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कैसे विश्व खाद्य अर्थव्यवस्था बच्चों की हत्या कर रही है: अट्ठाईसवाँ न्यूज़लेटर (2026)

खाद्यजनित बीमारियों के कुल मामलों में लगभग एक-तिहाई पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के होते हैं। यह मुनाफ़ा केंद्रित खाद्य अर्थव्यवस्था का परिणाम है।

उष्णकटिबंधीय, अनिता मालफ़ती (ब्राज़ील), 1917.

प्यारे साथियो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।

4 जून 2026 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया की खाद्य प्रणाली से जुड़ा दिल दहला देने वाला विश्लेषण जारी किया। 2021 तक के आँकड़ों पर आधारित नए अनुमानों के मुताबिक़ असुरक्षित खाने की वजह से सालाना 86.6 करोड़ बीमारियों के मामले आते हैं और 15 लाख मौतें होती हैं। दुनिया में लगभग हर नौ में से एक व्यक्ति ख़राब खाने की वजह से बीमार पड़ता है। दुनिया भर में ख़राब खाने की वजह से होने वाली बीमारियों के कुल मामलों के लगभग तीन-चौथाई और 60% मौतें अफ़्रीका और दक्षिणपूर्व एशिया में होती हैं। इसमें भी वे सबसे ज़्यादा शिकार बनते हैं जिन्होंने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया है: बच्चे। 

छोटे बच्चों में असुरक्षित भोजन से बीमार पड़ने का खतरा बड़े बच्चों और वयस्कों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक होता है। दुनिया की कुल आबादी में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की हिस्सेदारी केवल 9 प्रतिशत है, फिर भी खाद्यजनित (फूडबॉर्न) बीमारियों के लगभग एक-तिहाई मामले इन्हीं में पाए जाते हैं। वर्ष 2021 में असुरक्षित भोजन के कारण ऐसे 1 लाख 43 हजार बच्चों की मौत हो गई। ये महज़ आँकड़े नहीं हैं। ये उन ज़िंदगियों की कहानी हैं जो रोकी जा सकने वाली बीमारियों के कारण समय से पहले समाप्त हो गईं; उन परिवारों की पीड़ा हैं जो शोक में डूब गए; और उन समाजों की क्षति हैं, जिनसे उनके सबसे छोटे बच्चों के रूप में भविष्य छिन गया।

भूखी आत्मा, के.के. हेब्बार (भारत), 1952.

ऐसे निष्कर्षों पर सामान्य प्रतिक्रिया तकनीकी ही होती है। हमें बताया जाता है कि खाद्य सुरक्षा बेहतर निरीक्षण, मज़बूत विनियमन, बेहतर स्वच्छता, और प्रभावी निगरानी का मामला है। ये उपाय महत्त्वपूर्ण और आवश्यक हैं। फिर भी ये नहीं बताते कि खाना ख़राब होने से बचाने के लिए दशकों के संचित ज्ञान के बावजूद क्यों लाखों लोग असुरक्षित भोजन खाते रहते हैं। दूषित खाने से होने वाली बीमारी की निरंतरता को समझने के लिए, हमें तकनीकी स्पष्टीकरणों से आगे बढ़कर वैश्विक खाद्य प्रणाली की संरचना की जाँच करनी होगी।

प्रमुख खाद्य प्रणाली भोजन के अधिकार के इर्द-गिर्द नहीं बल्कि मुनाफ़े की खोज के आधार पर संगठित है। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में, खाद्य उत्पादन को बड़े कृषि-व्यवसाय निगमों, सुपरमार्केट शृंखलाओं, फ़ूड प्रॉसेसरों, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के वर्चस्व वाले अत्यधिक संकेंद्रित उद्योग में बदल दिया गया है। यह प्रणाली, जो मुख्य रूप से निवेश पर रिटर्न को अधिकतम करना चाहती है, ऐसे विरोधाभास उत्पन्न करती है जो कम से कम तीन प्रमुख तरीक़ों से खाद्य सुरक्षा को सीधे प्रभावित करते हैं।

पहला, लागत कम करने का दबाव पूरी आपूर्ति शृंखला में शॉर्टकट को प्रोत्साहित करता है। श्रमिकों को अक्सर अनिश्चित परिस्थितियों में काम करना पड़ता है (लैटिन अमेरिका में 80% से अधिक कृषि रोज़गार में औपचारिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा का अभाव है), निरीक्षण प्रणालियाँ के लिए पर्याप्त धन नहीं दिया जाता, और उत्पादकों पर व्यय कम करते हुए उत्पादन बढ़ाने का भारी दबाव होता है। खाद्य सामग्रियाँ तेज़ी से जटिल होती वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के माध्यम से बहुत अधिक दूरी तय करती है, जिससे उनके दूषित होने की आशंका बढ़ जाती है और जिन परिस्थितियों में इसका उत्पादन किया गया था वे अस्पष्ट होती जाती हैं।

दूसरा, पूँजीवादी खाद्य प्रणालियाँ लागतों को बाह्यीकृत (externalise) करती हैं। पर्यावरणीय क्षति, जल प्रदूषण, असुरक्षित काम की परिस्थितियाँ, और सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों को अक्सर निजी फर्मों की ज़िम्मेदारी के बजाय किसी और की समस्या मान लिया जाता है। सामाजिक लागतें श्रमिकों, उपभोक्ताओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों द्वारा वहन की जाती हैं, जबकि मुनाफ़ा निजी बना रहता है।

तीसरा, वैश्विक असमानताएँ खाद्य सुरक्षा के पैटर्न को आकार देती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भोजन से होने वाली बीमारी का सबसे अधिक बोझ अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में केंद्रित है, क्योंकि ये क्षेत्र औपनिवेशिक अविकास, ऋण निर्भरता, अपर्याप्त सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे, और वैश्विक अर्थव्यवस्था में असमान एकीकरण के दीर्घकालिक प्रभावों का लगातार सामना करते आ रहे हैं। इसलिए असुरक्षित भोजन केवल एक स्वास्थ्य मुद्दा नहीं है: यह असमान विकास की अभिव्यक्ति है।

बंगाल का अकाल, गोबर्धन ऐश (भारत), 1943.

हर साल हज़ारों बच्चों की मौतें इस व्यवस्था के नैतिक दिवलियापन को उजागर करती हैं। एक समाज जो बच्चों को भोजन से जुड़ी ऐसी बीमारियों से मरने देता है जिनकी रोकथाम की जा सकती है, वह अपने सबसे बुनियादी कर्तव्यों में से एक में विफल हो गया है। ये मौतें विशेष रूप से दुखद हैं क्योंकि समाधान काफी हद तक ज्ञात हैं। डब्ल्यूएचओ स्वच्छ पानी, स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा से जुड़ी आदतों, स्वास्थ्य सेवा, और प्रभावी सार्वजनिक विनियमन तक पहुँच को मृत्यु दर कम करने के लिए महत्त्वपूर्ण साधन मानता है। इन हस्तक्षेपों के लिए सार्वजनिक निवेश और राजनीतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है और इन्हें केवल बाज़ार की ताकतों पर नहीं छोड़ा जा सकता। फिर भी खाद्य और कृषि संगठन (एफ़एओ) जैसी संस्थाएँ सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल को बढ़ावा देना जारी रखती हैं जो भूख और असुरक्षित भोजन की संरचनात्मक जड़ों का सामना करने में विफल रही हैं।

मुद्दा केवल बैक्टीरिया और वायरस द्वारा दूषित होने का नहीं है। समकालीन खाद्य प्रणालियाँ जनसंख्या को ज़हरीले रसायनों, भारी धातुओं और औद्योगिक प्रदूषकों सहित ख़तरों की एक व्यापक श्रेणी के संपर्क में लाती हैं। डब्ल्यूएचओ के नए अनुमान खाद्य आपूर्ति में हानिकारक पदार्थों से जुड़ी पुरानी बीमारियों के दीर्घकालिक बोझ को स्वीकार कर रहे हैं। इसके परिणाम तत्काल बीमारी से परे आजीवन विकलांगता, विकासात्मक हानि, और जीवन की गुणवत्ता में कमी तक फैलते हैं।

सैटे [एक प्रकार का दक्षिण-पूर्वी एशियाई व्यंजन] बेचने वाले, चिओंग सू पिएंग (सिंगापुर), 1958.

इसके अलावा, खाद्य सुरक्षा को खाद्य प्रणालियों के व्यापक संकट से अलग नहीं किया जा सकता। दुनिया भर में, लाखों लोग भूख के शिकार हैं, जबकि अन्य मोटापे और आहार-संबंधी बीमारियों का सामना करते हैं। किसान क़र्ज़ में धकेल दिए जाते हैं, जबकि खाद्य निगम अभूतपूर्व बाज़ार शक्ति का संचय करते हैं। कृषि उत्पादन पारिस्थितिक विनाश में योगदान देता है, जबकि जलवायु परिवर्तन फ़सलों को ख़तरे में डालता है। वही प्रणाली जो खाद्य असुरक्षा उत्पन्न करती है, वही असुरक्षित भोजन भी उत्पन्न करती है। यह विरोधाभास चौंकाने वाला है। मानव समाज के पास सभी के लिए सुरक्षित भोजन सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान, उत्पादन क्षमता और तकनीकी साधन मौजूद हैं। फिर भी मौजूदा आर्थिक व्यवस्थाओं के तहत, ये क्षमताएँ मानवीय आवश्यकता के बजाय लाभ निचोड़ने के विचार के अधीन हैं।

डब्ल्यूएचओ के निष्कर्षों को न केवल खाने के दूषित होने को लेकर एक चेतावनी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, बल्कि एक वैश्विक खाद्य व्यवस्था के ख़िलाफ़ आरोप के रूप में भी, जो लाखों लोगों को रोकी जा सकने वाली बीमारी और मौत के सामने छोड़ देती है। जब एक बच्चा इसलिए मरता है क्योंकि भोजन असुरक्षित है, तो कारण केवल दूषित भोजन नहीं होता। उस भोजन के पीछे निवेश, विनियमन, बुनियादी ढाँचे, स्वामित्व, और सामाजिक प्राथमिकताओं के बारे में राजनीतिक और आर्थिक निर्णयों की एक शृंखला होती है। खाद्यजनित बीमारी अपनी तात्कालिक अभिव्यक्ति में जैविक है, लेकिन अपनी उत्पत्ति में सामाजिक है। मानवता के सामने चुनौती केवल भोजन को अधिक सुरक्षित बनाना नहीं है। यह मुनाफ़े के बजाय देखभाल, निजी संचय के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य, और बाज़ार दक्षता के बजाय मानवीय गरिमा पर आधारित खाद्य प्रणालियों का निर्माण करना है। तभी सभी के लिए सुरक्षित भोजन का वादा एक नारे के बजाय एक वास्तविकता बन सकता है।

मुर्दों का देश, उचे ओकेके (नाइजीरिया), 1961.

यहाँ पाँच ऐसे उपाय सुझाए जा रहे हैं जिनसे सुरक्षित और न्यायोचित खाद्य व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है:

  1. जल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवा में सार्वभौमिक सार्वजनिक निवेश: स्वच्छ जल, स्वच्छ बुनियादी ढाँचे और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच सुनिश्चित करना, विशेष रूप से ग्रामीण और निम्न-आय समुदायों में जहाँ खाद्यजनित बीमारी का बोझ सबसे अधिक है।
  2. सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा संस्थानों को मजबूत करना: खाद्य निरीक्षण प्रणालियों, प्रयोगशाला क्षमता, रोग रोकथाम नेटवर्कों और विनियामक एजेंसियों का विस्तार करना, साथ ही उन्हें बजट कटौती और कॉर्पोरेट प्रभाव से बचाना।
  3. क्षेत्रीय और छोटे-पैमाने की खाद्य प्रणालियों का समर्थन: स्थानीय किसानों, सहकारी समितियों, सार्वजनिक खरीद योजनाओं और छोटी आपूर्ति शृंखलाओं में निवेश करना, जो पारदर्शिता, लचीलापन और जवाबदेही बढ़ाती हैं।
  4. खाद्य प्रणाली शासन का लोकतंत्रीकरण: कृषि-व्यवसाय और खाद्य खुदरा क्षेत्र में कॉर्पोरेट के बढ़ते प्रभाव को कम करना, श्रमिकों और किसानों की भागीदारी को मज़बूत करना, और खाद्य उत्पादन तथा वितरण की सार्वजनिक निगरानी सुनिश्चित करना।
  5. सुरक्षित भोजन को मानव अधिकार के रूप में मान्यता देना: बाध्यकारी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ स्थापित करना जो सुरक्षित, पौष्टिक भोजन तक पहुँच को बाज़ार वस्तु के बजाय एक मौलिक सामाजिक अधिकार के रूप में मानती हैं।

ये सभी सुधार एक सरल सिद्धांत में निहित हैं: भोजन एक सामाजिक वस्तु है, केवल एक वस्तु (कमोडिटी) नहीं। ये मानते हैं कि सुरक्षित भोजन के अधिकार को जीवन के अधिकार से अलग नहीं किया जा सकता।

इस दृष्टिकोण को अव्यावहारिक कहकर ख़ारिज करना आसान है। लेकिन क्या यह महज़ आदर्शवाद है कि किसी भी बच्चे को रोकी जा सकने वाली खाद्यजनित बीमारी से नहीं मरना चाहिए?

आख़िरी भोजन, मलंगताना वालेंटे नग्वेन्या (मोज़ाम्बिक), 1964.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ने पूँजीवादी व्यवस्था की निर्दयता के प्रति मेरी कटुता को और गहरा कर दिया। मुझे महान मोज़ाम्बिकन पत्रकार और कवि जोस क्रावेइरिन्हा (1922–2003) की एक छोटी कविता ‘सभ्यता’ याद आ गई:

Antigamente
(antes de Jesus Cristo)
os homens erguiam estádios e templos
e morriam na arena como cães.
Agora…
também já constroem Cadillacs.
प्राचीन काल में
(ईसा मसीह से भी पहले)
इंसानों ने मंदिर और स्टेडियम बनाए
और अखाड़े में कुत्तों की मौत मरे।
आज…
वे कैडिलैक* भी बनाते हैं।

स्नेह सहित, 

विजय 

(*गाड़ियों का एक ब्रांड)