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सूक्ष्म वित्त का दुष्चक्र और केरल की सहकारी मिसाल

केरल ने भारत का सबसे बड़ा सहकारी बैंकिंग नेटवर्क बनाते हुए गरीबी खत्म की है। इसका उदाहरण साबित करता है कि बिना शोषण के वित्तीय समावेशन संभव है।

हरलीन कौर

यूनियन बजट 2026 पेश किया जाने वाला है। इस संदर्भ में गहराते सूक्ष्म वित्त (Microfinance) संकट की बात करना जरूरी हो जाता है। हालिया आँकड़ों के अनुसार कुल बकाया कर्ज 61,000 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। ट्राईकॉन्टिनेंटल संस्थान के दिसंबर 2025 अध्ययन में इस संकट का एक समयोचित विकल्प मिलता है। केरल की सहकारी बैंकिंग प्रणाली ने शोषण के बिना वास्तविक वित्तीय समावेशन को साकार कर दिखाया है, जिसका दावा वाणिज्यिक सूक्ष्म वित्त क्षेत्र ने किया था पर पूरा नहीं कर सका।

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) ने दिल्ली में अगस्त 2025 में सूक्ष्म वित्त पर एक राष्ट्रीय जन सुनवाई आयोजित की। इस सुनवाई में 500 से अधिक महिलाओं ने अपनी आप बीती सुनाई। उन्होंने बताया कि सशक्तिकरण के साधन के रूप में प्रचारित सूक्ष्म वित्त संस्थान महिलाओं को दमनकारी कर्ज और उत्पीड़न के चक्र में फँसा रहे हैं। इस सुनवाई से पहले एडवा ने देश के 100 जिलों में 9,000 से अधिक महिलाओं का सर्वे किया था। इस सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले थे। सर्वे में शामिल महिलाओं में से लगभग 40 प्रतिशत पर 50,000 रुपये से अधिक का ऋण था, जबकि अन्य 40 प्रतिशत पर 1 से 2.5 लाख रुपये का ऋण था। सर्वे में शामिल सत्तर प्रतिशत महिलाएँ ऐसे परिवारों से थीं जिनकी मासिक आय 10,000 रुपये से कम थी। लगभग एक-तिहाई महिलाएँ ऋण के दुष्चक्र में फँसी थीं, जो पुराना ऋण चुकाने के लिए दूसरी कंपनियों से नया उधार ले रही थीं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का निर्देश है कि सूक्ष्म वित्त बिना कुछ गिरवी रखे दिया जाना चाहिए। इसके बावजूद, एडवा ने पाया कि 50-60 प्रतिशत महिलाओं को अपना व्यक्तिगत सामान गिरवी रखने के लिए मजबूर किया गया था।

इस कर्ज की ब्याज दर भी बहुत ज़्यादा होती है। जहाँ सूक्ष्म वित्त कंपनियाँ बैंकों से 10-11 प्रतिशत की दर पर ऋण लेती हैं, वहीं ये कंपनियाँ महिलाओं से 22–26 प्रतिशत ब्याज वसूलती हैं। कई मामलों में यह ब्याज 60 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। एडवा के सर्वे में उजागर हुआ कि बहुत सारी महिलाओं को तो उनसे वसूली जा रही ब्याज दर की जानकारी तक नहीं थी। तगादा करने वाले वसूली एजेंट कर्ज लेने वाली महिलाओं को प्रताड़ित करने के लिए अलग-अलग तरह के हथकंडे अपनाते हैं। सर्वे में शामिल कर्जदार महिलाओं में से तीस प्रतिशत को धमकी और गाली-गलौच का सामना करना पड़ा, जबकि दस प्रतिशत का सामान जब्त कर लिया गया। पाँच प्रतिशत महिलाओं को शारीरिक या यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

यह संकट नीतिगत बदलावों की देन है। RBI ने 2014 में सूक्ष्म वित्त को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending, PSL) में शामिल किया। इस आदेश ने बैंकों के लिए एक आसान रास्ता खोल दिया। अब बैंक ग़रीबों को सीधे ऋण देने की बजाय इन सूक्ष्म वित्त कंपनियों को फंड देकर अपना PSL लक्ष्य पूरा कर सकते हैं। बैंकों ने छोटे प्रत्यक्ष ऋणों की बजाय संस्थानों को थोक ऋण देना पसंद किया। नतीजतन, जिन महिलाओं को सार्वजनिक बैंकों से 4–8 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण मिलना चाहिए था, वे निजी कंपनियों को 24-26 प्रतिशत ब्याज चुका रही हैं। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्य अब इस शोषक सूक्ष्म वित्त बाजार के गढ़ बन गए हैं।

नवीन एस (2025), दिनेश वस्त्र सहकारी समिति के दर्ज़ी

केरल: एक प्रभावी विकल्प

केरल अपने 4,146 सहकारी ऋण संस्थानों के नेटवर्क के साथ एक प्रभावी विकल्प प्रस्तुत करता है। इस नेटवर्क की आधारशिला 3 करोड़ से अधिक सदस्यों वाली प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (Primary Agricultural Credit Societies, PACS) हैं। समिति के सदस्य ही लोकतांत्रिक रूप से इनको चलाते हैं। भारत की सभी PACS समितियों में जमा राशि का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा (121.7 अरब रुपये) केरल की समितियों से आता है।

मुनाफ़ा कमाने वाले सूक्ष्म वित्त संस्थानों के विपरीत ये सहकारी समितियाँ मुनाफ़े का स्थानीय स्तर पर पुनर्निवेश करती हैं और वास्तव में ज़रूरतमंद तबकों के काम आती हैं। केरल के पचास प्रतिशत से कम आय वाले ग्रामीण परिवार ऋण के लिए इन समितियों पर निर्भर हैं, जिनमें दलित, आदिवासी और अत्यंत ग़रीब परिवारों की निर्भरता काफी अधिक है। RBI और सेंटर फॉर सोशियो-इकोनॉमिक एंड एनवायरनमेंटल स्टडीज के अध्ययन बताते हैं कि ग़रीब लोग सहकारी बैंकों को वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में अधिक सुलभ और भरोसेमंद मानते हैं, क्योंकि वाणिज्यिक बैंकों की जटिल प्रक्रियाएँ और औपचारिक माहौल उनके लिए रुकावटें पैदा करते हैं।

यह मॉडल जाति-विरोधी संघर्षों, सामाजिक सुधार और साम्यवादी आंदोलन से उभरा है। 1957 में भूमि सुधारों के बाद, ऋण सहकारी समितियों ने नए छोटे किसानों को आवश्यक पूंजी प्रदान की, ताकि वे साहूकारों के कर्ज में वापस न फँस जाएँ। पल्लियक्कल सर्विस कोऑपरेटिव बैंक इसका एक उदाहरण है। साल 2000 में जब बड़ी संख्या में कर्जदार कर्ज चुकाने में विफल हो रहे थे, तब बैंक ने वसूली के नियम कड़े करने के बजाय लोगों से समुदाय की बेहतरी पर उनकी सलाह लेने का विकल्प चुना। इसके बाद बैंक ने स्थानीय खाद्य आत्मनिर्भरता के लिए एक व्यापक योजना विकसित की, जिसके तहत सात कृषि क्षेत्रों में आपसी सहायता समूह बनाए गए। बैंक ने लोगों को कर्ज देने के साथ उनके लिए व्यावसायिक ट्रेनिंग व परामर्श सुविधाएँ शुरू की और साथ ही प्रोसेसिंग केंद्र बनाए तथा लोकल उत्पाद को प्रीमियम बाजारों तक पहुँचने में मदद की। आज, 1,000 से अधिक परिवार इस बैंक से जुड़े हैं। बैंक का यह टिकाऊ मॉडल जनता की लूट पर नहीं, बल्कि समुदाय की समृद्धि पर टिका है।

यह आत्मनिर्भरता विकसित करने का एक ठोस मॉडल है: जहां वित्तीय संस्थान अपने सदस्यों के हितों के लिए काम करते हैं क्योंकि सदस्य ही उन्हें नियंत्रित करते हैं। ये संस्थान सामूहिक विकास में निवेश करते हैं और स्थानीय समस्याओं को लोकतांत्रिक तरीके से हल करते हैं।

जुनैना मोहम्मद (2025), कुडुंबश्री

संरचनात्मक अंतर और मौलिक सच्चाई

केरल की सहकारी समितियों और वाणिज्यिक सूक्ष्म वित्त संस्थानों के बीच का यह संरचनात्मक अंतर एक बड़ी सच्चाई उजागर करता है। किसी वित्तीय प्रणाली का उद्देश्य, व उसके परिणाम, इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसका नियंत्रण किसके हाथों में हैं।

सूक्ष्म वित्त संस्थान, विशेष रूप से 2000 के दशक में इनके व्यावसायीकरण के बाद, मुनाफ़ा बटोरने का रास्ता बन गए हैं। अगस्त 2010 में, एसकेएस माइक्रोफाइनेंस ने शेयर बाज़ार में कदम रखा, और निवेशक वित्तीय समावेशन की सफलता के रूप में इसके गुण गाने लगे। लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर, आंध्र प्रदेश एक सूक्ष्म वित्त संकट में डूब गया। कर्ज चुकाने में विफल रहे 200 से अधिक लोगों ने आत्महत्या कर ली। इस संकट ने एक क्रूर सच्चाई उजागर की: जिस मॉडल को ‘ग़रीबों के लिए बैंकिंग’ के रूप में बाजार में उतारा गया था, वह असल में ग़रीबों की जेब से अमीर निवेशकों के खाते भरने की बैंकिंग बन गया था। इसमें महिलाओं को दोहरे उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। एक तो भेदभावपूर्ण सामाजिक मानदंडों के चलते अक्सर ऋण राशि पर महिलाओं का नियंत्रण नहीं होता, ऊपर से वसूली एजंटों के दमन का शिकार अधिकतर वे ही बनती हैं।

इसके विपरीत, केरल की सहकारी समितियाँ, जो जाति-विरोधी और मजदूर वर्ग आंदोलनों से निर्मित हुई हैं, ऋण को सामूहिक शक्ति को विकसित करने के साधन के रूप में देखती हैं। उनकी सदस्य-स्वामित्व वाली लोकतांत्रिक संरचना समुदाय की समृद्धि को मुख्य मिशन मानती है। ऋण वसूली में आने वाली चुनौतियों से उभरने के लिए पल्लियक्कल जैसी सहकारी समितियाँ पूरे समुदाय को उन्नत करने के लिए कृषि विकास में निवेश करती हैं। इस तरह के फ़ैसले उन कंपनियों को तर्कहीन लगेंगे जिनका उद्देश्य केवल मुनाफ़ा बढ़ाना है, लेकिन सदस्यों के नियंत्रण से चलने वाली संस्था इन्हें तरजीह देगी।

वरुणिका सराफ़ (2020), जुगनी

भारत के सामने विकल्प

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ब्रिकवर्क रेटिंग्स के अनुसार, मार्च 2025 तक सूक्ष्म वित्त क्षेत्र में बकाया ऋण लगभग दोगुना बढ़कर 16 प्रतिशत हो गया था। दूसरी तरफ़ वित्त वर्ष 2025 में, सूक्ष्म वित्त कंपनियों ने पिछले वर्ष की तुलना में 25.4 प्रतिशत कम ऋण दिए हैं, और कई उधारकर्ता इन्हें चुकाने में असमर्थ हैं। एडवा का सर्वे दिखाता है कि नियामक दिशानिर्देशों के बावजूद ऋण वसूली एजेंटों द्वारा उत्पीड़न जारी है।

एडवा द्वारा आयोजित जन-सुनवाई से अहम सुझाव सामने आए हैं। जैसे महिलाओं को 4 प्रतिशत ब्याज दर पर सस्ते ऋण का कानूनी अधिकार मिले; ब्याज दरों की अधिकतम सीमा लागू की जाए; सूक्ष्म वित्त क्षेत्र को प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) से हटाया जाए; और सार्वजनिक बैंकों में प्रत्यक्ष बैंकिंग प्रक्रिया का विस्तार किया जाए। ये कोई काल्पनिक प्रस्ताव नहीं हैं। ट्राईकॉन्टिनेंटल संस्थान के अध्ययन के अनुसार, केरल दशकों से इन्हें विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक अपना रहा है।

यह व्यवस्थागत अन्याय आँकड़ों में भी नज़र आता है। 2014 और 2024 के बीच, भारतीय बैंकों ने बड़ी कंपनियों के 16.35 लाख करोड़ रुपये के ऋण माफ किए, जिनमें से केवल 16 प्रतिशत ही वसूल किए गए थे। वहीं दूसरी तरफ़, बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए उधार लेने वाली गरीब महिलाएँ सूक्ष्म वित्त कंपनियों को 22-26 प्रतिशत ब्याज दर चुका रही हैं। सस्ते ऋण की मांग हाथ फैलाना नहीं, बल्कि हाथ उठा कर न्याय की माँग करना है। जनता की गरिमा केवल सब्सिडी वाले आटा-चावल से सुनिश्चित नहीं की जा सकती; इसके लिए गैर-शोषणकारी पूंजी तक उनकी पहुँच संभव बनाना आवश्यक है।

व्यक्तिगत त्रासदियाँ इस प्रणाली की क्रूरता को उजागर करती हैं: पश्चिम बंगाल की मयूरी नास्कर जैसी महिलाएँ, जो सूक्ष्म वित्त के उत्पीड़न से बचने के लिए जहर खाने को मजबूर हैं या लापता हो जाती हैं, लूट पर आधारित सिस्टम की जानी पहचानी परिणति हैं। केरल के 3 करोड़ के ज़्यादा सहकारी सदस्य साबित करते हैं कि एक बेहतर सिस्टम विकसित करना संभव है।

बजट 2026 तैयार किया जा रहा है। नीति निर्माताओं को तय करना है कि वे कर्ज लेने वाली ग़रीब जनता को लूट कर निवेशकों की जेब भरने वाले अन्यायपूर्ण व असफल मॉडल का समर्थन जारी रखेंगे, या केरल की सहकारी बैंकिंग मॉडल की सफलता से सीख लेंगे। केरल ने हाल ही में चरम ग़रीबी समाप्त की है, ऐसे में भारत की वित्तीय समावेशन रणनीति के लिए केरल के मॉडल का गंभीरता से अध्ययन करना और भी जरूरी हो जाता है।