क्रांति सिर्फ़ संस्कृति और विचारों से ही जन्म लेती है
साम्राज्यवादी हमले संस्कृति को हथियार बनाते हैं, लेकिन सच यह है कि कला-साहित्य प्रतिरोध और नए समाज के निर्माण का एक अनिवार्य हिस्सा हैं।
‘पोर क्यू कैंटामोस / कैनसियोन नुएवा’ (हम क्यों गाते हैं / नया गीत) सुनिए, जो ‘ए डोस वोसेस’ (दो आवाज़ों में) से लिया गया है। यह मारियो बेनेदेत्ती और डैनियल विग्लियेट्टी के बीच एक सहयोग है, जिसमें बेनेदेत्ती द्वारा ‘पोर क्यू कैंटामोस’ का पाठ और विग्लियेटी का गीत ‘कैनसियोन नुएवा’ एक साथ प्रस्तुत किए गए हैं।
लैटिन अमेरिका में जनता के आंदोलनों की राह और उनकी संस्कृति का विकास हमेशा से आपस में घुले-मिले रहे हैं। पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में स्पैनिश और पुर्तगाली उपनिवेशवाद से लेकर उन्नीसवीं सदी के स्वतंत्रता आंदोलनों और 1823 के मोनरो सिद्धांत के दौर तक लैटिन अमेरिका के लोगों ने वर्चस्व के हर रूप का विरोध किया है। क्यूबा की आज़ादी के संघर्ष के प्रमुख नेता जोस मार्टी ने 1891 में इस महाद्वीप की राजनीतिक और सांस्कृतिक एकता के बारे में नुएस्ट्रा अमेरिका (हमारा अमेरिका) नाम से एक निबंध लिखा। यह लैटिन अमेरिकी जनता के प्रतिरोध की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में से एक है।
मार्टी के लिए नुएस्ट्रा अमेरिका सिर्फ़ उस विशाल भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं था जो रीओ ग्रांडे से लेकर मैगलन जलडमरूमध्य’ तक फैला हुआ है, बल्कि यह इस महाद्वीप के इतिहासों, संस्कृतियों और संघर्षों में रचा-बस एक सांस्कृतिक प्रोजेक्ट है। यह मार्टी के चिंतन की साम्राज्यवाद-विरोधी ताकत थी: लैटिन अमेरिका ख़ुद को जानकर ही ख़ुद को मुक्त कर सकता था, उन स्वदेशी, अफ्रीकी, किसान और लोकप्रिय जड़ों को पहचानकर जिनका उपनिवेशवाद और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने तिरस्कार किया था।
जैसा कि मार्टी ने नुएस्ट्रा अमेरिका में लिखा: ‘एक समस्या के सभी पहलुओं को जान लेने के बाद उन्हें हल करना, उन्हें बिना जाने हल करने से आसान होता है।… समझ तैयार करना ही समस्या को हल करना है। और इस समझ के साथ किसी देश को जानना और उस पर शासन करना ही निरंकुशता से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय है’। लैटिन अमेरिका के पूरे इतिहास में इस स्व-ज्ञान को पुनरुत्पादित करने का एक प्रमुख साधन यहाँ का साहित्य रहा है। कविताओं, उपन्यासों, निबंधों और गीतों के ज़रिए इस महाद्वीप के लोगों ने अपने यथार्थ को प्रस्तुत किया है। यह प्रस्तुति अमूर्त नहीं बल्कि उनके भोगे गए अनुभव हैं।
लेखक ट्रक द्वारा मिनास दे फ्रियो, क्यूबा की यात्रा करते हुए, तिथि अज्ञात। स्रोत: रेविस्ता कासा दे लास अमेरिकास।
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में लैटिन अमेरिका में गहन राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन हुए। 1959 में क्यूबा की क्रांति ने इस टापू देश को यूनाइटिड स्टेट्स (यूएस) की अधीनता से निकाला और एक ऐसे समाजवादी परिवर्तन की प्रक्रिया की शुरुआत की जो आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का पुनर्निर्माण करना चाहती थी। इसने इस क्षेत्र की अन्य संघर्षरत जनता को उम्मीद दी। इसके जवाब में यूएस ने अपना साम्राज्यवादी हमला और तीखा कर दिया: नुएस्ट्रा अमेरिका में 1961 में यूएस ने क्यूबा के ख़िलाफ़ बे ऑफ़ पिग्स असफल आक्रमण में सहयोग दिया, 1964 ब्राज़ील में सैन्य तख़्तापलट की कोशिश का समर्थन किया, 1973 से पहले चिली में साल्वाडोर अलेंदे की सरकार को अस्थिर करने की कोशिशें कीं, और 1970 के दशक में पूरे महाद्वीप में तानाशाहों के पक्ष में और विद्रोहों को दबाने के लिए आक्रामक कार्यक्रमों को समर्थन दिया।
इस पृष्ठभूमि में, साहित्य प्रतिरोध में अपनी अहम भूमिका निभाता रहा, ख़ासतौर से 1960 और 1970 के दशक में लैटिन अमेरिका में बेहद तेज़ी से बढ़ती साक्षरता के दौरान। इस दौर में कई लेखकों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। इस दौर में कला और राजनीति के अंतरसंबंध पर हमेशा से चली आ रही बहस एक बार फिर उभरी। लैटिन अमेरिका के इस दौर में इस बहस के केंद्र में थी क्यूबा की क्रांति और इसकी सांस्कृतिक नीति।
क्रांति के पहले साल में नई सरकार ने कई सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना की, इनमें शामिल थे नेशनल थिएटर, क्यूबन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सिनेमैटोग्राफ़िक आर्ट एंड इंडस्ट्री (आईसीएआईसी), और कासा दे लास अमेरिकास। हायदी संतामारिया के नेतृत्व में कासा दे लास अमेरिकास लैटिन अमेरिका में संस्कृति, कला और साहित्य के बारे में विचार का एक अनिवार्य केंद्र बना। उरुग्वे के लेखक मारियो बेनेदेत्ती (1920-2009) ने कासा के राजनीतिक और सांस्कृतिक काम में बहुत अहम भूमिका निभाई। उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिका में साहित्य को प्रतिरोध के क्षेत्र के रूप में स्थापित करने में मदद की। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के अन्य कई लैटिन अमेरिकी लेखकों की ही तरह मारियो का साहित्यिक और राजनीतिक विकास भी कासा दे लास अमेरिकास से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था।
कासा की पत्रिका रेविस्ता कासा दे लास अमेरिकास पहली बार 1960 में छपी। इसने लैटिन अमेरिकी और कैरिबियाई संस्कृति के मुक्ति से जुड़े पहलू को फैलाने और विकसित करने में केंद्रीय भूमिका अदा की। ऐसा करके इसने एक नए समाज के निर्माण में अपना योगदान दिया।
इन संस्थानों के गठन के साथ-साथ, 1961 में फ़िदेल कास्त्रो ने अपने भाषण पलाब्रास ए लॉस इंटेलेक्चुअल्स (बुद्धिजीवियों के लिए कुछ शब्द) में क्रांति की सांस्कृतिक नीति की आधारशीला की रूपरेखा पेश की। कोनराडो बेनीतेज़ ब्रिगेड जैसे कार्यक्रम क्यूबा के साक्षरता अभियान के केंद्र में थे, और इसके साथ ही क्लासिकल साहित्यिक रचनाओं की लाखों प्रतियों का मुफ़्त वितरण संस्कृति को लोगों के एक अधिकार के तौर पर स्थापित करने की व्यापक कोशिश का अहम अंग बना। ग़ौरतलब है कि क्रांति की प्रक्रिया में जो पहली किताब छापी और बाँटी गई वह थी मिगुएल दे सर्वेंट्स की डॉन क्विक्सोट।
लेकिन इसके साथ क्यूबा के ख़िलाफ़ यूएस का साम्राज्यवादी हमला भी सांस्कृतिक क्षेत्र तक फैल गया। कासा दे लास अमेरिकास के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सीआईए के पैसे से चलने वाली कांग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ़्रीडम ने 1966 में पेरिस से मुंडो नुएवो (नई दुनिया) नाम की पत्रिका निकाली। इस पत्रिका के निदेशक थे उरुग्वेयाई आलोचक एमीर रोद्रिगेज़ मोनेगाल। इस पत्रिका ने ख़ुद को एक स्वतंत्र साहित्यिक पत्रिका के रूप में पेश करते हुए लैटिन अमेरिका में तेज़ी से उभर रहे लेखकों को क्यूबाई क्रांतिकारी प्रोजेक्ट से हटाकर उदार कम्युनिज़म-विरोधी ख़ेमे में ला दिया।
जैसे-जैसे पूरे महाद्वीप में क्रांति और प्रति-क्रांति के बीच टकराव हुए, वैसे-वैसे लेखकों ने क्यूबा में समाजवाद के निर्माण और शीतयुद्ध के दौरान यूएस द्वारा किए गए सांस्कृतिक हमले, दोनों पर अलग-अलग राय देनी शुरू कर दी। लैटिन अमेरिका में लेखन में आए ज़बरदस्त उत्थान के दौर के प्रमुख लेखक, जैसे जूलियो कोर्टाज़ार, मारियो वर्गास ल्योसा, गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ और कार्लोस फुएंतेस, इस बहस में ख़ास और कभीकभार अंतर्विरोधी तौर पर शामिल हुए। इससे यह उजागर हुआ कि साहित्य और कला अपने दौर के व्यापक राजनीतिक संघर्षों से अछूते नहीं रह सकते।
इसी संदर्भ में वर्ग संघर्ष में बेनेदेत्ती द्वारा प्रतिपादित लेखक की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। हवाना में कल्चरल कांग्रेस के बाद 1968 में क्यूबा पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में बेनेदेत्ती ने यह राय पेश की:
अगर हर क्रांतिकारी का यह फ़र्ज़ है कि क्रांति लाने के लिए काम किया जाए, तो उसी तरह हर लेखक का फ़र्ज़ है साहित्य रचना … साहित्य, अन्य कार्यों के साथ-साथ, इंसान के वैचारिक पटल का विस्तार करता है। लोग महान साहित्य के अर्थों – अंतिम या फ़ौरी – को जहाँ तक समझ पाते हैं, वे हमारे संघर्षों के क़रीब आते हैं। और अगर वे दुश्मन द्वारा उन पर थोपे गए अलगाव का विश्लेषण कर पाएँ तो यह क़रीबी और गहरी हो जाती है। इसलिए, हम जुझारू लेखकों पर कोई संकीर्ण थीम या सामान्य दृष्टिकोण थोपने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं करते।
इसलिए, साहित्य की संभावना लेखक की राजनीतिक राय से आगे जाती है, हालाँकि साम्राज्यवाद के तेज़ हमलों के दौर में, ये राय राजनीतिक प्रक्रियाओं को मज़बूत या कमज़ोर करने के लिए अहम हो जाती हैं। बेनेदेत्ती का कहना यह था कि साहित्य की क्रांतिकारी ताक़त किसी निर्देशित थीम, विधा या नारे तक सीमित नहीं की जा सकती। साहित्य लोगों के वैचारिक पटल को फैलाता है, अलगाव को पहचान पाने की उनकी क्षमता को धार देता है और उन्हें अपनी व्यवस्थित, कल्पनात्मक और भावनात्मक शक्ति के ज़रिए संघर्षों के नज़दीक लाता है।
संस्कृति विलासिता की वस्तु नहीं, एक अधिकार है
मारियो बेनेदेत्ती लैटिन अमेरिका के बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। कविता, उपन्यास, कहानी और निबंध, सभी विधाओं में इन्होंने एक सीधी और बेहद मानवीय शैली का विकास किया जिसने उरुग्वे और बाक़ी लैटिन अमेरिका की सामाजिक और भावनात्मक पेचीदगियों को उजागर किया।
अपने साहित्यिक योगदान के अलावा बेनेदेत्ती ने लैटिन अमेरिकी वामपंथ की सांस्कृतिक और राजनीतिक ज़िंदगी में भी एक केंद्रीय भूमिका निभाई। कासा दे लास अमेरिकास के साथ उनके जुड़ाव ने – पहले इसके साहित्य पुरस्कार के लिए निर्णायक मंडल के सदस्य के रूप में और बाद में सेंटर फ़ॉर लिटरेरी रिसर्च (साहित्यिक अनुसंधान केंद्र) के संस्थापक और निदेशक के रूप में – एक ऐसी लैटिन अमेरिकी साहित्यिक संस्कृति के विकास में योगदान दिया, जो यूरोपीय साहित्यिक परंपराओं को स्वीकार करते हुए भी, नुएस्ट्रा अमेरिका के राजनीतिक, सौंदर्यात्मक और सांस्कृतिक महत्व पर ज़ोर देती थी। इस अनुभव ने लैटिन अमेरिकी पाठकों और क्रांतिकारी प्रक्रियाओं के साथ संवाद में साहित्यिक अभ्यास पर उनके चिंतन को गहरा किया, बिना साहित्य को कठोर नियमों या हठधर्मिता में सीमित किए। क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका पर उनके विचार विशेष रूप से महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
1968 में कल्चरल कोंग्रेस ऑफ़ हवाना में बेनेदेत्ती ने बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के बीच के तनाव के बारे में बात रखी। ऐसे समय में जब राजनीतिक संघर्षों का स्वरूप मुख्य रूप से हथियारबंद था, बुद्धिजीवियों और कलाकारों से अमूमन लड़ाई में सीधे शामिल होने की माँग की जाती थी। बेनेदेत्ती के लिए वैचारिक काम अपने आप में क्रांतिकारी प्रक्रिया का एक ज़रूरी हिस्सा था। उनका मत था कि बुद्धिजीवी ‘अपने मूल अर्थ में ही परंपरा-विरोधी होता है, अपने सामाजिक परिवेश का आलोचक होता है, और बेहतरीन याददाश्त वाला गवाह’।
उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि संस्कृति विलासिता की वस्तु नहीं बल्कि एक अधिकार है। ‘एक कलाकार जो अपने सपने देखने, सौंदर्य रचना, कल्पना के निर्माण के अधिकार की रक्षा उसी दृढ़ संकल्प और विश्वास से करता है जितना कि अपने भोजन, मकान और स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा करता है – सिर्फ़ वही कलाकार अपनी रचनाओं को किसी विलासिता की वस्तु की बजाय एक आवश्यकता के तौर पर पेश करने की क्षमता रखता है, सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी।’
इस तरह बेनेदेत्ती के मुताबिक़ क्रांतिकारी संस्कृति को राजनीतिक संघर्ष से गौण नहीं माना जा सकता था। कला, साहित्य और कल्पना भी उस शक्ति का हिस्सा थे जिनसे लोगों के लिए अपनी परिस्थितियों की व्याख्या करना, अपनी गरिमा की रक्षा करना और नए समाज के लिए संघर्ष करना संभव हुआ।
पुरस्कार के निर्णायक मंडल में बेनेदेत्ती, हायदी संतामारिया और अलेहो कारपेंटियर के साथ, 1978। स्रोत: फुंडासियोन मारियो बेनेदेत्ती।
बेनेदेत्ती के साहित्य का सबसे बड़ा हिस्सा उनकी कविताएँ हैं। उनके पूरे साहित्य में उन्होंने कई विधाओं में लिखने का प्रयास किया, जिनमें हाइकू भी शामिल हैं, इनके ज़रिए उन्होंने साधारण जीवन की विविधता को चित्रित किया। उनकी कविता में, उनके अधिकांश लेखन की तरह, सबसे बढ़कर निकटता और एकजुटता की एक नीति दिखाई देती है, जैसा कि उनके एक हाइकु (हाइकै) में देखा जा सकता है:
| la más cercana de todas las fronteras es con mi prójimo |
सब सरहदों में से सबसे नज़दीक है मेरे पड़ोसी के साथ वाली सरहद |
उनका गद्य भी उनके साहित्यिक योगदान का एक अहम हिस्सा है। नौ से अधिक संग्रहों में, उन्होंने स्मृति, उरुग्वे में तानाशाही के तहत जीवन, प्रेम, और दैनिक अस्तित्व की अंतरंग बनावट जैसे विषयों पर लिखा, जिससे व्यक्तिगत लगने वाले अनुभवों को राजनीतिक आधार मिला। ‘मोंतेविदियानोस’ (मोंतेविदियावासी), ‘जियोग्राफियास’ (भूगोल), और ‘बुजोन दे तिएम्पो’ (समय का मेलबॉक्स) जैसे उनके कहानी संग्रह, साथ ही उपन्यास ‘प्रिमावेरा कॉन उना एस्किना रोटा’ (टूटे शीशे में वसंत) यह दर्शाते हैं कि उनके लेखन में भावनात्मकता और राजनीति कैसे अविभाज्य हैं।
बेनेदेत्ती का जीवन और साहित्य संस्कृति और कला के साथ एक संघर्षशील (मिलिटेंट) जुड़ाव को दर्शाते हैं, जो क्रांतिकारी निर्माण के मूलभूत आयाम हैं। उनकी कविता और गद्य सूक्ष्म और गहन दोनों हैं, जो एक नए समाज में एक नए मनुष्य के निर्माण के विरोधाभासों को उजागर करते हैं।
हम किस लिए गाते हैं?
इक्कीसवीं सदी में वर्ग संघर्ष की गतिशीलता तीव्र बनी हुई है। पतनशील यूएस साम्राज्य फ़िलिस्तीन से लेकर वेनेजुएला और क्यूबा तक, वैश्विक दक्षिण के क्षेत्रों और लोगों के खिलाफ अपने हमले तेज़ कर रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों के लोगों ने भी अपना प्रतिरोध जारी रखा हुआ है। ‘विचारों और भावनाओं की लड़ाई’, जैसा कि इसके बारे में फ़िदेल ने कहा था, बहुत तेज़ी से हमारे दौर के केंद्र में आ गई है।
एक लेखक और क्रांतिकारी दोनों रूपों में मारियो बेनेदेत्ती की विरासत यह समझने के लिए बेहद अहम है कि एक बुद्धिजीवी सिर्फ़ एक संस्कृतिकर्मी के रूप में ही काम नहीं कर सकता बल्कि क्रांतिकारी प्रक्रिया के भीतर एक संगठनकर्ता के तौर पर भी काम कर सकता है। कासा दे लास अमेरिकास अब भी नुएस्ट्रा अमेरिका में सबसे ज़रूरी सांस्कृतिक संस्थानों में से एक बना हुआ है। यह ऐसी कला के निर्माण को प्रोत्साहन देता है जिसकी जड़ें हमारे लोगों के अनुभवों में हो और ऐसा करके यह उस विश्वास को ज़िंदा रखे हुए है कि संस्कृति राजनीतिक संघर्ष से अलग नहीं है बल्कि इसका एक अनिवार्य स्वरूप है।
इस समय जब यूएस ने घेरेबंदी, प्रतिबंधों और दुनिया से काट देने की नीति के ज़रिए क्यूबा को बर्बाद करने के प्रयास तेज़ कर दिए हैं, ऐसे में क्यूबा की क्रांति की लौ को जलाए रखने के लिए ज़रूरी है कि जन संगठनों की ओर से इसके साथ एकजुटता दिखाई जाए। ऐसा करने से मौजूदा और आने वाली नस्लें भी इस संघर्ष को जारी रखेंगी। जैसा कि बेनेदेत्ती अपनी एक कविता में सवाल करते हैं ‘हम किस लिए गाते हैं?’
| Cantamos porque llueve sobre el surco Y somos militantes de la vida Y porque no podemos ni queremos Dejar que la canción se haga ceniza |
हम गाते हैं ताकि खेत में पड़ती रहे बारिश और ज़िंदगी के लिए लड़ने वाले हम न चाहते हैं और न होने देंगे कि गीत राख़ हो जाएँ |
स्नेह सहित,
मिगेल योशिदा
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में कला और संस्कृति विभाग और नुएस्ट्रा अमेरिका कार्यालय के सदस्य; एक्सप्रेसाओ पोपुलर, ब्राजील में संपादक।