युवा एक भविष्य चाहते हैं: उनतालीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
युवा आंदोलनों के पीछे एक कड़वा सच है: मौजूदा आर्थिक व्यवस्था पूँजी की रक्षा करते हुए युवाओं से गरिमामय रोज़गार और बेहतर भविष्य का सपना छीन लेती है।
द बुल (बढ़ता हुआ फ़ासीवाद), व्लादिमीर लीसेंको (यूएसएसआर), 1929
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
पिछले दो सालों में दुनिया भर में युवा अपनी माँगों के साथ सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं। केन्या से नेपाल, इंडोनेशिया से फ़िलिपींस तक, मेडागास्कर से मोरक्को और पेरू तक युवा आंदोलन खड़े हुए। पत्रकारों ने इन्हें ‘जेन-ज़ी’ का नाम दिया, जैसे कि ये कोई मार्केट सेग्मेंट हो। इस शब्द से प्रदर्शनकारियों की कम उम्र, डिजिटल प्लैटफॉर्मों के साथ उनकी सहजता और स्थापित राजनीतिक संस्थाओं को लेकर उनके असंतोष का संकेत मिलता है। लेकिन यह हमारे समय की राजनीति के बारे में जितना बताता है, उससे कहीं अधिक चीज़ों को छिपा भी लेता है।
एक पीढ़ी एक वर्ग नहीं होती – युवा पीढ़ी के सामाजिक-आर्थिक अनुभव अलग-अलग होते हैं। इसके अतिरिक्त इन प्रदर्शनों के अपने-अपने इतिहास हैं। जून 2024 में केन्या में हुए विरोध प्रदर्शन का तात्कालिक कारण एक वित्त विधेयक था जिससे ऋण और सरकारी ख़र्च में कटौती का बोझ मज़दूर वर्ग पर डाल दिया जाता। सितंबर 2025 में मोरक्को में हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह थी सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणाली का बर्बाद होना जबकि 2030 फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की तैयारियों में बेइंतहा धन लगाया जा रहा है। इसी महीने में मेडागास्कर में पीने योग्य पानी और बिजली न मुहैया करवाने को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए। पेरू में सितंबर और अक्टूबर 2025 में प्रदर्शन हुए जिनके निशाने पर थे राजनीतिक सत्ता, संगठित अपराध, और एक पेन्शन व्यवस्था जो युवाओं से पैसे तो ले रही थी लेकिन उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करती। ये प्रदर्शन एक जैसे नहीं लेकिन इनमें एक साझा भावना थी: स्टेडियमों के लिए पैसे हैं लेकिन अस्पतालों के लिए नहीं, विदेशी करदाताओं को देने के लिए धन है लेकिन युवाओं को रोज़गार देने के लिए नहीं, पुलिस के लिए पैसे हैं पर स्कूलों के लिए नहीं।
आमतौर पर भ्रष्टाचार शब्द को बहुत उछाला जाता है लेकिन इसके नीचे एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो भविष्य को बर्बाद करती है।
पहला अक्षर, इब्राहिम एल-सलाही (सूडान), 1960
इनमें से कई प्रदर्शनों में जापानी मंगा वन पीस का समुद्री डाकू वाला झंडा दिखाई दिया। यह एक दिलचस्प प्रतीक है: यह मंगा ऐसे युवाओं के एक समूह की कहानी है, जो ताक़तवर लोगों के एकाधिकार में मौजूद ख़जाने की तलाश में समुद्र की यात्रा पर निकलते हैं और ऐसी विश्व सरकार का सामना करते हैं, जो कानूनसम्मत होने का दावा तो करती है, लेकिन हिंसा का सहारा लेती है। यह झंडा कोई राजनीतिक कार्यक्रम पेश नहीं करता, लेकिन एक भावना ज़रूर व्यक्त करता है: मौजूदा व्यवस्था एक छलावा है और उससे बाहर निकलकर किसी नए रोमांच की तलाश अब ज़रूरी हो गई है। युवा मानो कह रहे हों, ‘आओ, भविष्य की तलाश में खुले समुद्र की ओर निकल चलें—ऐसे भविष्य की, जो वर्तमान जितना निराशाजनक न हो!’
इस भावना का भौतिक आधार अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट में साफ़ दिखाई देता है। इस रिपोर्ट का नाम है ग्लोबल एम्प्लॉयमेंट ट्रेंड्स फ़ॉर यूथ 2026: बैक टू द फ़्यूचर। साल 2023 में दो दशकों में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँचने के बाद 2025 में 15 से 24 के आयुवर्ग के लोगों में बेरोज़गारी दर बढ़कर 12.4% हो गई। दूसरे शब्दों में इसका मतलब है कि 6.7 करोड़ युवा सक्रिय रूप से काम तलाश रहे थे लेकिन उन्हें रोज़गार नहीं मिला। दुनिया के ग्यारह में से आठ उप-क्षेत्रों में 2023 से 2025 के बीच युवाओं में बेरोज़गारी बढ़ी। लेकिन बेरोज़गारी दर से सिर्फ़ एक पहलू पता चलता है, क्योंकि यह उन लोगों को शामिल नहीं करती जिन्होंने काम ढूँढना ही बंद कर दिया है। इसलिए NEET (भारत में होने वाली NEET परीक्षा नहीं) से सच्चाई ज़्यादा निकलकर आती है: ऐसे युवा जो ‘न नौकरी कर रहे हैं, न पढ़ाई या प्रशिक्षण’। साल 2025 में 25.7 करोड़ युवा – हर पाँच में से एक – इस श्रेणी में थे, साल 2023 से 90 लाख ज़्यादा।
नेपाल माता, लैन सिंह बांगदेल (नेपाल), 1979
इस ठंडे-से संक्षिप्त नाम के पीछे ऐसी ज़िंदगियाँ हैं, जो अधर में लटकी हुई हैं। एक युवा स्कूल पूरा करता है, महीनों तक रोज़गार की तलाश करता है, और उसे पता चलता है कि नौकरियाँ हैं ही नहीं। यह तलाश ख़त्म करके वो आख़िर अपने घर लौट जाता है, और उसकी शादी, बच्चे या एक स्वतंत्र जीवन की संभावना आगे खिसक जाती है। वक़्त गुज़रता है लेकिन ज़िंदगी वहीं ठहरी रहती है। यह बोझ भी एक जेंडर पर ज़्यादा पड़ता है। युवा महिलाओं में NEET दर 27.4% है यानी युवा पुरुषों की 13.1% के दोगुने से ज़्यादा। ऐसा इसलिए नहीं कि महिलाओं में शिक्षा की कमी है, बल्कि अवैतनिक देखभाल का काम, भेदभाव और ठीक-ठाक नौकरियों के अभाव की वजह से वे आर्थिक जीवन से बाहर हो जाती हैं।
अरब देशों और उत्तरी अफ़्रीका में, लगभग एक-तिहाई युवा NEET श्रेणी में आते हैं। उप-सहारा अफ़्रीका में युवाओं में बेरोज़गारी की आधिकारिक दर कम दिखती है, यानी 8.4%। हालाँकि इससे साबित यह होता है कि ग़रीबी की वजह से लोग असंगठित क्षेत्र की ओर जाने को मजबूर हुए हैं, न कि यह कि बहुत रोज़गार मौजूद है। युवा लोगों को या तो असंगठित क्षेत्र में पहले से मौजूद काम करना पड़ता है या ऐसा ही कोई काम ख़ुद शुरू करना पड़ता है। निम्न और निम्न-मध्य आय वाले देशों में हर दस में से नौ युवा असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं, जहाँ सामाजिक और रोज़गार सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं है। आमतौर पर कहा जाता है कि शिक्षा मौजूदा समस्याओं से उबरने की सीढ़ी है। इसलिए लोग उधार लेकर पढ़ाई करते हैं, शैक्षणिक योग्यता हासिल करते हैं और कभी-कभार दूसरी जगह भी जाते हैं। लेकिन वहाँ उन्हें जो मिलता है उसे आईएलओ ने मध्य-स्तरीय कौशल आधारित रोज़गार का ‘खोखला होते जाना’ कहा है। मालिक पहली बार काम की तलाश करने वालों से अनुभव माँगता है, वहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफ़िशल इंटेलिजेन्स) ने कुछ ऐसी शुरुआती स्तर की नौकरियों को संकट में डाल दिया है जिनसे अनुभव अर्जित किया जाता था। शिक्षा ने तो उम्मीद बढ़ा दी, लेकिन अर्थव्यवस्था इन उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पा रही।
आलिंगन, नोए कंजूरा (अल साल्वाडोर), 1950
युवाओं के इस मोहभंग को राजनीतिक अर्थशास्त्र से पूरी तरह कटा हुआ एक मानसिक स्वास्थ्य का संकट कह देना नाकाफ़ी है। यूनीसेफ से जुड़े 2025 के 5,600 से ज़्यादा युवाओं के एक सर्वे ने पाया कि दस में से छह युवा मौजूदा स्थिति की वजह से दबाव महसूस कर रहे हैं, जबकि इनमें से सिर्फ़ आधे जानते हैं कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य के लिए कहाँ से सहायता मिल सकती है। फिर भी 60% ने कहा कि वे उम्मीद का दामन थामे हैं और एक बेहतर भविष्य गढ़ने में मदद करना चाहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट है कि दुनिया भर में छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन से जूझ रहा है, यह दर 13 से 29 आयुवर्ग के व्यक्तियों के बीच 17 से बढ़कर 21% हो गई है। आम धारणा के विपरीत, निम्न आय वाले देशों में अकेलेपन का अनुभव ज़्यादा किया जा रहा है। अकेलेपन का संबंध सिर्फ़ मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) और घबराहट से ही नहीं बल्कि कम आय, अपर्याप्त सार्वजनिक आधारभूत ढाँचे, और शिक्षा तथा रोज़गार से बाहर कर दिए जाने की स्थिति से भी है।
अकेलेपन का मतलब सिर्फ़ अपने पास किसी का न होना नहीं है; इसका मतलब यह भी है कि कोई व्यक्ति समाज के लिए कितना ग़ैर-ज़रूरी है। एक स्मार्टफ़ोन के ज़रिए एक युवा व्यक्ति हज़ारों लोगों से जुड़ा हुआ हो सकता है लेकिन उन संस्थानों से कटा हुआ है जो उसके लिए एक गरिमामय जीवन सुनिश्चित कर सकते हैं: जैसे काम की जगह, यूनियन, स्थानीय संगठन, सांस्कृतिक केंद्र, और एक राजनीतिक संगठन। इस लिहाज़ से बाज़ार ने संचार का माध्यम तो दिया लेकिन वह समुदाय नहीं जिसके बीच बातचीत हो, उसने दिखने का ज़रिया तो दिया पर आत्म-निर्णय का अधिकार नहीं।
शीर्षकहीन, पीटरसन कमवाथी (केन्या), 2020
यह अकेलापन अनिश्चितता की एक व्यापक स्थिति से और गहरा हो जाता है। पूँजी की भाषा में बात करने वाली संस्थाएँ भी इस अस्थिरता को दर्ज करती हैं। वर्ल्ड अनसर्टेन्टी इंडेक्स उन देश-रिपोर्टों में ‘अनिश्चितता’ शब्द के उल्लेखों की संख्या दर्ज करता है, जिन्हें इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट तैयार करती है। यह एक शोध संस्था है, जिसकी सेवाओं का इस्तेमाल कंपनियाँ, वित्तीय संस्थाएँ और सरकारें करती हैं। इस सूचकांक में उछाल युद्धों, वित्तीय संकटों, महामारियों, राजनीतिक उथल-पुथल और व्यापारिक टकरावों के समय दिखाई देता है—यानी उन्हीं संकटों के दौरान, जो लाखों लोगों के रोज़मर्रा के जीवन को असुरक्षित और अनिश्चित बना देते हैं।
लेकिन पूँजी के द्वारा गिनी गई इस अनिश्चितता का अनुभव श्रमिक वर्ग बहुत ही अलग रूप से करता है। वित्त मुहैया करवाने वालों के लिए अनिश्चितता का मतलब है कि उनके किसी निवेश का मूल्य गिर जाएगा, लेकिन एक युवा मज़दूर के लिए इसका मतलब है कि उसके पास अलगे महीने रोज़गार रहेगा या नहीं वह नहीं जानता, क्या वह घर का किराया दे पाएगा, क्या वह भोजन जुटा पाएगा, या क्या जंग या जलवायु संकट से उसका घर तो तबाह नहीं हो जाएगा। शासक वर्ग अनिश्चितता का निर्माण भी करता है और उसकी गणना भी।
लाल चाँद वाला ब्रह्मांड, क्लारा लेदेस्मा (डोमिनिकन गणराज्य), 1971
कथित ‘जेन-ज़ी’ विद्रोह दरअसल एक ऐसी पीढ़ी का आगमन है जिसका भविष्य बर्बाद कर दिया गया है। उनका विद्रोह फ़िलहाल एक संगठित कार्यक्रम नहीं है। अचानक से उभरा ग़ुस्सा या तो एकजुटता और सामाजिक पुनर्संरचना की ओर जा सकता है या इस पर नकारात्मकता, अंधराष्ट्रीयता और चरम दक्षिण-पंथ हावी हो सकते हैं। अहम सवाल यह है कि क्या स्थिर संगठन स्क्रीन से पैदा हुए अकेलेपन को समूहिकता के संघर्ष में बदल सकते हैं या नहीं।
इन विरोध प्रदर्शनों के साथ-साथ कवियों और कलाकारों का एक वर्ग भी उभरा है: हमज़ा रैद और एल महदी ल्यूबी (मोरक्को से), एदुआर्दो रुइज़ साएन्स (पेरू से) – जो 2025 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा मारे गए – और केन्या से कवि जवान। जवान की 2019 की कविता, ‘किलर ब्रीड’ (Killer Breed), युवाओं के दृढ़ संकल्प को अपने में क़ैद करती है। यह कविता – जो शेंग में लिखी गई है, केन्या की शहरी बोली जो किस्वाहिली, अंग्रेज़ी, और अन्य केन्याई भाषाओं को मिलाती है – उस हिंसा के बारे में है, जो एक हठी और बर्बाद होते राज्य द्वारा युवा विद्रोहियों पर थोपी जाती है:
| Citizens na law no love, land cruisers zimekuwa hearse Kuferry body bags forest grounds zimeja body parts Si watu Ni animals Kwa killer squads’ Poo poo kushoot na kutoa bullets kwa throats Alafu Kwa media wanakuwa applaused Hakuna light Kwa end ya tunnel iko closed Hakuna change Kwa youth heart yake imekuwa stopped Hakuna justice Kwa years za cases ziko paused Nikupe ID? Wee ukifichia eyewitness badge number Kwa crime scene openly identity unaseal Inamean hauko right system Ni dark haina light Si na guns but our voices zita challenge your might. Juu Wewe Na Wewe Na Wewe Na Wewe Si Enforcers Wewe Ni killer breed Wewe Ni Killer breed Wewe ni killer breed | नागरिक और क़ानून: इनमें कोई प्रेम नहीं। लैंड क्रूज़र अर्थियों में तब्दील हो गई हैं, जो लाशें ढो रही हैं। जंगलों की ज़मीन शरीर के चीथड़ों से पटी हुई हैं। खूनी दस्तों में जाते हैं, इंसान नहीं, बल्कि जानवर। पू! पू! उन्होंने बंदूक़ चला दी, हलक़ से निकाली गोलियाँ। फिर मीडिया में तालियाँ बजाईं। सुरंग के दूसरे छोर पर कोई रौशनी नहीं; सुरंग ही बंद कर दी गई है। युवाओं के लिए कोई बदलाव नहीं: उनकी धड़कनें रोक दी गई हैं। कोई न्याय नहीं: उनके मुक़दमें सालों के लिए स्थगित कर दिया गए हैं। मैं तुम्हें अपना पहचान पत्र दूँ? जबकि तुम छिपाते हो चश्मदीद से अपना बैज नंबर। वारदात की जगह पर, तुम खुलकर अपनी पहचान छिपाते हो। यानी सच तुम्हारी ओर नहीं है। व्यवस्था अंधकार में है; इसके पास रौशनी नहीं। हमारे पास बंदूक़े न सही, लेकिन हमारी बुलंद आवाज़ तुम्हारी शक्ति को चुनौती देगी। क्योंकि तुम, और तुम, और तुम: तुम क़ानून लागू करने वाले नहीं। तुम एक खूनी प्रजाति हो। तुम एक खूनी प्रजाति हो। तुम एक खूनी प्रजाति हो। |
स्नेह सहित,
विजय