मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह बिगाड़ रहा वायु प्रदूषण
दीपक भारती
हाल के कई शोध, जिनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के अध्ययन भी शामिल हैं, वायु प्रदूषण और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध होने की बात उजागर करते हैं। इनमें इससे भी चिंताजनक बात यह सामने आई कि वायु प्रदूषण अधिक होने और उसका शिकार बनने से अवसाद, बेचैनी और यहां तक कि आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति का ख़तरा बढ़ जाता है। इसका बच्चों और किशोरों पर ज़्यादा असर पड़ता है क्योंकि उनका दिमाग़ इस उम्र में विकसित हो रहा होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा शोध के मुताबिक, दुनिया में 10 में से 9 लोग ऐसी हवा में सांस ले रहे हैं, जो वायु-गुणवत्ता के निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करती।
बढ़ता खतरा
एनवायरमेंट, क्लाइमेट चेंज और हेल्थ की डब्ल्यूएचओ डायरेक्टर ने हाल ही में ‘साइंस इन 5’ वीडियो में वायु प्रदूषण के अदृश्य ख़तरों को बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों को ही नुक़सान नहीं पहुंचाता बल्कि मस्तिष्क पर भी गहरा असर डालता है, जिससे मस्तिष्क-संबंधी विकार और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। हाल ही में मानसिक स्वास्थ्य पर एक शोध किया गया जो ‘ प्रॉसिंडिग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस’ में प्रकाशित हुआ। इसके मुताबिक, वायु प्रदूषण से दिमाग़ में सूजन और साथ ही इसमें संरचनात्मक बदलाव की आशंका है। इसी तरह यूनिसेफ की एक रिपोर्ट ‘डेंजर इन एयर’ में ख़ुलासा हुआ कि वायु प्रदूषण का बच्चों के मस्तिष्क विकास पर लंबे समय के लिए असर पड़ सकता है, जिससे उनकी सीखने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
हमारे शहरों की हालत
देश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक ज़्यादातर दिनों में मध्यम से ख़राब और कई बार बेहद ख़राब की श्रेणी में रहता है, जिनमें दिल्ली और एनसीआर के नोएडा, गाजियाबाद, गुड़गांव और फरीदाबाद जैसे शहर शामिल हैं। इन शहरों में पिछले दस साल से ज़्यादा समय से दीपावली के आसपास लगभग एक महीने तक हवा बेहद ख़राब रहती है, जिससे लोगों को सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन होती है। प्रदूषण बढ़ने और उसका दिलोदिमाग़ पर नकारात्मक असर पड़ने की बात, बहुत तकनीकी या रॉकेट सांइस जैसी चीज़ नहीं है, जिसे आम आदमी समझ न सके। हम सब महसूस कर सकते हैं कि पिछले तीन-चार दशकों में जिस तरह से देश में शहरों के आकार बढ़े हैं, गाड़ियों की तादाद बढ़ी है और पेड़ काटे गए हैं, उसका असर हमारी ज़िंदगी पर पड़ा है। बढ़ते प्रदूषण की चुनौती कितनी गंभीर है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 31 अक्टूबर 2024 को दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर 603 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया था, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी मानकों से कई गुना ज़्यादा था।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) ने इसी 11 जुलाई को साल 2025 की पहली छमाही के दौरान देश भर में हवा की गुणवत्ता के विश्लेषण के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की। इसके मुताबिक दिल्ली अब भी देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर है। इसकी निगरानी वाले कुल 293 में से 239 शहरों में 80 से ज़्यादा दिनों तक पीएम 2.5 मटेरियल का डेटा उपलब्ध रहा। इन 239 में से 122 शहरों ने भारत के वार्षिक राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को पार कर लिया। जबकि 117 शहर इस सीमा से नीचे रहे। हालांकि, सभी 239 शहर डब्ल्यूएचओ के सख़्त वार्षिक मानक 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को पार कर गए। यानी वायु गुणवत्ता के भारतीय मानकों के मुताबिक, इस साल की पहली छमाही में 122 शहर प्रदूषित रहे।
बच्चे भी शिकार
भारतीय बच्चों और किशोरों में भी बढ़ता डिप्रेशन एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। चंडीगढ़ स्थित पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) और स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा किए एक अध्ययन से पता चला है कि स्कूल जाने वाले 13 से 18 साल के अधिकांश किशोर अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार बन रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस द्वारा 2016 में भारत के 12 राज्यों पर किए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि देश में क़रीब 2.7 फ़ीसदी लोग डिप्रेशन जैसे आम मेंटल डिस्ऑर्डर से पीड़ित हैं। एक अन्य अध्ययन के हवाले से पता चला है कि दुनिया में अस्थमा के क़रीब एक तिहाई मामले लंबे समय तक प्रदूषण के महीन कणों के सम्पर्क में रहने से जुड़े हैं। इसी तरह एनवायरमेंटल रिसर्च जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि गर्भावस्था और बचपन के शुरूआती दिनों में वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से मस्तिष्क के श्वेत पदार्थ की संरचना में बदलाव आ सकता है, जो मानसिक विकास को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। दिल्ली स्थित शोध एवं अध्ययन संस्थान ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट’ (सीएसई) ने अपनी नई रिपोर्ट में ख़ुलासा किया है कि भारतीय शहरों में ओजोन प्रदूषण के स्तर में चिंताजनक वृद्धि हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक इस साल गर्मियों के दौरान भारत के दस प्रमुख शहरी क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर पर ओजोन का स्तर काफ़ी बढ़ गया, जिससे इन क्षेत्रों में हवा कहीं ज़्यादा ज़हरीली हो गई। इससे दिल्ली सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है।
हरित-क्षेत्रों की कमी
देश के अधिकतर शहरों में उच्च और मध्य वर्ग के रिहायशी इलाक़ों में तो आबादी के हिसाब से पार्क मिल भी जाएंगे, निम्न वर्ग के बच्चे जिन इलाक़ों में रहते हैं वहां ऐसी कोई सुविधा भी नहीं होती। जिन शहरों में पार्क होते हैं, उनमें भी ज़्यादातर पार्कों में बच्चों के लिए झूले या खेलने के उपकरण नहीं होते और अगर होते भी हैं तो एक बार ख़राब हो जाने पर ठीक नहीं कराए जाते। दूसरी ओर स्कूलों में भी बिल्डिंगों का आकर जितना बड़ा होता है, उसकी तुलना में हरित क्षेत्र और खेलने की जगह कम होती है। घर और स्कूल के बाद पार्क ही वह हरित क्षेत्र है, जहां बच्चे रोज़ आसानी से जा सकते हैं, खेल सकते हैं और ताज़ा हवा में सांस ले सकते हैं। लेकिन शहरों में बिल्डिंगों, सड़कों और दूसरी जगहों की तुलना में पार्कों की जगह बेहद कम है और जितनी है भी, वह हर वर्ग और उसके बच्चों के लिए नहीं है। प्रदूषण ख़ासकर वायु प्रदूषण से निपटने के उपाय तलाशने में नाकाम रहने के कारण शहरों में लोग घरों के अंदर ही बने रहने को बेहतर विकल्प मानने लगे हैं। बच्चों को भी इसी वजह से बाहर जाने की इजाज़त नहीं मिलती। इसका नतीजा होता है- बच्चों के स्क्रीन टाइम में बढ़ोतरी। एक तरफ़ बाहर सड़कों पर धूल और धुआं और दूसरी तरफ घंटों मोबाइल पर नज़रें टिकाए रखने की आदत, जो शायद बच्चों के दिमागी तौर पर कुंद होने के ख़तरों को और बढ़ाती है।
बचाव के उपाय
ज़ाहिर है कि जलवायु-परिवर्तन का ख़तरा जितना बड़ा है और उससे निपटने की निजी और सामूहिक पहल जितनी सीमित है, उसमें प्रदूषण न सिर्फ़ बाक़ी बीमारियों को बढ़ा रहा है, ख़ुद भी एक लाइलाज बीमारी बन रहा है। गांवों तक शहरों जैसी सुविधाओं भले ही व्यापक स्तर पर न पहुंची हों, प्रदूषण,ख़ासकर वायु प्रदूषण से निपटने में उनके आसपास का हरित क्षेत्र प्रभावी भूमिका निभाता है। इसके चलते वहां लोग और बच्चे खेत, खलिहान और तराई जैसे हरित क्षेत्रों में समय बिता पाते हैं और कुछ हद तक इस बढ़ती विकराल समस्या से बच जाते हैं।
शोधों में सामने आए वायु प्रदूषण के गंभीर ख़तरों को देखकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लोगों से बचाव के क़दम उठाने की अपील की है। इनमें ज़्यादा यातायात वाले क्षेत्रों में जाने से बचना और कम प्रदूषण वाली जगहों में जाकर ‘आउटडोर गतिविधियां’ करना शामिल है। उसने सरकारों से वायु की गुणवत्ता में सुधार के लिए बड़े क़दम उठाने की मांग भी की, ऐसे क़दम जो आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद होने के साथ ही सार्वजनिक सेहत के लिए बेहतर नतीजे लाएं। अगर हमें अपने शहरों को स्वस्थ और ऐसी जगह बनाना है, जहां हर तरह के लोग ख़ुशी से रह सकें तो इनमें हरित क्षेत्रों का न सिर्फ़ आकार बढ़ाना होगा बल्कि उनमें पर्याप्त निवेश भी करना पड़ेगा। नीतियां बनाने वाले लोगों को प्रदूषण कम करने और इसके समानांतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मज़बूत करने और यातायात-प्रबंधन के लिए ठोस क़दम उठाने होंगे। इसके लिए न केवल निजी बल्कि सामूहिक स्तर पर प्रयास करने पड़ेंगे, जिससे सबको साफ़ हवा मिले और वे स्वस्थ रहें। यह सरकारों के साथ हमारी भी प्राथमिकता और ज़िम्मेदारी बननी चाहिए।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)