अलादीन का चिराग नहीं है एआई
एआई की सीमाएँ उजागर होने के साथ युवाओं में यह समझ बढ़ी है कि इस पर आँख मूँदकर भरोसा करने की बजाय इसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल किया जाए।
हाल तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को कुछ इस तरह देखा जाता था जैसे यह कोई अलादीन का चिराग हो। हम बस ख़्वाहिशें जताएँगे और पलक झपकते ही एआई सब कुछ कर देगा; इंसान को कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं होगी; हाथ-पैर, दिमाग़ कुछ भी चलाने की आवश्यकता नहीं। बहरहाल एआई का यह तिलिस्म धीरे-धीरे छँट रहा है। अब समझ में आने लगा है कि अंततः इस सृष्टि का कर्ता-धर्ता मनुष्य ही है। कोई तकनीक उसे अपदस्थ करके जीवन के सभी कार्यव्यापार को अपने हाथ में ले ले, यह मुमकिन नहीं।
हाल में हुए कई अध्ययनों में पता चला है कि युवाओं में एआई को लेकर भरोसा कम हुआ है। वे उसकी सीमाएँ पहचनाने लगे हैं। युवा एआई का इस्तेमाल कम नहीं कर रहे हैं, वे उसके लाभ देख रहे हैं, लेकिन उसकी असली क्षमता को भी समझने लगे हैं। सितंबर 2026 में प्रकाशित प्यू रिसर्च सेंटर के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में 36 देशों के 42,151 लोगों को शामिल किया गया। इसमें 18 से 34 वर्ष की उम्र के लोगों में एआई को लेकर एक दिलचस्प प्रवृत्ति दिखाई दी। युवा दूसरे आयु-वर्गों की तुलना में एआई के बारे में अधिक जागरूक हैं, लेकिन वे इसके प्रति उत्साहित और चिंतित—दोनों हैं। कई देशों में युवाओं में एआई को लेकर फ़िक्र बढ़ी है। ख़ास तौर पर रोज़गार को लेकर वे अधिक आशंकित हैं। भारत भी उन देशों में शामिल है जहाँ 18-34 वर्ष के लोग 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की तुलना में एआई के कारण नौकरियाँ कम होने की आशंका अधिक व्यक्त करते हैं।
अमेरिका में यह बदलाव और स्पष्ट है। 2024 में 18 से 34 वर्ष के 40 प्रतिशत लोगों ने कहा था कि वे एआई को लेकर उत्साहित होने से ज़्यादा चिंतित हैं। 2026 में यह संख्या बढ़कर 55 प्रतिशत हो गई। यानी जिन युवाओं से उम्मीद की जाती थी कि वे नई तकनीक को उत्साह से स्वीकार करेंगे, उनमें ही उसके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ रही है। इसे एआई का विरोध या उससे मोहभंग तो नहीं कहा जा सकता, दरअसल यह उस दौर का संकेत है जब किसी नई तकनीक का आकर्षण उसकी वास्तविकता से टकराने लगता है।
इस्तेमाल बढ़ा, भरोसा घटा
इस विरोधाभास को समझना जरूरी है। एआई का इस्तेमाल युवाओं में कम नहीं हुआ है। 2026 के एक अमेरिकी सर्वेक्षण में 14 से 29 वर्ष के 51 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे जनरेटिव एआई का इस्तेमाल रोज या सप्ताह में कम-से-कम एक बार करते हैं। लेकिन उसी सर्वेक्षण में एआई के प्रति संदेह बढ़ता दिखाई दिया। केवल 56 प्रतिशत युवाओं ने माना कि एआई उन्हें अपना काम जल्दी पूरा करने में मदद करता है—2025 के मुकाबले यह संख्या 10 प्रतिशत कम थी। एआई से जल्दी सीखने में मदद मिलने की बात मानने वालों का अनुपात भी 46 प्रतिशत रह गया, जो पिछले साल से सात प्रतिशत कम था।
कामकाजी युवाओं के बीच संदेह और अधिक स्पष्ट है। 2026 में 48 प्रतिशत जेन जी कर्मचारियों ने कहा कि कार्यस्थल पर एआई के जोख़िम उसके लाभों से अधिक हैं। केवल 15 प्रतिशत ने इसका उलटा कहा। इससे भी अधिक दिलचस्प बात यह है कि 69 प्रतिशत ने एआई की मदद के बिना किया गया काम ज्यादा भरोसेमंद माना, जबकि केवल 28 प्रतिशत ने एआई की मदद से किए गए काम पर अधिक भरोसा जताया।
इसका अर्थ यह नहीं कि युवा एआई का इस्तेमाल नहीं करना चाहते। वे उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं, लेकिन अब वे यह भी पूछ रहे हैं—क्या एआई जो काम कर रहा है, उसे मैं खुद समझ भी रहा हूँ? और क्या उस पर भरोसा किया जा सकता है? यहीं से एआई की पहली बड़ी सीमा सामने आती है।
लिन हर्शमैन लीसन (यू.एस.ए), प्लग को चुनौती, 2025
पढ़ाई आसान हुई या सीखना?
यह माना जा रहा था कि शिक्षा के क्षेत्र में एआई अभूतपूर्व बदलाव लाएगा। छात्रों ने इसे एक ऐसे साथी के रूप में लिया, जो उनकी मौज ही मौज कराएगा। अब कल तक जो उन्हें करना था, वह एआई करेगा यानी होमवर्क का झंझट ख़त्म। 2026 के RAND सर्वेक्षण में 2025 के दौरान अमेरिकी विद्यार्थियों में होमवर्क के लिए एआई इस्तेमाल करने वालों का अनुपात 48 से बढ़कर 62 प्रतिशत हो गया। लेकिन इसी दौरान एआई के बारे में एक ख़ास चिंता भी बढ़ी: 67 प्रतिशत विद्यार्थियों ने कहा कि स्कूल के काम के लिए एआई का अधिक इस्तेमाल आलोचनात्मक सोच को नुकसान पहुँचा सकता है। साल के पहले हिस्से में यह संख्या 54 प्रतिशत थी। यह विरोधाभास बहुत कुछ कहता है।
छात्र जानते हैं कि एआई से उत्तर जल्दी मिल जाता है। लेकिन उत्तर मिल जाना और किसी विषय को समझ लेना एक ही बात नहीं है। विद्यार्थी एआई से उत्तर तो ले सकता है। एआई उसे एक सुंदर, व्यवस्थित और आत्मविश्वास से लिखा हुआ उत्तर दे देगा, लेकिन उस उत्तर को बनाने की प्रक्रिया—स्रोतों को पढ़ना, अलग-अलग व्याख्याओं को समझना, प्रमाणों की विश्वसनीयता परखना, विरोधी तर्कों पर विचार करना—शायद उसके अपने अनुभव का हिस्सा नहीं बनेगा। ब्रिटेन के विश्वविद्यालयी छात्रों पर 2026 में किए गए एक सर्वेक्षण में भी यही द्वंद्व सामने आया। 95 प्रतिशत विद्यार्थियों ने कहा कि उन्होंने किसी न किसी रूप में एआई का इस्तेमाल किया है और 49 प्रतिशत ने माना कि एआई ने उनके विद्यार्थी जीवन को बेहतर बनाया है। लेकिन कुछ छात्रों ने कौशल के क्षरण, सामाजिक अलगाव और भविष्य के रोज़गार को लेकर चिंता भी व्यक्त की। यह शायद एआई को लेकर बदलती मानसिकता का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत है: युवा अब सुविधा और क्षमता में अंतर करने लगे हैं। जनरेटिव एआई की एक विचित्र समस्या है। वह कई बार ग़लत उत्तर देता है, लेकिन ऐसा करते समय उसकी भाषा पर संदेह नहीं होता। यही उसकी सबसे ख़तरनाक सीमाओं में से एक है। मनुष्य के पास जब किसी सवाल का उत्तर नहीं होता तो वह कह सकता है—‘मुझे नहीं पता।’ एआई के पुराने और नए मॉडल इस दिशा में बेहतर हुए हैं, लेकिन फिर भी वे ग़लत तथ्य, ग़लत संदर्भ या ग़लत निष्कर्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। समस्या केवल ग़लती नहीं है। समस्या यह है कि ग़लत उत्तर अक्सर सही उत्तर जैसा दिखाई देता है। युवा जब पढ़ाई, नौकरी, समाचार, क़ानून, विज्ञान या किसी सामाजिक प्रश्न के लिए एआई पर निर्भर होते हैं, तब उन्हें केवल उत्तर नहीं चाहिए; उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि उत्तर कितना विश्वसनीय है।
मतलब आप एआई पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं कर सकते। उसका इस्तेमाल करने के लिए आपको उससे पर्याप्त अधिक जानना पड़ता है कि आप उसकी ग़लती पकड़ सकें। अगर विद्यार्थी को विषय का पर्याप्त ज्ञान ही नहीं है, तो वह एआई की ग़लती को कैसे पहचानेगा? इसलिए एआई के दौर में ज्ञान का महत्व ख़त्म होने के बजाय एक दूसरे रूप में बढ़ सकता है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि जानकारी कहाँ से मिलेगी। सवाल यह भी है कि मिली हुई जानकारी की जाँच कौन करेगा?
कोडिंग में भी ‘जादू’ का भ्रम टूटा
एआई की सीमाएँ केवल शिक्षा में नहीं दिखाई दे रही हैं। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग को लेकर भी शुरुआती उत्साह को कुछ वास्तविक अनुभवों ने चुनौती दी है। 2025 में METR के एक अध्ययन में अनुभवी सॉफ्टवेयर डेवलपर्स को उन ओपन-सोर्स प्रोजेक्टों पर काम करने को कहा गया जिनसे वे पहले से परिचित थे। डेवलपर्स को लगा था कि एआई उनके काम को लगभग 24 प्रतिशत तेज कर देगा। लेकिन अध्ययन में इसके उलट परिणाम आया: एआई की मदद से काम पूरा करने में औसतन 19 प्रतिशत अधिक समय लगा। कारण यह था कि एआई द्वारा सुझाए गए कोड को जाँचना और उसमें सुधार करना कई बार इतना समय ले रहा था कि शुरुआती बचत समाप्त हो गई।
यह परिणाम हर तरह की प्रोग्रामिंग पर लागू नहीं होता। नए कोड, सरल काम या अलग परिस्थितियों में एआई काफ़ी मददगार हो सकता है। लेकिन यह अध्ययन उस धारणा पर सवाल ज़रूर उठाता है कि एआई हर परिस्थिति में मनुष्य को तेज़ बना देगा।
युवाओं के लिए इसका एक बड़ा मनोवैज्ञानिक असर भी है। अगर किसी विद्यार्थी ने वर्षों तक प्रोग्रामिंग सीखी और अचानक उसे बताया गया कि एआई कुछ ही सेकंड में कोड लिख सकता है, तो उसके सामने सवाल आता है: मैं यह कौशल क्यों सीखूँ? लेकिन जब वह देखता है कि एआई को सही निर्देश देना, उसके कोड को समझना, उसकी ग़लतियाँ पकड़ना और जटिल समस्या को सही ढंग से परिभाषित करना अब भी मनुष्य पर निर्भर है, तो तस्वीर बदल जाती है। शायद भविष्य में प्रोग्रामिंग का मतलब केवल कोड लिखना नहीं होगा। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि प्रोग्रामिंग सीखना बेकार हो जाएगा।
तुशार जोग (भारत), साम्राज्य की प्रबोधक सेना
रचनात्मकता का सवाल
एआई की सबसे बड़ी परीक्षा शायद रचनात्मकता के क्षेत्र में है। एक कविता, कहानी, चित्र या संगीत एआई कुछ ही सेकंड में तैयार कर सकता है। लेकिन सवाल है कि यह सब कितना रचनात्मक होता है? यहाँ समस्या ‘सुंदर’ और ‘मौलिक’ के बीच है। एआई ऐसी सामग्री बना सकता है जो देखने या पढ़ने में प्रभावशाली हो। लेकिन रचनात्मकता केवल किसी सुंदर वस्तु का निर्माण नहीं है। उसमें अनुभव, स्मृति, संघर्ष, सामाजिक संदर्भ, जोख़िम लेने की क्षमता और किसी चीज़ को अलग तरह से देखने की इच्छा शामिल होती है।
यही वजह है कि युवाओं में यह चिंता दिखाई दे रही है कि एआई कहीं उनकी अपनी रचनात्मक क्षमता को कमज़ोर न कर दे। प्यू के 2026 के अमेरिकी सर्वेक्षण में युवा वयस्कों ने एआई को लेकर रचनात्मकता और मानवीय जुड़ाव पर भी चिंता जताई। 30 वर्ष से कम उम्र के लोग विशेष रूप से इस बात को लेकर चिंतित पाए गए कि एआई उनके लिए रचनात्मकता और मानवीय संबंधों को कठिन बना सकता है। यहाँ एक दिलचस्प सवाल पैदा होता है: यदि मशीन हर बार हमारे लिए पहला मसौदा तैयार कर देगी, तो क्या हम ख़ुद पहला विचार पैदा करने की क्षमता खो देंगे? शायद एआई की सबसे बड़ी चुनौती यही है—वह हमारे काम को आसान बनाते हुए कहीं हमारी क्षमता को ही अनावश्यक न बना दे।
नौकरी खोने का डर
युवाओं के एआई से बदलते रिश्ते को समझने के लिए रोज़गार को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एआई से जुड़ी शुरुआती बहस में अक्सर कहा गया कि वह नई नौकरियाँ पैदा करेगा। यह संभव भी है और कई क्षेत्रों में नई भूमिकाएँ बन भी रही हैं। लेकिन किसी युवा के लिए भविष्य की नई नौकरी से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण उसकी वर्तमान नौकरी होती है।
अगर उसने चार साल कंप्यूटर साइंस पढ़ी है और उसे लगता है कि एआई जूनियर प्रोग्रामर का काम कर सकता है, तो वह भविष्य की लाखों नई नौकरियों की संभावित संख्या से ज़्यादा अपने सामने मौजूद अवसर को देखेगा। सितंबर 2026 के प्यू सर्वेक्षण में भारत समेत कई देशों में युवा वयस्कों ने एआई के कारण रोज़गार घटने की आशंका अपेक्षाकृत अधिक व्यक्त की। यह डर केवल बेरोज़गारी का नहीं है। यह प्रवेश-द्वार के बंद होने का डर भी है।
किसी पेशे में प्रवेश करने वाले युवाओं को आमतौर पर शुरुआती स्तर के कामों से अनुभव मिलता है। यदि उन कामों का बड़ा हिस्सा एआई करने लगे, तो सवाल यह है कि युवा अनुभव हासिल करेंगे कैसे? यही वह बिंदु है जहाँ एआई का असर केवल मौजूदा नौकरियों पर नहीं, बल्कि करियर की सीढ़ी पर पड़ सकता है।
फिर भी युवा एआई को छोड़ नहीं रहे। वे एआई से दूर नहीं जा रहे। वे उसका अधिक व्यावहारिक इस्तेमाल कर रहे हैं। ब्रिटेन के छात्रों में 95 प्रतिशत तक एआई का किसी न किसी रूप में इस्तेमाल होना इसका उदाहरण है। अमेरिका में भी जेन-जी के बीच नियमित इस्तेमाल जारी है। भारत में तस्वीर कुछ अलग भी है। 2026 के Deloitte सर्वेक्षण में भारत के जेन-जी और मिलेनियल्स ने एआई के प्रति अपेक्षाकृत सकारात्मक रवैया व्यक्त किया। 90 प्रतिशत से अधिक भारतीय जेन-जी और मिलेनियल उत्तरदाताओं ने सीखने और कौशल-विकास के लिए एआई का इस्तेमाल करने की बात कही। युवाओं का एआई से मोहभंग नहीं हुआ है, बल्कि वे मोह से बाहर निकल रहे हैं।
के. पी. रेजी (भारत), प्रेम-चित्र के लिए अध्ययन
एआई की असली सीमा
एआई की सीमा वहाँ सबसे अधिक उजागर होती है जहाँ केवल सूचना या पैटर्न पर्याप्त नहीं होते। जहाँ संदर्भ चाहिए। जहाँ ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है। जहाँ निर्णय के परिणाम भुगतने पड़ते हैं। जहाँ मानवीय संबंध महत्त्वपूर्ण होते हैं। जहाँ यह समझना ज़रूरी होता है कि किसी तथ्य का अर्थ किसी ख़ास समय, समाज या व्यक्ति के लिए क्या है। एआई एक शानदार सहायक हो सकता है। लेकिन सहायक और निर्णयकर्ता एक चीज़ नहीं हैं।
वह शिक्षक का विकल्प नहीं, शिक्षक का उपकरण हो सकता है। वह लेखक का विकल्प नहीं, लेखक का सहयोगी हो सकता है। वह डॉक्टर, वकील, पत्रकार, वैज्ञानिक या प्रोग्रामर के काम को बदल सकता है, लेकिन हर मामले में उस पेशे की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ले सकता। और शायद सबसे अहम बात यह है कि एआई का अच्छा इस्तेमाल वही व्यक्ति कर पाएगा जिसके पास एआई के बाहर का ज्ञान है।
एक अधिक परिपक्व रिश्ता
नई तकनीकों के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है। शुरुआत में कोई तकनीक चमत्कार लगती है। फिर उसका सामान्यीकरण होता है। उसके बाद उसकी सीमाएँ दिखाई देती हैं। अंततः समाज उसके साथ एक अधिक व्यावहारिक रिश्ता विकसित करता है। एआई भी शायद इसी रास्ते पर है। युवा अब उससे यह उम्मीद नहीं कर रहे कि वह उनकी जगह सब कुछ कर देगा। वे यह सीख रहे हैं कि उससे क्या करवाया जा सकता है और क्या नहीं। यह बदलाव एआई के लिए ख़तरा नहीं, बल्कि उसके अधिक ज़िम्मेदार इस्तेमाल की शर्त हो सकता है।
शायद भविष्य की सबसे महत्त्वपूर्ण एआई-कुशलता यह नहीं होगी कि कौन सबसे अच्छा प्रॉम्प्ट लिख सकता है। वह यह समझने की क्षमता होगी कि कब एआई से मदद लेनी है, कब उसके उत्तर की जाँच करनी है और कब कहना है—यह काम मुझे ख़ुद करना होगा। एआई का भविष्य शायद उस दिन तय नहीं होगा जब मशीन मनुष्य से अधिक काम करने लगेगी। वह उस दिन तय होगा जब मनुष्य यह तय करना सीख लेगा कि कौन-सा काम मशीन को देना है और कौन-सा काम अपने पास रखना है। और युवाओं में दिखाई दे रहा वर्तमान संशय शायद इसी समझ की शुरुआत है।
संजय कुंदन |