Skip to main content

सोवेटो पचास बरस बाद: जो दस्तावेज़ों में न मिले वह संघर्ष भुला दिया जाता है

दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद-विरोधी फोटोग्राफरों ने सबूत सहेजे, सामूहिक स्मृति बनाई, और कैमरे को राजनीतिक शिक्षा व अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का हथियार बनाया।

यह कला बुलेटिन अब्दुल्ला इब्राहिम (1934-2026) को समर्पित है। वे दक्षिण अफ़्रीका के मशहूर जैज़ संगीतकार और नस्लभेद विरोधी कार्यकर्ता थे जिनका इसी महीने देहांत हो गया। जीते जी उन्होंने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के साधनों, ख़ासतौर से पीआनो, को राजनीतिक प्रतिरोध के सशक्त हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। यही प्रतिरोध उनके गीत ‘सोवेटो’ में भी साफ़ झलकता है।

दक्षिण अफ़्रीका के शहर सोवेटो के ऑर्लैंडो वेस्ट इलाक़े में दो सड़कों, मोइमा और विलाकाज़ी, के कोने पर खड़े होकर देखें। बारह बरस के हेक्टर पीटरसन को 16 जून 1976, यानी आधी सदी पहले इसी महीने में, सुबह के साढ़े नौ बजे गोली मार दी गई थी। इसी जगह के क़रीब फ़ोटोग्राफ़र मसाना सैम्यूअल ‘सैम’ नज़ीमा ने अपने पेनटैक्स एस एल कैमरे और एक 50 मिमि लेंस से छह तस्वीरें ली थीं; इनमें से तीसरी तस्वीर दुनियाभर में देखी गई: अठारह साल के मबुइसा मखुबो हेक्टर के शरीर को उठाए भाग रहे थे, उनकी बहन एंटोनेट सिथोले उनके साथ भाग रही थी। उनके नीचे बिछी डामर की सड़क पर एक गहरी परछाईं पड़ रही थी। ये परछाईं कुछ बातों की गवाही दे थी – तस्वीर सुबह के वक़्त ली गई थी, सोवेटो रोड का वह ख़ास हिस्सा जहाँ यह घटना घटी और वह घड़ी जब रंगभेदी राज्यतंत्र ने एक स्कूली छात्र को गोली मारी।

16 जून 1976 को हेक्टर पीटरसन को मबुइसा मखुबो द्वारा उठाकर ले जाते हुए। साभार: सैम नज़ीमा

यह तस्वीर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक बन गई। 80 के दशक में अंतर्राष्ट्रीय रंगभेद-विरोधी आंदोलनों ने इसे अनगिनत बार पोस्टरों और टीशर्टों पर छापा, जिनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लोगों के साथ एकजुटता संगठन (OSPAAAL) और लंदन में रंगभेद-विरोधी आंदोलन (AAM) से लेकर बोत्सवाना के गैबोरोन में मेडू कला समूह (Medu Art Ensemble) आदि शामिल थे। इन सभी समूहों ने मिलकर रंगभेदी शासन की क्रूरता को दुनिया के सामने रखा और उसे हराने के लिए एक वैश्विक आंदोलन खड़ा करने में सहायता की। लेकिन यह बुलेटिन इस एक तस्वीर के बारे में नहीं है बल्कि फ़ोटोग्राफ़रों की उस पूरी पीढ़ी के बारे में है जिन्होंने नस्लभेद को अपनी तस्वीरों में क़ैद किया, उसमें निहित अंधकार को उजागर किया और उस मुक्ति संघर्ष को इतिहास के पन्नों के लिए दर्ज किया जो इस बर्बर शासन के ख़िलाफ़ लड़ा गया।

सोवेटो विद्रोह को तस्वीरों में उतारना

16 जून 1976 को 3,000 से 10,000 के बीच स्कूली छात्रों ने ग्यारह क़तारों में ऑर्लैंडो स्टेडियम की ओर मार्च निकाला। उनकी तात्कालिक शिकायत थी कि अफ़्रीकन स्कूलों में बिना सलाह-मशवरा किए शिक्षा का माध्यम अफ्रीकान्स बना दिया गया था। इसके अलावा उनकी व्यापक शिकायत बंटू शिक्षा के विरुद्ध थी – या, जैसा कि इसे दो दशक लगाकर तैयार करने वाले प्रधानमंत्री हेंड्रिक फर्वूर्ड कहते थे, एक ‘अलग और निम्न’ व्यवस्था, जिसे ब्लैक बच्चों को यह समझाने के लिए डिज़ाइन किया गया था कि उनके श्रम के अलावा उनके लिए कोई स्थान नहीं है। सोवेटो स्टूडेंट्स रिप्रेज़ेंटटिव काउन्सिल ने नेलेडी हाई स्कूल से 13 जून को मार्च निकालने का फ़ैसला किया। इस काउन्सिल का नेतृत्व कर रहे थे उन्नीस वर्षीय टेबोहो ‘त्सीत्सी’ माशिनिनी, उन्नीस वर्षीय मर्फ़ी मोरोबे और सोलह वर्षीय सेथ मज़ीबुको।

सुबह साढ़े नौ बजे पहली बार गोलियाँ चलाई गईं। पंद्रह साल लेस्ली ‘हेस्टिंग्स’ एनडलोवु मारे जाने वाले पहले छात्र थे; हेक्टर पीटरसन दूसरे। दिन ढलते-ढलते, सोवेटो में कम-से-कम तेईस छात्र मारे गए थे, इनमें से ज़्यादातर बच्चे थे। साल ख़त्म होते-होते, पूरे देश में 700 से ज़्यादा छात्रों की हत्या कर दी गई थी।

घुटनों के बल बैठकर लिखते छात्र, 60 का दशक, साभार: अर्नेस्ट कोल

इन छात्रों को फ़ोटोग्राफ़रों का साथ रहा। सैम नज़ीमा द वर्ल्ड  के लिए काम करते थे, यह उस समय देश का प्रमुख ब्लैक अख़बार था; पीटर माग़ुबाने रैंड डेली मेल के लिए तस्वीरें खींचते थे; और ऐल्फ़ कुमालो संडे टाइम्ज़ के लिए काम करते थे। इन्होंने तस्वीरें खींची। मार खाई। कुछ गिरफ़्तार भी हुए। लेकिन तमाम जोखिमों के बावजूद इन फ़ोटोग्राफ़रों ने हर संभव तरीक़े से नेगेटिव पहुँचाने का काम किया।

कुमालो सोवेटो में रहते थे और उन्होंने लगभग आधी सदी तक इस शहर को तस्वीरों में दर्ज किया। जिस रंगभेदी शासन को वे अपनी तस्वीरों के ज़रिए उजागर कर रहे थे उसने उन्हें प्रताड़ित किया। वे याद करते हैं ‘मुझे गिरफ़्तार किया गया, मारा गया। उन्होंने मेरा सिर फोड़ दिया’।

ये तस्वीरें सिर्फ़ सोवेटो में उस दिन हुई बर्बरता की गवाह भर नहीं हैं। क्रिस हानी बारागवानाथ अस्पताल में डॉक्टर मैल्कम क्लाइन ने पाया कि कुछ घायलों के ‘घाव अजीब’ थे: उनके शरीर के ऊपरी हिस्सों में गोली घुसने के छोटे छेद और निचले हिस्से से निकलने के बड़े छेद’ मिले। डॉक्टरों को बाद में समझ आया कि पुलिस हेलिकॉप्टरों से गोलियाँ चला रही थी। पुलिस ने गोलियों से घायल दाखिल हर मरीज़ के नाम की लिस्ट माँगी ताकि उन पर ‘दंगों’ के लिए कार्रवाई की जा सके, लेकिन डॉक्टरों और दाखिल करने वाले क्लर्कों ने मना कर दिया। बल्कि दाख़िले की वजह उन्होंने ‘फोड़े’ लिखा। क्लाइन ने कहा ‘ऐसा करके हमने अनगिनत मरीज़ों को दोबारा पुलिस की बर्बरता का सामना करने से बचाया’।

कैमरा मेरी बंदूक़ था

उस सुबह के बाद भी कैमरे चलते रहे, दशकों तक, तस्वीरें उन घटनाओं की दस्तावेज़ हो गईं तथा राजनीतिक शिक्षा, साझी स्मृति और प्रतिरोध का हिस्सा हो गईं। पीटर मगुबाने याद करते हैं कि सोवेटो में उस सुबह अपनी तस्वीर उतारे जाने के लिए मना करने वाले युवा प्रदर्शनकारियों से उन्होंने कहा था ‘जो संघर्ष दर्ज न किया जाए वह संघर्ष ही नहीं’। मगुबाने ने ख़ुद 1969 में अपनी तस्वीरों के लिए 586 दिन एकांत कारावास में बिताए, वे अमूमन बाइबल को खोखला करके उसमें कैमरा छिपा लिया करते थे।

ज़्वेलित्शा, किंग विलियम्स टाउन (अब क़ोंसे), पूर्वी केप, 1978 में अंतिम संस्कार जुलूस। साभार: पीटर मगुबाने

सोवेटो: द फ़्रूट ऑफ़ फ़ियर (1986) में छपी मुगबाने की तस्वीरों को देखें: मातम करने वालों से भरी एक बस, खिड़कियों से निकलती उनकी बुलंद मुट्ठियाँ, बस की छत पर बैठे और लोग; उनके पीछे गाड़ियों का एक क़ाफ़िला, उनके पीछे फैली पहाड़ियाँ। यह साल था 1978; जगह पूर्वी केप, स्टीव बीको का इलाक़ा। स्टीव उस ब्लैक कॉन्‌शस्‌नेस्‌ मूवमेंट [ब्लैक चेतना आंदोलन] के सह-संस्थापक थे जिसने सोवेटो विद्रोह को प्रेरित किया। बीको की सितंबर 1977 में पुलिस हिरासत में हत्या कर दी गई थी। यहाँ, मुगबाने ने रंगभेदी शासन के दौर में राजनीतिक प्रतिरोध के एक नए स्वरूप को दर्ज किया, जब सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबंध लग गए तो अंतिम यात्राओं ने उनकी जगह ले ली। इसी तरह कैमरे ने भी एक नई भूमिका ले ली। जैसा कि मगुबाने ने कहा ‘मैं अपनी बंदूक़ लेके चल सकता था; कैमरा ही मेरी बंदूक़ था। मैं इस बंदूक़ से रंगभेद को मार सकता था’।

एक और तस्वीर देखें, यह अर्नेस्ट कोल ने ली थी। ब्लैक पुरुषों की एक क़तार, वे निर्वस्त्र थे और एक दीवार की ओर मुँह करके खड़े थे, उनके हाथ ऊपर थे और रंगभेदी प्रवासी मज़दूर प्रणाली के तहत खदानों में काम करने के लिए उनकी चिकित्सा जाँच की जा रही थी। लोगों को अलग-अलग श्रेणियों में रखने वाली व्यवस्था ने कोल के साथ भी ऐसा ही किया: अपने नेगेटिवों के साथ दक्षिण अफ़्रीका से बाहर जाने के लिए उन्हें एक पासपोर्ट की ज़रूरत थी, जिसके लिए उन्हें ख़ुद को फिर से ब्लैक से ‘कलर्ड’ [मिश्रित जाति] की श्रेणी में डलवाना पड़ा, यहाँ तक कि अपने नाम की वर्तनी ‘Kole’ से बदलकर ‘Cole’ करनी पड़ी ताकि यह अधिक इंग्लिश लगे। वे जिन तस्वीरों के नेगेटिव देश से बाहर ले जा पाए, वे 1967 में यूनाइटिड स्टेट्स में एक क़िताब के रूप में छपीं। क़िताब का नाम था हाउस ऑफ़ बॉन्डेज़  [ज़ंजीरों का घर], इसमें खदानकर्मियों वाली तस्वीर भी थी। इस क़िताब को दक्षिण अफ़्रीका में बैन कर दिया गया। दक्षिण अफ़्रीका एम्बसी ने कोल का पासपोर्ट रिन्यू करने से मना कर दिया जिस वजह से उन्हें सालों तक सड़कों पर रहना पड़ा। 1990 में दक्षिण अफ़्रीका के महानतम फ़ोटोग्राफ़रों में से एक ने न्यूयॉर्क में देशहीन व्यक्ति के रूप में दम तोड़ा। उनकी अस्थियाँ बाद में दक्षिण अफ़्रीका लाई गईं और मामेलोदी में दफ़नाई गईं।

रात में सफ़ाईकर्मी बोर्डरूम का टेबल साफ़ करते हुए, जोहंनेसबेरग, 1984। साभार: लेस्ली लॉसन

लेस्ली लॉसन की ली हुई एक तस्वीर है वर्किंग विमन (1985) [कामकाजी महिलाएँ]। लॉसन ने 80 के दशक के शुरुआती दौर में दक्षिण अफ़्रीका में काम करती हुई ब्लैक महिलाओं की तस्वीरें लीं, इनमें शहर के बाहरी श्वेत इलाक़ों के रसोईघरों में घरेलू कामगार महिलाएँ और फ़ैक्टरियों में उत्पादन लाइनों में काम कर रही मज़दूरों से लेकर श्वेत मालिकों के खेतों में काम करने वाली खेत मज़दूरों तक सब शामिल थीं। इस क़िताब में लेस्ली की तस्वीरों के साथ इन महिलाओं के अपने शब्द भी छपे जिनमें उन्होंने काम के घंटों, वेतन और काम पर जाने के सफ़र के बारे में बात की। ऐसा करके लेस्ली ने महिलाओं के उस श्रम को तस्वीरों में दर्ज किया जो रंगभेदी शासन की अर्थव्यवस्था को चलाता था। लेकिन यह श्रम उस दशक के प्रतिमा विज्ञान (आइकनोग्राफी) से लगभग ग़ायब था। लॉसन ने दक्षिण अफ्रीकी उच्च शिक्षा समिति (SACHED) के साथ काम किया, जो मज़दूरों का शिक्षा ट्रस्ट था, और “वर्किंग विमन” न केवल मज़दूरों के अध्ययन समूहों (स्टडी ग्रूप) के लिए एक शिक्षण टूल के रूप में काम आई बल्कि एक दस्तावेज़ी अभिलेख के रूप में भी।

संतु मोफोकेंग की 1986 की फोटोग्राफी शृंखला, ट्रेन चर्च को देखें। एक तस्वीर भोर में सोवेतो-जोहान्सबर्ग कम्यूटर लाइन के एक डिब्बे को कैद करती है: मज़दूर हाथ उठाए, गीत गा रहे हैं, जबकि एक व्यक्ति ट्रेन की भीतरी दीवार को हाथ से ड्रम की तरह बजा रहा है। कम्यूटर लाइन रंगभेदी अर्थव्यवस्था की दैनिक प्रणाली का हिस्सा थी, जो ब्लैक मज़दूरों को भोर से पहले और अंधेरे के बाद श्वेत शहर से ले जाती और लाती थी। यह एक चर्च में बदल गई थी, जहाँ अधिकतर मध्यम आयु वर्ग की महिलाएँ काम के कपड़ों में गाती थीं, प्रचार करती थीं और सांत्वना पाती थीं। यह “एक दैनिक अनुष्ठान” था, जैसा कि मोफोकेंग ने इसे कहा। रंगभेदी अर्थव्यवस्था के अमानवीय तर्कों के बावजूद, ब्लैक मज़दूर लगातार उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का सक्रिय निर्माण कर रहे थे, जो व्यवस्था उन्हें हासिल नहीं करने देती थी। मोफोकेंग ने कहा कि उनकी अपनी प्रतिबद्धता “सामान्य ब्लैक दक्षिण अफ़्रीकियों को जीवन के दैनिक काम-काज में व्यस्त” तस्वीरों में क़ैद करने की थी – जो अस्तित्व बनाए रखने और सामूहिक जीवन में छिपा प्रतिरोध का एक स्वरूप था।

पूजा करते हाथ, ट्रेन चर्च शृंखला से जोहान्सबर्ग-सोवेटो लाइन, 1986। साभार: संतु मोफोकेंग

इनमें से कोई भी तस्वीर अकेले सफल नहीं होती; सब ही इस सामूहिक जीवन में रची-बसी थीं और कई तो राजनीतिक संगठन में काम आईं। ओमर बादशाह का जन्म 1945 में डरबन के भारतीय समाज में हुआ। फ़ोटोग्राफ़र बनने से पहले वे मज़दूर संगठन कार्यकर्ता थे, और केमिकल वर्कर्स इंडस्ट्रीयल यूनीयन के पहले महासचिव थे। उन्होंने 1975 में अपना पहला कैमरा ख़रीदा ताकि फ़ैक्टरी के हालात की तस्वीरें ले सकें और मज़दूरों को जागरूक कर सकें। 1981 में बादशाह ने एफ़्रापिक्स नाम के कलेक्टिव के गठन में मदद की। यह लगभग चालीस महिला और पुरुष फ़ोटोग्राफ़रों का समूह था जो जोहान्सबर्ग में दक्षिण अफ़्रीका के चर्चों की काउन्सिल के खोत्सो हाउस से काम करता था, इसके डार्करूम (वे अंधेरे कमरे जहाँ नेगेटिव से तस्वीरें तैयार की जाती हैं) डरबन और केप टाउन में थे। खोत्सो हाउस पर छापा मारा गया था और 1986 में इस पर बमबारी भी की गई।

इन तमाम तस्वीरों और राजनीतिक कार्यों को एक कड़ी जोड़ती थी ब्लैक चेतना, एक आंदोलन और वे विचार जिन्हें स्टीव बीको ने सबसे पहले सुसंगत रूप से पेश किया था। दक्षिण अफ्रीकी छात्र संगठन के 1973 के नीति घोषणापत्र में, बीको ने लिखा कि ब्लैक चेतना आंदोलन “ब्लैक समुदाय को उनके स्वयं में, उनके प्रयासों, उनके मूल्य-तंत्रों, उनकी संस्कृति, उनके धर्म और उनके जीवन-दृष्टिकोण के प्रति एक नए स्वाभिमान से भरना चाहता है”। बीको द्वारा परिभाषित ‘ब्लैक व्यक्ति’ एक राजनीतिक श्रेणी थी, जिसमें वे सभी आते थे जिन्हें रंगभेदी राज्य ने अपनी गैर-श्वेत श्रेणियों में रखा था – खानों और टाउनशिप के अफ्रीकी मज़दूर, केप की फैक्ट्रियों और बंदरगाहों के कलर्ड मज़दूर, भारतीय और चीनी बंधुआ मज़दूरों के वंशज, जिन्हें ब्रिटेन ने गन्ना काटने या सोने की खानों में काम करने के लिए भेजा था। उन्होंने इन सभी को उस बहुमत के रूप में रखा जो श्वेत पूँजी से उनके संबंध द्वारा परिभाषित था। इसी कारण, बीको ने जोर देकर कहा, “ब्लैक समुदाय के विभिन्न वर्गों के बीच ब्लैक एकजुटता के महत्व को कम नहीं आँका जाना चाहिए”। रंगभेद-विरोधी आंदोलन की तस्वीरें भी पूरे औपनिवेशिक दृश्य और नस्लीय व्यवस्था को साफ़-साफ़ पेश करने और उसे ध्वस्त करने के लिए एकजुटता बनाने से जुड़ी थी।

बर्बरता को छिपाने की कोशिश

आज पचास साल बाद और रंगभेद के कानूनी अंत के तीन दशक से भी अधिक समय बाद, नस्ली-पूँजीवादी व्यवस्था अभी भी बनी हुई है। हेक्टर पीटरसन की तस्वीर और सोवेतो में 16 जून की वार्षिक स्मृति दक्षिण अफ्रीका, पूरे महाद्वीप और पूरे प्रवासी समुदाय में नई पीढ़ियों को मुक्ति के अधूरे काम के लिए उनके अपने संघर्षों में प्रेरित करती रहती है।

डीप्स्लूट, जोहान्सबर्ग में युवा, रात के आकाश के विरुद्ध छायाचित्र, 1970 के दशक। साभार: एल्फ कुमालो

यह संघर्ष केवल दक्षिण अफ़्रीका तक सीमित नहीं है। अक्टूबर 2023 में अमेरिका-समर्थित इज़राइली जनसंहार शुरू होने के बाद से, दो सौ से अधिक फ़िलिस्तीनी पत्रकार – जिनमें फोटोग्राफ़र भी शामिल हैं – मारे गए हैं। जिन लोगों ने दुनिया को ग़ज़ा को देखते रहने के लिए मजबूर किया है, उनमें बिसान ओव्दा शामिल हैं, जिनके ग़ज़ा से रोज़ आने वाल सोशल मीडिया वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुँचे हैं। इसी तरह वाएल दहदूह, अल जज़ीरा के ब्यूरो प्रमुख,  ने जनवरी 2024 में अपने बेटे, कैमरामैन हमज़ा दहदूह, को दफनाने के बाद भी रिपोर्टिंग जारी रखी। उनके साथ असंख्य फ़िलिस्तीनी फोटोग्राफ़र, पत्रकार और आम लोग हैं, जो अपनी दुनिया की बर्बादी को देख भी रहे हैं और उसका लेखा-जोखा भी बना रहे हैं। ट्राईकॉन्टिनेंटल की डोसियर, Despite Everything: Cultural Resistance for a Free Palestine, नक़बा के बाद से प्रतिरोध का दस्तावेज़ीकरण करने वाले फ़िलिस्तीनी सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की लंबी यात्रा का पता लगाती है, और इस बात पर जोर देती है कि दस्तावेजीकरण के बिना कोई संघर्ष नहीं है।

जैसा कि मिरियम मेकबा ‘सोवेतो ब्लूज़‘ में गाती हैं, राज्य ने उस जनसंहार को “शहर के बीच थोड़ी-सी बर्बरता” बनाकर कमतर आँकने की कोशिश की। पचास साल बाद, तस्वीरें, गीत, गवाहियाँ और संघर्ष के अभिलेख उस मिटाने की कोशिश को विफल कर रहे हैं।

बच्चों को मालिक का एक ख़त मिला
उसमें लिखा था: खोसा, सोथो, ज़ुलु अब और नहीं
बच्चों ने फ़रमान अस्वीकार किया, उन्होंने जवाब भेजा
तब पुलिसवाले उतरे बचाव में
बच्चे हवा में उछाले जा रहे थे, गोलियाँ, वो मर रहे थे
माएँ चिल्ला रही थीं, रो रही थीं
पिता शहरों में काम कर रहे थे
शाम के अख़बार ने कहा:
बस ज़रा-सी बर्बरता, शहर के बीचोंबीच

एकजुटता में,

टिंग्स चक 

कला निर्देशक, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान