अति निम्न मज़दूरी पर काम करते हैं ज़्यादातर प्रवासी श्रमिक
गाँवों में भुखमरी से पीड़ित अनेक कामगार शहर आते हैं और यहाँ किसी भी शर्त पर मज़दूरी करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
सर्वे रिपोर्ट की पहली कड़ी में हमने नोएडा के कपड़ा कारखानों में काम करने वाले मज़दूरों के रहने के हालात का जायज़ा लिया। दूसरे भाग में हमने ग्रामीण भारत के उन संरचनात्मक पहलुओं तथा मज़दूरों के मूल निवास की परिस्थितियों का विश्लेषण किया जो उनको प्रवास के लिए मजबूर करते हैं। इस भाग में हम उनकी कमाई का विश्लेषण करेंगे। अति निम्न मज़दूरी ग्रामीण क्षेत्रों में समाज के सबसे निचले पायदान पर मौजूद, आर्थिक संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित कामगारों को ही प्रवास के लिए आकर्षित कर पाती है। साथ–ही–साथ, यह ग्रामीण भुखमरी से अपेक्षाकृत बेहतर अवसर तो देती है, लेकिन ग्रामीण असमानता की संरचना को भी बरक़रार रखती है। यह न तो इनको शहर का हिस्सा बनने देती है, न ही इनको गाँव में ख़ुशहाल ज़िंदगी जीने का मौक़ा देती है। त्रासदी यह है कि ऐसे कामगार न गाँव में सुकून से बस पाते हैं, न अपने प्रवास के शहर में।
टेक्स्टाइल और कपड़ा उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। कुल जीडीपी में इसका योगदान करीब 2.3 प्रतिशत है; और भारत के सालाना निर्यात का 12 प्रतिशत भाग टेक्स्टाइल और कपड़ा उद्योग से होता है। भारत के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, ब्रिटेन, तथा जर्मनी जैसे देश प्रमुख निर्यात केंद्र हैं। कृषि के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा रोज़गार प्रदान करने वाला सेक्टर है। करीब 4.5 करोड़ श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से तथा 10 करोड़ श्रमिक टेक्स्टाइल और कपड़ा उद्योग से संबद्ध क्षेत्रों में कार्यरत हैं। तमिलनाडु, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, और उत्तर प्रदेश शीर्ष टेक्स्टाइल और कपड़ा निर्यातक राज्य हैं। 2024-25 के दौरान गौतम बुद्ध नगर भारत का दूसरा सबसे बड़ा टेक्सटाइल निर्यातक ज़िला था। हमारे सर्वे में शामिल मज़दूर गौतम बुद्ध नगर के टेक्स्टाइल और कपड़ा कारखानों में ही काम कर रहे थे।
पीएलएफ़एस के अनुसार 7 प्रतिशत से ज्यादा शहरी श्रमिक गारमेंट सेक्टर में काम करते हैं। शहरी महिला कामगारों की गारमेंट सेक्टर में सहभागिता पुरुषों की तुलना में ज्यादा है। पाँच प्रतिशत शहरी पुरुष श्रमिकों के मुकाबले चौदह प्रतिशत शहरी महिला श्रमिक गारमेंट सेक्टर में काम कर रही थीं। यह मैन्युफ़ैक्चरिंग के उन अपवाद सेक्टरों में से एक है जिनमें महिला श्रमिकों की भागीदारी अच्छी है। लेकिन इस सेक्टर में काम लैंगिक आधार पर बँटा मालूम पड़ता है। सवैतनिक कार्य पुरुष–प्रधान हैं जबकि अवैतनिक कार्य महिला प्रधान। 2023-24 में गारमेंट सेक्टर में काम करने वाले शहरी पुरुषों में से लगभग 67 प्रतिशत सवैतनिक कार्य (दिहाड़ी मज़दूरी तथा नियमित वेतनभोगी मज़दूरी) में संलग्न थे, जबकि महिलाओं के लिए यह आँकड़ा मात्र 20 प्रतिशत था। महिलाओं का मुख्य हिस्सा बिना मेहनताना के काम करने वाली श्रेणियों में कार्यरत था। यही कारण है कि महिला मज़दूरों की बड़ी तादाद संलग्न होने के बावज़ूद कारखानों में उनकी संख्या पुरुषों की तुलना में नगण्य है। घर और कारखाना का यह लैंगिक विभाजन गारमेंट सेक्टर में गहरा है। इस लैंगिक विभेद की वजह से हमारे सर्वे में शामिल सारे मज़दूर पुरुष हैं।
कुमार मिसल, लक्ष्मी, 2022
न्यूनतम भी नसीब नहीं
87 प्रतिशत मज़दूर बड़े कारखानों (500 से ज्यादा मज़दूर) में कार्यरत थे। शेष मज़दूर मध्यम आकार (100 से लेकर 500 मज़दूर) के कारखानों में काम कर रहे थे। बड़े कारखानों में काम करने वाले मज़दूरों की औसत मासिक कमाई 11,000 रुपए थी जबकि मध्यम आकार के कारखानों में काम करने वाले मज़दूर की औसत कमाई 10,500 रुपए के करीब थी। सर्वे में शामिल कुल मज़दूरों में सबसे ज्यादा भाग दर्ज़ी का काम करने वालों का था। एक दर्ज़ी की औसत मासिक पगार 11,000 रुपए के करीब थी। हेल्परों की मासिक पगार 8,300 रुपए थी। मज़दूरों की तनख़्वाह उनके काम के अनुसार कम अथवा ज्यादा थी। कपड़े मोड़ना, साफ़ करना, पैक करना, तथा स्टोर की देखभाल करना जैसे कामों के लिए 10,000 रुपए प्रतिमाह से कम का वेतन था, जबकि कपड़े काटना, उन पर रंग चढ़ाना, तथा बटन टाँकना जैसे कामों की मासिक तनख़्वाह 13,000 से 15,000 रुपयों के बीच थी। सुपरवाइज़रों की तनख़्वाह मज़दूरों से काफ़ी ज्यादा, 19,000 रुपए प्रतिमाह के लगभग थी।
राज्य सरकारों का श्रम आयोग न्यूनतम मज़दूरी तय करता है और उनमें आवधिक वृद्धि करता है ताकि महँगाई के अनुसार मज़दूरी बढ़ सके। हमने सर्वे में शामिल मज़दूरों की मज़दूरी का उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा प्रकाशित न्यूनतम मज़दूरी से मिलान किया। श्रम मंत्रालय तीन तरह की श्रेणियों की मज़दूरी तय करता है—कुशल मज़दूर, अर्ध–कुशल मज़दूर, तथा अकुशल मज़दूर। हमारे सर्वे में मुख्यत: कुशल तथा अकुशल मज़दूर शामिल थे। तकरीबन आधे मज़दूरों को ही सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी मिल पा रही थी। तालिका 1 दोनों श्रेणियों में न्यूनतम मज़दूरी प्राप्त करने वाले मज़दूरों के प्रतिशत को दर्शाती है। अकुशल मज़दूरों—जो ज़्यादातर नए–नए काम पर लगे होते हैं तथा हेल्पर जैसे काम करते हैं—में न्यूनतम मज़दूरी प्राप्त करने वालों का प्रतिशत कुशल मज़दूरों से कम था। ये ज़्यादातर काम की तलाश में पहली बार शहर गए युवा प्रवासी होते हैं अथवा गारमेंट कारखानों में काम शुरू करने वाले मज़दूर होते हैं। इनकी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर उनको न्यूनतम मज़दूरी से महरूम करना अधिक आसान होता है—और जैसा कि हमारा विश्लेषण बताता है, अक्सर यही होता है।
तालिका 1: उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम आयोग द्वारा न्यूनतम मज़दूरी या उससे ज्यादा अर्जित करने वाले सर्वे में शामिल मज़दूरों का प्रतिशत
आँकड़ो का स्रोत: सर्वे के आँकड़ो से लेखक की गणना
हमने यहाँ उत्तर प्रदेश राज्य की न्यूनतम मज़दूरी दरों का उपयोग किया है, क्योंकि नोएडा प्रशासनिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश राज्य का हिस्सा है। लेकिन यहाँ दिल्ली राज्य की न्यूनतम मज़दूरी का उपयोग करना व्यावहारिक होगा, क्योंकि यहाँ रहने का ख़र्च दिल्ली शहर के बराबर है, और उत्तर प्रदेश राज्य के किसी भी शहर से बेहद ज़्यादा। दिल्ली सरकार की न्यूनतम मज़दूरी को पैमाना बनाकर विश्लेषण करने पर पता लगता है कि विरले ही किसी मज़दूर को न्यूनतम मज़दूरी मिल रही थी। सिर्फ़ चार प्रतिशत कुशल मज़दूरों को ही दिल्ली सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी मिल पा रही थी, जबकि एक भी अकुशल मज़दूर को न्यूनतम मज़दूरी नहीं मिल रही थी। जीतोड़ काम करने बाद अपना पेट पालने के लिए आवश्यक निम्नतम मज़दूरी तक न मिल पाना गारमेंट सेक्टर के ज्यादातर मज़दूरों की हक़ीक़त है।
एक तो सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी की दरों को पहले से ही भरण–पोषण के लिए नाकाफ़ी माना जाता रहा है। यह न सिर्फ़ शहरों में एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए अपर्याप्त होता है, बल्कि अमानवीय हालात में रहने के लिए भी नाकाफ़ी होता है। उसके ऊपर से, समस्या यह है कि अधिकतर कारखाने अपने मज़दूरों को यह अमानवीय रूप से निम्न न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं देते। सरकारें भी इस अमानवीय शोषण को प्रश्रय देती हैं। पहले तो वे बेहद निम्न न्यूनतम मज़दूरी तय करके मज़दूरों के शोषण को वैधानिक जामा पहनाती हैं। फ़िर उसके अनुपालन को नज़रअंदाज़ करने मज़दूरों के अतिशोषण का आधार तैयार करती हैं। पूँजीपतियों की अतिशोषणकारी मज़दूरी और उसका सरकारी आधार मिलकर प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा की इबारत लिखते हैं।
शोषण के अनेक तरीक़े
मज़दूरों की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ा ग़ैर–कृषि सेक्टर होने के बावज़ूद गारमेंट सेक्टर की मज़दूरी अन्य सेक्टरों से कम है। गारमेंट सेक्टर में अन्य मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टरों की तुलना में मज़दूरों की मासिक कमाई कम होती है, ख़ासकर नियमित वेतनभोगी मज़दूरों तथा स्व–नियोजित मज़दूरों की। नीचे दी गई तालिका में यह फ़र्क साफ़ दिखता है। गारमेंट सेक्टर अतिनिम्न मज़दूरी देने वाले सेक्टरों में शामिल है। जैसा कि कि हमने ऊपर देखा, इस सेक्टर में सबसे ज़्यादा हकमारी महिलाओं की होती है। जिन श्रमिक–श्रेणियों में महिलाओं की हिस्सेदारी ज़्यादा है उनमें ही सबसे कम मज़दूरी मिलती है। यह काफ़ी कुछ उत्पादन की प्रणाली पर भी निर्भर करता है। गारमेंट सेक्टर में सारा काम कारखाने में कराए जाने की ज़रूरत नहीं होती। बहुत सारे ऐसे काम होते हैं जिनमें कारखाने के भीतर सुपरवाइज़र की नज़र के सामने काम कराए बिना भी गुणवत्ता को परखा जा सकता है और मज़दूरों को काम के अनुसार मज़दूरी दी जा सकती है। उदाहरण के लिए बटन टाँकना, सिलाई करना, खास पैटर्न में कपड़ों को काटना इत्यादि। इस तरह के कामों में महिलाओं की संलग्नता ज़्यादा देखने को मिलती है। ऐसे मज़दूरों को स्व–नियोजित मज़दूर के नाम से जाना जाता है। और चूँकि ये सीधे कारखानों के भीतर काम नहीं करते तथा इनके ऊपर काम के घंटों की प्रत्यक्ष बंदिश नहीं होती है, अत: उन्हें दिहाड़ी अथवा नियमित वेतनभोगी मज़दूर नहीं माना जाता है। ये तकनीकी रूप से कारखाने अथवा किसी नियोक्ता के लिए काम नहीं करते। मज़दूर की परिभाषा के बाहर ऐसे मज़दूरों को न न्यूनतम मज़दूरी देने की कोई वैधानिक वजह होती है और न ही सामाजिक सुरक्षा। फलत: ये बाकी मज़दूरों से भी कम कमाते हैं। सीधा कारखानों में जाकर काम न करने की वजह से उनके काम और उनकी पहचान को भी नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
तालिका 2: वर्ष 2023–24 में टेक्स्टाइल, तथा टेक्स्टाइल को छोड़कर अन्य विनिर्माण गतिविधियों में संलग्न शहरी श्रमिकों का औसत मासिक वेतन
आँकड़ों का स्रोत: पीएलएफ़एस 2023–24, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI), भारत सरकार।
गारमेंट सेक्टर के हालात आर्थिक विकास के वर्तमान आयाम और इसमें मेहनतकश जनता की जगह के बीच के विरोधाभास को उजागर करते हैं। हमारे सर्वे के आँकड़े इस सेक्टर के एक बेहद छोटे इलाक़े के कुछ मज़दूरों के अनुभवों पर आधारित हैं। लेकिन सरकार द्वारा कराए जाने वाले देशव्यापी सर्वे भी मज़दूरों की बदहाली को ही बयान करते हैं। पीएलएफ़एस के अनुसार टेक्सटाइल सेक्टर में संलग्न 94 प्रतिशत मज़दूर असंगठित सेक्टर में काम कर रहे थे। यानी कि उनके पास श्रम कानूनों का आभासी कवच तक नहीं था और वे समाजिक सुरक्षा से भी महरूम थे। सोचिए, आर्थिक तरक्की का वर्तमान विमर्श—जिसका निर्यातोन्मुखी आर्थिक विकास एक आधार स्तंभ है—अपने सबसे सफल सेक्टरों में से एक में 94 प्रतिशत मज़दूरों को काम करने की मानवीय परिस्थितियों की वैधानिक गारंटी भी नहीं दे पा रहा है। अभी तो हम संगठित सेक्टर में श्रम कानूनों की अवहेलना की चर्चा ही नहीं कर रहे हैं।
अतिनिम्न मज़दूरी मज़दूरों की बदहाली का प्रमुख कारण है—उनके गाँवों में भी और शहरों में भी। गाँव में व्याप्त ग़रीबी से बचने के लिए वो शहर की ओर भागते हैं। शहर में गारमेंट जैसे सेक्टर—जो प्रवासी मज़दूरों के श्रम के बूते कायम हैं—उनके शोषण के नाना तरीके ईजाद करते हैं। कुछ को मज़दूर मानने से इंकार कर दिया जाता है, तो कुछ की मज़बूरी का फ़ायदा उठाकर उनको ‘हेल्पर‘ जैसे तमगे दिए जाते हैं। लचर श्रम कानूनों—जो मज़दूरों की गरिमा को बचाने में हमेशा से विफल रहे हैं तथा मज़दूरों को अमानवीय परिस्थितियों से बचाने में विरले ही सफल हुए हैं—के अनुपालन के असंख्य नुस्खे तैयार किए गए हैं। पूंजीपतियों की ये कारगुजारियाँ सरकारी शह मिलने के बाद ही कारगर हो पाती हैं। इतने सारे प्रपंच करके मज़दूरों को अमानवीय रूप से निम्न मज़दूरी दिया जाना संभव बनाया जाता है।
कुमार मिसल (भारत), निरक्षर 2, 2024
दोनों जगह हाशिए पर
यही कारण है कि दिन–भर कमरतोड़ मेहनत करने के बाद ज़्यादातर मज़दूर अपने लिए एक कमरा तक किराए पर नहीं ले सकते। ऐसी जगहों पर नहीं रह सकते जो उनकी निजता की हिफ़ाज़त कर सकें, साफ़–सुथरी हों, और जहाँ पीने योग्य पानी, तथा शौचालय जैसी सुविधाएँ हों। वो शहर, जिसकी आर्थिक प्रगति उनके श्रम पर टिकी है, का हिस्सा बनने का सपना भी नहीं देख सकते। ये दिन–रात परिश्रम करने के बावज़ूद अपने परिवार को अपने साथ रख नहीं सकते क्योंकि उनकी कमाई शहर में परिवार के भरण–पोषण के लिए अपर्याप्त है। अतिनिम्न मज़दूरी उनको अपने ही देश में एकाकी और निर्वासन का जीवन जीने के लिए मजबूर करती है।
यह अतिनिम्न मज़दूरी, गाँव में बसे आश्रितों की मूलभूत ज़रूरतों को कुछ हद तक पूरा तो करती है, लेकिन इतना ही कि वो रोटी और कपड़े जैसी ज़रूरतों को बमुश्किल पूरा कर सकें। उनकी गाँव की ग़रीबी भी कायम रहती है और शहरी विपन्नता भी। सारी कमाई रोज़मर्रा की ज़रूरतों में चले जाने की वजह से इनके पास खास बचत नहीं हो पाती। ये कभी–कभार गाँव तो जा सकते हैं, लेकिन शहर में आना इनकी मज़बूरी होती है। इस तरह गाँव बेरोज़गारी और ग़रीबी का स्रोत बने रह जाते हैं और शहरों के गारमेंट जैसे सेक्टर इसका फ़ायदा उठाकर उनसे सस्ते श्रम का लाभ उठाते हैं।
उमेश यादव |