनियादी जरूरतों पर होने वाले खर्च में कटौती करने तथा सार्वजनिक मितव्ययिता की व्यवस्था स्थापित करने के लिए बाध्य किया। संरचनात्मक समायोजन की नीतियों ने तीसरी दुनिया में उधार ग्रहण कर्ज़ मितव्ययिता की व्यूह रचना को मजबूत किया और वैश्विक पटल पर विकास के एजेंडा व इन सरकारों की राजनीतिक ताकत पर कुठाराघात किया।

  • फोर्डिस्ट उत्पादन प्रणाली का विखंडन तथा वैश्विक कारखानों का प्रादुर्भाव। इसको संभव बनाने में जनसंचार एवं परिवहन की तकनीकों में हुए विकास के साथसाथ (1986 से 1994 के शुल्क और व्यापार पर सामान्य समझौते (GATT) के अंतिम चरण में अपनाए गए) बौद्धिक संपदा अधिकार के नये कानूनों ने मुख्य भूमिका निभाई।11

  • विकासशील देशों में छोटे किसानों एवं भूस्वामियों पर कृषिव्यवसायों के आक्रमण (विकसित देशों में कृषिव्यवसायों को प्रदान की जाने वाली सब्सिडी ने इस आक्रमण की धार को तेज किया) तथा उपठेकाकृत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के उदय ने वैश्विक वर्ग संघर्ष में कामगार वर्ग तथा किसानों को कमजोर किया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इनकी वजह से कामगार यूनियनों का संगठनकर्म बेहद मुश्किल हो गया और राष्ट्रीयकरण जैसी रणनीतियाँ पहले की तरह कारगर नहीं रहीं।

इन घटनाओं ने तीसरी दुनिया की प्रगतिशील ताकतों को कमजोर किया और धीरेधीरे NIEO विमर्श को हाशिए पर धकेल दिया। इससे नवउदारवादी सिद्धांत एवं नीति के आगमन और दबदबे का मंच तैयार हो गया।

 

Anshan Iron and Steel Company, one of China’s largest state enterprises, was renovated and expanded as one of the 156 construction projects in the country that received significant aid and expertise from the Soviet Union. It was also part of China’s first Five-Year Plan (1953–1957).

5. अंशान लौह एवं इस्पात कंपनी चीन के सबसे बड़े सार्वजनिक उपक्रमों में से एक है। यह देश के उन 156 निर्माण परियोजनाओं में शामिल थी जिनका जीर्णोद्धार एवं विस्तार सोवियत संघ से मिले तकनीकी एवं आर्थिक सहायता की मदद से किया गया था। यह चीन के प्रथम पंचवर्षीय योजना (1953-1957) का भी हिस्सा थी।

 

3. वैश्वीकरण तथा नवउदारवाद का दौर (1979-2008)

 

दिसंबर 1980 में, तृतीय संयुक्त राष्ट्र विकास दशक की स्थापना करने के लिए संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव ने पुन: पुष्टि की कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश ‘एक नये अंतर्राष्ट्रीय क्रम की स्थापना’ हेतु ‘निष्ठा’ के साथ काम करेंगे। इसने स्थापित किया कि ‘विकास का परम ध्येय विकास की प्रक्रिया में सभी लोगों की पूर्ण भागीदारी एवं विकास के फायदे के न्यायोचित वितरण के आधार पर सभी लोगों के कल्याण की सतत् उन्नति है’।12

लेकिन शीघ्र ही इस प्रस्ताव में दरारें प्रकट होने लगीं। प्रस्ताव के भीतर नए शब्दों का प्रवेश हुआ। वैश्विक विमर्श में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा चलन में लाये गए ‘व्यापार का उदारीकरण’ तथा ‘संरचनात्मक समायोजन’ जैसे विचार इस प्रस्ताव के भीतर भी घुस गए। उदाहरण के लिए, यह प्रस्ताव कहता है: ‘सभी देश व्यापार के उदारीकरण तथा संरचनात्मक समायोजन को बढ़ावा देने हेतु एक उदार तथा विस्तारशील व्यापार प्रणाली के प्रति प्रतिबद्ध रहेंगे, जिससे देशों को तुलनात्मक सुलाभ (Comparative Advantage) का फायदा प्राप्त होने का मार्ग प्रशस्त होगा’।13

NIEO के लिए हामी भरने के बावजूद यह साफ हो गया था कि कर्ज़ के बढ़ते दरों के दबाव (मेक्सिको द्वारा 1982 में दिवालियापन घोषित करने के पश्चात इसमें बेतहाशा वृद्धि हुई) में आकर तीसरी दुनिया के अधिकाधिक देशों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक विभागों में प्रकट होने वाले मुद्रावादी विचारों (ये विचार मिल्टन फ्रीडमैन के काम से प्रेरित थे) को अपनाना शुरू कर दिया था। संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार के दबाव में प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का नेतृत्व NIEO का विरोध करने वाले मुद्रावादियों के हाथों में सौंप दिया गया। इन मुद्रावादियों ने विकास विमर्श के वैश्विक पहलूओं को नज़रअंदाज़ किया और इस विचार का प्रचार किया कि विकास की समस्या सरकारों से जुड़ी हुई है (उदाहरण के लिए, विलियम हूड जिन्होंने कुछ समय के लिए शिकागो विश्वविद्यालय में काम किया – 1979 में IMF के मुख्य अर्थशास्त्री बने, जबकि ऐनी क्रूगर फ्रीडमैन के नवउदारवाद की समर्थक – 1982 में विश्व बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री बनीं)। एक दशक के बाद, जॉन टॉय ने NIEO के इस अवसान को एक ‘प्रतिक्रांति’ की उपमा दी14

वैश्विक पटल पर शक्ति संतुलन में आए परिवर्तनों ने नवऔपनिवेशिक ढाँचे में बदलाव की गुंजाइश को खत्म कर दिया। इससे वैकासिक सिद्धांत के विमर्शों का भी अवसान हो गया। कर्ज़ के अंबार तले दबे वैश्विक दक्षिण के देशों ने – विशेषकर अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में सरकारी व्यय एवं सब्सिडियों में कटौती, घरेलू बाज़ारों का उदारीकरण और मज़दूरी को कम रखने वाली नीतियाँ लागू करना शुरू कर दिया। ऐसी नीतियों ने इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान पहुँचाया। इस दौर को ‘विकास का खोया हुआ दशक’ के नाम से जाना गया। इनके ऊपर आयातप्रतिस्थापन को त्यागकर निर्यातप्रोत्साहन की नीतियों को अपनाने का दबाव था। बहुत सारे देश इस दबाव की वजह से अपने प्राथमिक उत्पादों का ज्यादासेज्यादा निर्यात करने लगे; या बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने देश के भीतर उत्पादन की वैश्विक वस्तु श्रृंखला स्थापित करने हेतु लुभाने के लिए अर्थव्यवस्थाओं का उदारीकरण और नियामक नियंत्रणों को हटाने लगे।15

विश्व बैंक तथा IMF के दस्तावेजों ने विकास के विमर्श को आकार देना शुरू कर दिया, जहां मार्क्सवादी एवं राष्ट्रीय मुक्ति की आवाजों को अगुवा की बजाय आलोचकों का दर्ज़ा देकर हाशिए पर धकेल दिया गया। अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र ने उल्टी दिशा में कुछ उल्लेखनीय कदम उठाए। सबसे पहले, विश्व बैंक ने पहली बार कहा कि ग़रीबी का खात्मा संभव नहीं है, इसे सिर्फ कम किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के चतुर्थ विकास दशक के प्रस्ताव ने तीव्र भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में ‘बदलती विश्व अर्थव्यवस्था के प्रति खुले एवं लचीले जवाबों’ की जरूरत की पुनर्पुष्टि की ।16 उसी साल सोवियत संघ का विघटन हो गया और भूमंडलीकरण की ताकतों पर नकेल की संभावना भी खत्म हो गई।

हालात गंभीर थे। जनवरी 1993 में संयुक्त राष्ट्र ने विश्व सामाजिक स्थिति का प्रकाशन किया। इस प्रकाशन को संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने सामाजिक प्रगति और विकास पर उद्घोषणा (1969) के अनुपालन के मूल्यांकन हेतु अनुमोदित किया था। 1993 की यह रिपोर्ट कहती है, ‘हालाँकि उद्घोषणा के लक्ष्य हासिल नहीं हुए हैं, लेकिन विकास के पीछे मौजूद शक्तियों की समझ गहरी हुई है और लक्ष्यों, दृष्टिकोणों और उनपर दिए जाने वाले जोर का मूल्यांकन करके उनका नवीनीकरण किया गया है। फलत:, विकास की प्रक्रिया को सतत् बनाने हेतु ग्रहणकर्ता देशों की सांस्थानिक क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए सहायता दिए जाने पर जोर दिया जा रहा है’।17

संयुक्त राष्ट्र का यह कथन विश्व बैंक और IMF के विचारों तीसरी दुनिया के विकास के मुद्दों पर बाहरी कारकों को नज़रअंदाज़ करना से मेल खाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सब्सिडीशुल्क शासनपद्धति (व्यापार का उदारीकरण) तथा मजदूरों को मिलने वाली सुरक्षा का अंत (श्रम बाजार का उदारीकरण) जैसे आंतरिक सुधारों पर जोर दिया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भ्रष्टाचार का मुकाबला, ‘सुशासन’ और मानवाधिकारों के राजनीतिक पहलू पर जोर देना (किंतु श्रम अधिकार इसके दायरे से बाहर रखे जाएंगे) अगली अवधि के एजेंडा होंगे। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों ने बहुत सारे दक्षिणपूर्व एशिया के देशों के द्वारा की गई प्रगति का हवाला देकर यह साबित करने की कोशिश की कि निर्यातप्रोत्साहन अथवा ‘एशियाई मूल्यों’ के बल पर आंतरिक विकास हासिल करना संभव है। उन्होंने चार एशियाई टाईगरों – (हांग कांग, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, और ताईवान) को उदाहरण के तौर पर पेश किया कि कैसे उन्होंने उपरोक्त बदलाव कर विपरीत बाहरी कारकों के बावजूद तीव्र आर्थिक विकास हासिल की18 इन देशों के छोटे आकार के अलावा और भी कई मददगार कारक थे जिनको इन अध्ययनों ने अनदेखा किया; जैसे मजदूर अधिकारों का दमन करने वाली दीर्घकालिक राजनीतिक तानाशाही और संयुक्त राज्य अमेरिका की साम्राज्यवादी उपस्थिति के फलस्वरूप निम्न सैन्य खर्च जैसे कारणों को विकास के कारक के रूप में पहचानने की बजाय NIEO की आलोचना के रूप में दर्ज किया गया।19 वैश्विक दक्षिण के देशों पर अपने श्रम बाजारों तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का उदारीकरण करने का दबाव बनाने के लिए ‘पूर्व एशियाई चमत्कार’ का प्रयोग हथियार की मानिंद किया गया।20

इस दौरान, विकास की बहसों के केंद्र में NIEO अथवा विश्व अर्थव्यवस्था के नवऔपनिवेशिक ढाँचे नहीं, अपितु बुनियादी ज़रूरतों की माप तय कर संसाधननिर्धन देशों के ऊपर लादे गए लक्ष्यों की गणना थी। यह सब सहस्त्राब्दी घोषणा (2000) और सतत् विकास हेतु 2030 के एजेंडा (2015) के माध्यम से किया गया। सहस्त्राब्दी घोषणा (2000) ने आठ सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों तथा सतत् विकास हेतु 2030 के एजेंडा ने सत्रह सतत् विकास लक्ष्यों की नींव रखी। इन सबको संयुक्त राष्ट्र मानव विकास परियोजना के मानव विकास सूचकांक परियोजना (1990) तथा आर्थिक सहयोग एवं विकास के अंतर्राष्ट्रीय विकास लक्ष्य (1996) के तकनीकी कार्यों के आधार पर विकसित किया गया था। इनमें से किसी भी लक्ष्य में विकास की संभावना को प्रभावित करने वाले बाहरी कारकों (उदाहरण के लिए, स्थायी कर्ज़ संकट) को जगह नहीं दी गई। यही कारण है कि यह साहित्य उधार ग्रहण कर्ज़ मितव्ययिता के व्यूह को जन्म देने वाली IMF की नीतियों और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सामाजिक धन के निर्माण के सतत् तरीकों पर विमर्श नहीं करता है। विश्व बैंक ने 1996 में कहा था कि नियोजन का दौर खत्म हो चुका है, और वैश्विक दक्षिण की सरकारों को इन सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों तथा सतत् विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवश्यक विकास दर एवं सार्वजनिक वित्त प्राप्त करने हेतु बाज़ारों पर श्रद्धा रखनी होगी21 पिछले कुछ दशकों के दौरान वैश्विक दक्षिण के केवल मुट्ठीभर देश सतत् विकास लक्ष्यों के कुछ लक्ष्यों को हासिल कर पाने में सफल हो पाए हैं। 2007-2008 के वित्तीय संकट, 2020-2022 की महामारी तथा यूक्रेन युद्ध ने इन लक्ष्यों और देशों के बीच के फ़ासले को बढ़ा दिया है।

 

The Games of New Emerging Forces (GANEFO) were hosted in Jakarta, Indonesia in 1963. Under President Sukarno’s leadership, GANEFO was organised as a boycott to the Olympic Games and hosted athletes of newly independent and socialist states.

6. नई उभरती ताकतों के खेल (GANEFO, The Games of New Emerging Forces) का आयोजन इंडोनेशिया के जकार्ता में 1963 में किया गया था। राष्ट्रपति सुकर्नो की अगुवाई में GANEFO को ओलंपिक खेलों के विरोध में आयोजित किया गया था। इसमें नए स्वतंत्र देशों तथा समाजवादी देशों ने भाग लिया था।

 

4. पाँच नियंत्रणों का दौर

संयुक्त राज्य अमेरिका में कर्ज़ बाज़ार के विफल हो जाने की वजह से पाश्चात्य वित्तीय बाज़ारों में 2007-2008 का संकट आया। इस संकट ने नवउदारवादी एजेंडा की चूलें हिलाकर रख दीं। वैश्विक दक्षिण के देश खासकर चीन जैसे विशाल देश संयुक्त राज्य अमेरिका की मुख्य खरीददार की भूमिका को लेकर आशंकित हो गए। संयुक्त राज्य अमेरिका के घरेलू बाज़ार तथा पाश्चात्य वित्तीय बाज़ारों की इन बुनियादी कमजोरियों के सामने आने से वैश्विक दक्षिण में बहुत सारे व्यावहारिक बदलाव आए। इनमें से दो महत्वपूर्ण बदलाव निम्नलिखित हैं:

  1. 2009 में बड़े विकासशील राज्यों ब्राज़ील, चीन, भारत और दक्षिण अफ़्रीका ने मिलकर BRICS की स्थापना की। इन्होंने इंडोनेशिया, मेक्सिको, नाईजीरिया व अन्यों के साथ मिलकर दक्षिणदक्षिण विकास एजेंडा में जान फूँकने की कोशिश की। इन घटनाओं ने BRICS के सहारे एक नवीन व्यापार तथा विकास प्रणाली के जन्म और दक्षिणी वायर ट्रांसफर प्रणाली सहित एक नयी वित्तीय तथा मौद्रिक प्रणाली के निर्माण की आशा जगाई। संयुक्त राज्य अमेरिकी सरकार की प्रतिबंध नीति, जिसने बहुत से देशों को पाश्चात्य देशों के दबदबे वाली वित्तीय व्यवस्था से अलगथलग कर दिया, ने भी इन घटनाओं को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस नए दक्षिणदक्षिण एजेंडा के परिणामस्वरूप बहुत सारे लेख अस्तित्व में आए। हालाँकि इनमें से ज्यादातर लेख इस तरह के विकास के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे के निर्माण के तकनीकी पहलूओं पर प्रकाश डालते हैं। अभी तक दक्षिणदक्षिण एजेंडा के भीतर से विकास का कोई ठोस सिद्धांत उत्पन्न नहीं हो पाया है। संयुक्त राष्ट्र ने 2013 में दक्षिणदक्षिण सहयोग कार्यालय (United Nations Office for South-South Cooperation (UNOSSC)) स्थापित किया था, जिसका काम सतत् विकास लक्ष्यों के काम को आगे बढ़ाना मात्र है। इसके कार्यक्षेत्र में विकास के लिए राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय योजना के निर्माण की जरूरत का मूल्यांकन नहीं आता है और इसकी दक्षिणदक्षिण सहयोग की सैद्धांतिक समझ दक्षिणदक्षिण के बीच व्यापार में बढ़ोत्तरी तक ही सीमित है।

  2. औद्योगिक उत्पादन (विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी, हरित टेक्नोलॉजी, उच्चगति की रेल, क्वांटम कम्प्यूटिंग, रोबोटिक्स और दूरसंचार) में असीम प्रगति के बल पर चीनी वैकासिक प्रतिमान नाटकीय रूप से बदला। चीनी सरकार ने अपने पश्चिमी राज्यों पर केंद्रित “पश्चिम की तरफ चलो” नीति तथा ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम के माध्यम से घरेलू बाज़ार का आकार बढ़ाया और 2013 में शुरू की गई वन बेल्ट, वन रोड पहल (जिसको 2016 में बेल्ट तथा रोड परियोजना का नाम दिया गया) की मदद से व्यापार तथा विकास के नए नेटवर्कों का निर्माण किया।22 2000 में स्थापित चीनअफ़्रीका सहयोग फ़ोरम और 2001 में स्थापित शंघाई सहयोग संगठन आदि के माध्यम से चीन ने अपनी व्यापार नीतियों को तीव्र रुप से विस्तारित किया; जिसके फलस्वरूप 2022 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार धड़ा बना। वर्तमान में चीन वैश्विक दक्षिण के ज्यादातर देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। इस व्यापारिक विस्तारीकरण और वैश्विक दक्षिण पर इसके प्रभाव से सम्बन्धित सिद्धांत विकासशील अवस्था में हैं। इससे जुड़े साहित्य सैद्धांतिक न होकर मुख्यत: वर्णनात्मक हैं।23

दुनिया में हो रहे व्यापार तथा विकास से सम्बन्धित इन तीव्र परिवर्तनों के साथ कदम मिलाने अथवा इनको आकार देने वाली ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को समझने के बजाय संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगी एक राजनैतिक तथा सैन्य एजेंडे के माध्यम से उनको पीछे धकेलने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे नव शीत युद्ध के नाम से जाना है24 वॉशिंगटन की अगुवाई में यह एजेंडा धड़ों की आक्रामक राजनीति, आर्थिक विघटन तथा व्यापक सैन्यीकरण के माध्यम से चीन की आर्थिक प्रगति तथा दक्षिणदक्षिण कार्यक्रमों को रोकने की कोशिश कर रहा है। इसकी वजह से दुनिया अस्थिर हो गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि पाश्चात्य देशों ने यह मान लिया है कि वो चीन के आर्थिक विकास तथा दक्षिणदक्षिण व्यापार एवं विकास प्रणाली से मुकाबला करने में अक्षम हैं। आर्थिक रूप से मुकाबला करने में अक्षम पश्चिमी देश इन प्रगतियों को अवरुद्ध करने के लिए अपनी श्रेष्ठ सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर रहे हैं। वर्तमान के किसी भी विकास सिद्धांत को वैश्विक दक्षिण की समस्याओं के निराकरण की कोशिशों को अवरुद्ध करने वाले इस नव शीत युद्ध को भी विमर्श का हिस्सा बनाना होगा।

वर्तमान में विभिन्न प्रकार के विकास के सिद्धांत बौद्धिक अखाड़े में ताल ठोंक रहे हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ इक्कादुक्का सिद्धांत ही हमारे वर्तमान की समस्याओं को संपूर्णता तथा गहराई के साथ देख पाने में सक्षम हैं। आर्टुरो एस्कोबार, गुस्तावो एस्टेवा, और अरम ज़िया जैसे ‘विकासोत्तर’ स्कूल के विद्वान विमर्श के दायरे को स्थानीय स्तर तक सीमित कर देते हैं। सीमित दायरे में बँधा उनका नज़रिया समस्या के स्तर तथा राज्यों तथा आंदोलनों द्वारा स्थानीय दायरे से निकलकर वृहत्तर एजेंडा बनाने की जरूरत को नज़रअंदाज़ करता है। यह नज़रिया छोटे स्तर की घटनाओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी तो देता है, लेकिन इसकी नींव नवउदारवादी धरातल में मजबूती से जमी होती है’। नवउदारवादी धर्म के शिकंजे में जकड़े लोग, जिसमें IMF के अर्थशास्त्री भी शामिल हैं, नए भाषा विन्यास में छुपे संरचनात्मक समायोजन तथा सुशासन जैसे पुराने राग अलापते रहते हैं। आजकल विकास के बारे में लिखने वाले कुछ ही लोग तथ्यों के साथ शुरूआत करते हैं और उनके आधार पर सिद्धांत का निर्माण करते हैं, लेकिन वो अक्सर अपनी नवउदारवादी हठधर्मिता को सच्चाई के ऊपर थोपते हैं।

तथ्यों के साथ शुरूआत करने के लिए आवश्यक है कि कर्ज़ तथा विऔद्योगीकरण की समस्याओं, प्राथमिक उत्पादों के निर्यात पर निर्भरता, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा रॉयल्टियों को हथियाने के लिए हस्तांतरण मूल्य निर्धारण (Transfer pricing) का प्रयोग, नई औद्योगिक रणनीतियों के निर्माण में आने वाली कठिनायों और दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में लोगों की तकनीकी, वैज्ञानिक एवं नौकरशाही की क्षमताओं की निर्माण प्रक्रिया में आने वाली समस्याओं को स्वीकार किया जाए। इन कठिनायों से पार पाना वैश्विक दक्षिण की सरकारों के लिए हमेशा से ही एक दुष्कर कार्य रहा है। हालाँकि अब, दक्षिणदक्षिण के नए खिलाड़ियों तथा चीनी सार्वजनिक संस्थानों के उद्भव ने इन सरकारों के सामने बहुत से विकल्प पैदा कर दिए हैं। अब ये सरकारें पश्चिमी देशों द्वारा नियंत्रित वित्तीय एवं व्यापारिक संस्थानों पर आश्रित नहीं हैं। इन नई सच्चायों का जन्म नये विकास सिद्धांतों के प्रतिपादन और दुराग्रही सामाजिक निराशा से पार पाने हेतु नये नज़रियों के निर्माण की माँग करता है। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रीय नियोजन तथा क्षेत्रीय सहयोग के साथसाथ वित्त एवं व्यापार के लिए एक बेहतर बाहरी वातावरण बनाने की लड़ाई की नितांत आवश्यकता है।

दक्षिणदक्षिण सहयोग के संस्थानों तथा BRI परियोजना का उद्भव समाजवादी आंदोलनों एवं समाजवादी सरकारों के लिए एक नए समाजवादी सिद्धांत के निर्माण हेतु एक साथ मिलकर काम करने का अवसर लाया है। इस सिद्धांत की निर्माण प्रक्रिया में विकास के एजेंडे को अवरुद्ध करने वाले पाँच नियंत्रणों जैसा कि समीर अमीन ने वर्णित किया है25की समझ विकसित करते हुए इनको खत्म करने के रास्ते तलाशने होंगे:

  1. प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण: औद्योगिक उत्पादन के लिए आवश्यक ज्यादातर प्राथमिक संसाधन अफ़्रीका, एशिया तथा लैटिन अमेरिका के क्षेत्रों में पाए जाते हैं। लेकिन इन संसाधनों के ऊपर नियंत्रण मुख्यत: प्रत्यक्ष स्वामित्व के रूप में अथवा वस्तु श्रृंखला के ऊपर नियंत्रण के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का होता है। ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ पश्चिमी देशों में हैं। पहले के दौर में इस्तेमाल की गई संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की रणनीति आज के समय में पर्याप्त नहीं है, क्योंकि देशों के भीतर इन संसाधनों के उपयोग हेतु आवश्यक औद्योगिक क्षमता नहीं होने के कारण देशों को इन्हें बाहर बेचने पर मजबूर होना पड़ता है। इन संसाधनों के ऊपर नियंत्रण स्थापित करने के लिए कौन से साधन मौजूद हैं? इस सवाल का जवाब विकास के नए सिद्धांत को आधारशिला प्रदान करेगा।

  2. वित्तीय प्रवाह पर नियंत्रण: सीमित आंतरिक धन एवं असमान वितरण (क्योंकि धनाढ्य अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर टैक्स देने से इंकार करते हैं और अवैध टैक्स हेवनों में अपना धन छुपाते हैं) के कारण बहुत सारे विकासशील देश घरेलू पूंजी संचयन के लिए आवश्यक उच्च बचत दर पैदा करने में अक्षम होते हैं। इसके अतिरिक्त, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बहुत सारे अपारदर्शी हथकंडों (जैसे कि हस्तांतरण मूल्य निर्धारण है (Transfer pricing)) का प्रयोग करके ट्रिलियनों डॉलर की धनराशि विकासशील देशों से हथिया लेती हैं। पूंजी नियंत्रण तथा बेहतर टैक्स प्रबंधन के माध्यम से संसाधनों का नियंत्रण और रियायती दर पर वित्तपोषण प्राप्त कर पाना वित्तीय प्रवाह पर नियंत्रण स्थापित करने के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। क्या बाहरी वित्त के नए स्त्रोतों (उदहरण के लिए, पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना के उदय ने लंदन क्लब के अलावा एक और विकल्प पैदा कर दिया है) का फायदा उठाकर विकासशील देश वित्तीय बाज़ारों के ऊपर नियंत्रण स्थापित करेंगे?

  3. विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण: पुरातन औपनिवेशिक इतिहास तथा नई बौद्धिक संपदा अधिकार प्रणालियों के कारण वैश्विक दक्षिण के बहुत सारे देश विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के संस्थानों को विकसित करने के लिए अपने साधनों का विकास करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। इस कारण तकनीकी जानकारी खरीदने के लिए उन्हें महँगा शुल्क अदा करना पड़ता है। उनके प्रतिभाशाली नौजवान पढ़ाई करने और अपनी ज़िंदगी बनाने के लिए दूसरे देशों की तरफ पलायन करते हैं। विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के ऊपर नियंत्रण के अभाव के कारण संसाधनों का स्त्राव और प्रतिभा का पलायन, दोनों होता है। क्या राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय विकास की योजनाएँ विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के हस्तांतरण की युक्तियाँ ईज़ाद कर सकती हैं?

  4. सैन्य शक्ति पर नियंत्रण: वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश हथियारों पर प्रतिवर्ष 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च करते हैं। इसमें से लगभग आधी रकम संयुक्त राज्य अमेरिका अकेले खर्च करता है।26 हथियारों के व्यापारी केवल मुट्ठीभर देशों में केंद्रित हैं। ज्यादातर हथियार व्यापारी संयुक्त राज्य अमेरिका के हैं। अपने पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद तथा आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने वाले विकासशील देश अपने बेशकीमती सामाजिक धन का एक बड़ा हिस्सा हथियारों पर खर्च करते हैं। हथियारों की खरीद के दौरान ये देश अक्सर साम्राज्यवाद के सैन्य एजेंडे में शामिल हो जाते हैं। क्या नए विकास एजेंडा के लिए यह संभव है कि वो हथियारों पर होनेवाले खर्च को सीमित करने वाले एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे में प्रतिभागी बने, और यह माँग रखे कि मुख्य ताकतें विवादों को गहरा न करें, और शांति क्षेत्रों के विस्तार की माँग भी उठाये?

  5. सूचना पर नियंत्रण: 1980 में, UNESCO की रिपोर्ट कई आवाज़ें, एक दुनिया ने सूचना के ऊपर एकाधिकार को लेकर आगाह किया था। रिपोर्ट ने बताया था कि यह एकाधिकार ज्यादातर पश्चिमी राज्यों में केंद्रित था। पचास सालों के बाद आज सूचना पर एकाधिकार ज्यादा नाटकीय रूप ले चुका है। सूचना एवं संचार के प्रवाह की संरचना का नियंत्रण चुनिंदा पश्चिमी फ़र्मों गूगल, फ़ेसबुक (मेटा) और ट्विटर के हाथों में है।27 किसी भी विकास एजेंडे ने सूचना पर नियंत्रण तथा एक दूसरे के सांस्कृतिक एवं राजनीतिक संसारों के विषय में लोगों की परस्पर शिक्षा की महत्ता को गंभीरता से नहीं लिया है। क्या एक नया समाजवादी विकास सिद्धांत सूचना की महत्ता को रेखांकित करेगा? क्या दक्षिणदक्षिण तथा BRI के नए नेटवर्क सत्यनिष्ठ संचार तथा विकासशील दुनिया में सूचना के प्रसार के लिए सूचना की नई प्रणालियों का निर्माण करेंगे?28

विकास के एक नए सिद्धांत का निर्माण करते वक्त हमें इन सवालों की दहलीज से होकर गुजरना होगा। वर्तमान में तैयार किये गए विकास के सिद्धांत के लिए यह जरूरी होगा कि वह आंदोलनों, राज्यों और क्षेत्रों को इन पाँचों पहलुओं पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का रास्ता दिखाए और बाहरी, साम्राज्यवादी ताकतों के दबाव से खुद को बचाए।


The TAZARA Railway (or Uhuru Railway), connecting the East African countries of Tanzania and Zambia, was funded by China and constructed by Chinese and African workers. The railway was completed in 1975 under the presidencies of Julius Nyerere (Tanzania), Kenneth Kaunda (Zambia), and Mao Zedong (China) and has become an important lifeline for landlocked Zambia to bypass white-led colonial governments and access trading ports via Tanzania.

7. पूर्वी अफ़्रीकी देशों तंजानिया तथा ज़ांबिया को जोड़ने वाली TAZARA (या उहुरु रेलवे) को चीन ने वित्तपोषित किया और इसे चीनी तथा अफ़्रीकी मज़दूरों ने बनाया था। इसका निर्माण 1975 में पूरा हुआ। इसे जूलियस न्येरे (तंजानिया), केन्नेथ कुंडा (ज़ांबिया) तथा माओ ज़ेदोंग (चीन) के कार्यकाल में बनाया गया था। ज़मीनी सीमा से घिरे हुए ज़ांबिया को यह श्वेत नेतृत्व वाली औपनिवेशिक सरकारों को दरकिनार करने का एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान करता है।

 

Image Credits

The reference images used for the collages in this dossier were edited by Tricontinental: Institute for Social Research.

1. Bibliotheca Alexandrina via Wikimedia Commons; Olaf Tausch via Wikimedia Commons (CC BY 3.0); German Federal Archives via Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0 DE); and JSC Gateway to Astronaut Photography of Earth via Wikimedia Commons.

2. Jean-Pierre Dalbéra (CC BY 2.0) via Flickr and Senado the Commons via Flickr (Flickr Commons).

3. Bdgzczy via Wikimedia Commons (CC0 1.0), Katorisi via Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0), Ktneop via Wikimedia Commons (CC0 1.0), Reinhard Kraasch via Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0), and Mohigan via Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0).

4. The National Archives UK via Wikimedia Commons (OGL v1.0) and Unknown source via Pan-African News Wire.

5. People’s Pictorial via Wikimedia Commons.

6. Indonesian Department of Information via Wikimedia Commons and Dutch National Archives via Wikimedia Commons (CC0 1.0).

7. David Brossard via Wikimedia Commons (CC BY-SA 2.0) and Unknown source via The Zambian Observer.

 

Notes

1 Food and Agriculture Organisation of the United Nations (FAO), Building a Common Vision for Sustainable Food and Agriculture: Principles and Approaches (Rome: FAO, 2014), https://www.fao.org/3/i3940e/i3940e.pdf.

2 ‘World Hunger Statistics 2022,’ Embrace Relief, 17 February 2023, https://www.embracerelief.org/world-hunger-statistics-2022/#:~:text=According%20to%20the%20United%20Nations,majority%20living%20in%20developing%20countries.

3 United Nations General Assembly, Resolution 1710 (XVI), United Nations Development Decade: A Programme for International Economic Co-operation, A/RES/16/1710, (19 December 1961), https://digitallibrary.un.org/record/204609?ln=en, 17.

4 United Nations Economic Commission on Latin America, The Economic Development of Latin America and Its Principal Problems (New York: United Nations Publications, 27 April 1950).

5 Harvey Leibenstein, Economic Backwardness and Economic Growth (New York: John Wiley & Sons, 1957); Irma Adelman, Theories of Economic Growth and Development, (Stanford: Stanford University Press, 1958).

6 Key early texts that were critical of the dependency literature from a Marxist standpoint include Paul Baran, The Political Economy of Growth (New York: Monthly Review Press, 1957) and Celso Furtado, Formação econômica do Brasil [The Economic Growth of Brazil] (Rio de Janeiro: Fundo de Cultura, 1959).

7 United Nations General Assembly, Resolution 2626 (XXV), International Development Strategy for the Second United Nations Development Decade, A/R/25/2626 (24 October 1970), http://www.un-documents.net/a25r2626.htm.

8 United Nations, Proceedings of the United Nations Conference on Trade and Development, Third Session, vol. 1 (New York: United Nations, 1973), https://unctad.org/system/files/official-document/td180vol1_en.pdf, 2.

9 United Nations General Assembly, Resolution 3201 (S-VI), Declaration on the Establishment of a New International Economic Order, A/RES/S-6/3201 (1 May 1974), https://digitallibrary.un.org/record/218450?ln=en.

10 United Nations Environment Programme, Cocoyoc Declaration adopted by the participants in the UNEP/UNCTAD Symposium on ‘Patterns of Resource Use, Environment and Development Strategies’ held at Cocoyoc, Mexico, A/C.2/292 (8–12 October 1974), https://digitallibrary.un.org/record/838843?ln=en.

11 For more on the disarticulation of production, see Tricontinental: Institute for Social Research’s working document no.1, In the Ruins of the Present (2018),https://thetricontinental.org/working-document-1/.

12 United Nations General Assembly, Resolution 35/56, International Development Strategy for the Third United Nations Development Decade, A/RES/56/33 (5 December 1980), https://digitallibrary.un.org/record/18892?ln=en.

13 United Nations General Assembly, Resolution 35/56, International Development Strategy for the Third United Nations Development Decade, A/RES/56/33 (5 December 1980), https://digitallibrary.un.org/record/18892?ln=en.

14 John Toye, Dilemmas of Development: Reflections on the Counter-Revolution in Development Theory and Policy (Oxford: Blackwell, 1987); Vijay Prashad, The Poorer Nations: A Possible History of the Global South (London: Verso, 2012).

15 आयात प्रतिस्थापन का तात्पर्य घरेलू उद्योग के उत्पादन, सरंक्षण और सुरक्षा के हित में विदेशी आयात की जगह घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने वाली आर्थिक रणनीति से है। निर्यात प्रोत्साहन का तात्पर्य ऐसी आर्थिक रणनीति से है जो उन वस्तुओं के निर्यात करने प्राथमिकता देती है जिसमें किसी देश के पास तुलनात्मक सुलाभ होता है तथा यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अधिकाधिक खुला रखने की हिमायती होती है।

16 World Bank, World Development Report 1990: Poverty, (New York: Oxford University Press, 1990); United Nations General Assembly, Resolution 45/199, International Development Strategy for the Fourth United Nations Development Decade, A/RES/45/199 (21 December 1990), https://digitallibrary.un.org/record/105649?ln=en, 126.

17 United Nations Economic and Social Council, 1993 Report on the World Social Situation: Addendum, E/1993/50/Add.1 (12 January 1993), https://digitallibrary.un.org/record/171302?ln=en, 45.

18 World Bank, The East Asian Miracle: Economic Growth and Public Policy (Washington D. C.: World Bank, 1993); Joseph Stiglitz, ‘Some Lessons of the East Asian Miracle’, World Bank Research Observer 11, no. 2 (August 1996). For more, see studies by the Korea Development Institute.

19 Prabhat Patnaik, ‘Diffusion of Activities and the Terms of Trade’ in Accumulation and Stability Under Capitalism (New York: Oxford University Press, 1997).

20 Adjustment in Africa: Reforms, Results, and the Road Ahead (Washington, DC: World Bank, 1994).

21 World Bank, World Development Report 1996: From Plan to Market (New York: Oxford University Press, 1996), http://openknowledge.worldbank.org/handle/10986/5979;?locale-attribute=fr.

22 For more on the eradication of absolute poverty in China, see Tricontinental: Social Institute for Research’s first study on socialist construction, Serve the People: The Eradication of Extreme Poverty in China, (2021), https://thetricontinental.org/studies-1-socialist-construction/.

23 A useful start is provided by the seven-volume series titled Five Years of the Belt and Road Initiative, published by Chongyang Institute for Financial Studies of Renmin University of China and Foreign Language Press (2019) and New Silk Road, New Thinking, a collection published by Foreign Language Press (2018).

24 Vijay Prashad, John Bellamy Foster, John Ross, and Deborah Veneziale, The United States Is Waging a New Cold War: A Socialist Perspective (Tricontinental: Institute for Social Research, Monthly Review, and No Cold War, 13 September 2022), https://thetricontinental.org/the-united-states-is-waging-a-new-cold-war-a-socialist-perspective/. For more details, see https://nocoldwar.org/.

25 Samir Amin, ‘The Challenge of Globalisation’, Review of International Political Economy, vol. 3, no. 2, Summer 1996. Also see Tricontinental: Institute for Social Research’s notebook no. 1, Globalisation and Its Alternative: An Interview with Samir Amin (2018).

26 Stockholm International Peace Research Institute, ‘World Military Expenditure Passes $2 Trillion for First Time,’ SIPRI, 25 April 2022, https://www.sipri.org/media/press-release/2022/world-military-expenditure-passes-2-trillion-first-time#:~:text=Military%20expenditure%20reaches%20record%20level,consecutive%20year%20that%20spending%20increased.

27 Vijay Prashad, ‘History has not ended: An assessment of the Culture of Information Production’, Keynote address, East China Normal University, Shanghai, 4 May 2023.

28 ALBA-TCP, Tricontinental: Institute for Social Research and Simón Bolívar Institute, A Plan to Save the Planet, 24 November 2021,

 

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