आधुनिकीकरण का अर्थ पूँजीवाद नहीं है: अड़तीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
वैश्विक दक्षिण में विकास पूँजीवादी पश्चिम के नक़्शेकदम पर चलकर नहीं आएगा। इसके लिए संप्रभुता, समाजवादी योजना और सामाजिक संबंधों में परिवर्तन की ज़रूरत है।
दो पैरों पर चलना: चीनी आधुनिकीकरण का समाजवाद, चरण 1–3, 2026, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान। डोजियर संख्या 104, सितंबर 2026 में शामिल।
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
साल 1960 में, अमेरिकी (यूएस) अर्थशास्त्री वॉल्ट व्हिटमैन रोस्टो की द स्टेजिस् ऑफ़ इकनॉमिक ग्रोथ: ए नॉन-कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो [विकास के चरण: एक ग़ैर-कम्युनिस्ट घोषणापत्र] शीर्षक क़िताब प्रकाशित हुई। इसके उपशीर्षक से क़िताब का मंतव्य ज़ाहिर हो जाता है। रोस्टो ने सिर्फ़ आर्थिक विकास का ही विवरण नहीं दिया; उन्होंने शीत युद्ध के लिए एक विचारधारात्मक हथियार भी दे दिया। उनके मुताबिक़ सभी समाजों ने एक ही रास्ता लिया, शुरुआत ‘पारंपरिक समाज’ से की, फिर ‘स्वयं स्फूर्ति के पूर्व की दशा’ से गुज़रे, ‘स्वयं स्फूर्ति की दशा, ‘परिपक्वता की अवस्था’ और अंतत: पहुँचे ‘अत्यधिक जन उपभोग की अवस्था’ तक। इस मार्ग के अंत में ख़ुद यूएस खड़ा था: इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संस्थान पूरी दुनिया के लिए मिसाल माने गए। रोस्टो की कहानी में विकास सिर्फ़ साम्राज्यवादी पश्चिम की उपभोग की प्रवृत्ति और सांस्थानिक स्वरूप के अनुसरण का नाम था; आधुनिक होने का मतलब था पूँजीवादी हो जाना।
रोस्टो की अवधारणा और ख़ासतौर से सेंट लूसिया के अर्थशास्त्री आर्थर लूइस ने ‘परंपरा’ को ‘आधुनिकता’ के बरक्स रख दिया। पुरानी दुनिया को हटाकर नई दुनिया के लिए जगह बनाई जानी थी। इस पूरे विचार से उपनिवेशवाद ग़ायब था, और साथ ही दास-प्रथा, लूट, असमान आदान-प्रदान, एशिया, अफ़्रीका तथा लैटिन अमेरिका से यूरोप और उत्तरी अमेरिका की ओर संपदा का संगठित हस्तांतरण भी। साम्राज्यवाद ने जिन देशों को ग़रीब बनाया उनसे कहा गया कि उनकी ग़रीबी का कारण उनकी पिछड़ी हुई संस्कृतियाँ थी। उन्हें संप्रभुता या सामाजिक क्रांति की ज़रूरत नहीं थी। उनसे कहा गया कि उन्हें ज़रूरत थी तो विदेशी पूँजी, पश्चिमी विशेषज्ञों और धैर्य की।
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, दो पैरों पर चलना, 2026। डोजियर संख्या 104, दो पैरों पर चलना: चीनी आधुनिकीकरण का समाजवाद, सितंबर 2026 के लिए आवरण चित्र।
क्रांतिकारी परंपराओं के बारे में अपने एक हालिया न्यूज़लेटर में हमने क्रांतिकारी राजनीति में अंतर्निहित सांस्कृतिक विरासत की बेहतरीन बहस की चर्चा की थी। हालाँकि, चीन में मुख्य समस्या परंपरा की नहीं अपमान की थी। पहले अफ़ीम युद्ध (1839-1842) से लेकर चीनी क्रांति (1949) की विजय तक, इस देश ने जो बर्दाश्त किया उसे ‘अपमान की एक सदी’ कहा गया: यहाँ के लोगों पर अफ़ीम का व्यापार थोपा गया, यहाँ की सरकारों पर असमान समझौते थोपे गए, विदेशी ताक़तों द्वारा यहाँ के इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया गया,बंदरगाहों पर साम्राज्यवादी एकाधिकार लागू किया गया और देश को वॉरलॉर्डों, क़ब्ज़े और गृहयुद्ध ने बाँट दिया। चीन में पूँजीवाद ऐडम स्मिथ की क़िताब द वेल्थ ऑफ़ नेशंस (1776) के साथ नहीं आया था, बल्कि बंदूकों से लदे बेड़ों और नशीले पदार्थों के साथ आया था। पूँजीवादी ताक़तों ने न तो इस देश को एकीकृत किया और न ही इसकी उत्पादन शक्तियों को आज़ाद कराया। इसके विपरीत, पूँजीवादी साम्राज्यवाद ने चीनी समाज को छिन्न-भिन्न कर दिया और सामंतों, सौदेबाज़ों और विदेशी पूँजी के दलालों को मज़बूत किया।
चीनी लोगों के लिए आधुनिकीकरण का मतलब यह नहीं था कि वे अपनी संस्कृति के बड़े हिस्से को त्यागने या पश्चिम की तरह बन जाने का इंतज़ार करें। आधुनिक होने का मतलब था अपमान का अंत, संप्रभुता को फिर हासिल करना, देश को एकजुट करना, ग़रीबी और अशिक्षा को ख़त्म करना और ऐसी भौतिक क्षमता का निर्माण करना जो बंदूकों से लैस बेड़ों का रास्ता हमेशा के लिए बंद कर दे। इस तर्क के आधार पर, चीनी आधुनिकीकरण की शुरुआत सिर्फ़ राष्ट्र मुक्ति से हो सकती थी और इसका विकास सिर्फ़ समाजवाद के ज़रिए।
हमारा नवीनतम डोसियर, वॉकिंग ऑन टू लेग्स: द सोशलिज़म ऑफ़ मॉडर्नाइज़ेशन [दो पैरों पर खड़ा होना: चीनी आधुनिकीकरण का समाजवाद] दो ऐसे परस्पर जुड़े हुए कार्यों की ओर ध्यान खींचता है जिन्हें चीनी क्रांति ने पूरा करने का ज़िम्मा उठाया: सामाजिक संबंधों में परिवर्तन और उत्पादन शक्तियों का विकास। एक ग़रीब देश वस्तुओं का समान वितरण करने भर से अभाव को ख़त्म नहीं कर सकता – इसके लिए ज़रूरत है आधुनिक उद्योगों, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आधारभूत ढाँचे की। लेकिन नवउपनिवेशवादी व्यवस्था के शिकंजे के चलते चीन इस काम को कैसे पूरा कर पाने की उम्मीद रख सकता था? हमारे डोसियर में हमने आधुनिक चीन के इतिहास को तीन चरणों में बाँटा है: 1949 से 1978, 1978 से 2013 और 2013 से वर्तमान।
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, चरण 1, 2026। डोजियर संख्या 104, दो पैरों पर चलना: चीनी आधुनिकीकरण का समाजवाद, सितंबर 2026 में शामिल।
साल 1949 में, चीन दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से एक था: यहाँ जीवन प्रत्याशा पैंतीस वर्ष थी, साक्षरता दर दो प्रतिशत से भी कम, औद्योगिक क्षमता बहुत सीमित थी और ग्रामीण क्षेत्र में सामंती संबंधों का वर्चस्व था। इसलिए क्रांति का पहला काम सामाजिक और भौतिक दोनों था। साल 1953 तक, भूमि सुधार के ज़रिए 30 करोड़ भूमिहीन और ग़रीब किसानों के बीच 4.7 करोड़ हेक्टेयर का पुनर्वितरण किया गया। ज़मींदारी व्यवस्था तो टूटी ही, लेकिन साथ ही एक और महत्त्वपूर्ण चीज़ हुई। किसानों ने 翻身 (फानशन) का अनुभव किया – इसका शाब्दिक अर्थ है ‘उलटना’ या ‘देह की तरफ़’, लेकिन क्रांति की भाषा में इसका मतलब था, दासता को उखाड़ फेंकना और राष्ट्रीय विकास के सक्रिय भागीदार के तौर पर तनकर खड़ा होना। आधुनिकीकरण की शुरुआत किसी शॉपिंग मॉल से नहीं हुई बल्कि भूमि, गरिमा हासिल करने और दासता के अंत से हुई।
बड़े स्तर पर चलाए गए साक्षरता अभियानों, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों, ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ने के लिए बनाई गई जगहों, और बेयरफ़ुट-डॉक्टर कार्यक्रम ने समाज को बदलकर रख दिया।बेयरफ़ुट-डॉक्टर कार्यक्रम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए स्थानीय किसानों और लोगों को प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण, कार्यक्रम का नाम बेयरफ़ुट या नंगे पैर वाले डॉक्टर इसलिए पड़ा क्योंकि इसके तहत प्रशिक्षण पाने वाले लोग ज़्यादातर धान के खेतों में नंगे पाँव काम करते थे। साल 1959 तक, साक्षरता की दर बढ़कर सत्तावन प्रतिशत हो गई; 1978 तक जीवन प्रत्याशा दर तिरसठ वर्ष पार कर गई। इस बीच, समाजवादी योजना पद्धति ने एक समावेशी औद्योगिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी: स्टील प्लांट, बिजली घर, ऑटोमोबाइल और ट्रैक्टर की फ़ैक्टरियाँ, रेल परिवहन और पुलों का निर्माण हुआ। ये सब सफलताएँ घेरेबंदी, प्रतिबंधों और जंग के लगातार ख़तरों के बीच हासिल की गईं। संप्रभुता ने एक भौतिक नींव तो तैयार कर ली थी लेकिन वह अब भी कुछ कमज़ोर थी।
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, चरण 2, 2026। डोजियर संख्या 104, दो पैरों पर चलना: चीनी आधुनिकीकरण का समाजवाद, सितंबर 2026 में शामिल।
साल 1978 के बाद आई सुधार और बाहरी दुनिया के लिए दरवाज़े खोलने की नीति ने रणनीति में बदलाव किया लेकिन अपनी ऐतिहासिक दिशा नहीं छोड़ी। देंग शियाओ पिंग के इस बयान कि ‘समाजवाद ग़रीबी नहीं है’ ने समस्या के मूल को पहचाना। चीन ने अपनी उत्पादक शक्तियों का विकास करने के लिए राज्य के नेतृत्व में बाज़ारों और विदेशी पूँजी का उपयोग किया, लेकिन इसने अर्थव्यवस्था के नियंत्रक शिखरों के समक्ष घुटने नहीं टेक दिए। बैंकिंग, ऊर्जा, दूरसंचार और परिवहन व यातायात पर सार्वजनिक नियंत्रण ने राज्य को निवेश का मार्गदर्शन करने का अवसर दिया और इससे समाज को मनमाने ढंग से संचालित करने की छूट निजी क्षेत्र को नहीं मिली। बाज़ार का इस्तेमाल एक साधन के रूप में हुआ न कि वह साध्य बन बैठा।
इस दूसरे दौर ने अथाह सामाजिक संपदा का निर्माण किया और 1978 से 2019 के बीच 76.5 करोड़ लोगों को ग़रीबी से उबारा। लेकिन इसके साथ ही इस दौर में गंभीर अंतर्विरोध भी खड़े हुए: असमानता, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीय असंतुलन, मज़दूरों पर दबाव और पर्यावरणीय विनाश। इन अंतर्विरोधों को स्वीकार करना इस दौर में हुए सुधारों को ख़ारिज करना नहीं है, इसका मतलब है कि उपलब्धियों के जश्न में इसकी क़ीमत को भुला नहीं दिया गया। समाजवाद का निर्माण कोई पहले से खींच दी गई सीधी रेखा नहीं है, बल्कि यह संघर्षों से भरी एक प्रक्रिया है जिसमें नई क्षमताएँ नए अंतर्विरोधों को जन्म देती हैं और इन्हें सुलझाना होता है।
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, चरण 3, 2026। डोजियर संख्या 104, दो पैरों पर चलना: चीनी आधुनिकीकरण का समाजवाद, सितंबर 2026 में शामिल।
साल 2013 के बाद चीन तीसरे चरण में दाख़िल हुआ। यह तीन प्रमुख विचारों पर टिका है: साझा समृद्धि, पर्यावरण अनुकूल सभ्यता, और उच्च गुणवत्ता विकास। लक्षित ग़रीबी उन्मूलन अभियान के तहत चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के तीस लाख से ज़्यादा कार्यकर्ताओं को लामबंद किया गया ताकि उन इलाक़ों तक पहुँचा जाए जहाँ अत्यधिक ग़रीबी है, वहाँ न्यूनतम आय, पर्याप्त भोजन और कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षित आवास, , पीने योग्य पानी, बिजली और यातायात सुनिश्चित किए जा सकें। संपदा का ख़ुद-ब-ख़ुद नीचे तक पहुँचने का इंतज़ार करने की बजाय, पार्टी ने ख़ुद घर-घर जाकर अभावों की पहचान की और उन्हें मिटाया। इसी के साथ, पार्टी ने निजी सत्ता के केंद्रीकरण के ख़िलाफ़ कदम उठाए, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम कर रहे कॉरपोरेशनों के लिए नियम सख़्त किए, निजी कोचिंग संस्थानों पर पाबंदी लगाई, और ‘घर रहने के लिए हैं, सट्टेबाज़ी के लिए नहीं’ के सिद्धांत के तहत संपत्ति की सट्टेबाज़ी पर रोक लगाई। चीन ने ऋण को सट्टेबाज़ी वाली गतिविधियों से हटाकर रणनीतिक उद्योग, सार्वजनिक आधारभूत ढाँचे, और प्रौद्योगिकी विकास की ओर मोड़ा। ये छोटी उपलब्धियाँ नहीं हैं; इनका संबंध मूलभूत समाजवादी प्रश्न से है: पूँजी समाज पर शासन करेगी या समाज पूँजी पर।
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीनी आधुनिकीकरण को ‘चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुए समाजवादी आधुनिकीकरण’ के रूप में व्याख्यायित किया है। समाजवादी आधुनिकीकरण की अवधारणा का परंपरा से कोई दुराव नहीं है, बल्कि इसने चीन को अपनी सभ्यता की विरासत से सामंती पदानुक्रम या पश्चिमी सांस्कृतिक वर्चस्व के सामने नतमस्तक हुए बिना सीखने का अवसर दिया। परंपरा न तो संग्राहलयों में रख छोड़ने की चीज़ है और न ही कोई रुकावट जिसे पार करना पड़े; इसे तो आलोचनात्मक रूप से ग्रहण किया जाना चाहिए और वैज्ञानिक तर्कशीलता तथा समाजवादी नैतिकता के साथ बहस में शामिल किया जाना चाहिए।
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, आगे का रास्ता, 2026। डोजियर संख्या 104, दो पैरों पर चलना: चीनी आधुनिकीकरण का समाजवाद, सितंबर 2026 में शामिल।
अपने अपमान से जुड़ी चीन की स्मृति को कभी-कभी पश्चिम में राज्य द्वारा विकृत मनोवैज्ञानिक असंतोष के रूप में देखा जाता है। लेकिन अपमान सिर्फ़ एक भाव नहीं है। यह एक भौतिक परिस्थिति की ओर इशारा करता है: संप्रभुता का खो जाना, संसाधनों का छीन लिया जाना, प्रौद्योगिकी विकास का निषेध, और लोगों के भविष्य को विदेशी सत्ता के अधीन कर दिया जाना। आज सेमीकंडक्टर से जुड़े नियंत्रण, प्रतिबंध, व्यापार रुकावटें, और सैन्य घेरेबंदी चीनी जनता को याद दिलाते हैं कि उनकी विकासयात्रा को बाधित करने वाली पुरानी साम्राज्यवादी आकाँक्षा आज भी मौजूद है। इसलिए प्रौद्योगिकी आत्म-निर्भरता कोई संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं है बल्कि संप्रभुता की रक्षा के संकल्प का ही मौजूदा स्वरूप है।
बाक़ी देशों के लिए चीन के रास्ते पर चल पड़ना आसान नहीं है। यह मार्ग एक ऐसी क्रांति से बना है जिसकी जड़ें मज़दूरों-किसानों की एकता में है और साथ ही एक ऐसी पार्टी में जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी योजनाएँ बनाने में सक्षम है। लेकिन इसके इतिहास ने वैश्विक दक्षिण के सामने एक ज़रूरी प्रश्न खड़ा किया है: क्या संप्रभुता के बिना आधुनिकीकरण संभव है? विदेशी ऋण के बोझ से जूझ रहे, वस्तुओं के निर्यात पर निर्भर, और डाटा, वित्त, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और परिवहन पर अपना नियंत्रण खो चुके देश अधिकारिक रूप से तो स्वतंत्र हैं लेकिन उनके पास अपना भविष्य चुनने की आज़ादी नहीं। उन्हें रोस्टो की सीढ़ी तो पकड़ा दी गई है लेकिन इस पर चढ़ने के लिए कोई पायदान नहीं है।
फान वेन्नान, कामरेड चांग’ए (嫦娥同志), 2022। वेनहुआ जोंगहेंग, खंड 1, अंक 2, ‘चीन का अति गरीबी से समाजवादी आधुनिकीकरण तक का मार्ग’, जून 2023 के लिए आवरण चित्र।
चीन की क्रांति ने रोस्टो की सीढ़ी चढ़ने की अनुमति नहीं माँगी; बल्कि इसने विकास के लिए अपनी राह बनाई। चीन के आधुनिकीकरण को वस्तुओं के अंबार या अरबपतियों की संख्या से नहीं आँका जाना चाहिए; इसका सही अंदाज़ा इस बात से लगेगा कि क्या किसान अपने पैरों पर खड़ा है, क्या बच्चे साक्षर हैं, क्या लोगों की उम्र लंबी हुई है और वे स्वस्थ जीवन जी पा रहे हैं, क्या प्रौद्योगिकी सामाजिक ज़रूरतों को पूरा कर रही है, क्या पर्यावरण सुरक्षित है, और क्या एक राष्ट्र बिना सिर झुकाए एक साम्राज्य का सामना कर पा रहा है। चीन का आधुनिकीकरण कोई यूटोपिया नहीं; हर समस्या के निवारण ने एक नयी समस्या को जन्म दिया है जिसे सुलझाया जाना है। चीनी आधुनिकीकरण की सच्ची परख इसी बात से हुई कि यह बदलते समय के अनुसार ख़ुद को ढाल लेता है और नई चुनौतियों का सामना करता है। हम यह नहीं कह रहे कि चीनी समाज में कोई समस्याएँ नहीं, लेकिन इसका समाजवादी कार्यक्रम अंतर्विरोधों को पहचानने, दिशा में सुधार लाने और इन्हें सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है।
आधुनिकीकरण तक के चीन के सफ़र ने एक बात साबित की है कि एक अल्पविकसित देश अपनी संप्रभुता की रक्षा करते हुए अपने लिए पूँजीवादी पश्चिम से अलग मार्ग बना सकता है। इस सब से यह नहीं सीखा जाना चाहिए कि चीन की नक़ल की जा सकती है, बल्कि यह सीखना चाहिए कि आधुनिकीकरण के लिए ज़रूरी है ऐसा राजनीतिक संगठन जो संप्रभुता को योजना, प्रौद्योगिकी क्षमता, समाज कल्याण, और सामूहिक शक्ति में बदलने में सक्षम हो। इसीलिए राजनीतिक दलों के बारे में सोचना ज़रूरी हो जाता है। चीन की यात्रा को इसके राजनीतिक दल व्यवस्था, सीपीसी की संरचना और अन्य दलों, राज्य और समाज से इसके संबंधों का विश्लेषण किए बिना पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इस यात्रा को समझने के लिए साल में दो बार निकलने वाला हमारा जर्नल वेनहुआ जोंगहेंग: समसामयिक चीनी विचारों की पत्रिका पढ़ सकते हैं। यह पत्रिका हम द ग्लोबल साउथ अकादमिक फ़ोरम (GSAF) के साथ मिलकर निकालते हैं।
GSAF का 2026 का सम्मेलन 17 और 18 अक्टूबर को पूडोंग (शंघाई) में होगा, इसकी थीम होगी ‘वैश्विक दक्षिण के राजनीतिक दल: शासन और आधुनिकीकरण’। वैश्विक दक्षिण के राजनीतिक दल, सामाजिक आंदोलन और अकादमिक संस्थानों को साथ लाते हुए यह फ़ोरम एक ऐसी जगह उपलब्ध करा रहा है जहाँ शासन और आधुनिकीकरण के अनुभवों को साझा किया जाए। और साथ ही यह सवाल भी उठाया जाए कि संप्रभुता को कैसे ऐसे संस्थानों में तब्दील किया जाए जो योजना, विकास और मुक्ति का रास्ता गढ़ने में सक्षम हों। क्योंकि आख़िर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वैश्विक दक्षिण की जनता बिना किसी और का अनुसरण किए अपनी शर्तों पर एक ऐसे आधुनिकीकरण की व्याख्या कर सकती है जो निर्भरता से परे एक भविष्य का निर्माण हो।
स्नेह सहित,
विजय