ब्रेन कैप्चर से बौद्धिक संप्रभुता की ओर: छब्बीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
1990 से एक अदृश्य बौद्धिक संरचना आर्थिक विचारों की वैधता तय करती आई है और इसने विकल्पों के लिए जगह ही मिटा दी है।
तीन स्कूली छात्राएँ, जेरार्ड सेकोटो (दक्षिण अफ़्रीका), 1940 के दशक का शुरुआती दौर।
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
दो दशक पहले मैं दक्षिण अफ़्रीका में मलावी के अर्थशास्त्री थांडिका मकांडावीर (1940-2020) के साथ था। हम उनकी पीढ़ी के विचारकों के बारे में बात कर रहे थे जो राष्ट्र मुक्ति के आंदोलनों के दौर में बड़े हुए थे। हमारे ज़हन में मिस्र के अर्थशास्त्री समीर अमीन (1931-2018), ब्राज़ील के अर्थशास्त्री रुई माउरो मारिनी (1932-1997) और वानिया बांबीरा (1940-2015), पाकिस्तानी राजनीति विशेषज्ञ इक़बाल अहमद (1934-1999), दक्षिण अफ़्रीकी मानववैज्ञानिक आर्ची माफेजे (1936-2007) और नाइजीरियाई राजनीति वैज्ञानिक क्लाउड ऐके (1939-1996) जैसे लोग थे। इन विचारकों और इनके जैसे अन्यों ने यह समझ लिया था कि मुक्ति के लिए ज़रूरी है समाज और उसके विकास के लिए मुक्त रूप से सोचने की क्षमता। उन्होंने इस महत्वकांक्षा को विकसित करने के लिए संस्थानों का निर्माण किया: विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, प्रकाशन और सबसे ज़रूरी योजना आयोग। उनका प्रोजेक्ट असमान और अधूरा था लेकिन बेहद ज़रूरी था। थांडिका मकांडावीर और मैं इस पीढ़ी के सामने आई नाकामियों को लेकर उदास थे। उन्होंने मुझसे डरबन में कहा था ‘हम एक स्थाई प्रेरक शक्ति का निर्माण नहीं कर सके जो आगे बढ़ती रहे’ (यही भाव उन्होंने अपनी 2005 की क़िताब अफ़्रीकन इंटलेक्चुअलस् में भी पेश किया)।
80 के दशक के ऋण संकट और 90 की शुरुआत में सोवियत संघ के विघटन ने दुनिया का बौद्धिक परिदृश्य को बदलकर रख दिया। इसका नतीजा महज़ यह नहीं था कि वॉशिंगटन कंसेंसिस के नाम से जाने जाने वाली नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का विस्तार हुआ, लेकिन इसके बहुत गहरे परिणाम हुए: बौद्धिक जीवन पर क़ब्ज़ा। हम इस परिघटना को ब्रेन कैप्चर (ज़हनी क़ब्ज़ा) के नाम से जानते हैं। यह अवधारणा किसी क्षेत्र पर उपनिवेशवादी वर्चस्व से अलग है। इसके लिए सेनाओं या गवर्नरों की ज़रूरत नहीं होती। यह संस्थानों, प्रोत्साहन/लाभांक, व्यावसायिक प्रगति और धीरे-धीरे पूर्वाग्रहों के आत्मसात् होने के ज़रिए काम करते हैं। इनकी सफलता इस चीज़ में देखी जाती है कि वैश्विक दक्षिण के विचारक किस हद तक अपने समाजों को उन संरचनाओं के माध्यम से देखते हैं जो कहीं और निर्मित हुई हैं और वैश्विक पूँजी के हितों से जुड़ी हैं।
लाल भीड़, एल्सन कम्बालु (मलावी), 2024।
उपनिवेशवाद ने हमेशा ही चेतना को आकार देने की कोशिश की है। उपनिवेशवादी प्रशासकों ने लगातार यह दावा किया है कि उपनिवेशों की जनता में स्वराज की क्षमता नहीं और इन्हें बाहरी सहायता की ज़रूरत है। उपनिवेशवादी शिक्षा प्रणाली ने उपनिवेश के अभिजात वर्ग को ऐसे ही तैयार किया है कि वे उपनिवेशी शासन को लागू करें और इसके निहित पूर्वाग्रहों को स्वीकार कर लें। इसके बावजूद उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों ने इस बौद्धिक विरासत को चुनौती दी। पूरे वैश्विक दक्षिण में विचारकों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उनके अपने ऐतिहासिक अनुभवों के बीच से ज्ञान का सृजन किया जा सकता है। उन्होंने अपने समाजों के यथार्थों के आधार पर कृषि सुधार और औद्यौगीकरण के लिए प्रणालियों पर बहस की। उन्होंने इन विचारों को उपनिवेशवाद से नए-नए आज़ाद हुए देशों के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में लागू किया।
लेकिन 1990 के दशक में सब बदल गया जब नवउदारवादी पूँजीवाद को इतिहास के अंतिम पड़ाव के तौर पर पेश किया गया। विकास की भाषा बदल गई और इसका ज़ोर अब हो गया प्रतिस्पर्धा, बाज़ार दक्षता, निवेश की संभावनाओं, राजकोषीय/वित्तीय अनुशासन, मुद्रास्फीति के लक्ष्य और विनियमन पर। इस बौद्धिक बदलाव को सुदृढ़ करने में एक शक्तिशाली अंतर्राष्ट्रीय ईकोसिस्टम ने काम किया जिसमें अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़), विश्व बैंक, प्रमुख यूएस और यूरोपीय विश्वविद्यालय, कन्सल्टिंग कंपनियाँ (मकिंज़ी एंड कंपनी के नेतृत्व में), क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ और निजी फ़ाउंडेशन शामिल हैं। वित्तीय संसाधन, वजीफ़ों, शोध अनुदान, फ़ेलोशिप, व्यावसायिक अवसरों और नीतिगत प्रभाव ज़्यादा से ज़्यादा उन लोगों के पाले में गए जिन्होंने प्रभावी प्रतिमान (डॉमिनेंट पैरडायम) को अपनाया।
फुलानी घुड़सवार, जिमोह बोला अकोलो (नाइजीरिया), 1962।
इस नेट्वर्क का महत्व अनुभव के आधार पर आंका जा सकता है। कॉर्नल बैन और लेनर्ड सीब्रुक ने पाया कि क़रीबन तीन चौथाई आईएमएफ़ के वरिष्ठ अधिकारियों ने यूएस और यूरोप के विश्वविद्यालयों से शिक्षा या प्रशिक्षण प्राप्त किया था। दुनिया के सबसे प्रभावशाली वित्तीय संस्थान का बौद्धिक केंद्र एक संकरे भौगोलिक और विचारधारात्मक क्षेत्र में सीमित था। यह सीमित होना कोई अपने आप हुई घटना नहीं थी: इसमें एक बृहत् प्रक्रिया झलकती थी जिसके माध्यम से आर्थिक विचारों में उत्तर अटलांटिक संस्थानों की प्रधानता बढ़ती गई।
इसी के साथ, आईएमएफ़ ने अपने वैश्विक दक्षिण से आए अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का नाटकीय रूप से विस्तार किया। हज़ारों सिविल सेवक, केंद्रीय बैंकर, ट्रेजरी अधिकारी और आर्थिक योजनाकारों ने उन कार्यक्रमों में प्रशिक्षण पाया जो समष्टि आर्थिक प्रबंधन, राजकोषीय नीति और बाज़ार सुधार से जुड़ी धारणाओं के एक साझा समूह के इर्द-गिर्द डिज़ाइन किए गए थे। इन कार्यक्रमों को विचारधरात्मक नहीं बल्कि तकनीक से जुड़े होने के रूप में पेश किया गया। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल क्या हैं, किन लक्ष्यों की प्राप्ति की जानी है और कौन सी नीतियाँ वैधानिक हैं जैसे विचार हमेशा तकनीकी प्रशिक्षण के साथ जुड़े रहते हैं। इसका नतीजा सिर्फ़ यह नहीं था कि प्रस्तावित नीतियों का प्रचार हुआ बल्कि इससे एक साझे बौद्धिक फ़्रेमवर्क का निर्माण हुआ, और इसी के बारे में 2000 के शुरुआती दौर में थांडिका मकांडावीर और मैं बात कर रहे थे।
ब्राज़ील का सेंट्रल रेलवे, तर्सिला दो अमराल (ब्राज़ील), 1924।
ब्रेन कैप्चर को प्रभावी बनाने में इससे मदद मिली कि इसे सामान्य बोध (कॉमन सेन्स) के रूप में पेश किया गया और बहकावे के तौर पर अनुभव नहीं किया गया। नवउदारवादी अर्थशास्त्र की धारणाओं को वस्तुनिष्ठ सत्य बन गए और उस दौर की बहसें इतनी सीमित हो गईं कि इनके अलावा और सभी विकल्प पुराने, अव्यवहारिक या ग़ैरज़िम्मेदाराना लगने लगे। लगभग पूरे वैश्विक दक्षिण से एक नई क़िस्म के नीतिकार निकले। दक्षिण अमेरिका में, विचारक ‘टेक्नोपॉल’ का हवाला देने लगे, यानी ऐसे प्रशिक्षित अर्थशास्त्री जो व्यावसायिक दक्षता को राजनीतिक अधिकार के साथ जोड़ते थे। ऐसे ही लोग पूरे अफ़्रीका और एशिया में नज़र आने लगे। इनकी शैक्षणिक यात्राएँ लगभग एक ही रास्ते से गुजरी थीं: स्नातक स्तर की शिक्षा अपने देश में, यूएस या यूरोप के किसी विश्वविद्यालय से शोध, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से प्रशिक्षण और आख़िर अपने देश में सरकारी पद पर वापसी।
इसके कई उदाहरण हैं। नाइजीरिया के एनगोज़ी ओकोन्जो-इवेआला ने हॉर्वर्ड और एमआईटी से पढ़ाई की और इसके बाद वे विश्व बैंक में तमाम पदों पर रहते हुए अंतत: वित्त मंत्री बने। भारत के मनमोहन सिंह ने केम्ब्रिज और आक्स्फ़ोर्ड से पढ़ाई की जिसके बाद वे कई अहम आर्थिक पदों पर रहे (इसमें वित्त मंत्री का पद भी शामिल है जिस पर रहते हुए वे देश को उदारीकरण की प्रक्रिया की तरह ले गए) और आख़िर देश के प्रधानमंत्री बने। ब्राज़ील के पेड्रो मालन ने बर्क्ली स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से शोध अध्ययन किया इसके बाद वे अपने देश के अहम दौर यानी बाज़ार सुधारों के दौरान वित्त मंत्री रहे। विकासशील देशों में कई लोगों की जीवनयात्रा लगभग ऐसी ही रही हैं। इन हस्तियों की महत्ता उन अहम राजनीतिक पदों में नहीं जिन पर ये रहे बल्कि इस तथ्य में है कि ये सब एक साझे बहुराष्ट्रीय बौद्धिक वातावरण से निकले हैं।
जादूगर, रेमेडियोस वारो (स्पेन/मेक्सिको), 1956.
विश्व बैंक, आईएमएफ, प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, विकास एजेंसियाँ और वैश्विक परामर्श फर्में तेज़ी से एकल करियर पाइपलाइन के रूप में कार्य करने लगीं। इन संस्थानों से गुज़रने वाले अर्थशास्त्री विधियों, अवधारणाओं, व्यावसायिक मानदंडों और नीतिगत मान्यताओं को साझा करते रहे। एक ज्ञान-समुदाय (एपिस्टेमिक कम्युनिटी) उभरा, जिसके सदस्य अक्सर विवरणों पर असहमत होते थे, लेकिन राजकोषीय अनुशासन, उदारीकरण, विनियमन-मुक्ति और बाज़ार-नेतृत्व वाले विकास के प्रति व्यापक प्रतिबद्धता साझा करते थे। इसके परिणाम गहन थे। कई देशों में, बौद्धिक जीवन जनसामान्य के अनुभवों से कट गया। अर्थशास्त्रियों ने विकास का जश्न मनाया, जबकि बेरोज़गारी और असमानता बढ़ी। राजकोषीय लक्ष्यों की प्रशंसा की गई, जबकि सार्वजनिक सेवाएँ बिगड़ती गईं। विदेशी निवेश का स्वागत किया गया, जबकि घरेलू उत्पादन क्षमता कमज़ोर होती गई। व्यापक आर्थिक स्थिरता की भाषा लगातार सामाजिक अस्थिरता की वास्तविकताओं पर हावी होती गई।
शायद ब्रेन कैप्चर का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव आत्मविश्वास का कम होना था। उपनिवेश-विरोधी विचारकों की पुरानी पीढ़ी का मानना था कि नए विचार वैश्विक दक्षिण के अनुभवों से उभर सकते हैं। वे समझते थे कि ऐतिहासिक स्थितियाँ विभिन्न समाजों में भिन्न होती हैं और नीति को स्थानीय वास्तविकताओं के अनुकूल बनाना पड़ता है। इसके विपरीत, नव-उदारवादी युग ने बौद्धिक निर्भरता और अनुरूपता को ही प्रायः प्रोत्साहित किया। स्थानीय विशेषज्ञ का काम नए ज्ञान के सृजन की कम और विदेशों में निर्मित ढाँचों को घरेलू नीति में ढालना अधिक हो गया।
इस बदलाव के प्रमाण न केवल संस्थानों में, बल्कि स्वयं भाषा में भी पाए जा सकते हैं। इक्कीसवीं सदी की शुरुआत तक, वैश्विक दक्षिण भर में नीति-निर्माता तेज़ी से एक साझी शब्दावली में बात करने लगे: राजकोषीय ज़िम्मेदारी, निवेशक विश्वास, प्रतिस्पर्धात्मकता, मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण, संरचनात्मक सुधार, व्यावसायिक माहौल, और बाज़ार दक्षता। ये अवधारणाएँ तटस्थ वर्णनकर्ता नहीं थीं। वे उन प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करती थीं जो विशिष्ट ऐतिहासिक अनुभवों और संस्थागत व्यवस्थाओं से उभरी थीं। फिर भी उन्हें सार्वभौमिक मानकों के रूप में माना जाने लगा, जो संदर्भ की परवाह किए बिना सभी समाजों पर लागू होते थे।
शीर्षकहीन, बहजात सदर (ईरान), 1956.
ब्रेन कैप्चर का मतलब यह नहीं है कि उत्तर (विकसित देशों) से निकले सभी विचार अमान्य हैं, न ही इसका मतलब यह है कि बौद्धिक आदान-प्रदान को अस्वीकार किया जाना चाहिए। मानव ज्ञान समाजों और संस्कृतियों के बीच संवाद के माध्यम से आगे बढ़ता है। मुद्दा आदान-प्रदान का नहीं, बल्कि पदानुक्रम का है। समस्या तब पैदा होती है जब संस्थानों का एक समूह इतना ज़्यादा अधिकार प्राप्त कर लेता है कि वैकल्पिक दृष्टिकोणों को विकसित होने से पहले ही हाशिए पर धकेल दिया जाता है। आज का कार्य संज्ञानात्मक आत्मनिर्भरता (कॉग्निटिव ऑटार्की) की ओर पीछे हटना नहीं है, बल्कि बौद्धिक संप्रभुता को पुनः प्राप्त करना है – यह एक नारा था जो 2000 के दशक के मध्य में भारत में विश्वविद्यालय के प्रगतिशील छात्रों के बीच लोकप्रिय था। वैश्विक दक्षिण के देशों को अपनी वास्तविकताओं से सोचने का आत्मविश्वास चाहिए, जबकि वे शेष विश्व के साथ जुड़े रहें। इसका अर्थ है स्वतंत्र अनुसंधान उत्पन्न करने में सक्षम संस्थानों का पुनर्निर्माण करना। इसका अर्थ है सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को मज़बूत करना, स्थानीय प्रकाशन का समर्थन करना, दक्षिण-दक्षिण बौद्धिक नेटवर्कों का विस्तार करना, और उन बहसों को प्रोत्साहित करना जो बहुमत के ठोस अनुभवों से शुरू होती हैं, न कि वित्तीय बाज़ारों की मान्यताओं और हितों से।
उपनिवेश-विरोधी पीढ़ी – थांडिका की पीढ़ी – समझती थी कि मुक्ति की शुरुआत अपने स्वयं के अनुभव से वास्तविकता को नाम देने की क्षमता से होती है। वह सबक आज भी प्रासंगिक है। भविष्य की लड़ाई केवल संसाधनों, संस्थानों और सत्ता के लिए संघर्ष नहीं है। यह विचारों के लिए भी एक संघर्ष है। आर्थिक विचार की कमान संभालने वाले उच्च स्थान (प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान, क्रेडिट-रेटिंग एजेंसियाँ, नीति-परामर्श फर्में, और विकास संगठन) एक छोटे से उत्तरी अटलांटिक बौद्धिक पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर केंद्रित बने हुए हैं। इसलिए ब्रेन कैप्चर को उलटने के लिए सिर्फ़ नीतियों में बदलाव काफ़ी नहीं है। इसके लिए बौद्धिक अधिकार के नए केंद्रों का निर्माण करना आवश्यक है, जो वैश्विक दक्षिण के लोगों के अनुभवों और आकांक्षाओं से अवधारणाओं, सिद्धांतों और रणनीतियों को तैयार करने में सक्षम हों। कोई भी मुक्ति परियोजना सफल नहीं हो सकती, यदि उसकी कल्पना करने वाले मस्तिष्क पहले ही ग्रहित (कैप्चर) हो चुके हों।
हम जीतेंगे, रीना लाज़ो (ग्वाटेमाला), 1959.
अपनी तीन-भाग वाली कविता ‘अराजनीतिक बुद्धिजीवी’ (एपॉलिटिकल इंटलेक्चुअलस्) में, ग्वाटेमाला के क्रांतिकारी और कवि ओटो रेने कैस्टियो (1934–1967) ने हमें चेताया था कि नवउदारवादी बुद्धिजीवी कोई अराजनीतिक प्रौद्योगिकीविद् (टेक्नोक्रैट) नहीं है। उन्होंने यह कविता 1965 की शुरुआत में लिखी थी, ग्वाटेमाला की सेना द्वारा उनकी हत्या से दो वर्ष पहले।
1
एक दिन,
मेरे देश के अराजनैतिक
बुद्धिजीवियों से
जिरह करेंगे
सबसे मामूली लोग।उनसे पूछा जाएगा
कि वे क्या कर रहे थे
जब उनकी मातृभूमि धीरे-धीरे
नष्ट हो रही थी,
छोटी, अकेली, मद्धिम,
आंच की तरह।कोई उनसे नहीं पूछेगा
उनके शानदार कपड़ों के बारे में,
या दोपहर के भोजन के बाद की
लंबी झपकी के बारे में,
या जीवन की व्यर्थता को लेकर
उनकी बकवास के बारे में
न ही
मुनाफ़ाखोरी के उनके सिद्धांत के बारे में।
उनसे सवाल नहीं होंगे
ग्रीक मिथकों पर,
उस आत्मग्लानि पर भी नहीं
जो उपजती होगी इस अहसास के साथ
कि उनके अंदर तिल-तिल करके मर रहा है
कोई एक कायर की मौत।
2
एक दिन
सबसे साधारण लोग आएंगे।
वे जिन्हें
अराजनैतिक बुद्धिजीवियों की
किताबों और कविताओं में स्थान न मिला,
फिर भी, हर दिन, वे लाते रहे बुद्धिजीवियों के लिए
उनकी ब्रेड और दूध,
उनके लिए अंडे और टॉर्टिला, [एक प्रकार की रोटी]
जिन्होंने धोए उनके कपड़े,
चलाई उनकी गाड़ियाँ,
उनके कुत्तों को संभाला और बग़ीचों की देखभाल की,
जिन्होंने उनके लिए काम किया
वे पूछेंगे:
क्या किया था तुमने
जब ग़रीब लोग
तबाह हो रहे थे,
और उनकी मासूमियत,
उनकी मुस्कान
छिन रही थी उनसे?
3
मेरे प्रिय देश के
अराजनैतिक बुद्धिजीवियों
तुम्हारे पास कोई जवाब न होगा।सन्नाटे का एक गिद्ध
तुम्हें अंदर-ही-अंदर नोचेगा।
तुम्हारा दुर्भाग्य
तुम्हारी आत्मा को कुतरेगा।
और तुम ख़ामोश रहोगे
ख़ुद पर शर्मिंदा होगे।
स्नेह सहित,
विजय