Skip to main content

हम अपनी क्रांतिकारी परंपराओं की जड़ों तक पहुँचते हैं: पैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)

साम्राज्यवाद अगर ज्ञान, तकनीक और कला को अधीनता के औज़ार बना सकता है, तो उत्पीड़ित जनता इन्हें अपने हाथ में लेकर मुक्ति के हथियारों में बदल सकती है।

क़ब्ज़े के बीच रस्में, सलमान मंसूर (फ़िलिस्तीन), 1988

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

फ़िलिस्तीनी मुक्ति के एक सौम्य और सहृदय चित्रकार सलमान मंसूर (1947-2026) की याद में।

जनवरी 1968 में सत्तर देशों के 470 प्रतिनिधि हवाना के सांस्कृतिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए क्यूबा पहुँचे। वे अलग-अलग तरह की परिस्थितियों वाले देशों से आए थे—कुछ युद्ध में उलझे हुए थे, कुछ समाजवादी व्यवस्था के निर्माण में लगे थे, कुछ उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे थे, और कुछ साम्राज्यवादी शक्तियों के केंद्र थे, जहाँ बुद्धिजीवियों ने सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करना शुरू कर दिया था। वियतनाम उस समय धरती की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताक़त से संघर्ष कर रहा था। तीन महीने पहले चे ग्वेरा की हत्या ने इस विश्वास को ख़त्म नहीं किया था कि साम्राज्यवाद को हराया जा सकता है बल्कि इस विश्वास को और अधिक मज़बूत कर दिया था।

इन प्रतिनिधियों ने यह समझ लिया था कि साम्राज्यवाद सिर्फ़ बंदूकों और बैंकों से नहीं चलता। यह तो स्कूलों, रेडियो स्टेशनों, प्रयोगशालाओं, संग्रहालयों और कल्पना पर भी क़ब्ज़ा कर लेता है। यह उपनिवेशवाद झेल रहे लोगों को सिखाता है कि वे अपने इतिहास को पिछड़ा हुआ मानें, अपनी भाषाओं को क्षेत्रीय भाषाएँ समझें और अपनी लोकप्रिय कलाओं को ऐसे कच्चे माल के रूप में देखें जिसे महानगरों में तराशे जाने की ज़रूरत है। इस मशीनरी के विरुद्ध इस कांग्रेस ने उस चीज़ का आह्वान किया जिसे फ़िदेल कास्त्रो ने ‘सांस्कृतिक क्षेत्र का एक वियतनाम’ कहा था: यानी उन साधनों के लिए एक संगठित संघर्ष जिनके माध्यम से इंसान ख़ुद को और अपनी शक्ति को समझता है। हमारा नवीनतम डोसियर ए वियतनाम इन द फ़ील्ड ऑफ़ कल्चर: द कल्चरल कांग्रेस ऑफ़ हवाना, 1958 (अगस्त 2026) का शीर्षक कास्त्रो के ही शब्दों से लिया गया है और यह उस कांग्रेस की 100वीं वर्षगाँठ पर इसे याद करता है।

हवाना का सांस्कृतिक सम्मेलन हमें इस न्यूज़लेटर के विषय – क्रांतिकारी परंपराओं – पर चर्चा करने का आधार प्रदान करता है। क्रांतिकारी परंपरा अतीत की पूजा-अर्चना नहीं है। क्रांतिकारी शब्द लैटिन शब्द ‘रेडिक्स’ या ‘जड़’ से आया है। जड़ तक जाना, उन संघर्षों को खोजना है जिन्होंने किसी राष्ट्र के विचार और सौंदर्य को जन्म दिया, और उनकी अधूरी संभावनाओं को वर्तमान में संजोना है। परंपरा वह नहीं है जो अपरिवर्तित रहती है। यह वह है जिसे लोग निरंतर नया रूप देते हैं, क्योंकि वे अपनी मनुष्यता को साकार करने और प्रकृति के विनाश के बजाय उसके भीतर फलने-फूलने के लिए संघर्ष करते हैं।

इस दौर में इस क्रांतिकारी परंपरा का एक स्पष्ट उदाहरण विलियम शेक्सपियर के नाटक द टेम्पेस्ट (1610–1611) के ग़ुलाम पात्र कैलिबन को उपनिवेशवाद-विरोधी दृष्टि से नए रूप में प्रस्तुत करने से सामने आया। कैरेबियन और लैटिन अमेरिका में, कैलिबन किसी अछूते अतीत में लौटने के बारे में नहीं, बल्कि उस चीज़ को – जो उपनिवेशवाद ने थोपी थी – भाषा, साहित्य, और ज्ञान को औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ हथियारों में बदलने का एक तरीक़ा बन गया। दो कृतियों ने इस उपनिवेश-विरोधी पाठ को और धार दी: एमे सीज़ेयर का नाटक ए टेम्पेस्ट (1969) और रॉबर्टो फर्नांडीज़ रेटामार का निबंध कैलिबन (1971)। शेक्सपियर के नाटक में, प्रॉस्पेरो (यूरोपीय सभ्यता) एक द्वीप पर क़ब्ज़ा करता है, कैलिबन (उपनिवेशित) को ग़ुलाम बनाता है, और उसे भाषा सिखाता है ताकि उसे आदेश दिया जा सके। सीज़ेयर उस औपनिवेशिक आदेश से कैलिबन के इनकार को नाटकीय रूप देता है। उसका कैलिबन ख़ुद को X पुकारे जाने की माँग करता है – जो उसके नाम को मिटाने वाली हिंसा और उस स्वतंत्रता दोनों को इंगित करता है, जिसे वह हासिल करना  चाहता है। सीज़ेयर प्रॉस्पेरो और कैलिबन को एक बिगड़ती औपनिवेशिक दुनिया में बंद छोड़ देता है: प्रॉस्पेरो ख़ुद की कल्पना उस प्रजा के बिना नहीं कर सकता, जिस पर वह हावी है; जबकि कैलिबन का उपनिवेशित होने से इनकार उसकी दुनिया को चकनाचूर कर देता है। कैलिबन प्रॉस्पेरो की व्यवस्था के भीतर बेहतर प्रतिनिधित्व नहीं माँगता; वह उस व्यवस्था को ही चुनौती देता है। रेटामार के लिए, कैलिबन लैटिन अमेरिकी सभ्यता के किनारे पर पड़ी कोई शर्मनाक छाया नहीं है; वह उसके उपनिवेशित लोग हैं। प्रॉस्पेरो ने उसकी भूमि पर आक्रमण किया, उसके पूर्वजों को मार डाला, उसे ग़ुलाम बनाया, और उस पर एक भाषा थोपी। रेटामार पूछता है कि कैलिबन कर ही क्या सकता है, सिवाय इसके कि उसी भाषा का उपयोग करके प्रॉस्पेरो को श्राप दे?

श्राप तो केवल शुरुआत है। कैलिबन केवल उपनिवेशवादी भाषा को अस्वीकार नहीं करता; वह उसे छीन लेता है। साम्राज्यवादी केंद्रों में संचित विज्ञान, तकनीक, साहित्य और राजनीतिक अवधारणाएँ उपनिवेश बनाई गई दुनिया से निकाली गई संपत्ति और श्रम से संभव हुई थीं। रेटामार इस विचार को अस्वीकार करते हैं कि वे स्वाभाविक रूप से पश्चिम की हैं। उन पर फिर से दावा करना अनुकरण नहीं, बल्कि प्रत्यर्पण है। उन्हें पुनः प्राप्त करना उस दुनिया की जड़ों को खोदना है, जिसे उपनिवेशवाद ने एकाधिकार में लेने की कोशिश की थी – और उसके साधनों को मुक्ति की ओर मोड़ना है। कैलिबन आदेश की भाषा को विद्रोह की भाषा में – उस मौलिक परंपरा में बदल देता है, जिसे हम संजोकर रखते हैं। मैंने रेटामार के निबंध और इसकी पृष्ठभूमि के बारे में टैंक मैगज़ीन से लगभग एक घंटे की एक चर्चा की।

इक्वाडोर का स्वप्न, कैमिलो एगास (इक्वाडोर), 1939

किसे तर्क के लिए खड़े होने की अनुमति है और किसे भावना तक सीमित रखा जाता है? हवाना में, यह कोई अमूर्त प्रश्न नहीं था। नीग्रिटूड  (1930 के दशक में उभरा एक दार्शनिक, साहित्यिक और राजनीतिक आंदोलन जो ब्लैक पहचान को प्रोत्साहित और यूरोपीय उपनिवेशवाद का विरोध करता है) पर बहसों ने इस समस्या का सीधे सामना किया। रेने देपेस्त्र ने लियोपोल्ड सेनघोर के उस सूत्रीकरण – ‘भावना ब्लैक है, जैसे तर्क श्वेत है’ – को उस ख़तरे का उदाहरण बताया, जो एक उपनिवेश-विरोधी सांस्कृतिक विद्रोह के सामने खड़ा है। देपेस्त्र ने नीग्रिटूड की मूल प्रस्थापना – ब्लैक-अफ्रीकी संस्कृतियों के नस्लीय अमानवीकरण के ख़िलाफ़ – का सम्मान किया; लेकिन चेतावनी दी कि, जब इसे वर्ग-संघर्ष से अलग कर दिया जाता है, तो यह नस्लीय सारतत्ववाद (racial essentialism) में बदल सकता है और प्रतिक्रियावादी अभिजात वर्ग द्वारा क़ब्ज़ाया जा सकता है। हैती में, फ़्राँस्वा डुवालिए के ‘नॉइरिस्म’ (noirisme) ने ब्लैक संस्कृति की रक्षा को एक राज्य-विचारधारा में बदल दिया था, जिसने ब्लैक प्रामाणिकता के नाम पर लोगों और वामपंथ को आतंकित किया। इसलिए कांग्रेस ने उदारवादी समावेशन (liberal assimilation) और नस्लीय सारतत्ववाद – दोनों को अस्वीकार कर दिया। नस्लवाद को कुछ ग़ुलाम बनाए गए लोगों को मालिक के घर में प्रवेश देकर या औपनिवेशिक श्रेणियों को स्थायी सत्य में बदलकर हराया नहीं जा सकता है। इसके लिए उन भौतिक संबंधों में परिवर्तन की आवश्यकता थी, जो नस्ल को निरंतर एक पदानुक्रम (hierarchy) के रूप में पुनरुत्पादित करते हैं।

हालाँकि, यह मौलिक परंपरा उन रचनाओं में भी दिखाई देती है, जिनकी राजनीति सीमित या अनिर्णीत रह जाती है। ऑक्टावियो पाज़ की पुस्तक द लैबिरिंथ ऑफ सॉलिट्यूड (1950), जो हवाना की क्रांतिकारी राजनीति से बहुत दूर लिखी गई थी, मुखौटों, चुप्पियों, त्योहारों और अकेलेपन के माध्यम से मैक्सिको के औपनिवेशिक दंश को समझने की कोशिश करती है। यह उस समाज में विकसित छिपाव और दूसरों से दूरी बनाए रखने की आदतों की पड़ताल करती है, जिस पर विजय और औपनिवेशिक दमन की गहरी छाप थी।। पाज़ समझते थे कि विजय और औपनिवेशिक शासन का असर व्यक्ति की सोच और आत्म-बोध के भीतर भी बना रहता है। उपनिवेशित और उत्तर-औपनिवेशिक व्यक्ति मुखौटा इसलिए नहीं पहनता कि उसके भीतर कुछ नहीं है, बल्कि इसलिए कि इतिहास ने अपने वास्तविक रूप को सामने लाना उसके लिए जोख़िम भरा बना दिया है। अकेलापन एक ओर पीड़ा बन जाता है, तो दूसरी ओर बचाव का साधन भी। लेकिन यह भूलभुलैया केवल मनोवैज्ञानिक नहीं है, क्योंकि इसकी दीवारें विजय और औपनिवेशिक दमन, नस्ली ऊँच-नीच, वर्गीय सत्ता और आधुनिकता के साथ मैक्सिको के अब तक अनसुलझे संबंधों से बनी हैं। उग्र परंपरा की शुरुआत वहीं से होती है, जहाँ पाज़ का विश्लेषण अपनी सीमा तक पहुँच जाता है—अर्थात् जहाँ सामूहिक संघर्ष अकेलेपन को तोड़ देता है। किसान सभा, हड़ताल समिति, साक्षरता अभियान, रंगमंच कार्यशाला और सामुदायिक रेडियो केंद्र केवल पहले से मौजूद जनता की अभिव्यक्ति नहीं करते, बल्कि एक नई जनता को गढ़ने में भी मदद करते हैं। पाज़ का विश्लेषण भी अंततः इसी तथ्य की ओर संकेत करता है।

ट्लाटेलोल्को का जनसंहार, बेंजामिन सिल्वा (ब्राजील), 1968

इसी से संबंधित एक प्रश्न ईरान में जलाल अल-ए अहमद (1923–1969) के साहित्य के माध्यम से उभरा: बिना साम्राज्यवादी शक्ति की श्रेणियों और निर्भरताओं के अधीन हुए कोई आधुनिक ज्ञान को कैसे ग्रहण कर सकता है? अल-ए-अहमद का राजनीतिक सफ़र तुदेह पार्टी के कम्युनिस्ट परिवेश से शुरू हुआ, लेकिन बाद में वे धार्मिक प्रभाव वाले साम्राज्यवाद-विरोध की ओर बढ़े। 1962 में उनकी विचारोत्तेजक पुस्तक घरबज़देगी प्रकाशित हुई। इसके शीर्षक का अंग्रेजी में अक्सर वेस्टॉक्सिकेशन, ऑक्सिडेंटोसिस या वेस्टस्ट्रकनेस के रूप में अनुवाद किया जाता है। ईरान में यह पुस्तक व्यापक रूप से पढ़ी गई, यहाँ तक कि उलेमा (धर्मगुरुओं) के कुछ वर्गों के बीच भी। अल-ए-अहमद ने इसमें ऐसे समाज का चित्रण किया जो पश्चिम से इस हद तक प्रभावित हो चुका था कि समस्या केवल विदेशी वस्तुओं के आयात तक सीमित नहीं थी। समाज ने पश्चिम के विचारों और दृष्टिकोणों को भी इस तरह अपना लिया था, जैसे वे उसके लिए ऑक्सीजन हों। इसका नतीजा एक तरह की सभ्यतागत दुर्गंध थी—नकल, निर्भरता और अपने ही समाज से अलगाव की बासी साँस। तकनीक तो आ जाती है, लेकिन उसे अपने हित में दिशा देने की सामाजिक क्षमता विकसित नहीं होती। स्थानीय अभिजात वर्ग आयातित वस्तुओं और बाहर से आई इच्छाओं का बिचौलिया बन जाता है, और लोगों को यह महसूस करना सिखा दिया जाता है कि उनकी अपनी दुनिया में ही कुछ कमी है।

अल-ए-अहमद की यह वैचारिक रचना अतीत के किसी ऐसे शुद्ध और बाहरी प्रभाव से अछूते रूप की ओर लौटने की रोमानी कोशिश के रूप में पढ़ी जा सकती थी, लेकिन उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण बात कुछ और थी। वे चाहते थे कि हम अपनी परंपराओं को स्वीकार करें और साथ ही आधुनिक दुनिया की ज़रूरतों के अनुसार उन्हें नए और अधिक परिवर्तनकारी रूप में विकसित करें। यहीं आकर अल-ए-अहमद का सवाल हवाना में उठे सवालों से जुड़ जाता है। सम्मेलन ने विज्ञान या तकनीक को केवल इसलिए ख़ारिज़ नहीं किया कि वे पश्चिम से आई थीं। इसके बजाय उसने सवाल उठाया कि इन पर अधिकार किसका है, इन्हें किन उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इन्हें संभव बनाने वाला श्रम किसका है। प्रतिनिधियों ने उन डॉक्टरों का उदाहरण दिया, जिन्हें तीसरी दुनिया के देशों में सार्वजनिक धन से प्रशिक्षित किया जाता है, लेकिन बाद में साम्राज्यवादी केंद्र उन्हें अपने हित में इस्तेमाल करने के लिए वहाँ से खींच लेता है। उन्होंने स्थानीय ज्ञान के उस शोषण की भी चर्चा की, जिसे ‘वैज्ञानिक कच्चे माल’ की तरह इकट्ठा किया जाता है और फिर नीति-निर्माण, निगरानी तथा सैन्य हस्तक्षेप के रूप में तैयार करके वापस लौटाया जाता है। इसलिए ऑक्सिडेंटोसिस का जवाब अतीत की शुद्धता की ओर लौटना नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता स्थापित करना है—यानी आधुनिक ज्ञान को सामूहिक रूप से अपने नियंत्रण में लेना, उसे सामाजिक ज़रूरतों के अनुसार दिशा देना और इसी प्रक्रिया में समाज को भी बदलना।

मिनोटौर भले लोगों को डराता है, बहमान मोहस्सेस (ईरान), 1966

हवाना में प्रतिनिधित्व कर रहे मुक्ति आंदोलनों ने इस संप्रभुता को पहले से ही व्यवहार में उतारना शुरू कर दिया था। उन्होंने दिखाया कि संस्कृति ऐसी चीज़ नहीं है जिसे अलग-थलग रखकर केवल सुरक्षित किया जाए या मुक्ति हासिल होने के बाद के लिए टाल दिया जाए। इसके बजाय, संस्कृति स्वयं मुक्ति के निर्माण का एक माध्यम थी। वियतनाम में राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे की मासिक रिपोर्टों में सैन्य जीतों के साथ-साथ उन लोगों की संख्या भी दर्ज की जाती थी, जिन्हें निरक्षरता से मुक्ति मिली थी। वहीं, बमबारी के बीच तहखानों में सिनेमा की टीमें काम करती थीं। गिनी-बिसाऊ, अंगोला और मोज़ाम्बिक के मुक्त क्षेत्रों में औपचारिक स्वतंत्रता मिलने से पहले ही स्कूल, मुद्रणालय, कलाकारों की कार्यशालाएँ और क्रांतिकारी गीत एक नए समाज की नींव तैयार कर रहे थे।मुक्ति स्वयं संस्कृति का एक कर्म थी।

यही समझ लोटस के पीछे भी काम कर रही थी। मार्च 1968 में पहली बार अफ्रो-एशियन राइटिंग्स नाम से प्रकाशित हुई यह पत्रिका उस सांस्कृतिक ढाँचे को विकसित करने में मददगार बनी, जिसकी आवश्यकता हवाना कांग्रेस ने बताई थी। यह अफ्रीका और एशिया के लेखकों के लिए एक बहुभाषी मंच बना और बाद में इसमें लैटिन अमेरिका के लेखक भी शामिल हुए। इसके पन्नों ने उस औपनिवेशिक व्यवस्था को नकार दिया, जिसमें वैश्विक दक्षिण के लेखकों को लंदन, पेरिस या न्यूयॉर्क से मान्यता मिलने का इंतज़ार करना पड़ता था। लोटस ने साहित्य की एक नई भौगोलिक तस्वीर सामने रखी—फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध की आवाज़ वियतनामी मुक्ति संघर्ष के साथ संवाद कर सकती थी, दक्षिण अफ्रीका का संघर्ष मिस्र की कविता से जुड़ सकता था, और हाल ही में उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देश उन मुल्कों के साथ खड़े हो सकते थे जो अभी भी आज़ादी के लिए लड़ रहे थे। एक उदाहरण बताता है कि इस बुनियादी ढाँचे ने क्या संभव बनाया। 1972 में, लोटस ने मिस्र के नाटककार तौफ़ीक अल-हकीम का नाटक ‘उग़्निय्यत अल-मौत‘ (मृत्यु-गीत) प्रकाशित किया। पत्रिका के नेटवर्कों के माध्यम से, इस नाटक का हिंदी में अनुवाद किया गया और उसी वर्ष नई दिल्ली में इसका मंचन किया गया; इसका अम्हारिक में भी अनुवाद हुआ, और इथियोपियाई सरकारी टेलीविजन पर यह प्रसारित हुआ। इस प्रकार, मिस्र के एक ग्रामीण परिवार की यह कहानी, जिसमें काहिरा में बेटे की शिक्षा के कारण पीढ़ियों से चली आ रही ख़ूनी दुश्मनी ख़त्म हुई, मिस्र की सीमाओं से बाहर भी पहुँच सकती थी और उन लोगों से संवाद कर सकती थी, जो परंपरा, आधुनिकता और सामाजिक परिवर्तन की अपनी-अपनी दुविधाओं का सामना कर रहे थे।

लोटस (अरबी संस्करण), खंड 3, अंक 9, जुलाई 1971

आज हमें लोटस जैसी ही तत्परता और आवश्यकता की ज़रूरत है। हवाना सम्मेलन जिस मीडिया तंत्र का सामना कर रहा था, वह आज प्लैटफॉर्मों, एल्गोरिदम, डेटा के दोहन और कुछ गिने-चुने मालिकों के हाथों में केंद्रित स्वामित्व की एक जटिल व्यवस्था बन चुका है। यह तंत्र केवल सेंसरशिप नहीं करता; बल्कि पूरी दुनिया में लगातार तस्वीरों और सूचनाओं की बाढ़ ला देता है, साझा अनुभव को हर व्यक्ति की अलग-अलग सूचना-धारा में बाँट देता है, लोगों का ध्यान भी एक संपत्ति में बदल देता है और एकजुटता को दूर की चीज़ जैसा बना देता है—यह सब उस समय भी, जब युद्ध हमारे मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन पर तुरंत पहुँच जाता है। नस्लवाद और उपनिवेशवाद आज भी पुराने सत्ता-संबंधों को डिजिटल रूप देकर नए सिरे से सामने आ रहे हैं। दुनिया के लोगों को एक-दूसरे की तस्वीरें और दृश्य देखने-उपभोग करने के लिए तो प्रेरित किया जाता है, लेकिन एक-दूसरे के संघर्षों के साथ टिकाऊ और गहरे संबंध बनाने से रोका जाता है।

दुनिया की एक नई सांस्कृतिक दृष्टि उन विविधता के नारों के सहारे तैयार नहीं की जा सकती, जिन्हें वही संस्थाएँ आगे बढ़ाती हैं जो युद्ध और लूट को आर्थिक मदद देती हैं। यह दृष्टि नस्लवाद, उपनिवेशवाद, पितृसत्ता और पूँजीवादी शोषण के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्षों से पैदा होनी चाहिए। हवाना में जिस व्यापक अर्थ में संस्कृति की बात की गई थी, उसे फिर से सामने लाना होगा—संस्कृति केवल कला और शिक्षा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, विज्ञान, श्रम, खेल, मीडिया, तकनीक और रोज़मर्रा के जीवन के संगठन से भी जुड़ी है। इस परियोजना के केंद्र में मौजूद बौद्धिक कार्यकर्ता कोई ऐसा अकेला प्रतिभाशाली व्यक्ति नहीं है, जो जनता से ऊपर खड़ा हो, बल्कि वह व्यक्ति है जिसका ज्ञान एक सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। इस परियोजना का लक्ष्य एक अभिजात वर्ग की जगह दूसरे अभिजात वर्ग को बैठाना नहीं है, बल्कि बौद्धिक जीवन का इतना विस्तार करना है कि धीरे-धीरे विचार करने वालों और काम करने वालों के बीच का विभाजन मिटने लगे। क्रांतिकारी परंपराएँ हमें न तो कोई पूरी तरह तैयार नक़्शा देती हैं और न ही वर्तमान से बच निकलने का कोई सुरक्षित ठिकाना। वे हमें कुछ तरीक़े देती हैं—पाज़ का उस मुखौटों की दुनिया से गुज़रना, जिन्हें विजय और औपनिवेशिक इतिहास ने पीछे छोड़ा; सीज़ेयर का औपनिवेशिक पटकथा को मानने से इनकार; रेटामार का शासक की भाषा को अपने अधिकार में लेना; अल-ए अहमद की दूसरों की अंधी नकल से पैदा होने वाली निर्भरता को लेकर चेतावनी; लोटस द्वारा बनाया गया अंतरराष्ट्रीयतावादी साहित्यिक साझा मंच; और हवाना का यह आग्रह कि क्रांति को जीवन की पूरी संरचना को बदलना चाहिए।

बनारस पर बारिश, पारितोष सेन (भारत), 1962

हमें विरासत में एक तूफ़ान मिला है। हमारा काम है ख़ुद को इससे आज़ाद करना।

स्नेह सहित,

विजय